GEOPOLITICAL DISCUSSION
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यह कैसी विडंबना है रोजाना ₹10 कमाने वाला व्यक्ति और रोजाना ₹1 लाख कमाने वाला व्यक्ति भी एक ही पायदान पर एक ही तरीके से शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी सेवा में आरक्षण का दावा कर रहे हैं। इस पर विचार जब तक नहीं होगा सुधार की गुंजाइश बहुत कम है और यह चर्चा सिर्फ…
यह कैसी विडंबना है रोजाना ₹10 कमाने वाला व्यक्ति और रोजाना ₹1 लाख कमाने वाला व्यक्ति भी एक ही पायदान पर एक ही तरीके से शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी सेवा में आरक्षण का दावा कर रहे हैं। इस पर विचार जब तक नहीं होगा सुधार की गुंजाइश बहुत कम है और यह चर्चा सिर्फ…
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“ बहारों (पुलिसवालों) फूल बरसाओ मेरा महबूब (काँवरिया) आया है… ज़रा फूल बरसाओ!” 🌸 गजब का लोकतंत्र है साहब! यही पुलिस जब छात्र अपने अधिकारों के लिए सड़क पर उतरते हैं, तो हाथों में लाठियाँ आ जाती हैं। नागरिक सवाल पूछता है तो बैरिकेड खड़े हो जाते हैं। लेकिन धार्मिक जुलूस सामने आते ही वही व्यवस्था श्रद्धा में सिर झुका देती है— फूल बरसाओ, रास्ता खाली कराओ और बाकी जनता को किनारे लगाओ! सवाल काँवरिया या उनकी आस्था का नहीं है। सवाल उस दोहरे मापदंड का है, जिसमें तर्क और अधिकारों से ज्यादा महत्व भीड़ और धार्मिक भावनाओं को मिलने लगता है। छात्र के सवाल पर लाठी, नागरिक की आवाज़ पर पुलिसिया सख्ती, और धार्मिक जुलूस पर फूलों की बारिश— फिर हम किस दिशा में जा रहे हैं? आस्था निजी विश्वास हो सकती है, लेकिन जब शासन-प्रशासन भीड़ की धार्मिक पहचान देखकर अपना व्यवहार बदलने लगे, तो यह सिर्फ कानून-व्यवस्था का सवाल नहीं रह जाता—यह लोकतांत्रिक सोच और वैज्ञानिक चेतना का सवाल बन जाता है। “जो सवाल पूछे, उसे हटाओ… जो अधिकार माँगे, उसे मिटाओ… और जो धार्मिक भीड़ लेकर आए— उस पर फूल बरसाओ!” 🌸
"तानाशाह को सबसे ज़्यादा डर व्यंग्य से लगता है, क्योंकि व्यंग्य उसकी भव्यता के गुब्बारे में पिन चुभा देता है।" - हरिशंकर परसाई
Imp. for — •upsc, uppcs prelims and other state pcs exams •HEO(Anthropology Section) @EternalCivilAcademy
ये पाँच देश हैं: भारत, चीन, अज़रबैजान, हंगरी और स्लोवाकिया (रूस से तेल-गैस खरीदने वाले बड़े देश)।
राज्यसभा में विदेश मंत्रालय द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, साल 2026 में (अभी तक) प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं पर ख़र्च का ब्योरा कुछ ये है। बताओ जी फिर लोग पूछते हैं कि हमारे टैक्स का सदुपयोग कहाँ होता है? अरे भाई, इतनी मेहनत से कमाओ, सरकार को टैक्स दो और फिर ऊपर से सवाल भी पूछो! ऐसा कौन करता है🤔 चिंता मत कीजिए… आपका पैसा बिल्कुल सही जगह इस्तेमाल हो रहा है। प्रधानमंत्री की विदेश यात्राएँ हों, उनका इंतज़ाम हो या बाकी सरकारी खर्च—सब कुछ जनता की भलाई के लिए ही तो है। 🙏 और अगर अभी भी आपको अपने टैक्स की पाई-पाई का हिसाब चाहिए, तो थोड़ा इंतज़ार कीजिए… अगले बजट में सबका पाई पाई का हिसाब सामने आ जाएगा। तब तक निश्चिंत रहिए— आप कमाते रहिए, टैक्स भरते रहिए और सरकारी खर्च पर भरोसा रखिए। 🙊😂 लोकतंत्र में सवाल पूछना आपका अधिकार है… लेकिन जवाब कब और कितना मिलेगा, यह अलग सवाल है। 😌
