Imam Khamenei | Hindi: Archives
Статистикаइमाम ख़ामेनई: हिन्दी का आर्काइव: (अन-ऑफ़िशियल । नॉन-फ़ंडेड)
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🇮🇷: 🏴 | 24/08/2024 को हुसैनिया इमाम ख़ुमैनी (र), तेहरान में रहबर-ए-इंक़िलाब-ए-इस्लामी इमाम सय्यद अली ख़ामेनई (द) की तरफ़ से इमाम अली रज़ा (अ) की शहादत पर मजलिस-ए-अज़ा मुन'अक़िद हुई, जिसमें हज़ारों अज़ादारों ने हिस्सा लिया। इस मजलिस के बाद रहबर ने ख़िताब किया। (तीसरा/आख़िरी हिस्सा) - आज अल्हम्दुलिल्लाह इत्तिहाद मौजूद है। इस इत्तिहाद को 'अवाम को बरक़रार रखना चाहिए। मुल्क के ज़िम्मेदारान, ख़ास तौर पर तीनों शाख़ों के ज़िम्मेदारान, जो अल्हम्दुलिल्लाह आज मुक़म्मल इत्तिहाद और हमआहंगी के साथ काम कर रहे हैं, इस इत्तिहाद को क़ायम रखें। मुल्क के ख़ादिमीन की 'अवाम हिमायत करें; प्रेसिडेंट की हिमायत करें। प्रेसिडेंट; मेहनती और फ़ाअल हैं; ऐसे मेहनती, फ़ाअल अवामिल की क़द्र करनी चाहिए। - क़ौम और हुकूमत के बीच इत्तिहाद, निज़ाम के मुख़्तलिफ़ ज़िम्मेदारान के बीच इत्तिहाद, फ़ौजों और 'अवाम के बीच इत्तिहाद, 'अवाम के मुख़्तलिफ़ हिस्सों के बीच इत्तिहाद—ये सब कुछ पूरी क़ुव्वत के साथ बरक़रार रखना चाहिए; ये मेरी क़तई सिफ़ारिश है। - मैं अलामात और दलाएल की बुनियाद पर ये महसूस करता हूँ कि आज दुश्मन की सबसे बड़ी कोशिश ये है कि इस हमआहंगी, इत्तिहाद और तव्अवुन को नुक़सान पहुँचाया जाए; आज दुश्मन मुख़्तलिफ़ तरीक़ों से ये काम कर रहा है, 'अवाम को होशियार रहना चाहिए। - यक़ीनन कुछ लोगों के मुख़्तलिफ़ मसाइल पर मुख़्तलिफ़ आरा हो सकती हैं; इसमें कोई मसला नहीं, लेकिन अहल-ए फ़िक्र को समझना चाहिए कि एक नया ख़्याल पेश करना जो ईरान की कौम की मौज़ूदा सूरत-ए हाल को मुकम्मल करे, इसका फ़र्क़ है तख़रीब और तौहीन से जम्हूरी इस्लामी के बुनियादी उसूलों को नुक़सान न पहुँचाएँ। यही उसूल हैं जिन्होंने इस क़ौम को इतना बुलंद किया, इस मुल्क को इतना तरक्क़ी दिया और इस कौम को ये ताक़त दी। - अगर ये उसूल मुकम्मल करने, इज़ाफ़ा करने या इस्लाह करने की ज़रूरत हो तो कोई मसला नहीं, लेकिन तख़रीब नहीं होनी चाहिए; तख़रीब दुश्मन की ख़्वाहिश है। और तीनों शाख़ों के बीच तआवुन, पार्लियामेंट और हुकूमत, अदलिया, फ़ौजे और दूसरे के बीच तअव्वुन को जारी रखना चाहिए। - आज हमारा दुश्मन, वो दुश्मन जो हमारे सामने है, यानी सहयुनी अड्डा, दुनिया का सबसे बदनाम हुकूमत है। क़ौमें भी सहयुनी हुकूमत से नफ़रत करती हैं, इससे बेज़ार हैं; और हुकूमतें भी इस हुकूमत, सहयुनी हुकूमत की मज़म्मत करती हैं। - देखें, वो मग़रीबी मुल्कों के सरबराह जो हमेशा सहयुनी हुकूमत के हामी रहे हैं, आज उन्हें मज़म्मत कर रहे हैं; अलबत्ता ये सिर्फ़ ज़बानी मज़म्मत है; ये कम है, ज़बानी मज़म्मत का कोई फ़ायदा नहीं। जो ज़ुल्म आज सहयूनी हुकूमत के सरबराह कर रहे हैं, मेरे ख़्याल में ये तारीख़ में बे-मिसाल है। बच्चों को भूख और प्यास से मारना; बच्चों को भूख