☸️🌼पवित्र बुद्ध वाणी🌼☸️
Статистика☸️🌼'' इस चैनल के माद्यम से आपको भगवान बुद्ध जी की पवित्र बुद्ध वाणी पढ़ने का मौका मिलेंगी !''🌼☸️ 🌹'' धम्म ही मनुष्यों में श्रेष्ठ है , इसलोक में भी और परलोक में भी ! ''🌹दीघ निकाय ३.४🌹 🌹हमारा मुख्य ग्रुप👇 https://t.me/Indianbuddhist🙏
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🙏🌹इस PDF में प्रस्तुत है - भगवान बुद्ध, सद्धर्म और आर्य संघ के असीम गुणों की एक अत्यंत दुर्लभ और हृदयस्पर्शी स्तुति🙏🌹
🌼..खुद्दक निकाय के विमानवत्थु ..🌼 #kuddakanikayapdf #vimanavattupdf 🌹🌹🌼जानिए देवलोक जाने का रास्ता ! ( त्रिपिटक के विमानवत्थु )🌼🌹🌹 🌹हिंदी अनुवाद - कल्याणमित्र जगमीत सिंह जी🌹
🌹🌹🌼आइए, शुरू से ध्यान साधना / विपस्सना सीखें! (BUDDHIST MEDITATION BOOK IN HINDI)🌼🌹🌹 🌹लेखक -अति पूजनीय ज्ञानानंद गुरु भंते जी (श्रीलंका) 🌹अनुवादक - कल्याणमित्र जगमीत सिंह जी
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☸️आइए, शुरू से आर्य उपोसथ व्रत के बारे में सीखें !☸️ 🌼सभी लोग उपोसथ धारण करके अप्रमाण पुण्य अर्जित करिए ! मन में संकल्प लीजिये की इस वर्ष में सभी उपोसथ दिन मैं उपोसथ धारण करूँगा ! उपोसथ धारण करने से हमें बहुत पुण्य मिलता है। मनुष्य जन्म,कल्याण मित्र संगती और पवित्र धम्म मिलना बहुत दुर्लभ है। आपको ये सब मिला है ! इसलिए उपोसथ के महत्व को जानकर आलस छोड़कर हर उपोसथ धारण करिए ! 🌼 🙏🌷मंगलकामना करता हूँ की आप सभी लोग को इस वर्ष में सभी उपोसथ धारण करके अप्रमाण पुण्य अर्जित करने का मौका मिले !🌷🙏 ⭕️👉इससे आप आसानी से उपोसथ शील सुरक्षा के बारे में सीख सकते हैं!👇👇
☸️🌹आइए, शुरू से ध्यान साधना /विपस्सना सीखें!🌹🙏 🌹🌼ध्यान हमें समृद्ध करता है और जीवन को अधिक अर्थ देता है। ध्यान मन को सुधारने की एक विशेष विधि है। वे बुद्ध जी ही थे जिन्होंने सबसे पहले हमें सिखाया कि चित्त का विकास किया जा सकता है। उन्होंने अपने चित्त को उच्चतम स्तर तक उन्नत किया और हमें चित्त को उन्नत करने का मार्ग बताया। मन के विकास की इस विधि को हम ''ध्यान'' कहते हैं। यदि आप इस विधि का अभ्यास कर सकते हैं, तो आप भी अपने चित्त को तीव्रता से सुधार सकते हैं।🌹🌼 ⭕️👉इससे आप आसानी से ध्यान /विपस्सना विधि के बारे में सीख सकते हैं!👇👇👇
🌺अग्गधम्म सुत्त🌺 #anguttaranikaya “छहि, भिक्खवे, धम्मेहि समन्नागतो भिक्खु अभब्बो अग्गं धम्मं अरहत्तं सच्छिकातुं। कतमेहि छहि? इध, भिक्खवे, भिक्खु अस्सद्धो होति, अहिरिको होति, अनोत्तप्पी होति, कुसीतो होति, दुप्पञ्ञो होति, काये च जीविते च सापेक्खो होति। इमेहि खो, भिक्खवे, छहि धम्मेहि समन्नागतो भिक्खु अभब्बो अग्गं धम्मं अरहत्तं सच्छिकातुं। "भिक्षुओं, छह बातों से युक्त भिक्षु अग्र-धर्म अर्हत्व का साक्षात्कार करने के अयोग्य होता है। कौनसी छह? भिक्षुओं, यहाँ भिक्षु अश्रद्धावान होता है, अहिरिक (पापों के प्रति लज्जा-रहित) होता है, अनोत्तप्पी (पापों के प्रति भय-रहित) होता है, आलसी होता है, दुष्प्रज्ञ (बेसमझ) होता है, काया (शरीर) और जीवन के प्रति आशावान होता है। भिक्षुओं, इन छह बातों से युक्त भिक्षु अग्र धर्म अर्हत्व का साक्षात्कार करने के अयोग्य होता है। “छहि, भिक्खवे, धम्मेहि समन्नागतो भिक्खु भब्बो अग्गं धम्मं अरहत्तं सच्छिकातुं। कतमेहि छहि? इध , भिक्खवे, भिक्खु सद्धो होति, हिरिमा होति, ओत्तप्पी होति, आरद्धवीरियो होति, पञ्ञवा होति, काये च जीविते च अनपेक्खो होति। इमेहि खो, भिक्खवे , छहि धम्मेहि समन्नागतो भिक्खु भब्बो अग्गं धम्मं अरहत्तं सच्छिकातु”न्ति। "भिक्षुओं, छह बातों से युक्त भिक्षु अग्र-धर्म अर्हत्व का साक्षात्कार करने के योग्य होता है। कौनसी छह? भिक्षुओं, यहाँ भिक्षु श्रद्धावान होता है, लज्जावान होता है, भय-सहित होता है, आरब्ध-वीर्य वाला (energetic) होता है, प्रज्ञावान होता है, काया और जीवन के प्रति आशा-रहित होता है। भिक्षुओं, इन छह बातों से युक्त भिक्षु अग्र धर्म अर्हत्व का साक्षात्कार करने के योग्य होता है।" 🌸 अंगुत्तरनिकाय ६.८.९, सुत्तपिटक