आस्था तभी सार्थक है जब वह मनुष्य को बेहतर बनाए, परिवार को मजबूत बनाए और समाज को आगे ले जाए। यदि कोई परंपरा हमें विवेक, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक उत्तरदायित्व से दूर ले जाने लगे, तो उस पर शांतिपूर्वक और तर्कपूर्ण ढंग से विचार करना ही एक जागरूक समाज की पहचान है। राम सिंह ✍✍✍
आस्था, परंपरा और सामाजिक यथार्थ: क्या आस्था का अर्थ केवल प्रदर्शन है? कांवड़ यात्रा पर एक सामाजिक विमर्श✍✍✍ भारत विविध आस्थाओं और परंपराओं का देश है। यहाँ प्रत्येक नागरिक को अपनी धार्मिक मान्यताओं का पालन करने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है। इसी प्रकार कांवड़ यात्रा भी करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए भगवान शिव के प्रति भक्ति, श्रद्धा और व्यक्तिगत विश्वास का प्रतीक है। अनेक लोग इसे आत्मानुशासन, तप और आध्यात्मिक साधना के रूप में देखते हैं। इस आस्था का सम्मान होना चाहिए। किन्तु किसी भी परंपरा का सामाजिक मूल्यांकन करना भी उतना ही आवश्यक है। प्रश्न यह नहीं है कि आस्था सही है या गलत; प्रश्न यह है कि क्या हमारी आस्था हमें बेहतर मनुष्य, बेहतर नागरिक और बेहतर परिवार का सदस्य बना रही है, या वह केवल प्रदर्शन, भीड़ और भावनात्मक उत्साह तक सीमित होती जा रही है? आज कांवड़ यात्रा के दौरान दो तस्वीरें दिखाई देती हैं। एक ओर ऐसे श्रद्धालु हैं जो अनुशासन, संयम और श्रद्धा के साथ यात्रा करते हैं। दूसरी ओर कुछ स्थानों पर तेज़ डीजे, सड़क जाम, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान, अभद्र व्यवहार, नशाखोरी और सोशल मीडिया पर प्रसिद्धि पाने की होड़ जैसी घटनाएँ भी सामने आती हैं। यदि ऐसा होता है, तो यह धर्म नहीं बल्कि सामाजिक अनुशासन का प्रश्न बन जाता है। सबसे अधिक चिंता युवाओं को लेकर है। जिस आयु में उन्हें शिक्षा, कौशल, प्रतियोगी परीक्षाओं, रोजगार और अपने भविष्य के निर्माण में समय लगाना चाहिए, उस समय यदि वे धार्मिक आयोजनों को सोशल मीडिया प्रदर्शन या भीड़ का हिस्सा बनने का माध्यम बना लें, तो यह आत्ममंथन का विषय है किसी भी समाज का भविष्य उसके शिक्षित और विवेकशील युवाओं पर निर्भर करता है, केवल भावनात्मक उत्साह पर नहीं। यह भी एक सामाजिक तथ्य है कि बड़े धार्मिक आयोजनों में भाग लेने वालों में बड़ी संख्या निम्न और मध्यम आय वर्ग के लोगों की होती है। वहीं संपन्न और प्रभावशाली वर्ग अक्सर सीमित समय के लिए धार्मिक स्थलों पर जाकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है और अपने कामकाज में