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Shri Shiv Daily Spiritual Broadcast

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  • नवग्रह होम की विधि और ग्रहदोष निवारण के दान और मंत्र: नौ ग्रह (सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु) मनुष्य के कर्मानुसार उसे फल देते हैं। जब कोई ग्रह प्रतिकूल होकर रोग, कष्ट या धन-हानि देता है, तो उसकी विशेष समिधा से हवन करने पर वह शांत और प्रसन्न हो जाता है: सूर्य : अर्क (मदार) की समिधा — आरोग्यता और ओज हेतु। चंद्रमा : पलाश (ढाक) की समिधा — मानसिक शांति और बुद्धि हेतु। मंगल खदिर (खैर) की समिधा — भूमि, शक्ति और ऋण-मुक्ति हेतु। बुध अपामार्ग (अपामार्ग/लटजीरा) की समिधा — ज्ञान, वाणी और व्यापार हेतु। गुरु : पीपल (अश्वत्थ) की समिधा — विद्या, धर्म और संतति हेतु। शुक्र : गूलर (उदुंबर) की समिधा — संपत्ति, वाहन और वैभव हेतु। शनिवार/शनि : शमी (छोंकर) की समिधा — आयु और संकट-मुक्ति हेतु। राहु : दूर्वा (दूब घास) की समिधा — बाधा-निवारण और मानसिक भय हेतु। केतु : कुशा (कुश) की समिधा — मोक्ष और अध्यात्म-सिद्धि हेतु। महर्षि सनन्दन जी ने नवग्रह मण्डल के पूजन और हवन का नियम समझाया: मण्डल-निर्माण: शुभ मुहूर्त में वेदी बनाकर उस पर चावल, तिल और रंगों से नवग्रहों का गोल/चौकोर मण्डल बनाया जाता है। आवाहन व स्थापन: मध्य में सूर्य, पूर्व-दक्षिण में मंगल, दक्षिण में शुक्र, उत्तर-पूर्व (ईशान) में गुरु, उत्तर में बुध, पूर्व में चंद्रमा, पश्चिम में शनि, दक्षिण-पश्चिम (नैऋत्य) में राहु और उत्तर-पश्चिम (वायव्य) में केतु की स्थापना की जाती है। आहुति-संख्या: प्रत्येक ग्रह के वैदिक या पौराणिक मंत्रों से १०८, १०८० या उससे अधिक आहुतियाँ दी जाती हैं। आहुति के बाद घृत (घी) और चरु का होम किया जाता है। सनन्दन जी ने बताया कि केवल हवन ही नहीं, बल्कि विशिष्ट वस्तुओं का दान करने से भी ग्रहों के अनिष्ट प्रभाव तुरंत समाप्त हो जाते हैं: सूर्य के लिए: माणिक्य (रुबी), ताँबा, गुड़, और लाल वस्त्र का दान। चंद्रमा के लिए: मोती, चाँदी, दूध, और श्वेत वस्त्र का दान। मंगल के लिए: मूंगा, लाल मसूर, और ताँबे का पात्र। बुध के लिए: पन्ना, कांस्य (कांसा), और हरी मूंग। गुरु के लिए: पुखराज, चना दाल, हल्दी, और पीला वस्त्र। शुक्र के लिए: हीरा, चावल, इत्र, और उजला वस्त्र। शनि के लिए: नीलम, काला तिल, उड़द दाल, और लोहे का दान। राहु व केतु के लिए: गोमेद व लहसुनिया, और कस्तूरी व सात प्रकार का अनाज (सप्तधान्य)। 🕉️🍀साभार❤️🙏🌿🚩🪷🔥$k$🧨♦️💥

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  • हजारों लाल त्रिसंधि फूलों से बढ़कर एक सफेद त्रिसंधि, हजारों सफेद त्रिसंधि फूलों से बढ़कर एक कुन्द का फूल, हजारों कुन्द-पुष्पों से बढ़कर एक कमल-फूल, हजारों कमल-पुष्पों से बढ़कर एक बेला और हजारों बेला-फूलों से बढ़कर एक चमेली का फूल होता है । निम्नलिखित फूल भगवान को लक्ष्मी की तरह प्रिय है । इस बात को उन्होने स्वयं श्रीमुख से कहा है-👉 मालती, मौलसिरी, अशोक, कालीनेवारी (शेफालिका), बसंतीनेवारी (नवमल्लिका), आम्रात (आमड़ा), तगर, आस्फोत, बेल, मधुमल्लिका, जूही (यूथिका), अष्टपद, स्कन्द,कदम्ब, मधुपिङ्गल, पाटला, चम्पा, ह्रद्य, लवंग, अतिमुक्तक (माधवी), केवड़ा, कुरब, बेल, सायंकालमें फूलनेवाला श्वेत कमल (कह्लार) और अडूसा । कमल का फूल तो भगवान को बहुत ही प्रिय है । विष्णुरहस्य में बतलाया गया है कि कमल का एक फूल चढ़ा देने से करोड़ो वर्ष के पापों का भगवान नाश कर देते है । कमल के अनेक भेद है । उन भेदो के फल भी भिन्न-भिन्न है । बतलाया गया है कि सौ लाल कमल चढ़ाने का फल एक श्वेत कमल के चढ़ाने से मिल जाता है तथा लाखों श्वेत कमलो का फल एक नीलकमल से और करोड़ो नीलकमलों का फल एक पद्म से प्राप्त हो जाता है । यदि कोई भी किसी प्रकार एक भी पद्म चढ़ा दे, तो उसके लिये विष्णुपुरी की प्राप्ति सुनिश्चित है। बलि के द्वारा पूछे जाने पर भक्तराज प्रल्हाद ने विष्णु के प्रिय कुछ फूलों के नाम बतलाये है- सुवर्णजाती (जाती), शतपुष्पा (शताह्वा), चमेली (सुमनाः), कुंद, कठचंपा (चारुपट), बाण, चम्पा, अशोक, कनेर, जूही, पारिभद्र, पाटला, मौलसिरी, अपराजिता (गिरिशालिनी), तिलक, अड़हुल, पीले रंगके समस्त फूल (पीतक) और तगर । पुराणों ने कुछ नाम और गिनाये है, जो नाम पहले आ गये है, उनको छोड़कर शेष नाम इस प्रकार है- अगस्त्य आम की मंजरी, मालती, बेला, जूही, (माधवी) अतिमुक्तक, यावन्ति, कुब्जई, करण्टक (पीली कटसरैया), धव (धातक), वाण (काली कटसरैया), बर्बरमल्लिका (बेला का भेद) और अडूसा । विष्णुधर्मोत्तर में बतलाया गया है कि भगवान विष्णु की श्वेत पीले फूल की प्रियता प्रसिद्ध है, फिर भी लाल फूलों में दोपहरिया (बन्धूक), केसर, कुङ्कुम और अड़हुल के फूल उन्हें प्रिय है, अतः इन्हे अर्पित करना चाहिये । लाल कनेर और बर्रे भी भगवान