tgindex
सत्संग से संजीवनी

सत्संग से संजीवनी

Статистика
@sss63хинди

सत्संग रुपी नौका में बैठकर विचारवान भक्त सहजता से भव सागर पार हो जाता है। *जो प्रेम गली में आया ही नहीं* *प्रितम का ठिकाना क्या जाने* *जिसने कभी प्रित लगाई नहीं* *वो प्रितम से मिलना क्या जाने* *❣️💓 !! श्री राधा !! 💓❣️*

Последний пост
23 февр.
Последнее чтение
15 авг.
Постов за неделю
0
Всего постов
20
Тип
открытый
Язык
хинди
В каталоге с
15 авг.
Подписчики
550
0 за 1 дн.
Сутки
0
0,00%
Неделя
 
Месяц
 
Просмотров на пост
110
20 постов
Вовлечённость
20,0%
к подписчикам
Постов в день
0,0
всего 20
Упоминаний
0
каналов
Охват размещения
оценка
1/24сутки в ленте
1/48двое суток
1/72трое суток

Оценка по просмотрам недавних постов: пост набирает почти всё за первые сутки.

Посты

  • राम ! राम !! राम !!! राम !!!! प्रवचन दिनांक 9 मार्च 2003 प्रातः 5:00 बजे। *’विषय - परमात्मा सब जगह परिपूर्ण है।* *परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी की वाणी बहुत विलक्षण है, दिव्य (परम वचन) है । श्री’ ’स्वामी जी महाराज जी की वाणी सुनने से हृदय में प्रकाश आता है, इसलिए’ ’प्रतिदिन जरूर सुननी चाहिए।* परम श्रद्धेय स्वामी जी महाराज जी कह रहे हैं कि जो परमात्मा की प्राप्ति चाहते हैं । इसका (परमात्मा का) निर्माण नया नहीं है। इसे बनाना नहीं है। ये पहले से ही है । वो परमात्मा सदा ही पूरे के पूरे हैं। जैसे नृसिंह भगवान् खंभे से प्रकट हुए तो पूरे के पूरे। पूरी शक्ति थी । कोई जाने चाहे न जाने, माने चाहे न माने, कोई स्वीकार करे चाहे न करे। भगवान् के इन बातों का फर्क नहीं है। मैं सब में समान रूप से परिपूर्ण हूं। सब प्राणियों में भी हूं। जैसे प्राणियों में हैं, ऐसे जड़ में भी हैं पूरे के पूरे । खंभे से निकल गए। जानने वाले कहते हैं कि परमात्मा की प्राप्ति में देरी का काम है ही नहीं। बेटा बाप की सब संपत्ति का अधिकारी है। तो भगवान् की पूरी संपत्ति सब के लिए। आप ध्यान नहीं देते। ध्यान दो । बाहर की सामग्री सब दुनिया के लिए है। संसार की चीज संसार को दे दो, योग हो जायेगा। अलग हो जाओ (शरीर को स्वरूप से अलग करना) तो ज्ञान योग हो गया। भगवान् के अर्पण करने से भक्ति योग हो गया । साधक होता है तो साध्य की प्राप्ति हो जाती है । साधक साध्य बिना नहीं रह सकता। और साध्य साधक बिना नहीं रह सकता। इस वास्ते वो हमारा है। ममैवांशो ....। अनादि काल से ये मेरा ही अंश है। जीव केवल मेरा ही अंश है । साक्षात् मेरा ही अंश है । हरदम साथ रहने वाला। संसार, धन, जमीन, कुटुंब चाहिए - ये बिल्कुल फालतू चीज। जो बाधा है, विघ्न है उसकी चाहना करते हैं। आप साक्षात् परमात्मा के अंश है। हो जैसे ही परमात्मा के अंश हो। स्थावर, जंगम सब भगवान् ही हैं। भगवान् के सिवाय कुछ नहीं हैं। भगवान् हैं पूरे के पूरे ।सर्व समर्थ परमात्मा हैं, उनके जैसा कोई है नहीं, हुआ नहीं, होगा ही नहीं, होना संभव ही नहीं । ये संसार रहेगा नहीं। इनके लिए रोना पड़ेगा। *सच्चे हृदय से भक्त जब सच्चा गाय है ।* *भक्त वत्सल कान में झट पहुंच ही जाय है ।* सांचे राचे राम। *ईश्वर अंश जीव अविनाशी।* *चेतन अमल सहज सुखराशि।।* साक्षात् परमात्मा का अंश है। ख्याल ही नहीं है। निहाल हो जाओगे। मान बड़ाई सत्कार पूरा प्राप्त नहीं कर सकता। पर परमात्मा की प्राप्ति कर सकता है। भगवान् प्राणी मात्र के सुहृदय हैं । इस वास्ते सब कामनाओं को छोड़कर भगवान् में लग जाय। प्रेम हो जाय तो बहुत जल्दी प्राप्त हो जाय। नाशवान का महत्व है ये ही बाधक है। सत्ता परमात्मा की ही है। सत् असत् मैं ही हूं। मेरे सिवाय कुछ है ही नहीं। कितनी सुगम, कितनी विलक्षण, उत्तम बात है। मेरे सिवाय कुछ नहीं है। भगवान् ने पूछा- तेरा मोह नष्ट हुआ कि नहीं ? तो कहा कि नष्ट हुआ, आपकी कृपा से । गीता की पढ़ाई से नहीं। मोह नष्ट हो गया। मोह नष्ट होते ही स्मृति हो गई। भगवान् की कृपा का सहारा ले लिया ।सबके लिए सुगम है। कितनी सुगम बात। भगवान् कहते हैं सबके लिए सुलभ है । भगवान् सुलभ हैं और महात्मा दुर्लभ हैं । मैं तो सब जगह हूं। कितनी बढ़िया बात हैं । गीता जैसा ग्रंथ कह रहा है कि वो दुर्लभ महात्मा बन जाय। जिस लाभ की प्राप्ति होने पर उससे बढ़कर लाभ मानने में आता ही नहीं ।वो सबके लिए सुलभ हैं ।जीव मात्र उनका अंश है । और किसी का अंश हमने सुना ही नहीं ।और किसी में योग्यता नहीं है । मनुष्य में योग्यता है । इस वास्ते भगवान् कहते हैं मैं उसके लिए सुलभ हूं। https://t.me/sss63 *हरि रीझे जग देत है, हरिजन हरि ही देत ।* इस वास्ते संतों ने कहा है आप दो नंबर हो, एक नंबर संत हैं। सबसे बढ़िया चीज मिली । मौज हो गई । परमात्मा के साथ नित्य युक्त हो जाय। जागे तब से सोवे तब तक । नित्य और निरंतर लगने वाले के लिए मैं सुलभ हूं। लोग चाहे पागल कहो । सिवाय भगवान् के है ही नहीं। वासुदेव: सर्वम् । नया कहां से आवे । वाह प्रभु वाह। खूब उत्साह से नृत्य करे। अरे ! क्या मिल गया। जो मिलना चाहे मिल गया। ऐसे भगवान् हमारे हैं। नारायण ! नारायण ! नारायण ! नारायण ! *सुखी व सम्पन्न जीवन के लिए ये टेलिग्राम चैनल जोईन करें व औरों से भी करवाएं और शेयर करते जाएं :* https://t.me/sss63 https://t.me/sss963 https://t.me/sss981 https://t.me/ashram999