"ब्राह्मण, न मैं सभी यज्ञों की प्रशंसा करता हूँ,और ब्राह्मण, न मैं सभी यज्ञों की निन्दा करता हूँ। ब्राह्मण, जैसे यज्ञ में गौओं की हत्या होती है, बकरी-भेडों की हत्या होती है, मुर्गे सूअरों की हत्या होती है तथा (अन्य) नाना प्रकारके प्राणियों की हत्या होती; ब्राह्मण, मैं इस प्रकार के हिंसक यज्ञ की प्रशंसा नहीं करता। यह किसलिये ? ब्राह्मण, इस प्रकार के हिंसक यज्ञ में अर्हत् या अर्हत्व-मार्गारूढ़ नहीं आते। “यथारूपे च खो, ब्राह्मण, यञ्ञे नेव गावो हञ्ञन्ति, न अजेळका हञ्ञन्ति, न कुक्कुटसूकरा हञ्ञन्ति, न विविधा पाणा सङ्घातं आपज्जन्ति; एवरूपं खो अहं, ब्राह्मण, निरारम्भं यञ्ञं वण्णेमि , यदिदं निच्चदानं अनुकुलयञ्ञं। तं किस्स हेतु? एवरूपञ्हि, ब्राह्मण, निरारम्भं यञ्ञं उपसङ्कमन्ति अरहन्तो वा अरहत्तमग्गं वा समापन्ना”ति। "ब्राह्मण, जैसे यज्ञ में न गौओं की हत्या होती है, न बकरी-भेडों की हत्या होती है, न मुर्गे सूअरों की हत्या होती है और न (अन्य) नाना प्रकार के प्राणियों की हत्या होती है, ब्राह्मण, मैं इस प्रकार के अहिंसक यज्ञ की प्रशंसा करता हूँ, जो कि यह नित्य दान देना, अनुकूल यज्ञ है। यह किसलिये ? ब्राह्मण, इस प्रकार के अहिंसक यज्ञ में अर्हत् या अर्हत्व-मार्गारूढ़ आते हैं।" “अभिसङ्खतं निरारम्भं, यञ्ञं कालेन कप्पियं। तादिसं उपसंयन्ति, सञ्ञता ब्रह्मचारयो॥ "जिस यज्ञ में पशुओं की हत्या न होती हो, ऐसा अभिसंस्कृत (तैयार किया गया) यज्ञ उचित समय पर करना चाहिये। जो संयत हैं, जो ब्रह्मचारी हैं वे वैसे 'यज्ञ' में जाते हैं। “विवटच्छदा ये लोके, वीतिवत्ता कुलं गतिं। यञ्ञमेतं पसंसन्ति, बुद्धा यञ्ञस्स कोविदा॥ "दुनिया से जिन्होंने पर्दे को हटा दिया है, जो कुल-गति की सीमाओं के पार हैं, जो यज्ञ के जानकर 'बुद्ध' हैं वे ऐसे ही यज्ञ की प्रशंसा करते हैं। “यञ्ञे वा यदि वा सद्धे, हब्यं कत्वा यथारहं। पसन्नचित्तो यजति , सुखेत्ते ब्रह्मचारिसु॥ "यज्ञ में अथवा श्राद्ध में यथायोग्य 'आहुति' डालने वाला सुक्षेत्र ब्रह्मचारियों में प्रसन्नचित्त हो 'यज्ञ' करता है। “सुहुतं सुयिट्ठं सुप्पत्तं , दक्खिणेय्येसु यं कतं। यञ्ञो च विपुलो होति, पसीदन्ति च देवता॥ "दक्षिणा देने योग्यों को जो दान दिया जाता है, वह अच्छी आहुति देना है, वह अच्छा यज्ञ करना है, वह अच्छी प्राप्ति है। ऐसा 'यज्ञ' महान् यज्ञ होता है और देवता-गण प्रसन्न होते हैं। “एवं यजित्वा मेधावी, सद्धो मुत्तेन चेतसा। अब्याबज्झं सुखं लोकं, पण्डितो उपपज्जती”ति॥ "जो मेधावी होता है, जो श्रद्धावान् होता है, वह पण्डित मुक्त चित्त से इस प्रकार यज्ञ करके व्यापाद-रहित सुख-लोक को प्राप्त होता है।" 🌸 अंगुत्तरनिकाय ४.४.१०, सुत्तपिटक
🌺उदायी सुत्त🌺 #anguttaranikaya अथ खो उदायी ब्राह्मणो येन भगवा तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा भगवता सद्धिं सम्मोदि। सम्मोदनीयं कथं सारणीयं वीतिसारेत्वा एकमन्तं निसीदि। एकमन्तं निसिन्नो खो उदायी ब्राह्मणो भगवन्तं एतदवोच – “भवम्पि नो गोतमो यञ्ञं वण्णेती”ति? “न खो अहं, ब्राह्मण, सब्बं यञ्ञं वण्णेमि; न पनाहं, ब्राह्मण, सब्बं यञ्ञं न वण्णेमि। यथारूपे खो, ब्राह्मण, यञ्ञे गावो हञ्ञन्ति, अजेळका हञ्ञन्ति, कुक्कुटसूकरा हञ्ञन्ति, विविधा पाणा सङ्घातं आपज्जन्ति; एवरूपं खो अहं, ब्राह्मण, सारम्भं यञ्ञं न वण्णेमि। तं किस्स हेतु? एवरूपञ्हि, ब्राह्मण, सारम्भं यञ्ञं न उपसङ्कमन्ति अरहन्तो वा अरहत्तमग्गं वा समापन्ना। उस समय उदायी ब्राह्मण जहाँ भगवान् थे, वहाँ गया, पास पहुँच कर कुशल-क्षेम पूछा। कुशल-क्षेम की बात-चीत कर चुकने पर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए ब्राह्मण ने भगवान् से कहा- "हे गौतम, आप भी यज्ञ की प्रशंसा करते हैं?"