को प्रिय है । बर्रे का फूल पीला-लाल होता है । इसी तरह कुछ सफेद फूलों को वृक्षायुर्वेद लाल उगा देता है । लाल रंग होने मात्र से वे अप्रिय नही हो जाते, उन्हे भगवान को अर्पण करना चाहिये । इसी प्रकार कुछ सफेद फूलों के बीच भिन्न-भिन्न वर्ण होते है । जैसे पारिजात के बीच में लाल वर्ण । बीच में भिन्न वर्ण होने से भी उन्हे सफेद फूल माना जाना चाहिये और वे भगवान के अर्पण योग्य है । विष्णुधर्मोत्तर के द्वारा प्रस्तुत नये नाम ये है- तीसी, भूचम्पक, पुरन्ध्रि, गोकर्ण और नागकर्ण । अन्त में विष्णुधर्मोत्तर ने पुष्पों के चयन के लिये एक उपाय बतलाया है । कहा है कि जो फूल शास्त्र से निषिद्ध न हो और गन्ध तथा रंग-रूप से संयुक्त हो उन्हे विष्णु भगवान को अर्पण करना चाहिये । श्रीविष्णु के लिये निषिद्ध फूल 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ विष्णु भगवान पर नीचे लिखे फूलों को चढ़ाना मना है – आक, धतूरा, कांची, अपराजिता (गिरिकर्णिका), भटकटैया, कुरैया, सेमल, शिरीष, चिचिड़ा (कोशातकी), कैथ, लाङ्गुली, सहिजन, कचनार, बरगद, गूलर, पाकर, पीपर और अमड़ा (कपीतन) । घर पर रोपे गये कनेर और दोपहरियो के फूल का भी निषेध है । पुष्पों के संबंध में उल्लेखनीय है कि कमल और कुमुद के पुष्प 11 से 15 दिन तक बासी नहीं होते। अगत्स्य के पुष्प कभी बासी नहीं माने जाते। चंपा की कली को छोड़कर किसी भी दूसरे पुष्प की कली कभी भी देवता पर नहीं चढ़ानी चाहिए। मध्याह्न स्नान के बाद पुष्प तोड़ने की सख्त मनाही शास्त्रों में की गई है। किसी भी पूजन में केतकी के पुष्प नहीं चढ़ाते हैं। 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️@

  • बदले में पत्ते चढ़ाये और पत्ते भी न मिलें तो इनके फल चढ़ाये ।फूल की अपेक्षा माला में दुगुना फल प्राप्त होता है । रात में कदम्ब के फूल और मुकुर को अर्पण करे और दिन में शेष समस्त फूल । बेला दिन में और रात मे भी चढ़ाना चाहिये । सूर्य भगवानपर चढ़ाने योग्य कुछ फूल ये है – बेला, मालती, काश,माधवी, पाटला, कनेर, जपा, यावन्ति,कुब्जक, कर्णिकार, पीली कटसरैया (कुरण्टक), चम्पा, रोलक, कुन्द, काली कटसरैया वाण), बर्बरमल्लिका, अशोक, तिलक, लोध, अरूषा, कमल, मौलसिरी, अगस्त्य और पलाशके फूल तथा दूर्वा । विहित पत्र 〰️〰️〰️ बेल का पत्र, शमी का पत्ता, भॅंगरैया की पत्ती, तमालपत्र, तुलसी और काली तुलसी के पत्ते तथा कमल के पत्ते सूर्य भगवान की पूजा में गृहीत है । सूर्य के लिये निषिद्ध फूल 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️गुंजा (कृष्णला), धतूरा, कांची, अपराजिता (गिरिकर्णिका), भटकटैया, तगर और अमड़ा- इन्हे सूर्य पर न चढ़ाये । भगवती गौरी👉 शंकर भगवान् को चढ़ने वाले पुष्प मां भगवती को भी प्रिय हैं। इसके अलावा जितने लाल फूल है वे सभी भगवती को अभीष्ट है तथा सुगन्धित समस्त श्वेत फूल भी भगवती को विशेष प्रिय है । बेला, चमेली, केसर, श्वेत और लाल फूल, श्वेत कमल, पलश, तगर, अशोक, चंपा, मौलसिरी, मदार, कुंद, लोध, कनेर, आक, शीशम और अपराजित (शंखपुष्पी) आदि के फूलों से देवी की भी पूजा की जाती है । कुछ ग्रंथों में आक और मदार के पुष्प चढ़ाना मना किया गया है, अतः अन्य पुष्पों के अभाव में ही इनका उपयोग करें। दुर्गा से भिन्न देवियों पर इन दोनों को न चढ़ाये । किंतु दुर्गाजी पर चढ़ाया जा सकता है । क्योंकि दुर्गा की पूजा में इन दोनों का विधान है । शमी, अशोक, कर्णिकार (कनियार या अमलतास), गूमा, दोपहरिया, अगस्त्य, मदन,सिन्दुवार, शल्लकी, माधव आदि लताऍ, कुश की मंजरियॉं, बिल्वपत्र, केवड़ा, कदम्ब, भटकटैया, कमल- ये फूल भगवती को प्रिय है । श्रीकृष्ण👉 अपने प्रिय पुष्पों का उल्लेख महाभारत में युधिष्ठिर से करते हुए वे कहते हैं-हे राजन्! मुझे कुमुद, करवरी, चणक, मालती, नंदिक, पलाश और वनमाला के पुष्प बहुत प्रिय हैं। आक और मदार की तरह दूर्वा, तिलक, मालती, तुलसी, भंगरैया और तमाल विहित-प्रतिषिद्ध है अर्थात ये शास्त्रों से विहित भी है और निषिद्ध भी है । विहित-प्रतिशिद्ध के सम्बन्ध के तत्त्वसागर संहिताक कथन है कि जब शास्त्रों से विहित फूल न मिल पायें तो विहित-प्रतिषिद्ध फूलों से पूजा कर लेनी चाहिये । लक्ष्मीजी👉 इनका सबसे अधिक प्रिय पुष्प कमल है। उन्हें पीला फूल चढ़ाकर भी प्रसन्न किया जा सकता है। इन्हें लाल गुलाब का फूल भी काफी प्रिय है। विष्णुजी👉भगवान विष्णु को तुलसी बहुत प्रिय । एक और रत्न, मणि तथा स्वर्णनिर्मित बहुत-से फूल चढ़ाये जायॅं और दूसरी और तुलसीदल चढाया जाय तो भगवान् तुलसीदल को ही पसंद करेंगे । सच पूछा जाय तो ये तुलसीदल की सोलहवी कला की भी समता नहीं कर सकते । भगवान को कौस्तुभ भी उतना प्रिय नहीं है, जितना कि तुलसीपत्र मंजरी । काली तुलसी तो प्रिय है ही किंतु गौरी तुलसी तो और भी अधिक प्रिय है । भगवान ने श्रीमुख से कहा है कि यदि तुलसीदल न हो तो कनेर, बेला, चम्पा, कमल और मणि आदि से निर्मित फूल