Hindi Kavita/Poems (Hindi Kavitayen)
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अंतिम ऊँचाई कितना स्पष्ट होता आगे बढ़ते जाने का मतलब अगर दसों दिशाएँ हमारे सामने होतीं, हमारे चारों ओर नहीं। कितना आसान होता चलते चले जाना यदि केवल हम चलते होते बाक़ी सब रुका होता। मैंने अक्सर इस ऊलजलूल दुनिया को दस सिरों से सोचने और बीस हाथों से पाने की कोशिश में अपने लिए बेहद मुश्किल बना लिया है। शुरू-शुरू में सब यही चाहते हैं कि सब कुछ शुरू से शुरू हो, लेकिन अंत तक पहुँचते-पहुँचते हिम्मत हार जाते हैं। हमें कोई दिलचस्पी नहीं रहती कि वह सब कैसे समाप्त होता है जो इतनी धूमधाम से शुरू हुआ था हमारे चाहने पर। दुर्गम वनों और ऊँचे पर्वतों को जीतते हुए जब तुम अंतिम ऊँचाई को भी जीत लोगे—जब तुम्हें लगेगा कि कोई अंतर नहीं बचा अब तुममें और उन पत्थरों की कठोरता में जिन्हें तुमने जीता है—जब तुम अपने मस्तक पर बर्फ़ का पहला तूफ़ान झेलोगे और काँपोगे नहीं—तब तुम पाओगे कि कोई फ़र्क़ नहीं सब कुछ जीत लेने में और अंत तक हिम्मत न हारने में। - कुँवर नारायण 👉 Join @Hindi_Poems #HindiKavita
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अमल धवल गिरि के शिखरों पर, बादल को घिरते देखा है। छोटे-छोटे मोती जैसे उसके शीतल तुहिन कणों को मानसरोवर के उन स्वर्णिम कमलों पर गिरते देखा है, बादल को घिरते देखा है। तुंग हिमालय के कंधों पर छोटी बड़ी कई झीलें हैं, उनके श्यामल नील सलिल में समतल देशों से आ-आकर पावस की ऊमस से आकुल तिक्त-मधुर बिषतंतु खोजते हंसों को तिरते देखा है। बादल को घिरते देखा है। ऋतु वसंत का सुप्रभात था मंद-मंद था अनिल बह रहा बालारुण की मृदु किरणें थीं अगल-बग़ल स्वर्णाभ शिखर थे एक-दूसरे से विरहित हो अलग-अलग रहकर ही जिनको सारी रात बितानी होती, निशा-काल से चिर-अभिशापित बेबस उस चकवा-चकई का बंद हुआ क्रंदन, फिर उनमें उस महान सरवर के तीरे शैवालों की हरी दरी पर प्रणय-कलह छिड़ते देखा है। बादल को घिरते देखा है। दुर्गम बर्फ़ानी घाटी में शत-सहस्र फुट ऊँचाई पर अलख नाभि से उठने वाले निज के ही उन्मादक परिमल— के पीछे धावित हो-होकर तरल-तरुण कस्तूरी मृग को अपने पर चिढ़ते देखा है, बादल को घिरते देखा है। कहाँ गए धनपति कुबेर वह कहाँ गई उसकी वह अलका नहीं ठिकाना कालिदास के व्योम-प्रवाही गंगाजल का, ढूँढ़ा बहुत किंतु लगा क्या मेघदूत का पता कहीं पर, कौन बताए वह छायामय बरस पड़ा होगा न यहीं पर, जाने दो, वह कवि-कल्पित था, मैंने तो भीषण जाड़ों में नभ-चुंबी कैलाश शीर्ष पर, महामेघ को झंझानिल से गरज-गरज भिड़ते देखा है, बादल को घिरते देखा है। शत-शत निर्झर-निर्झरणी कल मुखरित देवदारु-कानन में, शोणित धवल भोज पत्रों से छाई हुई कुटी के भीतर रंग-बिरंगे और सुगंधित फूलों से कुंतल को साजे, इंद्रनील की माला डाले शंख-सरीखे सुघड़ गलों में, कानों में कुवलय लटकाए, शतदल लाल कमल वेणी में, रजत-रचित मणि-खचित कलामय पान पात्र द्राक्षासव पूरित रखे सामने अपने-अपने लोहित चंदन की त्रिपटी पर, नरम निदाग बाल-कस्तूरी मृगछालों पर पलथी मारे मदिरारुण आँखों वाले उन उन्मद किन्नर-किन्नरियों की मृदुल मनोरम अँगुलियों को वंशी पर फिरते देखा है, बादल को घिरते देखा है। - नागार्जुन 👉 Join @Hindi_Poems #HindiKavita
