शिव महिमा स्तोत्र
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☀️🙏॥श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यश्रीगोविन्दभगवत् पूज्यपादशिष्यस्य श्रीशङ्करभगवतः कृतौ सुवर्णमालास्तुतिः॥️🙏☀️ 🚩द्वितीय भाग(२६-५०)🚩 लब्ध्वा भवत्प्रसादाच्चक्रं विधुरवति लोकमखिलं भो । साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ ४३ ॥🚩 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩 भावार्थ:- "हे साम्ब! हे सदाशिव! हे शम्भो! हे शंकर! सम्पूर्ण संसार की रक्षा विधाता (भगवान विष्णु) आपके ही प्रसाद से प्राप्त सुदर्शन चक्र द्वारा करते हैं। अर्थात् यह सम्पूर्ण जगत आपके अनुग्रह तथा कृपा से ही सुरक्षित एवं संतुलित है। हे प्रभु! मैं आपके चरणों की शरण में हूँ।" व्याख्या: १. लब्ध्वा भवत्प्रसादात् (आपकी कृपा से प्राप्त कर): ‘भवत्’ अर्थात ब्रह्म रूप शिव से तात्पर्य है। ब्रह्म की कृपा से ही जीव (यहाँ विष्णु) ब्रह्मज्ञान (सुदर्शन चक्र) प्राप्त करता है। क्योंकि परम सत्ता ब्रह्म ही है, जो सबको प्रकाश देता है। २. चक्रं (सुदर्शन चक्र): ‘चक्र’ ब्रह्मज्ञान का प्रतीक है। यह ज्ञान ही संसार रूपी अंधकार को काटने वाला यंत्र है। यह ब्रह्म की माया को भेदकर जीव को मोक्ष की मार्ग पर ले जाता है। ३. विधुः अवति लोकमखिलं (विष्णु सम्पूर्ण लोक की रक्षा करते हैं): विष्णु कोई भिन्न सत्ता नहीं हैं। वे भी ब्रह्म का ही सगुण रूप हैं। यह पालन कार्य भी ब्रह्म ही करता है। जब ज्ञान (चक्र) प्राप्त होता है, तब जीव रूप विष्णु सम्पूर्ण संसार (अपने मन तथा इन्द्रियों) का पालन करता है अर्थात अज्ञान से बचाव करता है। ४. भो साम्ब सदाशिव शम्भो (हे शिव, हे ब्रह्मस्वरूप): यहाँ साधक ब्रह्मरूप शिव को संबोधित कर रहा है, जो साकार तथा निराकार दोनों से परे हैं। शिव ही निर्गुण ब्रह्म हैं, जो उपासक तथा उपास्य दोनों से परे हैं। ५. शरणं मे तव चरणयुगम् (मैं आपके चरणों की शरण में हूँ): ‘शरण’ का अर्थ है — अहंकार तथा द्वैत का पूर्ण त्याग। साधक यह स्वीकार करता है कि वह एवं ब्रह्म (शिव) भिन्न नहीं हैं। यह चरणयुगल ही ब्रह्मज्ञान का द्वार है। 🙁🙁☹️😶🙁☹️😏😣
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☀️🙏॥श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यश्रीगोविन्दभगवत् पूज्यपादशिष्यस्य श्रीशङ्करभगवतः कृतौ सुवर्णमालास्तुतिः॥️🙏☀️ 🚩द्वितीय भाग(२६-५०)🚩 रज्जावहिरिव शुक्तौ रजतमिव त्वयि जगन्ति भान्ति विभो । साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ ४२ ॥🚩 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩 भावार्थ:- "हे सर्वव्यापक प्रभु! जिस प्रकार रज्जु (रस्सी) में सर्प का भ्रम होता है तथा शुक्ति (सीप) में चाँदी का आभास होता है, उस प्रकार से ही यह सम्पूर्ण जगत आपकी सत्ता में ही प्रकाशित होता है। हे साम्ब (माता के साथ संयुक्त), हे सदाशिव, हे शंभु, हे शंकर! मैं आपके चरणकमलों की शरण में आता हूँ।" व्याख्या : १. "रज्जावहिरिव": "रज्जु-सर्प भ्रांति" एक प्रसिद्ध दृष्टांत है। जब