भी मुझे नहीं सुहाते । तुलसी से पूजित शिवलिङ्ग या विष्णु की प्रतिमा के दर्शनमात्र से ब्रह्महत्या भी दूर हो जाती है । एक और मालती आदि की ताजी मालाए हो और दूसरी ओर बासी तुलसी हो तो भगवान बासी तुलसी को ही अपनायेंगे । शास्त्र ने भगवान पर चढ़ाने योग्य पत्रों का भी परस्पर तारतम्य बतलाकर तुलसी की सर्वातिशायिता बतलायी है, जैसे कि चिचिड़े की पत्ती से भॅंगरैया की पत्ती अच्छी मानी गयी है तथा उससे अच्छी खैर की और उससे अच्छी शमी की । शमी से दूर्वा, उससे अच्छा कुश, उससे अच्छी दौना की, उससे अच्छी बेल की पत्ती को और उससे भी अच्छा तुलसीदल होता है । नरसिंहपुराण में फूलों का तारतम्य बतलाया गया है । कहा गया है कि दस स्वर्ण-सुमनों का दान करने से जो फल प्राप्त होता है, व एक गूमा के फूल चढ़ाने से प्राप्त हो जाता है । इसके बाद उन फूलों के नाम गिनाये गये हैं, जिनमे पहले की अपेक्षा अगला उत्तरोत्तर हजार गुना अधिक फलप्रद होता जाता है, जैसे-गूमा के फूल से हजार गुना बढ़कर एक खैर, हजारों खैर के फूलों से बढ़कर एक शमी का फूल, हजारों कनेर के फूलों से बढ़कर एक सफेद कनेर, हजारों सफेद कनेर से बढ़कर कुश का फूल, हजारो कुश के फूलों से बढ़कर वनवेला, हजारों वनवेला के फूलों से एक चम्पा, हजारों चम्पाओं से बढ़कर एक अशोक, हजारों अशोक के पुष्पों से बढ़कर एक माधवी, हजारों वासन्तियों से बढ़कर एक गोजटा, हजारों गोजटांओं के फूलों से बढ़कर एक मालती, हजारों मालती फूलों से बढ़कर एक लाल त्रिसंधि (फगुनिया),

  • धार्मिक कर्मकांडों में पुष्प का महत्त्व (विस्तृत विवरण) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ भारतीय संस्कृति में पुष्प का उच्च स्थान है। देवी-देवताओं और भगवान् पर आरती, व्रत, उपवास या पर्वो पर पुष्प चढ़ाए जाते हैं। धार्मिक अनुष्ठान, संस्कार, सामाजिक व पारिवारिक कार्यों को बिना पुष्प अधूरा समझा जाता है। पुष्पों की सुगंध से देवता प्रसन्न होते हैं। सुंदरता के प्रतीक पुष्प हमारे जीवन में उल्लास, उमंग, प्रसन्नता के प्रतीक हैं। पुष्प के संबंध में कहा गया है। पुण्य संवर्धनाच्चापि पापौधपरिहारतः । पुष्कलार्थप्रदानार्थं पुष्पमित्यभियीयते ॥ -कुलाणवतंत्र अर्थात् पुण्य को बढ़ाने, पापों को भगाने और श्रेष्ठ फल को प्रदान करने के कारण यह पुष्प कहा जाता है। दैवस्य मस्तकं कुर्यात्कुसुमोपहितं सदा । अर्थात् देवता का मस्तक सदैव पुष्प से सुशोभित रहना चाहिए। पुष्पैर्देवां प्रसीदन्ति पुष्पैः देवाश्च संस्थिताः न रत्नैर्न सुवर्णेन न वित्तेन च भूरिणा तथा प्रसादमायाति यथा पुष्पैर्जनार्दन। -विष्णुनारदीय व धर्मोत्तर पुराण अर्थात् देवता लोग रत्न, सुवर्ण, भूरि द्रव्य, व्रत तपस्या एवं अन्य किसी भी साधनों से उतना प्रसन्न नहीं होते, जितना कि पुष्प चढ़ाने से होते हैं। कालिकापुराण में ऐसा उल्लेख मिलता है कि किसी भी देवता पर कभी भी बासी, जमीन पर गिरे हुए, कटे, फटे, गंदे, कीड़े लगे, दूसरों से मांगे या कहीं से चुराए हुए पुष्प नहीं चढ़ाने चाहिए। माला के संबंध में ललितासहस्रनाम में कहा गया है मां शोभां लातीति माला। अर्थात जो शोभा देती है, वह माला है। भगवान् को जो पुष्पों की मालाएं चढ़ाई जाती हैं, उनमें कमल अथवा पुंडरीक की माला को सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। शास्त्रो में कुछ फुलो के चढ़ाने से मिलने वाले फल का तारतम्य बतलाया है, जैसे दस सुवर्ण-माप के बराबर सुवर्ण-दान का फल एक आक के फूल को चढ़ाने से मिल जाता है । हजार आक के फूलों की अपेक्षा एक कनेर का फूल, हजार कनेर के फूलो के चढ़ाने की अपेक्षा एक बिल्वपत्र से फल मिल जाता है और हजार बिल्वपत्रों की अपेक्षा एक गूमाफूल (द्रोण-पुष्प) होता है । इस तरह हजार गूमा से बढ़कर एक चिचिड़ा, हजार चिचिड़ो (अपामार्गो) से बढ़कर एक कुश का फूल, हजार कुश-पुष्पों से बढ़कर एक शमी का पत्ता, हजार शमी के पत्तों से बढ़कर एक नीलकमल, हजार नीलकमलों से बढ़कर एक धतूरा, हजार धतूरों से बढ़कर एक शमी का फूल होता है । अन्त में बतलाया है कि समस्त फूलों की जातियों में सबसे बढ़कर नीलकमल होता है। भगवान व्यास ने कनेर की कोटि में चमेली, मौलसिरी, पाटला, मदार, श्वेतकमल, शमी के फूल और बड़ी भटकटैया को रखा है। इसी तरह धतूरे की कोटि में नागचम्पा और पुंनाग को माना है। अपने आराध्य देव की प्रसन्नता के लिए कौन-सा पुष्प चढ़ाना चाहिए और कौन-सा नहीं? इस संबंध में यहां संक्षिप्त जानकारी दी जा रही है। श्री गणेशजी👉 आचार भूषण नामक ग्रंथानुसार गणेशजी को तुलसीदल को छोड़कर सभी प्रकार के पुष्प प्रिय हैं इन्हे सफेद या हरी दूर्वा अवश्य चढ़ानी चाहिये । दूर्वा की फुनगी में तीन या पॉंच पत्ती होनी चाहिये। शंकरजी👉 शास्त्रों ने भगवान शंकर की पूजा में मौलसिरी (बक-बकुल) के फूल को ही अधिक महत्त्व दिया है । भविष्यपुराण ने भगवान शंकर पर चढ़ाने योग्य और भी फूलों के नाम गिनायै है- करवीर (कनेर), मौलसिरी, धतूरा, पाढर, बड़ी कटेरी, कुरैया, कास, मन्दार, अपराजिता, शमीका फूल, कुब्जक, शंखपुष्पी, चिचिड़ा, कमल, चमेली, नागचम्पा, चम्पा, खस, तगर, नागकेसर, किंकिरात (करंटक अर्थात् पीले फूलवाली कटसरैया), गूमा, शीशम, गूलर, जयन्ती, बेला, पलाश, बेलपत्ता, कुसुम्भ-पुष्प, कुङ्कुम अर्थात् केसर, नीलकमल और लाल कमल । जल एवं स्थल में उत्पन्न जितने सुगन्धित फूल है, सभी भगवान शंकर को प्रिय है। शंकरजी को निषिद्ध पत्र-पुष्प 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ कदम्ब, सारहीन फूल या कठूमर, केवड़ा, शिरीष, तिन्तिणी, बकुल (मौलसिरी), कोष्ठ, कैथ, गाजर, बहेड़ा, कपास, गंभारी, पत्रकंटक, सेमल, अनार, धव, केतकी, वसंत ऋतु में खिलनेवाला कंद-विशेष, कुंद, जूही, मदन्ती, शिरीष सर्ज और दोपहरिया के फूल भगवान शंकर पर नहीं चढ़ाने चाहिये । वीरमित्रोदय में इनका संकलन किया गया है। सूर्य नारायण👉 भविष्यपुराण मे बतलाया गया है कि सूर्य भगवान को यदि एक आक का फूल अर्पण कर दिया जाय तो सोने की दस अशर्फिया चढ़ाने का फल मिल जाता है । फूलों का तारतम्य इस प्रकार बतलाया गया है – हजार अड़हुल के फूलों से बढ़कर एक कनेर का फूल होता है, हजार कनेर के फूलों से बढ़कर एक बिल्वपत्र, हजार बिल्वपत्रों से बढ़कर एक ‘पद्म; (सफेद रंग से भिन्न रंगवाला), हजारों रंगीन पद्म-पुष्पों से बढ़कर एक मौलसिरी, हजारों मौलसिरियों से बढ़कर एक कुश का फूल, हजार कुश के फूलों से बढ़्कर एक शमी का फूल, हजार शमी के फूलों से बढ़कर एक नीलकमल, हजारों नील एवं रक्त कमलों से बढ़कर ‘केसर और लाल कनेर’ का फूल होता है । यदि इनके फूल न मिले तो

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  • जानिए शिवलिंग पर क्या चढ़ाने से क्या फल मिलता है? 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ 👉 शिवलिंग पर दूध अर्पित करने से आरोग्य की प्राप्ति होती है। 👉 शिवलिंग पर दही अर्पित करने से हमें जीवन में हर्ष और उल्लास की प्राप्ति होती है। 👉 शिवलिंग पर शहद चडाने से रूप और सौंदर्य प्राप्त होता है , वाणी में मिठास रहती है, समाज में लोकप्रियता बढ़ती है। 👉 शिवलिंग पर घी चढ़ाने से हमें तेज की प्राप्ति होती है। 👉 शिवलिंग पर शकर चढ़ाने से सुख - समृद्धि और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। 👉 शिवलिंग पर ईत्र चढ़ाने से धर्म की प्राप्ति होती हैं। 👉 शिवलिंग पर सुगंधित तेल चढ़ाने से धन धान्य की वृद्धि होती है, जीवन में सभी भौतिक सुखों की प्राप्ति होती है। 👉 शिवलिंग पर चंदन चढ़ाने से समाज में यश और मान-सम्मान की प्राप्ति होती है। 👉 शिवलिंग पर केशर अर्पित करने से दाम्पत्य जीवन सुखमय होता है , विवाह में आने वाली समस्त अड़चने दूर होती है, मनचाहा जीवन साथी प्राप्त होता है विवाह के योग शीघ्र बनते है । 👉 शिवलिंग पर भांग चढ़ाने से हमारे समस्त पाप समस्त बुराइयां दूर होती हैं। 👉 शिवलिंग पर आँवला अथवा आँवले का ऱस चढ़ाने से दीर्घ आयु प्राप्त होती है । 👉 शिवलिंग पर गन्ने का रस चढ़ाने से समस्त पारिवारिक सुखो की प्राप्ति होती है , परिवार के सदस्यों के मध्य में प्रेम बना रहता है। 👉 शिवलिंग पर गेहूं चढ़ाने से वंश वृद्धि होती है, योग्य संतान की प्राप्ति होती है, संतान आज्ञाकारी होती है। 👉 शिवलिंग पर चावल चढ़ाने से धन और सुख समृद्धि की प्राप्ति होती है। 👉 शिवलिंग पर तिल चढ़ाने से पापों समस्त रोगो का नाश होता है। 👉 शिवलिंग पर जौ अर्पित करने से सांसारिक सुखो की प्राप्ति होती है। 👉 भगवान भोलेनाथ की बेलपत्र से पूजा करने से सभी संकट दूर होते है। 👉 भगवान भोलेनाथ की दूर्वा से पूजन करने दीर्घ आयु की प्राप्ति होती है। 👉 भगवान भोलेनाथ की हारसिंगार के फूलों से पूजन करने पर जीवन में सुख-संपत्ति और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। 👉 भगवान भोलेनाथ पर चमेली के फूल चढ़ाने से सुख समृद्धि प्राप्त होती है। 👉 भगवान भोलेनाथ की धतूरे से पूजन करने पर भगवान शंकर सुयोग्य पुत्र प्रदान करते हैं, जो कुल का नाम रोशन करता है। 👉 भगवान भोलेनाथ की आंकड़े के फूल से पूजन, श्रंगार करने से जीवन के सभी सुख मिलते है, पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। 👉 भगवान भोलेनाथ की अलसी के फूलों से पूजन करने से मनुष्य सभी देवताओं का प्रिय हो जाता है। 👉 भगवान भोलेनाथ की बेला के फूल से पूजन करने पर मनचाहा, सुंदर जीवनसाथी मिलता है। 👉 भगवान भोलेनाथ की जूही के फूल से पूजन करने से घर कारोबार में धन धान्य की कोई भी कमी नहीं होती है। 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