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हंगामा है क्यूँ बरपा थोड़ी सी जो पी ली है डाका तो नहीं मारा चोरी तो नहीं की है ना-तजरबा-कारी से वाइ'ज़ की ये हैं बातें इस रंग को क्या जाने पूछो तो कभी पी है उस मय से नहीं मतलब दिल जिस से है बेगाना मक़्सूद है उस मय से दिल ही में जो खिंचती है ऐ शौक़ वही मय पी ऐ होश ज़रा सो जा मेहमान-ए-नज़र इस दम इक बर्क़-ए-तजल्ली है वाँ दिल में कि सदमे दो याँ जी में कि सब सह लो उन का भी अजब दिल है मेरा भी अजब जी है हर ज़र्रा चमकता है अनवार-ए-इलाही से हर साँस ये कहती है हम हैं तो ख़ुदा भी है सूरज में लगे धब्बा फ़ितरत के करिश्मे हैं बुत हम को कहें काफ़िर अल्लाह की मर्ज़ी है ता'लीम का शोर ऐसा तहज़ीब का ग़ुल इतना बरकत जो नहीं होती निय्यत की ख़राबी है सच कहते हैं शैख़ 'अकबर' है ताअत-ए-हक़ लाज़िम हाँ तर्क-ए-मय-ओ-शाहिद ये उन की बुज़ुर्गी है - अकबर इलाहाबादी 👉 Join @Hindi_Poems #HindiKavita
हो गई है पीर पर्वत हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए - दुष्यंत कुमार 👉 Join @Hindi_Poems #HindiKavita
ईश्वर तुम आत्महत्या कर लो अब सही वक्त पर तुम्हारे अस्तित्व का समाप्त हो जाना ही अच्छा है अपने झूठे मुखौटे को हटाओ और कर लो स्वीकार कि सिसकते हो तुम भी! यदि ये दुनिया तुम्हारे लिए खेल है तो तुम्हें नहीं लगता? कि खेल एकतरफ़ा होता जा रहा है कि कमज़ोर के आँसुओं से अब तुम्हारी सत्ता डिगने की कगार पर है? इससे पहले कि कमज़ोर, जिसकी प्रार्थनाएँ तुम्हारे वज़ूद को बचाए हुए हैं, उतार दे तुम्हें सिंहासन से तंग आकर नकार दे तुम्हारा ईश्वर होना उजाड़ दे तुम्हारे बड़े-बड़े मंदिरों का अस्तित्व और तुम्हारी ईश्वर होने की नौकरी से तुम्हें बेदखल कर दे तुम आत्महत्या कर लो! सुना है कि तुम्हें धरती पर सबसे अधिक प्रिय बच्चों की मुस्कानें हैं कि चिड़ियों की चहचहाहट तुम्हारा संगीत है कि तुम तितली के पंखों के रंग से करते हो श्रृंगार कि तुम प्रेम की भाषा समझते हो तो क्यों नहीं देते सज़ा? उन्हें जो बच्चों का बचपन उजाड़ देते हैं जो चिड़ियों के पंख कतर देते हैं जो तितलियों के रंगीन परों को मसल देते हैं जो भय, नफ़रत, हथियारों की भाषा सिखा रहे हैं! बुढ़ा गए हो तुम ईश्वर अब तुम घर के बाहर देहरी पर बैठे बुजुर्ग माँ -बाप की तरह लाचार हो जिसे कभी भी उनकी संतानें भेज सकती हैं वृद्धाश्रम! तुम झूठी हंसी के पीछे ठीक वैसे ही छुपा रहे हो अपने आँसू जैसे कोई कलाकार अपने चेहरे पर पोत लेता है कई परतें श्रृंगार की! असल में ये दुनिया अब वैसी रह नहीं गयी जैसी तुमने बनाई थी इसलिए... कमज़ोर बेबस तुम्हारे वज़ूद को नकार दे उसके पहले तुम आत्महत्या कर लो ईश्वर! - रुचि बहुगुणा उनियाल 👉 Join @Hindi_Poems #HindiKavita
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ईश्वर और प्याज़ क्या ईश्वर प्याज़ खाता है? एक दिन माँ ने मुझसे पूछा जब मैं लंच से पहले प्याज़ के छिलके उतार रहा था क्यों नहीं माँ मैंने कहा जब दुनिया उसने बनाई तो गाजर मूली प्याज़ चुकन्दर- सब उसी ने बनाया होगा फिर वह खा क्यों नहीं सकता प्याज़? वो बात नहीं- हिन्दू प्याज़ नहीं खाता धीरे-से कहती है वह तो क्या ईश्वर हिन्दू हैं माँ? हँसते हुए पूछता हूँ मैं माँ अवाक देखती है मुझे उधर छिल चुकने के बाद अब पृथ्वी जैसा गोल कत्थई प्याज़ मेरी हथेली पर था और ईश्वर कहीं और हो या न हो उन आँखों में उस समय ज़रूर कहीं था मेरे छोटे-से प्याज़ में अपना वजूद खोजता हुआ - केदारनाथ सिंह 👉 Join @Hindi_Poems #HindiKavita
