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Ramdhari Singh Dinkar (राष्ट्रकवि दिनकर)

Ramdhari Singh Dinkar (राष्ट्रकवि दिनकर)

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Dedicated to Ramdhari Singh `Dinkar’ Ji Folded hands (23 September 1908 – 24 April 1974) For Paid Promotion @Hindi_Promotion_Bot

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  • अरुणोदय नई ज्योति से भीग रहा उदयाचल का आकाश, जय हो, आँखों के आगे यह सिमट रहा खग्रास। है फूट रही लालिमा, तिमिर की टूट रही घन कारा है, जय हो, कि स्वर्ग से छूट रही आशिष की ज्योतिधारा है। बज रहे किरण के तार, गूँजती है अंबर की गली-गली, आकाश हिलोरें लेता है, अरुणिमा बाँध धारा निकली। प्राची का रुद्ध कपाट खुला, ऊशा आरती सजाती है, कमला जयहार पिन्हाने को आतुर-सी दौड़ी आती है। जय हो उनकी, कालिमा धुली जिनके अशेष बलिदानों से, लाली का निर्झर फूट पड़ा जिनके शायक-संधानों से। परशवता-सिंधु तरण करके तट पर स्वदेश पग धरता है, दासत्व छूटता है, सिर से पर्वत का भार उतरता है। मंगल-मुहूर्त; रवि! उगो, हमारे क्षण ये बड़े निराले हैं, हम बहुत दिनों के बाद विजय का शंख फूँकनेवाले हैं। मंगल-मुहूर्त्त; तरुगण! फूलो, नदियो! अपना पय-दान करो, जंज़ीर तोड़ता है भारत, किन्नरियो! जय-जय गान करो। भगवान साथ हों, आज हिमालय अपनी ध्वजा उठाता है, दुनिया की महफ़िल में भारत स्वाधीन बैठने जाता है। आशिष दो वनदेवियो! बनी गंगा के मुख की लाज रहे, माता के सिर पर सदा बना आज़ादी का यह ताज रहे। आज़ादी का यह ताज बड़े तप से भारत ने पाया है, मत पूछो, इसके लिए देश ने क्या कुछ नहीं गँवाया है। जब तोप सामने खड़ी हुई, वक्षस्थल हमने खोल दिया, आई जो नियति तुला लेकर, हमने निज मस्तक तोल दिया। माँ की गोदी सूनी कर दी, ललनाओं का सिंदूर दिया, रोशनी नहीं घर की केवल, आँखों का भी दे नूर दिया। तलवों में छाले लिए चले बरसों तक रेगिस्तानों में, हम अलख जगाते फिरे युगों तक झंखाड़ों, वीरानों में। आज़ादी का यह ताज विजय-साका है मरनेवालों का, हथियारों के नीचे से ख़ाली हाथ उभरनेवालों का। इतिहास! जुगा इसको, पीछे तस्वीर अभी जो छूट गई, गाँधी की छाती पर जाकर तलवार स्वयं ही टूट गई। जर्जर वसुंधरे! धैर्य धरो, दो यह संवाद विवादी को, आज़ादी अपनी नहीं; चुनौती है रण के उन्मादी को। हो जहाँ सत्य की चिनगारी, सुलगे, सुलगे, वह ज्वाल बने, खोजे अपना उत्कर्ष अभय, दुर्दांत शिखा विकराल बने। सबकी निर्बाध समुन्नति का संवाद लिए हम आते हैं, सब हों स्वतंत्र, हरि का यह आशीर्वाद लिए हम आते हैं। आज़ादी नहीं, चुनौती है, है कोई वीर जवान यहाँ? हो बचा हुआ जिसमें अब तक मर मिटने का अरमान यहाँ? आज़ादी नहीं, चुनौती है, यह बीड़ा कौन उठाएगा? खुल गया द्वार, पर, कौन देश को मंदिर तक पहुँचाएगा? है कौन, हवा में जो उड़ते इन सपनों को साकार करे? है कौन उद्यमी नर, जो इस खंडहर का जीर्णोद्धार करे? माँ का अंचल है फटा हुआ, इन दो टुकड़ों को सीना है, देखें, देता है कौन लहू, दे सकता कौन पसीना है? रोली, लो उषा पुकार रही, पीछे मुड़कर टुक झुको-झुको पर, ओ अशेष के अभियानी! इतने पर ही तुम नहीं रुको। आगे वह लक्ष्य पुकार रहा, हाँकते हवा पर यान चलो, सुरधनु पर धरते हुए चरण, मेघों पर गाते गान चलो। पीछे ग्रह और उपग्रह का संसार छोड़ते बढ़े चलो, करगत फल-फूल-लताओं की मदिरा निचोड़ते बढ़े चलो। बदली थी जो पीछे छूटी, सामने रहा, वह तारा है, आकाश चीरते चलो, अभी आगे आदर्श तुम्हारा है। निकले हैं हम प्रण किए अमृत-घअ पर अधिकार जमाने को, इन ताराओं के पार, इंद्र के गढ़ पर ध्वजा उड़ाने को। सम्मुख असंख्य बाधाएँ हैं, गरदन मरोड़ते बढ़े चलो, अरुणोदय है, यह उदय नहीं, चट्टान फोड़ते बढ़े चलो। - रामधारी सिंह दिनकर Join 👉 @MahakaviDinkar

