ख्यालों के बुने अल्फ़ाज़।
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🖤🍂 ज़िद बस उसको पाने की है हमें कहाँ ज़रूरत ज़माने की है रिश्ता पुराना भी टूट सकता है यही कीमत आज़माने की है बहुत दिनों से देखा नहीं तुझे यह रुत तेरे शहर आने की है बच कर रहना ज़माने से ज़रा बुरी नियत इस ज़माने की है अच्छी नहीं लगती ख़ामोश तू तुझे ज़रूरत मुस्कुराने की है बहुत हो गया नज़रों का मिलाना अब ज़रूरत बात बढ़ाने की है बड़ी जंचती है सादगी तुझ पे तू हस्ती दिल लगाने की है © आदिल खान...✍🏻
❤️✨🍂 न जाने क्यों देखकर तुम्हें, आंखे लगती है सपने संजोना !! जरा भी पसंद नहीं है मुझे, बारिश का तुम्हे यूं भिगोना !! Good morning everyone 💐 © आदिल कहां...✍🏻
ᥫ᭡፝֟፝֟ ऐसे कैसे पढ़ लोगे मुझे चन्द लम्हों में; मैंने खुद को लिखने में कई साल लगाये हैं...!!
❤️🌎⭐ जमीन और फलक को रुलाने वाला हु तुम्हारे हिज़्र की बरसी मनाने वाला हूं !! में तुझ पे हाथ उठाऊंगा सोचना भी मत खुदा की बंदी में नखरे उठाने वाला हूं !! © आदिल खान...✍🏻
ᥫ᭡፝֟፝֟ वो कबूतर जो तेरी ओर गए थे जानां, लौट तो आए हैं मगर आवाज खो बैठे...!!
ᥫ᭡፝֟፝֟ तुम्हारा अंतिम समय का व्यवहार मेरी पसंद पर दाग लगा गया...!!
❤️🌎⭐ में दुनिया के सामने अकड़ कर चलने वाला लड़का झुक कर तुम्हारे जूतों की धूल अपने हाथों से साफ करूं तो मानोगी की इश्क है !! ❤️ © आदिल खान...✍🏻
सूरतें जितनी भी हसीन हों, नसीबों की मोहताज होती हैं, खामोशियों में दबी हँसी भी अक्सर दर्द से जलती रहती है। आँखों के आईने में अरमान टूट कर बिखर जाते हैं, मोहब्बत की राहें अक्सर तक़दीर की रेत में दफ़्न हो जाती हैं। #आकाश
ᥫ᭡፝֟፝֟ इश्क में तड़प लाज़मी है, पर खुद को खो देना ज़ुल्म है!!
ᥫ᭡፝֟፝֟ नशा था तेरे प्यार का जिसमे हम खो गए हमें भी नही पता चला कब हम तेरे हो गए!!
ᥫ᭡፝֟፝֟ अगर आप अजनबी हो तो लगते क्यों नहीं, और अगर मेरे हो तो मुझे मिलते क्यों नहीं।
दिल के टुकड़े मजबूर करते हैं कलम चलाने को वरना, हक़ीक़त में कोई भी खुद का दर्द लिखकर खुश नहीं होता वरना। छुपा लेते हैं लोग आँसू हँसी के पीछे अक्सर, हर ज़ख़्म यूँ सरे-बाज़ार बयाँ होता नहीं वरना। रातों की तन्हाई में दिल चीख़ता तो बहुत है, दिन की रौशनी में ये हालात दिखते नहीं वरना। हम भी मुस्कुराते फिरते हैं महफ़िलों में अक्सर, भीतर का समंदर यूँ ठहरा हुआ होता नहीं वरना। कुछ ख़्वाब थे जो टूट के बिखरे हैं आँखों में, हर आदमी यूँ ख़ामोश सा रहता नहीं वरना। कलम से जो बह निकला वही सच बन गया अपना, दिल यूँ हर किसी के सामने खुलता नहीं वरना। "आकाश" अपने जज़्बात यूँ काग़ज़ पे उतार देता है, सीने में ये तूफ़ान कभी थमता नहीं होता वरना। #आकाश
जिनकी जवानी भारत हो गई “कुछ नाम इतिहास में दर्ज हैं, और कुछ इस मिट्टी में समा गए। पर जिन्होंने भारत के लिए अपनी जवानी लुटा दी— वे सब अमर हो गए।” महाराणा प्रताप— जिन्होंने सिंहासन नहीं, स्वाभिमान चुना। घास की रोटी खाकर भी मातृभूमि के आगे कभी सिर नहीं झुकाया। भगत सिंह— जिनकी आँखों में उम्र नहीं, इंक़लाब जलता था। हँसते-हँसते फाँसी चूम ली, क्योंकि उन्हें पता था— एक मौत, लाखों को जगा देगी। चंद्रशेखर आज़ाद— जिन्होंने गुलामी में ज़िंदा रहना स्वीकार नहीं किया। और सुभाष— जिन्होंने कहा, “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा।” कोई