Tides - गहरे विचार
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से हमारी तुष्टि न हो तो फिर एक मुस्लिम लेखक का संदर्भ देखिए। अल बिरुनी का भारत पुस्तक को पढि़ए। अल बिरुनी की पुस्तक में भारत की सीमाओं और लोगों का वर्णन है। इसमें एक वर्णन है कि भारत के लोगों ने चारों दिशाओं में चार नगरों से आकाशीय गणना की है। उसकी आज तो जाँच की जा सकती है। वह कह रहा है कि इन चारों स्थानों पर भारत के लोग रहते हैं। ये चारों स्थान हैं – उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव, और पूरब तथा पश्चिम के शहरों का अक्षांश और देशांतर गणना दी हुई है। अल बिरुनी का कहना है कि ये गणनाएं तभी सही हो सकती हैं, जब आप वहाँ लगातार जा रहे हों। पिरी राइस का नक्शा दुनिया का एक नक्शा है। यह फटी-पुरानी अवस्था में किसी विद्वान को मिला। उसने उसे देखा। उस नक्शे की विशेषता है कि उसमें दक्षिणी ध्रुव दिखाया गया है। दक्षिणी ध्रुव पर दो किलोमीटर मोटी बर्फ की परत जमी हुई है। वर्ष 1966 में इंग्लैंड और स्वीडेन ने एक सिस्मोलोजिकल सर्वेक्षण किया और उसके आधार पर दक्षिणी ध्रुव का नक्शा बनाया। यह नक्शा पिरी राइस के नक्शे के एकदम समान है। तो प्रश्न उठा कि पिरी राइस का नक्शा इतना पहले कैसे बना? उस विद्वान ने उस नक्शे को अमेरिका के एयर फोर्स के टेक्नीकल डिविजन के स्क्वैड्रन लीडर को भेजा। स्क्वैड्रन लीडर ने उत्तर लिखा कि नक्शा तो सही है, परंतु उस समय जब बर्फ नहीं थी, जब जानने के लिए जो यंत्र और तकनीकी ज्ञान चाहिए, वह नहीं रहा होगा। वह कहता है कि इस दो किलोमीटर की बर्फ की तह जमने में कई दशक लाख वर्ष लगे। यह नक्शा लगभग तबका बना हुआ है। यह उद्धरण मैप्स ऑफ एनशिएंट सी किंग्स के हैं। पिरी राइस तूर्क का डकैत था। तूर्कों को आमतौर पर हम मुसलमान मान लेते हैं। परंतु ध्यान दें कि ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी तक इसे यूरोप अनातोलिया बोलते थे। तूर्क लोग जब वर्तमान तूर्किस्तान पहुँचे, तब उसका नाम तूर्किस्तान रखा। वे वास्तव में दूर्गा और शिव के उपासक रहे हैं। पिरी राइस लिख रहा है कि उसने यह नक्शा पुराने नक्शों के आधार पर बनाया है। अमेरिकन नक्शा बनाने वाले विद्वान लिखते हैं कि इस रास्ते पर लगातार समुद्री यात्राएं होती रही हैं। दक्षिणी ध्रुव पर यात्राएं हो रही हैं व्यापारिक और सैन्य कारणों से। अलग-अलग हिमयुगों में नक्शे बनाए गए हैं। इसे बनाने वाले और यात्रा करने वाले वे लोग हैं, जिनके नाम से एक महासागर का नाम ही रख दिया गया है। हिंद महासागर। दूसरे किसी भी देश के नाम पर महासागर का नाम नहीं रखा गया है, क्यों? इस हिंद महासागर में हिंद का तटीय प्रदेश छोटा सा ही है। फिर भी इसका नाम हिंद महासागर इसलिए है कि इसमें भारतीय ऐसे चलते हैं जैसे कनॉट प्लेस में दिल्ली पुलिस और जनता चलती है। इसी प्रकार हिंद महासागर में भारतीय व्यापारी और उनकी रक्षा के लिए चतुर्गिंणी सेना चलती है। चतुर्गिंणी में चौथा अंग कौन है? चार प्रकार की सेना है नौसेना। इसका प्रमाण है अजंता में बड़े-बड़े जहाजों का चित्रण है जिसमें हाथी-घोड़े और हथियार लदे होते हैं। ऐसे ही भित्तिचित्र भारत के उत्तर में स्थित पाँच स्तानों में भी मिले हैं। इस प्रकार हम पाते हैं कि भारत एक स्वाभाविक राष्ट्र है और अत्यंत विशाल राष्ट्र रहा है। इसके ढेरों प्रमाण मिलते हैं। कुछ प्रमाण यहाँ प्रस्तुत किए गए हैं। ✍🏻प्रो. कुसुमलता केडिया (लेखिका धर्मपाल शोधपीठ, भोपाल की निदेशक हैं।)
में एक नदी चलती है। उस नदी के आस-पास का इलाका ही वास्तविक रूस है। और कीव सहित यूक्रेन आज रूस से बाहर है। पाँच विशाल देशों के बाद अगला देश है चीन। चीन का वर्तमान आकार तो पंडित नेहरू का दिया हुआ है। तिब्बत तो कभी उसका था ही नहीं। जिसे भारत के यूरोपीय चश्मेवाले बुद्धिजीवी पूर्वी तूर्कीस्तान या फिर चीनी तूर्कीस्तान कहते हैं, वह भी उसका नहीं रहा है। इसे भी वर्ष 1949 में जवाहरलाल नेहरू ने चीन के लिए छोड़ दिया। यह तो महाकाल के उपासकों का स्थान रहा है। महाकाल के उपासक रहे महान मंगोल सम्राट कुबलाई खाँ ने चीन को पराजित किया था। चीन में मंगोलिया और मंचूरिया का हिस्सा मिला हुआ है। ये दोनों इलाके साम्यवादी चीन का हिस्सा 1949 के बाद रूस और चीन की सहमति से बने। रूस में लेनिन, स्टालिन जैसे कुछ तानाशाह लोग सत्ता में आ गए थे। उन्हें दुनिया भर में मित्र चाहिए था। कहा जाता है दुनिया भर में परंतु उसका वास्तविक अर्थ होता है यूरेशिया में। शेष चारों महादेश तो गिनती में होते ही नहीं हैं। तो साम्यवादी रूस को केवल एक सहयोगी मिला माओ के नेतृत्व वाला साम्यवादी चीन। साम्यवादी रूस ने मंगोलिया और मंचुरिया को चीन का हिस्सा मान लिया। दूसरा विश्वयुद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र की रचना हुई जिसमें यूएसएसआर स्थायी सदस्य था। दूसरा स्थायी सदस्य बनने का प्रस्ताव भारत को मिला था, परंतु जवाहरलाल नेहरू ने कूटनीतिक मूर्खता में वह प्रस्ताव चीन को दिलवा दिया। इन दोनों साम्यवादी देशों ने मिल कर बंदरबाँट की। परंतु आज चीन टूट रहा है। तीन हिस्सों में। यह अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट है। मंचुरिया और मंगोलिया, दोनों ही चीन को अपने कब्जे में रखने वाले देश हैं। वर्ष 1914 तक मंचुरिया का गुलाम रहा है। यह तो हमें कहीं पढ़ाया नहीं जाता कि तेरहवीं शताब्दी से लेकर वर्ष 1914 तक चीन भरतवंशी मंगोलों तथा मंचुओं का गुलाम रहा है। हमने देखा कि 15 अगस्त 1947 के भारत से दुनिया के छह नेशन-स्टेटों का क्षेत्रफल अधिक है और वे