  • राम ! राम !! राम !!! राम !!!! प्रवचन दिनांक 8 मार्च 2003 प्रातः 5:00 बजे। *’विषय - अपने विवेक का आदर करें ।’* *परम् श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी की वाणी बहुत विलक्षण है, दिव्य (परम वचन) है । श्री’ ’स्वामी जी महाराज जी की वाणी सुनने से हृदय में प्रकाश आता है, इसलिए’ ’प्रतिदिन जरूर सुननी चाहिए।* परम् श्रद्धेय स्वामी जी महाराज जी कह रहे हैं कि ये (जीव) परमात्मा का साक्षात अंश है । *ईश्वर अंश जीव अविनाशी ।* *चेतन अमल सहज सुखराशि ।।* स्वयं माया के वश हुआ है। पराधीन स्वयं हुआ है। स्वयं योग्य है, अधिकारी है, छोड़ सकता है। जैसे राजा मंत्री के वश हो जाता है । वास्तव में मंत्री के वश नहीं है। ये स्वयं नाशवान् के वश हो गया। संत महात्मा चेताते हैं । स्वयं चेतन हो । क्रिया और पदार्थ के वश मत हो। क्रिया की जगह विश्राम और पदार्थ की जगह भगवान्। कुछ नहीं करना। उस कुछ नहीं करना के लिए ही जप, ध्यान, स्वाध्याय, सत्संग करना है कि न करने की योग्यता आ जाय । जैसे मकड़ी जाल में फंस जाती है, ऐसे फंस गया। स्त्री है, पुत्र है, मां - भाई हैं । कैसे छोडूं ? छूटेगा पक्की बात है। छूटेगा तो फायदा नहीं होगा। कुटुंबी है, परिवार है, संसार है, ये दीखते हैं विस्तृत । पर तुम स्वयं जैसे हो वैसे (परिवार आदि) नहीं हैं। परिवार तो पहले नहीं था, पीछे नहीं रहेगा और वर्तमान में भी नाश की तरफ जा रहा है। जिसकी उत्पत्ति - विनाश होता है, जिसका संयोग - वियोग होता है, आती - जाती है, वो अपनी नहीं होती। धीरज से मोहित नहीं होता। मान लिया है, अपनी नहीं है । संत महात्मा की बात मान ले तो ठीक हो जाय । या अपने विवेक से देख ले तो ठीक हो जाय। विवेक का स्वयं आदर करे । (चेतन) अपने को मालिक नहीं समझता । इसलिए सत्संग की जरूरत है । भगवान् ने मनुष्य जन्म दिया तो उद्धार करने की सामग्री दी है। उद्धार की स्वतंत्रता है, योग्यता है, अधिकार है, सामर्थ्य है। अब इनको काम में न ले तो क्या करें । सत्संग से बहुत लाभ है। सत्संग करे तो निहाल हो जाय आनंद हो जाय। सदा के लिए आनंद हो जाय। "नहीं" "है" कैसे हो जाएगा । केवल उत्साह हो जाय। ऊंचा उठने के लिए भगवान् ने सब सामग्री दी है। पूरी सामग्री। भगवान् की दी हुई सामग्री को काम में लेवे तो कितनी उन्नति की बात है। साधन सामग्री खूब दी है। सबसे प्रमुख विवेक है, विवेक। विवेक को अपने काम में लाओ। भगवान् ने विवेक सबको दिया है। क्योंकि भगवान् ने कहा है - *सब मम प्रिय सब मम उपजाए।* *सब से अधिक मनुज मोहि भाए।।* संयोग जन्य सुख से वियोग का सुख श्रेष्ठ है। भगवान् की विलक्षण उद्धार की शक्ति है जो हमारे साथ है। भगवान् से प्रार्थना करो। समझ में नहीं आवे तो उनसे मांगो। संतों का अनुभव बहुत काम का है, कल्याण करने वाला है। हमारे किसी चीज की जरूरत नहीं है। मुझे कुछ नहीं चाहिए, किसी से संबंध नहीं हैं । भगवान् मेरा है। मेरा ख्याल करते हैं। गंगा जी सबके लिए है। ठंडा जल है। निर्मल है और खुला क्षेत्र है। और नया नया आता है। स्नान करो। नई नई वस्तु देते हैं भगवान्। अपना स्वरूप सबसे नया है, वो सबको देते हैं भगवान्। https://t.me/sss63 जैसे बेटे को बाप देता है तो बाप खुश होता है । ऐसे भगवान् देकर खुश होते हैं । अपना उद्धार खुद करे। इंद्रियों को नियंत्रण करता है तो आत्मा अपनी मित्र हो जाती है और अगर इंद्रियों में नियंत्रण नहीं हो तो आत्मा शत्रु हो जाती है। मौका बहुत बढ़िया आया हुआ है। कृपा है। हम भी पढ़े लिखे हैं । ग्रंथ हमारे सामने हैं। ऐसे भगवान् ने कृपा सब पर कर रखी है । समान रूप से । विवेक देते हैं । सबके सब स्वतंत्र हैं । एक बात है दूसरे का अहित नहीं करें। ये बहुत पतन का कारण है। न बुरा करना, न बुरा समझना, न बुरा चाहना । ये छोड़ देने से बुराई रहित हो जाते हैं तो असीम भलाई हो जाती है । एक ही बात है मौका है सावचेत हो जाओ। सब ठीक हो जायेगा। बेठीक सब ठीक हो जायेगा । नारायण ! नारायण ! नारायण ! नारायण ! *सुखी व सम्पन्न जीवन के लिए ये टेलिग्राम चैनल जोईन करें व औरों से भी करवाएं और शेयर करते जाएं :* https://t.me/sss63 https://t.me/sss963 https://t.me/sss981 https://t.me/ashram999

  • *सुखी व सम्पन्न जीवन के लिए ये टेलिग्राम चैनल जोईन करें व औरों से भी करवाएं और शेयर करते जाएं :* https://t.me/sss63 https://t.me/sss963 https://t.me/sss981 https://t.me/ashram999

  • राम ! राम !! राम !!! राम !!!! प्रवचन दिनांक 7 मार्च 2004 प्रातः 5:00 बजे। *’विषय - आप असंग हैं ।’* *परम् श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी की वाणी बहुत विलक्षण’ ’है, दिव्य (परम वचन) है । श्री स्वामी जी महाराज जी की वाणी’ ’सुनने से हृदय में प्रकाश आता है, इसलिए प्रतिदिन जरूर सुननी चाहिए ।’* परम श्रद्धेय स्वामी जी महाराज जी कह रहे हैं कि यह निश्चित है कि हम यहां के नहीं हैं । हम यहां आए हैं, हम यहां के नहीं हैं । यहां जो डेरा लगा दिया है - मेरा घर है, मेरा कुटुंब है । अमुक समाज का हूं । (परंतु) आप भगवान के हैं । जो पिता का घर है वही घर पुत्र का होता है । भगवान् सब जगह हैं । पर निर्लेप हैं । जैसे आकाश सब जगह होता हुआ कहीं लिप्त नहीं होता । ऐसे आत्मा सब जगह होता हुआ, लिप्त नहीं होता । ऐसे के पुत्र हो करके लिप्त हो जाते हो । आप यहां के नहीं हो, यह निश्चित समझो । *’ईश्वर अंश जीव अबिनाशी ।’* ’ *चेतन अमल सहज सुख राशि* ।।’ यह आपका स्वरूप है । सूर्य सब को प्रकाशित करता है । ऐसे एक क्षेत्रज्ञ सब क्षेत्रों को प्रकाशित करता है । जैसे एक सूर्य संपूर्ण ब्रह्मांड को प्रकाशित करता है, ऐसे आप हैं - सब क्षेत्रों को प्रकाशित करते हैं । आप ज्ञाता हैं, प्रकाशक हैं, निर्लिप्त हैं । सूर्य सबको प्रकाशित करता है, पर लिप्त नहीं होता । सूर्य के प्रकाश में वेद पाठ होता है और शिकार भी होता है, पर सूर्य लिप्त नहीं होता । अपने में कर्तृत्व भोक्तृत्व है ही नहीं । कर्तृत्व भोक्तृत्व का त्याग नहीं करना है, अपितु कर्तृत्व भोक्तृत्व को स्वीकार ही न करें । तो ठीक रहे । अध्यारोपित नहीं करना है । ’ *ईश्वर अंश जीव अबिनाशी ।’* ये दो हुए । ’चेतन अमल’ सहज सुख राशि ।। (तीन ये, ऐसे ये पांच हो गए) । इसमें आरोप नहीं है । सहज सुख राशि है । स्वाभाविक सुख राशि होने से किसी भी प्राणी को दु:ख सुहाता नहीं है । दु:ख में लिप्त नहीं होना चाहता; क्योंकि सहज सुख राशि है । अनुभव करो । अनुभव कैसे हो ? ’शरीर मैं नहीं हूं । शरीर मेरा नहीं है । और शरीर मेरे लिए भी नहीं’ ’है’ । शरीर संसार के लिए है । जब शरीर मैं, मेरा नहीं है तो धन-संपत्ति, जमीन, जायदाद, घर, मकान, रुपया आपके लिए कैसे होगा ? यह जनता के लिए है । इससे दूसरों की सेवा करनी है । इसी को कर्म योग कहते हैं । है ही सेवा के लिए, संसार के लिए है । संसार की चीज है, संसार के लिए है । उनके लिए है । आप उसके (परमात्मा के) अंश हो । अपने तो भगवान् हैं । इस वास्ते भगवान् अपने लिए है। संसार सेवा के लिए है तो हो गया - कर्मयोग । इससे अलग हो जाए तो हो गया - ज्ञानयोग और जिसका है उसके शरण हो गए - यह हो गया भक्तियोग । खास हैं भगवान् । https://t.me/sss63 ’ *ईश्वर अंश जीव अबिनाशी ।’* *’चेतन अमल सहज सुख राशि* ।।’ यह स्वीकार कर लेना चाहिए । सत्ता मात्र आपका स्वभाव है । भगवान् सद्घन, चिद्घन, आनंदघन है । घन मानो ठोस । इसमें कुछ भी प्रवेश नहीं कर सकता । पदार्थ दीखता है, वास्तव में पदार्थ है ही नहीं, क्रिया है । पराश्रय और परिश्रम - अपने लिए नहीं है । कोई क्रिया नहीं । अर्पण कर दे तो परम विश्राम । भगवान् के शरण हो गए है । हैं ही उसके । परमात्मा के अंश हैं । चिन्मय सत्ता स्वरूप हैं । बहुत विलक्षण, सच्ची, पक्की सिद्धांत की बात है । स्थिरता है, समाधि है यह कारण शरीर की है । ’बहुत विशेष ध्यान देने की बात है कि समाधि भी अपने लिए’ ’नहीं’ ’है’ । परम विश्राम आप का स्वरूप है । (तुलसीदास जी कहते हैं) उभय प्रबोधक चतुर दुभाषी । मानो निर्गुण का भी ज्ञान हो जाए । सगुण का भी ज्ञान हो जाए । नाम (जप) में शक्ति है कि भगवान् के स्वरूप का ज्ञान हो जाए और अपने स्वरूप का भी ज्ञान हो जाए । यह दोनों को जनाने वाला है । सगुण और निर्गुण दोनों का ज्ञान कराने वाला है । यह चतुर दुभाषी है । दुभाषिया तो एक एक को, एक एक की भाषा समझाता है । यह तो दोनों सगुण और निर्गुण का ज्ञान करा देता है । सब पर मोरी बराबरी दाया । शत्रु, मित्र, उदासीन सब पर मेरी बराबरी दाया । उनकी प्राप्ति के लिए ही मनुष्य शरीर दिया है । कृपा करके बीच में मनुष्य शरीर दिया है । तो असंग हो जाए । गुणों का संग ही जन्म मरण में हेतु है । इस वास्ते असंग हो जाए । संतों का संग करो । जिन्होंने त्याग कर दिया है, उनका संग करो । आपका स्वरूप स्वत: असंग है । स्वरूप स्वाभाविक असंग है । है असंग पर गुणों के संग के कारण शरीर मिला है । जन्म मरण होता है (गुणों के संग से) । आपका स्वरूप असंग है । अनेक योनियों में जाते हुए भी असंग है । शरीरस्थोsपि .... । कर्ता भोक्ता नहीं है । 18 वें अध्याय का 17 वां श्लोक बहुत बढ़िया श्लोक है । ’ *यस्य नाहंकृतो भावो ..... ।’*