  • उन्होंने भृंगी को श्राप दिया- “हे भृंगी तू सृष्टि के आदि नियमों का उल्लंघन कर रहा है। यदि तू मातृशक्ति का सम्मान करने में अपनी हेठी समझता है तो अभी इसी समय तेरे शरीर से तेरी माता का अंश अलग हो जाएगा। यह श्राप सुनकर स्वयं महादेव भी व्याकुल हो उठे। भृंगी की बुद्धि भले ही हर गई थी पर महादेव जानते थे कि इस श्राप का मतलब कितना गंभीर है। *शरीर विज्ञान की तंत्रोक्त व्याख्या के मुताबिक इंसान के शरीर में हड्डियां और पेशियां पिता से मिलती हैं, जबकि रक्त और मांसमाता के अंश से प्राप्त होता है।* फिर क्या था, भृंगी की तो दुर्गति हो गई। उनके शरीर से तत्काल रक्त और मांस अलग हो गया। शरीर में बची रह गईं तो सिर्फ हड्डियां और मांसपेशियां। मृत्यु तो हो नहीं सकती थी क्योंकि वो अविमुक्त कैलाश के क्षेत्र में थे और स्वयं सदाशिव और महामाया उनके सामने थे। उनके प्राण हरने के लिए यमदूत वहां पहुंचने का साहस ही नहीं कर सकते थे। असह्य पीड़ा से भृंगी बेचैन होने लगे। ये शाप भी आदिशक्ति जगदंबा का दिया हुआ था। उन्होंने ये शाप भृंगी की भेदबुद्धि को सही रास्ते पर लाने के लिए दिया था। इसलिए महादेव भी बीच में नहीं पड़े। इस शाप का लाभ यह हुआ कि भृंगी असहनीय पीड़ा में पड़कर समझ गए कि पितृशक्ति किसी भी सूरत में मातृशक्ति से परे नहीं है। माता और पितामिलकर ही इस शरीर का निर्माण करते हैं। इसलिए दोनों ही पूज्य हैं।इसके बाद भृंगी ने असह्य पीड़ा से तड़पते हुए जगदंबा की अभ्यर्थना की। माता तो माता होती है। उन्होंने तुरंत उनपर कृपा की और पीड़ा समाप्त कर दी। माता ने अपना शाप वापस लेने का उपक्रम शुरू किया लेकिन धन्य थे भक्त भृंगी भी। उन्होंने माता को शाप वापस लेने से रोका। भृंगी ने कहा- माता मेरी पीड़ा दूर करके आपने मेरे उपर बड़ी कृपा की है। परंतु मुझे इसी स्वरुप में रहने दीजिए। मेरा यह स्वरूप संसार के लिए एक उदाहरण होगा। इस सृष्टि में फिर से कोई मेरी तरह भ्रम का शिकार होकर माता और पिता को एक दूसरे से अलग समझने की भूल न करेगा। मैंने इतना अपराध किया फिर भी आपने मेरे ऊपर अनुग्रह किया। अब मैं एक जीवंत उदाहरण बनकर सदैव आपके आसपास ही रहूंगा। भक्त की यह बात सुनकर महादेव और जगदंबा दोनों पुलकित हो गए। अर्द्धनारीश्वर स्वरुप धारण किए हुए मां जगदंबा और पिता महादेव ने तुरंत भृंगी को अपने गणों में प्रमुख स्थान दिया। भृंगी चलने-फिरने में समर्थ हो सकें इसलिए उन्हें तीसरा पैर भी दिया। तीसरे पैर से वह अपने भार को संभालकर शिव-पार्वती के साथ चलते हैं।अर्धनारीश्वर भगवान ने कहा- हे भृंगी तुम सदा हमारे साथ रहोगे। तुम्हारी उपस्थिति इस जगत को संदेश होगी कि हर जीव में जितना अंश पुरूष है उतनी ही अंश है नारी। नारी और पुरुष में भेद करने वाले की गति तुम्हारे जैसे हो जाती है। पुरुष और स्त्री मिलकर संसार को आगे बढ़ाएं, दोनों बराबर अंश के योगी हैं यही सिद्ध करने को मैंने अर्धनारीश्वर रूप धरा है। स्त्री-पुरुष दोनों का अपना स्थान, अपना अस्तित्व है। इसे नकारने वाले को शिव-शिवा दोनों में से किसी की भी कृपा प्राप्त नहीं होती। वह जीव मृत्युलोक में सदा शिव-शिवा की कृपा के लिए तरसता ही विदा हो जाएगा। भृंगी को वो पद प्राप्त हुआ, जिसे हासिल करने के लिए इंद्रादि बड़े-बड़े देवता भी लालायित रहते हैं। संसार को मैथुनी सृष्टि की व्यवस्था शिवजी ने दी है। इसके लिए उन्होंने सबसे पहले ब्रह्मा को अपना अर्धनारीश्वर स्वरूप दिखाया। उसे देखकर ही ब्रह्मा ने नारी की कल्पना की। नारी और पुरुष के संयोग से सृष्टि रचना की व्यवस्था दी। अर्थात नर-नारी मिलकर सूक्ष्म ब्रह्मा की तरह सृष्टिकर्ता हो जाते हैं। फिर शिव ने जगदंबा के साथ विवाह व्यवस्था दी। सर्वप्रथम विवाह शिव-जगदंबा का ही है। जय महादेव मेरे महादेव 🙏🙏🙏

  • महादेव के गणों मे एक हैं भृंगी। एक महान शिवभक्त के रुप में भृंगी का नाम अमर है। #भृंगी की कथा महादेव के गणों मे एक हैं भृंगी। एक महान शिवभक्त के रुप में भृंगी का नाम अमर है। कहते हैं जहां शिव होंगे वहां गणेश, नंदी, श्रृंगी, भृंगी, वीरभद्र का वास स्वयं ही होगा। शिव-शिवा के साथ उनके ये गण अवश्य चलते हैं। इनमें से सभी प्रमुख गणों के बारे में तो कहानियां प्रचलित हैं। जैसे दक्ष यज्ञध्वंस के लिए वीरभद्र उत्पन्न हुए। मां पार्वती ने श्रीगणेश को उत्पन्न किया। नंदी तो शिव के वाहन हैं जो धर्म के अवतार हैं। शिलाद मुनि के पुत्र के रूप में जन्म लेकर शिवजीके वाहन बने नंदी। आपने यह सब कथाएं खूब सुनी होंगी पर क्या प्रमुख शिवगण भृंगी की कथा सुनी है?भृंगी की खास बात यह हैं कि उनके तीन पैर हैं। शिव विवाह के लिए चलीबारात में उनका जिक्र मिलता हैं बिनु पद होए कोई.. बहुपद बाहू” (यानी शिवगणों में कई बिना पैरों के थे और किसी के पास कई पैर थे) ये पद तुलसीदासजी ने भृंगी के लिए ही लिखा है।भृंगी के तीन पैर कैसे हुए? इसके पीछे एक कथा है जो हमें बताती है कि उमा-शंकर के बीच का प्रेम कितना गहरा है। ये दोनों वस्तुत: एक ही हैं। दरअसल भृंगी की एक अनुचित जिद ही वजह से सदाशिव और जगदंबा को अर्द्धनारीश्वर रुप धारण करना पड़ा।