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  • मोदीजी का न्याये ‘न’ राज्यम् और नफरती एंकर-एंकराओं की दौड़ रांची तक https://hindi.newslaundry.com/2026/08/14/nl-tippani-episode-289-naredra-modi-nyaye-n-rajyam-and-zen-z-mohan-bhagwat जो अपने दफ्तर से कुछ किलोमीटर दूर जंतर-मंतर नहीं पहुंच सके वो एक हजार किलोमीटर दूर रांची पहुंच गए. ताकि अपने बिके हुए जमीर की नुमाइश कर सकें. इस जमात के एंकर एंकराओं की कोशिश यही थी कि किसी भी तरह से रांची के छात्र आंदोलन से जंतर-मंतर के छात्र आंदोलन को कमतर दिखाया जाए. और इस तरह जंतर-मंतर पर इनको युवाओं और छात्रों ने जो आइना दिखाया था, उसका दर्द  थोड़ा कम किया जा सके. पर ऐसा हो न सका.उधर, उत्तर प्रदेश के बरेली में बजरंगदल कार्यकर्ताओं ने नया गुल खिलाया. पहले एक किलो चिकन बिरयानी खरीदी. उसके बाद प्रशासन को सूचना दी कि फलां बिरियानी बेच रहा है. इसके बाद प्रशासन ने आकर बुलडोजर से सलमान का काउंटर गिरा दिया, टीन शेड तोड़ दिया. एक व्यक्ति की आस्था की कीमत दूसरे व्यक्ति की रोजी को चुकानी पड़ रही है क्योंकि देश में अमृतकाल चल रहा है. ऐसा आपने कब देखा सुना कि बिरियानी बेचने या रोजी-रोटी के लिए कुछ करने के आरोप में किसी के दुकान पर बुलडोजर चला दिया जाय. यही न्याय वाला राज्य है जिसके बारे में मोदीजी संस्कृत में कहते हैं न्याये न राज्यम्.रामजी का चंदा चोरी और डंकापति की वापसी (https://hindi.newslaundry.com/2026/07/03/nl-tippani-episode-287-on-ayodhya-ram-mandir-donation-scam)मिस्टर इंडिया मोदी सरकार, ई20 का घनचक्कर और कॉकरोचों की भूख हड़ताल  (https://hindi.newslaundry.com/2026/07/17/nl-tippani-episode-288-mr-india-modi-e20-mandate-and-cockroach-janta-party-protest)

  • एसआईआर कैंप: सवालों और संशय के बीच कैसे तैयार हो रही मतदाताओं की सूची  https://hindi.newslaundry.com/2026/08/13/sir-camp-how-the-voter-list-is-being-prepared-amidst-questions-and-doubts राजधानी दिल्ली में इन दिनों एसआईआर यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन की प्रक्रिया जारी है. चुनाव आयोग ने फॉर्म भरने की अंतिम तारीख बढ़ाकर 17 अगस्त कर दी है. फॉर्म बांटने से लेकर उन्हें जमा करने और डिजिटाइजेशन तक का काम बीएलओ कर रहे हैं.पूरी प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए कुछ स्थानीय लोगों ने अपने घरों में छोटे-छोटे कैंप भी लगाए हैं. हमने ऐसे ही एक कैंप का दौरा किया, जहां फॉर्म भरवाने पहुंचे लोगों को इसे समझने और जमा करने में कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा हैं.कई लोगों के लिए यह प्रक्रिया एक नई चुनौती बनकर सामने आई है. वहीं, कुछ लोगों के मन में एसआईआर को लेकर नागरिकता चले जाने का डर भी नजर आया. इसी बीच, फॉर्म में दिए गए ‘रिलेटिव’ टर्म को लेकर भी मतदाताओं और प्रक्रिया में मदद कर रहे लोगों के साथ खुद बिएलओ और ईआरो भी असमंजस में दिखाई दिए.सरकार से नाराज़ अबिदा अब वोट नहीं डालतीं। लेकिन लोगों ने कहा कि फॉर्म नहीं भरा तो दिल्ली से निकाल दिया जाएगा। इसी डर से वह कैंप पहुंचीं। उन्होंने हमसे कहा, “चलो, फॉर्म भर भी दूं तो क्या तुम तोड़फोड़ रोक दोगे?”इन कैंपों में पूरे दिन क्या होता है और एसआईआर को लेकर मतदाताओं की क्या राय है? जानने के लिए देखिए ये रिपोर्ट.सुप्रीम कोर्ट का फैसला: चुनाव आयोग को एसआईआर प्रक्रिया चलाने का पूरा अधिकार (https://hindi.newslaundry.com/2026/05/27/supreme-court-uphold-election-commission-full-authority-to-conduct-sir-process)यूपी एसआईआर: 2003 की सूची वाले नाम 2026 की ड्राफ्ट लिस्ट से गायब (https://hindi.newslaundry.com/2026/01/22/names-listed-in-the-2003-electoral-roll-missing-from-the-2026-draft-list-in-up-after-sir)

  • पुलिसकर्मियों के बयान शब्दशः एक जैसे थे. यही एक तथ्य इस मामले की आगे की पड़ताल का आधार बना.रिपोर्ट ने जांच की कि जुलाई, 2023 की हिंसा के पीछे विदेशी साजिश का दावा कायम रखने और यूएपीए के तहत गिरफ्तारियों को सही ठहराने के लिए किस तरह की रणनीतियां अपनाई गईं.राजस्थान का एंटी-कन्वर्जन कानून कैसे बनायह दो हिस्सों में प्रकाशित एक श्रृंखला थी, जिसे नवंबर, 2025 में प्रकाशित किया गया. उस समय राजस्थान अपना धर्मांतरण विरोधी कानून बनाने वाला बीजेपी शासित नौवां राज्य बन चुका था. महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ भी इसी तरह के कानून पर विचार कर रहे थे. इसी दौरान सुप्रीम कोर्ट में ऐसे कानूनों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई चल रही थी. कर्नाटक में कांग्रेस ने 2023 में सत्ता में आने के बाद इस कानून को खत्म करने का वादा किया था. लेकिन उसके बाद इस दिशा में बहुत कम कार्रवाई हुई.सीरीज के पहले हिस्से (https://www.newslaundry.com/2025/11/04/in-rajasthans-anti-conversion-campaign-third-party-complaints-police-bias-hindutva-link) में न्यूज़लॉन्ड्री ने धर्म परिवर्तन के आरोपों से जुड़े सात मामलों की पड़ताल की. ये मामले फरवरी, 2024 से जुलाई, 2025 के बीच भरतपुर, दौसा, झुंझुनू, जयपुर और बांसवाड़ा के अलावा पिलानी तहसील में दर्ज किए गए थे.रिपोर्ट में दिखाया गया कि राज्य सरकार के एंटी-कन्वर्जन कानून लाने से पहले ही एक पैटर्न उभर चुका था. इन मामलों में ऐसे तीसरे पक्ष के लोगों ने शिकायतें दर्ज कराईं, जिनका संबंधित परिवारों से कोई संबंध नहीं था. पुलिस ने इन शिकायतों पर कार्रवाई की. ईसाइयों को अपने ही घरों में प्रार्थना करने के दौरान भी हमलों का सामना करना पड़ा.दूसरे हिस्से (https://www.newslaundry.com/2025/11/08/how-youtubers-and-media-outlets-drive-rajasthans-anti-conversion-hysteria) में यह जांच की गई कि यूट्यूबर्स और मीडिया संस्थान राजस्थान में एंटी-कन्वर्जन उन्माद को कैसे बढ़ावा दे रहे थे.वीएचपी, बजरंग दल, आरएसएस और बीजेपी नेताओं के आरोपों को यूट्यूबर्स और मीडिया संस्थानों ने आगे बढ़ाया और कई बार उन्हें स्थापित तथ्य की तरह पेश किया. इनमें से कई मामलों में न तो मुकदमे का फैसला हुआ था और कई मामलों में चार्जशीट तक दाखिल नहीं हुई थी.यूपी के बरेली में एक जन्मदिन की पार्टीदिसंबर, 2025 में प्रकाशित हुई रिपोर्ट (https://www.newslaundry.com/2025/12/29/should-i-kill-myself-how-a-womans-birthday-party-became-a-free-pass-for-a-hindutva-mob) में बताया गया कि कैसे एक महिला की जन्मदिन पार्टी हिंदुत्ववादी भीड़ के लिए खुला न्यौता बन गई.दरअसल, शिवांगी के नर्सिंग कोर्स के दो महीने बाकी थे. वह केशलता इंस्टीट्यूट ऑफ नर्सिंग में पढ़ रही थीं. उन्होंने अपने 22वें जन्मदिन पर अपने बैचमेट्स के साथ साल का अंत जश्न मनाकर करने का फैसला किया था. एक बजरंग दल कार्यकर्ता कैफे में पहुंचा. इसके बाद शिवांगी के मुस्लिम सहपाठियों पर ‘लव जिहाद’ के आरोप लगाए गए. शिवांगी ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई. लेकिन एफआईआर दर्ज नहीं की गई.इसके बजाय उनके सहपाठियों और कैफे के मालिक पर गैरकानूनी जमावड़े का मामला दर्ज कर दिया गया. गौरतलब है कि प्रेम भाटिया पत्रकारिता पुरस्कार और व्याख्यान की शुरुआत 1995 में प्रेम भाटिया मेमोरियल ट्रस्ट ने की थी. यह पुरस्कार द ट्रिब्यून के वरिष्ठ संपादक रहे प्रेम भाटिया की स्मृति में शुरू किया गया था. 2024 में ट्रस्ट ने अपनी पूरी निधि एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया को सौंप दी थी.नोट: आकांक्षा कुमार ने बतौर स्वतंत्र पत्रकार न्यूज़लॉन्ड्री के लिए यह रिपोर्टिंग की की थीं. वर्तमान में वह द वायर के साथ काम कर रही हैं.'एनकाउंटर राज' की पड़ताल: एक जगह, तीन मुठभेड़, वही कहानी? (https://hindi.newslaundry.com/2025/06/06/uttar-pradesh-police-half-encounter-trends-are-victims-getting-justice-under-this-encounter-raj)उत्तर प्रदेश: 236 मुठभेड़ और एक भी दोषी नहीं, ‘एनकाउंटर राज’ में एनएचआरसी बना मूकदर्शक (https://hindi.newslaundry.com/2025/07/17/uttar-pradesh-236-encounters-and-not-a-single-convict-nhrc-remains-a-mute-spectator-in-encounter-raj)

