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शैव एवं शाक्त तंत्र (A Group of ancient tantra,yog and sadhna)

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  • शक्ति उपासना एवं आचार शाक्त साधना तीन प्रकार के आचारों से की जाती है १. दक्षिणाचार, २. वामाचार एवं ३. कुलाचार। दक्षिणाचार में समस्त वैष्णवाचार सम्मिलित है। इसमें प्रात: स्नान, दिन में पूजन, हविष्यान का भोजन, पूजन में ऊन का आसन, रुद्राक्ष माला तथा तुलसीमाला का प्रयोग, श्रौत-स्मार्त नियमों का पालन करते हुए साधना करना, पत्थर या मिट्टी के बर्तनों का प्रयोग करना, ब्रह्मचर्यपूर्वक रहना, अपनी ही स्त्री से सम्भोग करना तथा मद्य से पूजन न करना। बामाचार में स्नान-शौचादि का कोई बन्धन नहीं है। साधक सदा सभी समय में जप-ध्यानादि कर सकता है। रात्रिपूजन विशेष रूप से किया जाता है। वर्णाश्रम धर्म के पालन की कोई आवश्यकता नहीं है। नृदन्त की माला तथा नरमुण्ड के पात्र प्रशस्त हैं। धर्मादि (मृगचर्मादि) के आसन, स्त्रीकेश के कंकण तथा मदा का सेवन विहित है। मद्य-मांसादि से ही देवता का पूजन किया जाता है। साधनाकाल में अपनी स्त्री या दूसरे की ही में यह भेद नहीं किया जाता। कुलाचार को राजयोग भी कहा जाता है। इसके पश्च मकार अन्तर्याग से सम्बन्धित हैं। इनका क्रमपूर्वक विवेचन यथास्थान किया जायेगा। उपरोक्त तीनों आचारों को भावत्रय भी कहते हैं। दक्षिणाचार पशुभाव से सम्बन्धित है, वामाचार वीरभाव से तथा कुलाचार दिव्यभाव से सम्बन्धित है। कालीविलासतन्त्र का कहना है शृणु भावनयं देवि ! दिव्यवीरपशुक्रमात् । दिव्यश्च देववत् प्रायो वीरचोद्धतमानसः ।। पशुभावः सदा देवि। शुद्धश्च शुचिवत् सदा । अर्थात् हे देवि । भावत्रय का श्रवण करो। दिव्य, बीर एवं पशु यह क्रमपूर्वक है। दिव्यभाव देववत् है, वीरभाव औद्धत्य है और पशुभाव सदा शुद्ध तथा पवित्रवत् है। 'कालीविलासतन्त्र' पशुभाव को सर्वश्रेष्ठ तथा बीरभाव को सबसे निकृष्ट मानता है; जबकि अन्य तन्त्र पशुभाव को ही निकृष्ट मानते हैं; जैसा कि 'भावचूड़ामणि' में कहा भी गया है- भावस्तु त्रिविधो देव। दिव्यबीरपशुक्रमात् । आद्यभावो महादेव । श्रेयान् सर्वसमृद्धिदः ।। द्वितीयो मध्यमशैव तृतीयस्सर्वनिन्दितः ।। श्रीदेवी ने कहा- हे देव। भाव तीन प्रकार के होते हैं १. दिव्य, २. वीर तथा ३. पशु। हे महादेव! दिव्यभाव सभी प्रकार की समृद्धि प्रदान करने वाला है, वीरभाव मध्यम है तथा पशुभाव सभी प्रकार से निन्दित है। यहाँ पर यह भी उल्लेखनीय है कि जिस तन्त्रग्रन्ध ने जिस भाव को प्रधानता दी है उसे ही श्रेष्ठ कहा है, किन्तु अधिकांश ग्रन्थ इस बात पर सहमत हैं कि पशुभाव ही सबसे निन्दित है। अब इन सभी भावों का क्रमपूर्वक पृथक् पृथक् विवेचन किया जायेगा।

  • श्रीतारा महा-विद्या एक समय श्री पार्वती ने श्री शङ्कर से पूछा- सर्वेश्वर सर्व-रहस्याभिज्ञ विश्वात्मन् । वह कौन-सी विद्या है, जिसे प्राप्त कर परम बिद्वान् व्यास मुनि ने भारतादि-ग्रंथों का निर्माण किया?' उत्तर में श्री शंकर ने कहा हे पार्वति । श्रीतारा महाविद्या के प्रभाव से ही व्यास मुनि ग्रन्थ-रचना में समर्थ हुए थे। हे गिरि-नन्दिनि । 'तारा' महा-विद्या अज्ञान रूपी इन्धन के लिए 'अग्नि-स्वरूप' है, जिसे प्राप्त कर 'धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष' चारों पदार्थ अनायास ही मिल जाते हैं। इस विद्या के प्रभाव से कोई भी वस्तु अप्राप्य नहीं है। श्रीतारा का साधक 'काव्य-कला' में प्रवीण होकर गङ्गा-प्रवाह के सदृश कविता करता है, राजा को वश में कर रखता है, सभा में नाद उपस्थित होने पर प्रति-वादी की वाणी का स्तम्भन कर सकता है। इस विद्या के आराधन से अनेक अ‌द्भुत चमत्कार साधक में आ जाते हैं। कहाँ तक कहें, श्रीतारा-मन्त्र के ज्ञान मात्र से साधक सर्वज्ञ हो जाता है।' श्रीतारा के अनेक मन्च तथा साधना-प्रकार हैं, तथापि तीन भेद ही मुख्य माने जाते हैं। प्रणव (ऊं), माया (ह्रीं), वधू (स्त्री), कूर्व (हूं) बौर अस्त्र (फट) अर्थात ॐ हीं स्त्री हूं फट- तारा भगवती की पंचाक्षर महा-विद्या है। 'हीं स्त्रीं हूँ इस त्रयाक्षर को 'नील सरस्वती' कहते हैं। यही 'तारा कुल्लुका' नाम से प्रख्यात है। ह्रीं स्त्रीं हूं फट' मंत्र को 'एक-जटा तारा कहते हैं। किसी-किसी के मत से 'स्त्री' बीज के स्थान पर ' त्रीं' बीज माना जाता है, परन्तु वह विद्या वसिष्ठ मुनि से शप्त होने के कारण शीघ्र फलदा नहीं है, किन्तु 'तारा-भक्ति-सुधार्णव में कहा है कि कृष्ण-अवतार होने पर यह विद्या श्राप से मुक्त हो जाएगी। इन विद्याओं के और भी कई भेद है, तथापि साधक समुदाय में इन्हीं का विशेष प्रचलन है। 'मन्त्र-महोदधि' में भी तारा के कई भेद बताए गए हैं। श्री ब्रह्मा ने भी तारा की जिस मन्त्र से आराधना की थी, उसे 'सप्ताक्षर' कहते हैं। दूसरी विद्या 'द्वादशाक्षर' है, जिसकी सिद्धि बौद्ध-मार्ग से होती है। 'सप्ताक्षर' के पाँचवें वर्ण के स्थान पर 'सौं' बीज लगाकर भगवान् बलराम ने आराधन किया था। त्रीं हूं फट् क्लीं ऐं' इस पंचाक्षर को नारायण ने जपा था। ॐ ह्रीं हूं हीं हूं फट' इस ष्डाक्षरी विद्या' को सूर्य ने अदिति को प्रदान किया था। श्री शंकर जो कहते हैं कि स्त्री हूं ह्रीं हूं फट्' इस पंचाक्षर को जप कर मैने जालंधर को मारा था।

