Forex Pro Guru
Статистика- Последний пост
- 11 авг.
- Последнее чтение
- 15 авг.
- Постов за неделю
- 1
- Всего постов
- 21
- Тип
- открытый
- Язык
- und
- Категория
- Экономика
- В каталоге с
- 14 авг.
- 1/24сутки в ленте
- 268
- 1/48двое суток
- 307
- 1/72трое суток
- 331
Оценка по просмотрам недавних постов: пост набирает почти всё за первые сутки.
Посты
🇷🇺 Russia approves Bitcoin, Ethereum and USDT for public trading on exchanges.
🤝 Happy Friendship Day
कल रात जापान और South Korea की सरकारों ने ऐसा कदम उठाया, जो बहुत कम देखने को मिलता है। हुआ ये कि Japan की currency yen 40 साल के सबसे कमज़ोर स्तर पर पहुँच गई। 1 डॉलर के बदले 163 yen मिल रहे थे। वहीं South Korea की currency won भी 17 साल के सबसे कमज़ोर स्तर पर पहुँच गई। 1 डॉलर के बदले 1,561 won मिल रहे थे। जब दोनों देशों की currencies लगातार गिरने लगीं, तो Japan और South Korea ने लगभग एक ही समय पर बाज़ार में डॉलर बेचना शुरू कर दिया, ताकि अपनी currencies को सहारा मिल सके। Reuters के मुताबिक, अमेरिका ने भी शायद इसमें मदद की। यानी तीनों देशों ने मिलकर बाज़ार को संभालने की कोशिश की। अब इसमें खास बात क्या है? Japan और South Korea के रिश्ते हमेशा से अच्छे नहीं रहे हैं। दोनों देशों के बीच पुराने राजनीतिक और ऐतिहासिक विवाद हैं। इसलिए इनका एक साथ मिलकर currency बचाने के लिए कदम उठाना बहुत बड़ी बात मानी जा रही है। इसका असर भी तुरंत दिखा। कुछ ही देर में yen 163 से मज़बूत होकर करीब 157 तक आ गया और won भी लगभग 2% मज़बूत हो गया। लेकिन अगले ही दिन बाज़ार ने फिर दबाव बनाया और yen दोबारा 160 के पार चला गया। अब सवाल है कि Japan की currency इतनी कमज़ोर क्यों हो रही है? Japan अपनी ज़रूरत की लगभग 87% energy बाहर से खरीदता है। उसमें भी सबसे बड़ा हिस्सा तेल का है। Iran-US युद्ध के दौरान जब कच्चे तेल की कीमत 103 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच गई, तो Japan को तेल खरीदने के लिए पहले से कहीं ज़्यादा डॉलर खर्च करने पड़े। जितने ज़्यादा डॉलर बाहर गए, yen उतना ही कमज़ोर होता गया। और yen जितना कमज़ोर हुआ, बाहर से सामान खरीदना उतना ही महँगा हो गया। यानी Japan एक ऐसे चक्र में फँस गया, जिससे निकलना आसान नहीं है। South Korea की परेशानी भी कुछ ऐसी ही है। उसकी सबसे बड़ी ताकत semiconductor export है। लेकिन China ने rare earth minerals और Indium की सप्लाई पर सख़्ती कर दी। इससे Samsung और SK Hynix जैसी कंपनियों की supply chain पर दबाव बढ़ गया। Investors घबरा गए, won गिरने लगा और South Korea का शेयर बाज़ार भी दबाव में आ गया। कुछ दिन पहले SK Hynix ने America में 26.5 billion डॉलर का ADR issue किया था। उस पैसे का कुछ हिस्सा won में बदला गया, जिससे currency को थोड़ी राहत मिली। लेकिन जैसे ही उसका असर खत्म हुआ, won फिर दबाव में आ गया। इसलिए South Korea के केंद्रीय बैंक को बाज़ार में उतरना पड़ा। उधर Japan भी लगातार अपनी currency बचाने में अरबों डॉलर खर्च कर रहा है। इस साल April-May में उसने करीब 73 अरब डॉलर बाज़ार में झोंक दिए। फिर 11 July को 20.7 अरब डॉलर बेचे और अब 31 July को फिर बड़ा intervention करना पड़ा। Bank of Japan ने ब्याज दर नहीं बढ़ाई, क्योंकि अगर वह ऐसा करता है तो पूरी दुनिया के bond market पर असर पड़ सकता है। इसलिए उसने डॉलर बेचकर yen को संभालने की कोशिश की। लेकिन अब सवाल यही है कि बिना ब्याज दर बढ़ाए वह अपनी currency को कितने दिन तक बचा पाएगा। सबसे बड़ी बात यह है कि जब Japan और South Korea की currencies कमज़ोर होती हैं, तो China को फायदा मिलता है। क्योंकि दोनों देशों को rare earth जैसे ज़रूरी minerals के लिए China पर निर्भर रहना पड़ता है। ऊपर से उनकी अपनी currencies भी कमज़ोर हैं, इसलिए China की पकड़ और मज़बूत हो जाती है। @forexproguru
🇰🇷🇺🇸 South Korea sells US dollars in rare market intervention to strengthen the won.