छहों अस्वाभाविक राष्ट्र हैं और ये छहों अतिशीघ्र टूट जाएंगे। आज के दिन भी भारत क्षेत्रफल की दृष्टि से दुनिया का सबसे बड़ा स्वाभाविक राष्ट्र है। हम जानते हैं कि पाकिस्तान और बांग्लादेश का जन्म कैसे हुआ है। अक्सर यह कहा जाता है कि हम पड़ोसी रोज नहीं बदल सकते। परंतु हमने हर रोज पड़ोसी ही तो बदला है। पाकिस्तान हमारा पड़ोसी कब था, वह तो हमारा घर था। हमारा पड़ोसी अफगानिस्तान भी कब था, वह भी हमारा घर ही था। चीन भी आपका पड़ोसी कब था, नेपाल कब था हमारा पड़ोसी? हमने तो घरवालों को ही पड़ोसी बना दिया है। याद करें कि युद्ध अपराध के कारण संयुक्त राष्ट्र ने ट्रीटी ऑफ वर्साई के कारण जर्मनी के दो हिस्से कर दिए, वह जर्मनी एक हो गया। अंतरराष्ट्रीय कानूनों के तहत एक हो गया। ऐसे में पाकिस्तान और भारत क्यों एक नहीं हो सकते? भारत का नक्शा देखिए, नीचे पेनिनसुलर भारत है, परंतु ऊपर विराट हिमालय है। अफगानिस्तान तो दुर्योधन का ननिहाल गाँधार ही तो था। शकुनि यहीं का था। और निकट इतिहास में महाराजा रणजीत सिंह का राज्य गाँधार तक था। वर्ष 1905-10 में पंडित दीनदयालू शर्मा काबुल और कांधार में संस्कृत पर भाषण देने जाते हैं, सनातनधर्मरक्षिणी और गौरक्षिणी सभाएं करते हैं। गाँधी जी के जाने पर वायसराय खड़ा नहीं होता, पंरतु पंडित दीनदयालू शर्मा से मिलने के लिए इंग्लैंड का राजा भी खड़ा होता है। वर्ष 1910 में अफगानिस्तान नाम का कोई देश था ही नहीं। वर्ष 1922 में अंग्रेजों ने इसे बनाया रूस और उनके ब्रिटिश इंडिया के बीच बफर स्टेट के रूप में। महाभारत में राजा युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में ढेर सारे राजा आते हैं। वे राजा जो युधिष्ठिर को कर देते हैं, वे सभी आते हैं। जो प्रदेश भारत के चक्रवर्ती सम्राट को कर देते हैं, वे भारत ही कहलाएंगे न? यह भारत कहाँ से कहाँ तक है? यवन प्रांत जिसे आज ग्रीक कहते हैं। परंतु ग्रीक स्वयं को ग्रीक नहीं कहते। वे स्वयं को एलवंशीय कहते हैं। उनके देश का नाम आज भी ग्रीस नहीं एलेनिक रिपब्लिक है। एलवंश मतलब बुद्ध और इला की संतान। यह भारतीय ग्रंथों में मिल जाएंगे। राजसूय यज्ञ के बाद युद्ध के वर्णन में स्पष्ट वर्णन है कि कौन-कौन सी सेनाएं पांडवों के साथ हैं और कौन-कौन कौरवों के साथ। वहाँ 250 जनपदों का उल्लेख है जिसमें दरद, काम्बोज, गाँधार, यवन, बाह्लीक, शक सभी नाम आते हैं। जिसे आज हम इस्लामिक देश के रूप में जानते हैं, यह पूरा इलाका शिव. ब्रह्मा, दूर्गा का पूजक सनातन धर्मावलम्बी चक्रवर्तीं भारतीय सम्राट के जनपद रहे हैं। यह एक रोचक सत्य है कि अंग्रेजों को वर्ष 1910 तक पता नहीं था कि अशोक, देवानां पियदासी कौन है? वे महाभारत को नकार देते हैं। यदि हम महाभारत को गलत भी मान लें तो वायुपुराण, विष्णुपुराण, रामायण, कालीदास का रघुवंश, पाणिनी के अष्टाध्यायी आदि में किए गए भारतसंबंधी वर्णनों को देखें। यदि इन भारतीय संदर्भों
परंतु अंग्रेजो के द्वारा भारतीय शिक्षा का सर्वनाश करके फिर अपने चेलों को सत्ता सौंपने के बाद उन लोगों ने जो भारतीय ज्ञान परंपरा का सर्वनाश किया है ,उसके बाद से हिन्दू लोगों के पास राजनीतिक चेतना बहुत अल्प है और वे तोतों की तरह से वे ही बातें करते रहते हैं जो हिंदू द्रोही सत्ताधीशो ने शोर मचाया है और जो उनके द्वारा प्रायोजित विद्यालय विद्या संस्थानों में पढ़ाया जाता है जो कि झूठ है, भयंकर झूठ। पर हिन्दू अब वही दुहराते रहते हैं। भारत को एक राष्ट्र मानकर अन्य लघु राष्ट्रों जैसा एक मानना घोर अज्ञान है। यह यूरोप के 37 राष्ट्रों के बराबर आज है।पहले यह समस्त यूरोप से बड़ा था। 50 से अधिक मुस्लिम देशों के बराबर है अकेले भारत। इसके विषय में सोचते और बोलते समय सदा यह ध्यान रखें, कृपया। ✍🏻रामेश्वर मिश्रा पंकज स्वाभाविक राष्ट्र है भारत यह आज हमें पता है कि भारत का वर्तमान स्वरूप 15 अगस्त 1947 की देन है। आज अखंड भारत की कल्पना में हम केवल पाकिस्तान और बांग्लादेश को जोड़ते हैं। परंतु हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि बर्मा, श्रीलंका, अफगानिस्तान आदि भी भारत के ही भाग रहे हैं। यदि हम केवल 15 अगस्त 1947 के बाद के भारत को ही लें तो भी इस समय विश्व में केवल छह नेशन स्टेट या राष्ट्र ऐसे हैं जो आकार में भारत से बड़े हैं और ये छहों अस्वाभाविक राष्ट्र हैं। एक एक कर सभी पर विचार करते हैं। पहला राष्ट्र है आस्ट्रेलिया। आस्ट्रेलिया क्या है? उसके केवल तटीय इलाकों में लोग बसे हैं। दिल्ली के बराबर आबादी है। इस नाम का भी कोई इतिहास नहीं है। यह बीसवीं शताब्दी में बना एक अस्वाभाविक राष्ट्र है। दूसरा बड़ा राष्ट्र है यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका। अमेरिका तो इस इलाके का नाम भी नहीं है। आज भी यूनाइटेड स्टेट्स किसी अमेरिगो नामक आदमी के नाम से जाना जाता है। इसे वेस्ट इंडिया ही कह दिया होता या वेस्ट इंडियन सबकोंटिनेंट ही कह दिया होता। यदि आपको किसी स्थान को उनके मूल नाम से नहीं बुलाना है तो कुछ पहचाना सा नाम तो रखना चाहिए था। किसी को पता ही नहीं है कि अमेरिगो कौन था। अमेरिका का मूल नाम तो टर्टल कोंटीनेंट यानी कि कच्छप महाद्वीप है। संयुक्त राष्ट्र अमेरिका तो उन्नीसवीं-बीसवीं शताब्दी में अस्तित्व में आया है। इसके टूटने का रुदन सैमुएल हंटिंगटन अपनी पुस्तक क्लैश ऑफ सिविलाइजेशन में कर रहे हैं। भारत में इस पर काफी बहस चल रही है, परंतु बहस करने वालों ने ठीक से उसकी प्रस्तावना तक नहीं पढ़ी है। प्रस्तावना में ही वह कह रहा है कि संयुक्त राष्ट्र अमेरिका टूट रहा है। क्यों? क्योंकि