और प्यास से क़त्ल करना; बच्चे जो खाने के लिए कहीं आए, उन पर फायरिंग करना; ये दुनिया में, जितना मैं तारीख़ से वाक़िफ़ हूँ, बे-मिसाल है। - ये ज़ुल्म कौमों को बेज़ार कर चुका है; इसके मुक़ाबिल खड़ा होना ज़रूरी है। खड़े होना सिर्फ़ ज़बानी नहीं होना चाहिए कि हुकूमतें कहें कि हम मुख़ालिफ़ हैं, हम मज़म्मत करते हैं—यहाँ तक कि फ़्रांस, ब्रिटेन और दूसरी हुकूमतें भी मज़म्मत कर चुकी हैं—ये फ़ायदेमंद नहीं है। ज़रूरी है कि सहयूनी हुकूमत की मदद के रास्ते बंद किए जाएँ; इनकी मदद के तमाम रास्ते मुक़म्मल तौर पर बंद किए जाएँ। - आज जो काम बहादुर यमन के 'अवाम कर रहे हैं, वो दुरुस्त काम है; ये सही रास्ता है। सहयुनी हुकूमत के सरबराहों के किए जाने वाले ज़ुल्म के मुक़ाबिल कोई और रास्ता नहीं है, सिवा इसके कि इन की मदद के तमाम रास्ते हर तरफ़ से मुक़म्मल तौर पर बंद किए जाएँ। - यक़ीनन, हर काम जो जम्हूरी इस्लामी के लिए मुमकिन हो, हर काम जो मुमकिन हो, हम मुक़म्मल तैयारी रखते हैं और उम्मीद रखते हैं कि इनशाअल्लाह खुदावंद-ए-आलम; ईरान की क़ौम की कोशिशों को बरकत दे, इस मुहलक और गहरी बिमारी की जड़ (सहयुनी हुकूमत) को इस मुसीबत से ख़त्म करे, और इनशाअल्लाह मुस्लिम कौमों को बेदार करे और एक दूसरे के साथ मुत्तहिद करे। वालसलामु अलैकुम व रहमतुल्लाह व बरकातुहु ✅ Join: WhatsApp | Telegram | Instagram
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🇮🇷: 🏴 | 24/08/2024 को हुसैनिया इमाम ख़ुमैनी (र), तेहरान में रहबर-ए-इंक़िलाब-ए-इस्लामी इमाम सय्यद अली ख़ामेनई (द) की तरफ़ से इमाम अली रज़ा (अ) की शहादत पर मजलिस-ए-अज़ा मुन'अक़िद हुई, जिसमें हज़ारों अज़ादारों ने हिस्सा लिया। इस मजलिस के बाद रहबर ने ख़िताब किया। (दूसरा हिस्सा) - जहाँ तक मौजूदा मुल्की मसाइल का तअल्लुक़ है, कुछ झड़पें हुईं और ईरान की क़ौम पर एक जंग मुसल्लत की गई; लेकिन क़ौम ने पूरी क़ुव्वत और ताक़त के साथ मुक़ाबला किया और दुनिया की तवज्जु़ह हासिल की। इन वाक़ियात की बदौलत, ईरान ने दुनिया के लोगों की नज़र में एक ख़ास इज़्ज़त और नई इज़्ज़त हासिल की। ये सब इस वाक़िए से मुतअल्लिक़ है। - जो लोग कहते हैं, “जनाब! अमरीका के ख़िलाफ़ नारे न लगाएँ, वो ग़ुस्सा हो जाएँगे, आप से दुश्मनी करेंगे”, ये लोग ज़ाहिरी नज़र रखने वाले हैं। जो लोग ये तज्ज़िया करते हैं कि “क्यों अमरीका के साथ डायरेक्ट मुआमलात नहीं करते, अपने मसाइल हल नहीं करते”, मेरे ख़्याल में ये भी ज़ाहिरी नज़र रखने वाले हैं। अस्ल मसला ऐसा नहीं है; ये मसला हल होने वाला नहीं है। वो चाहते हैं कि ईरान; अमरीका के ताबेय रहे। - ईरान की क़ौम; इस बड़ी तौहीन से शदीद रंज़ीदा होती है, और जिस शख़्स या ग्रुप को ईरान की क़ौम से ये ग़लत तवक़्क़ो है, ईरान पूरी ताक़त के साथ उसके मुक़ाबिल खड़ा होता है। हालिया जंग भी इसी वजह से हुई। सहयुनी हुकूमत को आगे बढ़ाया गया, उभारा गया, उन्हें रज़ामंद किया गया, मदद की गई ताकि ईरान पर हमला करे