🇯🇵 Japan sells US dollars and buys yen in massive currency intervention after yen falls to 40-year low.
"सस्नेहं गुरुपूर्णिमा-शुभाशयाः"🙏
16 वर्षों तक आमरण अनशन रखने वाली मणिपुर की इरोम शर्मिला के साथ क्या हुआ? इरोम शर्मीला ने मणिपुर में 16 साल लगातार यानी 2000 से 2016 तक आमरण अनशन किया. अन्न का एक दाना नहीं खाया. सरकार नाक में नली डालकर दूध और पोषक तत्व देकर उनको जिंदा रखती रही. फिर इरोम ने अपने मुद्दे पर विधानसभा चुनाव लड़ा. लेकिन उनको सिर्फ नब्बे (90) वोट मिले, वह सीट कांग्रेस ने जीत ली. इरोम ने फिर राजनीति छोड़ दी. शादी कर ली. अब उनका एक सुंदर सा परिवार है, जिसमें दो बच्चे भी हैं. अब वे खुश हैं. इरोम के अनशन के दौरान ज्यादातर समय कांग्रेस सत्ता में रही. बीजेपी भी आई. पर राष्ट्र ने इस बात को नहीं माना कि अनशन करने के कारण देश का कानून बदल दिया जाए. इसके लिए तो सरकार बनानी पड़ती है. यही तो लोकतंत्र है इसी लिए इराम ने चुनाव लड़ा. फिर उनको पता चला कि इस मुद्दे पर जनता उनके साथ नहीं है. वे एक चुनावी रैली भी नहीं कर पाईं, जिसमें 100 लोग भी आए हों पिछले 25 साल में 4 अलग अलग सरकारों के साथ काम करने के अनुभव के आधार पर मेरा आकलन है कि 100 में 99 आंदोलन इसलिए सफल नहीं हो पाते क्योंकि सरकार उसका दमन नहीं करती दमन करना भी नहीं चाहिए.
कल रविवार अमेरिका में प्रेसिडेंट ट्रम्प का बर्थडे है. ट्रम्प चाहते थे कि ईरान के साथ उनकी डील उनके जन्म दिवस पर साइन हो ताकि देश वासियों के सामने राजनैतिक संदेश जाये कि यह ट्रम्प का बर्थडे गिफ्ट है. ईरान यह संदेश बिल्कुल नहीं देना चाहता था. अंततः हल निकला कि ईरान ने अपने समयानुसार रविवार समाप्त होते ही जैसे ही घड़ी की सुई ने बारह क्रॉस किया सोमवार लगा साइन कर दिया. टाइमज़ोन का अंतर है तो यह अभी अमेरिका की रविवार की शाम है, प्रेसिडेंट के बर्थडे की पार्टी आरम्भ होने का समय. ईरान के लिहाज से वो झुके नहीं और ट्रम्प के ऐंगल से उन्हें बर्थडे गिफ्ट भी मिल गया. संक्षेप में अमेरिका ईरान डील यही है. विन विन डील. अमेरिका के ऐंगल से यह उनके इतिहास की सबसे कम खर्चे / जान माल की क्षति वाला युद्ध रहा. दुश्मन के हजारों मारे, अपने बस दस बारह ही हताहत हुवे. युद्ध का खर्च जो हुआ उससे कई गुना ज्यादा तो वह यूक्रेन को युद्ध के लिए दान देते हैं. ऊपर से वेनेजुवेला का तेल बेच ऐसे कई युद्ध वह ऐसे ही लड़ सकते थे. ईरान की सबसे बड़ी जीत यह है कि उन्होंने हार नहीं मानी. चाहे जो नुक़सान हो वह अंत तक टिके रहे. अमेरिका का युद्ध में एक ही एजेंडा था ईरान को न्यूक्लियर बम नहीं बनाने देना है. आरंभिक MOU साइन होने के पश्चात फाइनल डील आने में दो महीने का समय रहेगा जिसमें इस विषय पर विस्तार से बात होगी. ईरान के लिहाज़ से वह चाहते थे कि उनके जिस फण्ड पर अमेरिका के मित्र देशों ने कब्जा कर रखा है वह वापस किया जाये. उसका एक हिस्सा डील के आरम्भ में मिल जाएगा. ईरान चाहता है कि युद्ध में और सैंक्शन से जो नुक़सान हुआ है उसके कंपनसेशन