उसके नीचे मैक्सिको उसे धक्का दे रहा है। मैक्सिको वहाँ का मूल है। वे वहाँ के मूलनिवासी हैं। उनका अपना क्षेत्र है। दीवाल बनाने से क्या होगा? दीवाल तो चीन ने भी बनाई थी। फिर भी उसे मंगोल, हूण, शक, मांचू सभी पराजित करते रहे। तीसरा राष्ट्र है कैनेडा। संयुक्त राष्ट्र के ऊपर कैनेडा है। यहाँ कुछ फ्रांसीसी लोग हैं, कुछ अंग्रेज हैं और इन्होंने एक राष्ट्र बना लिया। यहां का पूरा इतिहास खंगाल डालिये, कैनेडा नाम नहीं मिलेगा। अस्वाभाविक राष्ट्र है। चौथा राष्ट्र है ब्राजील। यह नाम भी आपको इतिहास में नहीं मिलेगा। उन्नीसवीं शताब्दी तक ब्राजील का कोई अस्तित्व नहीं है। यह संयुक्त राष्ट्र अमेरिका से भगाए गए कुछेक फ्रांसीसी, अंग्रेज और जर्मन लोगों की रचना है। ये कृत्रिम सीमाएं हैं। पाँचवां बड़ा राष्ट्र है जिसे हम पहले यूएसएसआर के नाम से जानते रहे हैं सोवियत संघ। उससे टूट कर सोलह राष्ट्र अलग हो गए, अब बचा है रूस। रूस के तीन चौथाई हिस्से के बारे में उसे स्वयं ही उन्नीसवीं शताब्दी तक पता नहीं था। यह हिस्सा था रूस का एशियायी हिस्सा। यह तो प्राचीन काल से भारत का हिस्सा रहा है। साइबेरिया का उच्चारण बदलें तो सिबिरिया होता है यानी शिविर का स्थान। इतालवी लोग स्थानों को स्त्रीलिंग से बुलाते हैं। इसलिए शिविर शिविरिया बन गया जिसे हम आज साईबेरिया कहते हैं। यह रूस का हिस्सा नहीं था। यह हिस्सा रहा है भरतवंशी शकों का, भरतवंशी मंगोलों का। इसे आप नक्शों में आसानी से देख सकते हैं। कब तक रहा है? उन्नीसवीं शताब्दी तक। यह कोई प्राचीन इतिहास नहीं है, जिसे ढूंढना पड़े। यह आधुनिक इतिहास है। फ्रांसीसी क्रांति या पुनर्जागरण के काल के बाद के इतिहास को आधुनिक काल माना जाता है। परंतु यह तो उससे भी कहीं नई घटना है। उन्नीसवीं शताब्दी तक रूस इस इलाके को जानता भी नहीं है। वह स्वयं उसे क्या बतलाता है, इसे देख लीजिए। अ_ारहवीं शताब्दी तक रूस अपनी सीमाएं क्या बता रहा है, देख लीजिए। जैसे हम कहते हैं न कि हमारी सीमाएं गांधार तक रही हैं, रूस अपनी सीमाओं के बारे में क्या कहता है? इसलिए यह भी स्वाभाविक राष्ट्र नहीं है। कृत्रिम देश है। शीघ्र ही अपनी स्वाभाविक सीमाओं में आ जाएगा। इसकी स्वाभाविक सीमाएं क्या हैं? आज के यूक्रेन में एक स्थान है कीव। कीव के उत्तर
‘‘अजनाभं नामऐतद्भारात्वर्षं भारतमिति ।’’ क्या पृथ्वी का यही खंड जहाँ हम लोग रहते हैं , भारतवर्ष है ? इसका प्रमाण क्या है ? शास्त्रों में बताया गया है की भारतवर्ष में नर-नारायण हैं | इसी भारतवर्ष में भगवान श्रीहरि नर-नारायण रूप में है । केदारनाथ, बद्रीनाथ के रास्ते में दो पर्वत नर और नारायण हैं ऐसा माना जाता है कि देवर्षि नारद जी भगवान की आराधना नर-नारायण के रूप में करते हैं । नर और नारायण पर्वत विष्णु पुराण में भी भारतवर्ष की स्थिति के बारे में बताया गया है - उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेष्चैव दक्षिणम् । वर्शं तद् भारतं नाम भारती यत्र संततिः ।। ऐसा भूखण्ड जो समुद्र के उत्तर तथा हिमालय से दक्षिण में स्थित है वही भारतवर्ष है और वहीं पर चक्रवर्ती भरत जी की संतति निवास करती है ।पुराणों के आधार पर इस भारतवर्ष का विस्तार 9000 योजन माना जाता है । एक योजन में 9 मील माना जाता है । अतः भारतवर्ष का विस्तार 81000 मील माना जा सकता है । भारतवर्ष अन्य वर्षों से श्रेष्ठ है क्यों कि यह कर्म भूमि है तथा अन्य वर्ष भोग भूमियाँ हैं - ‘यतो हि कर्मभूरेशा ह्यतो न्या भोगभूमयः’ (विष्णुपुराण) । ऐसा कहा जाता है कि मानव भगवान की सुन्दरतम रचना है और मानव को स्वतंत्रता है कर्मों को करने की । अच्छे कर्मों के द्वारा मानव अपना उद्धार कर सकता है । ऐसी स्वतंत्रता देवताओं को भी प्राप्त नहीं है क्योंकि वह भोगयोनि है । परंतु मनुष्यों में भी भारतवर्ष में जन्म लेने वाले को ही ऐसी स्वतंत्रता प्राप्त है क्योंकि भारतवर्ष कर्मभूमि है तथा अन्य वर्ष भोगभूमि है । यही कारण है कि पृथ्वी पर भारतवर्ष के अतिरिक्त कहीं भी कर्म विधि नहीं है । उसका विधान हमारे वर्णाश्रम व्यवस्था में है । वर्णाश्रम व्यवस्था सनातन धर्म का मूल है । सभी वर्णांे तथा आश्रमों में पूर्णतया प्रतिष्ठित मनुष्य जीवन के सर्वोत्तम लक्ष्य मोक्ष को प्राप्त करने का अधिकारी होता है । यहाँ पर पैदा होने वाले मनुष्य अपने-अपने कर्मों के आधार पर स्वर्ग तथा अपवर्ग प्राप्त कर सकते हैं । इसलिए संसार के किसी अन्य धर्मों में वर्णाश्रम व्यवस्था का विधान नहीं है । अन्य धर्म भोग को बढ़ावा देता है परंतु सनातन धर्म योग को बढावा देता है । अतः भारतवर्ष में पैदा होने वाले प्राणी अन्य जगहों पर पैदा होने वालों से अधिक प्रबुद्ध होता है । भारतवर्ष का कण-कण ऊर्जा से भरा हुआ तीर्थ है जिसने भी भारतवर्ष की पदयात्रा की है उन्हें नई ऊर्जा तथा दिषा मिली है । पाण्डवों ने भारतवर्ष की पदयात्रा की थी वनवास काल में तभी उन्हें नई ऊर्जा मिली और धर्मराज्य की स्थापना हुई । भगवान राम ने भी वनवास काल में भारतवर्ष की पदयात्रा की तभी वह रामराज्य स्थापित करने में सफल रहें । आदिशंकराचार्य ने भारतवर्ष की पदयात्रा कर दिग्विजय किया और भारतवर्ष के एकता के सूत्र को और भी मजबूत किया । वर्तमान काल में भी महात्मा गांधी ने पूरे भारतवर्ष की पदयात्रा की तभी वे ब्रिटिश साम्राज्य का नाश कर पाये । भारतवर्ष अपने आप में तीर्थ है जिस तरह तीर्थस्थानों की परिक्रमा से नई ऊर्जा मिलती है उसी तरह भारतवर्ष की परिक्रमा से भी नई ऊर्जा मिलती है । ये स्वयं प्रमाणित है । आप यहाँ पर किसी से भी भाग्य, भगवान, आत्मा, परमात्मा