  • ‘एनकाउंटर राज’ से ‘हिंदुत्ववादी हिंसा’ तक: अकांक्षा कुमार की पांच रिपोर्टों को प्रेम भाटिया पुरस्कार https://hindi.newslaundry.com/2026/08/12/akanksha-kumar-receive-2026-prem-bhatia-award-for-political-journalism वरिष्ठ पत्रकार आकांक्षा कुमार को साल 2026 का प्रेम भाटिया पत्रकारिता पुरस्कार मिला है. उन्हें राजनीतिक पत्रकारिता में उत्कृष्टता के लिए इस सम्मान से नवाज़ा गया है. आकांक्षा को यह पुरस्कार 2025 में न्यूज़लॉन्ड्री पर प्रकाशित पांच रिपोर्टों के लिए एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया की ओर से मिला है. पुरस्कार समारोह मंगलवार को दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित किया गया. जहां वरिष्ठ वकील और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने प्रेम भाटिया स्मृति व्याख्यान भी दिया. सिब्बल ने इस दौरान “लोकतंत्र के दो सबसे मजबूत स्तंभ प्रेस और न्यायपालिका हैं, दोनों हमें विफल कर चुके हैं, क्यों?” विषय पर अपनी बात रखी.  आकांक्षा कुमार ने इन सभी रिपोर्टों के लिए महीनों तक पड़ताल की. इन रिपोर्टों के लिए उन्हें ऐसे जिलों की यात्रा भी करनी पड़ी, जो आमतौर पर राष्ट्रीय खबरों में जगह नहीं बना पाते. इनमें से किसी भी रिपोर्ट के साथ शुरुआत में यह गारंटी नहीं थी कि जांच किसी ठोस निष्कर्ष तक पहुंचेगी. यही पत्रकारिता का वह हिस्सा है, जिसे विज्ञापन के जरिए फंड नहीं किया जाता और जिस पर बाकी न्यूज़रूम खर्च नहीं कर सकते. खोजी पत्रकारिता का यह दायरा अब और तेजी से सिकुड़ रहा है.न्यूज़लॉन्ड्री में ऐसी पत्रकारिता इसलिए संभव है क्योंकि सब्सक्राइबर इसके लिए भुगतान करते हैं. अगर आप चाहते हैं कि इस तरह की रिपोर्टिंग जारी रहे, तो आज ही सब्सक्राइब करें (https://www.newslaundry.com/subscription). भुगतान करें, ताकि खबरों की आजादी बनी रहे. Thrilled to share that I have been conferred the Prem Bhatia Award for Excellence in Political Journalism 2026 by the Editors Guild of India (@IndEditorsGuild (https://x.com/IndEditorsGuild?ref_src=twsrc%5Etfw)) for five stories published in 2025 by @newslaundry (https://x.com/newslaundry?ref_src=twsrc%5Etfw). The submissions included stories on: 1) Police encounters in Uttar… pic.twitter.com/qYxB0Ip52z (https://t.co/qYxB0Ip52z)— Akanksha Kumar (@akanksha_kumar3) August 12, 2026 (https://x.com/akanksha_kumar3/status/2087382083291484463?ref_src=twsrc%5Etfw) तीन राज्य, पांच रिपोर्टपुरस्कार से सम्मानित पांच रिपोर्टें तीन राज्यों से जुड़ी हैं और अलग-अलग मुद्दों को सामने लाती हैं.इनमें पुलिस द्वारा कथित फर्जी मुठभेड़ में हत्याएं, सांप्रदायिक हिंसा को विदेशी साजिश साबित करने के लिए आतंकवाद विरोधी कानून के इस्तेमाल, धार्मिक अल्पसंख्यकों पर धीरे-धीरे बढ़ते कानूनी दबाव और कट्टर हिंदुत्ववादी समूहों के बेखौफ होने जैसे मुद्दे शामिल हैं.उत्तर प्रदेश पुलिस के खिलाफ एक मां की लड़ाईजून 2025 में प्रकाशित इस रिपोर्ट का शीर्षक था, “एनकाउंटर राज' की पड़ताल: एक जगह, तीन मुठभेड़, वही कहानी?.” (https://hindi.newslaundry.com/2025/06/06/uttar-pradesh-police-half-encounter-trends-are-victims-getting-justice-under-this-encounter-raj)दरअसल, विजय सोनी की मौत उन हजारों मामलों में से एक थी. जहां पुलिस ने मुठभेड़ की कहानी रची थी. मालूम हो कि मार्च 2017 से सितंबर 2024 के बीच उत्तर प्रदेश पुलिस ने 12,964 मुठभेड़ का आंकड़ा पेश किया. यानि उत्तर प्रदेश पुलिस औसतन हर दिन करीब पांच मुठभेड़ कर रही थी. विजय सोनी की मां अंजू देवी ने फर्जी मुठभेड़ के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया. अदालत ने 12 पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया लेकिन एफआईआर दर्ज नहीं हुई.फैसले के दस दिन बाद पुलिस ने इलाहाबाद हाईकोर्ट से आदेश पर स्टे हासिल कर लिया. इस खोजी रिपोर्ट में पुलिस रिकॉर्ड और कानूनी दस्तावेजों के जरिए घटनाओं की पूरी कड़ी को दोबारा तैयार किया गया. रिपोर्ट ने यह भी विस्तार से बताया कि पुलिस की कहानी किन बिंदुओं पर कमजोर पड़ती है.कट, कॉपी, चार्जअप्रैल, 2025 में प्रकाशित रिपोर्ट का शीर्षक था, “कट, कॉपी, चार्ज: नूंह हिंसा में हरियाणा पुलिस के कमजोर केस के अंदर की कहानी.” (https://www.newslaundry.com/2025/04/18/cut-copy-charge-inside-haryana-polices-flawed-case-on-nuh-violence)दरअसल, 15 जनवरी 2024 को हरियाणा पुलिस के तीन कर्मचारियों ने छह महीने पहले हुई नूंह की सांप्रदायिक हिंसा के बारे में बयान दिए थे. इस हिंसा में दो होमगार्ड की मौत हुई थी. इस हिंसा को फरवरी, 2023 में कथित तौर पर गौ रक्षकों द्वारा नासिर हुसैन और जुनैद खान की हत्या के बदले के रूप में पेश किया गया था. तीनों

  • कांवड़ यात्रा: महिलाओं के लिए आस्था का यह सफर कितना मुश्किल, कितना आसान https://hindi.newslaundry.com/2026/08/12/kanwar-yatra-how-difficult-or-easy-is-this-journey-of-faith-for-women सावन का महीना यानि भगवान शिव के भक्तों के लिए अपने आस्था के सफर पर निकलने का मौका. शिव के कांवड़ यात्री हरिद्वार से गंगाजल लेकर अपने घरों को लौटते हैं और शिवरात्रि के दिन नजदीकी मंदिरों में जल अर्पित करते हैं. इसी अर्पण के साथ उनका यह कई दिनों का सफर समाप्त होता है. बीते सालों में इस सफर पर महिलाएं भी पुरुषों के बराबर कंधा मिलाने लगी हैं. लेकिन इस दौरान उन्हें किस तरह की दिक्कतें पेश आती हैं और क्या चीज उनका हौसला बनाए रखती है, यही जानने के लिए हमने महिला कांवड़ यात्रियों से बात की. इस दौरान महिलाओं ने अपने सफर और उसके दौरान आने वाली मुश्किलों के बारे खुलकर बात की. कांवड़ यात्री कीर्ति ने बताया कि वह अपने पति और सात महीने के बच्चे के साथ इतनी लंबी यात्रा कैसे तय कर रही हैं. वहीं, खुशबू ने अपने खेल के प्रति प्रेम और उससे जुड़ी चुनौतियों के बारे में भी हमसे बात की.  देखिए हमारी ये खास रिपोर्ट.कांवड़ का कहर: 12 होटल- सवा तीन करोड़ का घाटा (https://hindi.newslaundry.com/2025/07/28/kanwar-yatra-route-12-hotels-face-more-than-3-crore-loss-in-during-sawan)‘तुम ज्ञान के दीप जलाना, कांवड़ लेने मत जाना’ कविता पढ़ने वाले टीचर पर एफआईआर दर्ज (https://hindi.newslaundry.com/2025/07/15/fir-lodged-against-the-bareily-teacher-who-recited-poem-tum-gyan-ke-deep-jalana-kanwar-lene-mat-jana)

