previous year question paper and material (HINDI sahitya) हिंदी साहित्य
СтатистикаFor NET(JRF), CUET PG( Hindi) ,CUET UG( Hindi) and All other Hindi examinations
- Последний пост
- 15 авг.
- Последнее чтение
- ещё не заходили
- Постов за неделю
- 8
- Всего постов
- 37
- Тип
- открытый
- Язык
- английский
- В каталоге с
- 15 авг.
- 1/24сутки в ленте
- 168
- 1/48двое суток
- 192
- 1/72трое суток
- 207
Оценка по просмотрам недавних постов: пост набирает почти всё за первые сутки.
Посты
UPSC हिंदी साहित्य वैकल्पिक PYQ👆👆
без подписи
без подписи
без подписи
UPSC हिंदी साहित्य वैकल्पिक तैयार करने के लिए एक ग्रुप बनाया गया है। कल से भक्तिकाल पर उत्तर लेखन शुरू हो रहा है। इच्छुक अभ्यर्थी आमंत्रित हैं... Link इसके कमेंट में भेज दिया जायेगा...
без подписи
без подписи
“युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु। युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥” (~ भगवद्गीता, अध्याय 6, श्लोक 17)
उतनी दूर मत ब्याहना बाबा ! ~निर्मला पुतुल बाबा! मुझे उतनी दूर मत ब्याहना जहाँ मुझसे मिलने जाने ख़ातिर घर की बकरियाँ बेचनी पड़े तुम्हें मत ब्याहना उस देश में जहाँ आदमी से ज़्यादा ईश्वर बसते हों जंगल नदी पहाड़ नहीं हों जहाँ वहाँ मत कर आना मेरा लगन वहाँ तो कतई नहीं जहाँ की सड़कों पर मान से भी ज़्यादा तेज़ दौड़ती हों मोटर-गाडियाँ ऊँचे-ऊँचे मकान और दुकानें हों बड़ी-बड़ी उस घर से मत जोड़ना मेरा रिश्ता जिस घर में बड़ा-सा खुला आँगन न हो मुर्गे की बाँग पर जहाँ होती ना हो सुबह और शाम पिछवाडे़ से जहाँ पहाडी़ पर डूबता सूरज ना दिखे । मत चुनना ऐसा वर जो पोचाई और हंडिया में डूबा रहता हो अक्सर काहिल निकम्मा हो माहिर हो मेले से लड़कियाँ उड़ा ले जाने में ऐसा वर मत चुनना मेरी ख़ातिर कोई थारी लोटा तो नहीं कि बाद में जब चाहूँगी बदल लूँगी अच्छा-ख़राब होने पर जो बात-बात में बात करे लाठी-डंडे की निकाले तीर-धनुष कुल्हाडी़ जब चाहे चला जाए बंगाल, आसाम, कश्मीर ऐसा वर नहीं चाहिए मुझे और उसके हाथ में मत देना मेरा हाथ जिसके हाथों ने कभी कोई पेड़ नहीं लगाया फसलें नहीं उगाई जिन हाथों ने जिन हाथों ने नहीं दिया कभी किसी का साथ किसी का बोझ नहीं उठाया और तो और जो हाथ लिखना नहीं जानता हो "ह" से हाथ उसके हाथ में मत देना कभी मेरा हाथ ब्याहना तो वहाँ ब्याहना जहाँ सुबह जाकर शाम को लौट सको पैदल मैं कभी दुःख में रोऊँ इस घाट तो उस घाट नदी में स्नान करते तुम सुनकर आ सको मेरा करुण विलाप..... महुआ का लट और खजूर का गुड़ बनाकर भेज सकूँ सन्देश तुम्हारी ख़ातिर उधर से आते-जाते किसी के हाथ भेज सकूँ कद्दू-कोहडा, खेखसा, बरबट्टी समय-समय पर गोगो के लिए भी मेला हाट जाते-जाते मिल सके कोई अपना जो बता सके घर-गाँव का हाल-चाल चितकबरी गैया के ब्याने की ख़बर दे सके जो कोई उधर से गुजरते ऐसी जगह में ब्याहना मुझे उस देश ब्याहना जहाँ ईश्वर कम आदमी ज़्यादा रहते हों बकरी और शेर एक घाट पर पानी पीते हों जहाँ वहीं ब्याहना मुझे! उसी के संग ब्याहना जो कबूतर के जोड़ और पंडुक पक्षी की तरह रहे हरदम साथ घर-बाहर खेतों में काम करने से लेकर रात सुख-दुःख बाँटने तक चुनना वर ऐसा जो बजाता हों बाँसुरी सुरीली और ढोल-मांदर बजाने में हो पारंगत बसंत के दिनों में ला सके जो रोज़ मेरे जूड़े की ख़ातिर पलाश के फूल जिससे खाया नहीं जाए मेरे भूखे रहने पर उसी से ब्याहना मुझे।
अजीम प्रेमजी स्कॉलरशिप only for girl's राज्य और केंद्र शासित प्रदेश* आंध्र प्रदेश ,अरुणाचल प्रदेश, असम, बिहार, दिल्ली (NCT), छत्तीसगढ़, झारखंड, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, ओडिशा, राजस्थान, सिक्किम, तेलंगाना, त्रिपुरा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी।
हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए ~दुष्यन्त कुमार हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए, इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए। आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी, शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए। हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में, हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए। सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए। मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही, हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।
कवि की वासना ~हरिवंशराय बच्चन कह रहा जग वासनामय हो रहा उद्गार मेरा! १ सृष्टि के प्रारंभ में मैने उषा के गाल चूमे, बाल रवि के भाग्य वाले दीप्त भाल विशाल चूमे, प्रथम संध्या के अरुण दृग चूम कर मैने सुलाए, तारिका-कलि से सुसज्जित नव निशा के बाल चूमे, वायु के रसमय अधर पहले सके छू होठ मेरे मृत्तिका की पुतलियो से आज क्या अभिसार मेरा? कह रहा जग वासनामय हो रहा उद्गार मेरा! २ विगत-बाल्य वसुंधरा के उच्च तुंग-उरोज उभरे, तरु उगे हरिताभ पट धर काम के धव्ज मत्त फहरे, चपल उच्छृंखल करों ने जो किया उत्पात उस दिन, है हथेली पर लिखा वह, पढ़ भले ही विश्व हहरे; प्यास वारिधि से बुझाकर भी रहा अतृप्त हूँ मैं, कामिनी के कंच-कलश से आज कैसा प्यार मेरा! कह रहा जग वासनामय हो रहा उद्गार मेरा! ३ इन्द्रधनु पर शीश धरकर बादलों की सेज सुखकर सो चुका हूँ नींद भर मैं चंचला को बाहों में भर, दीप रवि-शशि-तारकों ने बाहरी कुछ केलि देखी, देख, पर, पाया न कोई स्वप्न वे सुकुमार सुंदर जो पलक पर कर निछावर थी गई मधु यामिनी वह; यह समाधि बनी हुई है यह न शयनागार मेरा! कह रहा जग वासनामय हो रहा उद्गार मेरा! ४ आज मिट्टी से घिरा हूँ पर उमंगें हैं पुरानी, सोमरस जो पी चुका है आज उसके हाथ पानी, होठ प्यालों पर टिके तो थे विवश इसके लिये वे, प्यास का व्रत धार बैठा; आज है मन, किन्तु मानी; मैं नहीं हूँ देह-धर्मों से बिधा, जग, जान ले तू, तन विकृत हो जाये लेकिन मन सदा अविकार मेरा! कह रहा जग वासनामय हो रहा उद्गार मेरा! ५ निष्परिश्रम छोड़ जिनको मोह लेता विश्व भर को, मानवों को, सुर-असुर को, वृद्ध ब्रह्मा, विष्णु, हर को, भंग कर देता तपस्या सिद्ध, ऋषि, मुनि सत्तमों की वे सुमन के बाण मैंने, ही दिये थे पंचशर को; शक्ति रख कुछ पास अपने ही दिया यह दान मैंने, जीत पाएगा इन्हीं से आज क्या मन मार मेरा! कह रहा जग वासनामय हो रहा उद्गार मेरा! ६ प्राण प्राणों से सकें मिल किस तरह, दीवार है तन, काल है घड़ियां न गिनता, बेड़ियों का शब्द झन-झन वेद-लोकाचार प्रहरी ताकते हर चाल मेरी, बद्ध इस वातावरण में क्या करे अभिलाष यौवन! अल्पतम इच्छा यहां मेरी बनी बंदी पड़ी है, विश्व क्रीडास्थल नहीं रे विश्व कारागार मेरा! कह रहा जग वासनामय हो रहा उद्गार मेरा! ७ थी तृषा जब शीत जल की खा लिये अंगार मैंने, चीथड़ों से उस दिवस था कर लिया श्रृंगार मैंने राजसी पट पहनने को जब हुई इच्छा प्रबल थी, चाह-संचय में लुटाया था भरा भंडार मैंने; वासना जब तीव्रतम थी बन गया था संयमी मैं, है रही मेरी क्षुधा ही सर्वदा आहार मेरा! कह रहा जग वासनामय हो रहा उद्गार मेरा! ८ कल छिड़ी, होगी ख़तम कल प्रेम की मेरी कहानी, कौन हूँ मैं, जो रहेगी विश्व में मेरी निशानी? क्या किया मैंने नही जो कर चुका संसार अबतक? वृद्ध जग को क्यों अखरती है क्षणिक मेरी जवानी? मैं छिपाना जानता तो जग मुझे साधू समझता, शत्रु मेरा बन गया है छल-रहित व्यवहार मेरा! कह रहा जग वासनामय हो रहा उद्गार मेरा!