  • सूचना आज भौमश्विनी योग आज रात्रि आप सभी को यथा शक्ति यथा संभव देवी अथर्वशीर्ष का पाठ करें।दीक्षित शिष्य जनों को गुरु गणपति मंत्र जाप करने के बाद आवश्यक रूप से यह पाठ करना है आज रात्रि। जय माँ

  • सतनाम — उग्रतारा में कब? उग्रतारा में सतनाम जप के बाद करना श्रेष्ठ माना गया है। कारण: जप से शक्ति जाग्रत होती है। सतनाम से वही उग्र-शक्ति शांत, प्रसन्न और अनुग्रहकारी बनती है। यह उग्रता को करुणा में रूपांतरित करता है। यदि जप 108 या 1008 हो, तो उसके पश्चात् अष्टोत्तर नामावली पर्याप्त है। तांत्रिक विवेचन--- चरण आन्तरिक प्रभाव न्यास उग्र-नाद को देह में प्रतिष्ठित करना ध्यान भय-विनाशिनी शक्ति का साक्षात्कार कवच प्राण-तंत्र की सुरक्षा जप नाद का तीव्र आरोहण सतनाम उग्रता का करुणा में विलय। सावधानी--उग्रतारा साधना रात्रि, विशेषतः मध्यरात्रि में अधिक प्रभावी मानी जाती है। यदि मानसिक अस्थिरता, अत्यधिक स्वप्न या भय अनुभव हो — जप की संख्या घटाएँ और कवच को दो बार करें। गुरु-दीक्षा के बिना उग्र-साधना में अति-प्रयोग न करें। त्रिक-दृष्टि से उग्रतारा का नाद–बिन्दु रहस्य त्रिक (कश्मीर-शैव) में सम्पूर्ण साधना का मूल है — प्रकाश (शिव) और विमर्श (शक्ति) का अद्वैत। उग्रतारा इस अद्वैत का तीव्र स्पन्द हैं — जहाँ नाद और बिन्दु एक-दूसरे को प्रकट करते हैं। बिन्दु क्या है? (त्रिक-दृष्टि)-- बिन्दु = संकुचित, अखण्ड चैतन्य-बीज यह शिव का “अहं-प्रकाश” है — बिना किसी विस्तार के सहस्रार या हृदय-गुहा में सूक्ष्म ज्योति-बिन्दु के रूप में अनुभव यह निःस्पन्द अवस्था है। नाद क्या है? बिन्दु का प्रथम कम्पन = नाद यह शक्ति का स्पन्द है नाद ही वाक् का मूल, प्राण का कम्पन और मन्त्र का स्वरूप है उग्रतारा इस प्रथम स्पन्द की उग्र ध्वनि हैं — मौन से ध्वनि की ओर पहला विस्फोट। उग्रतारा क्यों “उग्र”? उग्रता का अर्थ क्रोध नहीं — बल्कि “अविद्या-विच्छेदक तीव्रता”। त्रिक में जब बिन्दु स्वयं को पहचानता है (प्रत्यभिज्ञा), तो जो आन्तरिक कम्पन उठता है — वही उग्र-नाद है। नाद–बिन्दु की साधना का आन्तरिक क्रम-- अवस्था अनुभव बिन्दु-स्थिती गहन मौन, शून्य-ज्योति नाद-उद्गम सूक्ष्म ध्वनि (अनाहत) उग्र-नाद तीव्र आन्तरिक स्पन्द पुनः-लय नाद का बिन्दु में विलय उग्रतारा साधना में जप के मध्य जो तीव्र कम्पन, कण्ठ-कम्प या आन्तरिक ध्वनि उठती है — वही नाद की अनुभूति है। विशुद्धि-चक्र और उग्रतारा--- उग्रतारा का विशेष सम्बन्ध कण्ठ (विशुद्धि) से है। बिन्दु = सहस्रार की ज्योति नाद = कण्ठ में ध्वनि जप = नाद का ऊर्ध्व-गमन मौन = पुनः बिन्दु-लय जब जप स्वयमेव रुक जाए और भीतर ध्वनि चलती रहे — वह अजपा-नाद की झलक है। उग्रतारा का त्रिक रहस्य --- बिन्दु = शिव का निःशब्द अहं नाद = शक्ति का प्रथम स्पन्द उग्रतारा = नाद का स्वातन्त्र्य-विस्फोट साधना = नाद को पुनः बिन्दु में लाना। साधक के लिए संकेत-- यदि जप के समय आन्तरिक ध्वनि सुनाई दे — ध्यानपूर्वक सुनें, दबाएँ नहीं। यदि कण्ठ में कम्पन या नील-प्रकाश अनुभव हो — भय न करें। साधना का लक्ष्य नाद में अटकना नहीं, नाद के स्रोत (बिन्दु) में विश्राम है।