  • अरुंधति रॉय: “चुनावी हार से बड़ा है जंतर मंतर का मैसेज” https://hindi.newslaundry.com/2026/08/11/nl-interviews-with-arundhati-roy-about-her-book-meri-maa-meri-gangster अरुंधति रॉय की नई किताब ‘मेरी मां, मेरी गैंगस्टर’ उनकी मां मेरी रॉय की कहानी के बहाने उनके अपने बचपन, परिवार, रिश्तों और लेखिका बनने की यात्रा को सामने लाती है. लेकिन न्यूज़लॉन्ड्री के साथ इस बातचीत में किताब के पन्नों से आगे निकलकर मौजूदा राजनीति और छात्र आंदोलन पर भी खुलकर चर्चा हुई.अरुंधति रॉय ने अपनी मां के साथ जटिल रिश्ते, 16 साल की उम्र में घर छोड़ने, दिल्ली में आर्किटेक्चर की पढ़ाई, दोस्तियों और अपने लेखन की शुरुआत के बारे में विस्तार से बात की. वह बताती हैं कि उनकी मां एक साथ ‘बेहद महान’ और ‘बेहद कठोर’ महिला थीं और क्यों उन्हें समझने के लिए सिर्फ मां के रूप में नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र महिला के रूप में देखना जरूरी है.बातचीत में जंतर-मंतर के छात्र आंदोलन और शिक्षा व्यवस्था से लेकर नरेंद्र मोदी की राजनीति, राजनीतिक छवि, चुनाव, लोकतांत्रिक संस्थाओं, नर्मदा और बस्तर के आंदोलनों, पर्यावरण और सामाजिक असमानता तक कई मुद्दों पर चर्चा हुई. अरुंधति रॉय के मुताबिक, मौजूदा छात्र आंदोलन को सिर्फ परीक्षा और शिक्षा के सवाल तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता.इस खास बातचीत में जानिए अरुंधति रॉय की मां मेरी रॉय कैसी थीं? उनके बचपन ने उनकी सोच को कैसे आकार दिया? ‘द गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स’ के पीछे उनके परिवार और स्मृतियों की क्या भूमिका रही? और आज के भारत की राजनीति और आंदोलनों को वह किस नजर से देखती हैं?देखिए पूरी बातचीत.

  • झारखंड विधानसभा घेराव, लाठीचार्ज और हिंसा का पूरा सच https://hindi.newslaundry.com/2026/08/11/the-full-truth-behind-the-jharkhand-assembly-gherao-lathi-charge-and-violence झारखंड में झारखंड लोक सेवा आयोग और झारखंड कर्मचारी चयन आयोग परीक्षाओं में कथित पेपर लीक और धांधली के खिलाफ कल राजधानी रांची में हुआ छात्रों का 'विधानसभा महा-घेराव' हुआ. परीक्षाओं को रद्द करने और केंद्रीय जांच एजेंसी (सीबीआई) द्वारा मामले की पड़ताल को लेकर राज्य के सभी 24 जिलों से आए हजारों अभ्यर्थियों ने पुलिस द्वारा लगाए गए तमाम सुरक्षा घेरों को तोड़ दिया. प्रशासन द्वारा लागू की गई धारा 163 और कंटीले तारों की सुरक्षा घेरेबंदी को तोड़ते हुए आक्रोशित छात्र विधानसभा परिसर में पहुंच गए. हालांकि, दिनभर चले प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने वाटर कैनन, लाठीचार्ज और आंसू गैस का इस्तेमाल किया. जिसमें कई छात्र घायल हुए. वहीं पुलिस का कहना है कि प्रदर्शनकारियों की तरफ से पथराव किया गया जिसमे कई सुरक्षाकर्मी घायल हुए हैं.  ऐसे में सवाल उठता है कि इन दोनों दावों का सच क्या है. इसी सवाल का जवाब हम अपनी रिपोर्ट मे लेकर आ रहे हैं. देखिए हमारी यह खास ग्राउंड रिपोर्ट .  झारखंड में 14 दिन से आंदोलन जारी, छात्र बोले- ‘हम पार्टी के साथ पर इस सिस्टम के खिलाफ' (https://hindi.newslaundry.com/2026/08/07/protests-in-jharkhand-enter-14th-day-students-say-we-stand-with-the-jmm-party-but-against-this-system)इंडिया गेट से गिरफ्तार अक्षय की तस्वीर वायरल, साथी बोले- ‘छात्र है, कोई माओवादी नहीं’ (https://hindi.newslaundry.com/2025/11/25/detention-of-akshay-kumar-photo-viral-friend-says-student-not-a-maoist)

  • जेन-ज़ी से आरक्षण 'विरोध' पर उतरे हर्ष दुबे https://hindi.newslaundry.com/2026/08/10/nl-interview-with-harsh-dubey-on-anti-reservation-jantar-mantar-zen-z-and-neet-paper-leak देश की राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए नीट पेपर लीक विरोधी प्रदर्शन के दौरान एक छात्र हर मीडिया चैनल पर जाकर आरक्षण की बात करने लगा. देखते ही देखते यह छात्र सोशल मीडिया पर भी सुर्खियों का हिस्सा बन गया. जिसके बाद ‘आरक्षण हटाओ आंदोलन’ जैसे पेज भी सोशल मीडिया पर बने. इस छात्र का नाम है हर्ष दुबे. हर्ष ने न्यूजलॉन्ड्री से बात करते हुए कहा कि उनकी मांग आरक्षण में सुधार की है न कि खत्म करने की. उन्होंने कहा कि वे आरक्षण का विरोधी नहीं बल्कि उसमें सुधार के समर्थक हैं. हालांकि, यह सुधार कैसा होगा, क्या होगा इसे लेकर फिलहाल दुबे के पास कोई खाका नहीं है. उन्होंने कहा कि वह 21 अगस्त से जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करेंगे और उनकी मांग है कि सोशल मीडिया पर साथ देने वाले लोग उन्हें सीजेपी की तरह ही समर्थन दें. हर्ष ने हमसे बातचीत में कहा, “वह आरक्षण के विरोधी नहीं हैं, बस वह सुधार चाहते हैं. वह कहते हैं कि सीजेपी में उन्हें नीट के छात्र विरोध प्रदर्शन करते हुए नहीं मिले, वह सभी छात्र दूसरे थे. यह पूछने पर कि आपने कैसे तय किया कि यहां नीट के छात्र नहीं थे तो वह कहते हैं, मैंने 15-20 लोगों से बात की थी. उसमें मुझे कोई नीट का छात्र नहीं मिला.”सवाल ये है कि हजारों की भीड़ में सिर्फ कुछ लोगों से बातचीत के आधार पर क्या आंदोलन को खारिज कर देना चाहिए. देखिए दुबे के साथ हमारी ये खास बातचीत. महिला आरक्षण, परिसीमन और एसआईआर पर सपा नेता पूजा शुक्ला से बातचीत (https://hindi.newslaundry.com/2026/04/24/samajwadi-party-leader-pooja-shukla-on-women-reservation-delimitation-and-up-sir)मॉर्निंग शो: आरक्षण, अत्याचार और कानून व्यवस्था पर जोधपुर के युवाओं से बातचीत  (https://hindi.newslaundry.com/2023/11/18/morning-show-another-election-show-with-jodhpur-jainarayan-vyas-university-students-on-reservation-and-crime-against-women-and-dalits-in-rajasthan)

  • (https://www.primevideo.com/detail/0NRH5KEPWHFDRA9QZYEOV12X0W)डॉक्यूमेंट्री पॉडकास्ट - होप एंड फियर: इंडियाज स्पेस रिवोल्यूशन (https://www.bbc.com/audio/play/p0n750mt) अतुल चौरसिया रिपोर्ट - रुपीस 2,192 करोड़ क्लियरड, 62% फॉर फर्म्स लिंक्ड टू गवर्नमेंट टेक फंड पैनल  (https://indianexpress.com/article/express-exclusive/government-tech-fund-goes-to-private-firms-linked-to-panel-that-selected-them-10821494/)लेख - जेन ज़ीज़ पैरेंट्स मस्ट आंसर फॉर देयर पॉलिटिक्स, क्राइसिस इट क्रिएटेड (https://indianexpress.com/article/opinion/columns/pratap-bhanu-mehta-writes-gen-z-rebellion-government-and-parents-10819080/)  चर्चा में पिछले सप्ताह देखने, पढ़ने और सुनने के लिए किसने क्या सुझाव दिए, उसके लिए यहां (https://docs.google.com/spreadsheets/d/1VCmV6yr5t1LHE77Xp5-cYhWrQSkhW3A8nix310MvRQU/edit?gid=831325801#gid=831325801) क्लिक करें. ट्रांसक्रिप्शन: तस्नीम फातिमा प्रोडक्शन : हसन बिलाल संपादन: हसन बिलालएनएल चर्चा 434: CJP प्रदर्शन के बाद छात्रों पर पुलिस का शिकंजा, मीडिया का नैतिकता पाठ और असम में बाढ़ (https://hindi.newslaundry.com/2026/08/01/nl-charcha-episode-434-police-crackdown-on-students-following-cjp-protest-medias-lecture-on-ethics-and-floods-in-assam)एनएल चर्चा 433: जंतर-मंतर पर सीजेपी का हल्लाबोल, सोनम वांगचुक की हिरासत और पुलिस का एक्शन (https://hindi.newslaundry.com/2026/07/25/nl-charcha-episode-433-cjps-protest-at-jantar-mantar-sonam-wangchuks-detention-and-police-crackdown)