  • *बुरे समय का मुकाबला मनुष्य कर सकता है।* *वह अपना पथ खुद निर्माण कर सकता है।* *दुख में से सुख खोज सकता है और अपने जीवन में नरक तुल्य दिखाई देने वाली वेदनाओं से मुक्ति प्राप्त कर सकता है।* *तीन चौथाई दुख तो उसके अपने पैदा किये हुए होते है।* *अपने को ठीक जगह पर खड़ा कर दिया जाय तो अधिकाँश दुखों से अपने आप छुटकारा मिल जाता है।* *कुछ समय ऐसा भी होता हैं, जो संसार क्रम के साथ सम्बन्धित हैं, उनको सहन करने की शक्ति विवेक द्वारा प्राप्त हो सकती है।* *इस प्रकार अपने को विवेकपूर्वक ठीक स्थिति पर रख कर हम संसार के समस्त दुखों से छुटकारा पा सकते हैं।* https://t.me/sss63 *यही आध्यात्म पथ है। बाहरी परिस्थितियाँ आदमी को सुख या दुःख नहीं दे सकतीं।* *यदि ऐसा होता तो समस्त धनी सुखी और सब गरीब दुःखी हुए होते, परन्तु वास्तव में बात इससे उल्टी है।* *निकट से परीक्षा करने पर अधिकाँश गरीब सुखी और अधिकाँश धनी दुखी मिलेंगे।* *सुखी व सम्पन्न जीवन के लिए ये टेलिग्राम चैनल जोईन करें व औरों से भी करवाएं और शेयर करते जाएं :* https://t.me/sss63 https://t.me/sss963 https://t.me/sss981 https://t.me/ashram999

  • राम ! राम !! राम !!! राम !!!! प्रवचन दिनांक 6 मार्च 2004 प्रातः 5:00 बजे। *’विषय - नहीं और है ।’* *परम् श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी की वाणी बहुत विलक्षण है, दिव्य (परम वचन) है । श्री स्वामी जी महाराज जी की वाणी सुनने से हृदय में प्रकाश आता है, इसलिए प्रतिदिन जरूर सुननी चाहिए।* परम् श्रद्धेय स्वामी जी महाराज जी कह रहे हैं कि बड़ी सीधी सी बात है । अपना वास्तव में संबंध खास करके भगवान् के साथ है । संसार के साथ संबंध नहीं है । सही बात है, सही । ठीक बात को मान ले, ठीक हो जाएगा । यह स्वाभाविक है, स्वत:, स्वत:; क्योंकि - *’ईश्वर अंश जीव अबिनाशी ।’* हमारे पिता का घर है । यहां मुसाफिरी में आए हैं हम । यह (संसार) निरंतर बदलता है । प्रत्यक्ष है । न बालकपना रहता है, न जवानी रहती है, न वृद्धावस्था रहती है । न रोग रहता है, न नीरोगता रहती है । और आप वही रहते हो । धनी अवस्था में, निर्धन अवस्था में, रोगी में, निरोगता में - हम तो वही रहते हैं । हम और भगवान् कभी बदलते ही नहीं । संसार हमारा साथी नहीं है, प्रत्यक्ष बात है । शरीर बालक था, जवान हुआ, बुड्ढा हो जाता है । यह बदलता ही है । गांव बदल गए, शहर बदल गए । हम जिसके साथ हैं, वह परमात्मा हैं । 84 लाख योनियों में जाते हैं तो भी भगवान् तो साथ में है । और 84 लाख शरीर कोई साथ रहने वाला नहीं है । और भगवान् साथ छोड़ने वाले नहीं हैं । एक बार दृढ़ता पूर्वक मान लिया, मान लिया, मान ही लिया । हम भगवान् के हैं । जैसे आपकी कन्या ससुराल को स्वीकार कर लेती है और पीहर का त्याग कर देती है । आपकी कन्या के पति साथ नहीं था, पर मान लिया । (और) हम भगवान् के साथ हैं । लड़की भी पति को, जो साथ नहीं रहता, मान लेती है । (जबकि) हम तो भगवान् के हैं । अवस्था बदलती है । बालक पना बदला, जवानी बदली, पर भगवान् कभी बदलते नहीं । जो कभी होता है, कभी नहीं होता - वह हमारा नहीं होता । भगवान् कभी बदलते ही नहीं, नियम है । और संसार बदलेगा ही । ‘ नहीं’ रहेगा उसको अपना मान लिया और जो ‘ है’ उसको अपना नहीं माना । इतनी सुगम बात है । इतनी सरल बात है । इस वास्ते सच्ची बात को स्वीकार कर लो । इसमें अभ्यास नहीं है । भगवान् बदलने वाले नहीं हैं । और संसार बदलेगा । बालक अवस्था हुई, जवान अवस्था हुई, वृद्धावस्था हुई - यह बदलते हैं । जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति भी बदलते हैं । समाधि अवस्था तक बदलते हैं । मूर्च्छा भी बदलती है । जो साथ में नहीं रहती, वह हमारी नहीं है और जो साथ रहता है, वह हमारा है । भगवान् अपना है । संसार अपना नहीं है, नहीं है, नहीं है । ‘ है’ है है वह अपना है, पक्का । एकदम स्वीकार कर ले, बस । स्वीकार कर लिया तो बढ़िया बात है । हम भगवान् के हैं । भगवान् हमारे हैं । शरीर और संसार हमारा नहीं है । भगवान् और आप हैं । शरीर और संसार नहीं है । यह रहने वाला नहीं है । रहने वाला है, रहने वाला ही है । नहीं रहने वाला, नहीं रहने वाला ही है । ऐसी बात मान ले बस । https://t.me/sss63 आप का स्वरूप असंग है । हम हैं और संसार नहीं है, इतनी ही तो बात है । ’ *नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत: ।’* असत् की सत्ता नहीं है और सत् का अभाव नहीं होता । एक बात और विलक्षण है । नाम जप है । नाम जप का उद्देश्य है, वह बदलने वाला नहीं है । क्रिया बदलने वाली है । उद्देश्य में थकावट नहीं होती है । वह पुराना नहीं होता है । सगुण उपासना हो, निर्गुण उपासना हो - सबके लिए नाम जप बढ़िया है । तुलसीदास जी ने भगवान् के लिए कहा है - चतुर दुभाषी है । नाम जप करो । नाम जप, कीर्तन में प्रेम हो जाए तो ठीक हो जाएगा । सुगम उपाय है । सरल उपाय है और हम सब के सब कर सकते हैं । कैसी बढ़िया बात है । संत महात्माओं ने ऐसी बातें बताई हैं । पढ़ा लिखा, अनपढ़ सब समझ सकते हैं । नारायण ! नारायण !!नारायण !!! नारायण !!!! *सुखी व सम्पन्न जीवन के लिए ये टेलिग्राम चैनल जोईन करें व औरों से भी करवाएं और शेयर करते जाएं :* https://t.me/sss63 https://t.me/sss963 https://t.me/sss981 https://t.me/ashram999

