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निष्कर्ष भारत की विविध मृदाएँ देश की कृषि उत्पादकता की रीढ़ हैं। प्रत्येक प्रकार की मृदा की अपनी विशिष्ट विशेषताएं और उपयुक्त फसलें हैं। सतत कृषि प्रथाओं और मृदा संरक्षण के माध्यम से इन संसाधनों को संरक्षित करना भविष्य की पीढ़ियों के लिए अत्यंत आवश्यक है।
भारत की प्रमुख मृदाएँ (Soils of India) भारत एक विस्तृत भौगोलिक विविधता वाला देश है, जिसके परिणामस्वरूप यहाँ मृदाओं (Soils) की विविधता भी अत्यंत उल्लेखनीय है। जलवायु, चट्टानों की प्रकृति, ऊँचाई और वनस्पति जैसे कारकों के आधार पर भारत की मृदाओं को मुख्य रूप से छह वर्गों में वर्गीकृत किया गया है। ये मृदाएँ कृषि, वनस्पति और देश की आर्थिक गतिविधियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। 1. अलूवियल मृदा (Alluvial Soils) यह भारत की सबसे व्यापक रूप से फैली हुई मृदा है, जो लगभग 43% भूमि क्षेत्र को कवर करती है। गठन: यह नदियों द्वारा लाए गए जलोढ़ (Alluvium) से बनती है। गंगा-यमुना-सिंधु मैदान और दक्षिण भारत के तटीय मैदान इसकी प्रमुख वितरण क्षेत्र हैं। प्रकृति: यह मृदा बेहद उपजाऊ होती है और इसमें पोटाश, चूना और फॉस्फोरस की अच्छी मात्रा पाई जाती है। रंग: यह हल्के भूरे से गहरे भूरे रंग की होती है। उपयोग: यह गेहूँ, चावल, गन्ना, तिलहन और अनाज की खेती के लिए आदर्श है। वर्गीकरण: इसे दो भागों में बांटा गया है: खादर (Khadar): नई और ताजी जलोढ़ मृदा, जो हर साल नदियों द्वारा जमा होती है। भांगर (Bhangar): पुरानी जलोढ़ मृदा, जिसमें चूने के गोले (Kankar) पाए जाते हैं। 2. जलोढ़ मृदा (Black Soils / Regur Soils) इसे काली मिट्टी या रेगुर भी कहा जाता है। यह मुख्य रूप से प्रायद्वीपीय पठार में पाई जाती है। गठन: यह ज्वालामुखीय चट्टानों (Basalt) के क्षरण से बनती है। विशेषता: इसमें जल धारण क्षमता (Water Retention) बहुत अधिक होती है। सूखे पर यह दरारें पकड़ लेती है और गीले होने पर चिपचिपी हो जाती है। वितरण: महाराष्ट्र, गुजरात, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के दक्षिणी और पूर्वी भाग। रंग: गहरा काला या भूरा। उपयोग: यह कपास की खेती के लिए सबसे उपयुक्त मृदा मानी जाती है। इसके अलावा, गेहूँ, ज्वार, बाजरा और तिलहन भी इसमें उगते हैं। 3. लाल मृदा (Red Soils) गठन: यह लाल रंग की चट्टानों (जैसे ग्रेनाइट और गनेस) के क्षरण से बनती है। लोहा (Iron) की उपस्थिति के कारण इसका रंग लाल होता है। विशेषता: यह मृदा आमतौर पर पोषक तत्वों से निर्जीव होती है, लेकिन यदि उसे उर्वरकों से समृद्ध किया जाए तो यह उपजाऊ हो सकती है। वितरण: दक्षिण भारत के पूर्वी और दक्षिणी भाग, ओडिशा, तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के कुछ हिस्से। उपयोग: यह गन्ना, गेहूँ, दलहन और सब्जियों की खेती के लिए उपयुक्त है। 4. जंगली मृदा (Laterite Soils) गठन: यह उच्च तापमान और भारी वर्षा वाले क्षेत्रों में चट्टानों के गहराई से क्षरण से बनती है। इसमें लोहा और एल्युमिनियम की अधिक मात्रा होती है। विशेषता: इसमें नाइट्रोजन और पोटाश की कमी होती है, इसलिए यह कृषि के लिए प्राकृतिक रूप से कम उपजाऊ होती है। वितरण: केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु, ओडिशा और पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्से, साथ ही उत्तर-पूर्वी राज्यों में भी पाई जाती है। उपयोग: इसमें चाय, कॉफी, रबड़ और ज्वार की खेती की जाती है। यह ईट बनाने के लिए भी प्रयोग होती है। 