इसका अर्थ बताइए आपलोग🤣🤣🤣 शायद मिथिला क्षेत्र वाले ही बता पाएंगे 😅😅😅
कौन-सी बात कहाँ, कैसे कही जाती है ये सलीक़ा हो, तो हर बात सुनी जाती है डॉ वसीम बरेलवी
जो शिलाएँ तोड़ते हैं ~केदारनाथ अग्रवाल ज़िंदगी को वह गढ़ेंगे जो शिलाएँ तोड़ते हैं, जो भगीरथ नीर की निर्भय शिराएँ मोड़ते हैं। यज्ञ को इस शक्ति-श्रम के श्रेष्ठतम् मैं मानता हूँ!! ज़िंदगी को वे गढ़ेंगे जो खदानें खोदते हैं, लौह के सोए असुर को कर्म-रथ में जोतते हैं। यज्ञ को इस शक्ति श्रम के श्रेष्ठतम् मैं मानता हूँ!! ज़िंदगी को वे गढ़ेंगे जो प्रभंजन हाँकते हैं, शूरवीरों के चरण से रक्त-रेखा आँकते हैं। यज्ञ को इस शक्ति-श्रम के श्रेष्ठतम् मैं मानता हूँ!! ज़िंदगी को वे गढ़ेंगे जो प्रलय को रोकते हैं, रक्त से रंजित धरा पर शांति का पथ खोजते हैं। यज्ञ को इस शक्ति-श्रम के श्रेष्ठतम् मैं मानता हूँ!! मैं नया इंसान हूँ इस यज्ञ में सहयोग दूँगा। ख़ूबसूरत ज़िंदगी की नौजवानी भोग लूँगा।
कुछ लोग तुम्हें समझाएँगे वो तुम को ख़ौफ़ दिलाएँगे जो है वो भी खो सकता है इस राह में रहज़न हैं इतने कुछ और यहाँ हो सकता है कुछ और तो अक्सर होता है पर तुम जिस लम्हे में ज़िंदा हो ये लम्हा तुम से ज़िंदा है ये वक़्त नहीं फिर आएगा तुम अपनी करनी कर गुज़रो जो होगा देखा जाएगा
सतपुड़ा के घने जंगल ~भवानीप्रसाद मिश्र सतपुड़ा के घने जंगल। नींद मे डूबे हुए से ऊँघते अनमने जंगल। झाड ऊँचे और नीचे, चुप खड़े हैं आँख मीचे, घास चुप है, कास चुप है मूक शाल, पलाश चुप है। बन सके तो धँसो इनमें, धँस न पाती हवा जिनमें, सतपुड़ा के घने जंगल ऊँघते अनमने जंगल। सड़े पत्ते, गले पत्ते, हरे पत्ते, जले पत्ते, वन्य पथ को ढँक रहे-से पंक-दल मे पले पत्ते। चलो इन पर चल सको तो, दलो इनको दल सको तो, ये घिनौने, घने जंगल नींद में डूबे हुए से ऊँघते अनमने जंगल। अटपटी-उलझी लताएँ, डालियों को खींच खाएँ, पैर को पकड़ें अचानक, प्राण को कस लें कपाएँ। साँप सी काली लताएँ बला की पाली लताएँ लताओं के बने जंगल नींद मे डूबे हुए से ऊँघते अनमने जंगल। मकड़ियों के जाल मुँह पर, और सर के बाल मुँह पर मच्छरों के दंश वाले, दाग काले-लाल मुँह पर, वात-झन्झा वहन करते, चलो इतना सहन करते, कष्ट से ये सने जंगल, नींद मे डूबे हुए से ऊँघते अनमने जंगल। अजगरों से भरे जंगल। अगम, गति से परे जंगल सात-सात पहाड़ वाले, बड़े छोटे झाड़ वाले, शेर वाले बाघ वाले, गरज और दहाड़ वाले, कम्प से कनकने जंगल, नींद मे डूबे हुए से ऊँघते अनमने