  • https://t.me/sss63

  • *श्रीराम जी के विभिन्न प्रकार के धनुष :* प्रायः जनमानस श्रीराम के एक ही धनुष के बारे में जानते हैं, जिसका नाम 'कोदंड' था। वास्तव में श्रीराम ने जीवन में तीन धनुषों का प्रयोग किया। 1) कोदंड:- इसका सामान्य अर्थ होता है बाँस। अब यह तो तय है कि राम के जिस असाधारण भारी धनुष, जिसके बारे में उल्लेख मिलता है कि उससे छूटे बाण ने ताड़ के वृक्षों को भेद दिया था, सामान्य एक बाँस का बना तो नहीं होगा। हां, यह निश्चित है कि लचीलापन देने के लिए विशेष प्रकार के बाँस की खपच्चियों का प्रयोग अवश्य किया गया होगा लेकिन बिना धातुओं टुकड़ों के प्रयोग के बिना उसका इतना भारी व कठोर होना संभव नहीं। https://t.me/sss63 ऐसा प्रतीत होता है कि इस धनुष का निर्माण श्रीराम ने वनवास की अवधि या अयोध्या में वनगमन से पूर्व किया था। तीन नम्बर का चित्र कोदंड का प्रतीकात्मक रूप है। 2)शार्ङ्ग :- इसका सामान्य अर्थ है 'सींग'। प्रागैतिहासिक काल से ही हिरनों के सीधे सींगों का भाले की नोंक के रूप में और मुड़े सींगों का धनुष बनाने के लिए उपयोग होता रहा था। कालांतर में जब आर्यों का प्रिय अस्त्र धनुष बन गया तो सींगों का धनुषों में प्रयोग परिष्कृत रूप में होने लगा, यहाँ तक कि हाथीदांत का प्रयोग भी शक्तिशाली धनुषों के बनाने में हुआ। श्रीराम इस धनुष का प्रयोग संभवतः राजकीय अवसरों पर करते थे। नजदीकी युद्ध में छोटे छोटे 'वैतस्तिक' बाणों के प्रयोग के लिए भी इसमें छोटी धनुरी जुड़ी रहती थी ताकि नजदीक आ गए शत्रु सैनिकों पर फुर्ती से छोटे बाण बरसाए जा सकते थे। यद्यपि उल्लेख तो नहीं है लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि विष्णु का यह धनुष श्रीराम को महर्षि विश्वामित्र द्वारा दिया गया था। दो नंबर का चित्र इसी धनुष का प्रतीकात्मक रूप है। 3) वैष्णव:- यह वह धनुष है जिसका प्रयोग श्रीराम ने रावण से अंतिम युद्ध के समय किया। स्पष्टतः यह उस युग का आधुनिकतम धनुष था जिसे महर्षि अगस्त्य ने श्रीराम को प्रदान किया था। https://t.me/sss63 प्रत्यंचा :- श्रीराम के धनुषों की प्रत्यंचा भी अत्यंत विशिष्ट प्रकार की थी जो धनुषों के एक सिरे पर एक से ज्यादा लिपटी रहती थीं ताकि प्रत्यंचा के कटने पर दूसरी तुरंत चढ़ाई जा सके। पूरे योद्धा जीवन में उनकी प्रत्यंचा केवल दो बार कटी थी। इतनी मजबूती का कारण यह था कि प्रत्यंचा भैंसे की ताजी आंत में मूँज के धागे भर दिये जाते थे और आँत के सूखने पर न केवल जबरदस्त लचीली होती थी बल्कि अटूट भी होती थी। यह जरूरी भी था क्योंकि श्रीराम की भुजाएं बहुत लंबी थीं और वह छः फीट के धनुष पर प्रत्यंचा को बहुत पीछे तक तानते थे। बाण के वेग का अंदाजा आप स्वयं लगा सकते हैं। बाण :- 1)नाराच:- यह अन्य धनुर्धारियों की तरह श्रीराम का प्रिय बाण था। चार नंबर पर है। 2)अर्धचंद्र:- यह बड़े लक्ष्य और गर्दन को उड़ाने के लिए प्रयुक्त करते थे। 3)क्षुरप्र:- चपटी धार का बाण। गर्दन के बगल से निकला और श्वासनली का.. आपको पता ही नहीं लगेगा कि आत्मा कब शरीर छोड़ गई। 4)वैतस्तिक:- 'बित्ते' भर के बाण। यह नजदीकी युद्ध में उपयोगी होते थे जो धनुष पर ही लगी छोटी धनुरी या कमान से छोड़े जाते हैं। महाभारत काल में द्रोण, कृष्ण, प्रद्युम्न और अर्जुन के पास इन बाणों का संग्रह था। धृष्टद्युम्न के भयंकर आक्रमण से द्रोण इन्हीं बाणों से बच पाये थे। https://t.me/sss63 5) बिना फल के बाण :- इनका निर्माण प्रायः अघातक चोट व चेतावनी के लिए किया गया परंतु कुशल धनुर्धर के हाथों में यह भी जानलेवा सिद्ध होते थे। भरत के पास भी ऐसे बाणों का जिक्र मिलता है जो उनके अहिंसक व साधु स्वभाव के अनुरूप स्वाभाविक था। महाभारत काल मे अभिमन्यु ने ऐसे ही बाण से एक राजा बसातीय का वध कर दिया था।

  • *संसार मेरे काम आ जाय, मेरा स्वार्थ सिद्ध हो जाय— यह इच्छा पतन करने वाली है; और मेरे द्वारा किसी का हित हो जाय, मैं किसी के काम आ जाऊँ— यह इच्छा उत्थान करने वाली है।* *जो सच्चे हृदय से भगवान् में लग जाता है, वह उदार हो जाता है, फिर उसमें भोग-संग्रह, मान-प्रतिष्ठा, नाशवान् प्राणी-पदार्थों की इच्छा-ममता नहीं रहती है; उसके द्वारा फिर स्वाभाविक ही संसार का हित होता है।* *भगवान् के भक्त चार तरह के होते हैं— अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी। भगवान् ने इन चारों तरह के भक्तों को उदार कहा है, ये चारों तरह के भक्त सच्चे हृदय से भगवान् की तरफ ही लग गये, इसलिए ये उदार हैं। फिर इनमें कृपणता, संग्रह की इच्छा, मान-बड़ाई, भोगों की इच्छा नहीं रहती, इनमें उत्पत्ति-विनाशशील पदार्थों से सुख लेने की इच्छा नहीं रहती, इसलिए भगवान् ने इनको उदार कहा है।* https://t.me/sss63 *अर्थार्थी भक्त धन तो चाहता है, लेकिन धन वह भगवान् से ही चाहता है। वह धन के लिए छल, कपट, झूठ का सहारा नहीं लेता है, इसलिए भगवान् ने उसे भी उदार कहा है। भक्त की भगवान् में अनन्यता रहती है, जैसे छोटा बच्चा कुछ भी चाहता है तो अपनी माँ से ही चाहता है, दूसरों से नहीं चाहता है, ऐसे ही भक्त केवल भगवान् से ही चाहता है।* *मनुष्य के ज्यों-ज्यों धन बढ़ता है, वैसे-वैसे उसके धन का लोभ बढ़ता है। संसार के सामने तो वह अपने को सुखी प्रदर्शित करता है, लेकिन उसके मन में सदा रुपयों का लोभ रहता है, दरिद्रता रहती है; जिससे उसके हृदय में जलन होती रहती है। 'जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई।' परोपकार के लिए जो धन रखता है, वह उस धन को अपना नहीं समझता है, तभी उदार हो सकता है— एक कहावत है 'उदार के धन नहीं और शूरवीर के सिर नहीं।' जैसा संसार का हित भगवान् के भक्तों द्वारा होता है, वैसा हित धनियों के द्वारा हो सकता ही नहीं।* *जो गृहस्थ निर्वाह-मात्र के रुपयों और पदार्थों को ही अपना मानता है, शेष सामग्री को संसार की (परोपकार के लिए) ही मानता है, ऐसा मनुष्य गृहस्थ में रहते हुए भी संन्यासी की पदवी को प्राप्त कर लेता है, लेकिन जो निर्वाह से अधिक धन और पदार्थों को अपना मानता है, श्रीनारदजी ‍(श्रीमद्भागवतम् 7/14/8 में) कहते हैं कि वह चोर है और जो दण्ड चोर को मिलता है, वही दण्ड उसे मिलना चाहिए।* *सुखी व सम्पन्न जीवन के लिए ये टेलिग्राम चैनल जोईन करें व औरों से भी करवाएं और शेयर करते जाएं :* https://t.me/sss63 https://t.me/sss963 https://t.me/sss981 https://t.me/ashram999

  • अतः जीवन को सुधारने का प्रयत्न युवावस्था से ही करना चाहिए ।। *सुखी व सम्पन्न जीवन के लिए ये टेलिग्राम चैनल जोईन करें व औरों से भी करवाएं और शेयर करते जाएं :* https://t.me/sss63 https://t.me/sss963 https://t.me/sss981 https://t.me/ashram999

