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📌ग्राम पंचायत - त्रिस्तरीय पंचायती व्यवस्था के सबसे निचले स्तर पर ग्राम पंचायत होती है। ग्राम पंचायत के गठन हेतु पर्वतीय क्षेत्रों में कम से कम 500 के मैदानी क्षेत्रों में कम से कम 1000 व अधिकतम 10 हजार की आबादी होनी चाहिए। किसी भी ग्राम पंचायत में सदस्यों की संख्या 5 से कम व 15 से अधिक नहीं हो सकती है। 👉 ग्राम पंचायत सदस्यों एवं पंचायत अध्यक्ष (प्रधान) का चुनाव ग्राम सभा के 18 वर्ष या इससे अधिक आयु के सदस्यों द्वारा की जाती है। ग्राम सभा द्वारा एक उप-प्रधान भी चुना जाता है। 👉 पंचायत सदस्य, प्रधान या उप प्रधान चुने जाने हेतु आयु कम से कम 21 वर्ष होनी चाहिए। ग्राम पंचायतों में अविश्वास प्रस्ताव के लिए पंचायत के लिए पंचायत के 1/5 सदस्यों के साथ ही साथ कुल परिवारों के आधे परिवारों का सहमत होना अनिवार्य है। • एक अथवा अधिक गांवों को मिलाकर गठित ग्राम पंचायत के तहत पंजीकृत मतदाताओं को मिलाकर जो सभा बनती है, उसे ग्राम सभा कहते हैं। एक ग्राम सभा की एक ही ग्राम पंचायत होती है। • किसी आवास समूह को ग्राम सभा घोषित करने, उसकानाम निर्धारित करने आदि कार्य राज्य सरकार करती है। • ग्राम सभा की प्रत्येक वर्ष दो आम बैठक होती है, जिसकी अध्यक्ष्ता ग्राम प्रधान करता हैं।
📌क्षेत्र पंचायत - त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था में क्षेत्र पंचायत मध्य स्तरीय निगमित निकाय है। इसके अध्यक्ष को प्रमुख तथा उपाध्यक्ष को उप-प्रमुख कहा जाता है। इसके अलावा एक कनिष्ठ उप-प्रमुख भी होता हैं। • क्षेत्र पंचायत के सदस्यों का चुनाव ग्राम सभा के 18 या अधिक आयु के मतदाता करते हैं। क्षेत्र पंचायत के निर्वाचित सदस्यों की संख्या 20 से कम व 40 से अधिक नहीं हो सकती है। • इसके अध्यक्ष (प्रमुख) व उपाध्यक्ष (उप प्रमुख) का चुनाव, क्षेत्र पंचायत के निर्वाचित सदस्यों द्वारा किया जाता है। • उस क्षेत्र पंचायत के अन्तर्गत आने वाले ग्राम प्रधान, लोकसभा सदस्य, राज्य सभा सदस्य, राज्य विधानसभा सदस्य क्षेत्र पंचायत के पदेन सदस्य होते हैं, ये क्षेत्र पंचायत की बैठकों में भाग ले सकते है और प्रस्तावों पर मत दे सकते हैं केवल प्रमुख या उप प्रमुख के विरूद्ध अविस्वास प्रस्ताव पर मत नहीं दे सकते हैं। • उस क्षेत्र पंचायत के अन्तर्गत आने वाले जिला पंचायत सदस्य भी क्षेत्र पंचायत की बैठक में विशेष आमंत्रित सदस्य के रूप में भाग ले सकते हैं, परन्तु मत नहीं दे सकते हैं। • इस पंचायत का सचिव BDO होता है। • यह पंचायत अधिकांश कार्य अपने सदस्यों से गठित पूर्ववत 6 प्रकार के समितियों के माध्यम से करती है। • क्षेत्र पंचायत जिला पंचायत एवं ग्राम पंचायत के मध्य कड़ी के रूप में कार्य करती है।
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📌स्वामी विवेकानंदः इनका जन्म 1862 में हुआ। वे आध्यात्मिक जिज्ञासा के कारण रामकृष्ण के संपर्क में आये तथा उनके शिष्य बन गये। इन्होंने रामकृष्ण परमहंस के उपदेशों को लोगों के बीच प्रचारित किया तथा इन्हें तत्कालीन भारतीय समाज के अनुरूप ज्यादा प्रासंगिक बनाने का प्रयास किया। वे नव-हिन्दूवाद के उपदेशक के रूप में उभरे। विवेकानंद ने रामकृष्ण परमहंस की शिक्षाओं एवं उपदेशों को प्रचारित करने के लिये 1897 में रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। रामकृष्ण की शिक्षाओं, उपनिषद एवं गीता के दर्शन तथा बुद्ध एवं यीशु के उपदेशों को आधार बनाकर विवेकानंद ने विश्व को मानव मूल्यों की शिक्षा दी। उन्होंने सामाजिक कर्म पर जोर दिया और कहा कि अगर ज्ञान के साथ जिस वास्तविक संसार में हम रहते हैं, उसमें कर्म न किया जाये तो ज्ञान निरर्थक है। विवेकानंद ने सर्वधर्म समभाव की घोषणा की और धार्मिक मामलों में हर प्रकार की भी संकीर्णता की निंदा की। 