  • दशमहाविद्या साधना-क्षेत्र-- दशमहाविद्या साधना में पंचाङ्ग-न्यास, ध्यान, जप, कवच और सतनाम — इनका क्रम साधना की परम्परा पर निर्भर करता है कौल, श्रीविद्या, तांत्रिक, पुराणोक्त। फिर भी सामान्य तांत्रिक क्रम इस प्रकार माना जाता है: सामान्य क्रम (एकाग्र साधना के लिए) आचमन, शुद्धि, आसन-स्थापन गुरु-वन्दना / गुरुमंत्र जप संकल्प पंचाङ्ग-न्यास (कर-न्यास, अङ्ग-न्यास आदि) ध्यान कवच-पाठ मूलमंत्र जप सतनाम / नामावलि कीलक-विमोचन (यदि परम्परा में हो) पूर्ति-प्रार्थना, क्षमा-याचन कवच कब और कैसे करें? समय:ध्यान के बाद और जप से पहले। उद्देश्य: साधक के सूक्ष्म-देह की रक्षा और शक्ति-संवेदन। विधि:आसन पर स्थिर होकर, दाहिने हाथ से हृदय/मस्तक स्पर्श कर। प्रत्येक श्लोक के साथ अंग-स्पर्श (यदि अंग-रक्षा-विधान हो)। भावना रखें कि देवी का तेज चारों ओर सुरक्षा-वृत बना रहा है। उदाहरण: काली कवच में प्रत्येक अंग पर देवी की शक्ति स्थापित की जाती है। तारा कवच में नाद-रूपिणी रक्षा का भाव प्रमुख होता है। कवच का कार्य है — “शक्ति को जागृत कर साधक के सूक्ष्म-क्षेत्र को सुरक्षित करना”। सतनाम (अष्टोत्तर/सहस्रनाम) कब करें? समय: दो परम्पराएँ प्रचलित हैं — (1) जप के बाद जब जप से देवी का आह्वान हो चुका हो। तब नामावली से उस जाग्रत शक्ति का विस्तार किया जाता है। (2) पूजन-क्रम में जप से पूर्व यदि यह पूर्ण पूजन-विधान का भाग हो। प्रत्येक नाम पर पुष्प/अक्षत अर्पण। विधि:प्रत्येक नाम के साथ “नमः” बोलकर पुष्प/अक्षत अर्पित करें। यदि मानसिक साधना है तो सहस्रार/हृदय में नामों का प्रकाश-विस्तार देखें। उदाहरण: त्रिपुरसुन्दरी सहस्रनाम जप के पश्चात् किया जाए तो श्रीचक्र-चैतन्य का विस्तार होता है। भुवनेश्वरी अष्टोत्तर पूजन में अर्पणात्मक अधिक होता है। संक्षेप में आदर्श क्रम-- न्यास ध्यान कवच मूलमंत्र जप सतनाम / सहस्रनाम सूक्ष्म दृष्टि -- न्यास = शक्ति-स्थापन ध्यान = शक्ति-दर्शन कवच = शक्ति-रक्षा जप = शक्ति-जागरण सतनाम = शक्ति-विस्तार तारा साधना में कवच एवं सतनाम का क्रम आपके प्रश्न के अनुसार — तारा महाविद्या में पंचाङ्ग-न्यास, ध्यान, जप, कवच और सतनाम का सूक्ष्म एवं तांत्रिक क्रम इस प्रकार है: पूर्ण साधना-क्रम--- आचमन, शुद्धि गुरु-वन्दना / गुरुमंत्र संकल्प पंचाङ्ग-न्यास (कर-न्यास, अङ्ग-न्यास) ध्यान (नीलसरस्वती/उग्रतारा भाव से) कवच-पाठ मूलमंत्र जप सतनाम / अष्टोत्तर / सहस्रनाम पूर्ति, क्षमा-याचन। तारा-कवच कब और कैसे? कब? ध्यान के बाद और जप से पहले। क्यों? तारा नाद-स्वरूपिणी हैं। कवच द्वारा: साधक के सूक्ष्म-नाड़ी-जाल की रक्षा होती है जप में आने वाले मानसिक/अदृश्य अवरोध शांत होते हैं कण्ठ-चक्र (विशुद्धि) स्थिर होता है। कैसे? स्थिर आसन में बैठकर प्रत्येक अंग-सुरक्षा श्लोक पर उस अंग को स्पर्श (यदि परम्परा अनुमति दे) भावना करें — नील-तेज का आवरण आपके चारों ओर मंडल बना रहा है उग्रतारा साधना में कवच विशेष रूप से आवश्यक माना गया है। सतनाम / नामावलि कब करें? तारा-साधना में दो पद्धतियाँ हैं: (A) जप के बाद (उत्तम आन्तरिक साधकों हेतु) जप से शक्ति जाग्रत हो जाती है सतनाम से वही शक्ति सहस्रार तक विस्तारित होती है यह अधिक आन्तरिक (ध्यानात्मक) विधि है। (B) जप से पूर्व (पूजनात्मक साधना में) प्रत्येक नाम पर पुष्प/अक्षत अर्पण मंडल-स्थापन और बाह्य पूजन में उपयोगी। तारा-साधना का सूक्ष्म रहस्य-- अंग आन्तरिक अर्थ न्यास नाद-शक्ति की देह में प्रतिष्ठा ध्यान नील-वाक्-शक्ति का दर्शन कवच नाड़ी-जाल की रक्षा जप नाद का आरोहण सतनाम नाद का विस्तार यदि आप “नीलसरस्वती” रूप में साधना कर रहे हैं तो जप के पश्चात् नामावलि करना अधिक फलदायक होता है, क्योंकि: तारा वाक्-शक्ति हैं नामों का जप ही उनका विस्तार है। उग्रतारा साधना में कवच एवं सतनाम का विशिष्ट क्रम उग्रतारा साधना में क्रम सामान्य तारा-साधना से अधिक संरक्षित और ऊर्जावान होता है। यहाँ कवच अत्यावश्यक माना गया है, क्योंकि उग्र-नाद की तीव्रता साधक के सूक्ष्म-तंत्र को झकझोरती है। तांत्रिक क्रम (उग्रतारा भाव) शुद्धि, आचमन गुरु-वन्दना (गुरु-अनुज्ञा स्मरण) संकल्प पंचाङ्ग-न्यास (विशेषतः कण्ठ एवं हृदय पर सजगता) ध्यान (श्मशान-नील, कराल-वदना, वराभय मुद्रा) कवच-पाठ ⚔️ मूलमंत्र जप सतनाम / अष्टोत्तर पूर्ति एवं क्षमा। उग्रतारा-कवच — कब और कैसे? कब? ध्यान के तुरंत बाद और जप से पहले। (यहाँ कवच छोड़ा नहीं जाता।) क्यों अनिवार्य? उग्रतारा नाद-शक्ति का तीक्ष्ण रूप हैं। जप के दौरान आन्तरिक कम्पन, स्वप्न-दर्शन, भय-उद्गार हो सकते हैं। कवच सूक्ष्म-देह को “नाद-आघात” से संतुलित रखता है। कैसे करें? प्रत्येक श्लोक के साथ संबंधित अंग पर मानसिक स्पर्श। कल्पना करें — गहरे नील-वज्र का सुरक्षा-वृत्त आपको घेर रहा है। अंत में कुछ क्षण मौन बैठें — सुरक्षा-चक्र स्थिर होने दें।

