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मैं चोरी करूं, खून करूं, धोखा दूं, धर्म मुझे अलग नहीं कर सकता। अछूत के हाथ से पानी पी लें, धर्म छूमंतर हो गया। अच्छा धर्म धर्म है। है। हम धर्म के बाहर किसी से आत्मा का संबंध भी नहीं कर सकते? आत्मा को भी धर्म ने बाँध रखा है, प्रेम को भी जकड़ रखा है। यह धर्म नहीं, धर्म का कलंक है। -प्रेमचंद (कर्मभूमि)
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Wishes on the 80th Independence Day 🇮🇳 Lucky to be born into the greatest civilisation in human history.
मुझे तुम नज़र से गिरा तो रहे हो मुझे तुम कभी भी भुला ना सकोगे
Milogi jab tum, toh pata chalega main aur bhi kaala ho gaya hoon... Main dhoop mein jalke itna kaala nahi hua tha, jitna iss raat mein sulag kar siyaah hua hoon. - Gulzar
Shubh Shaam
मैंने एक कहानी सुनी है कि कृष्ण भोजन को बैठे, रुक्मिणी ने थाली लगाई। एक कौर लिया होगा मुश्किल से कि हड़बड़ा कर भागे। रुक्मिणी समझ न पाई। लेकिन द्वार तक गए, वापस लौट आए; फिर बैठ गए थाली पर। रुक्मिणी ने कहा, बेबूझ हो गई बात। किसलिए भागे? और फिर क्यों द्वार से वापस लौट आए? भागे तो ऐसे जैसे कहीं आग लग गई हो–कि अब भोजन कैसे किया जा सकता है, आग पहले बुझानी होगी। और लौट आए ऐसे जैसे कुछ भी न हुआ था। यह क्या किया? कृष्ण ने कहा, जरूर आग लग गई थी; भागा। लेकिन द्वार तक पहुंचा कि आग बुझ गई, लौट आया। मेरा एक भक्त एक राजधानी की सड़क से गुजर रहा है, लोग उस पर पत्थर फेंक रहे हैं, लहू बह रहा है उसके माथे से और वह गोविन्द-गोविन्द किए जा रहा है। वह न तो उत्तर दे रहा है, न बचाव कर रहा है; उसने अपने को बिलकुल मेरे हाथों में छोड़ दिया। भागना एकदम अनिवार्य था। जो इस भांति असहाय हो जाए, भगवान को उसकी तरफ भागना ही पड़ता है। जो इतना शून्य हो जाए कि पत्थर पड़ रहे हैं, उनसे बचाव भी न करे, भागे भी न, उत्तर भी न दे, तो सारा अस्तित्व उसकी रक्षा के लिए आ जाता है। गङ्ढा हो गया; चारों तरफ से जलधार बहने लगती है–उसे भरने को, उसे झील बनाने को। फिर, रुक्मिणी ने पूछा, लौट क्यों आए? कृष्ण ने कहा, लेकिन जब तक मैं द्वार पर पहुंचा, उसने अपना चित्त ही बदल लिया; उसने खुद ही पत्थर हाथ में उठा लिया; अब वह खुद ही जवाब दे रहा है, मेरी कोई जरूरत न रही। परमात्मा की जरूरत वहीं है, जहां तुम असहाय हो। और तुम्हारी असहाय अवस्था से गोविन्द-गोविन्द का नाम निकल जाए, भजन हो गया। कोई शब्द कहने की जरूरत नहीं कि तुम गोविन्द-गोविन्द चिल्लाओ। भीतर भाव–कि वे भाव भरी आंखें आकाश की तरफ उठ जाएं, कि तुम्हारा हृदय आकाश की तरफ खुल जाए–और तुम अपने लिए कुछ भी न करो; उसी क्षण परमात्मा तुम्हारी तरफ दौड़ पड़ता है। तुम गङ्ढे बनो, परमात्मा भरने को सदा राजी है। ओशो - ( भजगोविंदम मुढ़मते )
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🎥 Apu Trilogy
🎥 Apu Trilogy
Growth rate of followers not as fast as CJP for obvious reasons but still very good indeed. Would touch 10mn in a day or two. The leaders have been declared as Ajeet Bharti(Youtuber, Journalist) and Dr. Anand Ranganathan(Professor(JNU), Scientist, Political commentator)
इतनी रात अँधेरे बरामदे में इस तरह खड़े रहना, न नींद में, न नींद के परे, खड़खड़ाते दरवाजे को सुनना-इससे ज्यादा और क्या चीज्ज दयनीय हो सकती है? भ्रमों को पालना-उनमें सुख ढूँढ़ना-फिर उसी 'चीज' को, जो न सुख होता, न भ्रम, एक मरे हुए चूहे की तरह घसीटकर कमरे में लाना- यह कोई गर्व की बात है? - निर्मल वर्मा
Time to address the elephant in the room? Gains 1M+ followers in a day!!
"संघर्षों के साये में इतिहास हमारा पलता है, जिस ओर जवानी चलती है, उस ओर ज़माना चलता है।"🔥🔥
Now it's time for Virat to chase down this target and have his name on Lords forever
Sheeerrrr ❤️🗿
ये भी मुमकिन है कि इक दिन वो पशीमाँ हो कर तेरे पास आए ज़माने से किनारा कर ले तू कि मासूम भी है ज़ूद-फ़रामोश भी है उस की पैमाँ-शिकनी को भी गवारा कर ले और मैं जिस ने तुझे अपना मसीहा समझा एक ज़ख़्म और भी पहले की तरह सह जाऊँ जिस पे पहले भी कई अहद-ए-वफ़ा टूटे हैं इसी दो-राहे पे चुप-चाप खड़ा रह जाऊँ
ये कौन राह में बैठे हैं मुस्कुराते हैं मुसाफ़िरों को ग़लत रास्ता बताते हैं तेरे लगाये हुए ज़ख़्म क्यों नहीं भरते मेरे लगाये हुए पेड़ सूख जाते हैं कोई तुम्हारा सफ़र पर गया तो पूछेंगे के रेल गुज़रे तो हम हाथ क्यों हिलाते हैं !! -तहज़ीब हाफ़ी