1898 में उन्होंने लिखा 'हमारी मात्रभूमि के लिये विश्व के दो महान धर्मों, हिन्दू एवं मुस्लिम की प्रणालियों का संगम ही एक मात्र आशा है। उन्होंने हिन्दू धर्म के पृथकतावादी सिद्धांत की आलोचना की तथा उसके 'मुझे मत छुओ' के आदर्श को उसकी एक बड़ी भूल बताया। साधारण जनता के दुःख एवं कठिनाइयों से परिचित होने के लिये उन्होंने पूरे देश की यात्रा की तथा कहा 'जिस एक मात्र ईश्वर पर मैं विश्वास करता हूं... वह मेरा ईश्वर सब देशों का दुखी, पीड़ित और दरिद्रजन है'। उनके अनुसार, किसी भूखे को धार्मिक उपदेश देना, ईश्वर का अपमान करने जैसा है। उन्होंने देशवासियों से स्वतंत्रता, समानता एवं स्वतंत्र सोच धारण करने की अपील की। विवेकानंद, एक महान मानवतावादी व्यक्ति थे तथा उन्होंने रामकृष्ण मिशन के द्वारा मानवीय सहायता एवं सामाजिक कार्य को अपना सर्वप्रमुख उद्देश्य बनाया। मिशन ने सामाजिक एवं धार्मिक सुधार के अनेक कार्य किये। उन्होंने कर्मफल की सर्वोच्चता को प्रतिपादित करते हुए इसे ही सर्वश्रेष्ठ बताया। विवेकानंद ने जीव की सेवा की तुलना शिव की पूजा से की। उनके अनुसार जीवन स्वयं एक धर्म है। कर्म के द्वारा ही मानव का दैवीय अस्तित्व होता है। उन्होंने तत्कालीन तकनीक एवं आधुनिक विज्ञान का उपयोग मानवमात्र के कल्याण हेतु करने की महत्ता प्रतिपादित की। विवेकानंद ने अपने मानवतावादी और कार्य सम्बंधी विचारों को व्यावहारिक रूप देने के लिये देश के विभिन्न भागों में रामकृष्ण मिशन की अनेक शाखायें स्थापित कीं। इस मिशन ने लोगों के लिये स्कूल, पुस्तकालय, दवाखाने, अनाथालय इत्यादि की स्थापना की। मिशन, विभिन्न प्राकृतिक आपदाओं यथा-बाढ़, सूखे एवं महामारी इत्यादि में भी लोगों की सहायता के लिये कार्य करता था। मिशन ने अंतर्राष्ट्रीय संगठन का स्वरूप धारण किया। मिशन एक हिन्दू धार्मिक संगठन था किंतु इसने अन्य धर्मों को भी महान बताया। आर्य समाज के विपरीत, मिशन ने मूर्तिपूजा का समर्थन किया। इसके अनुसार, मूर्तिपूजा, उपासना का उत्तम एवं सरल तरीका है। मूर्तिपूजा से आध्यात्मवाद का विकास बड़ी सरलता से किया जा सकता है। यह श्रेष्ठ है क्योंकि मूर्तिपूजा से कोई भी मनुष्य बहुत कम समय में ईश्वर की वंदना में निपुण हो सकता है। हिन्दू धर्म या वेदांत सर्वश्रेष्ठ है। इसकी सहायता से हिन्दू, सच्चा हिन्दू एवं क्रिश्चियन सच्चा क्रिश्चियन बन सकता है। विवेकानंद ने 1893 में शिकागो (अमेरिका) में सम्पन्न 'विश्व धर्म सम्मेलन' में लोगों को यह बताने का प्रयास किया कि वेदांत केवल हिन्दुओं का ही नहीं अपितु सभी मनुष्यों का धर्म है। उन्होंने आध्यात्मवाद एवं भौतिकतावाद के संतुलन पर बल दिया। इस सम्मेलन में उन्होंने कहा कि यदि पश्चिम के भौतिकतावाद एवं पूर्व के आध्यात्मवाद का सम्मिश्रण कर दिया जाये तो यह मानव जाति की भलाई का सर्वोत्तम मार्ग होगा। विवेकानंद ने कभी लोगों को राजनीतिक संदेश नहीं दिया। उन्होंने देश की युवा पीढ़ी से अपील की कि वे भारत की प्राचीन सभ्यता पर गर्व करें तथा भविष्य में भारत की संस्कृति को मानव जाति के कल्याणार्थ समर्पित करें। वे भारत को एक जागृत एवं प्रगतिशील राष्ट्र बनाना चाहते थे। वे जातिवाद, छुआछूत एवं विषमता को राष्ट्र के दुर्बल होने का महत्वपूर्ण कारक मानते थे। उन्हें भारत की जनता की शक्ति में पूर्ण आस्था थी। उनका विश्वास था कि एक दिन भारत का विकास होगा तथा देश से अशिक्षा एवं गरीबी पूरी तरह समाप्त हो जायेगी। https://t.me/ukpsctestseries
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📌सरकार द्वारा संचित निधि से रकम निकासी को मंजूरी दिलाने के लिए संसद में प्रस्तुत विधेयक विनियोग विधेयक कहलाता है।इसका प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 114 में है। संविधान के अनुच्छेद 266 (1) में भारत की संचित निधि गठित करने का प्रावधान है। भारत सरकार की संपूर्ण आय संचित निधि में जमा होता है और संपूर्ण व्यय भी संचित निधि से ही होता है। संसद की अनुमति से ही संचित निधि से धन लिया जा सकता है। विनियोग को राज्यसभा केवल 14 दिनों तक रोक सकता है वित्त विधेयक केवल राष्ट्रपति की सिफारिश पर ही प्रस्तुत किया जाता है। विनियोग विधेयक के लागू होने तक सरकार भारत की संचित निधि से कोई धन आहरित नहीं कर सकती है।
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