  • गुरु पूर्णिमा में संपूर्ण गुरु मंडल की कृपा सभी साधकों को प्राप्त हो।आप सभी को गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएं ।।

  • गुप्त वाराही नवरात्रि (१५ जुलाई -२३ जुलाई ) आप सभी को आने वाली गुप्त नवरात्रि की शुभकामनाएं।गुप्त नवरात्रि के यह ९ दिन पूर्णतः साधकों के अपने साधना विस्तार हेतु सबसे श्रेष्ठ दिन हैं।मेरा विश्वास है की हमारे सभी शिष्य जिन्हें माँ के जिस स्वरूप की भी मंत्र साधना में दीक्षित किया गया है वे इन दिनों का पूरा लाभ उठायेंगे और अपने इष्ट के प्रेम कृपा को प्राप्त करेंगे।अन्य साधक जन जो मुझसे जुड़े हैं वे सभी भी इन दिनों का अपने उपासना ,साधना क्रम से माँ को प्रसन्न करेंगे और अपने मनोरथ को सिद्ध करेंगे। जो साधक जन मंत्र जाप क्रम में अथवा दीक्षित नहीं है वे इन ९ दिनों में क्या कर सकते है उसके लिए मार्गदर्शन ले सकते हैं। चूँकि हमारे इन ९ दिनों में स्वयं की क्लिष्ट साधनाओ एवं तांत्रिक अनुष्ठान में व्यस्तता रहेगी अतः आज मैं कोशिश करूँगा की सभी को उचित मार्गदर्शन दे पाऊ एवं गुप्त नवरात्रि में व्यस्त हो जाऊँगा। इस नवरात्रि एक तंत्र का निर्माण भी किया जाएगा जो माँ मातंगी से संबंधित होगा लेकिन यह तंत्र सभी के लिए नहीं होगा क्योंकि यह सिर्फ़ एक ही निर्मित हो पाएगा यह चीता साधना के दौरान ही निर्मित की जाती है इसकी अन्य बाते गुप्त है जो कभी आगे प्रकाशित करूँगा। इन दिनों में जो लोग बहुत दिनों अनुष्ठान करवाने अथवा ऐसी कोई भी प्रक्रिया से जुड़ने की सोच रहे हो और अभी तक नहीं कर पाए वे इन दिनों का लाभ उठा सकते है जिन भी व्यक्ति से श्रद्धा भाव जुड़ा हो उनसे अनुष्ठान इन दिनों में अवश्य करायें बहुत लाभप्रद रहेगा। जय माँ

  • भगवान्‌ सदाशिव देवी पार्वती से कहते हैं कि हे पार्वती जी यदि--साधक दीक्षा ग्रहण करने के उपरान्त किसी रोग वश अथवा कार्यवश पुरश्चरण करने में स्वयं असमर्थ हो तो किसी योग्य उपासक को अपना प्रतिनिधि बनाकर उससे अपने मन्त्र का इष्ट सिद्धि तथा मन्त्र सिद्धि के लिये पुरश्चरण करवाये | परमानन्द तन्त्र में लिखा है:--- अशक्तश्चेत् देशिकेन ब्राह्मणेन च कारयेत्‌ ॥” इति अपनी असमर्थता में साधक सबसे पहिले गुरु देव से ही पुरश्चरण करने के लिये प्रार्थना करे। उनके स्वीकार न करने पर अथवा उनकी अनुपस्थिति में सब प्राणियों के हितैषी सद्गुण सम्पन्न किसी मंत्र साधक ब्राह्मण से पुरश्चरण करवा सकते हैं।

  • 5 июн.1 271

    तारापीठ महाश्मशान हवन - हमारे द्वारा पहले कुछ समूह साधना संबंधित अथवा हवन संबंधित कुछ कुछ प्रक्रिया की जाती रही है लेकिन काफी दिनों से हमे अपने साधना अनुष्ठान में समय नहीं मिल सका। कुछ लोगो ने पूछा की साप्ताहिक अथवा मासिक हवन का कार्यक्रम पहले जैसा किया जाए ताकि लोग इसमें सहयोग करके सम्मिलित हो कर इसका लाभ ले सकें तो यह आप सभी के लिए प्रस्तुत कर रहा हूँ मैं स्वयं के व्यक्तिगत साधना के हवन अनुष्ठान के अलावा माँ तारापीठ महा श्मशान में हर पूर्णिमा अमावस्या एक हवन आयोजित करता हूँ एवं माँ को उनके वहाँ के विशेष भोग को अर्पित करता हूँ।तारा पीठ में स्थित माँ तारा दृतीय महाविद्या हैं और आप सब इनके बारे में सोशल मीडिया के माध्यम से भली भाँति परिचित होंगे।अतः अब हर माह में २ हवन पूर्णिमा एवं अमावस्या के दिन तारापीठ महाश्मशान में आयोजित होंगे एवं इस हवन हेतु १० लोग सहयोग करके अपना नामांकन करा सकेंगे। इन १० लोगो के इस हवन में संकल्प इत्यादि किए जाएँगे और माँ की विशेष सेवा में वो भागीदार बनेंगे लेकिन यह मैं सुनिश्चित कर देना चाह रहा हूँ ये हवन सिर्फ़ माँ तारा की प्रसन्नता के लिए की जाती है इसमें किसी भी प्रकार के मनोरथ ,मनोकामना पूर्ति या माँ से कुछ भी मांगने का संकल्प नहीं किया जाता है एक मात्र सिर्फ़ माँ की प्रसन्नता हेतु यह हवन हर अमावस्या एवं पूर्णिमा में होता है अर्थात् माह में दो दिन। मैं यदि पीठ पर उपस्थित रहा तो मैं स्वयं अथवा मेरे ना रहने पर मेरे सहयोगियों द्वारा इस हवन का आयोजन होता है। अतः आने वाले अमावस्या एवं पूर्णिमा में होने वाले हवन में जो भी जुड़ना चाहेंगे मुझे मेसेज करके सहयोग राशि जमा करके जुड़ सकेंगे।इस हवन में १० से ज़्यादा लोगो को नहीं जोड़ा जाएगा। जो ज़्यादा सामर्थ्य से सेवा करना चाहेंगे वे विशेष भोग निवेदित करने हेतु भी आगे बढ़ सकते हैं। इसके लिए आपको इस दिए गए नम्बर पर व्हाट्सएप करना होगा -9120096234 इस नंबर पर किए गए मेसेज ही मान्य होंगे अन्य कहीं भी किए गए मेसेज मान्य नहीं होंगे।10 लोगो का नामांकन होते ही एक माह के बाद ही किसी और कोई जोड़ा जा सकेगा एक माह में दो हवन एक पूर्णिमा के दिन एक अमावस्या के दिन संपन्न होंगे। जय माँ