गिरना चीज़ों के गिरने के नियम होते हैं! मनुष्यों के गिरने के कोई नियम नहीं होते। लेकिन चीज़ें कुछ भी तय नहीं कर सकतीं अपने गिरने के बारे में मनुष्य कर सकते हैं बचपन से ऐसी नसीहतें मिलती रहीं कि गिरना हो तो घर में गिरो बाहर मत गिरो यानी चिट्ठी में गिरो लिफ़ाफ़े में बचे रहो, यानी आँखों में गिरो चश्मे में बचे रहो, यानी शब्दों में बचे रहो अर्थों में गिरो यही सोच कर गिरा भीतर कि औसत क़द का मैं साढ़े पाँच फ़ीट से ज़्यादा क्या गिरूँगा लेकिन कितनी ऊँचाई थी वह कि गिरना मेरा ख़त्म ही नहीं हो रहा चीज़ों के गिरने की असलियत का पर्दाफ़ाश हुआ सत्रहवीं शताब्दी के मध्य, जहाँ, पीसा की टेढ़ी मीनार की आख़िरी सीढ़ी चढ़ता है गैलीलियो, और चिल्ला कर कहता है— “इटली के लोगो, अरस्तू का कथन है कि भारी चीज़ें तेज़ी से गिरती हैं और हल्की चीज़ें धीरे-धीरे लेकिन अभी आप अरस्तू के इस सिद्धांत को ही गिरता हुआ देखेंगे गिरते हुआ देखेंगे, लोहे के भारी गोलों और चिड़ियों के हल्के पंखों, और काग़ज़ों को एक साथ, एक गति से गिरते हुए देखेंगे लेकिन सावधान हमें इन्हें हवा के हस्तक्षेप से मुक्त करना होगा...” और फिर ऐसा उसने कर दिखाया चार सौ बरस बाद किसी को कुतुबमीनार से चिल्लाकर कहने की ज़रूरत नहीं है कि कैसी है आज की हवा और कैसा इसका हस्तक्षेप कि चीज़ों के गिरने के नियम मनुष्यों के गिरने पर लागू हो गए हैं और लोग हर क़द और हर वज़न के लोग यानी हम लोग और तुम लोग एक साथ एक गति से एक ही दिशा में गिरते नज़र आ रहे हैं इसीलिए कहता हूँ कि ग़ौर से देखो, अपने चारों तरफ़ चीज़ों का गिरना और गिरो गिरो जैसे गिरती है बर्फ़ ऊँची चोटियों पर जहाँ से फूटती हैं मीठे पानी की नदियाँ गिरो प्यासे हलक़ में एक घूँट जल की तरह रीते पात्र में पानी की तरह गिरो उसे भरे जाने के संगीत से भरते हुए गिरो आँसू की एक बूँद की तरह किसी के दुख में गेंद की तरह गिरो खेलते बच्चों के बीच गिरो पतझर की पहली पत्ती की तरह एक कोंपल के लिए जगह ख़ाली करते हुए गाते हुए ऋतुओं का गीत “कि जहाँ पत्तियाँ नहीं झरतीं वहाँ वसंत नहीं आता” गिरो पहली ईंट की तरह नींव में किसी का घर बनाते हुए गिरो जलप्रपात की तरह टरबाइन के पंखे घुमाते हुए अँधेरे पर रोशनी की तरह गिरो गिरो गीली हवाओं पर धूप की तरह इंदधनुष रचते हुए लेकिन रुको आज तक सिर्फ़ इंदधनुष ही रचे गए हैं उसका कोई तीर नहीं रचा गया तो गिरो, उससे छूटे तीर की तरह बंजर ज़मीन को वनस्पतियों और फूलों से रंगीन बनाते हुए बारिश की तरह गिरो, सूखी धरती पर पके हुए फल की तरह धरती को अपने बीज सौंपते हुए गिरो गिर गए बाल दाँत गिर गए गिर गई नज़र और स्मृतियों के खोखल से गिरते चले जा रहे हैं नाम, तारीख़ें, और शहर और चेहरे... और रक्तचाप गिर रहा है देह का तापमान गिर रहा है गिर रही है ख़ून में मिक़दार होमोग्लोबीन की खड़े क्या हो बिजूके से नरेश, इससे पहले कि गिर जाए समूचा वजूद एकबारगी तय करो अपना गिरना अपने गिरने की सही वजह और वक़्त और गिरो किसी दुश्मन पर गाज की तरह गिरो उल्कापात की तरह गिरो वज्रपात की तरह गिरो मैं कहता हूँ गिरो। - नरेश सक्सेना 👉 Join @Hindi_Poems #HindiKavita
