|| क्षात्र धर्म || 🚩
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उत्तमैरुत्तमैर्नित्यं संबन्धानाचरेत्सह। निनीषुः कुलमुत्कर्षमधमानधमांस्त्यजेत् ।। अपने कुल को उन्नति की ओर ले जाने की इच्छा वाला व्यक्ति हमेशा उत्तमोत्तम लोगों के साथ ही सम्बन्ध रखे तथा अधमाधम लोगों के साथ (सम्बन्धों का) परित्याग कर देवे । ~ मनुस्मृति ४.२४४
आमतौरपर बलाबलका परीक्षणकर बलवान् होकर या बलवान् का आश्रय लेकर ही युद्ध करना श्रेष्ठ है । अन्यथा सन्धिका प्रयत्न करना ही उत्तम है। सम्मानपूर्वक सन्धि न हो सकनेपर और निष्क्रियतामें पापकी सम्भावना होनेपर, निर्बल होने और बलवान्का आश्रय न मिलनेपर भी युद्धमें कूदना आवश्यक है। जहाँ माता, पिता, गुरुजनोंका वध हो रहा हो, गोवध या मन्दिरोंका विध्वंस हो रहा हो, वहाँ निष्क्रिय होकर देखते रहना निश्चय ही पाप है । ऐसी स्थितिमें युद्ध ही श्रेष्ठ है। पूर्ण निश्चयके साथ युद्धमें कूदनेवाले थोड़े से वीर बड़े से बड़े शत्रुदलको पराजित कर सकते हैं। यदि विजय न मिल सकी तो वे कर्त्तव्यपालनपरायण वीर युद्धोपासनाके फलस्वरूप ब्रह्मलोक जैसी दिव्यगति पाते हैं।
सनातनसंस्कृतिकी दृष्टिसे युद्धमें यथावसर संलग्न होना क्षत्रियका धर्म है । राष्ट्र, प्रान्त, ग्राम, धर्म, संस्कृति, बपौती मलकियतकी रक्षाके लिए युद्धमें कूदना धर्म है। युद्धमें जय या पराजय सुनिश्चित है। अत एव भगवान् ने अर्जुनको कहा कि सुख दुःख, हानि लाभ, जय पराजयकी चिन्ता किये बिना समत्वबुद्धिपूर्वक केवल कर्त्तव्यपालनकी दृष्टिसे युद्ध करो । कदाचित् मारे जाओगे तो स्वर्ग पाओगे, जीतोगे तो राज्य प्राप्त कर उसका भोग करोगे -
गरल-असन दिगबसन ब्यसनभंजन जनरंजन । कुंद-इंदु-कर्पूर-गौर सच्चिदानंदघन ॥ बिकटबेष, उर सेष, सीस सुरसरित सहज सुचि। सिव अकाम अभिरामधाम नित रामनाम रुचि ॥ कंदर्पदर्प दुर्गम दमन उमारमन गुनभवन हर। त्रिपुरारि ! त्रिलोचन ! त्रिगुनपर ! त्रिपुरमथन ! जय त्रिदसबर ।। ~ गोस्वामी तुलसीदास जी (कवितावली, उत्तरकाण्ड)
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बर्मा, श्रीलंका, बांग्लादेश, पाकिस्तान, भूटान, तिब्बत का हिस्सा, मानसरोवर तक हम घुसेंगे चीन में, मानसरोवर हमारा है हिंदुओं का है। — श्री ऋग्वेदीय पूर्वाम्नाय गोवर्धनमठ पुरीपीठ के वर्तमान 145 वें श्रीमज्जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी श्रीनिश्चलानन्दसरस्वतीजी महाराज ।
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Someone I know personally: Mere bhaiya k relation m h y...help chiye inko..dekhlo apne end se contribute kr sko to Genuine hai 🙏🙏 yadi kar sakte hai aap contribute to avashya kare
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