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  • https://sakarbharat.com/epaper/sakar-bharat-15-august-2026-page-1-5/

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  • https://vastuguruji.in/blog/gita/gita-chapter-16-daivasura-sampad-vibhag-yog/

  • 3 авг.2022из KundliGuruji

    श्लोक मातृवत् परदारेषु परद्रव्येषु लोष्ट्रवत्। आत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यति स पण्डितः॥ चाणक्य के अनुसार सच्चा पण्डित वह नहीं जो शास्त्रों को रटे, बल्कि वह है जिसका आचरण शुद्ध हो। इस श्लोक में तीन कसौटियाँ दी गई हैं। पहली — पराई स्त्री को माता समान देखना। यह संयम और सम्मान की पराकाष्ठा है; जहाँ वासना नहीं, वहीं शुद्ध दृष्टि सम्भव है। दूसरी — पराए धन को मिट्टी के ढेले समान समझना। जिसे दूसरों की सम्पत्ति के प्रति लोभ नहीं, वही सच्चे अर्थों में सन्तुष्ट और ईमानदार है। लोभ ही अधिकांश पतन का मूल कारण होता है। तीसरी — सभी प्राणियों को अपने समान मानना। जब मनुष्य दूसरे के सुख-दुःख को अपना समझने लगे, तभी करुणा और समभाव जन्म लेते हैं। यही आत्मवत् सर्वभूतेषु का भाव है। चाणक्य कहते हैं कि जिसमें ये तीनों गुण एक साथ विद्यमान हों — संयम, निर्लोभता और समभाव — वही वास्तविक पण्डित है। शिक्षा की डिग्री नहीं, चरित्र की शुद्धता ही ज्ञान की सच्ची पहचान है। यह श्लोक बताता है कि बुद्धि का प्रयोग आत्म-नियन्त्रण और परोपकार में हो, तभी वह सार्थक है। https://viratmahanagar.com/chanakya-ke-anusar-saccha-pandit-kaun/

  • 2 авг.1762из KundliGuruji

    श्लोक (चाणक्य नीति) आपदर्थे धनं रक्षेद् दारान् रक्षेद्धनैरपि। आत्मानं सततं रक्षेद् दारैरपि धनैरपि॥ विपत्ति के लिए धन बचाओ, धन से परिवार बचाओ, पर स्वयं की रक्षा सबसे ऊपर रखो—चाहे इसके लिए धन और परिवार दोनों त्यागने पड़ें। कारण: यदि व्यक्ति स्वयं सुरक्षित नहीं, तो न धन बचा सकता है, न परिवार। जीवित व सक्षम व्यक्ति ही आगे चलकर सब कुछ पुनः अर्जित कर सकता है। यह स्वार्थ नहीं, प्राथमिकता का बुद्धिमत्तापूर्ण क्रम है — पहले स्वयं, फिर परिवार, फिर धन। सार: यह प्राथमिकता का क्रम है, स्वार्थ का उपदेश नहीं — स्वयं की सुरक्षा, तभी धन और परिवार दोनों की सुरक्षा सम्भव है। (स्रोत: चाणक्य नीति)

  • 1 авг.1542из KundliGuruji

    https://mahajyotish.com/vastu-devtas

  • https://sakarbharat.com/epaper/sakar-bharat/2026/07/30/page/8/

  • https://mahajyotish.com/vastu-grid

  • > कः कालः कानि मित्राणि, को देशः कौ व्ययागमौ। > समय, संगति, स्थान, आय-व्यय, कर्तव्य और सामर्थ्य — इन छह पर बार-बार विचार करो। — चाणक्य नीति चाणक्य कहते हैं, मनुष्य को छह प्रश्न बार-बार स्वयं से पूछने चाहिए। कः कालः — समय कैसा है, उन्नति का या संकट का? सही निर्णय भी गलत समय पर व्यर्थ हो जाता है। कानि मित्राणि — संगति उठाने वाली है या गिराने वाली? को देशः — जहाँ योग्यता का मूल्य न हो, वहाँ रहना जीवन नष्ट करना है। कौ व्ययागमौ — आय-व्यय का हिसाब न रखने वाला एक दिन अपनी स्वतन्त्रता खो देता है। कस्याहं — मेरे उत्तरदायित्व किसके प्रति हैं? यह प्रश्न अहंकार को सीमा में रखता है। का च मे शक्तिः — अपनी सामर्थ्य को न कम आँको, न अधिक। सार यह कि असफलता प्रायः परिश्रम की कमी से नहीं, आत्म-समीक्षा की कमी से आती है। *(स्रोत: चाणक्य नीति)*

  • > अनन्तशास्त्रं बहु वेदितव्यम् > अल्पश्च कालो बहवश्च विघ्नाः। > यत्सारभूतं तदुपासनीयं > हंसो यथा क्षीरमिवाम्बुमध्यात्॥ संक्षिप्त अर्थ: शास्त्र अनन्त हैं, जानने योग्य बहुत कुछ है, किन्तु समय थोड़ा है और विघ्न अनेक। अतः जो सारभूत है, उसी को ग्रहण करो — जैसे हंस जल में मिले दूध को अलग कर लेता है। आचार्य चाणक्य इस श्लोक में जीवन का सबसे व्यावहारिक सत्य रखते हैं — ज्ञान असीम है, पर मनुष्य का जीवन सीमित। संसार में पढ़ने, सीखने और जानने योग्य इतना कुछ है कि यदि कोई सब कुछ समेटने निकले, तो आयु समाप्त हो जाएगी और हाथ कुछ भी पूरा नहीं लगेगा। ऊपर से समय केवल थोड़ा ही नहीं, बाधाओं से भरा भी है — रोग, चिन्ता, उत्तरदायित्व, आजीविका। इन सबके बीच जो थोड़ा-सा समय शेष बचता है, वही वास्तविक पूँजी है। इसलिए, चाणक्य विवेक का समर्थन करते हैं, न कि संचय का। बुद्धिमान वह नहीं है जो सर्वाधिक ज्ञान रखता है, बल्कि वह है जो यह जानता है कि क्या त्यागना है। हंस का दृष्टांत इसी कौशल को दर्शाता है – दूध और जल के मिश्रण में भी, हंस केवल दूध को ग्रहण करता है और जल का परित्याग कर देता है। यही विवेकी दृष्टिकोण है।

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