✨ 2 𝙻𝚒𝚗𝚎𝚜 𝚄𝚛𝚍𝚞 Sad Poetry ✨
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Посты
....ज़ुल्फ, जबीं, चश्म, आरिज, लब, चेहरा, नहीं देखा। ....मैंने मुक्रम्मल चाहा है तुझे, कोई हिस्सा नहीं देखा।।
....Kuchh apno ke saath chalne ki kya baat karein ham. Sahab ....Insaan ke to do pair bhi kabhi ek-saath nahin chalte.
....कुछ अपनों के साथ चलने की क्या बात करें हम। साहब ....इंसान के तो दो पैर भी कभी एक-साथ नहीं चलते।।
....उसी का शहर, वही खुदा और उसके ही गवाह। ....साहब मुझे यकीन था की कुसूर मेरा ही निकलेगा।।
....Usi ka shehar, wahi khuda aur uske hi gawah. ....Sahab mujhe yakeen tha, ki kusur mera hi niklega.
....Ta umr malaal rahega Sahab ki ham hamsafar na ban sake. Magar ....Ek sukun ye bhi rahega ki zindagi ke safar me ham mile to the.
....ता उम्र मलाल रहेगा साहब की हम हमसफर ना बन सके । मगर ....एक सुकून ये भी रहेगा कि जिंदगी के सफर में हम मिले तो थे।।
....हम लायक नहीं किसी के भी साहब। ....हमसे जितना दूर रहोगे, उतना खुश रहोगे।।
....बेशक में तुझे दुआओ में मांगता था साहब। ....मगर तुझ जैसा शक्स किसी को बदुआ में भी ना मिले।।
....ये मुमकिन ही नहीं के दर - दर पे झुक जाऊं मैं। ....मेरा रब भी एक है साहब, मेरा सर भी एक है।।
....Ye Mumkin hi Nahi Ke Dar Dar Pe Jhuk Jaun Main. ....Mera Rab Bhi Ek Hai Sahab, Mera Sar Bhi Ek Hai.
....जिंदगी बहुत खूबसूरत है साहब कोशिश करो अकेले जीने की। ....ये दोस्ती, ये प्यार, ये मीठी बातें सब एक धोखा है।।
....Zindagi Bahut Khubsurat Hai Sahab Koshish Karo Akele Jeene Ki. ....Ye Dosti, Ye Pyar, Ye Meethi Baatein Sab Ek Dhokha Hai.
....मुझे नफ़रत करना आय ही नहीं साहब। ....मैने माफ़ करने के बाद लोगों को छोड़ दिया।।
....Mujhe nafrat karna aaya hi nahi Sahab. ....Maine maaf karne ke baad Logon ko chhod diya.
....एक चेहरे से उतरती हैं नक़ाबें कितनी, लोग कितने हमें इक शख़्स में मिल जाते हैं। ....वक़्त बदलेगा तो इस बार मैं पूछूँगा उस से तुम बदलते हो तो क्यूँ लोग बदल जाते हैं।।
....वो दौलत वो शोहरत जो चाहिए थी मिल गई क्या। ....जो मैं दे ना सका था वो खुशियाँ मिल गई क्या? ....जिन को पाने की चाह में छोड़ा था तुमने मुझको। ....उस शख़्स में तुम्हे वो सारी ख़बियाँ मिल गई क्या? ....वो मोती जडे लहंगे का, क्या शौक तेरा पुरा हुआ। ....वो तुझे हीरो से जडी हुई चूड़ियाँ मिल गई क्या? ....क्या रह रही हो तुम वहाँ अब बड़े ऐशो आराम से। ....वो तुम्हें संगमरमर लगी हवेलियाँ मिल गई क्या? .... मैं कभी कभी अकेला बैठकर सोचता हूँ बात ये। ....तुमको सोने की थाली में रोटियाँ मिल गई क्या?
....हम हकीकत से वाकिफ लोग हैं साहब। ....किसी के लिए खास होने का वहम नहीं पालते।।
....Ham Hakikat se wakif log hain Sahab. ....Kisi ke liye khas hone ka wehm nahi paalte.
....वो फिर भी ना समझ सका मेरे लफ़्ज़ों की गहराई को। ....मैंने हर वो लफ़्ज़ कह दिया जिसका मतलब मोहब्बत था।।