  • 2 июн.1 035

    माधुरी साधना यह साधना उनलोगों के लिए है जो राजनीती के क्षेत्र में है। धर्मोपदेशकों, समाज के प्रमुख लोगों के लिए भी यह साधना उत्तम है। इस साधना से तीव्र सम्मोहन शक्ति उनकी वाणी में हो जाती है अतः गायकों, उपदेशकों और जनसमूह के नियंत्रकों के लिए सर्वोत्तम सिद्ध हो चूका है। यह एक परीक्षित साधना है। इसके साधक जो कुछ भी अपने ज्ञान के अनुसार कहता है उसे जनसमूह पर अच्छा और अनुकूल साबित हुआ है। मूल-मंत्र है - " हूम ॐ क्लीम हूम ह्रीम ऐंग क्लीम ( एक गुप्त मंत्र बीज ) हूम ॐ स्वहा " दीक्षा लेके साधना शुरू करने के लिए संकल्पित साधक/साधिकाओं को पूर्ण मन्त्र बता दिया जाएगा। सर्वे-प्रथम गणेश जी को सिद्धि दिलाने के लिए नमन करें। फिर, उसके बाद अपने गुरु मंत्र ( ॐ तैलंग स्वामी तुभ्यं नमः ) बोलते हुए प्रणाम करें। उसके बाद माता सरस्वती को प्रणाम करें। इतना कर लेने के बाद आप जप  के लिए तैयार हैं। साधना की शुरुआत बुधवार से करें जो सिद्ध मुहूर्त में पड़ा हो। आठ माला जप नित्य 51 दिनों तक करना है। हवनादि कर्म की आवश्यकता नहीं। जो साधक यदि हवन कर्म भी करना चाहे तो वो सफ़ेद या लाल फूलों से कर सकता है और अश्वगंध मिले जल से तर्पण-मार्जन कर सकता है।  तब हवनकुंड आठ कोनों वाला हो और हवन की लकड़ी आम की हो।   इस साधना में ब्रह्मचर्य की कोई खास जरुरत नहीं है परन्तु, इसका अर्थ यह नहीं हुआ कि आप रोज सेक्स ही करें। यहाँ इस साधना में सेक्स तभी करें जब मन सेक्स के लिए विचलित हो। इस साधना में सफ़ेद या नीले रंग की संस्कारित हकीक या मोती की माला या श्वेतार्क की माला से जप किया जाता है। इन मालाओं के अभाव में संस्कारित स्फटिक की माला का उपयोग किया जा सकता है। साधना की दिशा पूरब रहेगी। आसन और वस्त्रों का रंग लाल या सफ़ेद या सफ़ेद लिए क्रीम कलर का हो। यह साधना कोई भी एक निश्चित समय पर की जाए तो समय का बदलाव बार-बार न हो। साधना करने का जो समय निश्चित किया गया हो उसमे डेढ़ घंटा का आगे या पीछे होने से कोई समस्या नहीं है किन्तु, समय की सुनिश्चितता का ध्यान रखें। इस साधना को बिना दीक्षा लिए न करें। बिना दीक्षा लिए यह साधना करने पर गरुओं का अपमान होता है और उनकी कृपा से वंचित हो जाने पर अच्छी सिद्धि न मिलने की संभावना बनी रहती है। साधना करने से पूर्व अपने ग्रहयोगों के अनुसार ग्रह-तंत्र अवश्य धारण करें। साधनाकाल के दौरान स्थान परिवर्तन न करें। यदि करना ही पड़ जाए तो परिवर्तन करने से पहले उच्छिष्ट गणपति तंत्र धारण कर लें। उसके बाद साधना-स्थान परिवर्तन हो सकता है।  इसके साधक अपनी वाणियों द्वारा ही सभी प्रकार के जन समूह को सम्मोहित कर लेता है - परीक्षित है।  जय माँ

  • माँ पराअम्बा की प्रेरणा और मेरी सेवा लेख प्रस्तुत है नए जिज्ञासुओं के मेसेज आते हैं गुरुजी हम बिल्कुल नए है हम कैसे आध्यात्मिक यात्रा शुरू करें हमे तंत्र मार्ग पर आगे बढ़ायें तो अब यह लेख पढ़ें बड़ी बड़ी परम्परा बड़ी बड़ी पूजाओं बड़े बड़े गुरु सभी को हाथ जोड़ें और सर्वप्रथम स्वयं का अवलोकन करें,चिंतन करें।किसी भी व्यक्ति के अंदर साधना संस्कार हैं तो वह संस्कार किसी ना किसी कारण से उदय अवश्य होगा। अब जब यह संस्कार का उदय हो तो मन विचलित होता है लेकिन इस विचलन को बनाये रखते हुए संतुलन आवश्यक है क्योंकि इसी समय व्यक्ति जल्दबाजी में तंत्र के ऊलजलूल मार्ग में फँस जाता है और फिर एक लंबा समय व्यतीत करके वापस से शुरू से शुरू करता है खैर यह सब प्रारब्ध का ही एक हिस्सा है। क्या करें सबसे प्रथम जब मन विचलित हो तंत्र मार्ग में प्रवेश करने हेतु और आप बिल्कुल नए हैं आपको कुछ नहीं समझ आ रहा। प्रथम मार्ग है प्रार्थना जिस भी मंदिर ,पीठ ,देवी देवता में आपका आकर्षण हो आपका भाव हो उनकी तरफ़ बढ़ें उनके पीठ इत्यादि पर जायें एवं उनसे प्रार्थना करें की आपके गुरु एवं आपके इष्ट की तरफ़ जाने वाले मार्ग पर आपको आगे बढ़ाये।यह प्रार्थना आपके खोज से ज़्यादा प्रभावी होता है क्योंकि खोज भी सही दिशा में हो यह आपकी प्रार्थना की शक्ति से आती है। प्रथम कार्य तो बता दिया आप सभी को जो की प्रार्थना है अब द्वितीय कार्य पर आते हैं जो है छोटे छोटे संकल्प जैसे मन लीजिए आप ने संकल्प लिया की मैं ३ माह तक नित्य १५। मिनट सिर्फ एक आसन पर बैठूँगा रीड की हड्डी सीधी करके अब ये एक संकल्प बन गया आपके लिए अब इस संकल्प के लिए अपने आपको झोंक दें।जैसे ही आप एक संकल्प पूर्ण करते हैं आपके अंदर एक अद्भुत शक्ति का उदय होता है और आप साधना तंत्र के मार्ग में पहली सीढ़ी चाहेंगे है ऐसे ही कभी संकल्प लिया किसी पाठ स्तोत्र इत्यादि का और उसे पूरा किया यहाँ से असल में आपका अभ्यास शुरू होता है अभी मैंने शृंखला शुरू कर दी है अपने लेखों की जिसमे मैं अपने अनुभव ,साधना की यात्रा एवं वर्षों का निचोड़ आपको सरल भाषा में यहाँ देता रहूँगा यह आप सभी को निश्चित रूप से अंदर से तैयार कर देगा और जो अनुभवी साधक होंगे उनकी भावनाए भी इन लेखों में उन्हें प्रत्यक्ष दिखेगी। यह सभी लेख पूर्णतः मेरे द्वारा लिखे गए हैं ना ही किसी के शब्द है ना ही किसी की कॉपी यह अनुभव है जिसे शब्दों में उतारने की चेष्टा माँ तारा की प्रेरणा से कर रहा हूँ।मैं ज़्यादा समय नहीं दे पाता की वीडियो इत्यादि बना पाऊ अतः यह एक मार्ग निकाला है की कम से कम मेरे लेख ही प्रकाश का कार्य करें जहाँ तक पहुँचें वहाँ ज्ञान का प्रकाश फैलाए। जय माँ