  • *रामायण मानव के लिए परम् आवश्यक :* *वाल्मीकि रामायण में मनुष्य के लिए उन्नति- सूचक सोपान- सप्तक :* महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित जीवनधर्मी महाकाव्य रामायण के मूल सातों काण्ड, मानव जीवन की उन्नति के सातों सोपान माना जाता है और यह मान्यता, वार्त्ता के रूप में रामायण की अन्तःस्वर भी है।। 1. बालकाण्ड : ------------------ बालक प्रभु को प्रिय है। क्योंकि उस में छल, कपट नहीं होता है। विद्या, धन एवं प्रतिष्ठा बढने पर भी जो बालक बड़ा होकर, अपना हृदय को निर्दोष- निर्विकारी बनाये रखता है, उसी को भगवान प्राप्त होते है। इसलिए कोई भी बालक जैसा निर्दोष- निर्विकारी दृष्टि रखने पर ही राम के स्वरुप को पहचान सकता है। जीवन में सरलता का आगमन, संयम एवं ब्रह्मचर्य से होता है। एक बालक की भांति अपने मान- अपमान को भूलने से जीवन में सरलता आती है। बालक के समान निर्मोही एवं निर्विकारी बनने पर शरीर अयोध्या बन जाता है। जंहा युद्ध, वैर, ईर्ष्या नहीं होती, वही स्थान ही अयोध्या है।। 2. अयोध्याकाण्ड : ----------------------- यह काण्ड मनुष्य को निर्विकार बनाता है। जीव जब भक्ति अर्थात प्रेमरुपी सरयू नदी के तट पर हमेशा निवास करता है, तभी निर्विकारी बनता है। अयोध्याकाण्ड प्रेम प्रदान करता है। राम का भरत प्रेम , राम का सौतेली माता से प्रेम आदि सब इसी काण्ड में है। राम की निर्विकारिता इसी में दिखाई देती है। अयोध्याकाण्ड का पाठ करने से परिवार में प्रेम बढता है और उसके घर में लडाई झगडे नहीं होते। उसका घर अयोध्या बनता है। कलह का मूल कारण धन एवं प्रतिष्ठा है। अयोध्या- काण्ड का फल निर्वैरता है। सब से पहले अपने घर की ही सभी प्राणियों में भगवद् भाव रखना चाहिए।। 3. अरण्यकाण्ड : --------------------- यह कांड निर्वासन को सूचित करता है। इसका मनन करने से वासना नष्ट होगी। बिना अरण्यवास (जंगल) के जीवन में दिव्यता नहीं आती। रामचन्द्र राजा होकर भी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ वनवास किया। वनवास मनुष्य हृदय को कोमल बनाता है। तप द्वारा ही कामरुपी रावण का बध होगा । इस में सूपर्णखा (मोह ) एवं शबरी (भक्ति) दोनो ही है। भगवान राम सन्देश देते हैं कि मोह को त्यागकर भक्ति को अपनाओ।। https://t.me/sss63 4. किष्किन्धाकाण्ड : -------------------------- जब मनुष्य निर्विकार एवं निर्वैर होगा, तभी उनकी ईश्वर से मैत्री होगी। इसमे सुग्रीव और राम अर्थात् जीव और ईश्वर की मैत्री का वर्णन है। जब जीव सुग्रीव की भांति हनुमान अर्थात् ब्रह्मचर्य का आश्रय लेगा, तभी उसे राम मिलेंगे। जिसका कण्ठ सुन्दर है, वही सुग्रीव है।कण्ठ की शोभा आभूषण से नहीं, बल्कि राम- नाम का जप करने से है। जिसका कण्ठ सुन्दर है, उसी की मित्रता राम से होती है किन्तु उसे हनुमान यानी ब्रह्मचर्य की सहायता लेनी पडेगी।। 5. सुन्दरकाण्ड : -------------------- जब जीव की मैत्री राम से हो जाती है, तब वह सुन्दर हो जाता है। इस काण्ड में हनुमान को सीता के दर्शन होते है। सीता जी पराभक्ति है। जिसका जीवन सुन्दर होता है, उसे ही पराभक्ति के दर्शन होते है। संसार समुद्र पार करने वाले को पराभक्ति सीता के दर्शन होते है। ब्रह्मचर्य एवं राम- नाम का आश्रय लेने वाला संसार सागर को पार करता है। संसार सागर को पार करते समय मार्ग में सुरसा बाधा डालने आ जाती है। ऐसे अच्छे रस ही सुरसा हो जाती है। नये- नये रस की वासना रखने वाली जीभ ही सुरसा है। संसार सागर पार करने की कामना रखने वाले को जीभ को वश में रखना होगा। जंहा पराभक्ति सीता है, वंहा शोक नही रहता। जंहा सीता है, वंहा शोक रहित अशोकवन है।। 6. लंकाकाण्ड : ------------------- जीवन भक्तिपूर्ण होने पर राक्षसों का संहार होता है। काम, क्रोधादि ही राक्षस है। जो इन्हें मार सकता है ,वही काल को भी मार सकता है। जिसे काम मारता है, उसे काल भी मारता है। लंका शब्द के अक्षरों को इधर- उधर करने पर होगा कालं। काल सभी को मारता है किन्तु हनुमान जी काल को भी मार देते हैं। क्योंकि वे ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले और इस कारण से पराभक्ति का दर्शन करते है।। 7. उत्तरकाण्ड : ------------------- इस काण्ड में काकभुसुण्डि एवं गरुड- संवाद को बार- बार पढना चाहिए। इस में सब कुछ है। जब तक राक्षस रूपी काल का विनाश नहीं होगा, तब तक उत्तरकाण्ड में प्रवेश नही मिलेगा। इस में भक्ति की कथा है। भक्त वही है, जो भगवान से एक क्षण भी अलग नही हो सकता। पूर्वार्ध में जो काम रुपी रावण को मारता है, उसी का उत्तरकाण्ड सुन्दर बनता है। वृद्धावस्था में वही राज्य करता है। जब जीवन के पूर्वार्ध अर्थात युवावस्था में काम को मारने का प्रयत्न होगा, तभी उत्तरार्ध तथा उत्तरकाण्ड सुधर पायेगा।

  • *🕉️सब वस्तुएँ प्राणियोंकी सेवाके लिये* *याद रखो—* धन-सम्पत्ति तथा सुख-सुविधाके द्वारा किसी प्राणीकी सेवा करके कभी अभिमान न करो, न यह समझो मैंने उस गरीबपर दया की है। यही समझो कि मैंने उसका हक ही उसे दिया है। और भगवान् के कृतज्ञ बनो जो उनकी कृपासे तुम्हारे हृदयमें ऐसी सद्बुद्धि उत्पन्न हुई और तुम्हें अवसर मिला। किसीकी सेवा करके उसपर अहसान न करो, न बदला चाहो और न उसका भगवान् से ही कोई लौकिक या पारलौकिक फल चाहो। https://t.me/sss63 ऐसा करोगे तो तुमपर भगवान् की कृपासुधा बरस पड़ेगी, जो तुम्हें परम कल्याणका भागी बना देगी। *- परम पूज्य "भाईजी” श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार* *सुखी व सम्पन्न जीवन के लिए ये टेलिग्राम चैनल जोईन करें व औरों से भी करवाएं और शेयर करते जाएं :* https://t.me/sss63 https://t.me/sss963 https://t.me/sss981 https://t.me/ashram999

  • राम।।🍁 🍁 *विचार संजीवनी* 🍁 *..एक ही विचार रखो..* *आप अपनी करनी की तरफ मत देखो, अपने पापों की तरफ मत देखो, केवल भगवान् की तरफ देखो।* जैसे विदुरानी भगवान् को छिलका देती हैं तो भगवान् छिलका ही खाते हैं। छिलका खाने में भगवान् को जो आनन्द आता है, वैसा आनन्द गिरी खाने में नहीं आता। कारण कि विदुरानी के मन में यह भाव है कि भगवान् मेरे हैं। जैसे बच्चे को भूखा देखकर माँ जिस भाव से उसको खिलाती है, उससे भी विशेष भाव विदुरानी में है। https://t.me/sss63 ऐसे ही आप भगवान् को अपना मान लो। जीने-मरने आदि किसी की भी परवाह मत करो। किसी से डरो मत। किसी की भी गर्ज करने की जरूरत नहीं है। बस, एक ही विचार रखो कि *'मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई'।* अगर यह विचार कर लोगे तो निहाल हो जाओगे। परन्तु बहुत धन कमा लो, बहुत सैर-शौक़ीनी कर लो, बहुत मान-बड़ाई प्राप्त कर लो तो यह सब कुछ काम नहीं आयेगा। *राम ! राम !! राम !!!* परम् श्रद्धेय स्वामी जी श्रीरामसुखदास जी महाराज *साधन-सुधा-निधि* पृष्ठ १६४ *सुखी व सम्पन्न जीवन के लिए ये टेलिग्राम चैनल जोईन करें व औरों से भी करवाएं और शेयर करते जाएं :* https://t.me/sss63 https://t.me/sss963 https://t.me/sss981 https://t.me/ashram999