भृंगी महान शिवभक्त थे। सदाशिव के चरणों में उनकी अत्य़धिक प्रीति थी। उन्होंने स्वप्न में भी शिव के अतिरिक्त किसी का ध्यान नहीं किया था। यहां तक कि वह जगद्जननी मां पार्वती को भी सदाशिव से अलग मानते थे। शिवस्य चरणम् केवलम्” के भाव में हमेशा रहते थे। उनकी बुद्धि यह स्वीकार ही नहीं करती थी कि शिव और पार्वती में कोई भेद नहीं है। एक बार सदाशिव के परम भक्त श्रृंगी ऋषि कैलाश पर अपने आराध्य की परिक्रमा करने पहुंचे। सदैव की तरह महादेव के बाईं जंघा पर आदिशक्तिजगदंबा विराजमान थीं। महादेव समाधि में थे और जगदंबा चैतन्य थीं। जगदंबा के नेत्र खुले थे। भृंगी तो आए थे शिवजी की परिक्रमा करने। शिवजी तो ध्यानमग्न थे। शिवप्रेम में भृंगी मतवाले हो रहे थे। वह सिर्फ शिवजी की परिक्रमा करना चाहते थे क्योंकि ब्रह्मचर्य की उनकी परिभाषा अलग थी। पर क्या करें, पार्वतीजी तो शिवजी के वामांग में विराजमान हैं। भृंगी अपना उतावनापन रोक ही नहीं पाए। साहस इतना बढ़ गया कि उन्होंने जगदंबा से अनुरोध कर दिया कि वह शिवजी से अलग होकर बैठें ताकि मैं शिवजी की परिक्रमा कर सकूं। जगदंबा समझ गईं कि यह है तो तपस्वी लेकिन इसे ज्ञान नहीं हुआ है। अभी यह अधूरा ज्ञान का है इसलिए उन्होंने भृंगी की बात को अनसुना किया। भृंगी तो हठ में थे, कुछ भी सुनने-समझने को तैयार ही नहीं। फिर से पार्वतीजी से कहा कि आपकुछ देर के लिए हट जाएं, मैं परिक्रमा कर लूं।मां पार्वती ने इसपर आपत्ति जताई और कहा कि अनुचित बात बंद करो. जगदंबा महादेव की शक्ति हैं. वह सदाशिव से पृथक होने को कैसे तैयार होतीं! माता ने भृंगी को कई तरह से समझाया, प्रकृति और पुरुष के संबंधों की व्याख्या की। वेदों का उदाहरण दिया परंतु भृंगी भी वैसे ही हठी। हठी की बुद्धि तो वैसे भी आधी हो जाती है।माता द्वारा दिए ज्ञान-उपदेश उनके विवेक में उतरे ही नहीं। उनकी बुद्धि सृष्टि के इस रहस्य को समझने के लिए तैयार ही नहीं हुई। उन्होंने सिर्फ शिव की परिक्रमा करने की ठान रखी थी। माता ने सोचा इस अज्ञानी को कुछ भी समझाने का लाभ नहीं। इसे अनदेखा ही कर देना चाहिए। माता शिवजी से अलग न हुईं। भृंगी ने भी हठ ही पाल रखा था। अपने मन की करने के लिए एक योजना बना ली। भृंगी ने सर्प का रुप धारण किया और शिवजी की परिक्रमा करने लगे। सरकते हुए वह जगदंबा और महादेव के बीच से निकलने का यत्न करने लगे। उनकी इस धृष्टता का परिणाम हुआ कि शिवजी की समाधि भंग हो गई। उन्होंने समझ लिया कि मूर्ख जगदंबा को मेरे वाम अंग पर देखकर विचलित है। वह दोनों में भेद कर रहा है। इसे सांकेतिक रूप से समझाने के लिए शिवजी ने तत्काल अर्द्धनारीश्वर स्वरुप धारण कर लिया। जगदंबा अब उन्हीं में विलीन हो गईं थी। शिवजी दाहिने भाग से पुरुष रूप में और बाएं भाग से स्त्रीरूप में दिखने लगे।अब तो भृंगी की योजना पर पानी फिरने लगा। हठी का हठ तो भगवान से भी ऊपर जाने लगता है। भृंगी ने इतने पर भी हिम्मत नहीं हारी। उन्हें तो बस शिवजी की ही परिक्रमा करनी थी। अपनी जिद पूरी करने की लिए एक और मूर्खतापूर्ण प्रयास किया। अब भृंगी ने चूहे का रुप धारण कर लिया। चूहे के रूप में प्रभु के अर्द्धनारीश्वर रुप को कुतरकर एक दूसरे से अलग करने की कोशिश में जुट गए। अब यह तो अति थी। शिवभक्त भृंगी की धृष्टता को लगातार सहन करती आ रही जगदंबा का धैर्य चूक गयी|

  • माँ विंध्यवासिनी और श्रीकृष्ण के बीच का संबंध?? 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ भगवान श्रीकृष्ण को पूर्णावतार माना जाता है। अर्थात जो हर तरह से पूर्ण हैं और जो पूर्णत: विष्णु ही है। भगवान श्रीकृष्ण के संबंध में सैंकड़ों रहस्य है लेकिन बहुत कम लोग ही उन सभी रहस्यों को जानते होंगे।एक रहस्य यह भी है कि माता विंध्यवासिनी भगवान श्रीकृष्ण की क्या लगती थीं? भगवान् श्रीकृष्ण की परदादी मारिषा एवं सौतेली मां रोहिणी (बलराम की मां) दोनों ही नाग जनजाति की थीं। भगवान श्री कृष्ण की माता का नाम देवकी था।भगवान श्री कृष्ण से जेल में बदली गई यशोदापुत्री का नाम एकानंशा था, जो आज विंध्यवासिनी देवी के नाम से पूजी जातीं हैं। श्रीमद्भागवत में नंदजा देवी कहा गया है इसीलिए उनका अन्य नाम कृष्णानुजा है। इसका अर्थ यह की वे भगवान श्रीकृष्ण की बहन थीं।इस बहन ने श्रीकृष्ण की जीवनभर रक्षा की थी। श्रीमद्भागवत पुराण की कथा अनुसार देवकी के आठवें गर्भ से जन्में श्रीकृष्ण को वसुदेवजी ने कंस से बचाने के लिए रातोंरात यमुना नदी को पार गोकुल में नन्दजी के घर पहुंचा दिया थातथा वहां यशोदा के गर्भ से पुत्री के रूप में जन्मीं भगवान की शक्ति योगमाया को चुपचाप वे मथुरा के जेल में ले आए थे। बाद में जब कंस को देवकी की आठवीं संतान के जन्म का समाचार मिला तो वह कारागार में पहुंचा।उसने उस नवजात कन्या को पत्थर पर पटककर जैसे ही मारना चाहा, वह कन्या अचानक कंस के हाथों से छूटकर आकाश में पहुंच गई और उसने अपना दिव्य स्वरूप प्रदर्शित कर कंस के वध की भविष्यवाणी की और अंत में वह भगवती विन्ध्याचल वापस लौट गई।