  • एनएल चर्चा 435: जेन ज़ी और मीम कल्चर, मेटा ने हटाया प्रधानमंत्री का वीडियो और FCRA विधेयक https://hindi.newslaundry.com/2026/08/08/nl-charcha-episode-435-gen-z-and-meme-culture-meta-removes-prime-ministers-video-and-the-fcra-bill एनएल चर्चा के इस अंक में जेन ज़ी की जीवनशैली, मीम कल्चर, प्रधानमंत्री का वीडियो कुछ देर के लिए हटाने पर मार्क ज़ुकरबर्ग द्वारा मांगी गई माफ़ी और विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 पर विस्तार से बात हुई.इसके अलावा आरबीआई ने अगले साल से प्लास्टिक करेंसी नोट पेश करने की योजना की घोषणा की, दिल्ली-एनसीआर में भारी बारिश और दिल्ली के कुछ हिस्सों के लिए रेड अलर्ट जारी, प्रभावित जिलों में राहत और बचाव कार्य जारी रहने के साथ असम में बाढ़ से मरने वालों की संख्या और बढ़ गई, सुप्रीम कोर्ट ने शिवसेना चुनाव चिह्न विवाद में ‘असली’ राजनीतिक दल का निर्धारण करने के लिए स्पष्ट मानदंड मांगे, विरोध प्रदर्शन जारी रहने के बीच झारखंड परीक्षा अनियमितता मामले में पांच और गिरफ्तारियां, एसीसी ने केंद्रीय गृह सचिव और कैबिनेट सचिव के लिए एक-एक साल के सेवा विस्तार को मंजूरी दी, संभल हिंसा जांच पैनल ने इस अशांति को मस्जिद सर्वेक्षण को रोकने की एक नियोजित साजिश बताया, बांग्लादेश ने ढाका/दिल्ली प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद नाराजगी जताई और कहा कि इस कार्यक्रम ने भारत के साथ संबंधों को नुकसान पहुंचाया है, राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि युवा विरोध प्रदर्शनों के बीच छात्रों के घरों पर गुंडे भेजे जा रहे हैं, भर्ती अनियमितताओं को लेकर झारखंड जेपीएससी-जेएसएससी छात्र विरोध तेज और अभ्यर्थियों ने तिरंगा मार्च तथा विधानसभा घेराव का ऐलान किया, सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि 'मान्यता प्राप्त' मीडिया आउटलेट अदालतों की रिपोर्टिंग कर सकते हैं लेकिन सुनवाई के ऑडियो या वीडियो क्लिप साझा नहीं कर सकते, शरद पवार की एनसीपी ने सभी प्रवक्ताओं को पद से हटा दिया, और लखनऊ में छह कांवड़ियों ने एक स्कूल वैन पर हमला कर उसकी विंडस्क्रीन तोड़ दी आदि ख़बरें भी हफ्ते की प्रमुख सुर्खियों में शामिल रहीं.इस हफ्ते चर्चा में बतौर मेहमान वरिष्ठ अधिवक्ता अपार गुप्ता शामिल हुए. न्यूज़लॉन्ड्री टीम से बातचीत में सह संपादक शार्दूल कात्यायन, सीनियर रिपोर्टर बसंत कुमार और अश्विन सिंह ने हिस्सा लिया. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के प्रबंध संपादक अतुल चौरसिया ने किया.चर्चा की शुरुआत करते हुए अतुल कहते हैं, “बड़ा सेलेक्टिव तरीके से मेटा द्वारा कंटेंट को हटाया जाता है जिसकी कोई जवाबदेही नहीं होती है लेकिन यह पहली बार हुआ है जब मेटा ने प्रधानमंत्री का ही वीडियो फेसबुक से हटा दिया जिसके बाद उन्हें माफ़ी भी मांगनी पड़ी. यह जो पूरा मामला है इसे आप कैसे देखते हैं अपार?”इस विषय पर अपार कहते हैं, “किसी भी देश के प्रधानमंत्री का वीडियो इस तरह हटाया जाना सही नहीं है और यह दिखाता है चाहे वह हम हों या कोई और देश के नेता कि हम अपने लोगों से कनेक्ट करने के लिए किस क़द्र निर्भर हो चुके हैं मेटा जैसे प्लेटफॉर्म्स पर चाहे वह फेसबुक हो इंस्टाग्राम हो या ट्विटर.”सुनिए पूरी चर्चा-  टाइमकोड्स:00:00 - इंट्रो और ज़रूरी सूचना 4:31 - सुर्खियां 12:00 - मेटा ने हटाया प्रधानमंत्री का वीडियो46:00 - जेन ज़ी और मीम कल्चर1:13:20 - सब्सक्राइबर्स के पत्र 1:17:36 - FCRA विधेयक01:32:33 - सलाह और सुझाव नोट: चर्चा में अपने पत्र भेजने के लिए यहां (https://www.newslaundry.com/podcast-letters) क्लिक करें.पत्रकारों की राय-क्या देखा, पढ़ा और सुना जाएशार्दूल कात्यायन रिपोर्ट - रुपीस 2,192 करोड़ क्लियरड, 62% फॉर फर्म्स लिंक्ड टू गवर्नमेंट टेक फंड पैनल  (https://indianexpress.com/article/express-exclusive/government-tech-fund-goes-to-private-firms-linked-to-panel-that-selected-them-10821494/)किताब - कॉस्मिक क्वेरीज़  (https://www.amazon.in/COSMIC-QUERIES-Neil-deGrasse-Tyson/dp/1426221770)यूट्यूब वीडियो - वाई डज़ एव्री मैमल्स गेट 1 बिलियन हार्टबीट्स इन देयर लाइफ?  (https://www.youtube.com/watch?v=tL9Lw250spc)अपार गुप्ता गाना - सफर (https://www.youtube.com/watch?v=LOi2MFAOTEQ) बसंत कुमार रिपोर्ट - विज्ञापन पर खर्च के मामले में मोदी से आगे निकले योगी, यूपी सरकार ने 8 सालों में खर्चे 6812 करोड़ रुपये  (https://hindi.newslaundry.com/2026/08/05/up-cm-yogi-overtakes-pm-narendra-modi-in-ad-spending-up-government-spent-6812-crore-in-eight-years)सीरीज - मुसाफिर कैफ़े (http://netflix.com/watch/82023964?source=35) सौरभ द्विवेदी के साथ जोजी जोसफ की बातचीत  (https://www.youtube.com/watch?v=kWLzv8s2vB0)अश्विन सिंह सीरीज़ - ग्राम चिकित्सालय

  • झारखंड में 14 दिन से आंदोलन जारी, छात्र बोले- ‘हम पार्टी के साथ पर इस सिस्टम के खिलाफ' https://hindi.newslaundry.com/2026/08/07/protests-in-jharkhand-enter-14th-day-students-say-we-stand-with-the-jmm-party-but-against-this-system झारखंड में भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर चल रहा छात्र आंदोलन पिछले कुछ वर्षों के सबसे बड़े छात्र आंदोलनों में बदलता जा रहा है. हजारों अभ्यर्थी भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता, जवाबदेही और सुधार की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं. जेपीएससी-जेएसएससी रिफॉर्म्स मंच के बैनर तले 25 जुलाई को रांची के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम से शुरू हुआ यह आंदोलन शुक्रवार को 14वें दिन में प्रवेश कर गया है. इस बीच हेमंत सोरेन सरकार पर राजनीतिक दबाव भी लगातार बढ़ रहा है.आंदोलन की तत्काल वजह 5 जुलाई को जारी झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी) की 14वीं सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा के परिणाम हैं. छात्रों ने परीक्षा और चयन प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर अनियमितताओं का आरोप लगाया है. उनकी मांग है कि परीक्षा रद्द की जाए और पूरे मामले की स्वतंत्र जांच कराई जाए. इसके लिए प्रदर्शनकारी केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) से जांच या झारखंड के बाहर के सेवानिवृत्त हाई कोर्ट के न्यायाधीशों की एक समिति गठित करने की मांग कर रहे हैं.धीरे-धीरे यह आंदोलन सिर्फ एक परीक्षा के नतीजों से जुड़ी शिकायतों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि जेपीएससी और झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (जेएसएससी) में व्यापक और संरचनात्मक सुधार की मांग तक पहुंच गया है. कई प्रदर्शनकारियों ने अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू कर दी है.हालांकि, झारखंड के इस आंदोलन की मीडिया कवरेज को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं. प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि जिस तरह का आंदोलन रांची में चल रहा है, उसे मुख्यधारा के मीडिया में उतनी जगह नहीं मिल रही, जितनी मिलनी चाहिए. इस आंदोलन की एक खास बात यह भी है कि यहां प्रदर्शन कर रहे ज्यादातर अभ्यर्थी जेन ज़ी के बजाय मिलेनियल्स हैं यानी वे युवा, जो अपनी स्नातक की पढ़ाई पूरी कर सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे हैं. इसके मुकाबले दिल्ली के जंतर-मंतर पर हालिया आंदोलनों में नजर आने वाले कई प्रदर्शनकारी उम्र में अपेक्षाकृत कम थे.आखिर रांची में चल रहे इस आंदोलन की जमीनी हकीकत क्या है? छात्र किन मांगों को लेकर 14 दिनों से डटे हैं और सरकार से उन्हें अब तक क्या जवाब मिला है?रांची में चल रहे इस आंदोलन की पड़ताल पर देखिए हमारी ये खास रिपोर्ट.झारखंड: छात्रों का आंदोलन जारी, भूख हड़ताल खत्म करने की देवेंद्र नाथ महतो ने बताई पूरी सच्चाई (https://hindi.newslaundry.com/2026/08/05/jharkhand-student-protest-leader-devendra-nath-mahto-on-hunger-strike-end-and-hemant-soren)'ऑफेंसिव पोस्ट' के खिलाफ कार्रवाई, जंतर-मंतर की रिपोर्टिंग भी निशाने पर? (https://hindi.newslaundry.com/2026/07/28/crackdown-on-offensive-posts-is-jantar-mantar-coverage-under-fire-too)

