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लोकशङ्करम्

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वेदोऽखिलो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम्। आचारश्चैव साधूनामात्मनस्तुष्टिरेव च॥

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  • ये सभी कथाएँ भक्ति के महिमावर्णन में ही तात्पर्य रखती हैं। शास्त्रविरुद्ध कृत्य के समर्थन में उनका तात्पर्य नहीं है, अतएव महान् भक्तों ने स्पष्ट कहा है कि श्रुति, स्मृति, पुराण तथा पाञ्चरात्र विधान के विरुद्ध हरि भक्ति उत्पात का ही मूल है। "श्रुतिस्मृतिपुराणादिपाञ्चरात्रविधिम् विना। ऐकान्तिकी हरेर्भक्तिरुत्पातायैव केवलम् ।।" अब दूसरा प्रश्न की वे ब्राह्मणी थी या शुद्रा??? उत्तर:— रामकियेन के अनुसार वह एक अप्सरा थी। ईश्वर की सेवा में असावधानी के कारण उसे शाप हुआ था कि वह एक जलते हुए जंगल के पास तब तक निवास करे जब तक राम स्वयं आकर उसे बुझा न दें। वरी के निवेदन पर राम ने आग बुझा दी जिससे वह फिर अप्सरा के रूप में स्वर्ग चली गयी। वाल्मीकि रामायण के अनुसार शबरी एक धर्मचारिणी ब्राह्मणी श्रमणी थी। रामरसिकावली के अनुसार शबरी एक मुनिपत्नी थी। किसी समय मुनि वन से साधना करके लौटे तो उसने उनका चरण धोया अब प्रमाण आर्ष वालमीकी रामायण से तो उसका शबरी नाम कहा गया है। वह शबर जाति की नहीं थी और श्रमणी अर्थात् तापसी थी- "श्रमणी शबरी नाम काकुत्स्थ चिरजीविनी " ( वा० रा० ३।७३।२६ ) श्रमणी का तिलककार ने तापसी अर्थ ही किया है। वहीं उसको 'धर्मसंस्थिता' भी कहा गया है- "श्रमणी धर्मसंस्थिताम् " ( वा० रा० ३।७४।७) उसने राम को यथाविधि अर्घ्य, पाय, आचमन आदि अर्पित किया- पाद्यमाचमनीयं व सर्वं प्रादाद्यथाविधि ।" ( वा० रा० ३।७४।७ ) श्री राम ने भी उसे तपोवने कहकर संबोधित किया था - ( वा० रा० ३।७४।८ ) उसके तप एवं नियमों के सम्बन्ध में कुशल प्रश्न किया था। वहाँ उसको "सिद्धा सिद्धसम्मता" भी कहा गया है। अतः उसका शबर जाति का होना और झूठे फल देना आदि प्रामाणिक न होकर प्रेमस्तुत्यर्थ ही हैं। मैंने विविध तन्य फल आपके लिए संचित किये हैं- " मया तु संचितं वन्यम्" ( वा० रा० ३।७४।१७ ) ☀️यही वस्तुस्थिति है कि न तो वह भीलनी थी और न उसने जूठे फल खिलाये थे। 🌸अतः इस प्रकार हमने दोनो बातें सप्रमाण सिद्ध की , माता शबरी ब्राह्मणी थी एवं उन्होंने प्रभु श्री राम को उच्छिष्ट फल नहीं खिलाए थे🌸 धर्म सम्राट् स्वामी करपात्री जी महाभाग द्वारा लिखित "रामायण मीमांसा"