  • ॥ श्रीहरिः शरणम् ॥ *प्रश्न-लोभ कैसे दूर हो ?* *उत्तर - लोभ अकेला नहीं आता, मोह के साथ ही आता है। फिर काम भी आता है, और क्रोध भी। कोई दोष अकेला नहीं आता। समस्त दोषों का मूल है-भूल। परिणाम है- जड़ता, पराधीनता। अपने ज्ञान का अनादर करना ही मूल भूल है।* *प्रश्न-मोह-निवृत्ति का उपाय बताइए।* *उत्तर-मोह-निवृत्ति कई प्रकार से होती है-* *1. आस्था के आधार पर केवल प्रभु मेरे अपने हैं।* *2. ज्ञान के आधार पर आसक्ति छोड़ने से।* *3. सेवा के आधार पर सेवा करें, कुछ न चाहें :* *प्रश्न-शारीरिक कष्ट पापों के परिणाम हैं क्या ? सुना है भगवान् का नाम लेने से पाप नाश होते हैं?* *उत्तर- शारीरिक कष्ट पापों का फल नहीं है। वह इसलिए कि अगर पाप का फल होता, तो कोई तो पुण्यात्मा ऐसा होता, जिसे शारीरिक कष्ट नहीं होता। नाम की महिमा तो भक्ति में प्रगाढ़ता लाने के लिए है। नाम प्यारा लगना चाहिए।* *प्रश्न-जीवन में भय क्यों होता है?* *उत्तर-जीवन में तीन प्रकार का भय होता है-* *1. वियोग का भय । इस भय का कारण व्यक्ति-मोह है। जो वास्तव में अपना है उसे अगर अपना करके अनुभव कर लेते हैं, तो वियोग का भय नहीं होता ।* *2. हानि का भय। इस भय का कारण वस्तु की ममता है। जो अपनी नहीं है, उसे अपनी मान लिया है।* https://t.me/sss63 *3. अपमान का भय। इस भय का कारण देह-अभिमान है। शरीर को बनाए रखना पसन्द करते हैं, जो कभी रहने वाला नहीं है। हमें देह से मोह हो गया है।* *प्रश्न-व्यर्थ-चिन्तन और सार्थक चिन्तन क्या है?* *उत्तर-अनित्य का चिन्तन व्यर्थ चिन्तन और नित्य का चिन्तन सार्थक चिन्तन । वस्तु-व्यक्ति का चिन्तन व्यर्थ चिन्तन और आत्मा-परमात्मा का चिन्तन सार्थक चिन्तन।* *प्रश्न-सम्मान के सुख से नुकसान क्या है?* *उत्तर-सम्मान का सुख इतना भयंकर विष है कि विष खाने से तो मनुष्य एक ही बार मरता है, परन्तु सम्मान का सुख भोगने से कई बार जीना-मरना पड़ता है।* *प्रश्न-बुराई क्या है?* *उत्तर-हमारे स्वाधीन होने में जो बाधक होवे, हमारे उदार होने में जो बाधा डाले, वही बुराई है।* *प्रश्न-बन्धन क्या है और कैसे टूटे ?* *उत्तर-लेना बन्धन है। लेना बन्द करके, देना दे डालने पर बन्धन जैसी चीज रह ही नहीं जाती।* –पूज्यपाद स्वामी श्री शरणानंद जी महाराज –‘प्रश्नोत्तरी संतवाणी’ मानव सेवा संघ वृन्दावन की पुस्तक से साभार सुखी व सम्पन्न जीवन के लिए ये टेलिग्राम चैनल जोईन करें व औरों से भी करवाएं और शेयर करते जाएं :* https://t.me/sss63 https://t.me/sss963 https://t.me/sss981 https://t.me/ashram999

  • *संतवाणी* *श्रद्धेय स्वामीजी श्रीशरणानन्दजी महाराज :* _(‘जीवन-पथ’ पुस्तक से)_ अगर मुझसे कहा गया होता कि तुम इस प्रकार के ईश्‍वर का चिन्तन करो तो शायद मैं तर्क करता। मुझसे यह नहीं कहा गया कि इस प्रकार के ईश्‍वर का चिन्तन करो। मुझसे तो यह कहा गया कि जिस प्रकार के ईश्‍वर को मानते हो, उसके तुम शरणागत हो जाओ। कितना अच्छा होता कि मुझको उस समय कह दिया होता कि तुम उसके शरणागत हो गए। मैं समझता हूँ कि तब मैं गुरु परम्परा को इतने जोर से पकड़ता कि कभी छोड़ नहीं सकता था। पर *गुरु तो वह होता है, जो गुरु बनकर नहीं आता, दोस्त बनकर आता है, सुहृद बनकर आता है, अपना होकर आता है। वही वास्तव में गुरु होता है।* तो उन्होंने कहा कि भैया ! तुम उनके शरणागत हो जाओ। चलते-फिरते, उठते-बैठते स्वतः चिन्तन जाग्रत होगा, किसी आकृतिको लेकर नहीं, किसी नामको लेकर नहीं। अब आप सोच सकते हैं कि वह चिन्तन क्या होगा ! उस समय मुझको यह कहते कि तुम नाम क्यों नहीं लेते हो, तो मालूम है उत्तर क्या देता ? नाम तो वे लेते हैं, जो दूर मानते हैं। माफ कीजिए ! मैं नाम का विरोध नहीं करता हूँ । नाम के प्रेमी को चोट न लगे। आत्मीयता की बात कहने के लिए भूमिका बना रहा हूँ। https://t.me/sss63 मैं नाम का विरोधी नहीं हूँ। आप जितनी श्रद्धा रखते होगें उतनी तो रखता ही हूँ, उससे कुछ और ज्यादा ही मान लीजिए। कोई कहे कि ध्यान करो तो ध्यान तो वह करे, जो किसी प्रकार की दूरी अनुभव करता हो। *सुखी व सम्पन्न जीवन के लिए ये टेलिग्राम चैनल जोईन करें व औरों से भी करवाएं और शेयर करते जाएं :* https://t.me/sss63 https://t.me/sss963 https://t.me/sss981 https://t.me/ashram999

  • राम ! राम !! राम !!! राम !!!! प्रवचन दिनांक 28 मार्च 2003 प्रातः 5:00 बजे। *विषय - नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत:।* *हमारे परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी की वाणी बहुत विलक्षण’ है, ’दिव्य (परम वचन) है । श्री स्वामी जी महाराज जी की वाणी सुनने से हृदय में प्रकाश आता है,’ ’इसलिए प्रतिदिन जरूर सुननी चाहिए।* परम श्रद्धेय स्वामी जी महाराज जी कह रहे हैं कि देखो खास बात है - नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत: । ये आधा श्लोक है, इसमें सब शास्त्र, वेद, पुराण आ गए । इन 16 अक्षरों में सब बात आ गई । संसार असत् है और परमात्मा सत् हैं । सबका मूल दो ही चीज है । एक सत् एक असत् । तो असत् का त्याग करना । बात इतनी ही है । सत् का आदर नहीं किया, असत् का आदर किया है और दु:ख पा रहे हैं । असत् का आदर करोगे, सुखी कभी नहीं होंगे । इस वास्ते सत् को धारण करना चाहिए । असत् की सत्ता नहीं है । सत्ता तो एक ही है । सिद्धांत की पक्की बात है । ठीक इसका पालन करें तो परमात्मा की प्राप्ति हो जाए । अपने साधक संजीवनी (परम श्रद्धेय स्वामी जी द्वारा विरचित ग्रंथ) में नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत: का विवेचन किया है, उसके बारे में बता रहे हैं । तो सत् सत् ही है, असत् असत् ही है । आप असत् का त्याग नहीं करोगे, तो असत् आपका त्याग कर ही देगा । असत् का त्याग कर दोगे तो मुक्त हो जाओगे । और असत् आपका त्याग करेगा तो मरोगे । सत् को पकड़ने वाले काल को ही खा जाते हैं । इस वास्ते सबसे कहना है सत् को धारण करें, नहीं तो मर जाओगे, मरते ही रहोगे । नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत: । इतनी पक्की बात है । सब से प्रार्थना है, हाथ जोड़कर कि असत् का त्याग करो । अनंत ब्रह्मांड में तिल जितनी चीज भी अपनी नहीं है । रुपया मेरा है, कुटुंबी मेरा है, भाई बंधु मेरा है । आपका कुछ भी नहीं है । संसार को अपना माना है, बड़ी भारी भूल है । असत् को महत्व मत दो । क्या शरीर सत् है ? क्या रुपया सत् है ? क्या कुटुंब सत् है ? क्या ब्रह्मांड सत् है ? सूर्य चंद्रमा कुछ नहीं रहेगा । इस वास्ते सब से प्रार्थना है सत् को महत्व दो । ब्रह्मांड के ब्रह्मांड नष्ट हो जाएगा । पक्की बात है। सच्ची बात है । https://t.me/sss63 ध्यान दो । ध्यान देते भी हैं, पर बहुत कम । ध्यान दिया है, ध्यान दो । इतनी प्रार्थना है हमारी, खुद विचार करो, कि सत् रहेगा कि असत् रहेगा ? हमारी प्रार्थना है, बात मानोगे तो कृपा है । नहीं मानोगे तो लाचारी है, क्या कर सकते हैं ? सच्ची बात को पकड़ो नहीं तो बड़ा संताप होगा, दु:ख होगा, रोते ही रहोगे । किसी का पति मर गया था। वो सत्संग में आती है, दु:ख मिट जाता है । खुद कहती है दु:ख मिट गया । सब जीवन्मुक्त हो सकते हैं, प्रेमी हो सकते हैं, भक्त हो सकते हैं । स्वयं देख लो आप । क्या शरीर रहेंगे ? क्या मकान रहेंगे ? मरोगे, अंत में एक कोड़ी भी साथ चलेगी नहीं । और भगवान् का भजन करो साथ जाएगा, पीछे एक रहेगा नहीं । इस वास्ते आपके चरणों में प्रार्थना है, सत् तत्व को पकड़ो । निहाल हो जाओगे । दु:ख मिट जाएगा, संताप मिट जाएगा, जन्म मरण मिट जाएगा । आनंद हो जाएगा, तत्वज्ञान हो जाएगा । अभी हाथ में है आपके । नहीं तो भैया रोना पड़ेगा । सपना सा हो जावसो सी ..... । निहाल हो जाओगे । प्रार्थना सबसे करबद्ध हाथ जोड़कर कि मनुष्य शरीर है । मौका है, हाथ से निकल जाएगा । मिलेगा नहीं । अब आर (अभी) समय है । मानव शरीर है, परमात्म प्राप्ति का अधिकार है । चार बात हैं । आप स्वतंत्र हैं, आपमें योग्यता है, सामर्थ्य है, आप अधिकारी हैं । परमात्मा की प्राप्ति के लिए आप में चारों बातें हैं । लग जाओ । ये बात करने वाले कितने दिन रहेगा, पता नहीं । सुनने वाले कितने दिन हैं, पता नहीं । छूटेगा ही । तो छूटेगा ही, तो आप छोड़ दो । तो निहाल हो जाओगे । मकान, संपत्ति, धन, परिवार, मान बड़ाई सब छूटेगी । अंत हूँ तोहि तजैंगे पावर, तू न तजै अब ही तो । और समय है अभी । कहावत है आप मर गया, तो प्रलय हो गया सब । चेत करो महाराज । भगवान् का भजन करो । संसार को छोड़ो । यह सब छूटेगा भाई । भगवान् में लग जाओ । नारायण ! नारायण !! नारायण !!! नारायण !!! *सुखी व सम्पन्न जीवन के लिए ये टेलिग्राम चैनल जोईन करें व औरों से भी करवाएं और शेयर करते जाएं :* https://t.me/sss63 https://t.me/sss963 https://t.me/sss981 https://t.me/ashram999