कहते हैं कि योगमाया ने यशोदा के गर्भ से जन्म लिया था। इनके जन्म के समय यशोदा गहरी निद्रा में थीं और उन्होंने इस बालिका को देखा नहीं था। जब आंख खुली तो उन्होंने अपने पास पुत्र को पाया जो कि कृष्ण थे।हालांकि गर्गपुराण के अनुसार भगवान कृष्ण की मां देवकी के सातवें गर्भ को योगमाया ने ही बदलकर कर रोहिणी के गर्भ में पहुंचाया था, जिससे बलराम का जन्म हुआ। बाद में योगमाया ने यशोदा के गर्भ से जन्म लिया था।इन्हीं योगमाया ने कृष्ण के साथ योगविद्या और महाविद्या बनकर कंस, चाणूर और मुष्टिक आदि शक्तिशाली असुरों का संहार कराया, जो कंस के प्रमुख मल्ल माने जाते थे।श्रीमद्भागवत पुरा में देवी योगमाया को ही विंध्यवासिनी कहा गया है जबकि शिवपुराण में उन्हें सती का अंश बताया गया है। भारत में विंध्यवासिनी देवी का चमत्कारिक मंदिर विंध्याचल की पहाड़ी श्रृंखला के मध्य (मिर्जापुर, उत्तर) पतित पावनी गंगा के कंठ पर बसा हुआ है।प्रयाग एवं काशी के मध्य विंध्याचल नामक तीर्थ है जहां मां विंध्यवासिनी निवास करती हैं। यह तीर्थ भारत के उन 51 शक्तिपीठों में प्रथम और अंतिम शक्तिपीठ है जो गंगा तट पर स्थित है।यहां तीन किलोमीटर के दायरे में अन्य दो प्रमुख देवियां भी विराजमान हैं। निकट ही कालीखोह पहाड़ी पर महाकाली तथा अष्टभुजा पहाड़ी पर अष्टभुजी देवी विराजमान हैं। हालांकि कुछ विद्वान इस 51 शक्तिपीठों में शामिल नहीं करते हैं लेकिन 108 शक्तिपीठों में जरूर इनका नाम मिलता है।शिव पुराण अनुसार मां विंध्यवासिनी को सती माना गया है। सती होने के कारण उन्हें वनदुर्गा कहा जाता है। कहते हैं कि आदिशक्ति देवी कहीं भी पूर्णरूप में विराजमान नहीं हैं,लेकिन विंध्याचल ही ऐसा स्थान है जहां देवी के पूरे विग्रह के दर्शन होते हैं। शास्त्रों के अनुसार, अन्य शक्तिपीठों में देवी के अलग-अलग अंगों की प्रतीक रूप में पूजा होती है।मान्यता अनुसार सृष्टि आरंभ होने से पूर्व और प्रलय के बाद भी इस क्षेत्र का अस्तित्व कभी समाप्त नहीं हो सकता। यहां लोग सिद्धि प्राप्त करने के लिए साधना करने आते हैं जहां संकल्प मात्र से साधकों को सिद्धि प्राप्त होती है।मार्कण्डेय पुराण श्री दुर्गा सप्तशती की कथा अनुसार ब्रह्मा, विष्णु व महेश भी भगवती की मातृभाव से साधना और उपासना करते हैं, तभी वे सृष्टि की व्यवस्था करने में समर्थ होते हैं। 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

  • कुत्ते का रहस्य :- 〰〰〰〰〰 हमारे पुराणों में यह बतलाया गया है की कुत्ता यमराज दूत है . कुत्ते को भैरव देवता का सेवक भी कहा जाता है. भैरव देवता को प्रसन्न करने के लिए कुत्ते को भोजन करना चाहिए. यदि भैरव देवता अपने भक्त से प्रसन्न रहते है तो किसी भी प्रकार की समस्या एवं रोग उसे छू नहीं सकता। मान्यता है की यदि आप कुत्ते को प्रसन्न रखते है तो वह आपके सामने किसी भी तरह की आत्माओं को फटकने नहीं देता. आत्माएं कुत्ते से दूर भागती है। कुत्ते की क्षमता के बारे में पुराण में बतलाया गया है की दरअसल कुत्ता एक ऐसा प्राणी है जिसे भविष्य में होने वाली घटनाओं का पूर्व आभास होता है तथा वह सूक्ष्म जगत को यानि की आत्माओं को देख सकता है। हिन्दू धर्म में कुत्ते को एक रहस्मयी प्राणी माना गया है, परन्तु इसे भोजन कराने से हर प्रकार के संकट से बचा जा सकता है। कुत्ते से जुड़े शकुन एवं अपशकुन :- 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 1 . कुत्ते की रोने की आवाज को अपशकुन माना जाता है. जब भी कुत्ता कराहता है तो समझ लीजिए की नकरात्मक शक्तियां आस पास है। 2 . शस्त्रों में कुत्ते के संबंध में यह बात कहि गई की यदि किसी परिवार में रोगी हो तो कुत्ता पालने से वह रोगी की बिमारी को अपने उपार ले लेता है। 3 . यदि किसी शुभ कार्य के दौरान कुत्ता आपका मार्ग रोके तो इसे विषमता या अनिश्चय प्रकट होती है। 4 . यदि संतान की प्राप्ति न हो रही हो तो काले कुत्ते को पालना चाहिए। 〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰

  • कौआ चींटी ओर कुत्ते का रहस्य? 〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰 प्राचीन समय के ऋषियों मुनियों ने अपने शोध में बताया था की प्रत्येक जानवर के विचित्र व्यवहार एवं हरकतों का कुछ न कुछ प्रभाव अवश्य होता है. जानवरों के संबंध में अनेको बाते हमारे पुराणों एवं ग्रंथो में भी विस्तार से बतलाई गई है। हमारे सनातन धर्म में माता के रूप में पूजनीय गाय के संबंध में तो बहुत सी बाते आप लोग जानते है होंगे परन्तु आज हम जानवरों के संबंध में पुराणों से ली गई कुछ ऐसी बातो के बारे में बतायेंगे जो आपने पहले कभी भी किसी से नहीं सुनी होगी. जानवरों से जुड़े रहस्यों के संबंध में पुराणों में बहुत ही विचित्र बाते बतलाई गई जो किसी को आश्चर्य में डाल देंगी। कौए का रहस्य :- 〰〰〰〰〰 कौए के संबंध में पुराणों बहुत ही विचित्र बाते बतलाई गई है मान्यता है की कौआ अतिथि आगमन का सूचक एवं पितरो