  • क्या माता शबरी ने प्रभु श्री राम को उच्छिष्ट बेर खिलाए थे? क्या माता शबरी शुद्रा थीं? प्रथम प्रश्न क्या माता शबरी ने प्रभु श्री राम को उच्छिष्ट बेर खिलाए थे??? अब उत्तर अस्तु "अद्य मे सफलं तप्तं स्वर्गश्चैव भविष्यति । त्वयि देववरे राम पूजिते पुरुषर्षभ ॥" ( वाल्मिकी रामायण ३।७४।१२) यहाँ शबरी ने राम को देववर देवश्रेष्ठ विष्णु कहा है। राम, मैं आपके सौम्य चक्षुओं से पूत होकर आपकी कृपा से अक्षय लोकों को जाऊँगी। "तवाहं चक्षुषा सौम्य पूता सौम्येन मानदग। मिष्याम्यशयां लोकांस्त्वत्प्रसादादरिन्दम । " ( वाल्मिकी रामायण ३।७४।१३) इससे भी श्री राम की ईश्वरता स्पष्ट होती है। इतना ही नहीं किन्तु अध्यात्मरामायण, रामचरितमानस आदि की कथाओं का मूल भी स्पष्ट है। वह कहती है कि धर्मज्ञ महाभाग महर्षियों ने जिनकी में परिचर्या करती थी, मुझसे कहा था कि तुम्हारे आश्रम में राम और लक्ष्मण आयेंगे। तुम उनका सत्कार करके दिव्य लोकों को प्राप्त करोगी। सो मैंने पम्पातीर समुद्भूत विविध वन्य पदार्थ आपके लिये सचित कर रखे हैं (वा० रा० ३।७४।१६-१८ ) 👉इससे यह सूचित होता है कि अपने गुरु की आज्ञा के अनुसार राम के आतिथ्य के लिए पुष्य फल, मूल आदि का संग्रह करती कई दिनों से वह प्रतीक्षा कर रही थी और उत्तम उत्तम वृक्षों और लताओं के फलों, मूलों की परीक्षा करके उनका संग्रहण करती थी। इसी का उपबृंहण पद्मपुराण में हैं। राम ने कबन्ध से सुने हुए उस आश्रम के चमत्कारों को देखना चाहा। उसने सब दिखाया और बताया कि यहाँ मेरे गुरु महर्षि ने मन्त्रपूर्वक अपने नीड ( शरीरपक्षर) को हुत किया था। यहीं वेदी पर वे अपने कम्पयुक्त हाथों से पुष्पोपहार अर्पण करते थे। उनके तप के प्रभाव से अतुलप्रभा वेदी आज भी अपनी दिव्यश्री से दिशाओं को प्रकाशित कर रही है। उपवासश्रम से स्नान 'अभिषेक के लिए जाने में असमर्थ होने से उनके लिए चिन्तन मात्र से सप्त सागर यहाँ आकर उपस्थित हो गये थे। उनके द्वारा स्पृष्ट पुष्प अब तक भी परिम्लान नहीं हुए फिर उसने कहा कि अब मैं आपकी अनुज्ञा से शरीर त्याग कर उन महनियों के पास जाना चाहती है। राम ने कहा भद्रे, मैं तुम्हारे द्वारा अचित हुआ हूँ यथासुख जाओ। चीर-कृष्णाजिनधारिणी शबरी राम से अनुज्ञात होकर अग्नि में अपने आप को आहूत कर ज्वलत्पादकतुल्य दिव्याभरणधारिणी, दिव्यमाल्यानु लेपना तथा दिव्याम्बरधारिणी होकर उस दिव्यधाम में चली गयी जहाँ महर्षि विहरण करते हैं । ( वा० रा० ३।७४ | २८-३५ ) प्रत्युद्गम्य प्रणम्याच निवेश्य कुशविष्टरे । पादप्रक्षालनं कृत्वा तत्तोयं पापनाशनम् ॥ शिरसा धार्य पीत्वा च वन्यैः पुष्पेरथाचयत् । फलानि च सुपक्वानि मूलानि मधुराणि च ॥ स्वयमास्वाद्य माधुर्यं परीचय परिभक्ष्य च । पश्चात्रिवेदयामास राघवाभ्यां दृढव्रता ॥ फलान्यास्वाद्य काकुत्स्थस्तस्यै मुक्ति परां ददौ। (पद्मपुराण) इन श्लोकों में परीक्ष्य तथा परिभक्ष्य शब्दों के आने से यह भ्रम नहीं होना चाहिए कि शबरी से जूठे फल भगवान को खिलाये। क्योंकि धर्मचारिणी शबरी ऐसा कदापि कर नहीं सकती। स्प अर्थ यही है कि वृक्षों के फलों को चखकर मीठा पहिचानकर उन्हीं वृक्षों के फल तोड़कर लाती थी न कि जूडे कर रखती थी। शबरी के माहात्म्य वर्णन में ही उक्त कथा का तात्पर्य है। कई लोगों ने लिखा है कि वे जूठे ही फल थे, जिन्हें शबरी ने राम को दिया था। वस्तुतः उसका अभिप्राय यही है कि वह खट्टे मीठे का परीक्षण करके उसी वृक्ष के या उसी ढंग के फलों का संग्रह करती है। बलरामदास के वृत्तान्त के अनुसार वह अपने पति के साथ राम से मिलती है। उसके अनुसार राम उन फलों को नहीं खाते जिनमें दाँतों के निशान नहीं है। परन्तु इसका भी तात्पर्य शबरी की भक्ति की प्रशंसा में ही है। नोच्छिष्टं कस्यचिद्दद्यान्नाद्याच्चैव तथान्तरा । न चैवात्यशनं कुर्यान्न चोच्छिष्टः क्वचिद् व्रजेत् ॥ (मनुस्मृति २।५६ ) नोच्छिष्टं कस्यचिद्दद्यान्नाद्याच्चैतत्तथान्तरा। (भविष्यपुराण, ब्राह्म० ३ | ३९) उच्छिष्टमगुरोरभोज्यं स्वमुच्छिष्टोपहतं च ॥ ( वसिष्ठस्मृति १४ । १७) उक्त सभी प्रमाणों के अनुसार किसी सामान्य व्यक्ति के लिए भी उच्छिष्ट देना निषिद्ध है तो फिर ब्राह्मण, देवता, राजा या ईश्वर के लिए तो उच्छिष्ट अन्न या फल का प्रदान करना परम निषिद्ध ही है। 🌺अतः प्रमाणविरुद्ध आख्यायिका गुणवाद होकर भक्ति की प्रशंसा मात्र में ही पर्यवसित होती है कमाल की प्रियादासकृत टीका में कहा गया है।🌺 रघुराजसिंह की रसिका बसी में भी उल्लेख है कि मुनियों के निवेदन पर:— शबरी सकुचि सलिल पग डारी तुरतहि भो निर्मल सरबारी ॥