के बारे में बातें करके देख सकते हैं सभी के पास कुछ-न-कुछ अपने विचार होते हैं और वे विचार हमारे किसी-न-किसी शास्त्र में वर्णित होते हैं । हलाँकि वे उन शास्त्रों से हो सकता है अवगत नही हों । इसलिये यहाँ पर मनुष्य ही नहीं देवता भी जन्म लेकर यज्ञ यागादि अच्छे कर्मों के द्वारा पुण्य अर्जित कर अच्छे लोकों में जाना चाहते हैं । हमारे सनातन धर्म में ही भगवान के अवतार लेने की बात है । अन्य धर्मों मे नहीं क्योंकि सनातन धर्म भारतवर्ष में ही प्रचलित है और यह भारतवर्ष योगभूमि है । अतः यहाँ पर नये कर्म किये जा सकते है और अन्य खण्डों में नये कर्म नहीं हो सकते है - केवल पुरातन कर्मों का भोग ही हो सकता है । अतः देवगण भी यही गान करते हैं - गायन्ति देवाः किल गीतकानि धन्यास्ते तु भारतभूमि भागे। स्वर्गापवर्गास्पदमार्गभूते भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात् ।। (श्रीविष्णुपुराण 2/3/24) अर्थात् जिन्होंने स्वर्ग और अपवर्ग के मार्गभूत भारतवर्ष में जन्म लिया है, वे पुरुष हम देवताओं की अपेक्षा भी अधिक धन्य हैं । हिंदू संसार में सबसे अधिक राष्ट्र प्रेमी और राष्ट्रभक्त लोग हैं।ऐसी उत्कृष्ट और गहरी और व्यापक राष्ट्रभक्ति संसार में लगभग कहीं भी नहीं है क्योंकि इतना प्राचीन और स्वाभाविक राष्ट्र विश्व में और कोई नहीं हैं ।
धन्य - धन्य हे भारत भूमि ! भारत ! भरतखण्ड-जम्बूद्वीप ! यह वह देश है जहां गण के साथ-साथ राष्ट्र जैसे विचारों का उदय हुआ और धरती को मां कहने का भाव जागा। पूरी सप्तद्वीपा पृथ्वी पर इसको कर्मभूमि के रूप में जाना गया, अन्य सभी को भोग भूमि के रूप में संबोधित किया गया है। यह विचार इतना उदात्त और सर्वतोभावेन था कि ऋषिमना रचनाकारों ने देवगणों के मुखारविंद से इस भूमि का यशोगान करवाया। गुप्तकाल पूर्व रचे गए विष्णुपुराण में इस मातृभूमि के यश के रूप में पराशर को स्वीकारना पड़ा- गायन्ति देवा: किल गीतकानि धन्यास्तु ते भारतभूमिभागे। स्वर्गापवर्गास्पदमार्गभूते भवन्ति भूय: पुरुषा: सुरत्वात्।। कर्माण्य संकल्पित तत्फलानि सन्यस्य विष्णौ परमात्मभूते। अवाप्य तां कर्ममहीमनन्ते तस्मिंल्लयं ये त्वमला: प्रयान्ति।। (विष्णु्. द्वितीयांश, 3, 24-25) यही मान्यता मार्कण्डेय पुराणकार की है। आर्षरामायण, अध्यात्म रामायण में आई है। शिवपुराणकार ने भी इस मान्यता को यथारूप उद्धृत किया है। बहुत मायने रखती है भारतीय संस्कृति की यह स्वीकारोक्ति। संस्कृत में निबद्ध ये विचार कालजयी है, संस्कृत की तरह ही सार्वकालिक हैं, जैसा कि प्रो. विल्सन ने भी स्वीकारा था - यावद्भारतवर्षं स्याद्यावद्विन्ध्य हिमालयौ। यावद्गंगा च गोदा च तावदेव हि संस्कृतम्।। हमें स्मरण रखना चाहिए कि जीवन में पांच जकार बहुत ही दुर्लभ हैं - जननी जन्मदेशश्च जम्बूद्वीपो जनार्द्दन:। जाह्नवीतीरं इत्येते जकारा: पंचदुर्लभा।। 1।। मरणं जाह्नवीतीरे नृणां मुक्तिप्रदायकम्। विकृतावपि सन्ध्यातो मुक्तिद: स्याज्जनार्द्दन:।। 2।। जननी जन्मदेशाश्च मरणे मुक्तिदा: सदा। तस्मात् स्वजन्मदेशश्च पापनाशकरो नृणाम्।। 3।। (चतुर्वर्ग्ग चिन्तामणि : हेमाद्रि, अनुवाद श्रीकृष्ण जुगनू, : भाग 4, पृष्ठ 483) अर्थात् १. अपनी जन्मदात्री मां और २. अपनी जन्मभूमि, ३. उसमें भी जम्बूद्वीप भारतवर्ष तथा ४. जनार्दन के साथ साथ ५. जाह्नवी- गंगा जैसी नदी का तीर। ये पांच दुर्लभ हैं क्योंकि दो मिल जाएंगे तो तीन नहीं मिलते, तीन मिल जाए तो चार नहीं और चार मिले तो पांचवां कठिन होता है। यदि से पांचों ही मिल जाए तो क्या कहना। क्योंकि, प्राण निकले तो गंगा के किनारे, वह मुक्तिदायक माना गया है, जनार्दन भी यही फलदायी है। जननी व जन्मभूमि पर सांस निकले तो सदा ही मुक्तिदायी होती है, इसलिए कि अपना जन्मदेश लोगों का पाप नाश करने वाला होता है। ये श्लोक उन महर्षि देवल के हैं जिन्होंने भारत की सीमा पर सिंधु के आसपास रहकर उन लोगों के लिए देशज-संस्कार का अभियान छेड़ा था जाे बाहर से आए अथवा स्वदेश की परंपराओं को तिलांजलि दे चुके थे। अनेकानेक खोजें देने वाला, अनेकानेक मान्यताओं की बुनियाद रखने वाला और सहिष्णुता जैसे मूल्य का पोषक यह राष्ट्र सच में अपने मूल्यों के लिए महनीय है....। सम्भवामि युगे युगे... 🙏 नाम मिले तो भारत जैसा, मित्र मिले तो भारत। गुरु मिले तो भारत जैसा, शिष्य मिले तो भारत।। संग मिले तो भरतखण्ड सा, स्नेह मिले तो भारत। कर्म मिले तो भारतसेवा, जन्म मिले तो भारत।। 🇮🇳 जब महाभारत का रण निकट था, तब संजय ने धृतराष्ट्र से भारतवर्ष की महिमा में कहा, " यह भारतभूमि दिव्य और पवित्र है, सबको इसके गर्व का दर्शन और अवबोध होना चाहिए। यदि भारत को समझ लिया तो यह स्वीकार हो जाएगा : यह देश परमात्मा से अलग नहीं! यह पिता है, भाई है और यही पुत्र भी है। आकाश में पुण्यलोक और स्वर्गलोक बताने वालों को समझ लेना चाहिए यह देश ही पुण्यलोक और देवलोक है " : पिता भ्राता च पुत्राश्च खं द्यौश्च नरपुङ्गव। भूमिर्भवति भूतानां सम्यगच्छिद्रदर्शना।। ( भीष्मपर्व 9, 76) 🥁 गा हे तव जय गाथा... 🌏 आत्मीय मित्रों को स्वाधीनता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं... पुराणों में भारतवर्ष की महिमा - ये पृथ्वी सप्तद्वीपा है । इनके नाम हैं - जम्बूद्वीप, प्लक्षद्वीप, शाल्मलिद्वीप, कुशद्वीप, क्रौंचद्वीप, शाकद्वीप, तथा पुष्करद्वीप । सातों द्वीपों के मध्य जम्बूद्वीप है । जम्बूद्वीप के अधिपति महाराज आग्नीध्र के नौ पुत्र हुए - जिनके नाम थे - नाभि, किम्पुरूष, हरिवर्ष, इलावृत, रम्यक, हिरण्मय, कुरू, भद्राश्व और केतुमाल । राजा आग्नीध्र ने जम्बूद्वीप के नौ खंड कर अपने प्रत्येक नौ पुत्रों को वहाँ का राजा बनाया । इन खंड़ो का विस्तार नौ नौ हजार योजन बताया गया है । इन्हीं पुत्रों के नाम से नौ वर्ष (अर्थात् खंड ) प्रसिद्ध हुये । राजा नाभि के नाम से ही एक वर्ष अर्थात् एक खंड का नाम अजनाभ वर्ष हुआ । राजा नाभि एवं उनकी पत्नी मेरूदेवी के एक पुत्र थे जिनका नाम था ऋषभदेव । ऋषभेदव जी के सबसे बड़े पुत्र का नाम था भरत । राजा भरत वे अत्यंत प्रतापी तथा धर्मात्मा थे, अतः अजनाभ वर्ष का नाम हो गया भारतवर्ष ।