हेतु अमेरिका पैसे दे. अमेरिका सदैव इसके लिए तैयार रहता है, साझेदारी करो आधा तुम्हारा आधा हमारा पैसे हम लगा रहे हैं - इस संदर्भ में अभी आगे बात होगी. शेष अमेरिका की स्ट्रेट ऑफ़ हॉर्मुज़ ख़ाली करने की शर्त - वह तो युद्ध से पहले ही खुला था. ईरान की शर्त कि अमेरिका पर्शियन गल्फ से सेना हटाए तो वह युद्ध से पहले ही नहीं थी. वह सब हेडलाइंस के लिए हैं. मूल बात यह है कि अमेरिका को चाहिए ईरान कभी न्यूक्लियर पॉवर न बना पाये. ईरान को चाहिए पैसे और विकास. समझौता परफ़ेक्ट है. प्रेसिडेंट ट्रम्प के पोलिटिकल ऐंगल से भी नवंबर में अमेरिकी संसद के मिड टर्म हैं. युद्ध समझौता हो जाने की खबर उनकी पार्टी के लिए पॉजिटिव माहौल बनाएगी. दो महीने में फाइनल डील बिल्कुल चुनाव प्रचार के समय आयेगी वह डबल फायदा. यह वाक़ई डील है. न तुम जीते न हम हारे. @forexproguru
Now Deal is finally done🇮🇷🇺🇸✔️
SpaceX का आईपीओ सोमवार को आ रहा है. 1.8 ट्रिलियन डॉलर वैल्यू. आलरेडी चार गुना ओवरसब्सक्राइब है. लगभग 4400 लोग जिनमे स्टाफ़ के इंजीनियर ही नहीं बल्कि कुक, वेल्डर जैसे लोग भी शामिल हैं मिलियनेयर बनने वाले हैं. चार सौ लोग तो हंड्रेड प्लस मिलियन ओनर बनने वाले हैं. इन सबके बीच एलन मस्क मानवता के इतिहास का पहला ट्रिलियन डॉलर वर्थ का व्यक्ति बनने वाला है. यह इतनी बड़ी रकम है कि वह अकेले बंगला देश प्लस पाकिस्तान जैसे कई देशों की जीडीपी से ज्यादा है. यह अकेला व्यक्ति व्यक्ति छोड़िए भारत की टाटा बिड़ला अंबानी अदानी सब कंपनियां मिला दी जायें उससे ज्यादा अमीर है. @forexproguru
🇺🇸/🇮🇷 President Trump: ‘We’re going to hit Iran very hard today’. 🚨 MARKET UPDATES: Over $1.2 trillion erased from U.S. equities as escalating Trump–Iran tensions trigger a broad risk-off selloff. 📉 ▪️ S&P 500: -1.61% ▪️ NASDAQ: -1.98% Geopolitical uncertainty is rapidly being priced into stocks, with risk assets across the board coming under pressure. 🇺🇸 Bank of America says 70% of its bear-market signals are now active, a level that has historically coincided with market stress. 📉 Gold has slipped below its 200-day moving average by the largest margin seen since 2022. 🇨🇳 China increased its gold reserves by 10 tonnes in May, the biggest monthly purchase since January 2025. 🌍 Geopolitical tensions are also intensifying as Iran announces a full closure of the Strait of Hormuz following U.S. military strikes. Markets are now facing a potent mix of economic uncertainty, weakening sentiment, and rising geopolitical risk. @forexproguru
ट्रम्प ने नेतनयाहू को कहा है , भाई रुक जा आईपीओ तक फिर दोनों भाई मिल के मारेगे , क्यों अभी मार्केट बिगाड़ रहा है, पैसा लिया है मैंने सब से,तुझे भी दूंगा😂 "गंदा है पर धंधा है ये" @forexproguru