अन्धकार में एक व्यक्ति रज्जु को देखकर उसे सर्प समझ लेता है, तो यह उसका भ्रम होता है। उसी प्रकार, जीव अज्ञानवश संसार को वास्तविक मान लेता है, जबकि सत्य केवल ब्रह्म हैं। २. "शुक्तौ रजतमिव": जब सूर्य की किरणें किसी शुक्ति पर पड़ती हैं, तो वह चमकती हुई चाँदी जैसी प्रतीत होती है। परंतु वास्तव में वहाँ चाँदी नहीं होती, यह केवल दृष्टिभ्रम है। इसी प्रकार, यह संसार भी ईश्वर की माया से वास्तविक प्रतीत होता है, जबकि परम सत्य केवल शिव ही हैं। ३. "त्वयि जगन्ति भान्ति विभो": संपूर्ण जगत ब्रह्म में ही स्थित है एवं उन्हीं के कारण प्रकाशित होता है। यह जगत केवल उनकी चेतना का प्रतिबिंब है, वास्तव में केवल ब्रह्म ही सत्य हैं। ४. "साम्ब सदाशिव शम्भो": "साम्ब" शिव के अर्धनारीश्वर रूप का प्रतीक है, जो इस सृष्टि की रचनात्मक एवं संहारात्मक शक्ति का द्योतक है। "सदाशिव" शिव के नित्य, कल्याणकारी एवं अखंड स्वरूप का बोध कराता है। ५. "शरणं मे तव चरणयुगम्": भक्त भगवान शिव के चरणों की शरण में जाने की प्रार्थना करता है। यह आत्मबोध (Self-realization) तथा मोक्ष की मार्ग पर अग्रसर होने का प्रतीक है।" 🙁🙁☹️😶🙁☹️😏😣
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☀️🙏॥श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यश्रीगोविन्दभगवत् पूज्यपादशिष्यस्य श्रीशङ्करभगवतः कृतौ सुवर्णमालास्तुतिः॥️🙏☀️ 🚩द्वितीय भाग(२६-५०)🚩 यमनियमादिभिरङ्गैर्यमिनो हृदये भजन्ति स त्वं भो । साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ ४१ ॥🚩 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩 भावार्थ:- "हे प्रभु! जो योगी यम (संयम), नियम (आचरण), एवं अन्य योग-अंगों के माध्यम से अपने हृदय में आपका भजन करते हैं, वही आप हैं। हे साम्ब (माता के साथ संयुक्त), हे सदाशिव, हे शंभु, हे शंकर! मैं आपके चरणकमलों की शरण लेता हूँ।" व्याख्या : १. "यमनियमादिभिरङ्गैः": "यम" तथा "नियम" योग के आठ अंगों में से प्रारंभिक साधन हैं। यम में अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य, एवं अपरिग्रह आते हैं। नियम में शौच (शुद्धता), संतोष, तप, स्वाध्याय, एवं ईश्वर प्राणिधान सम्मिलित हैं। यह मार्ग आत्मा को शुद्ध करता है एवं भगवान की अनुभूति हेतु योगी को प्रस्तुत करता है। २. "यमिनो हृदये भजन्ति": "यमिनः" का अर्थ है आत्म-संयमी साधक अथवा योगी। जो योगी अपने हृदय में भगवान का चिंतन करते हैं, वे उनकी दिव्य उपस्थिति का अनुभव करते हैं। ३. "स त्वं भो": यह "त्वं" (तुम) तथा "स" (वह) की एकता को संकेत करता है। यह बताता है कि जो भगवान योगी अपने हृदय में भजते हैं, वही सर्वव्यापी ब्रह्म हैं। ४. "साम्ब सदाशिव शम्भो": "साम्ब" तथा "सदाशिव" भगवान शिव के शाश्वत तथा कल्याणकारी स्वरूप का वर्णन करते हैं। "शंभु" सुख तथा शांति का प्रतीक है। ५. "शरणं मे तव चरणयुगम्": भक्त भगवान शिव के चरणों की शरण में जाने की प्रार्थना करता है। यह आत्मसमर्पण तथा ब्रह्म के साथ एकत्व प्राप्त करने की साधना का प्रतीक है। 🙁🙁☹️😶🙁☹️😏😣