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  • स्वामी दयानंद सरस्वती का जन्म 12 फरवरी 1824 को टंकारा (वर्तमान गुजरात) में हुआ। उनका मूल नाम मूलशंकर था। वे 19वीं शताब्दी के महान समाज एवं धर्म सुधारक थे। उन्होंने 1875 में मुंबई में आर्य समाज की स्थापना की और भारतीय समाज में वैदिक धर्म, शिक्षा तथा सामाजिक सुधारों का व्यापक प्रचार किया। स्वामी दयानंद सरस्वती के प्रमुख विचार "वेदों की ओर लौटो" (Back to the Vedas) का संदेश दिया। मूर्ति पूजा, अंधविश्वास, कर्मकांड एवं रूढ़ियों का विरोध किया। एकेश्वरवाद का समर्थन किया। स्त्री शिक्षा एवं महिला अधिकारों का समर्थन किया। बाल विवाह का विरोध तथा विधवा विवाह का समर्थन किया। जाति व्यवस्था का आधार जन्म नहीं, बल्कि कर्म माना। शिक्षा के प्रसार और राष्ट्रीय चेतना पर बल दिया। आर्य समाज के उद्देश्य वैदिक धर्म का प्रचार-प्रसार। सामाजिक कुरीतियों का उन्मूलन। स्त्री शिक्षा एवं समानता को बढ़ावा। छुआछूत एवं जातिगत भेदभाव का विरोध। राष्ट्रीय भावना एवं स्वदेशी विचारों का विकास। प्रमुख ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश (1875) ऋग्वेदादि भाष्य भूमिका वेद भाष्य योगदान भारतीय समाज में सामाजिक एवं धार्मिक सुधारों को गति दी। आधुनिक शिक्षा के प्रसार में योगदान दिया। राष्ट्रवाद और स्वाभिमान की भावना को प्रोत्साहित किया। आर्य समाज के माध्यम से शिक्षा संस्थानों की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया। आलोचनाएँ अन्य धर्मों की उनकी आलोचना विवाद का विषय बनी। वेदों की उनकी व्याख्या से सभी विद्वान सहमत नहीं थे। निष्कर्ष स्वामी दयानंद सरस्वती ने भारतीय समाज को अंधविश्वास, सामाजिक कुरीतियों और रूढ़िवादिता से मुक्त करने का प्रयास किया। उनके विचारों ने भारतीय पुनर्जागरण, समाज सुधार और राष्ट्रीय आंदोलन को नई दिशा प्रदान की

  • भारतीय पुनर्जागरण के प्रमुख कारण 1. पाश्चात्य शिक्षा का प्रभाव अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार से तर्क, विज्ञान, लोकतंत्र और मानवाधिकार जैसे आधुनिक विचारों का विकास हुआ। शिक्षित मध्यम वर्ग का उदय हुआ। 2. अंग्रेजी शासन का प्रभाव ब्रिटिश प्रशासन ने भारत को एक राजनीतिक इकाई के रूप में संगठित किया। नई न्याय व्यवस्था, संचार और प्रशासनिक सुधारों ने परिवर्तन की प्रक्रिया को गति दी। 3. ईसाई मिशनरियों की गतिविधियाँ मिशनरियों ने भारतीय समाज की कुरीतियों की आलोचना की। इससे भारतीय समाज सुधारकों ने अपने धर्म और संस्कृति का पुनर्मूल्यांकन किया। 4. मुद्रण कला एवं प्रेस का विकास समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं के माध्यम से नए विचारों का व्यापक प्रचार हुआ। सामाजिक एवं राजनीतिक चेतना का विकास हुआ। 5. सामाजिक एवं धार्मिक कुरीतियाँ सती प्रथा, बाल विवाह, जाति-भेद, अस्पृश्यता, पर्दा प्रथा जैसी बुराइयों के विरुद्ध सुधार आंदोलनों की शुरुआत हुई। 6. प्राचीन भारतीय संस्कृति का पुनः अध्ययन संस्कृत ग्रंथों, वेदों और उपनिषदों के अध्ययन से भारतीयों में अपनी सांस्कृतिक विरासत के प्रति गौरव की भावना जागृत हुई। 7. समाज सुधारकों का योगदान राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद आदि ने समाज सुधार और जागृति में महत्वपूर्ण योगदान दिया। 8. यातायात एवं संचार का विकास रेल, डाक, तार और सड़कों के विकास से विचारों का आदान-प्रदान बढ़ा। विभिन्न क्षेत्रों के लोगों में संपर्क और राष्ट्रीय चेतना का विस्तार हुआ। भारतीय पुनर्जागरण का प्रभाव सामाजिक एवं धार्मिक सुधार आंदोलनों को गति मिली। महिलाओं की शिक्षा और अधिकारों को बढ़ावा मिला। राष्ट्रीय चेतना एवं राष्ट्रवाद का विकास हुआ। आधुनिक शिक्षा और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का प्रसार हुआ। निष्कर्ष भारतीय पुनर्जागरण ने भारतीय समाज को अंधविश्वास, रूढ़ियों और सामाजिक कुरीतियों से बाहर निकालकर आधुनिकता, तर्कशीलता और राष्ट्रीय चेतना की ओर अग्रसर किया। यही जागरण आगे चलकर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की वैचारिक आधारशिला बना।