🚨🚨 MASSIVE CRYPTO BLOODBATH 🚨🚨 📉 Bitcoin crashes to $61,400 🔻 Ethereum plunges below $1,720 💥 More than $1.76 BILLION in long positions wiped out in just 24 hours! ⚠️ Fear is spreading across the market as liquidations surge and volatility explodes. 🔥 Traders are getting wiped out while uncertainty grips the entire crypto market. 🐂 Bull trap or the ultimate buying opportunity? 🚀 📉 Strategy's Bitcoin holdings are now down a staggering $11.2 BILLION 🔻 BitMine's Ethereum holdings are down $9.38 BILLION 💥 Combined paper losses have surpassed $20.5 BILLION ⚠️ As crypto markets tumble, even the biggest institutional holders are feeling the pressure. 🔥 Billions erased. Volatility exploding. Fear rising. @forexproguru
चाइना को छोड़कर विश्व के अन्य सभी देशों में बॉन्ड यील्ड में वृद्धि दर्ज की गई है, जबकि चिना में यह घट गई है। 📉📈 वह देश, जो सबसे कम लागत पर ऋण प्राप्त कर सकता है, वह ही विश्व की आर्थिक महाशक्ति मानी जाती है, और वर्तमान में यह स्थिति चिना की है। 🌏🏆 ईरान में चल रहे संघर्ष का वास्तविक विजेता भी वही है। पिछले 15 वर्षों में चाइना ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ करने के लिए उल्लेखनीय प्रगति की है, जिसका यह एक सकारात्मक परिणाम है। ⚡🛡️ इस संघर्ष के दौरान चाइना ने लगातार स्वर्ण खरीदते हुए अपनी संपत्ति बढ़ाई है, जबकि अमेरिका ने स्वर्ण विक्रय किया है। 🥇💰 अर्थशास्त्र का एक सदियों पुराना सिद्धांत है: "जिसके पास स्वर्ण है, वही नियम बनाता है।" 📜👑 किसी भी देश का विश्लेषण करें, तो एक समान तथ्य सामने आता है कि जिसके पास सबसे बड़ा स्वर्ण भंडार रहा है, वही प्रमुख शक्ति बना रहा है। द्वितीय विश्व युद्ध तक यह स्थिति ब्रिटेन की थी, लेकिन युद्ध समाप्ति के दौरान ब्रिटेन का स्वर्ण अमेरिका स्थानांतरित हो गया। 🇬🇧➡️🇺🇸 वर्तमान में, स्विट्ज़रलैंड के माध्यम से अमेरिका का स्वर्ण चाइना की ओर स्थानांतरित होने लगा है। 🇨🇭➡️🇨🇳 @forexproguru
आपने कभी टारमैक टेक पर्ज नाम का शब्द सुना है...टारमैक टेक पर्ज है तो सरकारी शब्द पर इसका इस्तेमाल सुरक्षा और खुफिया विभाग के अधिकारी informal रूप में करते है.... इस शब्द का कब इस्तेमाल होता है वो आप इस तस्वीर में देख सकते है...इस तस्वीर में अमेरिकी अधिकारी चीनियों द्वारा उनको दिए गए गिफ्ट्स, बैज, plaques और इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसों को सीधे कूड़ेदान में फेंकते दिखाई दे रहे हैं.... वैसे है तो ये अपमानजनक तस्वीर,पर अमूमन हर देश यही करता है,बस तस्वीरें सामने नही आती... पर ठीक एयर फ़ोर्स वन में सवार होने से पहले की ये तस्वीर सामने आना अमेरिकन्स के विशाल इगो वाले माइंडसेट को भी दिखाता है...वो खुद को choosen one समझते हैं... इसलिए टारमेक टेक पर्ज को कोई सामान्य प्रक्रिया नहीं समझा जाता है,बल्कि बेहद सख्त conter इंटेलिजेंस प्रोटोकॉल का जरूरी हिस्सा समझा जाता है....