का आश्रम स्थल माना जाता है। हमारे धर्म ग्रन्थ की एक कथा के अनुसार इस पक्षी ने देवताओ और राक्षसों के द्वारा समुद्र मंथन से प्राप्त अमृत का रस चख लिया था. यही कारण है की कौआ की कभी भी स्वाभाविक मृत्यु नहीं होती. यह पक्षी कभी किसी बिमारी अथवा अपने वृद्धा अवस्था के कारण मृत्यु को प्राप्त नहीं होता. इसकी मृत्यु आकस्मिक रूप से होती है। यह बहुत ही रोचक है की जिस दिन कौए की मृत्यु होती है उस दिन उसका साथी भोजन ग्रहण नहीं करता. ये आपने कभी ख्याल किया हो तो यह बात गौर देने वाली है की कौआ कभी भी अकेले में भोजन ग्रहण नहीं करता यह पक्षी किसी साथी के साथ मिलकर ही भोजन करता है। कौआ की लम्बाई करीब 20 इंच होता है, तथा यह गहरे काले रंग का पक्षी है. जिनमे नर और मादा दोनों एक समान ही दिखाई देते है. यह बगैर थके मिलो उड़ सकता है. कौए के बारे में पुराण में बतलाया गया है की किसी भविष्य में होने वाली घटनाओं का आभास पूर्व ही हो जाता है। पितरो का आश्रय स्थल :- श्राद्ध पक्ष में कौए का महत्व बहुत ही अधिक माना गया है . इस पक्ष में यदि कोई भी व्यक्ति कौआ को भोजन कराता है तो यह भोजन कौआ के माध्यम से उसके पीतर ग्रहण करते है. शास्त्रों में यह बात स्पष्ट बतलाई गई है की कोई भी क्षमतावान आत्मा कौए के शरीर में विचरण कर सकती है। भादौ महीने के 16 दिन कौआ हर घर की छत का मेहमान बनता है. ये 16 दिन श्राद्ध पक्ष के दिन माने जाते हैं. कौए एवं पीपल को पितृ प्रतीक माना जाता है. इन दिनों कौए को खाना खिलाकर एवं पीपल को पानी पिलाकर पितरों को तृप्त किया जाता है। कौवे से जुड़े शकुन और अपशकुन :- 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 1 . यदि आप शनिदेव को प्रसन्न करना चाहते हो कौआ को भोजन करना चाहिए 2 . यदि आपके मुंडेर पर कोई कौआ बोले तो मेहमान अवश्य आते है। 3 . यदि कौआ घर की उत्तर दिशा से बोले तो समझे जल्द ही आप पर लक्ष्मी की कृपा होने वाली है। 4 . पश्चिम दिशा से बोले तो घर में मेहमान आते है। 5 . पूर्व में बोले तो शुभ समाचार आता है। 6 . दक्षिण दिशा से बोले तो बुरा समाचार आता है। 7 . कौवे को भोजन कराने से अनिष्ट व शत्रु का नाश होता है। चीटियों का रहस्य :- 〰〰〰〰〰 चीटियों को हम एक बहुत तुच्छ एवं छोटा जानवर समझते है, परन्तु चीटियां बहुत ही मेहनती और एकता से रहने वाला जीव है. सामूहिक प्राणी होने के कारण चींटी सभी कार्यों को बांटकर करती है. विश्वभर में लगभग 14000 से अधिक प्रजाति की चीटियां है। चींटी के बारे में वैज्ञानिकों ने कई रहस्य उजागर किए हैं. चींटियां आपस में बातचीत करती हैं, वे नगर बनाती हैं और भंडारण की समुचित व्यवस्था करना जानती हैं. हमारे इंजीनियरों से कहीं ज्यादा बेहतर होती हैं ‍चींटियां. चींटियों का नेटवर्क दुनिया के अन्य नेटवर्क्स से कहीं बेहतर होता है. ये मिलकर एक पहाड़ को काटने की क्षमता रखती है। चींटियां शहर को स्वच्छ रखने में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं. चींटियां खुद के वजन से 100 गुना ज्यादा वजन उठा सकती हैं. मानव को चींटियों से बहुत कुछ सीखने की जरूरत है। चीटियों दो प्रकार की होती है लाल चीटियां एवं काली चीटियां. शास्त्रों के अनुसार लाल चीटियां को शुभ तथा काली चीटियों को अशुभ माना गाय है. दोनों ही तरह की चींटियों को आटा डालने की परंपरा प्राचीनकाल से ही विद्यमान है. चींटियों को शकर मिला आटा डालते रहने से व्यक्ति हर तरह के बंधन से मुक्त हो जाता है। हजारों चींटियों को प्रतिदिन भोजन देने से वे चींटियां उक्त व्यक्ति को पहचानकर उसके प्रति अच्छे भाव रखने लगती हैं और उसको वे दुआ देने लगती हैं. चींटियों की दुआ का असर आपको हर संकट से बचा सकता है। * यदि आप कर्ज से परेशान है तो चीटियों को शक़्कर और आता डाले. ऐसा करने पर कर्ज की समाप्ति जल्द हो जाती है। * जो प्रत्येक दिन चीटियों को आता देता है वह वैकुंठ धाम को प्रस्थान करता है। * यदि आप लाल चीटियों को मुंह में अंडे दबाए देखते हो यह भी शुभ माना जाता है तथा परिवार में सुख समृद्धि बढ़ती है।

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  • ⏰ *ज़रूरी अपडेट: डेली LRT3 लाइव अनुष्ठान के टाइम में बदलाव* प्रिय शिवयोगियों, “90 Days for Mahadav” का पहला फेज़ 15 अगस्त 2026 को इंडिया टाइम के हिसाब से शुरू हो रहा है, इसलिए कृपया डेली LRT3 अनुष्ठान के टाइम में एक ज़रूरी बदलाव पर ध्यान दें। *LRT3 लाइव का नया डेली टाइम — 15 अगस्त इंडिया टाइम से लागू* 🇮🇳 इंडिया: 6:30 AM IST 🇺🇸 USA: 6:00 PM PST | 9:00 PM EST (14 अगस्त से) ⚠️ कृपया ध्यान दें: LRT3 लाइव अब हर दिन 7:00 AM IST के बजाय 6:30 AM IST पर शुरू होगा। *_(30 मिनट पहले)_* यह बदलाव ‘90 Days for Mahadebate’ – Phase 1 को अकोमोडेट करने के लिए किया जा रहा है, जो LRT3 के तुरंत बाद शुरू होगा। *LRT3 के लिए रिप्ले टाइमिंग वही रहेगी।* भगवान आपका भला करे