  • ☀️ समस्त सनातनवैदिकधर्म्मावलम्बियों को सहर्ष सूचित किया जाता है कि – अनन्तश्रीसमलङ्कृत अभिनवशङ्कर यतिचक्रचूडामणि राजराजेश्वर विश्ववन्द्य सर्वभूतहृदय श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्य श्रोत्रिय-ब्रह्मनिष्ठ वेदभाष्यकार धर्मसम्राट् स्वामी श्रीहरिहरानन्दसरस्वतीजी 'श्रीकरपात्रीजी' महाभाग का ११९वाँ प्राकट्यमहोत्सव आगामी श्रावणशुक्ल द्वितीया - शुक्रवार, तदनुसार - १४ अगस्त २०२६ को मनाया जाएगा। धर्मब्रह्मशरीराय करपात्रमहात्मने। वेदोद्धारप्रवृत्ताय नित्याय गुरवे नम:॥ 🪷🙏🏻

  • 10 авг.101111из girirajkitalahati

    🌙✨ वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शङ्कररूपिणम् । यमाश्रितो हि वक्रोऽपि चन्द्रः सर्वत्र वन्द्यते ॥ ज्ञानमय, नित्य, शङ्कररूपी गुरुकी मैं वन्दना करता हूँ, जिनके आश्रित होने से ही टेढ़ा चन्द्रमा भी सर्वत्र वन्दित होता है। ~ श्रीरामचरितमानस (बालकाण्ड, मंगलाचरण, ३)