  • जैसे सुझाव शामिल हैं.  आयोग की इस रिपोर्ट पर कई सवाल खड़े होते हैं. एक तरफ जहां रिपोर्ट में कहा गया है कि चार लोगों की मृत्यु हुई. जबकि इस हिंसा में मरने वालों की संख्या 5 हो गई थी. इस पर न्यूज़लॉन्ड्री ने रिपोर्ट भी की है. दूसरी ओर मौत की वजह भीड़ द्वारा अंधाधुंध गोलीबारी और पथराव को बताया गया है. कहा गया कि जामा मस्जिद के आसपास एकत्रित हिंसक और उग्र भीड़ ने अचानक पुलिस-प्रशासन पर अंधाधुंध पथराव शुरू कर दिया और गोलियां चलाईं. इस उपद्रव, पथराव और हिंसक झड़प में गोली और गंभीर चोटें लगने के कारण चार आम नागरिकों की मृत्यु हो गई.बता दें कि नवंबर 2024 में जब संभल में हिंसा फैली थी तो न्यूज़लॉन्ड्री ने वहां से ग्राउंड रिपोर्ट (https://www.newslaundry.com/2024/11/28/sambhal-violence-groud-report-shahi-eidgah-masjid) की थी. हमने संभल के सरकारी अस्पताल में भर्ती दो घायलों से भी बात की थी. घायलों के मुताबिक (https://hindi.newslaundry.com/2024/12/03/sambhal-violence-injured-hasan-and-azeem-sent-to-jail-from-moradabad-hospital-custody) उन्हें पुलिस ने गोली मारी. अस्पताल में घायल अजीम ने हमें बताया था कि पुलिस उस पर झूठी तहरीर देने का दबाव बना रही थी कि तुम्हारा बचने का एक की चांस है कि तुम 10-10 लोगों के नाम सोच लो और हमें लिखकर दो कि भीड़ पथराव कर रही थी. वहीं, दूसरे घायल हसन ने बताया था कि जिस दिन हिंसा हुई थी वह उसी दिन दिल्ली आया था. कब कहां से गोली लगी कुछ पता ही नहीं चला.         वहीं, मृतक के परिवारों के अलावा, घायलों और जिनके घर में तोड़फोड़ हुई है उनसे भी बात की थी. जिन घरों में तोड़फोड़ हुई थी उन्होंने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया था कि भारी तादात में पुलिसकर्मी उनके घर आए और तोड़फोड़ की. रिपोर्टिंग के दौरान हमने मौके पर पाया था कि घर के शीशे, वॉशिंग मशीन, फ्रिज, दरवाजे- खिड़कियां तोड़ दिए गए थे. इस दौरान उनसे कहा गया कि यहां दंगाई छिपे हुए हैं. संभल के वरिष्ठ पत्रकार मोहम्मद साद इस रिपोर्ट पर कहते हैं कि यह रिपोर्ट झूठ का पुलिंदा है. लोगों को गुमराह और सरकार को खुश करने की कोशिश की गई है. स्वतंत्र मीडिया ने काफी अच्छा काम किया था लेकिन उनमें से किसी से भी संपर्क नहीं किया गया. संभल पर कई शानदार रिपोर्ट हमने देखी हैं लेकिन उन पत्रकारों को इस रिपोर्ट का हिस्सा नहीं बनाया गया. ऐसे पत्रकारों को ढूंढा गया, जिनके संस्थान पहले से ही सत्ता के पसंदीदा हैं. वह आखिर में कहते हैं कि कई तथ्यों तो तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया है. जो संभल का प्रशासन पहले से कहता हुआ आ रहा था, वही सब इस रिपोर्ट में लिखा है. इसमें नया कुछ नहीं है.  वहीं, इस मामले पर संभल के एडवोकेट कमर आलम कहते हैं कि इस रिपोर्ट का कानूनी तौर पर कोई महत्व नहीं है. यह रिपोर्ट सिर्फ मंच से बोलने वालों के लिए ठीक है. न ही इस रिपोर्ट का कोर्ट पर कोई असर होने वाला है. क्या मीडिया सत्ता या कॉर्पोरेट हितों के बजाय जनता के हित में काम कर सकता है? बिल्कुल कर सकता है, लेकिन तभी जब वह धन के लिए सत्ता या कॉरपोरेट स्रोतों के बजाय जनता पर निर्भर हो. इसका अर्थ है कि आपको खड़े होना पड़ेगा और खबरों को आज़ाद रखने के लिए थोड़ा खर्च करना होगा. सब्सक्राइब करें. (https://hindi.newslaundry.com/subscription)संभल: तीन गोली और महीनों के इंतजार के बाद अब मुकदमे के आदेश से आंख चुराती पुलिस (https://hindi.newslaundry.com/2026/01/15/sambhal-police-looking-options-to-evade-court-order-for-registration-fo-fir)संभल: गिरफ्तारी के बाद भी अज्ञात लोगों की सूची में क्यों लगी है फैज़ान की तस्वीर? (https://hindi.newslaundry.com/2025/03/04/sambhal-jama-masjid-why-are-faizans-photos-included-in-the-list-of-unidentified-persons-even-after-the-arrested)संभल के तालाबंद घरों और पलायन के दावों का सच? (https://hindi.newslaundry.com/2025/02/26/fact-check-of-sambhal-migration-and-locked-house-claims-by-print-media)

  • लाउडस्पीकर द्वारा उकसाने वाले धार्मिक नारे लगाए गए. हजारों की संख्या में उपद्रवी चेहरे ढंककर अवैध 9 एमएम पिस्तौल, मिर्च बम, पेट्रोल बम और पत्थरों के साथ सर्वे टीम और पुलिस बल को घेरने पहुंच गए.आयोग ने वीडियो फुटेज, फॉरेंसिक जांच और प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों के आधार पर तीन लोगों को हिंसा का मुख्य साजिशकर्ता व दोषी ठहराया है.आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, संभल सांसद जिया उर रहमान बर्क के 19 एवं 22 नवंबर को दिए भड़काऊ भाषण और भीड़ को उकसाने में मुख्य भूमिका थी. साथ ही सांसद ने मस्जिद की सीढ़ियों से बयान दिया कि ‘मस्जिद थी, है और रहेगी’. आयोग का निष्कर्ष है कि उपचुनाव में हार के बाद राजनीतिक जनाधार और वर्चस्व बचाने हेतु क्षेत्र में तनाव पैदा करने का प्रयास किया गया. आयोग ने इसमें स्थानीय विधायक इकबाल महमूद के पुत्र सुहेल इकबाल पर 19 और 24 नवंबर दोनों दिन समर्थकों के साथ मौके पर पहुंचकर विरोध प्रदर्शन आयोजित करने और भीड़ को लामबंद करने का आरोप लगाया.वहीं, जामा मस्जिद के सदर जफर अली एडवोकेट को समय रहते पुलिस-प्रशासन को सहयोग न देने, भ्रामक संदेश फैलाने और मस्जिद के बाहर दंगाई भीड़ जुटने में मौन सक्रिय सहमति देने का दोषी माना है.आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, चेहरे ढककर पुलिस बल पर गोलीबारी करने वाली भीड़ की बैलिस्टिक जांच से पुष्टि हुई कि दंगाइयों ने अवैध 9एमएम पिस्तौल से पुलिस पर फायरिंग की और पुलिसकर्मियों से कारतूस और मैगजीन छीन ली.इस रिपोर्ट में आयोग ने माना कि संभल का एक सदी से भी पुराना सांप्रदायिक दंगों का इतिहास रहा है. बताया गया कि 1526 ई. में बाबर के आदेश पर हिंदू बेग द्वारा मंदिर (हरि हर मंदिर) के अवशेषों पर इसका निर्माण कराया गया था. वर्ष 1976 तक यहां हिंदू श्रद्धालुओं द्वारा नियमित भजन-कीर्तन एवं हवन किया जाता था.सांप्रदायिक दंगों का भी जिक्र किया गया है. इनमें 1947-1948: देश विभाजन के समय हुई हिंसा. 1978 का नरसंहार: होली के समय भीषण दंगा, जिसमें 183 से अधिक लोगों की जान गई थी. 1986, 1990 एवं 1992 बाबरी मस्जिद विवाद काल के दौरान भीषण दंगे, हत्याएं और आगजनी. 2019 (सीएए-एनआरसी विरोध) प्रदर्शन के दौरान रोडवेज बसें जलाई गईं और गोलीबारी में 2 लोगों की मौत हुई.आयोग द्वारा अपनाई गई जांच प्रक्रियाआयोग ने इस रिपोर्ट को तैयार करने के लिए कुल 199 गवाहों के बयान दर्ज किए हैं. इनमें 41 पुलिस बल एवं प्रशासनिक अधिकारी (29 पुलिस + 12 प्रशासन), चिकित्सा दल से 19 गवाह, 34 घटना के प्रत्यक्षदर्शी, 78 घटना से संबंधित हिरासत में लिए गए साक्षी, 3 शिकायतकर्ता पक्ष से,  2 सरकारी प्रतिवादी पक्ष से, जामा मस्जिद प्रबंधन समिति से 5 साक्षी, घटना को कवर करने वाले 10 मीडियाकर्मी और कोर्ट कमिश्नर के साथ गए वीडियोग्राफर/फोटोग्राफर जो प्रत्यक्षदर्शी शामिल थे. वहीं, 5 साक्षी ऐसे थे जो हिंसा से संबंधित दर्ज मामलों से जुड़े थे.इसके अलावा स्थानीय सांसद के बयान और स्थानीय विधायक के प्रतिनिधि का बयान दर्ज किया गया. इनमें से 106 साक्षियों के बयान वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से दर्ज किए गए और 84 साक्षियों के बयान संभल में डाक बंगले पर और 8 साक्षियों के बयान लखनऊ में जांच आयोग के कार्यालय में दर्ज किए गए.  इस जांच का हिस्सा रहे एक पत्रकार से हमें नाम नहीं छापने की शर्त पर कहा कि उन्हें समिति द्वारा संभल में बयान देने के लिए बुलाया गया था लेकिन उनके कार्यालय ने कहा कि आयोग के दफ्तर लखनऊ में बयान देकर आओ. वह कहते हैं, “समिति मुझसे बढ़ा चढ़ाकर बुलवाना चाहती थी. वह बार-बार पूछ रहे थे कि हिंसा के पीछे कौन था. इस पर मेरा एक ही जवाब था कि मेरा बयान मेरी रिपोटिंग ही है. वह सभी क्लिप्स देख लीजिए इसके अलावा मेरा कोई बयान नहीं है. जो मैंने देखा है वो सभी मेरी टीवी रिपोर्टिंग में है.”वह कहते हैं कि इस रिपोर्ट को थोड़ा बढ़ा-चढ़ाकर लिखा गया है. जो हमने बयान दिए थे उसे भी थोड़ा घुमा दिया गया है. जैसे हमारे कैमरामैन ने ही सिर्फ तीन लाइनों का बयान दिया था लेकिन रिपोर्ट में उसे डेढ़ पन्नों का लिखा गया है.    टीवी9 भारतवर्ष के पत्रकार मोहम्मद मुज्जमिल बताते हैं कि उन्होंने हिंसा के समय वहां से लाइव किया था. समिति ने संभल में उनसे पूछताछ की थी. जो हुआ उन्होंने बता दिया. रिपोर्ट में क्या है, वह अभी नहीं देख पाए हैं. मुज्जमिल बताते हैं कि उनके कार्यलय को एक नोटिस जारी कर हिंसा के वक्त के फुटेज भी मांगे गए थे. आयोग की अंतिम सिफारिशें और सुझाव   संभल जैसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए आयोग ने 30 बिंदुओं में अपनी सिफारिशें प्रस्तुत की हैं. जिसमें ड्रोन से निगरानी, इंटरनेट बंद करना और दंगा नियंत्रण योजना को लागू करने के अलावा उत्तर प्रदेश के संवेदनशील शहरों की सूची को अपडेट करने