जंगल। इन वनों के खूब भीतर, चार मुर्गे, चार तीतर पाल कर निश्चिन्त बैठे, विजनवन के बीच बैठे, झोंपडी पर फूस डाले गोंड तगड़े और काले। जब कि होली पास आती, सरसराती घास गाती, और महुए से लपकती, मत्त करती बास आती, गूँज उठते ढोल इनके, गीत इनके, बोल इनके सतपुड़ा के घने जंगल नींद मे डूबे हुए से उँघते अनमने जंगल। जागते अँगड़ाइयों में, खोह-खड्डों खाइयों में, घास पागल, कास पागल, शाल और पलाश पागल, लता पागल, वात पागल, डाल पागल, पात पागल मत्त मुर्गे और तीतर, इन वनों के खूब भीतर। क्षितिज तक फ़ैला हुआ-सा, मृत्यु तक मैला हुआ-सा, क्षुब्ध, काली लहर वाला मथित, उत्थित जहर वाला, मेरु वाला, शेष वाला शम्भु और सुरेश वाला एक सागर जानते हो, उसे कैसा मानते हो? ठीक वैसे घने जंगल, नींद मे डूबे हुए से ऊँघते अनमने जंगल। धँसो इनमें डर नहीं है, मौत का यह घर नहीं है, उतर कर बहते अनेकों, कल-कथा कहते अनेकों, नदी, निर्झर और नाले, इन वनों ने गोद पाले। लाख पंछी सौ हिरन-दल, चाँद के कितने किरण दल, झूमते बन-फूल, फलियाँ, खिल रहीं अज्ञात कलियाँ, हरित दूर्वा, रक्त किसलय, पूत, पावन, पूर्ण रसमय सतपुड़ा के घने जंगल, लताओं के बने जंगल।
मैं शून्य पे सवार हूँ बेअदब सा मैं खुमार हूँ अब मुश्किलों से क्या डरूं मैं खुद कहर हज़ार हूँ मैं शून्य पे सवार हूँ मैं शून्य पे सवार हूँ उंच-नीच से परे मजाल आँख में भरे मैं लड़ रहा हूँ रात से मशाल हाथ में लिए न सूर्य मेरे साथ है तो क्या नयी ये बात है वो शाम होता ढल गया वो रात से था डर गया मैं जुगनुओं का यार हूँ मैं शून्य पे सवार हूँ मैं शून्य पे सवार हूँ भावनाएं मर चुकीं संवेदनाएं खत्म हैं अब दर्द से क्या डरूं ज़िन्दगी ही ज़ख्म है मैं बीच रह की मात हूँ बेजान-स्याह रात हूँ मैं काली का श्रृंगार हूँ मैं शून्य पे सवार हूँ मैं शून्य पे सवार हूँ Writer Zakir khan
पर्दे के पीछे के लोग ~आकाश अनंत अकेले छूट जाते हैं अक्सर वो लोग, जो कैमरामैन की तरह तस्वीर के पीछे होते हैं। एक बेहतर तस्वीर, सही रोशनी और चमक की तलाश में, वो खुद को अंधेरों में ही संजोते हैं। टूट जाते हैं वो लोग, जैसे पतझड़ की पत्तियां शाखों से गिरती हैं। न राख होने का डर, न मिट्टी में मिलने का मलाल। किसी नाटक या फिल्म के उस पर्दे की तरह, जिसके पीछे की मेहनत कोई देख नहीं पाता। दिखने में आम, पर होते हैं खास। न अखबार की सुर्खियां, न न्यूज़ की चमक, वो बस अपनों की कद्र और इज्जत को पाल लेते हैं।
https://kaavyaalaya.org/mdhshla