  • 9 авг.10961из girirajkitalahati

    Kamika Ekadashi Today 🌸

  • नारायण 🌸

  • 7 авг.179из ShrutiManjari4

    सातदिन पर्यन्त केवल उष्णोदक से स्नान , खुल्ले कुवेँ के जल से स्नान और मलमूत्रत्याग ,मैथुन के बाद मिट्टी के बिना केवल जल आदि से शौच(शुद्धि)करनेवाले विप्र शूद्रसमान प्रायश्चित्त करणांत तक समस्त वैदिककर्म में शूद्रसमान अनधिकारी हो जाते हैं।सनियम प्राजापत्यव्रत के आचरण अथवा तत्प्रत्याम्नाय प्रायश्चित्त उपरांत पञ्चगव्यप्राशन करने से ही उसकी शुद्धि होती हैं। विधवा - ब्रह्मचारी और यति(संन्यासी) को यही प्रायश्चित्त दो गुना करना चाहिये । आजकल तो गोबर व मिट्टी से बने साबुन भी मिलते हैं। कच्ची ईंटे भी मिलती हैं। जिस तरह एक व्यापारी को व्यापार करने के , चोर को चोरी करने के , ठग को ठगने के अनेक तुक्के मिल जाते हैं ठिक वैसे ही मिट्टी से शौच करने के दृढ़निश्चय वाले मनुष्य को मिट्टी का प्रयोग कैसे करना चाहिये उसके भी अपनी व्यवस्थानुसार प्रयोग करना भी स्वाभाविक आ ही जाता हैं। (ज्ञातव्यः - उष्णोदक से स्नानविधा यह हैं कि किसी पात्र में पहिले ठंडे जल को ग्रहण करे उसमें उतना गरम जल डाले कि पानी गुनगुना हो जाय , इससे अधिक गरमजल से स्नान करना आरोग्य के लिये हितावह नहीं हैं। पहिले गरमजल को लेकर उसमें ठंडा जल नहीं डालना चाहिये क्योंकि ऐसे उष्णोदकस्नान में व्युत्क्रमविधा का अभाव हैं। ) मिट्टी का प्रयोग कितनी बार कैसे करना हैं आदि अपने अपने गृह्यसूत्र के शौचाचार सूत्रादि के अनुसार जान लेना चाहिये । सामान्यतः गीता प्रेस गोरखपुर की नित्यकर्म प्रकाश नामक पुस्तक में जिज्ञासुओ को दैखना चाहिये ...

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  • 7 авг.116из ShrutiManjari4

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  • 6 авг.1103из girirajkitalahati

    वेदस्योपनिषत् सत्यं सत्यस्योपनिषद् दमः । दमस्योपनिषन्मोक्ष एतत् सर्वानुशासनम् ॥ वेदाध्ययनका सार है सत्यभाषण, सत्यभाषणका सार है इन्द्रियसंयम और इन्द्रियसंयमका फल है मोक्ष। यही सम्पूर्ण शास्त्रोंका उपदेश है। ~ हंस गीता महाभारत (शान्ति पर्व, २९९.१३)

  • 6 авг.875из girirajkitalahati

    अज्ञेभ्यो ग्रन्थिनः श्रेष्ठा ग्रन्थिभ्यो धारिणो वराः। धारिभ्यो ज्ञानिनः श्रेष्ठा ज्ञानिभ्यो व्यवसायिनः ।। अज्ञानियों की अपेक्षा ग्रन्थों का अध्ययन करने वाले श्रेष्ठ होते हैं। ग्रन्थों का अध्ययन करने वालों से उनके अर्थ को हृदयंगम (धारिणः) करने वाले उत्तम हैं तथा ग्रन्थ को धारण करने वालों से ज्ञानी श्रेष्ठ हैं एवं ज्ञानियों की अपेक्षा वेद के अनुसार कर्म करने वाले श्रेष्ठ होते हैं। ~ मनुस्मृति १२.१०३

  • 4 авг.1005из girirajkitalahati

    परित्यजेदर्थकामौ यौ स्यातां धर्मवर्जितौ। धर्मं चाप्सुखोदर्कं लोकविक्रुष्टमेव च ।। धर्म द्वारा वर्जित जो अर्थ और काम होवें, उन दोनों का तथा भविष्य में दुःख देने वाले धर्मकार्यों और लोकनिन्दितकार्यों का भी परित्याग करे। ~ मनुस्मृति ४.१७६