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  • आयी हुई मृत्यु से कहा अजेय भीष्म ने कि 'योग नहीं जाने का अभी है, इसे जानकर, रुकी रहो पास कहीं'; और स्वयं लेट गये बाणों का शयन, बाण का ही उपधान कर! व्यास कहते हैं, रहे यों ही वे पड़े विमुक्त, काल के करों से छीन मुष्टि-गत प्राण कर। और पंथ जोहती विनीत कहीं आसपास हाथ जोड़ मृत्यु रही खड़ी शास्ति मान कर। श्रृंग चढ जीवन के आर-पार हेरते-से योगलीन लेटे थे पितामह गंभीर-से। देखा धर्मराज ने, विभा प्रसन्न फैल रही श्वेत शिरोरुह, शर-ग्रथित शरीर-से। करते प्रणाम, छूते सिर से पवित्र पद, उँगली को धोते हुए लोचनों के नीर से, "हाय पितामह, महाभारत विफल हुआ" चीख उठे धर्मराज व्याकुल, अधीर-से। "वीर-गति पाकर सुयोधन चला गया है, छोड़ मेरे सामने अशेष ध्वंस का प्रसार; छोड़ मेरे हाथ में शरीर निज प्राणहीन, व्योम में बजाता जय-दुन्दुभि-सा बार-बार; और यह मृतक शरीर जो बचा है शेष, चुप-चुप, मानो, पूछता है मुझसे पुकार- विजय का एक उपहार मैं बचा हूँ, बोलो, जीत किसकी है और किसकी हुई है हार? "हाय, पितामह, हार किसकी हुई है यह? ध्वन्स-अवशेष पर सिर धुनता है कौन? कौन भस्नराशि में विफल सुख ढूँढता है? लपटों से मुकुट क पट बुनता है कौन? और बैठ मानव की रक्त-सरिता के तीर नियति के व्यंग-भरे अर्थ गुनता है कौन? कौन देखता है शवदाह बन्धु-बान्धवों का? उत्तरा का करुण विलाप सुनता है कौन? "जानता कहीं जो परिणाम महाभारत का, तन-बल छोड़ मैं मनोबल से लड़ता; तप से, सहिष्णुता से, त्याग से सुयोधन को जीत, नयी नींव इतिहास कि मैं धरता। और कहीं वज्र गलता न मेरी आह से जो, मेरे तप से नहीं सुयोधन सुधरता; तो भी हाय, यह रक्त-पात नहीं करता मैं, भाइयों के संग कहीं भीख माँग मरता। "किन्तु, हाय, जिस दिन बोया गया युद्ध-बीज, साथ दिया मेर नहीं मेरे दिव्य ज्ञान ने; उलत दी मति मेरी भीम की गदा ने और पार्थ के शरासन ने, अपनी कृपान ने; और जब अर्जुन को मोह हुआ रण-बीच, बुझती शिखा में दिया घृत भगवान ने; सबकी सुबुद्धि पितामह, हाय, मारी गयी, सबको विनष्ट किया एक अभिमान ने। - रामधारी सिंह दिनकर Join 👉 @MahakaviDinkar