  • मेरे बहुत शिष्य एवं साधक मित्र पूछते रहते है ध्यान गहरा कैसे हो महीने हो गए वर्ष हो गए लेकिन वो संतुष्टि नहीं है जो ध्यान को गहराई में मिलनी चाइए आइए चर्चा करते हैं धारणा इष्ट पर गहरी करें ध्यान गहरा होता जाएगा।एक समय आयेगा इष्ट प्रत्यक्ष भी होंगे और फिर स्वयं के स्वरूप लोक करके आपको ध्यान की पराकाष्ठा पर भी पहुँचा देंगे।इष्ट पर धरना गहरा हो इसके लिए आपका इष्ट से प्रेम ,जुड़ाव ,भक्ति का गहरा होना आवश्यक है यह जुड़ाव आपके पूर्व के संस्कारों से आपका अंदर बीज रूप में उपस्थित रहता है और यदि आप साधना के लिए ब्रह्मांड द्वारा चुने गए हैं तो जीवन अचानक कोई ऐसी घटना क्रम होगा जिससे स्वतः ही आप अपने इष्ट की तरफ़ भागेंगे हालाँकि तुरंत ही अपने इष्ट अथवा गुरु का मिलना भी नहीं हो पाता व्यक्ति आकर्षण में सहायक देवी देवताओं के इर्द गिर्द घूमते घूमते अपने इष्ट तक पहुँचता है।इस यात्रा के दौरान कई अच्छे बुरे अनुभव कई अन्य प्रकार के संघर्ष ,मन के विभिन्न उलझनों का सामना करता जाता है और यदि साधक धैर्य,समर्पण और संकल्प का धनी है तो वो समय आता है जब वह आयाम खुलता है जो सामान्य व्यक्ति के समझ ,तर्क से परे है।आपके इष्ट का आपके जीवन में प्रवेश होता है यही वो समय है जिसे कहा गया है की साधक का दूसरा जन्म और यहाँ से होती है आपकी धारणा पुष्ट और भी ध्यान स्वतः ही पुष्ट होने लगता है। खैर आप अपना अभ्यास जारी रखें और अपने मंत्र ,गुरु और इष्ट पर विश्वास रखें सब स्वतः होगा। आ गए हैं साधना मार्ग पर फिर जाएँगे कहा । सारे लेख मेरी अनुभूति अंतरात्मा की आवाज से जुड़ी हुई है और हम सब ब्रह्मांडीय नियम के अंतर्गत एक दूसरे से जुड़े है तो हो ही नहीं सकता की ये लेख आप सब के हृदय तक ना पहुंचे अतः अपनी यात्रा पर काम करते जाए। जय माँ शाक्त उपासना मार्ग

  • महागुरुओं की कृपा और शक्ति अक्सर हमारे शिष्य जन एवं उनसे जुड़े हुए लोग जो कुछ ना कुछ परेशानी में होते हैं वो हमसे मिलने आते हैं हालांकि मेरा मिलना किसी से ज़्यादा नहीं हो पता क्योंकि समय साधना में ज़्यादा लगने के वजह से मेरी व्यस्तता नित्य बनी रहती है फिर भी ३-४ महीने से लगातार कोई पीछे पड़ा हो तो भगवती की प्रेरणा से मुँह से निकल जाता है की ठीक है आ जाइए मिलने के लिए लेकिन मैं ज़्यादा समय नहीं दे पाऊँगा अतः किसी ना किसी तरह से लोगो का आना जाना लगा रहता है जिसमे दीक्षा एवं साधनात्मक मार्ग पर अग्रसर होने वाले कम और परेशानियों से घिरे व्यक्ति ज़्यादा होते है और उचित भी है व्यक्ति कहीं तो जायेगा ही परेशानी से बाहर निकलने हेतु और मेरा काम भी है भगवती की प्रेरणा से जो कुछ कर सकू उनके लिए करना इसी क्रम में जिस सोसाइटी में मैं रहता हूँ वहाँ किसी को पता चल गया की एक साधक यहाँ रहते है तो वो अपने बच्चे को ले कर पहुँच गयीं । उनके बच्चे की गर्दन हर १५-२० सेकेंड के बाद स्वतः से नृत्य करने जैसा हिला करती थी मतलब गर्दन हर २० सेकेंड के बाद अपने आप हिलती रहती है बहुत जगह इलाज करा लिए लेकिन पता नहीं चल रहा था की क्या हुआ है मेरे पास आए तो मैंने देखा अब समझने की बात ये है की हजारो लाखो तरह की परेशानियां होती है और हर परेशानी का कोई निश्चित इलाज किसी साधक को नहीं पता होता सिर्फ इष्ट की प्रेरणा से ही कुछ किया जा सकता है।मेरा विश्वास ऐसी किसी भी स्थिति में अपने मन में आ रहे तरंगों विचारो पर होता है एयर वही मेरी इष्ट की प्रेरणा होती है।अब इस तरह की समस्या में मेरे मन जो विचार आया वो मैं बताता हूँ माँ तारा के फोटो के पास हमने एक कमल का फूल चढ़ाया हुआ था जो की लंबी डंडी के साथ था वह कमल का फूल उठाया और बहुत लंबे समय से महागुरु तैलंग स्वामी का एक मंत्र मैं जो जपता रहता था वो जपते हुए और उनका स्मरण करते हुए उसके गर्दन पर तीन बार वह कमल के फूल से मारा और बोला कि जाओ कल बताना क्या है कुछ आराम है कि नहीं वो दिन है और आज का दिन है कई महीने हो गए वह परेशानी उसकी जड़ से खत्म हो गई पता ही नहीं चला की क्या हुआ तो अब मैं बताता हूँ महागुरु तैलंग स्वामी का वो मंत्र और विधान गुरु पूर्णिमा विशेष - हूम हूम हूम अघोर सिद्धि देहि -देहि तैलंग स्वामी की आन फुरो आगम मेरी भक्ति स्वामी की शक्ति फुरो मंत्र महागुरु शिव  वाचा। माला रुद्राक्ष , दिशा पूरब और दक्षिण की कोण की ओर होकर।  सरसों के तेल की दीपक जलाकर , पांच माला जप 7 दिन करना है। हवन की जरुरत नहीं। आसन - काला हो। यह कार्य हर महीने करना है 15 माह तक।   जय माँ शाक्त उपासना मार्ग