और अपने ख़्याल में ईरान और जम्हूरी इस्लामी का काम ख़त्म कर दें। लेकिन उन्होंने ये तसव्वुर नहीं किया कि ईरान उनकी हरकत के जवाब में इतनी मजबूत तरीक़े से उन्हें सबक़ देगा कि वो पशेमान हो जाएँगे; ये तसव्वुर उनके पास नहीं था। - उन्होंने ख़्याल किया कि इस हमले से ईरान का काम ख़त्म हो जाएगा। देखें; 13 जून को ईरान पर हमला हुआ, और एक दिन बाद—यानी 14 जून को—अमरीका के कुछ एजेंट्स ने एक यूरोपी राजधानी में इज्लास किया और जम्हूरी इस्लामी के तख़्ता-पलट पर बहस शुरू की! मैंने ये टेलीविज़न पर भी दो तीन दिन पहले सुना, लेकिन हमें उस वक़्त ये ख़बर दी गई थी। यानी वो इतने पुर-इत्तिमाद थे कि इस हमले से जम्हूरी इस्लामी की बुनियादें हिल जाएँगी?; वो इतने पुर-इत्तिमाद थे कि लोग जम्हूरी इस्लामी के ख़िलाफ़ हो जाएँगे। वो इतने यक़ीन रखते थे कि हमले के एक दिन बाद इज्लास करके ये बहस की गई कि जम्हूरी इस्लामी के बाद कौन, किस हुकूमत और किस तरह हुकूमत करेगा! हत्ता कि ईरान के लिए बादशाह भी मुक़र्रर किया गया कि फुलांशख़्स ईरान का बादशाह हो! वो ईरान के बारे में इस तरह ख़्याल करते थे। - वो समझते थे कि इस हमले से निज़ाम और 'अवाम के बीच फ़ासले पैदा होंगे, निज़ाम कमज़ोर होगा, और वो अपने सफ़्फ़ाक़ और शरपरस्ताना मक़ासिद पर क़ाबू पा सकेंगे; लेकिन “ईरान की क़ौम”—ये हम बार-बार कह चुके हैं, और मैं दोबारा जोर देता हूँ—ईरान की क़ौम ने अपनी मुज़ाहमत के साथ, मुसल्लह अफ़वाज के साथ, हुकूमत और निज़ाम के साथ खड़े होकर, उन सब के मुँह पर एक मजबूत घुसा मारा! - इन बेवक़ुफ़ लोगों के बीच जो जम्हूरी इस्लामी के तख़्ता-पलट के लिए ईरान में बैठे थे, एक ईरानी भी था; इस ईरानी पर लानत जो अपने ही मुल्क के नुक़सान में, यहूद, सहयूनी और अमरीका के फ़ायदे के लिए बैठा और सरगर्म था! - यक़ीनन ये वो वक़्त था जब हमारे मुसल्लह फ़ौजों ने अपनी मुक़म्मल ताक़त नहीं दिखाई थी; ये इब्तिदाई दिन, यानी पहले और दूसरे दिन थे। बाद में, अल्हम्दुलिल्लाह, फ़ौजों ने बड़े कारनामे अंज़ाम दिए, जिन के लिए ईरान की पूरी क़ौम का शुक्रिया वाजिब है, और हम उनका शुक्रिया अदाअ करते हैं। इनशाअल्लाह मुस्तक़बिल में भी ईरान की क़ौम की क़ुव्वत और सलाहियत फ़ौजों में दिन ब-दिन बढ़ती रहेगी। - एक और नुक्ता यहाँ मौजूद है जो मैं बयान करना चाहता हूँ। इन वाक़ियात से दुश्मनों ने जो नतीजा अख़्ज़ किया वो ये है कि ईरान को जंग या फ़ौजी हमले से घटने टेकने पर मजबूर नहीं किया जा सकता; जम्हूरी इस्लामी को इन सख़्त और ज़ालिमाना जंजाल से पीछे नहीं ढकेला जा सकता। वो पिछले 45 साल से ये कोशिशें कर रहे हैं; और रोज़-ब-रोज़ जम्हूरी इस्लामी मजबूत तर हो रही है। - उन्होंने देखा कि हल ये है कि अंदरून-ए-मुल्क इख़्तिलाफ़ और निफ़ाक़ पैदा किया जाए; यक़ीनन उनके कुछ अवामिल भी मुल्क में मौजूद हैं; सहयुनियों और अमरीका के मुताबिक़, जो मुल्क के गोशे व-किनार में हैं; उनके ज़रिए या उन लोगों के ज़रिए जो ग़फ़लत से बोलते और लिखते हैं, लोगों में इख़्तिलाफ़ पैदा करने और मुल्क में मसले पैदा करने की कोशिश की जाती है। ✅ Join: WhatsApp | Telegram | Instagram