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"जनता का क्या है? जनता तो सीता है, जनता तो द्रौपदी है। रामराज आएगा, तो अग्नि-परीक्षा ले ली जाएगी। रावणराज आएगा, तो किडनैप कर ली जाएगी। पांडव आएँगे, दाँव में लगा देंगे। कौरव आएँगे, चीरहरण हो जाएगा। जनता का क्या है? जनता तो सीता है, जनता तो द्रौपदी है।" - अलंकार मिश्रा 👉 Join @Hindi_Poems #HindiKavita
मारे जाएँगे जो इस पागलपन में शामिल नहीं होंगे, मारे जाएँगे कठघरे में खड़े कर दिये जाएँगे जो विरोध में बोलेंगे जो सच-सच बोलेंगे, मारे जाएँगे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा कि किसी की कमीज हो उनकी कमीज से ज्यादा सफ़ेद कमीज पर जिनके दाग नहीं होंगे, मारे जाएँगे धकेल दिये जाएंगे कला की दुनिया से बाहर जो चारण नहीं होंगे जो गुण नहीं गाएंगे, मारे जाएँगे धर्म की ध्वजा उठाने जो नहीं जाएँगे जुलूस में गोलियां भून डालेंगी उन्हें, काफिर करार दिये जाएँगे सबसे बड़ा अपराध है इस समय निहत्थे और निरपराधी होना जो अपराधी नहीं होंगे, मारे जाएँगे ~ राजेश जोशी 👉 Join @Hindi_Poems #HindiKavita
कहानी जिस की थी उस के ही जैसा हो गया था मैं तमाशा करते करते ख़ुद तमाशा हो गया था मैं न मेरा नाम था न दाम बाज़ार-ए-मोहब्बत में बस उस ने भाव पूछा और महँगा हो गया था मैं कई दिन तक उसे देखा नहीं जब उस की खिड़की पर तो अपनी आँखों में खिड़की का पर्दा हो गया था मैं बिछड़ कर उस से तन्हाई का वो 'आलम रहा मुझ में कि इक दिन आइने में उस का चेहरा हो गया था मैं बुझा तो ख़ुद में इक चिंगारी भी बाक़ी नहीं रक्खी उसे तारा बनाने में अंधेरा हो गया था मैं बिता दी 'उम्र मैं ने उस की इक आवाज़ सुनने में उसे जब बोलना आया तो बहरा हो गया था मैं बहुत दिन बा'द वो इक दिन बिछड़ कर फिर मिला मुझ को मगर इस बार मिलते ही अकेला हो गया था मैं वो दुश्मन दोस्त बन कर घात में था अच्छे मौक़े की पता उस दिन चला जिस दिन निहत्ता हो गया था मैं सो ख़ुद को ढूँड कर इक रोज़ गोली मार दी मैं ने जिसे चाहा उसी की जाँ का ख़तरा हो गया था मैं ~ शकील आजमी 👉 Join @Hindi_Poems #HindiKavita
रोज़ कहाँ से कोई नया-पन अपने आप में लाएँगे रोज़ कहाँ से कोई नया-पन अपने आप में लाएँगे तुम भी तंग आ जाओगे इक दिन हम भी उक्ता जाएँगे चढ़ता दरिया एक न इक दिन ख़ुद ही किनारे काटेगा अपने हँसते चेहरे कितने तूफ़ानों को छुपाएँगे आग पे चलते चलते अब तो ये एहसास भी खो बैठे क्या होगा ज़ख़्मों का मुदावा दामन कैसे बचाएँगे वो भी कोई हम ही सा मासूम गुनाहों का पुतला था नाहक़ उस से लड़ बैठे थे अब मिल जाए मनाएँगे इस जानिब हम उस जानिब तुम बीच में हाइल एक अलाव कब तक हम तुम अपने अपने ख़्वाबों को झुलसाएँगे सरमा की रुत काट के आने वाले परिंदो ये तो कहो दूर देस को जाने वाले कब तक लौट के आएँगे तेज़ हवाएँ आँखों में तो रेत दुखों की भर ही गईं जलते लम्हे रफ़्ता रफ़्ता दिल को भी झुलसाएँगे महफ़िल महफ़िल अपना तअल्लुक़ आज है इक मौज़ू-ए-सुख़न कल तक तर्क-ए-तअल्लुक़ के भी अफ़्साने बन जाएँगे - बशर नवाज़ 👉 Join @Hindi_Poems #HindiKavita