🌺सब्बकामित्थेरगाथा🌺 #theragatha “द्विपादकोयं असुचि, दुग्गन्धो परिहीरति । नानाकुणपपरिपूरो, विस्सवन्तो ततो ततो॥ "यह दो पैरों वाला (द्विपादक) शरीर गन्दा है, दुर्गंध फैलाता है। अनेक गन्दगियों से भरा यह (शरीर) जहाँ तहाँ दुर्गन्ध फैलाता है। “मिगं निलीनं कूटेन, बळिसेनेव अम्बुजं। वानरं विय लेपेन, बाधयन्ति पुथुज्जनं॥ "जिस प्रकार छिपे हुए मृग को धोके से, मछली को काँटे से और बन्दर को लेप से फंसाया जाता है उसी प्रकार पृथक-जन (काम तृष्णा में) फँसाये जाते हैं। “रूपा सद्दा रसा गन्धा, फोट्ठब्बा च मनोरमा। पञ्च कामगुणा एते, इत्थिरूपस्मि दिस्सरे॥ "मनोरम रूप, शब्द, गन्ध रस और स्पर्श, ये पाँच प्रकार के काम-गुण स्त्री रूप में दिखाई देते हैं। “ये एता उपसेवन्ति, रत्तचित्ता पुथुज्जना। वड्ढेन्ति कटसिं घोरं, आचिनन्ति पुनब्भवं॥ "जो आसक्त-चित्त पृथक-जन इनका उपभोग करते हैं, वे घोर संसार को बढ़ाते हैं, और पुनर्जन्मों का संचय करते हैं। “यो चेता परिवज्जेति, सप्पस्सेव पदा सिरो। सोमं विसत्तिकं लोके, सतो समतिवत्तति॥ "जो इसका त्याग वैसा ही कर देता है जैसा कि पैर साँप के सर को, वह स्मृतिमान् हो इस दुनिया की आसक्ति से परे हो जाता है। “कामेस्वादीनवं दिस्वा, नेक्खम्मं दट्ठु खेमतो। निस्सटो सब्बकामेहि, पत्तो मे आसवक्खयो”ति॥ "कामों के दुष्परिणाम को देखकर निष्कामता को क्षेम (के रूप में) देखकर, सभी कामों से निर्लिप्त हो मैंने आस्रवों के क्षय को प्राप्त किया।" 🌸 थेरगाथा, खुद्दकनिकाय, सुत्तपिटक
🌺मागध सुत्त🌺 #sanyuttanikaya एवं मे सुतं – एकं समयं भगवा सावत्थियं विहरति जेतवने अनाथपिण्डिकस्स आरामे। अथ खो मागधो देवपुत्तो अभिक्कन्ताय रत्तिया अभिक्कन्तवण्णो केवलकप्पं जेतवनं ओभासेत्वा येन भगवा तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा भगवन्तं अभिवादेत्वा एकमन्तं अट्ठासि। एकमन्तं ठितो खो मागधो देवपुत्तो भगवन्तं गाथाय अज्झभासि – ऐसा मैंने सुना –एक समय भगवान् श्रावस्ती में अनाथपिण्डिक के जेतवनाराम में विहार करते थे। तब मागध देव-पुत्र देर रात्रि में (जब रात खत्म हो गई थी) (अपने) सुंदर रूप (वर्ण) से सारे जेतवन को प्रकाशित करता हुआ, जहाँ भगवान् थे, वहाँ पहुँचा; पास जाकर भगवान् को अभिवादन करके एक ओर खड़ा हो गया। एक ओर खड़े हुए मागध देवपुत्र ने भगवान को गाथा के द्वारा कहा– “कति लोकस्मिं पज्जोता, येहि लोको पकासति। भवन्तं पुट्ठुमागम्म, कथं जानेमु तं मय”न्ति॥ "लोक में कितने प्रद्योत (प्रकाश) हैं, जिनसे लोक प्रकाशित होता है? हम आपसे पूछने आए हैं, हम इसे किस प्रकार समझें? “चत्तारो लोके पज्जोता, पञ्चमेत्थ न विज्जति। दिवा तपति आदिच्चो, रत्तिमाभाति चन्दिमा॥ "इस लोक में चार प्रद्योत है, पांचवां विद्यमान नहीं है। दिन में सूर्य तपता है। रात में चंद्रमा चमकता है। “अथ अग्गि दिवारत्तिं, तत्थ तत्थ पकासति। सम्बुद्धो तपतं सेट्ठो, एसा आभा अनुत्तरा”ति॥ "और आग दिन-रात वहाँ वहाँ प्रकाश करती है। सम्बुद्ध तपने वालों में श्रेष्ठ हैं, यह सर्वोत्तम आभा है।" 🌸 संयुत्तनिकाय १.२.१.४, सुत्तपिटक