  • 21 июл.1 28025

    "फूलों की कोमल पंखुडियाँ बिखरें जिसके अभिनंदन में। मकरंद मिलाती हों अपना स्वागत के कुंकुम चंदन में। कोमल किसलय मर्मर-रव-से जिसका जयघोष सुनाते हों। जिसमें दुख-सुख मिलकर मन के उत्सव आनंद मनाते हों। उज्ज्वल वरदान चेतना का सौंदर्य जिसे सब कहते हैं। जिसमें अनंत अभिलाषा के सपने सब जगते रहते हैं। मैं उसी चपल की धात्री हूँ गौरव महिमा हूँ सिखलाती। ठोकर जो लगने वाली है उसको धीरे से समझाती। मैं देव-सृष्टि की रति-रानी निज पंचबाण से वंचित हो। बन आवर्जना-मूर्त्ति दीना अपनी अतृप्ति-सी संचित हो। अवशिष्ट रह गई अनुभव में अपनी अतीत असफलता-सी। लीला विलास की खेद-भरी अवसादमयी श्रम-दलिता-सी। मैं रति की प्रतिकृति लज्जा हूँ मैं शालीनता सिखाती हूँ। मतवाली सुंदरता पग में नूपुर सी लिपट मनाती हूँ। लाली बन सरल कपोलों में आँखों में अंजन सी लगती। कुंचित अलकों सी घुंघराली मन की मरोर बनकर जगती। चंचल किशोर सुंदरता की मैं करती रहती रखवाली। मैं वह हलकी सी मसलन हूँ जो बनती कानों की लाली।" "हाँ, ठीक, परंतु बताओगी मेरे जीवन का पथ क्या है? इस निविड़ निशा में संसृति की आलोकमयी रेखा क्या है? यह आज समझ तो पाई हूँ मैं दुर्बलता में नारी हूँ। अवयव की सुंदर कोमलता लेकर मैं सबसे हारी हूँ। पर मन भी क्यों इतना ढीला अपना ही होता जाता है, घनश्याम-खंड-सी आँखों में क्यों सहसा जल भर आता है? सर्वस्व-समर्पण करने की विश्वास-महा-तरू-छाया में। चुपचाप पड़ी रहने की क्यों ममता जगती है माया में? छायापथ में तारक-द्युति सी झिलमिल करने की मधु-लीला। अभिनय करती क्यों इस मन में कोमल निरीहता श्रम-शीला? निस्संबल होकर तिरती हूँ इस मानस की गहराई में। चाहती नहीं जागरण कभी सपने की इस सुधराई में। नारी जीवन का चित्र यही, क्या? विकल रंग भर देती हो, अस्फुट रेखा की सीमा में आकार कला को देती हो। रूकती हूँ और ठहरती हूँ पर सोच-विचार न कर सकती। पगली सी कोई अंतर में बैठी जैसे अनुदिन बकती। मैं जब भी तोलने का करती उपचार स्वयं तुल जाती हूँ। भुजलता फँसा कर नर-तरु से झूले सी झोंके खाती हूँ। इस अर्पण में कुछ और नहीं केवल उत्सर्ग छलकता है। मैं दे दूँ और न फिर कुछ लूँ इतना ही सरल झलकता है।" "क्या कहती हो ठहरो नारी! संकल्प अश्रु-जल-से-अपने। तुम दान कर चुकी पहले ही जीवन के सोने-से सपने। नारी! तुम केवल श्रद्धा हो विश्वास-रजत-नग पगतल में। पीयूष-स्रोत-सी बहा करो जीवन के सुंदर समतल में। देवों की विजय, दानवों की हारों का होता-युद्ध रहा। संघर्ष सदा उर-अंतर में जीवित रह नित्य-विरूद्ध रहा। आँसू से भींगे अंचल पर मन का सब कुछ रखना होगा- तुमको अपनी स्मित रेखा से यह संधिपत्र लिखना होगा। - जयशंकर प्रसाद