  • शक्ति प्रत्यक्षीकरण यदि मान लिया गया की कृपा संभव है लेकिन देव एवं अन्य योनि की शक्तियां किसी का भी प्रत्यक्षीकरण नहीं हो सकता तो क्षमा करें आप कृपा पात्र के योग्य हो सकते हैं लेकिन शक्ति का प्रत्यक्ष सानिध्य कभी प्राप्त नहीं कर सकते। साधक जान सधाये करते हैं ख़ुद पर बिना काम किए हुए बिना ख़ुद को तैयार किए हुए सीधा मंत्र जाप और मन में ढेर सारे शंका की कुछ काम बन जाए और यदि किसी से सुन लिया की शक्ति प्रत्यक्ष होती है तो बिना विश्वास बिना समर्पण बिना पागलपन सिर्फ़ ऐसा सोच लेना की ५१,१०० दिन में आड़े तिरछे जैसे तैसे जाप कर लेने से शक्ति प्रत्यक्ष हो जाएगी तो ये बहुत बड़ी भूल है और ऐसे ही लोग फिर आगे चल कर बोलते है बहुत साधनाएँ की लेकिन प्रत्यक्षीकरण जैसा कुछ नहीं होता।अरे भाई आपने सधनाये नहीं की आपने सिर्फ़ मजाक किया क्योंकि आप कभी तैयार थे ही नहीं ना आपने कभी आत्मसात किया था प्रत्यक्षीकरण के विज्ञान को सिर्फ़ आज़माया अपने मनोरथ को पूर्ण करने के साथ साथ सोचा की अगर प्रत्यक्ष भी हो जाए तो और आनंद उस चक्कर में कुछ ना हुवा। प्रत्यक्षीकरण के प्रमुख मूल बिंदु है इष्ट अथवा जिनकी साधना कर रहे हैं उनके प्रति पूर्ण समर्पण भाव ,कोई तर्क दिमाग में ना रहे की यदि भाव है सेवा है तो देवता प्रत्यक्ष भी होंगे ऐसा दृढ़ संकल्प होना चाहिए। एक ही शक्ति के पीछे पूर्ण समर्पण से लगे रहें।आज कल तो साधक जन पूछते है ३३ दिन साधना हवन कर लिया गुरु जी कितने दिन में प्रत्यक्षीकरण हो जाएगा यह मूर्खतापूर्ण प्रश्न है।रामकृष्ण परमहंस ,गुरुदेव बामा खेपा ने अपने आराध्य को कभी प्रतिमा समझा ही नहीं जीवित चैतन्य सत्य समझा और एक लंबे धैर्य,भावात्मक आवेश एवं कठिन तप से अपने आराध्य का प्रत्यक्षीकरण प्राप्त किया | यह मात्र एक प्रत्यक्षीकरण नहीं था यह सभी तर्क से परे एक साधक की प्रगाढ़ भावना ,प्रेम,समर्पण ,तप और एक लंबा इंतज़ार था जिसने साबित किया कि पराम्बा भी प्रत्यक्ष सामने आकर खड़ी होती हैं। आज कल तो कुछ दिन शक्ति की साधना की साथ ही साथ अलग अलग तरह के पाठ फिर उसके साथ ही अलग अलग स्वरूपों पर अपनी इक्षा अनुसार अलग अलग आकर्षण और एकनिष्ठ प्रेम तो विरले ही करते है किसी एक स्वरूप में रम कर और ऐसे विरले ही प्राप्त करते प्रत्यक्षीकरण। जय माँ शाक्त उपासना मार्ग

  • आपको बता दु एक सन्यासी दुर्लभ योगी द्वारा यह क्रिया का अभ्यास किया जाता था जिनका नाम मैं यहां नही लूंगा और वे अपने योग बल के लिए काफी प्रसिद्ध थे। मैंने २०२० में यूट्यूब पर सार्वजनिक रूप से योग सिद्धि का प्रमाण दिया था जिसमे एक साथ ही विभिन्न जगहों पर बैठे कई लोगो को ध्यान में बैठा का उन सभी के साथ एक ही समय पर मैंने लिंक स्थापित किया था वह इसी के अभ्यास से मानसिक शक्ति के विकास से संभव हुआ खैर यह सब बातो का कोई अर्थ नहीं बस आप सभी को इसका महत्व बताने हेतु और आप सब इसे जीवन में उतार कर इसका लाभ ले सकें इसके हेतु यह सब बताया।अतः इसका आप सब लाभ लें और जीवन में बदलाव लाए । जय माँ