  • जो स्वर्ण का शिवलिंग बनाकर उसकी पूजा करता है तो 3 पीढ़ी तक उसके यहाँ धन स्थिर रहता है। जो माणिक का बनाकर करता है उसके रोग, दरिद्रता दूर होकर धन और ऐश्वर्य बढ़ता है। इस प्रकार अलग-अलग शिवलिंगों की पूजा करने से अलग-अलग फल की प्राप्ति होती है लेकिन उन सबसे महाफल यह है कि जीव शिव-तत्त्व को प्राप्त हो जाय। https://t.me/sss63 शिव-तत्त्व को पाने के लिए हम तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु। नश्वर चीज का संकल्प नहीं लेकिन शिवसंकल्प हो, मंगलकारी संकल्प हो। और मंगलकारी संकल्प यही है कि संकल्प जहाँ से उठते हैं, उस परब्रह्म परमात्मा में हमारी चित्तवृत्तियाँ विश्रांति पायें। दो महाशक्तियाँ अपने को कर्ता मानकर लड़ें तो संसार का कचूमर हो जाय, इसलिए संसार की दुःख की घड़ी के समय जो सच्चिदानंद निर्गुण, निराकार था, उसने साकार रूप में प्रकट होकर दोनों महाशक्तियों को अपने-अपने कर्तव्य का पालन करने में लगा दिया। तो केवल वे दो महाशक्तियाँ ही शिव की नहीं हैं, हम लोग भी शिव की विभिन्न शक्तियाँ हैं। हमारा रोम-रोम भी शिव-तत्त्व से भरा है। ऐसा कोई जीव नहीं जो शिव तत्त्व से अर्थात् परमात्मा से एक सेकंड भी दूर रह सके। हो सकता है कि 2 सेकंड के लिए मछली को मछुआरा पकड़ के किनारे पर धर दे। लेकिन दुनिया में ऐसा कोई पैदा नहीं हुआ जो हमको उठाकर 2 सेकंड के लिए परमात्मा से अलग जगह पर रख दे। हम उस शिव तत्त्व में इतने ओत-प्रोत हैं। फिर भी अहंकार हमको दूरी का एहसास कराता है। https://t.me/sss63 जबकि अनंत की लीला में अनंत की सत्ता से सब हो रहा है, हम अपने को कर्ता मानकर उस लीला में विक्षे कर रहे हैं। यदि इस महाशिवरात्रि से लाभान्वित होने का सौभाग्य हमें मिल जाय, इस मंगल रात्रि का हम सदुपयोग कर लें कि ‘ब्रह्मा और विष्णु जैसी शक्तियाँ भी तुम्हारे तत्त्व के आगे नतमस्तक हैं तो हमारा धन, अक्ल, हमारी जानकारी – यह सब भी तो आप ही से स्फुरित हो रहा है। तो भगवान ! मेरा मुझ में कुछ नहीं, जो कुछ है तो तोर। तेरा तुझको देत हैं, क्या लागत है मोर।। ऐसा करके यदि हम अपना अहं विसर्जित कर सकें तो उस आत्मशिव को पहचानने की जिज्ञासा और सूझबूझ बढ़ जाती है। स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2017, पृष्ठ संख्या 14,15,17 अंक 290. *सुखी व सम्पन्न जीवन के लिए ये टेलिग्राम चैनल जोईन करें व औरों से भी करवाएं और शेयर करते जाएं :* https://t.me/sss63 https://t.me/sss963 https://t.me/sss981 https://t.me/ashram999

  • 15 फरवरी 2026 ‘ईशान संहिता’ में आता हैः माघकृष्णचतुर्दश्यामादिदेवो महानिशि। शिवलिंङ्गतयोद्भूतः कोटिसूर्यसमप्रभः।। ‘माघ (हिन्दी काल गणना के अनुसार फाल्गुन) मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी की महानिशा में करोड़ों सूर्यों के तुल्य कांतिवाले लिंगरूप आदिदेव शिव प्रकट हुए।’ जैसे जन्माष्टमी श्रीकृष्ण का जन्मदिन है ऐसे ही महाशिवरात्रि शिवजी (शिवलिंग) का प्राकट्य दिवस है, जन्मदिन है। वैसे देखा जाय तो ब्रह्मा, विष्णु, महेश एक ही अदभुत चैतन्यशक्ति के अवर्णनीय तत्त्व हैं। शास्त्रों में यह भी आता है कि भगवान अजन्मा हैं, निर्विकार, निराकार, शिवस्वरूप हैं, मंगलस्वरूप हैं। उनका कोई आदि नहीं, कोई अंत नहीं। जब वे अजन्मा हैं तो फिर महाशिवरात्रि या जन्माष्टमी को उनका जन्म कैसे ? यह एक तरफ प्रश्न होता है, दूसरी तरफ समाधान मिल जाता हैः कर्तुं शक्यं अकर्तुं शक्यं अन्यथा कर्तुं शक्यम्। शिव-तत्त्व कहो, चैतन्य तत्त्व कहो, आत्मतत्त्व कहो, उसकी अदभुत लीला है, जिसका बयान करना बुद्धि का विषय नहीं है। अब बुद्धि जितना नाम-रूप में आसक्त होती है, उतना उलझ जाती है और जितना सत्य के अभिमुख होती है उतना-उतना बुद्धि का विकास होकर परब्रह्म परमात्मा में लीन होती है। सूर्य से हजारों गुना बड़े तारे कैसे गतिमान हो रहे हैं ! एक आकाशगंगा में ऐसे अनंत तारे कैसे नियमबद्ध चाल से चल रहे हैं ! सर्दी के बाद गर्मी और गर्मी के बाद बारिश – ये क्रम और मनुष्य के पेट से मनुष्य तथा भैंस के पेट से भैंस की ही संतानें जन्मती हैं – यह जो नियमबद्धता अनंत-अनंत जीवों में है और अनंत-अनंत चेहरों में कोई दो चेहरे पूर्णतः एक जैसे नहीं, यह सब ईश्वर की अदभुत लीला देखकर बुद्धि तड़ाका बोल देती है। ऐसी कोई अज्ञात शक्ति है जो सबका नियमन कर रही है और कई पुतलों के द्वारा करा रही है। उसे अज्ञात शक्ति कहो या ईश्वरीय शक्ति, आदिशक्ति कहो। कैसे हुआ शिवलिंग का प्राकट्य ? ‘शिव पुराण’ की कथा है कि ब्रह्मा जी ने ऐसी अदभुत सृष्टि की रचना की और विष्णु जी ने पालन का भार उठाया। एक समय दोनों देवों को क्या हुआ कि हम दोनों में श्रेष्ठ कौन ? सृष्टिकर्ता बड़ा कि पालन करने वाला बड़ा ? दोनों में गज-ग्राह युद्ध, बौद्धिक खिंचाव शुरु हुआ। इतने में एक अदभुत लिंग प्रकट हुआ, जो आकाश और पाताल की तरफ बढ़ा। उसमें से आदेश आया कि ‘हे देवो ! जो इसका अंत पाकर जल्दी आयेगा वह दोनों में से बड़ा होगा।’ ब्रह्मा जी आकाश की ओर और विष्णु जी पाताल की ओर चले लेकिन उस अदभुत तत्त्व का कोई आदि-अंत न था। इसी तत्त्व को तत्त्ववेत्ताओं ने कहा कि ‘यह परमात्मा, शिव तत्त्व अनंत, अनादि है।’ अनंत, अनादि माना उसका कोई अंत और आदि नहीं। https://t.me/sss63 आत्मसाक्षात्कार करने के बाद भी उसका कोई छोर पा ले…. नहीं, बुद्धि उसमें लीन हो जाती है परंतु ‘परमात्मा इतना बड़ा है’ ऐसा नहीं कह सकती। आखिर दोनों देव हारे, थके…. दोनों के बड़प्पन ढीले हो गये। अब स्तुति करने लगे। दो महाशक्तियों में संघर्ष हो रहा था, उस संघर्ष को शिवलिंग ने एक दूसरे के सहयोग में परिणत कर दिया। सृष्टि में उथल-पुथल होने की घटनाओं को घटित होने से रोकने, प्राणिमात्र को बचाने की जो घड़ियाँ, जो मंगलकारी, कल्याणकारी रात्रि थी, उसको ‘महाशिवरात्रि’ कहते हैं। इस रात्रि को भक्तिभाव से जागरण किया जाय तो अमिट फल होता है। पूजा के प्रकार व महाशिवरात्रि का महाफल इस दिन शिवजी को फूल या बिल्वपत्र चढ़ाये जाते हैं। जंगल में हो, बियाबान (निर्जन स्थान) में हों, कहीं भी हों, मिट्टी या रेती के शिवजी बना लिये, पत्ते-फूल तोड़ के धर दिये, पानी का छींटा मार दिया, मुँह से ही वाद्य-नाद कर दिया, बैंड-बाजे की जरूरत नहीं, शिवजी प्रसन्न हो जाते हैं, अंतःकरण शुद्ध होने लगता है। तो मानना पड़ेगा कि शिवपूजा में वस्तु का मूल्य नहीं है, भावना का मूल्य है। भावे हि विद्यते देवः। शिवजी की प्रारम्भिक आराधना होती है पत्र-पुष्प, पंचामृत आदि से। पूजा का दूसरा ऊँचा चरण है कि शिवपूजा मानसिक की जाय – ‘जो मैं खाता पीता हूँ वह आपको भोग लगाता हूँ। जो चलता फिरता हूँ वह आपकी प्रदक्षिणा है और जो-जो कर्म करता हूँ, हे शिवजी ! आपको अर्पित है।’ जब उस शिव-तत्त्व को चैतन्य वपु, आत्मदेव समझकर, ‘अखिल ब्रह्माण्ड में वह परमात्मा ही साररूप में है, बाकी उसका प्रकृति-विलास है, नाम और रूप उसकी माया है’ – ऐसा समझ के नीति के अनुसार जो कुछ व्यवहार किया जाय और अपना कर्तापन बाधित हो जाय तो उस योगी को खुली आँख समाधि का सुख मिलता है। आँख खुली होते हुए भी अदृश्य तत्त्व में, निःसंकल्प दशा में वह योगी जग जाता है।