  • 2 авг.1404из girirajkitalahati

    न तन्मित्रं यस्य कोपाद् बिभेति यद् वा मित्रं शङ्कितेनोपचर्यम् । यस्मिन् मित्रे पितरीवाश्वसीत तद् वै मित्रं सङ्गतानीतराणि ॥ जिसके कोपसे भयभीत होना पड़े तथा शंकित होकर जिसकी सेवा की जाय, वह मित्र नहीं है। मित्र तो वही है, जिसपर पिताकी भाँति विश्वास किया जा सके; दूसरे तो साथीमात्र हैं ॥ He alone is a true friend who can be trusted like a father. ✨ Others are at best companions. ~ विदुर नीति श्रीमहाभारत (५.३६.३७)

  • अग्नि-वायु-रविभ्यस्तु त्रयं ब्रह्म सनातनम्। दुदोह यज्ञ सिद्ध्यर्थं ऋग्-यजुः साम लक्षणम्॥ (मनु स्मृति, १/२३) परम पद को बड़े आकार के कारण उरुक्रम भी कहा गया है। उरुक्रमस्य स हि बन्धुरित्था विष्णोः पदे परमे मध्व उत्सः॥ (ऋक्, १/१५४/५) पृथ्वी पर मनुष्य की सबसे बड़ी रचना नगर है, जिसे उरु या उर कहते हैं, जैसे बंगलूरु, मैसूरु, चित्तूर, तञ्जाउर, आदि। शिल्पशास्त्र के अनुसार विष्णु (मनुष्य रूप, सम्भवतः वामन) ने नगरों का प्रारूप तैयार किया था, इस अर्थ में उनको उरुक्रम कहा गया है। बाद में वरुण ने भी उरु प्रारूप का नगर बनाया जो इराक का सबसे प्राचीन नगर है। उरुं हि राजा वरुण श्चकार (ऋग् वेद १/२४/८) यज्ञ या सृष्टि अर्थ में विष्णु को विक्रान्त = विभाजन, उत्क्रान्त (वाहर निकलना), न्यक्रामत् (परिणत होना) आदि कहा है। लोकों का निर्माण और उनकी स्थिति भी विष्णु का विक्रम है। यज्ञो विष्णुः स देवेभ्य इमां विक्रान्तिं विचक्रमे यैषामियं विक्रान्तिरिदमेव प्रथमेन पदेन पस्पाराथेदमन्तरिक्षं द्वितीयमेन दिवमुत्तमेन। (शतपथ ब्राह्मण, १/९/३/९) इमे वै लोका विष्णोर्विक्रमणं विक्रान्तं विष्णोः क्रान्तम्। (शतपथ ब्राह्मण, ५/४/२/६) स उदक्रामत् सा गार्हपत्ये न्यक्रामत्॥२॥ यज्ञ चक्र रूप में दिन-रात भी विष्णु-क्रम है। तद्वाऽहोरात्रेऽएव विष्णुक्रमा भवन्ति। (शतपथ ब्राह्मण, ६/७/४/१०) विष्णु का विचक्रम गो रूप यज्ञ है। प्रति व्यक्ति सबसे अधिक गो वाला देश भी दक्षिण अमेरिका का उरुगुए है। विचक्रमाणस्त्रेधोरुगायः (ऋक् १/१५४/१, अथर्व ७/२६/१, वाज.सं. ५/१८, तैत्तिरीय सं. १/२/१३/३, काण्व सं. २/१०, मैत्रायणी सं. १/२९/१९/९) २. कं ब्रह्म- कः = प्रजापति, स्रष्टा रूप ब्रह्म। कस्मै देवाय हविषा विधेम (हिरण्यगर्भ सूक्त, १/१२१/१, ९, अथर्व, ४/२/१, ७, ८, वाज. यजु, १२/१०२, १३/४, २३/१, ३, २५/१०, ११, १२, १३, २७/२५, २६, आदि) सृष्टि या निर्माण में कुछ सामग्री लगती है, अतः कर्ता रूप ’क’ ब्रह्म ले लिए हवि देनी पड़ती है। वेद संहिताओं में कई स्थान पर कः, कं आया है, पर वह प्रजापति का वाचक है, या प्रश्नवाचक सर्वनाम, इसमें सन्देह है। ब्राह्मण ग्रन्थों में स्पष्ट