  • 20 июл.1 2304

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  • 20 июл.1 1305

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  • 18 июл.1 4513

    फलेगी डालों में तलवार धनी दे रहे सकल सर्वस्व, तुम्हें इतिहास दे रहा मान; सहस्रों बलशाली शार्दूल चरण पर चढ़ा रहे हैं प्राण। दौड़ती हुई तुम्हारी ओर जा रहीं नदियाँ विकल, अधीर; करोड़ों आँखें पगली हुईं, ध्यान में झलक उठी तस्वीर। पटल जैसे-जैसे उठ रहा, फैलता जाता है भूडोल। हिमालय रजत-कोष ले खड़ा, हिंद-सागर ले खड़ा प्रवाल, देश के दरवाज़े पर रोज़ खड़ी होती ऊषा ले माल। कि जाने तुम आओ किस रोज़ बजाते नूतन रुद्र-विषाण, किरण के रथ पर हो आसीन लिए मुट्ठी में स्वर्ण-विहान। स्वर्ग जो हाथों को है दूर, खेलता उससे भी मन लुब्ध। धनी देते जिसको सर्वस्व, चढ़ाते बली जिसे निज प्राण, उसी का लेकर पावन नाम क़लम बोती है अपने गान। गान, जिनके भीतर संतप्त जाति का जलता है आकाश; उबलते गरल, द्रोह, प्रतिशोध, दर्प से बलता है विश्वास। देश की मिट्टी का असि-वृक्ष, गान-तरु होगा जब तैयार, खिलेंगे अंगारों के फूल, फलेगी डालों में तलवार। चटकती चिनगारी के फूल, सजीले वृंतों के शृंगार, विवशता के विषजल में बुझी, गीत की, आँसू की तलवार। - रामधारी सिंह दिनकर Join 👉 @MahakaviDinkar

  • 14 мая3 014103

    फिरा कर्ण, त्यों 'साधु-साधु' कह उठे सकल नर-नारी, राजवंश के नेताओं पर पड़ी विपद् अति भारी। द्रोण, भीष्म, अर्जुन, सब फीके, सब हो रहे उदास, एक सुयोधन बढ़ा, बोलते हुए, 'वीर! शाबाश !' द्वन्द्व-युद्ध के लिए पार्थ को फिर उसने ललकारा, अर्जुन को चुप ही रहने का गुरु ने किया इशारा। कृपाचार्य ने कहा- 'सुनो हे वीर युवक अनजान' भरत-वंश-अवतंस पाण्डु की अर्जुन है संतान। 'क्षत्रिय है, यह राजपुत्र है, यों ही नहीं लड़ेगा, जिस-तिस से हाथापाई में कैसे कूद पड़ेगा? अर्जुन से लड़ना हो तो मत गहो सभा में मौन, नाम-धाम कुछ कहो, बताओ कि तुम जाति हो कौन?' 'जाति! हाय री जाति !' कर्ण का हृदय क्षोभ से डोला, कुपित सूर्य की ओर देख वह वीर क्रोध से बोला 'जाति-जाति रटते, जिनकी पूँजी केवल पाषंड, मैं क्या जानूँ जाति ? जाति हैं ये मेरे भुजदंड। 'ऊपर सिर पर कनक-छत्र, भीतर काले-के-काले, शरमाते हैं नहीं जगत् में जाति पूछनेवाले। सूत्रपुत्र हूँ मैं, लेकिन थे पिता पार्थ के कौन? साहस हो तो कहो, ग्लानि से रह जाओ मत मौन। 'मस्तक ऊँचा किये, जाति का नाम लिये चलते हो, पर, अधर्ममय शोषण के बल से सुख में पलते हो। अधम जातियों से थर-थर काँपते तुम्हारे प्राण, छल से माँग लिया करते हो अंगूठे का दान। - Ramdhari Singh Dinkar, रश्मिरथी Join 👉 @MahakaviDinkar