आज की परिस्थितियों में जब हम अपनी प्राचीन सभ्यता, संस्कृति एवं परम्परा को भूल कर भौतिकवादी सभ्यता का अंधानुकरण कर रहे हैं, अरविन्द का शिक्षा दर्शन हमें सही दिशा का निर्देश करता हैं। आज धार्मिक एवं अध्यात्मिक जागृति की नितान्त आवश्यकता है। श्री वी आर तनेजा के शब्दों में- "श्री अरविन्द का शिक्षा-दर्शन लक्ष्य की दृष्टि से आदर्शवादी, उपागम की दृष्टि से यथार्थवादी, क्रिया की दृष्टि से प्रयोजनवादी तथा महत्त्वाकांक्षा की दृष्टि से मानवतावादी है। हमें इस दृष्टिकोण को शिक्षा में अपनाना चाहिए।" कुछ आध्यात्मिक चेतना युक्त आत्मा सूक्ष्म जगत से स्थूल जगत में विशिष्ट कार्यों को संपादित करने हेतु ही जन्म लेती हैं। वे अपने लक्षित प्रयोजन के निहितार्थ ही सक्रिय रहती हैं। किसी अन्य लाभ - हानि, आकांक्षा- महत्वाकांक्षा के बारे में विचार किए बिना... श्री अरविन्द घोष उनमें से ही एक महर्षि थे।
जबाब एक ही मिलता है उन के पूर्व जन्म के पावन संस्कारों ने जिस पर कुछ अवधि के लिये भले कुसंस्कृति की गर्द जम गई थी पर जैसे ही कुछ पुण्यात्माओं का दर्शन हुआ वो सारी गर्द छंट गई. याद रखिये, पूर्व जन्म के संस्कार उत्तम हैं तो जे० एन० यू० का कलुषित माहौल, जाकिर और बेनी हिल के लेक्चर और प्रेश्याओं का दुष्प्रचार भी आपको बिगाड़ नहीं सकता और अगर पूर्व जन्म के संस्कार कलुषित हैं तो संघ प्रचारकों या ऋषि-मुनियों का सानिध्य भी आपको सुधार नहीं सकता. पिछले जन्म पर तो हमारा वश नहीं है पर कम से कम इस जन्म में खुद को और अपनी संतति को ऐसे संस्कारित जरूर करिए कि आपका या उनका अगला जन्म भारत-भक्ति के संस्कारों से निर्मित हो ताकि भारत माँ और सनातन के लिए बलिदान होने वालों का कभी इस देश में अकाल न पड़े. ✍🏻अभिजीत सिंह भारतीय स्वाधीनता संग्राम में श्री अरविन्द का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है।उनका बचपन घोर विदेशी और विधर्मी वातावरण में बीता;पर पूर्वजन्म के संस्कारों के बल पर वे महान आध्यात्मिक पुरुष कहलाये। उनका जन्म १५ अगस्त,१८७२ को डा. कृष्णधन घोष के घर में हुआ था।उन दिनों बंगाल का बुद्धिजीवी और सम्पन्न वर्ग ईसाइयत से अत्यधिक प्रभावित था।वे मानते थे कि हिन्दू धर्म पिछड़ेपन का प्रतीक है।भारतीय परम्पराएँ अन्धविश्वासी और कूपमण्डूक बनाती हैं;जबकि ईसाई धर्म विज्ञान पर आधारित है।अंग्रेजी भाषा और राज्य को ऐसे लोग वरदान मानते थे। डा.कृष्णधन घोष भी इन्हीं विचारों के समर्थक थे।वे चाहते थे कि उनके बच्चों पर भारत और भारतीयता का जरा भी प्रभाव न पड़े।वे अंग्रेजी में सोचें,बोलें और लिखें।इसलिए उन्होंने अरविन्द को मात्र सात वर्ष की अवस्था में इंग्लैण्ड भेज दिया।अरविन्द असाधारण प्रतिभा के धनी थे।उन्होंने अपने अध्ययन काल में अंग्रेजों के मस्तिष्क का भी आन्तरिक अध्ययन किया।अंग्रेजों के मन में भारतीयों के प्रति भरी द्वेष भावना देखकर उनके मन में अंग्रेजों के प्रति घृणा उत्पन्न हो गयी।उन्होंने तब ही संकल्प लिया कि मैं अपना जीवन अंग्रेजों के चंगुल से भारत को मुक्त करने में लगाऊँगा। अरविन्द घोष ने क्वीन्स कालिज,कैम्ब्रिज से १८९३ में स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण की।इस समय तक वे अंग्रेजी,ग्रीक,लैटिन,फ्रेंच आदि १० भाषाओं के विद्वान् हो गये थे।इससे पूर्व १८९० में उन्होंने सर्वाधिक प्रतिष्ठित आई.सी.एस. परीक्षा उत्तीर्ण कर ली थी।अब उनके लिए पद और प्रतिष्ठा के स्वर्णिम द्वार खुले थे;पर अंग्रेजों की नौकरी करने की इच्छा न होने से उन्होंने घुड़सवारी की परीक्षा नहीं दी।यह जान कर गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने उन्हें ‘स्वदेश की आत्मा’ की संज्ञा दी।इसके बाद वे भारत आ गये। भारत में १८९३ से १९०६ तक उन्होंने बड़ोदरा (गुजरात) में रहते हुए राजस्व विभाग,सचिवालय और फिर महाविद्यालय में प्राध्यापक और उपप्राचार्य जैसे स्थानों पर काम किया।यहाँ उन्होंने हिन्दी,संस्कृत,बंगला,गुजराती,मराठी भाषाओं के साथ हिन्दू धर्म एवं संस्कृति का गहरा अध्ययन किया;पर उनके मन में तो क्रान्तिकारी मार्ग से देश को स्वतन्त्र कराने की प्रबल इच्छा काम कर रही थी।अतः वे इसके लिए युवकों को तैयार करने लगे। अपने विचार युवकों तक पहुँचाने के लिए वे पत्र-पत्रिकाओं में लेख लिखने लगेे।वन्दे मातरम्,युगान्तर,इन्दु प्रकाश आदि पत्रों में प्रकाशित उनके लेखों ने युवाओं के मन में हलचल मचा दी।इनमें मातृभूमि के लिए सर्वस्व समर्पण की बात कही जाती थी।इन क्रान्तिकारी विचारों से डर कर शासन ने उन्हें अलीपुर बम काण्ड में फँसाकर एक वर्ष का सश्रम कारावास दिया। कारावास में उन्हें स्वामी विवेकानन्द की वाणी सुनायी दी और भगवान् श्रीकृष्ण से साक्षात्कार हुआ।अब उन्होंने अपने कार्य की दिशा बदल ली और ४ अप्रैल,१९१० को पाण्डिचेरी आ गये।यहाँ वे योग साधना,अध्यात्म चिन्तन और लेखन में डूब गये। १९२४ में उनकी आध्यात्मिक उत्तराधिकारी श्रीमाँ का वहाँ आगमन हुआ। २४ नवम्बर,१९२६ को उन्हें विशेष सिद्धि की प्राप्ति हुई। इससे उनके शरीर का रंग सुनहरा हो गया। श्री अरविन्द ने अनेक ग्रन्थों की रचना की।अध्यात्म साधना में डूबे रहते हुए ही ५ दिसम्बर,१९५० को वे अनन्त प्रकाश में लीन हो गये!! 15 अगस्त श्री अरबिंदो का जन्मदिन है। महर्षि अरविन्द ने भारतीय शिक्षा चिन्तन में महत्त्वपूर्ण योगदान किया। उन्होंने सर्वप्रथम घोषणा की कि मानव, सांसारिक जीवन में भी दैवी शक्ति प्राप्त कर सकता है। वे मानते थे कि मानव, भौतिक जीवन व्यतीत करते हुए तथा अन्य मानवों की सेवा करते हुए अपने मानस को 'अति मानस' (supermind) तथा स्वयं को 'अति मानव' (Superman) में परिवर्तित कर सकता है। शिक्षा द्वारा यह संभव है।