परिभाषा है। प्रजापतिर्वै कः (ऐतरेय ब्राह्मण, २/३८, ६/२१, कौषीतकि ब्राह्मण, ५/४, २४/४, ५, ९, ताण्ड्य महाब्राह्मण, ७/८/३, शतपथ ब्राह्मण, ६/४/३/४, ७/३/१/२०, तैत्तिरीय ब्राह्मण, २/२/५/५, जैमिनीय उपनिषद्, ३/२/१०, गोपथ ब्राह्मण, उत्तर, १/२२, ६/३) कं वै प्रजापतिः। (शतपथ ब्राह्मण, २/५/२/१३) सृष्टि निर्माण के लिए ऊर्जा या प्राण भी ’क’ है। प्राणो वाव कः (जैमिनीय उपनिषद्, ४/२३/४) कं ब्रह्म द्वारा निर्माण कं है। उपभोग्य वस्तु अन्न या उससे प्राप्त सुख कं है। अन्नं वै कम् (ऐतरेय ब्राह्मण, ६/२१, गोपथ ब्राह्मण, उत्तर, ६/३) सुखं वै कम् (गोपथ ब्राह्मण, उत्तर, ६/३) अथो सुखस्य वा एतत् नामधेयं कं इति (गोपथ ब्राह्मण, उत्तर, १/२२, कौषीतकि ब्राह्मण, ५/४) कं ह वा अस्मैभवति य एवमेतत् अर्कस्य अर्कत्वं वेद (बृहदारण्यक उपनिषद्, १/२/१) देवी के लिए स्त्रीलिंग में ’कां’ प्रयुक्त है- कां सोस्मितां हिरण्य प्राकारां (श्री सूक्त, ४, ऋक् खिल भाग, अष्टक ४/४/३२ के बाद का परिशिष्ट) एक व्यक्ति ने इसका अर्थ किया है कि इस मन्त्र द्वारा कांसा से स्वर्ण (हिरण्य) बनाया जा सकता है। पर कांस्य या स्वर्ण अर्थ में यहां प्रयोग नहीं है। काम्-(१) वाणी तथा मन से जिसका ज्ञान नहीं होता। (२) अव्यक्त, अमूर्त्त ब्रह्म। (३) सुख स्वरूपा। (४) चिन्मयी लक्ष्मी, जो अन्तःकरण में आवाज करती है (कै शब्दे, धातु पाठ, १/६५३)। (५) वाणी, वाक्य रूपा (वाग्देवी)। (६) सभी वेद जिस के बारे में जिज्ञासा करते हैं-का = कौन है? (७) क = ब्रह्म के रूप वाली। कस्मै देवाय हविषा विधेम (ऋक्, १०/१२१/१)-कर्त्ता रूप देव के लिए हवि दें। जड़ चेतन गुण दोषमय विश्व कीन्ह करतार (क)-रामचरितमानस (१/६/०)। (८) कर्त्ता रूपिणी। (३) खं ब्रह्म- ख का अर्थ आकाश है। गणित ज्योतिष में शून्य अर्थ में ख, व्योम (जहां ॐ भी नही है), आकाश आदि कूट शब्दों का प्रयोग है। खग = ख में गमन करने वाला पक्षी। खं वेपसा तुविजात स्तवानः (ऋक्, ४/११/२) अंङ्घि खं वर्तया पणिम् (ऋक्, १०/१५६/३) ॐ खं ब्रह्म (ईशावास्योपनिषद्, १७, वाज. यजु, ४०/१७) खं (आकाश) मनो बुद्धिरेव च (गीता, ७/४) ॐ खं ब्रह्म, खं पुराणं, वायु रं, खं-इति (बृहदारण्यक उपनिषद्, ५/१/१) अव्यक्त ब्रह्म की प्रथम सृषी आकाश भी उसी का स्वरूप है। वास स्थान रूप में इसे वासुदेव भी कहा है। (४) रं ब्रह्म-प्राण या गति रूप ब्रह्म ’रं’ है। रं इति, प्राणो वै रं, प्राणे हि इमानि भूतानि रमन्ते (बृहदारण्यक उपनिषद्, ५/१२/१, शतपथ ब्राह्मण, १४/८/१३/३) र इति-रञ्जयति इमानि भूतानि (मैत्रायणी उपनिषद्, ६/७) रकारो अण्डं विराड् भवति (तारसार उपनिषद्, १/४) रकारं अग्नि बीजं (ध्यानबिन्दु उपनिषद्, ९५) स चित्रेण चिकिते रंसु भासा (ऋक्, २/४/५) 🙌🌹🙌