  • जांच आयोग की रिपोर्ट, संभल हिंसा साजिश, सांसद बर्क साजिशकर्ता https://hindi.newslaundry.com/2026/08/07/inquiry-commission-report-says-sambhal-violence-was-a-conspiracy-hatched-by-mp-barq-and-others संभल हिंसा पर उत्तर प्रदेश सरकार के न्यायिक आयोग ने अपनी रिपोर्ट विधानसभा में पेश कर दी है. आयोग का सबसे बड़ा निष्कर्ष है कि 24 नवंबर 2024 की हिंसा अचानक नहीं भड़की बल्कि यह एक सुनियोजित साजिश और उकसावे का परिणाम थी. रिपोर्ट में सांसद जिया-उर-रहमान बर्क, स्थानीय विधायक इकबाल महमूद के पुत्र सुहेल इकबाल और जामा मस्जिद के सदर एडवोकेट जफर अली को कथित साजिश का हिस्सा बताया गया है. वहीं, आयोग ने जिला प्रशासन और पुलिस को लगभग पूरी तरह क्लीन चिट देते हुए कहा है कि उनके संयम और समय पर कार्रवाई से न सिर्फ शहर को सांप्रदायिक हिंसा से बचाया गया बल्कि मस्जिद का सर्वे करने आई टीम को भी सुरक्षित निकाला गया. आयोग का कहना है कि सांसद आदि राजनीतिक लोगों ने कथित तौर पर अदालत के आदेश पर हो रहे सर्वे की वास्तविक प्रकृति मुस्लिम समुदाय से छिपाई और भीड़ को उकसाया.आयोग ने हिंसा की वजह बताते हुए कहा कि 19 नवंबर को पहला सर्वे हुआ था. 19 से 24 नवंबर के बीच कथित तौर पर भीड़ जुटाने की तैयारी की गई. स्थानीय राजनीतिक तत्व, आपराधिक प्रवृत्ति के लोग और इंतजामिया कमेटी के सदस्यों ने मिलकर भीड़ को संगठित किया. आयोग का कहना है कि इसका उद्देश्य सांप्रदायिक माहौल बनाना और सरकार व प्रशासन को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदनाम करना था.पुलिस और प्रशासन को क्लीन चिटरिपोर्ट में आयोग ने कहा कि जिला प्रशासन और पुलिस ने बेहद संयम और समन्वय के साथ काम किया. डीएम, एसपी और अन्य अधिकारियों की मौजूदगी से बड़ा सांप्रदायिक दंगा टल गया. पुलिस पर जानलेवा हमला हुआ. पुलिस के हथियार लूटे गए. इसके बावजूद पुलिस ने घातक हथियारों का इस्तेमाल नहीं किया. एफएसएल आगरा की बैलिस्टिक रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि पुलिस ने संयम बरता. इस कमेटी के अध्यक्ष इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश देवेंद्र कुमार अरोड़ा बनाए गए. वहीं, सदस्यों के तौर पर सेवानिवृत्त आईएएस अमित मोहन प्रसाद सेवानिवृत्त आईपीएस एवं पूर्व पुलिस महानिदेशक अरविंद कुमार जैन और सेवानिवृत्त जिला न्यायाधीश बृजेश कुमार ने कानूनी सलाहकार की भूमिका अदा की.दरअसल, 24 नवंबर 2024 को उत्तर प्रदेश के संभल स्थित एएसआई संरक्षित ऐतिहासिक शाही जामा मस्जिद परिसर में अदालत के आदेशानुसार किए जा रहे एडवोकेट कमीशन सर्वे के दौरान अचानक भीषण हिंसा, पथराव, आगजनी और गोलीबारी की घटना घटित हुई थी. घटना की गंभीरता और संवेदनशीलता को देखते हुए राज्य सरकार ने तीन सदस्यीय उच्चस्तरीय न्यायिक आयोग का गठन किया गया. आयोग ने अपनी जांच के बाद 7 जुलाई को रिपोर्ट उत्तर प्रदेश सरकार को सौंपी, जिसे बीते दिनों राज्य विधानसभा के पटल पर रखा गया.गवाहियों, फॉरेंसिक रिपोर्ट, बैलिस्टिक जांच, एफआईआर और वीडियो फुटेज के विश्लेषण के बाद आयोग ने निष्कर्ष निकाला है कि संभल हिंसा कोई आकस्मिक या अचानक दंगा नहीं था बल्कि यह एक सुव्यवस्थित, पूर्व-नियोजित आपराधिक साजिश का परिणाम था.रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि दंगा करने वाले 4 उपद्रवियों की मृत्यु हो गई. जबकि इस घटना में संभल के पुलिस अधीक्षक, क्षेत्राधिकारी सहित दर्जनों पुलिसकर्मी, प्रशासनिक अधिकारी एवं नागरिक गंभीर रूप से घायल हुए थे. इस मामले में कुल 12 एफआईआर दर्ज की गईं, जिनमें से 11 मामलों में अदालत में आरोप-पत्र दाखिल किया जा चुका है.हिंसा का मुख्य कारण और घटनाक्रम आयोग की मानें तो हिंसा की पटकथा 19 नवंबर 2024 से शुरुआत हुई. सिविल जज (सीनियर डिवीजन), चंदौसी की अदालत में मूल वाद संख्या 182/2024 (हरि शंकर जैन आदि बनाम भारत संघ आदि) दायर हुआ. इसमें दावा किया गया कि शाही जामा मस्जिद परिसर प्राचीन हरि हर मंदिर स्थल है. अदालत ने स्थिति स्पष्ट करने हेतु सर्वेक्षण का आदेश दिया.जिसके बाद एडवोकेट कमिश्नर रमेश चंद्र राघव सर्वे हेतु पहुंचे लेकिन रोशनी की कमी, भारी भीड़ और स्थानीय नेताओं के हस्तक्षेप के कारण सर्वे बीच में ही रोकना पड़ा. रिपोर्ट में कहा गया कि 23 नवंबर को कुंदरकी (मुरादाबाद) विधानसभा उपचुनाव के नतीजे आए, जिसमें समाजवादी पार्टी उम्मीदवार की करारी हार हुई. आयोग के अनुसार, इस राजनीतिक पराजय के बाद स्थानीय समाजवादी पार्टी के नेतृत्व में बौखलाहट बढ़ी और वर्चस्व बचाने हेतु धार्मिक माहौल गरमाने का प्रयास किया गया. जुम्मे की नमाज के अवसर पर सांसद द्वारा मस्जिद की सीढ़ियों से बयानबाजी कर मुस्लिम समुदाय में यह संदेश फैलाया गया कि मस्जिद के अस्तित्व पर खतरा है.इसके बाद जब शेष सर्वे का कार्य शुरू हुआ तो आसपास की मस्जिदों से