स्टेट स्पांसर जासूसी और बगिंग के खतरे से बचने के लिए यही प्रोटोकॉल लागू होते हैं.... चीन जासूसी के मामले में बहुत बदनाम है,अमेरिका उसका गुरू है तो चीन में बनी कोई भी वस्तु या इलेक्ट्रॉनिक उपकरण राष्ट्रपति के विमान में होने का सवाल ही नही होता... चीन हमेशा से साधारण दिखने वाले उपहार, बैज, पेन ड्राइव, फोन चार्जर या इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स के भीतर निगरानी उपकरण, ट्रैकिंग चिप्स या डेटा-एक्सेस हार्डवेयर छिपाते आए हैं,इसलिए इस तरह की हाई लेवल की कूटनीतिक यात्राओं में 0 ट्रस्ट स्ट्रेटजी रहती है.... और हर तस्वीर के बाहर आने के अपने मायने है... अमेरिका ने ये तस्वीर सामने किया है तो कुछ तो बढ़िया डील नही हुई है... @forexproguru
видео или голосовое, без подписи
आज अमेरिकन डॉलर 96 रुपए प्रति डॉलर क्रॉस कर गया. एक साल में 13-15% की गिरावट बड़ी इकॉनमी में आसानी से नहीं देखी जाती. वैसे रुपया जब गिरता है तो एक्सपोर्ट सेगमेंट का फ़ायदा होता है. थैंक्स टू आवर ट्रीटीज एंड पॉलिसीज़ प्रोडक्ट सेगमेंट में भारतीय एक्सपोर्ट बढ़ना कब का बंद हो चुका है. हाँ it सर्विसेज में अभी भी ग्रोथ है, पर AI की वजह से इसमें भी वो ग्रोथ न रही और AI सेगमेंट में तो हमारी कोई पालिसी ही नहीं है. हमारी टेक पॉलिसीज़ इंस्टेंट सोशल मीडिया लाइक्स के लिए होती हैं. और भारत एक्सपोर्ट नहीं बल्कि इंपोर्ट प्रधान है. दुनिया में एक ही देश है जिसे भारत एक्सपोर्ट ज्यादा करता है - अमेरिका. जिसके साथ संबंध बिगाड़ने की अधिकतर राष्ट्रवादी वकालत करते मिलेंगे और अब ये संबंध पर्याप्त बिगड़ भी गए हैं तो वहाँ से भी एक्सपोर्ट डाउन है. इसके अतिरिक्त भारत मुख्यतः आयात ही करता है - रूस, चाइना, ईरान इन सब देशों से आयात ज्यादा है निर्यात लगभग न के बराबर. रुपए का अवमूल्यन होता है - बाहर इन देशों को भी पेमेंट डॉलर में ही करनी होती है तो जिस चीज का एक वर्ष पूर्व 85 रुपए दे रहे थे अब 96 दे रहे हैं. इतना ही नहीं विदेशी निवेशक जो अपने डॉलर भारत देश में निवेश करते हैं उनके ऐंगल से एक साल पहले उन्होंने सौ डॉलर भारत में लगाये, 8500 रुपए निवेशित हुवे. दस प्रतिशत व्यापार बढ़ा भी हो तो ये 9300 रुपए हुवे, अब वे पैसा वापस लें तो रुपए के अवमूल्यन से सौ डॉलर भी वापस न मिलेंगे. साथ ही न्यू टेक्नोलॉजी अर्थात् एआई में भारत दस साल पीछे है अपने एसियन पड़ोसियों से भी. तो विदेशी निवेशक अपना पैसा कोरिया जैसे टेक फ्रेंडली देशों में ले जा रहे हैं. आम जनता को जब तक अमीरों से टैक्स लेकर सब्सिडी मिलते हुवे गेहूँ / चावल / सरकारी अनुदान मिलता है वह ख़ुश रहती है, कूटनीति बताती है कि भारत अब अमेरिका को निर्यात नहीं करेगा इससे देश के अमीर एक्सपोर्टर का नुक़सान होगा पर ग़रीब का फ़ायदा. लेकिन हाँ एक समय के बाद यह उसे भी प्रभावित करने ही लगता है. यह समय देश की आर्थिक / विदेश नीति का सबसे क्रिटिकल समय है. पिछले कुछ वर्षों में चेस्ट थंपिंग के नाम पर जो ग़लतियाँ की गईं उन्हें सुधारने का समय है, लंबी प्लानिंग के साथ. जहाँ सर्जरी की आवश्यकता है वहाँ लंबे समय तक बैंड ऐड लगा कर काम नहीं चलाया जा सकता. @forexproguru