  • शंकर शंकर ३ रूपों का समन्वय है- (१) शं ब्रह्म (शान्त, लोकों की स्थिति) + (२) कं ब्रह्म (कर्ता ब्रह्म, प्रजापति) + (३) रं ब्रह्म (ऊर्जा या गति) यह खं = आकाश रूपी ब्रह्म में स्थित है, जो ब्रह्म की प्रथम सृष्टि है। १. शं ब्रह्म-शं - शान्ति, कल्याण। विश्व के ६ भागों द्वारा षड्विध ऐश्वर्य- ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसश्श्रियः। ज्ञानवैराग्ययोश्चैव षण्णां भग इतीरणा॥ (विष्णु पुराण, ६/५/७४) शं नो मित्रः शं वरुणः, शं नो भवत्यर्यमा। शं न इन्द्रो बृहस्पतिः, शं नो विष्णुरुरुक्रमः॥ (ऋक्, १/९०/९, अथर्व वेद, १९/९/६, ७, वाज. यजु, ३६/९, तैत्तिरीय आरण्यक, ७/१/१,) नः = हम लोगों का। नः + इन्द्रः = न इन्द्रः। (१) आकाश के क्षेत्र-आकाश के ३ धाम हैं-परम धाम-स्वयम्भू मण्डल = पूर्ण विश्व, मध्यम धाम = परमेष्ठी मण्डल = ब्रह्माण्ड या आकाशगंगा, अवम धाम - सौर मण्डल = सूर्य का प्रकाश क्षेत्र। या ते धामानि परमाणि यावमा या मध्यमा विश्वकर्मन्नुतेमा । (ऋक्, १०/८१/४) हर धाम में जो दृश्य पिण्ड है, वह भूमि, उसका प्रभाव क्षेत्र (साम) आकाश या द्यु, तथा बीच का क्षेत्र (अन्तरिक्ष या व्रत) है। पिण्ड निर्माण का आदि रूप आदित्य है, जो अभी अन्तरिक्ष में दीखता है। तीन धामों के आदित्य हैं-अर्यमा, वरुण, मित्र। भूमि = माता (स्त्रीलिंग), द्यु = पिता (पुल्लिंग), अन्तरिक्ष = नपुंसक लिंग। तिस्रो भूमीर्धारयन् त्रीरुत द्यून्त्रीणि व्रता विदथे अन्तरेषाम् । ऋतेनादित्या महि वो महित्वं तदर्यमन् वरुण मित्र चारु ॥ (ऋक्, २/२७/८) तिस्रो मातॄस्त्रीन्पितॄन्बिभ्रदेक ऊर्ध्वतस्थौ नेमवग्लापयन्ति । मन्त्रयन्ते दिवो अमुष्य पृष्ठे विश्वमिदं वाचमविश्वमिन्वाम् ॥ (ऋक्, १/१६४/१०) (२) सौर मण्डल-३ क्षेत्र सौर मण्डल के भीतर हैं- इन्द्र सृष्टि निर्माण के लिए ऊर्जा है- (देवस्य त्वा सवितुः प्रसवे) इन्द्रियस्य इन्द्रियेण। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, २/६/५/३) इन्द्रस्य इन्द्रियेण अभिषिंचामि (शतपथ ब्राह्मण, ५/४/२/२, ऐतरेय ब्राह्मण, ८/७) इन्धन रूप में भी इन्द्र कहा गया है-इन्धो वै नामैष सौर मण्डल ३३ धाम तक है, जिसमें इन्द्र का विस्तार है। इसे धामच्छद (धाम को ढंकने वाला, छद = छत) कहा है। ३३ अक्षर त्रिष्टुप् छन्द (११ x ४ = ४४ अक्षर) के ३ पाद हैं। मेरुदण्ड में ३३ जोड़ होते हैं, अतः सौर मण्डल मंत इन्द्र के वज्र को दधीचि की हड्डी से बना कहते हैं। इन्द्रो दधीचो अस्थभिर्वृत्राण्यप्रतिष्कुतः। जघान नवतीर्नव॥। (ऋक्, १/८४/१३) वज्रो वै त्रिष्टुप् (शतपथ ब्राह्मण, ७/४/२/२४, ऐतरेय