“धम्मेन रज्जं कारेत्वा, अस्मिं पथविमण्डले। महद्धने महाभोगे, अड्ढे अजायिहं कुले॥ "इस पृथ्वी-मण्डल पर धर्मानुकूल राज्य कर, मैंने महा धनवान्, महा-भोगवान, समृद्ध कुल में जन्म ग्रहण किया। “सब्बकामेहि सम्पन्ने , रतनेहि च सत्तहि। बुद्धा सङ्गाहका लोके, तेहि एतं सुदेसितं॥ "जहाँ सभी कामनाओं की पूर्ति के साधन थे और सातों रत्न विद्यमान थे। बुद्ध लोक के संग्राहक हैं, उनके द्वारा यह भली प्रकार उपदिष्ट है। “एसो हेतु महन्तस्स, पुथब्यो येन वुच्चति। पहूतवित्तूपकरणो, राजा होति पतापवा॥ "महानता का यह हेतु है, जिससे कोई पृथ्वी का राजा कहा जाता है। (पुण्यों को करने वाला) महान साधन-सम्पन्न होता है तथा प्रतापी राजा होता है। “इद्धिमा यसवा होति , जम्बुमण्डस्स इस्सरो। को सुत्वा नप्पसीदेय्य, अपि कण्हाभिजातियो॥ "वह ऋद्धि सम्पन्न होता है, ऐश्वर्य-युक्त होता है तथा जम्बुद्वीप का ईश्वर (मालिक) होता है। इस बात को सुनकर कौन प्रसन्न नहीं होगा, भले ही कृष्णअभिजाति (नीच जाति) का हो। “तस्मा हि अत्तकामेन , महत्तमभिकङ्खता। सद्धम्मो गरुकातब्बो, सरं बुद्धानसासन”न्ति॥ "इसलिये जो अपना हित चाहता हो, जिसके मन में महत्त्वाकांक्षा हो, उसे सद्धर्म के प्रति गौरव प्रदर्शित करना चाहिये, बुद्धों के अनुशासन को स्मरण करते हुए। 🌸 अंगुत्तरनिकाय ७.६.९, सुत्तपिटक
🌺मेत्त सुत्त🌺 #anguttaranikaya “मा , भिक्खवे, पुञ्ञानं भायित्थ। सुखस्सेतं, भिक्खवे , अधिवचनं यदिदं पुञ्ञानि । अभिजानामि खो पनाहं , भिक्खवे, दीघरत्तं कतानं पुञ्ञानं दीघरत्तं इट्ठं कन्तं मनापं विपाकं पच्चनुभूतं। सत्त वस्सानि मेत्तं चित्तं भावेसिं । सत्त वस्सानि मेत्तं चित्तं भावेत्वा सत्त संवट्टविवट्टकप्पे नयिमं लोकं पुनागमासिं। संवट्टमाने सुदाहं , भिक्खवे, लोके आभस्सरूपगो होमि, विवट्टमाने लोके सुञ्ञं ब्रह्मविमानं उपपज्जामि। "भिक्षुओं, पुण्यों (को करने) से मत डरो। भिक्षुओं, यह जो पुण्य (कर्म) हैं, यह सुख का ही पर्याय है। भिक्षुओं, मैं जानता हूँ कि मैंने दीर्घ-काल तक किये गए पुण्यों का दीर्घ-काल तक इष्ट, सुन्दर, काम्य फल अनुभव किया। मैंने सात वर्ष तक मैत्री चित्त की भावना की। सात वर्ष तक मैत्री-चित्त की भावना करके सात संवर्त-विवर्त कल्पों तक मैं फिर इस लोक में वापस नहीं आया। भिक्षुओं, लोक के संवर्त (=लोक-विनाश) के समय मैं आभश्वर-रूप में (उतपन्न) हुआ, विवर्त (=लोक-विकास) के समय शून्य ब्रह्म-विमान में उत्पन्न हुआ । “तत्र सुदं, भिक्खवे, ब्रह्मा होमि महाब्रह्मा अभिभू अनभिभूतो अञ्ञदत्थुदसो वसवत्ती। छत्तिंसक्खत्तुं खो पनाहं, भिक्खवे, सक्को अहोसिं देवानमिन्दो; अनेकसतक्खत्तुं राजा अहोसिं चक्कवत्ती धम्मिको धम्मराजा चातुरन्तो विजितावी जनपदत्थावरियप्पत्तो सत्तरतनसमन्नागतो। तस्स मय्हं, भिक्खवे, इमानि सत्त रतनानि अहेसुं, सेय्यथिदं – चक्करतनं, हत्थिरतनं, अस्सरतनं, मणिरतनं, इत्थिरतनं, गहपतिरतनं, परिणायकरतनमेव सत्तमं। परोसहस्सं खो पन मे, भिक्खवे, पुत्ता अहेसुं सूरा वीरङ्गरूपा परसेनप्पमद्दना। सो इमं पथविं सागरपरियन्तं अदण्डेन असत्थेन धम्मेन अभिविजिय अज्झावसि”न्ति । "भिक्षुओं, वहाँ मैं ब्रह्मा हुआ, महाब्रह्मा, अभिभू, अनभिभूत, सर्व-दर्शी, वश-वर्ती। भिक्षुओं, छत्तीस बार मैं शक्र, देवों का इंद्र (देवेंद्र) हुआ, अनेक सौ बार राजा हुआ - चक्रवर्ती, धार्मिक, धर्मराजा, चतुर्दिशा-विजयी, जनपद की स्थिरता-प्राप्त तथा सात रत्नों से युक्त। भिक्षुओं, मेरे पास ये सात रत्न थे - चक्ररत्न, हस्ति-रत्न, अश्व-रत्न, मणि-रत्न, स्त्री-रत्न, गृहपति-रत्न तथा सातवाँ नायक-रत्न। भिक्षुओं, मेरे सहस्राधिक पुत्र थे - शूर, वीरङ्ग (वीर्य से युक्त), शत्रु-सेना का मर्दन करने वाले। मैंने सागर तक इस सारी पृथ्वी को बिना दण्ड के, बिना शस्त्र के, धर्म से जीत कर शासन किया। “पस्स पुञ्ञानं विपाकं, कुसलानं सुखेसिनो । मेत्तं चित्तं विभावेत्वा, सत्त वस्सानि भिक्खवो । सत्तसंवट्टविवट्टकप्पे , नयिमं लोकं पुनागमिं ॥ "सुख को खोजने वाले लोग, कुशल, पुण्यों के विपाक को देखें। भिक्षुओं, सात वर्ष तक मैत्री-चित्त की भावना करके सात संवर्त-विवर्त कल्पों तक फिर इस लोक में आगमन नहीं हुआ। “संवट्टमाने लोकम्हि, होमि आभस्सरूपगो। विवट्टमाने लोकस्मिं, सुञ्ञब्रह्मूपगो अहुं॥ "लोक का संवर्त (विनाश) होने के समय मैं आभश्वर रूप में उतपन्न हुआ, लोक का विवर्त (विकास) होने के समय शून्य ब्रह्म विमान में उत्पन्न हुआ। “सत्तक्खत्तुं महाब्रह्मा, वसवत्ती तदा अहुं। छत्तिंसक्खत्तुं देविन्दो, देवरज्जमकारयिं॥ "मैं उस समय सात बार वशवर्ती महाब्रह्मा हुआ। छत्तीस बार देवेन्द्र शक्र होकर देवताओं पर राज्य किया। “चक्कवत्ती अहुं राजा, जम्बुमण्डस्स इस्सरो। मुद्धावसित्तो खत्तियो, मनुस्साधिपती अहुं॥ "मैं जम्बुद्वीप का ईश्वर चक्रवर्ती राजा हुआ। मैं मुद्धावसित्त (राज-तिलक किया हुआ नरेश) क्षत्रिय, मनुष्यों का अधिपति था। “अदण्डेन असत्थेन, विजेय्य पथविं इमं। असाहसेन कम्मेन , समेन अनुसासि तं॥ "मैंने बिना दण्ड के, बिना शस्त्र के, इस पृथ्वी को जीत लिया और फिर उस पर बिना किसी हिंसक कर्म (=साहसिक कर्म) किये बिना पक्षपात किये राज्य किया।
🌺मल सुत्त🌺 #anguttaranikaya "अट्ठिमानि , भिक्खवे, मलानि। कतमानि अट्ठ? असज्झायमला, भिक्खवे, मन्ता; अनुट्ठानमला, भिक्खवे, घरा; मलं, भिक्खवे, वण्णस्स कोसज्जं; पमादो, भिक्खवे, रक्खतो मलं; मलं, भिक्खवे, इत्थिया दुच्चरितं; मच्छेरं, भिक्खवे, ददतो मलं; मला, भिक्खवे, पापका अकुसला धम्मा अस्मिं लोके परम्हि च; ततो , भिक्खवे, मला मलतरं अविज्जा परमं मलं। इमानि खो, भिक्खवे, अट्ठ मलानी”ति। "भिक्षुओं, यह आठ मैल (मल) हैं। कौनसे आठ ? भिक्षुओ, पाठ न करना मन्त्रों का मल है, भिक्षुओं आलस्य (अनुट्ठान= अक्रियाशीलता) घर (गृहस्थ-जीवन) का मल है। भिक्षुओं, तन्द्रा (शरीर के) वर्ण का मल है; भिक्षुओं, प्रमाद (किसी भी वस्तु के) रक्षक का मल है; भिक्षुओं, दुश्चरित्रता स्त्री का मल है; भिक्षुओं, कंजूसी दाता (देने वाले) का मल है; भिक्षुओं, पापी अकुशल धर्म इस लोक तथा परलोक में मल हैं, भिक्षुओं, इन मलों से बढ़कर मल, अविद्या परम मल है। भिक्षुओं, यह आठ मल हैं।" “असज्झायमला मन्ता, अनुट्ठानमला घरा। मलं वण्णस्स कोसज्जं, पमादो रक्खतो मलं॥ "पाठ न करना मंत्रों का मल है, आलस्य घर का मल है। (शरीर-)वर्ण का मल तन्द्रा है, प्रमाद रक्षा करने वाले का मल है। “मलित्थिया दुच्चरितं, मच्छेरं ददतो मलं। मला वे पापका धम्मा, अस्मिं लोके परम्हि च। ततो मला मलतरं, अविज्जा परमं मल”न्ति॥ "स्त्री का मल दुश्चरित्र है, कंजूसी देने वाले का मल है। पापी अकुशल धर्म, इस लोक तथा परलोक में मल हैं। इन मलों से बढ़कर मल, अविद्या परम मल है।" 🌸 अंगुत्तरनिकाय ८.२.५, सुत्तपिटक