कारगिल की बर्फ़ में सो गया, कोई सीमा की रेत में बिछ गया। किसी का नाम स्मारक पर है, तो कोई बिना नाम के तिरंगे में लिपट गया। उन्होंने जवानी न सपनों में उड़ाई, न महफ़िलों में गंवाई। उन्होंने जवानी इस देश की नींव में चुपचाप चुनवा दी। आज जो हम खुली हवा में साँस लेते हैं, मोबाइल में आज़ादी लिखते हैं, वह सब किसी की अधूरी उम्र की कीमत पर मिला है। नमन है उन सब शहीदों को— जिनका धर्म भारत था, जिनकी पहचान बलिदान थी। नाम चाहे ज्ञात हों या नहीं, पर यह देश उनका ऋणी है। हम वादा करते हैं— यह आज़ादी यूँ ही नहीं जाएगी। जिन्होंने जवानी दे दी भारत को, उनकी क़ुर्बानी व्यर्थ नहीं जाएगी। #आकाश
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कहाँ तक ये दिखावा करे कि हम ख़ुश हैं इस ज़माने में, उम्र बीत रही है फ़क़त अपने ही दिल को क़ब्रिस्तान बनाने में। हर एक ज़ख़्म मुस्कान ओढ़े महफ़िल में चला आता है, सलीक़ा आ गया है दर्द को भी किस्से में छुपाने में। हमारे ख़्वाब भी थक कर कहीं कोने में सो जाते हैं, हुनर लगता है अब टूटी हुई उम्मीद जगाने में। किसी ने पूछ लिया हाल तो बस हँस के कह दिया हमने, महारत मिल गई है आँसुओं को लफ़्ज़ों से नहलाने में। वक़्त ने ऐसा घुमाया है कि पहचान खो बैठे हैं, हम ख़ुद को ढूँढते फिरते हैं अपने ही फ़साने में। अजनबी, सच कहें तो अब कोई शिकवा भी बाक़ी नहीं, ज़िंदगी बीत गई ख़ामोशी को अपना हमसफ़र बनाने में। #आकाश
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कभी फुरसत में लिखूँगा वो तमाम ख़ूबसूरत पल, जो मैंने सोचे ज़रूर थे, पर जी नहीं पाया। हर एक ख़्वाब को ज़िम्मेदारियों में दबाया, हँसने के बहाने थे बहुत, पर हँसी नहीं पाया। वक़्त की तेज़ रफ़्तार में सब पीछे छूटता गया, जो पास था वही सबसे पहले, संभाल नहीं पाया। कुछ रिश्ते सवाल बन गए, कुछ ख़ामोशी जवाब, कहने को बहुत कुछ था मगर कह नहीं पाया। मैं रोज़ आईने में खुद से मिलने जाता रहा, वो जो मैं था कभी, उसे पहचान नहीं पाया। नाम मेरा ही लिखा था हर एक अधूरी दास्ताँ पर, ज़िंदगी समझता रहा सब, बस खुद को नहीं पाया। #आकाश
ग़ज़ल दर्द देकर दिलासे, हाय अपनों के ये तमाशे अपने ही जब बन जाएँ, ज़ख़्मों के तमाशे हर मोड़ पे समझौते, हर बात पे ख़ामोशी सच बोलने वालों के, मिट जाते हैं तमाशे हँसते हुए चेहरे भी, रोने की वजह निकले महफ़िल में यूँ छुपते हैं, ग़मों के तमाशे उम्मीद की डोरों को, खुद हाथों से काटा फिर पूछते हैं हमसे, क्यूँ टूटे ये तमाशे जो साथ चले कल तक, आज राह बदल बैठे क़िस्मत ने दिखा डाले, कैसे कैसे तमाशे दिल साफ़ हो जिनका, वो हार ही जाते हैं दुनिया को पसंद आएँ, चालाक से तमाशे #आकाश
उदासियों की कहानी नहीं बनाऊंगा, मैं डूब जाऊँ अगर भी कश्ती नहीं बनाऊंगा। थक गया हूँ मैं झूठे ख़्वाब बुन-बुन कर, अब टूटे हुए ख़्वाबों से बस्ती नहीं बनाऊंगा। मैं अपने दिल में लगाऊँगा एक नया ताला, मगर इस बार मैं चाबी नहीं बनाऊंगा। जो अपना था वही सबसे ज़्यादा बेगाना निकला, अब हर किसी को मैं साथी नहीं बनाऊंगा। लहू से लिखी हैं मैंने अपनी सारी दास्ताँ, किसी के झूठ पे मैं स्याही नहीं बनाऊंगा। ख़ामोशी ही मेरी अब सबसे बड़ी ताक़त है, हर सवाल का मैं जवाब नहीं बनाऊंगा। अगर वक़्त ने फिर से आज़माने की ठानी, तो भी मैं अपनी सादगी क़ुर्बानी नहीं बनाऊंगा। #आकाश