  • ॥ श्रीहरिः ॥ *किसी भी प्रकारसे सत्पुरुषोंका मिलना हो जाय तो बस, काम हो गया।* *सच्चे सन्तका मिलना दुर्लभ है; पर यदि वे मिल गये तो फिर उनका मिलना अमोघ है।* *सच्चे सन्त यदि किसीके द्वारा सताये भी जाते हैं तो भी वे उसका कल्याण ही करते हैं। सच्चे सन्तके द्वारा किसीकी हानि होती ही नहीं, पर भगवान् इस बातको सहन नहीं करते। काकभुशुण्डिजीने गर्वमें आकर अपने गुरुका अपमान किया; गुरुने कुछ भी नहीं कहा, पर भगवान् शंकरने काकभुशुण्डिको शाप दे दिया। गुरुने शंकरसे प्रार्थना करके शापको वरदानके रूपमें परिणत करा दिया तथा अन्तमें काकभुशुण्डिजीको भगवत्प्राप्ति हुई। इस प्रकार सन्त अपनी दयासे बुरे फलको अच्छेमें बदल देते हैं।* https://t.me/sss63 *सन्त यदि किसीपर क्रोध करते हैं तो वह क्रोध भी किसीके लिये हानिकर नहीं होता, उस क्रोधसे भी लाभ ही होता है; नलकूबर-मणिग्रीवने नारदजीका तिरस्कार किया। ये दोनों यक्ष जलमें नंगे स्नान कर रहे थे। नारदजीके आ जानेपर उन्होंने ध्यान ही नहीं दिया। नारदजीने शाप दे दिया। शापसे वे जड़ वृक्ष बन गये, पर वृक्ष बनकर भगवान् श्रीकृष्णके अंगस्पर्शको पाकर वे कृतार्थ हो गये। सन्तोंका शाप भी पापोंसे शुद्ध करके अन्तमें भगवान्से मिला देता है।* *सन्त हरिदासजीपर मार पड़ी, शरीरसे खून निकलने लगा। मारनेवाले कहते- 'हरि-नाम लेना छोड़ दो।' हरिदासजीने सोचा- ये हमें मारते हैं तथा मारते हुए हरि-नाम लेनेके लिये मना करते हुए इनके मुँहसे हरि-नामका उच्चारण हो जाता है, इससे अच्छी बात और क्या होगी। हरिदासजीने कहा- 'भैया ! फिर मारो और हरि-नाम लो !' मार पड़ती गयी। हरिदास बेहोश हो गये। मरा जानकर लोगोंने उन्हें गंगाजीमें फेंक दिया, पर वे मरे नहीं थे। गंगाजीसे बाहर निकल आये और भगवान्से मारनेवालोंके कल्याणकी प्रार्थना करने लगे।* *उमा संत कइ इहइ बड़ाई।* *मंद करत जो करइ भलाई॥* *-यही सन्तका महत्त्व है। ऐसे पुरुष अत्यन्त दुर्लभ हैं, जो हैं वे ही सन्त हैं।* *कुछ सत्पुरुष ऐसे होते हैं कि बुराई करनेवालोंकी बदलेमें बुराई तो नहीं करते, पर भला भी नहीं करते। अवश्य ही ऐसे पुरुष भी बहुत थोड़े होते हैं; क्योंकि किसीके द्वारा की हुई बुराईको शान्तिसे सह लेना भी बड़ा कठिन है।* *परोपकारी पुरुष कुछ ऐसे भी होते हैं, जो भला न करनेवालोंका भी भला करते हैं।* *-सन्तोंद्वारा किसीका भी बुरा नहीं होता।* *सन्त स्वभावसे ही सबका मंगल करते हैं। जिस प्रकार सूर्य सहज ही अन्धकारका नाश करते हैं, उसी प्रकार सन्त स्वाभाविक ही निर्मल बनायेंगे।* *गुर्साईंजी महाराजने चन्दन एवं कुल्हाड़ेकी उपमा देकर सन्त किस प्रकार बुरा करनेवालेका भला करते हैं, यह बात दिखलायी है, बिलकुल ऐसी ही बात है। बुरा करनेवालेको भी सन्त अपनी ओरसे उत्तम-से-उत्तम चीज ही देते हैं।* – श्रद्धेय श्री हनुमानप्रसादजी पोद्दार (भाईजी) –‘सत्संग के बिखरे मोती’ गीताप्रेस गोरखपुर की पुस्तक से साभार *सुखी व सम्पन्न जीवन के लिए ये टेलिग्राम चैनल जोईन करें व औरों से भी करवाएं और शेयर करते जाएं :* https://t.me/sss63 https://t.me/sss963 https://t.me/sss981 https://t.me/ashram999

  • राम।।🍁 🍁 *विचार संजीवनी* 🍁 *..गुरु भी नकली है..* *वर्तमान में तो गुरु बनने का एक पेशा (व्यवसाय) ही बन गया है।* चेला इसलिये बनाते हैं कि अपनी जीविका चलती रहे, अपनी मनमानी होती रहे, अपनी मान-बड़ाई (शरीर का मान और नाम की बढ़ाई) होती रहे, अपना स्वार्थ सिद्ध होता रहे। यही भाव चेलों का भी रहता है ! *गुरु लोभी सिष लालची, दोनों खेले दाँव।* *दोनों डूबा 'परसराम', बैठ पथरकी नाँव।।* आजकल नकली चीजों का जमाना है। ब्राह्मण भी नकली, क्षत्रिय भी नकली, वैश्य भी नकली, शूद्र भी नकली, ब्रह्मचारी भी नकली, गृहस्थ भी नकली, वानप्रस्थ भी नकली, साधु भी नकली, यहाँतक कि साग-सब्जी, फूल-पत्ती, मिर्च-मसाले, दूध आदि भी नकली मिलते हैं। हर चीज नकली है तो गुरु भी नकली है। https://t.me/sss63 *राम ! राम !! राम !!!* परम् श्रद्धेय स्वामी जी श्रीरामसुखदास जी महाराज *साधन-सुधा-निधि* पृष्ठ २८९ *सुखी व सम्पन्न जीवन के लिए ये टेलिग्राम चैनल जोईन करें व औरों से भी करवाएं और शेयर करते जाएं :* https://t.me/sss63 https://t.me/sss963 https://t.me/sss981 https://t.me/ashram999

सत्संग से संजीवनी — tgindex