  • तहलका के पूर्व संपादक तरुण तेजपाल दुष्कर्म मामले में दोषी करार, सजा का ऐलान भी आज ही https://hindi.newslaundry.com/2026/08/06/former-tehelka-editor-tarun-tejpal-convicted-in-2013-rape-case बॉम्बे हाई कोर्ट की गोवा बेंच ने गुरुवार को तहलका के पूर्व प्रधान संपादक तरुण तेजपाल को दुष्कर्म के मामले में दोषी करार दिया. अदालत ने चार साल पहले आए सत्र अदालत के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें तरुण तेजपाल को बरी कर दिया गया था. अब हाईकोर्ट आज दोपहर में ही सजा की अवधि पर फैसला सुनाएगा. सजा तय होने से पहले तरुण तेजपाल ने अदालत से नरमी बरतने की अपील की है. यह मामला नवंबर 2013 का है.तब तहलका पत्रिका में काम करने वाली एक महिला पत्रकार ने आरोप लगाया था कि तरुण तेजपाल ने दो अलग-अलग रातों में उसके साथ यौन उत्पीड़न और दुष्कर्म किया. साल 2021 में गोवा की सत्र अदालत ने तरुण तेजपाल को सभी आरोपों से बरी कर दिया था.सत्र अदालत का कहना था कि घटना के बाद महिला का व्यवहार उस तरह का नहीं था, जैसा किसी यौन उत्पीड़न की पीड़िता से अपेक्षित माना जाता है. अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि महिला ने घटना के बाद तरुण तेजपाल को कुछ संदेश भेजे थे. सत्र अदालत ने माना कि इन संदेशों से यह नहीं लगता कि महिला डरी हुई थी या सदमे में थी. इसी आधार पर अदालत ने अभियोजन पक्ष के मामले को कमजोर माना और तेजपाल को बरी कर दिया.इसके बाद गोवा सरकार ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी. सरकार ने कहा कि निचली अदालत ने यह मान लिया कि किसी यौन उत्पीड़न की पीड़िता को एक तय तरीके से ही व्यवहार करना चाहिए. सरकार का कहना था कि अदालत ने पीड़िता के व्यवहार को लेकर अपनी एक अलग कसौटी बना ली, जो कानून के अनुरूप नहीं है. गोवा सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में पक्ष रखा.उन्होंने कहा कि इस मामले में सुनवाई के दौरान आरोपी और पीड़िता की भूमिकाएं जैसे उलट दी गई थीं. उन्होंने यह भी कहा कि पीड़िता से जिरह के दौरान ऐसे सवाल पूछे गए, जिनका मामले से कोई संबंध नहीं था. इन सवालों में उसके सहमति से बने यौन संबंधों पर विचार, शराब और सिगरेट पीने की आदत, और दोस्तों के साथ उसकी निजी बातचीत जैसे विषय शामिल थे.तुषार मेहता ने कहा कि अदालत को इन बातों पर विचार नहीं करना चाहिए था. वहीं, तरुण तेजपाल की ओर से कहा गया कि महिला के बयान में कई विरोधाभास हैं. बचाव पक्ष ने दलील दी कि महिला का बयान इतना भरोसेमंद नहीं है कि केवल उसी के आधार पर दोष सिद्ध किया जा सके. बचाव पक्ष ने होटल के सीसीटीवी फुटेज का भी हवाला दिया. उनका कहना था कि फुटेज से यह साबित नहीं होता कि तरुण तेजपाल ने महिला को खींचकर या जबरदस्ती लिफ्ट में ले जाया था.इस पर तुषार मेहता ने अदालत को उस ईमेल की याद दिलाई, जो कथित घटना के कुछ दिन बाद तरुण तेजपाल ने महिला को भेजा था. उस ईमेल में तरुण तेजपाल ने अपने व्यवहार पर अफसोस जताया था और इसे अपनी "गलत निर्णय क्षमता" बताया था. गोवा सरकार का कहना था कि यह ईमेल इस बात का संकेत है कि दोनों के बीच कोई घटना हुई थी.क्या मीडिया सत्ता या कॉर्पोरेट हितों के बजाय जनता के हित में काम कर सकता है? बिल्कुल कर सकता है, लेकिन तभी जब वह धन के लिए सत्ता या कॉरपोरेट स्रोतों के बजाय जनता पर निर्भर हो. इसका अर्थ है कि आपको खड़े होना पड़ेगा और खबरों को आज़ाद रखने के लिए थोड़ा खर्च करना होगा. सब्सक्राइब करें. (https://hindi.newslaundry.com/subscription)मानहानि मामला: बिना शर्त माफी मांगेंगे तरुण तेजपाल और अनिरुद्ध बहल (https://hindi.newslaundry.com/2024/01/12/tarun-tejpal-and-aniruddha-bahal-tells-delhi-highcourt-they-will-tender-unconditional-appology-in-defamation-case)तरुण तेजपाल: सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता का सरकारी ट्विस्ट और महिला अधिकार कार्यकर्ताओं का गुस्सा (https://hindi.newslaundry.com/2021/06/08/tarun-tejpal-tehelka-solicitor-general-supreme-court)

  • झारखंड: छात्रों का आंदोलन जारी, भूख हड़ताल खत्म करने की देवेंद्र नाथ महतो ने बताई पूरी सच्चाई https://hindi.newslaundry.com/2026/08/05/jharkhand-student-protest-leader-devendra-nath-mahto-on-hunger-strike-end-and-hemant-soren झारखंड पब्लिक सर्विस कमीशन और झारखंड स्टाफ सेलेक्शन कमीशन की परीक्षा में कथित अनियमितताओं और पेपर लीक के खिलाफ झारखंड में छात्रों का आंदोलन तेज हो गया है. इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे देवेंद्र नाथ महतो ने उन खबरों को खारिज किया है जिनमें दावा किया गया कि उन्होंने अपनी भूख हड़ताल तोड़ दी है.बातचीत में देवेंद्र नाथ महतो बताते हैं कि उन्होंने केवल सोनम वांगचुक के आग्रह पर जल ग्रहण किया है, लेकिन उनका अनशन पहले की तरह जारी है. उनका कहना है कि जब तक छात्रों की सभी मांगें पूरी नहीं होतीं, वे पीछे नहीं हटेंगे. उन्होंने यह भी कहा कि सरकार की किसी समिति या आश्वासन पर उन्हें भरोसा नहीं है और वे केवल मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से सीधे बातचीत चाहते हैं.इंटरव्यू में उन्होंने 10 अगस्त को प्रस्तावित विधानसभा मार्च का भी आह्वान किया और चेतावनी दी कि यदि सरकार ने जल्द पहल नहीं की तो यह छात्र आंदोलन एक बड़े जन आंदोलन में बदल सकता है.देखिए देवेंद्र नाथ महतो से ये बातचीत.बारिश के बीच देहरादून में जुटे हजारों छात्र, राहुल गांधी का 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम कैसा रहा? (https://hindi.newslaundry.com/2026/07/19/thousands-of-students-gathered-in-dehradun-amidst-the-rain-how-did-rahul-gandhis-chhatron-ki-goonj-event-go)रेलवे स्टेशन, बस अड्डे और घरों में नजरबंद करके सीजेपी के प्रदर्शन में लखनऊ जाने से रोके गए छात्र (https://hindi.newslaundry.com/2026/06/17/students-prevented-from-traveling-to-lucknow-for-the-cjp-protest-by-police)

  • (https://hindi.newslaundry.com/2026/02/12/119-crore-spent-on-print-media-in-financial-year-2024-to-2025-on-1052-newspapers)

