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उन “नासमझों” को सलाम… मैं अक्सर उन युवाओं के बारे में सोचता हूँ, जो आंदोलनों में सबसे आगे खड़े होते हैं। चार-चार बैरिकेडिंग पार करने की हिम्मत, आँसू गैस के बीच डटे रहने का साहस, वाटर कैनन बारिश में भीगने और लाठीचार्ज में चोट खाने के बाद भी फिर से उसी मोर्चे पर लौट आने का जज़्बा—आखिर इतनी हिम्मत आती कहाँ से है? वैसे अधिकारी जिन्हें सामने देख गरीब की रूह तक कांप जाती है उनके सामने बेखौफ खड़े रहना और सत्ता के नशे में चूर नेताओं को उनके बईमानी पर आईना दिखाना—समाज इन्हें अक्सर “नासमझ” कहता है। लेकिन जब तथाकथित समझदार लोग हर परिस्थिति में अपना मतलब चुनकर चुप रहे, तब इन्हीं नासमझों ने समाज के लिए आवाज उठाई। समाज को असली खतरा उन समझदारों से है, जिनकी समझदारी एकतरफा, सलेक्टिव या स्वयंहित के लिए है। जो दुबक लिए, निकल लिए, गए ही नहीं, पढ़ लिए.. इसलिए सलाम उन युवाओं को, जो उस कतार में सबसे आगे खड़े रहे, जहां फूल नहीं, लाठियाँ बरसने वाली थी। उम्मीद है एक दिन अंग्रेजों वाली शिक्षा व्यवस्था भी बदलेगी और समाज सिर्फ कर्मचारियों की नहीं बल्कि समाज के लिए सवाल पूछने वाले और अन्याय के खिलाफ खड़े होने वाले, देश हित के लिए नवाचार करने वालों को अधिकारियों से जायदा या बराबर इज्जत देगी। खैर इतिहास भूगोल गीता आदि पढ़ा आदमी यह जानता है कि प्रसिद्धि और पद से कर्मों का हिसाब खत्म नहीं होता—हिसाब जरूर होता है। ~ सुभाष वर्मा
S4G RANCHI Update : 10 अगस्त विधानसभा घेराव के बाद भी जारी रहेगा JPSC-JSSC आंदोलन, जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम बना रहेगा आंदोलन का केंद्र https://www.instagram.com/reel/Db3W_M2Jay6/?igsh=MXd3aDN2Mjc2Y202ag==
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इन दिनों राजधानी रांची के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम से लेकर अल्बर्ट एक्का चौक तक लगभग हर शाम JPSC और JSSC के आंदोलनकारी छात्रों द्वारा न्याय की आवाज बुलंद करती एक विशाल झांकी निकाली जा रही है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि लांस नायक अल्बर्ट एक्का कौन थे? आइए, इस वीडियो के माध्यम से जानते हैं उस महान सपूत की शौर्य गाथा 👇🏻 https://youtu.be/sOrNjmQITn4?si=acfZHUsl-iGPWwDD
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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा, चला जाऊँगा दर्द सीने में दबाऊँगा और, चला जाऊँगा। आंदोलन में कोई आए कि न आए कोई, मैं तो आवाज़ लगाऊँगा, चला जाऊँगा। सरकार के होश में आने तक आवाज़ उठाने दे मुझे, फिर अपने भाइयों को गले लगाऊँगा, चला जाऊँगा। मुद्दतों बाद जागा है यह झारखंडी हुजूम, अंधेरो से टकराऊंगा, सुबह होगी तो मै चला जाऊँगा। ज़ंजीरों में बंधे नहीं रहते झारखंडी, परेशानियों से नाव बनाऊँगा, चला जाऊँगा। कान में तेल डालकर सोई सरकारें सुन लें, मसला हल होने तक मसाल जलाऊंगा, आवाज उठाऊंगा, चला जाऊँगा। मैं मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा, हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा, चला जाऊँगा।
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