स्वतन्त्रता के उद्घोषक:श्री अरविन्द जन्मदिन 15 अगस्त पूर्व-जन्म के संस्कारों से कुछ होता भी है ? ======================= 18 वीं सदी के उतरार्ध में तब के पूर्वी बंगाल के खुलना में एक डॉक्टर हुए, नाम था कृष्णधन घोष. इधर देश भी मैकाले प्रणीत शिक्षा नीति से अभिशप्त था ऊपर से घोष साहेब विलायत से डॉक्टरी पढ़ कर आये थे इसलिये अंग्रेजियत उन के ऊपर अंग्रेजों से भी अधिक हावी थी. उन्हें भारत, भारतीयता, हिन्दू धर्म, हिन्दू-परंपरा और अपनी संस्कृति से बेइंतेहा चिढ़ थी. इसलिये जब उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई तो घर में सबसे कह दिया कि मेरे बेटे को दकियानूस और मूर्तिपूजक हिन्दू संस्कार से दूर रखा जाये. बेटा कुछ बड़ा हुआ तो उसे अंग्रेजों के स्कूल में अंग्रेज शिक्षकों के मातहती में छोड़ आये. पुत्र जब उस परवरिश से बाहर आया तो उसे सिवाय अंगरेजी और कोई भारतीय भाषा यहाँ तक की अपनी मातृभाषा बांग्ला भी नहीं आती थी. घर में नौकरों के कारण उस बालक ने थोड़ा बहुत हिंदी और बांग्ला सीख लिया तो पिता चिंतित हो गये कि ये जाहिलियत की ओर जा रहा है इसलिये सपरिवार पुत्र को लेकर विलायत चले गये और वहां बेटे को एक ईसाई पादरी के हवाले कर दिया और उसे सख्त निर्देश दिया कि उन के बच्चे को न तो किसी भारतीय से मिलने दे और न ही भारत के बारे में कोई जानकारी दी जाये. इसी बीच कृष्णधन घोष को एक और पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, अब चूँकि उन का विलायती मन बेटे को हिन्दू नाम देने से भी हिचक रहा था इसलिये पुत्र का नाम जीसस के आरंभिक नाम पर इमैनुअल रखा. कृष्णधन घोष के दोनों बेटों को पश्चिमी तालीम दी जाने लगी. लड़के को लैटिन, यूनानी, फ्रेंच से लेकर और भी कई यूरोपीय भाषायें सिखाई गई. मतलब ये कि युवावस्था पाने तक जन्मना हिन्दू कृष्णधन घोष के बेटों को हिन्दू संस्कार छू भी नहीं पाया था पर एक दिन कुछ कुछ ऐसा हुआ जिस ने कृष्णधन घोष के बेटों का सब कुछ बदल कर रख दिया. हुआ यूं कि इन भाईयों के सामने एक ईसाई प्रचारक ने हिन्दू धर्म के बारे में कुछ अनर्गल बात कह दी. पूर्व जन्म का उत्तम संस्कार उन भाइयों के पश्चिमी परवरिश पर हावी हो गया और हिन्दू धर्म पर पादरी द्वारा लगाये आक्षेपों का उन भाइयों ने मुंहतोड़ जबाब दिया. एक झटके में उन के ऊपर से ईसाईयत का रंग उतर गया, पिता ने जबर्दस्ती आई० सी० एस० की परीक्षा में बैठाया, सभी विषयों में उत्तीर्ण हो गये पर उनका मन अंग्रेजों की सेवा के लिये तैयार नहीं था इसलिये उस परीक्षा के अंतिम पेपर में गये ही नहीं और फिर एक दिन भारत आ गये. भारत भूमि पर पहला कदम रखते ही उन्हें एक दिव्य अनुभूति हुई, समझ में आ गया कि परमात्मा ने उन्हें भारत में ही क्यों पैदा किया. ईसाई संस्कार में पले-बढ़े उस शख्स के हाथ में भगिनी निवेदिता की पुस्तक 'काली माता' लग गई, फिर उस के बाद तो पश्चिम के सारे कुसंस्कार धुल गये. अब वो सिर्फ भारत के लिये थे. यहाँ आकर अपनी मातृभाषा बांग्ला सीखी, हिंदी सीखी, संस्कृत सीखी, फिर वेदों का पारायण किया. सौभाग्य से योगी बिष्णु भास्कर भी उन्हें मिल गये जिन्होंने उन को योग की दिव्यता का एहसास कराया. ध्यान मग्न हुए तो प्रथम आध्यात्मिक अनुभूति हुई. उसी समय बंगाल में अंग्रेजों की बंग-भंग की भारत-तोड़ो योजना शुरू हुई थी, वो कलकत्ता आ गये और खुल कर भारत के स्वाधीनता यज्ञ में कूद पड़े. उन्होंने युगांतर और वन्दे-मातरम् जैसा कालजयी अखबार निकाला. उनकी गतिविधियों से परेशान अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर कलकत्ता की अलीपुर जेल में डाल दिया. जेल जाना उन के लिये वरदान साबित हुआ क्यों कि इसी जेल के अंदर उन्हें सत्य का साक्षात्कार हुआ, कृष्ण की गीता-वाणी सुनाई दी, भारत माता के दर्शन हुए, स्वामी विवेकानंद के शब्द सुनाई दिये जेल से निकल कर उत्तरपाड़ा में अपने ध्येय को देश के सामने रखते हुए कहा, "जब यह कहा जाता है कि भारत महान बनेगा तब इसका अर्थ होता है कि सनातन धर्म महान बनेगा. जब भारत अपना विस्तार करेगा तब इंगित होता है कि सनातन धर्म अपना विस्तार कर सारे विश्व में फैलेगा. भारत धर्म के लिये एवं धर्म से ही जीवन्त है. धर्म की व्याख्या में ही राष्ट्र की व्याख्या भी है" ये महापुरुष थे महर्षि अरविंद घोष और उनके भाई का नाम था प्रसिद्ध क्रांतिकारी वारीन्द्र घोष, ये वारीन्द्र घोष वही थे जिन्हें उनके पिता ने इमैनुअल नाम दिया था. कहते हैं कि बच्चे को संस्कार तीन जगहों से मिलते हैं उसके घर से, उसके स्कूल से और उस की मित्र मंडली या समाज से. सवाल है कि अरविन्द और वारीन्द्र को हिंदुत्व और भारत भक्ति का संस्कार न तो घर से मिला, न स्कूल से मिला और न ही समाज से मिला फिर किस संस्कार ने उन्हें भारत-भक्ति सिखाई, अपने हिंदुत्व, भाषा, संस्कृति और परंपरा पर गर्व करना सिखाया? किस संस्कार ने बाईबिल पढ़ कर बड़े हुए अरविंदो को वेद-भाष्य करने को प्रेरित किया?