  • विज्ञापनों की भरमार, यूपी सरकार का अथाह प्रचारआज भी आप कोई भी न्यूज़ चैनल खोलें, किसी वेबसाइट पर जाएं, पढ़ने के लिए अखबार या पत्रिका उठाएं, या फिर उत्तर प्रदेश के किसी शहर से लेकर राजधानी दिल्ली तक कहीं भी निकलें, हर जगह आपको उत्तर प्रदेश सरकार के विज्ञापन दिखाई देंगे.दैनिक जागरण के लखनऊ एडिशन में इस जुलाई महीने के 29 दिनों में कुल 54 विज्ञापन छपे हैं. जिसमें से पूरे पन्ने के तीन, आधे पन्ने के 32 और पन्ने के चौथाई हिस्से में 19 विज्ञापन छपे हैं. यानि इस महीने दैनिक जागरण में हर रोज कम से कम दो विज्ञापन यूपी सरकार के छपे हैं.  वहीं, दैनिक हिंदुस्तान के लखनऊ एडिशन में में इस बीच कुल 49 विज्ञापन यूपी सरकार के छपे थे. जिसमें 3 पूरे पन्ने, 29 आधे पन्ने और 17  पन्ने के चौथे हिस्से के थे.  ऐसे ही अन्य अख़बारों में भी देखने को मिलता है. हर रोज विज्ञापन छपते हैं.न्यूज़लॉन्ड्री को जानकारी मिली है कि एशियानेट न्यूज़ डॉट कॉम को अपनी वेबसाइट पर 30 दिन बैनर के रूप में विज्ञापन लगाने के लिए कुल 94.40 लाख रुपये मिले हैं. यह विज्ञापन 14 मार्च 2026 से 30 दिनों तक के लिए वेबसाइट पर चलाया गया. जिसमें स्वावलंबन उद्यम, यूपी में महिला सक्षम है और सुपरफास्ट रफ्तार का बैनर लगाना था. ठीक इसी समय यही विज्ञापन वनइंडिया डॉट कॉम को भी जारी हुआ. उन्हें भी 94.40 लाख का भुगतान हुआ. जनवरी, 2026 को सूचना विभाग ने मिशन शक्ति और उज्ज्वला योजना के प्रचार के लिए अमर उजाला की वेबसाइट पर बैनर लगाने के लिए एक महीने का काम दिया. जिसकी एवज में 70.80 लाख का भुगतान हुआ. न्यूज़लॉन्ड्री ने पाया कि यूपी सरकार ने शेयरचैट जैसे प्लेटफॉर्म तक विज्ञापन बांटे हैं.  अब तक जिन विज्ञापनों का हमने जिक्र किया, वे सूचना विभाग की ओर से दिए गए थे. लेकिन उत्तर प्रदेश में दूसरे विभाग भी अपने स्तर पर विज्ञापन जारी करते हैं. न्यूज़लॉन्ड्री को सूचना के अधिकार के तहत यह जानकारी मिली है कि उद्योग एवं उद्यम प्रोत्साहन विभाग ने 2024-25 और 2025-26 के बीच प्रचार-प्रसार पर 60 करोड़ रुपए खर्च किए. जिसमें से लगभग 12 करोड़ प्रयागराज कुंभ के दौरान प्रचार पर खर्च हुआ.  न्यूज़लॉन्ड्री के पास मौजूद दस्तावेजों के मुताबिक, उद्योग एवं उद्यम प्रोत्साहन निदेशालय ने जुलाई, 2025 में योअर स्टोरी वेबसाइट के साथ करार किया था. दस्तावेज के अनुसार, योअर स्टोरी को 70 लाख रुपये दिए जाएंगे. इसके तहत उत्तर प्रदेश के सभी 75 जिलों के वन डिस्ट्रिक्ट, वन प्रोडक्ट (ओडीओपी) उद्यमियों, कारीगरों और इनोवेटर्स की 100 से अधिक सफलता की कहानियां रिकॉर्ड कर प्रदर्शित करना, स्थानीय विरासत, रोजगार, कारीगरों के सशक्तिकरण और ‘मेड इन यूपी’ ब्रांड के वैश्विक प्रभाव पर एक विजुअल वीडियो फिल्म बनाना, सभी 75 जिलों की अनूठी शिल्पकला, नवाचार और विरासत को दर्शाने वाली 500 कॉफी टेबल बुक्स तैयार करना और स्थानीय कारीगरी को बढ़ावा देने के लिए क्षेत्रीय भाषाओं में रील्स और वीडियो फीचर तैयार करना शामिल है.न्यूज़लॉन्ड्री ने पाया कि योअर स्टोरी ने ऐसा किया (https://yourstory.com/2025/09/india-handpicked-highlights-how-odop-transforming-indian-crafts)भी. योअर स्टोरी की वेबसाइट पर यूपी में ओडीओपी (https://www.facebook.com/HindiYourStory/videos/%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A3%E0%A4%B8%E0%A5%80-%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%B6%E0%A4%AE-%E0%A4%89%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6-odop/963907589653560/)को लेकर दर्जनों खबरें (https://yourstory.com/tag/odop?page=9)प्रकाशित हुई है. इसमें से कुछ तो एआई (https://yourstory.com/2026/02/badaun-zari-zardozi-odop-saqib-state-award-artisan)के जरिए प्रकाशित हैं. इस ख़बर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक (https://www.newslaundry.com/2026/08/05/rs-23-crore-a-day-8-years-yogi-outspends-modi-when-it-comes-to-ads) करें.क्या मीडिया सत्ता या कॉर्पोरेट हितों के बजाय जनता के हित में काम कर सकता है? बिल्कुल कर सकता है, लेकिन तभी जब वह धन के लिए सत्ता या कॉरपोरेट स्रोतों के बजाय जनता पर निर्भर हो. इसका अर्थ है कि आपको खड़े होना पड़ेगा और खबरों को आज़ाद रखने के लिए थोड़ा खर्च करना होगा. सब्सक्राइब करें. (https://hindi.newslaundry.com/subscription)11 सालों में मोदी सरकार ने विज्ञापन पर खर्च किए 5987 करोड़, जानिए किसे मिले कितने रुपये (https://hindi.newslaundry.com/2026/03/31/modi-government-spent-more-than-5987-crore-on-advertisements-over-11-years)मोदी सरकार का सालभर में प्रिंट विज्ञापन पर 119 करोड़ का खर्च, आधे से ज़्यादा रकम 10 बड़े हाउस के नाम

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  • कोविड के बाद विज्ञापन बजट में आया बड़ा उछाल उत्तर प्रदेश सरकार के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के खर्च का विश्लेषण बताता है कि 2017-18 से 2024-25 के बीच प्रचार-प्रसार के बजट का सबसे बड़ा हिस्सा ‘विज्ञापन तथा दृश्य प्रचार’ पर खर्च हुआ. यह खर्च अख़बारों, टेलीविजन और दूसरे माध्यमों पर हुआ. इस अवधि में इस मद पर कुल 5,658.16 करोड़ रुपये खर्च किए गए, जो कुल व्यय का लगभग 83 प्रतिशत से ज्यादा है.वित्त वर्ष 2017-18 में विज्ञापन तथा दृश्य प्रचार पर 236.33 करोड़ रुपये खर्च हुए थे. 2018-19 में यह बढ़कर 271.90 करोड़ रुपये और 2019-20 में 398.23 करोड़ रुपये हो गया. कोविड महामारी के वर्ष 2020-21 में यह खर्च 311.46 करोड़ रुपये रहा. इसके बाद 2021-22 में इस मद पर 951.75 करोड़ रुपये खर्च किए गए, जबकि 2022-23 में यह बढ़कर 1,158.06 करोड़ रुपये पहुंच गया. 2023-24 में 1,122.63 करोड़ रुपये और 2024-25 में 1,205.06 करोड़ रुपये खर्च हुए, जो उपलब्ध वर्षों में सबसे अधिक है.प्रकाशन पर भी सैकड़ों करोड़ रुपये खर्च‘विज्ञापन तथा दृश्य प्रचार’ के बाद सबसे अधिक खर्च प्रकाशन मद पर हुआ. इसमें सरकार बुकलेट, पैंफलेट और सरकार के विकास संबंधी कामों के बारे में किताबें प्रकाशित करती है. 2017-18 से 2024-25 के बीच इस मद पर कुल 896.64 करोड़ रुपये खर्च किए गए. अगर साल दर साल की बात करें तो 2017-18 में 29.69 करोड़, 2018-19 पर 27.51, 2019-20 में 47.12, 2020-21 में 52.50 करोड़ खर्च हुए. वहीं उसके बाद  इसमें भी काफी बढ़त देखने को मिली. 2021-22 में प्रकाशन पर 149.97 करोड़ रुपये और 2022-23 में 227.44 करोड़ रुपये खर्च हुए, जो इस अवधि का उच्चतम स्तर है. इसके बाद 2023-24 में यह खर्च 209.14 करोड़ रुपये और 2024-25 में 153.15 करोड़ रुपये रहा.क्षेत्र प्रचार, फोटो सेवाएं और फिल्म निर्माण पर अपेक्षाकृत कम खर्चआठ वर्षों के दौरान क्षेत्र प्रचार पर कुल 220.49 करोड़ रुपये खर्च किए गए. वहीं, फोटो सेवाओं पर 7.73 करोड़ रुपये, सामुदायिक रेडियो एवं टेलीविजन पर 11.46 करोड़ रुपये और फिल्म निर्माण पर 20.32 करोड़ रुपये खर्च हुए.2025-26 में भी विज्ञापनों पर सबसे बड़ा दांववित्त वर्ष 2025-26 के लिए सरकार ने सूचना एवं जनसंपर्क विभाग की विभिन्न गतिविधियों पर 918.83 करोड़ रुपये का बजट प्रावधान किया है. इसमें सबसे बड़ा हिस्सा फिर से विज्ञापन तथा दृश्य प्रचार के लिए रखा गया है.बजट के अनुसार विज्ञापन तथा दृश्य प्रचार के लिए 705.14 करोड़ रुपये, क्षेत्र प्रचार के लिए 37.14 करोड़ रुपये, फोटो सेवाओं के लिए 0.88 करोड़ रुपये, प्रकाशन के लिए 171.12 करोड़ रुपये, सामुदायिक रेडियो एवं टेलीविजन के लिए 1.81 करोड़ रुपये और फिल्म निर्माण के लिए 2.74 करोड़ रुपये निर्धारित किए गए हैं.यदि 2025-26 का पूरा बजट खर्च होता है, तो 2017-18 से 2025-26 के बीच सूचना एवं जनसंपर्क विभाग पर कुल व्यय 7,730.77 करोड़ रुपये तक पहुंच जाएगा. इनमें अकेले विज्ञापन तथा दृश्य प्रचार का हिस्सा 6,360.56 करोड़ रुपये होगा यानि कुल खर्च का अधिकांश हिस्सा विज्ञापन आधारित प्रचार पर केंद्रित रहेगा.किसे मिल रहा कितना विज्ञापन सरकार विभिन्न माध्यमों में किसे कितना विज्ञापन दे रही है, इस बात की जानकारी के लिए न्यूज़लॉन्ड्री ने कई बार उत्तर प्रदेश सरकार से सूचना के अधिकार के जरिए जानकारी मांगी. हालांकि, प्रदेश सरकार के सूचना विभाग ने कोई जानकारी नहीं दी. हमारे आवेदन का कभी जवाब नहीं आया और कभी-कभी जवाब आया तो यह कहकर आवेदन खारिज कर दिया गया कि इस सूचना को एकत्रित करने में काफी समय लगेगा. हालांकि, न्यूज़लॉन्ड्री ने साल 2021 में सूचना के अधिकार के तहत मिले जवाब पर एक रिपोर्ट (https://www.newslaundry.com/2021/07/21/yogi-government-spent-rs-160-crore-on-tv-ads-in-one-year-network18-hits-the-jackpot) प्रकाशित की थी. जिसमें  सामने आया था कि योगी सरकार ने एक साल में टीवी विज्ञापनों पर 160 करोड़ रुपये खर्च किए हैं. जिसमें  मुकेश अंबानी के नेतृत्व वाले नेटवर्क 18 ग्रुप को 28.82 करोड़ रुपये हासिल किए थे.