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Man Who Changed Whole Buddhist World | Father Of Mahamevnawa Monasterie... https://youtube.com/watch?v=MvcQgCgPGC4&si=baC7zbntGAAGVCjJ
🌺कटुविय सुत्त🌺 #anguttaranikaya एकं समयं भगवा बाराणसियं विहरति इसिपतने मिगदाये। अथ खो भगवा पुब्बण्हसमयं निवासेत्वा पत्तचीवरमादाय बाराणसिं पिण्डाय पाविसि। अद्दसा खो भगवा गोयोगपिलक्खस्मिं पिण्डाय चरमानो अञ्ञतरं भिक्खुं रित्तस्सादं बाहिरस्सादं मुट्ठस्सतिं असम्पजानं असमाहितं विब्भन्तचित्तं पाकतिन्द्रियं। दिस्वा तं भिक्खुं एतदवोच – एक समय भगवान् वाराणसी के ऋषिपतन मृगदाय में विहार करते थे। तब भगवान् पूर्वान्ह समय (चीवर) पहन कर तथा पात्र-चीवर लेकर वाराणसी में भिक्षाटन के लिये निकले। गो-योग-पिलक्ष स्थान पर भिक्षाटन करते समय भगवान् ने एक भिक्षु को देखा, जो (ध्यान) सुख से खाली था, जो बाहर (कामगुणों के) सुख (में लगा हुआ था), जो मूढ़-स्मृति था, जो अज्ञानी था, जो असमाहित था, जो भ्रान्त-चित्त था, जो असंयत-इन्द्रिय था। उस भिक्षु को देखकर भगवान् ने यह कहा – “मा खो त्वं, भिक्खु, अत्तानं कटुवियमकासि। तं वत भिक्खु कटुवियकतं अत्तानं आमगन्धेन अवस्सुतं मक्खिका नानुपतिस्सन्ति नान्वास्सविस्सन्तीति , नेतं ठानं विज्जती”ति। अथ खो सो भिक्खु भगवता इमिना ओवादेन ओवदितो संवेगमापादि। अथ खो भगवा बाराणसियं पिण्डाय चरित्वा पच्छाभत्तं पिण्डपातपटिक्कन्तो भिक्खू आमन्तेसि – "भिक्षु, तू अपने आपको जूठा-सड़ा हुआ न बना। भिक्षु, यह असम्भव है कि तू अपने आपको जूठा-सड़ा हुआ बनाये, उसमें से दुर्गन्ध निकले और उस पर मक्खियाँ न बैठें, न मण्डरायें।" भगवान् द्वारा इस उपदेश से उपदिष्ट होकर उस भिक्षु के मन में संवेग पैदा हुआ। तब भगवान ने वाराणसी में भिक्षाटन कर, भोजन के अनन्तर, भिक्षाटन से लौट चुकने पर, भिक्षुओं को आमंत्रित किया- “इधाहं, भिक्खवे, पुब्बण्हसमयं निवासेत्वा पत्तचीवरमादाय बाराणसिं पिण्डाय पाविसिं। अद्दसं खो अहं, भिक्खवे, गोयोगपिलक्खस्मिं पिण्डाय चरमानो अञ्ञतरं भिक्खुं रित्तस्सादं बाहिरस्सादं मुट्ठस्सतिं असम्पजानं असमाहितं विब्भन्तचित्तं पाकतिन्द्रियं। दिस्वा तं भिक्खुं एतदवोचं – "भिक्षुओं, मैंने पूर्वान्ह समय (चीवर) पहन कर तथा पात्र-चीवर लेकर वाराणसी में भिक्षाटन के लिये प्रवेश किया। भिक्षुओं, गो-योग-पिलक्ष स्थान पर भिक्षाटन करते समय मैंने एक भिक्षु को देखा, जो (ध्यान) सुख से खाली था, जो बाहर (कामगुणों के) सुख (में लगा हुआ था), जो मूढ़-स्मृति था, जो अज्ञानी था, जो असमाहित था, जो भ्रान्त-चित्त था, जो असंयत-इन्द्रिय था। उस भिक्षु को देखकर मैंने यह कहा – “‘मा खो त्वं, भिक्खु, अत्तानं कटुवियमकासि। तं वत भिक्खु कटुवियकतं अत्तानं आमगन्धेन अवस्सुतं मक्खिका नानुपतिस्सन्ति नान्वास्सविस्सन्तीति, नेतं ठानं विज्जती’ति। अथ खो, भिक्खवे, सो भिक्खु मया इमिना ओवादेन ओवदितो संवेगमापादी”ति। एवं वुत्ते अञ्ञतरो भिक्खु भगवन्तं एतदवोच – “किं नु खो, भन्ते, कटुवियं? को आमगन्धो? का मक्खिका”ति? "भिक्षु, तू अपने आपको जूठा-सड़ा हुआ न बना। भिक्षु, यह असम्भव है कि तू अपने आपको जूठा-सड़ा हुआ बनाये, उसमें से दुर्गन्ध निकले और उस पर मक्खियाँ न बैठें, न मण्डरायें।" मेरे द्वारा इस उपदेश से उपदिष्ट होकर