  • 1857 की क्रांति का महत्व 1. प्रथम व्यापक राष्ट्रीय विद्रोह पहली बार सैनिकों, किसानों, जमींदारों, शासकों और आम जनता ने मिलकर अंग्रेजों का विरोध किया। इसने राष्ट्रीय एकता की भावना को बल दिया। 2. राष्ट्रीय चेतना का विकास भारतीयों में स्वतंत्रता, स्वाभिमान और राष्ट्रवाद की भावना का विस्तार हुआ। आगे के राष्ट्रीय आंदोलनों को प्रेरणा मिली। 3. कंपनी शासन का अंत भारत शासन अधिनियम 1858 द्वारा ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त हुआ। भारत का शासन सीधे ब्रिटिश क्राउन के अधीन आ गया। 4. प्रशासनिक एवं सैन्य सुधार सेना का पुनर्गठन किया गया। प्रशासनिक ढाँचे में परिवर्तन हुए तथा ब्रिटिश सरकार अधिक सतर्क हुई। 5. रियासतों के प्रति नई नीति ब्रिटिश सरकार ने देशी रियासतों के साथ अपेक्षाकृत उदार नीति अपनाई। विलय की नीति (Doctrine of Lapse) को व्यावहारिक रूप से समाप्त कर दिया गया। 6. स्वतंत्रता आंदोलन की आधारशिला 1857 की क्रांति ने आगे के आंदोलनों—असहयोग, सविनय अवज्ञा और भारत छोड़ो आंदोलन—के लिए प्रेरणा और आधार प्रदान किया। 7. औपनिवेशिक नीतियों में परिवर्तन अंग्रेजों ने धर्म और सामाजिक मामलों में अपेक्षाकृत सावधानी बरतनी शुरू की। प्रशासन में भारतीयों की सीमित भागीदारी बढ़ाने का प्रयास किया गया। इतिहासकारों की राय वी. डी. सावरकर ने इसे "भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम" कहा। आर. सी. मजूमदार ने इसे मुख्यतः सैनिक विद्रोह माना, जो बाद में व्यापक रूप ले गया। निष्कर्ष 1857 की क्रांति भले ही तत्कालीन उद्देश्य प्राप्त न कर सकी, लेकिन इसने भारतीय राष्ट्रवाद को नई दिशा दी, अंग्रेजी शासन की कमजोरियों को उजागर किया और स्वतंत्रता संग्राम की मजबूत नींव रखी। इसलिए भारतीय इतिहास में इसका अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है।