उन्हें खाने पर आमंत्रित किया। जब खाना आया तो उसमें एक बाल था और वो ठंडा था तो उत्तंक ने कहा आप मुझे अपवित्र खाना खिलाना चाहते हैं। राजा पौष्य ने कहा ऐसा नहीं है और उसने अच्छा भोजन मंगवाया है। बहस बढ़ गई और दोनों ने एक दुसरे को शाप दिया। जहाँ उत्तंक ने राजा को भविष्य में अँधा हो जाने का शाप दिया, वहीँ राजा ने उत्तंक को निस्संतान होने का। जब विवाद थमा और जांच हुई तो खाने में सचमुच बाल था अब राजा लगे माफ़ी मांगने। उत्तंक ने तो अपना शाप थोड़े समय में समाप्त हो जाने का काल तय कर दिया, मगर राजा शाप वापस लेने में असमर्थ थे। उत्तंक ने समझाया कि जिस आरोप के सत्य होने की स्थिति में राजा ने शाप दिया था, वो झूठ था, आधा वाक्य झूठ होने के कारण शाप लागू ही नहीं हुआ होगा। अब जब उत्तंक लौटने लगे तो भेष बदले तक्षक उनसे कुंडल चुरा कर एक बिल में जा घुसा। पहले तो लकड़ी से बिल खोदते उत्तंक की मदद के लिए इंद्र ने अपना वज्र भेजा, फिर यात्रा की शुरुआत में जिस देव ने उत्तंक को गोबर खिलाया था उसने फिर से आकर उनकी मदद की। जैसे तैसे कुंडल वापस लेकर उत्तंक गुरु पत्नी के पास भी उसी देव की मदद से पहुंचे। जब सारी कहानी उन्होंने गुरु को बताई तो मदद करने वाले देव के इंद्र होने और समय के चक्र के बारे में भी उत्तंक को शिक्षा मिली। गुरुदक्षिणा दे चुके उत्तंक अब भी तक्षक से नाराज ही थे। उस से बदला लेने का विचार मन में लिए हुए ही वो हस्तिनापुर की ओर रवाना हुए थे। महाभारत के अनुक्रमाणिका पर्व के, यानि बिलकुल शुरूआती हिस्से की ये कहानियां लोमहर्षण के पुत्र सूतनन्दन उग्रश्रवा सुना रहे होते हैं। यानी कहानी पहले ही फ़्लैशबेक में जा चुकी होती है। महाभारत पढ़ने पर आप लगातार समय में आगे और पीछे आ-जा रहे होते हैं क्योंकि भृगु वंश के जो ऋषि ये कहानी एक दुसरे से मिलने पर सुना रहे होते हैं, या जो घटनाओं के समय वहां मौजूद हैं वो सब अलग अलग काल में होते हैं। कोई अपने शिक्षा या गुरुदक्षिना के लिए किये सफ़र की कहानी सुना रहा होता है तो कोई एक गुरु की आज्ञा पर किसी दुसरे ज्ञानी से मिलने जा रहा होता है। अभी की शिक्षा व्यवस्था एक ही जगह, ख़ास तौर पर किसी बड़े शहर में जमे रहने और दूसरों से कुछ ना सीखने पर जैसा जोर देती है वैसी परंपरा इस काल में नहीं दिखती। शायद ऐसी अड़ियल व्यवस्था के ना होने और एक दुसरे से सुनते सीखते रहने के ही कारण महाभारत आकार में विशाल भी हुई और इतने वर्षों से जीवित भी है। गुरुओं की तुलना में अभी के शिक्षक कुछ भी नहीं सिखाते ये तो अभी के शिक्षक खुद भी मान ही लेंगे। मेरे ख़याल से दोष उनका भी नहीं है। जो खुद ही कुछ जानता-सीखता नहीं, ना ही सिखाने में उसकी कोई रूचि है वो कुछ सिखाएगा भी कैसे? ✍🏻आनन्द कुमार जी की पोस्टों से संग्रहीत
में पढ़ने पर यहाँ भी फर्क दिख जाएगा। औद्दालकी का मतलब जहाँ पौत्र (पोता) होगा, वहीँ उद्दालकी का मतलब पुत्र हो जाता है। बृहदारण्यक, छान्दोग्योपनिषद्, कौषीतकि और कठोपनिषद, सबमें उनका नाम होने से विदेशी विद्वानों के लिए उद्दालक आरुणी एक ही व्यक्ति, या अलग अलग लोगों का नाम है ये भी एक बड़ा विषय रहा है। उपनिषदों के यही आरुणी महाभारत में शिष्य के रूप में हैं। महाभारत जिन गुरु शिष्यों की कहानी पर शुरू होती है, आरुणी उनमें से एक थे। गुरुकुल में रहने वाले आरुणी के गुरु धौम्य ने इन्हें आश्रम के खेतों की देखभाल जिम्मेदारी भी दे रखी थी। एक दिन जंगल से लकड़ी लेकर लौटते हुए घने बादल घिर आये और तेज बारिश की संभावना देखकर आरुणी दौड़कर खेतों की मेंढ़ देखने पहुंचे। तेज बारिश से मेंढ़ बहने की सी स्थिति में थी और उसे बचाने की लाख कोशिशों के बाद भी आरुणी उसे टूटने से रोक नहीं पाए। कहीं खेत तेज बहाव में बहते तो गुरु की देखभाल की आज्ञा का उल्लंघन होता इसलिए आरुणी मेंढ़ पर खुद ही लेट गए। भीगते हुए आरुणी मेंढ़ पर, पानी रोके लेटे रहे, और रात हो चली तो धौम्य ने सोचा आरुणी खेतों से वापस नहीं आया ? जब वो और अन्य शिष्य आरुणी को ढूंढते पहुंचे तो उन्हें खेत का पानी रोकते पाया। उद्दालक का एक अर्थ खेत की मेंढ़ से उठाया गया भी होता है, आरुणी का नाम इसी कारण गुरु ने उद्दालक भी रख दिया। आगे चलकर जो विख्यात अष्टावक्र हुए वो आरुणी के वंशज थे। आरुणी के अलावा भी धौम्य के और शिष्य थे जो खासे प्रसिद्ध हुए। ऐसे एक दुसरे शिष्य थे उपमन्यु। महाभारत के आदि पर्व का ये हिस्सा गुरु शिष्य परंपरा के अलावा समय का विभाग देखने के लिए भी पढ़ा जा सकता है। उस काल में समय कैसे प्रहार, घटी, दिन-रात और मास आदि में विभक्त था, अश्विनीकुमार की उपासना के समय वो भी वर्णन में आता है। बाद के समय के कई लोगों ने अपनी मर्जी से समय के विभाजन की पद्दतियों और काल गणना की भारतीय परम्पराओं का यथासंभव मजाक उड़ाने की कोशिश भी की है। किस्मत से संस्कृत भाषा और उसे जानने वाले आक्रमणकारियों के हिंसक तरीकों से पूरी तरह से ख़त्म नहीं हुए। गुरु शिष्य परंपरा में एक पीढ़ी आगे बढ़ते बढ़ते ये अब तक चले आये हैं। आयातित विचारधारा (Colonial Mindset) के मनोविकार से ग्रसित लोगों को निस्संदेह इस से बड़ी दिक्कत होती होगी। अब की पीढ़ी जब फिर से अपनी जड़ों को तलाशने में उन्हीं किताबों को खुद पढ़ने पर तुली है, जिसका मनचाहा अर्थ का अनर्थ करने में उन्होंने बरसों लगाये तो उन्हें वो Fundamentalist या कट्टरपंथी घोषित करके अलग थलग करने की कोशिश भी करते हैं। ये भी कोलोनियल माइंडसेट के लोगों द्वारा छुआछूत फैलाने का एक उदाहरण है। गुरु धौम्य के ही तीसरे शिष्य थे वेद जो कि सीधे-सादे, जरा कम चतुर जीव थे। वो बहुत तेजी से सीख नहीं पाते थे तो उन्हें गुरु ने बैल की तरह काम में लगाए रहते। भारी बोझा ढोना, दिन रात आश्रम की सेवा में होने के बाद भी वेद काम में जुटे रहते। उनके सेवा भाव से प्रसन्न होकर गुरु धौम्य ने उन्हें भी बुद्धि में सभी शास्त्र स्वतः स्फुरित हो जाने का वरदान दिया। आगे चलकर जब वेद गुरु हुए तो वो जानते थे इस तरह सेवा करना बड़े कष्ट का काम है, इसलिए वो अपने शिष्यों को ऐसी सेवा में जुटे रहने नहीं कहते हे। अब जो पी.एच.