उस भिक्षु के मन में संवेग पैदा हुआ। ऐसा कहने पर एक भिक्षु ने भगवान से यह कहा – "भन्ते, जूठन किसे कहते हैं ? दुर्गंध किसे कहते हैं ? मक्खियाँ किसे कहते हैं ?" “अभिज्झा खो, भिक्खु, कटुवियं; ब्यापादो आमगन्धो; पापका अकुसला वितक्का मक्खिका। तं वत, भिक्खु, कटुवियकतं अत्तानं आमगन्धेन अवस्सुतं मक्खिका नानुपतिस्सन्ति नान्वास्सविस्सन्तीति, नेतं ठानं विज्जती”ति। "भिक्षु, अत्यंत लोभ (अभिज्झा) जूठन है, व्यापाद दुर्गंध है, पापी अकुशल-वितर्क मक्खियाँ हैं। भिक्षु, यह असम्भव है कि तू अपने आपको जूठा-सड़ा हुआ बनाये, उसमें से दुर्गन्ध निकले और उस पर मक्खियाँ न बैठें, न मण्डरायें।" “अगुत्तं चक्खुसोतस्मिं, इन्द्रियेसु असंवुतं। मक्खिकानुपतिस्सन्ति , सङ्कप्पा रागनिस्सिता॥ "जब चक्षु तथा श्रोत अरक्षित होते हैं, इन्द्रियां असंयत रहती हैं, तब सराग संकल्प रूपी मक्खियाँ मण्डराती हैं। “कटुवियकतो भिक्खु, आमगन्धे अवस्सुतो। आरका होति निब्बाना, विघातस्सेव भागवा॥ "जब भिक्षु जूठा हो जाता है, जब दुर्गंध पैदा होती है तो वह निर्वाण से दूर हो जाता है और विनाश का ही हिस्सेदार होता है। “गामे वा यदि वारञ्ञे, अलद्धा समथमत्तनो । परेति बालो दुम्मेधो, मक्खिकाहि पुरक्खतो॥ "जो मूर्ख होता है, जो दुर्बुद्धि होता है, भीतर शांति (समथ) को बिना प्राप्त किये, मक्खियों से घिरा हुआ, गाँव या अरण्य में विचरता रहता है। “ये च सीलेन सम्पन्ना, पञ्ञायूपसमेरता। उपसन्ता सुखं सेन्ति, नासयित्वान मक्खिका”ति॥ "जो सदाचारी हैं, जो प्रज्ञा-उपशम में रत हैं, वे मक्खियों का नाश कर शान्त हो सुखपूर्वक सोते हैं।" 🌸 अंगुत्तरनिकाय ३.१३.६, सुत्तपिटक
🌺सेक्ख सुत्त🌺 #anguttaranikaya अथ खो अञ्ञतरो भिक्खु येन भगवा तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा भगवन्तं अभिवादेत्वा एकमन्तं निसीदि। एकमन्तं निसिन्नो खो सो भिक्खु भगवन्तं एतदवोच – उस समय एक भिक्षु जहाँ भगवान थे वहाँ गया; जाकर भगवान को अभिदावन करके एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए उस भिक्षु ने भगवान से यह कहा – “‘सेखो, सेखो’ति, भन्ते, वुच्चति। कित्तावता नु खो, भन्ते, सेखो होती”ति? “सिक्खतीति खो, भिक्खु, तस्मा सेखोति वुच्चति। किञ्च सिक्खति? अधिसीलम्पि सिक्खति, अधिचित्तम्पि सिक्खति, अधिपञ्ञम्पि सिक्खति। सिक्खतीति खो, भिक्खु, तस्मा सेखोति वुच्चती”ति। "भन्ते, 'शैक्ष, शैक्ष' कहते हैं। भन्ते, क्या होने से 'शैक्ष' होता है ?" "भिक्षु, सीखता है, इसलिये 'शैक्ष' कहा जाता है। क्या सीखता है ? अधिशील (शिक्षा में) सीखता है, अधिचित्त (शिक्षा में) सीखता है, अधिप्रज्ञा (शिक्षा में) सीखता है। भिक्षु, सीखता है, इसलिए शैक्ष कहा जाता है।" “सेखस्स सिक्खमानस्स, उजुमग्गानुसारिनो। खयस्मिं पठमं ञाणं, ततो अञ्ञा अनन्तरा॥ "जो शैक्ष है, शिक्षार्थी (सीखने वाला) है, जो ऋजु (सीधे) मार्ग पर चलने वाला है, असे पहले क्षय का ज्ञान होता है, उसके बाद अञ्ञा (अर्हत्व फल की उत्पत्ति) होती है। “ततो अञ्ञाविमुत्तस्स , ञाणं वे होति तादिनो। अकुप्पा मे विमुत्तीति, भवसंयोजनक्खये”ति॥ "तब उस स्थिर-चित्त, अञ्ञा-विमुक्त (अर्हत्व-फल विमुक्ति से विमुक्त) को भव संयोजनों के क्षय से ज्ञान होता है कि, 'मेरी विमुक्ति अचल है'।" 🌸 अंगुत्तरनिकाय ३.९.५, सुत्तपिटक