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🇮🇷: 🏴 | 24/08/2024 को हुसैनिया इमाम ख़ुमैनी (र), तेहरान में रहबर-ए-इंक़िलाब-ए-इस्लामी इमाम सय्यद अली ख़ामेनई (द) की जानिब से इमाम अली रज़ा (अ) की शहादत पर मजलिस-ए-अज़ा मुन'अक़िद हुई, जिसमें हज़ारों अज़ादारों ने हिस्सा लिया। इस मजलिस के बाद रहबर ने ख़िताब किया। (पहला हिस्सा): • मैं ता’ज़ियत पेश करता हूँ कि आलम-ए वजूद के वली-ए नेअमत, ख़ास तौर पर हम ईरानियों के इमाम-ए रऊफ़, अली बिन मूसा अर-रज़ा (अ) की शहादत पर। ये मजलिस भी इन्हीं बुज़ुर्गवार की इनायत है कि हमें ये मौक़ा मिला कि हम इस गर्म ओ-पुरजोश मजलिस का इं’इक़ाद कर सकें। मैं इमाम-ए रऊफ़ के बारे में एक बात अर्ज़ करूँगा, और एक बात मौजूदा रोज़मर्रा के मसाइल के बारे में भी अर्ज़ करूँगा। • इमाम रज़ा (अ) की ज़िंदगी में बड़े-बड़े वाक़ियात बार-बार पेश आए हैं, जिनमें से एक वो वाक़िया है जब आप मदीना से तुस और मर्व, यानी ख़ुरासान तशरीफ़ लाए। इन बुज़ुर्गवार की ज़िंदगी में और मुख़्तलिफ़ वाक़ियात भी मौजूद हैं। लेकिन जो नतीजा इस ख़ुरासान के सफ़र से निकला, वो अहल-ए बैत (अ) के मक्तब के लिए फ़ायदे और बरकात का मजमूआ' है। यानी अगर्चे ये सफ़र जब्री था और इन बुज़ुर्गवार ने अपनी मर्ज़ी से ख़ुरासान की तरफ़ हरकत नहीं की, मगर अल्लाह ने इस सफ़र को बरकत अता की, और जो वाक़ियात पेश आए, चाहे सफ़र के दौरान, या इस बुज़ुर्गवार की शहादत के बाद, वो सब बड़े अहम वाक़ियात थे। मैं दो मिसालों का ज़िक्र करूँगा। • एक पहलू, अहल-ए बैत (अ) के मक्तब का गैर-मा’मूली इन्तिशार है। ये मक्तब पहले तन्हा और मज़लूम था। इमाम हुसैन (अ) की शहादत के बाद, उस वक़्त की इस्लामी दुनिया के हर गोशे में शियों को ज़िंदगी की मुख़्तलिफ़ मुश्किलात का सामना था, जिस्मानी मुश्किलात, मआशी परेशानियाँ और रूहानी तकलीफ़ें। धीरे-धीरे ये हालत कम होने लगी, इमाम बाक़िर (अ) के दौर में कुछ हद तक, इमाम सादिक़ (अ) के दौर में ज़्यादा, और हज़रत मूसा बिन जाफ़र (अ) के दौर में और ज़्यादा। लेकिन इमाम रज़ा (अ) के दौर में तशय्यु का मक्तब पूरी इस्लामी दुनिया में इन्तिशार पा गया। तारीख़ के वाक़ियात से इंसान ये महसूस करता है कि इस सफ़र और इस हादिसे ने शियों और अहल-ए बैत (अ) के पैरोकारों के अंदर ऐसी रूह, ऐसा हौसला और ऐसी जान फूँक दी, जिसने तशय्यु को महफ़ूज़ रखा और उसे बाक़ी रखा। आज तक़रीबन बारह सौ साल गुज़र चुके हैं, लेकिन अहल-ए बैत (अ) के मक्तब के मानने वाले रोज़-ब-रोज़ बढ़ते गए, या तो शिया, या ऐसे लोग जो रस्मी तौर पर शिया नहीं हैं लेकिन अहल-ए बैत (अ) की तालिमात और उसूलों पर यक़ीन रखते हैं। ये सब इमाम रज़ा (अ) के उस सफ़र-ए बा-बरकत की बरकतों में से है। यानी मदीना से ख़ुरासान तक का ये सफ़र सिर्फ़ एक सफ़र नहीं था, बल्कि ऐसा वाक़िआ था जिसने