डी. के गाइड या ज्यादातर जगह शिक्षक होते हैं वो गुरु नहीं होते, इसलिए वो ऐसी चीज़ें याद भी नहीं रखते। जब वेद के एक शिष्य उत्तंक की शिक्षा पूरी हुई तो उसने भी गुरुदक्षिणा देने की इच्छा जताई। वेद ने कहा सोचकर बताता हूँ, तुम थोड़ा ठहरो। कई बार पूछे जाने पर भी बेचारे सीधे-सादे वेद ये तय नहीं कर पाए कि गुरुदक्षिना में आखिर क्या माँगा जाए ? आखिर उन्होंने उत्तंक को गुरुपत्नी से पूछ लेने कहा। वेद उस समय जनमेजय और पौष्य नाम वाले दो क्षत्रियों के पुरोहित थे। गुरुपत्नी ने कहा कि उत्तंक पौष्य की पत्नी के दिव्य कुंडल मांग लाये। रास्ते में उत्तंक को एक बैल पर बैठा लम्बा चौड़ा देव मिला जिसने उन्हें गोबर खा लेने की सलाह दी। जब उत्तंक यात्रा करके राजा पौष्य के पास पहुंचे तो वो कुंडल देने को तो राजी हो गए मगर उन्होंने कहा कि उत्तंक सीधा अन्तःपुर में जाकर रानी से कुंडल मांग ले। जब उत्तंक वहां पहुंचे तो वहां कोई रानी नहीं दिखी। उत्तंक वापस पौष्य के पास आये और पूछा क्या वो कुंडल नहीं देना चाहते, इसलिए झूठ कह दिया कि रानी वहां है, उनसे मांग लो ? पौष्य ने वापस पूछा क्या उत्तंक शुद्ध होकर गए थे ? आदि पर्व के तीसरे अध्याय का ये हिस्सा शौच और शुचिता पर भी है। जब उत्तंक ने बताया कि उन्होंने गोबर खाकर खड़े-खड़े आचमन किया था तो उन्हें ढंग से आचमन करने की आज्ञा हुई। जब साफ़ सुथरे उत्तंक वापस गए तो इस बार उन्हें रानी नजर आने लगी। रानी ने कुंडल दिए और साथ ही सावधान किया कि तक्षक इन्हें काफी समय से चुराना चाहता है। जाते समय जब उत्तंक ने राजा से आज्ञा ली तो राजा ने
समय के आगे बढ़ने के साथ मनुष्यों के ज्ञान के बढ़ने की बात आते ही हमें माण्डुक्य उपनिषद की याद आ जाती है। अथर्ववेद का ये उपनिषद आकार में सबसे छोटे उपनिषदों में गिना जाता है। इसके साथ ही ये उपनिषद सबसे अधिक विवादों की जड़ में रहा उपनिषद भी है। ये मुक्तिका के 108 उपनिषदों में छठे स्थान पर आता है। मुक्तिका को भगवान राम और हनुमान जी का मोक्ष के बारे में संवाद माना जाता है। खैर वापस माण्डुक्य उपनिषद पर आते हैं। ये सिर्फ 12 मन्त्रों वाला बिलकुल छोटा सा उपनिषद है जिसमें ॐ की चर्चा की जाती है। इस उपनिषद पर गौड़पादाचार्य ने कारिका लिखी। इसमें उपनिषद के सूत्रों को समझाने की चेष्टा की गयी है। उनके कारिका जोड़ने पर इसमें 215 श्लोक जुड़ गए और ये चार अध्यायों में भी बंट गया। यानी पहले से कहीं अधिक (करीब बीस गुना) लम्बा हो गया था और बात यहीं रुकी भी नहीं। गौड़पादाचार्य के शिष्य थे गोविन्द भगवद्पाद और उनके शिष्य थे आदि शंकराचार्य। माण्डुक्य उपनिषद अद्वैत के प्रमुख ग्रंथों में से एक माना जाता है। तो आदि शंकराचार्य ने माण्डुक्य उपनिषद की कारिका पर भाष्य लिख डाला! अब आज के दौर में संस्कृत में लिखा भाष्य तो आसानी से पढ़ा नहीं जा सकता, इसलिए भाष्य के साथ अनुवाद भी आते हैं। इस तरह माण्डुक्य उपनिषद जो बारह मन्त्रों का होता है, वो अब करीब ढाई सौ पन्ने का है। जहाँ तक विवादों का सवाल है, ये विवादों में इसलिए रही है क्योंकि कुछ विदेशी “विद्वान” इसे बौद्ध दर्शन से प्रभावित बताने पर तुले थे। उनके शून्य के सिद्धांत से कुछ मिलते-जुलते से लगने वाले चतुर्थ अवस्था की बात यहाँ भी थी। इस बात को स्थापित नहीं किया जा सका क्योंकि आत्म जैसे सिद्धांतों को बौद्ध मानते नहीं है। चित्त की जो बात माण्डुक्य उपनिषद में होती है वही बौद्ध काल से पूर्व के माने जाने वाले बृहदारण्यक उपनिषद में भी मिल जाती है। बारह मन्त्रों से कई श्लोकों तक पहुँच गए इस उपनिषद, उसकी कारिका और फिर भाष्य पर चर्चा इसलिए क्योंकि अगर जानकारी को हर सौ साल में दोगुना होता हुआ भी माना जाये तो सनातन धर्म के हजारों वर्षों में माण्डुक्य उपनिषद का आकार कितना बड़ा हो गया होता? अच्छा है कि भगवान श्री कृष्ण भगवद्गीता को उपनिषदों का सार बता देते हैं। सातवें अध्याय के आठवें श्लोक के एक छोटे से हिस्से में ही ॐ का महत्व पता चल जाता है। रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः। प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु।।7.8 अर्थात, कुन्तीनन्दन जलों में रस मैं हूँ, चन्द्रमा और सूर्य में प्रभा (प्रकाश) मैं हूँ, सम्पूर्ण वेदों में प्रणव (ओंकार) मैं हूँ, आकाश में शब्द और मनुष्यों में पुरुषार्थ मैं हूँ। युवराज ने गीता-उपनिषद पढ़ने टाइप कुछ कह दिया है। इस से पहले कि कोई अल्पज्ञ अपने सिरमौर की नकल करने की सोचे हम पहले ही सावधान कर देना चाहेंगे। गीता कोई एक नहीं होती, अगर साफ़ साफ़ ना कहा हो कि कौन सी गीता तो बिना सोचे समझे नकल करने वालों के लिए समस्या हो जायेगी। बिना अकल, नकल मत कीजिये। शिव गीता, अष्टावक्र गीता, अवधूत गीता, गणेश गीता जैसी कम से कम सैकड़ों अलग अलग गीता मौजूद हैं। शाकाहारी-मांसाहारी का विप्लव फैलाने में जुटे लोगों को ध्यान रखना चाहिए कि एक व्याध गीता भी महाभारत में ही होती है। आम तौर पर गीता बोलने से भगवद्गीता समझा जाता है, वो सबसे आसानी से उपलब्ध हो जायेगी। बहुत मोटी भी नहीं होती, ज्यादातर संस्करणों में सात सौ श्लोक ही होते हैं तो वही पढ़िएगा। उपनिषद में ज्यादा दिक्कत होगी क्योंकि उनकी गिनती और ज्यादा, मतलब १०८ मानी जाती है। वहां नाम पता होना और भी जरूरी है। गलती से भी बृहदारण्यक या छान्दोग्योपनिषद् मत उठा लीजियेगा, ये उपनिषदों में सबसे बृहद (बड़े-मोटे) होते हैं। सबसे छोटे वाले उपनिषदों में से एक है माण्डुक्य उपनिषद, जिसमें बारह ही मन्त्र हैं। उसपर शंकराचार्य के गुरु के गुरूजी ने गौड़पादकारिका लिखी थी तो उसकी वजह से ६४ श्लोक होते हैं, फिर आदि शंकराचार्य ने उसपे भाष्य लिखा तो अब करीब ढाई सौ पन्ने की हो गई है। मतलब अब कितना पढ़ने का मतलब उपनिषद पढ़ना होगा वो आपको अंदाजा हो गया होगा। प्रश्न उपनिषद जैसे कुछ वानप्रस्थ के इक्छुकों के लिए मानी जाती है, तो आप जैसे भोगियों को वो भी छोड़ना होगा। हाँ, फिर भी मन ना मान रहा हो तो, नचिकेता की प्रसिद्ध सी कहानी वाला कठोपनिषद् पढ़िए। शायद पूरा पढ़ पायें, रोमन लिपि में। उपनिषद के महावाक्यों में से एक जिस “तत्वमसि” का आपने अक्सर सुना होगा वो आरुणी नाम के गुरु से उनके शिष्य (पुत्र) श्वेतकेतु की वार्ता है। इन्हीं आरुणी को उद्दालक आरुणी के नाम से भी जाना जाता है। प्रचलित मान्यताओं के अनुसार उन्होंने उपनिषदों को श्रृंखलाबद्ध करने पर काम किया था। हरमन जकोबी और रैनडल कॉलिंस उनकी तुलना थेल्स ऑफ़ मिलेटस(Thales of Miletus) से करते हैं। संस्कृत को देवनागरी में लिखकर पढ़ने और रोमन ट्रांसलिटरेशन