5. बंजर मृदा (Arid / Desert Soils) गठन: यह शुष्क और अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों में पाई जाती है। इसमें नमक की अधिक मात्रा होती है और ऑर्गेनिक पदार्थों की कमी होती है। विशेषता: वर्षा की कमी के कारण इसमें क्षरण (Leaching) कम होता है, जिससे नमक जमा हो जाता है। वितरण: राजस्थान (थार रेगिस्तान), गुजरात, पंजाब और हरियाणा के कुछ हिस्से। उपयोग: यदि सिंचाई उपलब्ध हो, तो यह मृदा कपास, गेहूँ, ज्वार और बाजरे की खेती के लिए उपयोगी हो सकती है। 6. हिमालयी मृदा (Mountain / Forest Soils) गठन: यह पहाड़ी क्षेत्रों में पाई जाती है और इसकी प्रकृति स्थान के अनुसार भिन्न होती है। विशेषता: इसमें जैविक पदार्थों (Humus) की अच्छी मात्रा होती है, लेकिन यह अक्सर अम्लीय होती है। वितरण: हिमालय क्षेत्र, निचली पहाड़ियाँ और उत्तर-पूर्वी राज्यों। उपयोग: यह फलों की खेती (सेब, अमरूद, नाशपाती) और जंगली फसलों के लिए उपयुक्त है। मृदा संरक्षण (Soil Conservation) भारत में मृदा क्षरण (Soil Erosion) एक गंभीर समस्या है। इसे रोकने के लिए निम्नलिखित उपाय किए जा रहे हैं: वृक्षारोपण (Afforestation): पहाड़ों और रेगिस्तानी क्षेत्रों में पेड़ लगाना। सतही खेती (Contour Ploughing): ढलान वाली जमीन पर पंक्तियों में खेती करना। टिप्पणी (Terrace Farming): पहाड़ी क्षेत्रों में चरणों जैसी खेती। फसल चक्र (Crop Rotation): विभिन्न फसलों को बदलते हुए उगाना ताकि मिट्टी की उर्वरता बनी रहे। मृदा संरक्षण दीवारें: पानी के बहाव को रोकने के लिए बाधाएं बनाना।
*✍🏻भारत की प्रमुख मृदाएँ (Soils of India)**✓ जलोढ़ मिट्टी (Alluvial Soil)* — भारत की सबसे अधिक पाई जाने वाली एवं सबसे उपजाऊ मिट्टी।*✓ काली मिट्टी (Black Soil)* — कपास की खेती के लिए सर्वाधिक उपयुक्त; रेगुर मिट्टी भी कहलाती है।*✓ लाल मिट्टी (Red Soil)* — लौह ऑक्साइड की अधिकता के कारण लाल रंग की होती है।*✓ लेटराइट मिट्टी (Laterite Soil)* — अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में पाई जाती है; चाय, कॉफी एवं काजू के लिए उपयुक्त।*✓ मरुस्थलीय मिट्टी (Desert Soil)* — राजस्थान एवं गुजरात के शुष्क क्षेत्रों में पाई जाती है।*✓ पर्वतीय मिट्टी (Mountain Soil)* — हिमालयी क्षेत्रों में पाई जाती है; फल एवं चाय की खेती के लिए उपयुक्त।*✓ पीट एवं दलदली मिट्टी (Peaty & Marshy Soil)* — जैविक पदार्थों से भरपूर; केरल, सुंदरबन आदि में पाई जाती है।*✓ जलोढ़ मिट्टी के प्रमुख क्षेत्र* — उत्तर भारत का विशाल मैदान।*✓ काली मिट्टी के प्रमुख क्षेत्र* — महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात।*✓ लाल मिट्टी के प्रमुख क्षेत्र* — तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, ओडिशा।*✓ लेटराइट मिट्टी के प्रमुख क्षेत्र* — केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु एवं पश्चिमी घाट। ❤️ पोस्ट पसंद आए तो React करें और Share जरूर करें।
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