तशय्यु को नई ज़िंदगी दी। उस बुज़ुर्गवार की मौजूदगी, पेश आने वाले हवादिस, मुलाक़ातें, मुनाज़रात और उनका मामून, ’अवाम और उस वक़्त के हुक्काम से सुलूक, इन तमाम चीज़ों ने अपने-अपने अंदाज़ में असर छोड़ा, जिसने शियों को आँखों में बुलंद कर दिया और अहल-ए बैत (अ) के मक्तब को अज़मत बख़्शी। • दूसरा असर जिस पर मैं जोर देना चाहता हूँ, वो ये है कि आशुरा के मसले को इमाम रज़ा (अ) ने इस्लामी दुनिया में आम किया। यानी ख़ुद आशूरा का वाक़िया अहल-ए बैत (अ) के पैरोकारों में इस बात की वजह बना कि शियों को ज़ुल्म के ख़िलाफ़ जद्दोजहद का परचमदार समझा जाने लगा। कर्बला का वाक़िया एक ऐसा वाक़िया था जिसका लोगों के दिलों में जगह पाना ज़रूरी था, और जिस शख़्स ने इस तह़रीक़ को एक नई ताक़त के साथ शुरू किया, वो इमाम रज़ा (अ) थे। • ये मशहूर रिवायत इब्न-ए शबीब से नक़्ल है, जिसमें आप ने फरमाया: إن كنت باكياً لشيء فابكِ للحسين “अगर तुम किसी चीज़ के लिए रो सकते हो तो हुसैन के लिए रो।” • ये पहली और मुफ़स्सल रिवायत है, और बहुत अहमियत रखती है। इससे कर्बला की अहमियत ज़ाहिर होती है। बाद में जो वादे हैं, उन लोगों के लिए जो इमाम हुसैन (अ) की ज़ियारत करते हैं, अज़ादारी करते हैं या आँसू बहाते हैं: क़ियामत में हमारे साथ महशूर होंगे, हमारे क़रीब होंगे, और इसी तरह की चीज़ें। ये सब इस रिवायत में मौजूद हैं। जब कर्बला का मसला सामने आया, यानी हुसैन बिन अली (अ) की शहादत का वाक़िया पेश आया, तो फ़ितरी तौर पर ये सवाल पैदा होता है कि ये बुज़ुर्गवार क्यों शहीद हुए? ये सवाल इस्लाम के बहुत से समाजी मआरिफ़ की कुंजी है: “क्यों शहीद हुए?” ये वो वाक़िया था जिसने पैग़ंबर (स) के रेहलत के तक़रीबन पचास साल बाद इतनी बड़ी मुसीबत पैदा की और पैग़ंबर (स) के फ़रज़ंद की शहादत हुई। ये सवाल एक बुनियादी सवाल है। ये इंसानों के दिलों को तारीख़ के वाक़ियात के साथ जोड़ सकता है और मुसलमानों के फ़राइज़ को वाज़ेह कर सकता है। ✅ Join: WhatsApp | Telegram | Instagram
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🇮🇷: 🏴 | [आज सुबह: 24/08/2024, हुसैनिया इमाम ख़ुमैनी (र), तेहरान ] — इमाम अली रज़ा (अ) की शहादत की मजलिस-ए अज़ा में रहबर-ए-इंक़िलाब-ए-इस्लामी इमाम सय्यद अली ख़ामेनई (द) ने हज़ारों अज़ादारों से मुलाक़ात की, और ख़िताब किया। जारी... ✅ Join: WhatsApp | Telegram | Instagram
📕 | इमाम हसन (अ) की अज़मत... "पैग़म्बर-ए-अकरम (स) को उनके दौर की तमाम सख़्तियों और ग़मों के बावजूद और अमीरूल मोमिनीन (अ) को तमाम तकलीफ़ो और रंज-ओ-ग़म के बावजूद और इनके बाद बाक़ी आईम्मा को उन तमाम ज़ुल्म-ओ-सितम उठाने के बावजूद जो इनके दौर में इनके सामने आईं; इमाम हसन (अ) जैसी सूरतेहाल का सामना नहीं करना पड़ा और ये सूरतेहाल इमाम हसन (अ) की अज़मत बयान करती है।" — रहबर-ए-इंक़िलाब-ए-इस्लामी इमाम सय्यद अली ख़ामेनई (द) 🏴 शहादत-ए इमाम हसन(अ) #ImamHasan ✅ Join: WhatsApp | Telegram | Instagram