ब्राह्मण, २/१६, २/२) संवत्सरो (१ संवत्सर में जितनी दूर सूर्य का प्रकाश जाता है-सौर क्षेत्र) वज्रः (शतपथ ब्राह्मण, ३/६/४/१९) त्रैष्टुभो वा एष य एष (सूर्यः) तपति (कौषीतकि ब्राह्मण, २५/४) अन्तो वै त्रयस्त्रिंशः परमो वै त्रयस्त्रिंश स्तोमानाम् (ताण्ड्य महाब्राह्मण, ३/३/२) तं (त्रयस्त्रिंशं स्तोमं) उ नाक इत्याहुः। (ताण्ड्य महाब्राह्मण, १०/१/१८) बृहस्पति सौर मण्डल के अन्तरिक्ष का मुख्य ग्रह है। सोम (आकाश का विरल पदार्थ) के ३ क्षेत्रों में यह मध्य में है। (१) चान्द्र मण्डल का देवसोम या राजसोम, (२) जहां तक सौर वायु जाती है वह पवमान सोम है। इसका केन्द्र बृहस्पति होने से यह बृहस्पति सोम है। (३) ब्रह्माण्ड सीमा तक ब्रह्मणस्पति सोम है। एतद्वै देवसोमं यत् चन्द्रमाः (ऐतरेय ब्राह्मण, ७/११) सोमो राजा चन्द्रमाः (शतपथ ब्राह्मण, १०/४/२/१) अयं वायुः पवमानः (शतपथ ब्राह्मण, २/५/१/५) सोमो वै पवमानः। (शतपथ ब्राह्मण, २/२/३/२२) बृहस्पतिर्ब्रह्म ब्रह्मपतिः। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, २/५/७/४) वाग् वै बृहती तस्या एष पतिस्तस्मादु बृहस्पतिः।(शतपथ ब्राह्मण, १४/४/१/२२) (यजु ३८/८) अयं वै बृहस्पतिर्योऽयं (वायुः) पवते। (शतपथ ब्राह्मण, १४/२/२/१०) ब्रह्म वै ब्रह्मणस्पतिः (कौषीतकि ब्राह्मण, ८/५, ९/५, ताण्ड्य महाब्राह्मण, १६/५/८) व्यवहार में बृहस्पति ही दीखता है, अतः उसे भी ब्रह्मणस्पति कहा गया है। (३) उरुक्रम विष्णु-विष्णु के कई विक्रम वेदों में निर्दिष्ट हैं। विष्णु का प्रत्यक्ष रूप सूर्य है, जिससे पृथ्वी पर सृष्टि चल रही है। इसके ३ विक्रम सौर मण्डल के ३ क्षेत्र हैं, जिनको अग्नि, वायु, रवि (११, २२, ३३ अहर्गण तक) कहा गया है। इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम्। समूळ्हमस्य पांसुरे॥ (ऋक्, १/२२/१७) तद् विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः। दिवीव चक्षुराततम्॥ (ऋक्, १/२२/२०) सूर्य सिद्धान्त (१२/८१, ९०) में ब्रह्माण्ड को सूर्य का परम पद कहा है जहां तक सूर्य विन्दुमात्र दीखता है, तथा ब्रह्माण्ड की सटीक माप दी गयी है।

  • 31 июл.1245из girirajkitalahati

    वेदाभ्यासस्तपोज्ञानमिन्द्रियाणां च संयमः। अहिंसा गुरुसेवा च निःश्रेयसकरं परम् ।। वेदों का अभ्यास करना, तप का आचरण, ज्ञान की प्राप्ति, इन्द्रियों को अपने वश में रखना, किसी भी प्राणी की हिंसा न करना एवं गुरु की सेवा करना, ये सभी ब्राह्मण को परमकल्याण प्रदान करने वाले कर्म हैं। ~ मनुस्मृति १२.८३

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