видео или голосовое, без подписи
दुनिया अभी भी Iran war को missiles, drones और retaliation के angle से देख रही है। लेकिन quietly Gulf में एक दूसरा खेल चल रहा है। शुक्रवार को UAE ने घोषणा की कि वह 2027 तक अपनी Hormuz-bypass pipeline capacity को बढ़ाकर 30 लाख barrel प्रतिदिन तक ले जाएगा। उसी दिन PM Modi Abu Dhabi पहुँचे। F-16 escort मिला। Petroleum, LPG और defence agreements sign हुए। साथ में UAE ने भारत में 5 billion dollar investment की भी घोषणा कर दी। और इसी दौरान Beijing में Trump और Xi rose seeds exchange कर रहे थे। मुझे लगता है कि इस पूरे crisis में UAE शायद सबसे practical तरीके से move कर रहा है। क्योंकि UAE ने सिर्फ बयान नहीं दिए…उसने infrastructure बनाया। उसकी ADCOP pipeline पहले से Habshan से Fujairah तक oil ले जाती है। अब उसी network को expand करके वह अपनी export capacity लगभग दोगुनी करने जा रहा है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि Fujairah Strait of Hormuz के बाहर स्थित है। मतलब UAE का oil Persian Gulf और Hormuz chokepoint में घुसे बिना सीधे Arabian Sea तक पहुँच सकता है। यानी अगर future में Hormuz पर pressure बढ़ता भी है, तब भी UAE के पास alternate export route रहेगा। यहीं असली geopolitical calculation दिखाई देती है। Saudi Arabia के पास भी East-West Petroline है, लेकिन उसका Yanbu route Bab el-Mandeb के risk से जुड़ा हुआ है, जहाँ Houthi threat लगातार बना हुआ है। UAE शायद इस पूरे संकट से यह समझ चुका है कि future Gulf wars सिर्फ oil fields पर नहीं…oil routes पर भी लड़ी जाएंगी। और India भी यह बात समझ रहा है। UAE भारत के crude imports का लगभग 11 प्रतिशत और LPG का लगभग 40 प्रतिशत supply करता है। इसलिए strategic petroleum reserve cooperation और Fujairah access जैसे agreements सिर्फ व्यापार नहीं… long-term energy security का हिस्सा हैं। दिलचस्प बात यह है कि इसी 72 घंटे के दौरान: UAE pipeline expand करता है, India energy agreements sign करता है, China Hormuz से supertanker निकालता है, और America Beijing diplomacy में व्यस्त दिखता है। यानी surface पर diplomacy चल रही थी…लेकिन अंदर energy architecture बदला जा रहा था। मुझे इस पूरे episode में सबसे महत्वपूर्ण बात यही लगी कि modern geopolitics अब सिर्फ missiles और military bases तक सीमित नहीं रही। अब असली शक्ति इस बात से भी तय होगी कि: आपका oil कितनी safely बाहर जा सकता है,आपके shipping routes कितने secure हैं,और crisis के समय कौन reliable supplier बनकर खड़ा रहता है। शायद इसी कारण UAE quietly खुद को Gulf के सबसे dependable energy hub की तरह position करने की कोशिश कर रहा है। @forexproguru
नास्ति मातृसमा छाया नास्ति मातृसमा गतिः। नास्ति मातृसमं त्राणं नास्ति मातृसमा प्रपा॥🙏