  • 25 авг. 2025 г.10,6 тыс5126

    दो न्याय अगर तो आधा दो, पर, इसमें भी यदि बाधा हो, तो दे दो केवल पाँच ग्राम, रक्खो अपनी धरती तमाम। हम वहीं खुशी से खायेंगे, परिजन पर असि न उठायेंगे! दुर्योधन वह भी दे ना सका, आशिष समाज की ले न सका, उलटे, हरि को बाँधने चला, जो था असाध्य, साधने चला। जन नाश मनुज पर छाता है, पहले विवेक मर जाता है। हरि ने भीषण हुंकार किया, अपना स्वरूप-विस्तार किया, डगमग-डगमग दिग्गज डोले, भगवान् कुपित होकर बोले- 'जंजीर बढ़ा कर साध मुझे, हाँ, हाँ दुर्योधन! बाँध मुझे। यह देख, गगन मुझमें लय है, यह देख, पवन मुझमें लय है, मुझमें विलीन झंकार सकल, मुझमें लय है संसार सकल। अमरत्व फूलता है मुझमें, संहार झूलता है मुझमें। - Ramdhari Singh Dinkar, रश्मिरथी Join 👉 @MahakaviDinkar

  • क्षमा शोभती उस भुजंग को, जिसके पास गरल हो क्षमा, दया, तप, त्याग, मनोबल सबका लिया सहारा पर नर व्याघ्र सुयोधन तुमसे कहो, कहाँ, कब हारा? क्षमाशील हो रिपु-समक्ष तुम हुये विनत जितना ही दुष्ट कौरवों ने तुमको कायर समझा उतना ही। अत्याचार सहन करने का कुफल यही होता है पौरुष का आतंक मनुज कोमल होकर खोता है। क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो उसको क्या जो दंतहीन विषरहित, विनीत, सरल हो। तीन दिवस तक पंथ मांगते रघुपति सिन्धु किनारे, बैठे पढ़ते रहे छन्द अनुनय के प्यारे-प्यारे। उत्तर में जब एक नाद भी उठा नहीं सागर से उठी अधीर धधक पौरुष की आग राम के शर से। सिन्धु देह धर त्राहि-त्राहि करता आ गिरा शरण में चरण पूज दासता ग्रहण की बँधा मूढ़ बन्धन में। सच पूछो, तो शर में ही बसती है दीप्ति विनय की सन्धि-वचन संपूज्य उसी का जिसमें शक्ति विजय की। सहनशीलता, क्षमा, दया को तभी पूजता जग है बल का दर्प चमकता उसके पीछे जब जगमग है। - रामधारी सिंह "दिनकर" Join 👉 @MahakaviDinkar