लौट जाता है। यह स्थिति यह प्रश्न उठाती है कि क्या धार्मिक आयोजनों का समय, श्रम और आर्थिक बोझ मुख्यतः साधारण नागरिक ही वहन कर रहे हैं? यह प्रश्न विचारणीय है, न कि किसी वर्ग के विरुद्ध आरोप। एक और गंभीर पक्ष यह है कि समाज में कुछ लोग धार्मिक अवसरों पर स्वयं को अत्यंत धार्मिक दिखाते हैं, लेकिन अपने दैनिक जीवन में परिवार के साथ दुर्व्यवहार, नशाखोरी, हिंसा, भ्रष्टाचार या अनैतिक आचरण से नहीं बचते। यदि किसी व्यक्ति का व्यवहार अपने माता-पिता, पत्नी, बच्चों, पड़ोसियों और समाज के प्रति सम्मानपूर्ण नहीं है, तो केवल धार्मिक यात्रा में भाग लेने से उसका चरित्र नहीं बदल जाता। धर्म की पहली परीक्षा मनुष्य के आचरण में होती है, न कि उसके बाहरी प्रदर्शन में। सुना है सच्ची भक्ति कभी शोर नहीं मचाती। सच्ची श्रद्धा को स्वयं का प्रचार करने की आवश्यकता नहीं होती। यदि धार्मिक आस्था का उद्देश्य केवल विशाल कांवड़, भारी वजन, रिकॉर्ड बनाने, रीलें बनाने या प्रसिद्धि प्राप्त करना बन जाए, तो यह स्वाभाविक है कि लोग प्रश्न पूछें कि उद्देश्य ईश्वर की आराधना है या सामाजिक प्रदर्शन। किसी की आस्था निजी हो सकती है, लेकिन उसका प्रदर्शन समाज को प्रभावित करता है। हमें यह भी सोचना होगा कि यदि कोई परिवार आर्थिक कठिनाइयों से जूझ रहा है, बच्चों की पढ़ाई अधूरी है, माता-पिता के इलाज के लिए संसाधन नहीं हैं, फिर भी धार्मिक आयोजनों पर बड़ी राशि और समय खर्च किया जाता है, तो क्या यह संतुलित प्राथमिकता है? शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल और आर्थिक आत्मनिर्भरता किसी भी परिवार के स्थायी विकास की नींव हैं। आस्था इनका विकल्प नहीं हो सकती। इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि धार्मिक यात्राएँ निरर्थक हैं। यदि कोई व्यक्ति अनुशासन, संयम, सेवा, स्वच्छता और सद्भाव के साथ अपनी आस्था का पालन करता है, तो वह उसका व्यक्तिगत अधिकार है। लेकिन जहाँ आस्था के नाम पर कानून का उल्लंघन, नशा, हिंसा, प्रदर्शन या दूसरों को असुविधा पहुँचाने की प्रवृत्ति बढ़े, वहाँ समाज को प्रश्न पूछने का पूरा अधिकार है। आस्था का सर्वोच्च रूप मानव सेवा है। यदि हम अपने माता-पिता का सम्मान करें, बच्चों को शिक्षा दें, ईमानदारी से श्रम करें, नशे से दूर रहें, महिलाओं का सम्मान करें, समाज में प्रेम और सहयोग बढ़ाएँ, तो यही किसी भी धर्म की सबसे बड़ी साधना है। सच्ची भक्ति डीजे के शोर में नहीं, चरित्र की शांति में दिखाई देती है। सच्ची आस्था भारी कांवड़ में नहीं, बल्कि ईमानदार जीवन में दिखाई देती है। सच्चा धर्म दिखावे में नहीं, बल्कि मानवता, करुणा, शिक्षा और सेवा में जीवित रहता है।
दुनियां की संपूर्ण उत्पत्ति, कल्पना, मिथक सब एक ही नज़र में
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कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत ने अब तक 30 पदक जीते हैं, जिनमें 8 स्वर्ण 15 रजत 7 कांस्य शामिल हैं।