  • 1857 की क्रांति के प्रमुख परिणाम 1. कंपनी शासन का अंत भारत शासन अधिनियम 1858 के तहत ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त कर दिया गया। भारत का शासन सीधे ब्रिटिश क्राउन (ब्रिटिश सम्राट) के अधीन आ गया। 2. गवर्नर-जनरल अब वायसराय बना भारत में गवर्नर-जनरल को वायसराय का पद दिया गया। लॉर्ड कैनिंग भारत के प्रथम वायसराय बने। 3. महारानी की घोषणा (1858) महारानी विक्टोरिया की घोषणा में: भारतीयों के धर्म में हस्तक्षेप न करने का आश्वासन दिया गया। भारतीय रियासतों की सुरक्षा का वचन दिया गया। सरकारी सेवाओं में समान अवसर का सिद्धांत घोषित किया गया। 4. सेना का पुनर्गठन भारतीय और अंग्रेज सैनिकों का अनुपात बदला गया। तोपखाने जैसे महत्वपूर्ण विभाग अंग्रेजों के नियंत्रण में रखे गए। "फूट डालो और राज करो" की नीति को अधिक व्यवस्थित रूप से अपनाया गया। 5. रियासतों की नीति में परिवर्तन विलय की नीति (Doctrine of Lapse) को व्यावहारिक रूप से समाप्त कर दिया गया। देशी रियासतों के प्रति अपेक्षाकृत उदार नीति अपनाई गई। 6. प्रशासनिक परिवर्तन प्रशासन को अधिक केंद्रीकृत बनाया गया। भारतीय प्रशासन पर ब्रिटिश नियंत्रण और अधिक मजबूत हुआ। 7. राष्ट्रीय चेतना का विकास भारतीयों में राष्ट्रीय एकता और स्वतंत्रता की भावना मजबूत हुई। आगे चलकर राष्ट्रीय आंदोलन को नई दिशा मिली। 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना जैसी घटनाओं के लिए अनुकूल वातावरण बना। 8. आर्थिक प्रभाव ब्रिटिश सरकार ने भारत के संसाधनों का दोहन और बढ़ा दिया। सेना एवं प्रशासन पर खर्च बढ़ने से भारतीय अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त बोझ पड़ा। सकारात्मक एवं नकारात्मक परिणाम सकारात्मक राष्ट्रीय चेतना का विकास। कंपनी शासन का अंत। प्रशासनिक सुधारों की शुरुआत। नकारात्मक ब्रिटिश दमन और कठोर हो गया। सांप्रदायिक एवं जातीय विभाजन की नीति को बढ़ावा मिला। भारतीयों पर आर्थिक बोझ बढ़ा। निष्कर्ष 1857 की क्रांति तत्कालीन उद्देश्य में सफल नहीं हुई, किंतु इसने ब्रिटिश शासन की नीतियों में बड़े परिवर्तन किए और भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की मजबूत आधारशिला रखी। इसी कारण इसे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है।

  • #Gurugyan classes 🔳उत्तर प्रदेश के शीर्ष पांच सबसे अधिक आबादी वाले जिले ◼️प्रयागराज ◼️मुरादाबाद ◼️गाजियाबाद ◼️आजमगढ़ ◼️लखनऊ #roopsir

  • #Gurugyan classes 🔳प्रारूप समिति एवं इसके सदस्य ◼️गठन- 29 अगस्त 1947 ◼️ इसमें 7 सदस्य थे ▪️डॉ बी आर अंबेडकर (अध्यक्ष ) ▪️गोपाल स्वामी आयंगर ▪️अल्लादी कृष्ण स्वामी अय्यर ▪️डॉक्टर के एम मुंशी ▪️सैयद मोहम्मद सादुल्लाह ▪️एन. माधवराव ▪️ टी टी कृष्णमचारी #roopsir

  • #Gurugyan classes 🔳उत्तर प्रदेश के राज्य चिन्ह ◼️ राज्य प्रतीक- गंगा यमुना संगम ,मछली की एक जोड़ी, धनुष -तीर ◼️राज्य वृक्ष- अशोक ◼️ राज्य पशु- बारहसिंगा ◼️राज्य पक्षी -सारस क्रेन ◼️राज्य खेल- हॉकी ◼️राज्य पुष्प- पलाश/टेसु(जंगल की आग) #roopsir

  • #Gurugyan classes # 🔳उत्तर प्रदेश में कला और शिल्प संस्थान ◼️ कला एवं शिल्प महाविद्यालय ,1911 (लखनऊ) ◼️भारतीय ललित कला परिषद ,1920(वाराणसी) ◼️लखनऊ नगर निगम आर्ट गैलरी ,1949 ◼️भारत कला भवन, 1920 (वाराणसी) ◼️ राज्य ललित कला अकादमी, 1962 (लखनऊ) #roopsir#

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