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  • कृष्ण की चेतावनी वर्षों तक वन में घूम-घूम, बाधा-विघ्नों को चूम-चूम, सह धूप-घाम, पानी-पत्थर, पांडव आये कुछ और निखर। सौभाग्य न सब दिन सोता है, देखें, आगे क्या होता है। मैत्री की राह बताने को, सबको सुमार्ग पर लाने को, दुर्योधन को समझाने को, भीषण विध्वंस बचाने को, भगवान् हस्तिनापुर आये, पांडव का संदेशा लाये। ‘दो न्याय अगर तो आधा दो, पर, इसमें भी यदि बाधा हो, तो दे दो केवल पाँच ग्राम, रक्खो अपनी धरती तमाम। हम वहीं खुशी से खायेंगे, परिजन पर असि न उठायेंगे! दुर्योधन वह भी दे ना सका, आशिष समाज की ले न सका, उलटे, हरि को बाँधने चला, जो था असाध्य, साधने चला। जब नाश मनुज पर छाता है, पहले विवेक मर जाता है। हरि ने भीषण हुंकार किया, अपना स्वरूप-विस्तार किया, डगमग-डगमग दिग्गज डोले, भगवान् कुपित होकर बोले- ‘जंजीर बढ़ा कर साध मुझे, हाँ, हाँ दुर्योधन! बाँध मुझे। यह देख, गगन मुझमें लय है, यह देख, पवन मुझमें लय है, मुझमें विलीन झंकार सकल, मुझमें लय है संसार सकल। अमरत्व फूलता है मुझमें, संहार झूलता है मुझमें। ‘उदयाचल मेरा दीप्त भाल, भूमंडल वक्षस्थल विशाल, भुज परिधि-बन्ध को घेरे हैं, मैनाक-मेरु पग मेरे हैं। दिपते जो ग्रह नक्षत्र निकर, सब हैं मेरे मुख के अन्दर। ‘दृग हों तो दृश्य अकाण्ड देख, मुझमें सारा ब्रह्माण्ड देख, चर-अचर जीव, जग, क्षर-अक्षर, नश्वर मनुष्य सुरजाति अमर। शत कोटि सूर्य, शत कोटि चन्द्र, शत कोटि सरित, सर, सिन्धु मन्द्र। ‘शत कोटि विष्णु, ब्रह्मा, महेश, शत कोटि विष्णु जलपति, धनेश, शत कोटि रुद्र, शत कोटि काल, शत कोटि दण्डधर लोकपाल। जञ्जीर बढ़ाकर साध इन्हें, हाँ-हाँ दुर्योधन! बाँध इन्हें। ‘भूलोक, अतल, पाताल देख, गत और अनागत काल देख, यह देख जगत का आदि-सृजन, यह देख, महाभारत का रण, मृतकों से पटी हुई भू है, पहचान, इसमें कहाँ तू है। ‘अम्बर में कुन्तल-जाल देख, पद के नीचे पाताल देख, मुट्ठी में तीनों काल देख, मेरा स्वरूप विकराल देख। सब जन्म मुझी से पाते हैं, फिर लौट मुझी में आते हैं। ‘जिह्वा से कढ़ती ज्वाल सघन, साँसों में पाता जन्म पवन, पड़ जाती मेरी दृष्टि जिधर, हँसने लगती है सृष्टि उधर! मैं जभी मूँदता हूँ लोचन, छा जाता चारों ओर मरण। ‘बाँधने मुझे तो आया है, जंजीर बड़ी क्या लाया है? यदि मुझे बाँधना चाहे मन, पहले तो बाँध अनन्त गगन। सूने को साध न सकता है, वह मुझे बाँध कब सकता है? ‘हित-वचन नहीं तूने माना, मैत्री का मूल्य न पहचाना, तो ले, मैं भी अब जाता हूँ, अन्तिम संकल्प सुनाता हूँ। याचना नहीं, अब रण होगा, जीवन-जय या कि मरण होगा। ‘टकरायेंगे नक्षत्र-निकर, बरसेगी भू पर वह्नि प्रखर, फण शेषनाग का डोलेगा, विकराल काल मुँह खोलेगा। दुर्योधन! रण ऐसा होगा। फिर कभी नहीं जैसा होगा। ‘भाई पर भाई टूटेंगे, विष-बाण बूँद-से छूटेंगे, वायस-श्रृगाल सुख लूटेंगे, सौभाग्य मनुज के फूटेंगे। आखिर तू भूशायी होगा, हिंसा का पर, दायी होगा।’ थी सभा सन्न, सब लोग डरे, चुप थे या थे बेहोश पड़े। केवल दो नर ना अघाते थे, धृतराष्ट्र-विदुर सुख पाते थे। कर जोड़ खड़े प्रमुदित, निर्भय, दोनों पुकारते थे ‘जय-जय’! - रामधारी सिंह "दिनकर" Join 👉 @MahakaviDinkar

  • समुद्र का पानी बहुत दूर पर अट्टहास कर सागर हँसता है। दशन फेन के, अधर व्योम के। ऐसे में सुन्दरी! बेचने तू क्या निकली है, अस्त-व्यस्त, झेलती हवाओं के झकोर सुकुमार वक्ष के फूलों पर? सरकार! और कुछ नहीं, बेचती हूँ समुद्र का पानी। तेरे तन की श्यामता नील दर्पण-सी है, श्यामे! तूने शोणित में है क्या मिला लिया? सरकार! और कुछ नहीं, रक्त में है समुद्र का पानी। माँ! ये तो खारे आँसू हैं, ये तुझको मिले कहाँ से? - रामधारी सिंह "दिनकर" Join 👉 @MahakaviDinkar