🌺गद्रभ सुत्त🌺 #anguttaranikaya “सेय्यथापि, भिक्खवे, गद्रभो गोगणं पिट्ठितो पिट्ठितो अनुबन्धो होति – ‘अहम्पि दम्मो, अहम्पि दम्मो’ति । तस्स न तादिसो वण्णो होति सेय्यथापि गुन्नं, न तादिसो सरो होति सेय्यथापि गुन्नं, न तादिसं पदं होति सेय्यथापि गुन्नं। सो गोगणंयेव पिट्ठितो पिट्ठितो अनुबन्धो होति – ‘अहम्पि दम्मो, अहम्पि दम्मो’”ति। "जैसे भिक्षुओं, कोई गधा गायों के समूह के पीछे पीछे हो ले (और कहे) – 'मैं भी गाय हूँ, मैं भी गाय हूँ'। उसका न वैसा रंग होता है जैसा गायों का, न वैसी आवाज होती है जैसी गायों की, न वैसे पाँव होते हैं जैसे गायों के। वह गायों के समूह के पीछे पीछे लगा रहता है- 'मैं भी गाय हूँ, मैं भी गाय हूँ'।" “एवमेवं खो, भिक्खवे, इधेकच्चो भिक्खु भिक्खुसङ्घं पिट्ठितो पिट्ठितो अनुबन्धो होति – ‘अहम्पि भिक्खु, अहम्पि भिक्खू’ति। तस्स न तादिसो छन्दो होति अधिसीलसिक्खासमादाने सेय्यथापि अञ्ञेसं भिक्खूनं, न तादिसो छन्दो होति अधिचित्तसिक्खासमादाने सेय्यथापि अञ्ञेसं भिक्खूनं, न तादिसो छन्दो होति अधिपञ्ञासिक्खासमादाने सेय्यथापि अञ्ञेसं भिक्खूनं। सो भिक्खुसङ्घंयेव पिट्ठितो पिट्ठितो अनुबन्धो होति – ‘अहम्पि भिक्खु, अहम्पि भिक्खू’”ति। "इसी प्रकार, भिक्षुओं, यहाँ कोई भिक्षु भिक्षु-संघ के पीछे पीछे चलता है - 'मैं भी भिक्षु हूँ, मैं भी भिक्षु हूँ'। उसका न श्रेष्ठतर-शील (अधिशील) शिक्षा के पालन के लिये वैसा छन्द (तीव्र इच्छा) होता है, जैसा अन्य भिक्षुओं का, न श्रेष्ठतर-चित्त (अधिचित्त) शिक्षा के लिये वैसा छन्द होता है जैसा अन्य भिक्षुओं का, न श्रेष्ठतर-प्रज्ञा (अधिप्रज्ञा) शिक्षा के लिये वैसा छन्द होता है जैसा अन्य भिक्षुओं का। वह केवल भिक्षु संघ के पीछे पीछे चलता रहता है – 'मैं भी भिक्षु हूँ, मैं भी भिक्षु हूँ'।" “तस्मातिह , भिक्खवे, एवं सिक्खितब्बं – ‘तिब्बो नो छन्दो भविस्सति अधिसीलसिक्खासमादाने, तिब्बो नो छन्दो भविस्सति अधिचित्तसिक्खासमादाने, तिब्बो नो छन्दो भविस्सति अधिपञ्ञासिक्खासमादाने’ति। एवञ्हि वो, भिक्खवे, सिक्खितब्ब”न्ति। "इसलिये, भिक्षुओं, इस प्रकार सीखना चाहिये – 'श्रेष्ठतर-शील-शिक्षा के पालन के लिये हमारा तीव्र छन्द होगा, श्रेष्ठतर-चित्त-शिक्षा के पालन के लिये हमारा तीव्र छन्द होगा, श्रेष्ठतर-प्रज्ञा-शिक्षा के पालन के लिये हमारा तीव्र छन्द होगा'। भिक्षुओं, तुम्हें इसी प्रकार सीखना चाहिये।" 🌸 अंगुत्तरनिकाय ३.९.२, सुत्तपिटक
🌺अतित्ति सुत्त🌺 #anguttaranikaya “तिण्णं, भिक्खवे, पटिसेवनाय नत्थि तित्ति। कतमेसं तिण्णं? सोप्पस्स, भिक्खवे, पटिसेवनाय नत्थि तित्ति। सुरामेरयपानस्स, भिक्खवे, पटिसेवनाय नत्थि तित्ति। मेथुनधम्मसमापत्तिया, भिक्खवे, पटिसेवनाय नत्थि तित्ति। इमेसं, भिक्खवे, तिण्णं पटिसेवनाय नत्थि तित्ती”ति। "भिक्षुओं, इन तीन (चीजों) का उपभोग करने से तृप्ति नहीं होती। कौनसी तीन? भिक्षुओं, नींद का उपभोग करने से तृप्ति नहीं होती। सुरा-मेरय पान (distilled & fermented drinks) का उपभोग करने से तृप्ति नहीं होती। भिक्षुओं, मैथुन-धर्म समापत्ति (sexual intercourse) का उपभोग करने से तृप्ति नहीं होती। भिक्षुओं, इन तीन का उपभोग करने से तृप्ति नहीं होती।" 🌸 अंगुत्तरनिकाय ३.११.६, सुत्तपिटक