  • असीम शक्ति से बदले जीवन - अक्सर मेरे पास ऐसे कॉल या मेसेज आते हैं जिनसे बात करके मैं उनका ऊर्जा को पढ़ता हूँ और यह ज्ञात हो जाता है की उनकी स्थिति कैसी है आत्मविश्वास शून्य,एकाग्रता की कमी,लगातार नकारात्मक विचारो से घिरे रहना, प्रमाद में रहना ना काम करने की इक्षा ना कुछ करने की लेकिन ऐसे में जब अति हो जाता है तो वे ढूँढते है की इससे बाहर कैसे निकले ऐसे में मैं बात करते समय ही भाँप जाता हूँ की इनके साथ क्या स्थिति बनी हुई है।इन सब के साथ ही साथ जो रोजगार हेतु प्रयासरत हैं किसी महत्वपूर्ण कंपीटिशन की तैयारी कर रहे हैं उन्हें भी जिस स्तर की ऊर्जा अपने अंदर चाहिए वह बहुत कम लोगो के अंदर दिखायी देती है।अतः ऐसे में मैंने अधिकतर लोगो को एक प्रयोग दिया और इसके अद्भुत परिणाम सामने आए।इसमें एक उदाहरण एक विद्यार्थी की भी है जो आईएएस की तैयारी में प्री और मेन्स निकालने के बाद इंटरव्यू में छाँट दिए जा रहे थे जब लास्ट एटेम्पट बचा तो कहीं से ढूँढते ढाँढते हुए उन्हें मेरा नम्बर प्राप्त हुआ और यही प्रयोग उन्हें भी बताया गया जिसके बाद उन्होंने आईएएस क्रैक किया और अच्छे पद पर अभी बने हुए हैं।कुछ राजनैतिक लोग भी इस प्रयोग से स्वयं को अच्छे पद पर आसीन कर सके। आइए नीचे जानते है इस आसान और सभी के लिए उपयुक्त इस प्रयोग के विषय में सर्वप्रथम एक आसन पर रोज़ रीड की हड्डी सीधी करके कम से कम १५ मिनट तक स्थिरता से बैठने का अभ्यास करें जब आपकी शारीरिक स्थिरता बनने लगे और मन विचारशून्य होना शुरू हो उस समय आप सभी को प्रातः सूर्योदय के समय कुछ समय सूर्य के समक्ष एक प्रक्रिया से गुजरना है। आईय जानते है - स्थिरता से सूर्योदय के समय ऐसे स्थान पर बैठें जहाँ सूर्य उगते हुए दिखें कुछ देर तक सूर्य को इस स्थिति में देखें उगते हुए एवं धीरे धीरे स्वांस ले और बाहर निकाले अनुभव करें कि आपके अंदर आपके नाक से दिव्य प्राण ऊर्जा आपके अंदर धीरे धीरे प्रवाहित हो रही है जो पूरे शरीर मे फैल रही है और धीरे धीरे स्वास बाहर निकालते समय महसूस करें कि अंदर के सभी नकारात्मक,सभी दुख/ईर्ष्या/द्वेष/अहंकार रूपी दूषित ऊर्जाएं बाहर निकल रही है।अपने आपको आनन्दित और हल्का महसूस करें जैसे कोई भार अंदर से निकल रहा हो। यह सब प्रक्रिया करते समय स्थिर और रीढ़ की हड्डी सीधी करके बैठें। स्वांस लेना और बाहर छोड़ना इसे एक क्रिया मानी जायेगी ऐसा कम से कम 21 बार करें। अब आंखें बंद कर लें आपने दाहिने तरफ के नाक को दबाएं एवं बाएं तरफ के नाक से धीरे धीरे स्वांस लें इस स्वांस के साथ प्रातः की सूर्य की किरणों का प्रवेश बाए तरफ के नाक से अंदर जाते हुए सजग रूप से महसूस करें।स्वास लेते समय 6 सेकेंड में पूरी तरह स्वांस भर लें और दोनो नाकों को बंद करके स्वांस को 24 सेकेंड के लिए रोक दें इस स्थिति में अनुभव करें कि आपके अंदर यह ऊर्जा का भंडार आपके सभी नाड़ी,सभी शरीर के अवयवों को ऊर्जा से भर रहा है आपके मस्तिष्क को ज्यादा सजग और तीव्र कर रहा है फिर 24 सेकेंड स्वांस रोकने के बाद दाहिने नाक से 12 सेकेंड में धीरे धीरे पूरी स्वांस बाहर निकाल दें इस निकलती हुई स्वास के साथ सम्पूर्ण नकारात्मक भाव वाली सभी ऊर्जाएं जिससे आपका आत्मविश्वास कमजोर होता है उसे बाहर निकलता हुआ महसूस करें।अब दाहिने नाक से स्वांस लें ,स्वास रोके,और स्वास को बाहर निकाले ठीक जैसे आपने ऊपर किया है उसी प्रकार। बाए से स्वांस लेना ,रोकना,दाहिने नाक से बाहर निकलना पुनः दाहिने से स्वांस लेना,रोकना, और बाएं से बाहर निकालना यह एक क्रिया हुई ऐसी आपको 15 क्रियाएं करनी है। इसके बाद शांत,आनन्दित,ऊर्जा से भरे हुए स्वयं को शांत मन से स्थिरता के साथ ध्यान में बैठे रहने दें और कम से कम 21 बार नीचे दिए गए सूर्य गायत्री मन का मन ही मन जप करें। ॐ आदित्याय विदमहे दिवाकराय धीमहि तन्नो सूर्यः प्रचोदयत।। जिन्हें किसी भी प्रकार की स्वांस की परेशानी हो अथवा हृदय के मरीज हो वे स्वांस रोकने की प्रक्रिया न करें।केवल स्वांस एक तरफ से लें और दूसरी तरफ से बाहर निकाले ऊपर बताये गयी प्रक्रिया अनुसार। यह अद्भुत शक्ति का आपके अंदर संचार करता है ।इससे निम्न परिवर्तन आपके अंदर आते है - ★ आपके अंदर चेतना का विस्तार होता है। ★ पहले से ज्यादा सजग होते जाते हैं। ★ यादाश्त तेज होती जाती है और मंद बुद्धि स्वस्थ्य होने शुरू ही जाती है। ★ दिमाग ज्यादा विश्लेषण करने योग्य हो जाता है और जल्दी थकता नही। ★ आध्यात्मिक स्तर पर जो सजगता आपको चाहिये वो प्राप्त होती है। ★ भय का नाश और आत्मविश्वास की वृद्धि। ★ किसी भी प्रकार की डिप्रेशन, अनिद्रा,एंजायटी और अन्य बहुत से परेशानियों में आराम मिलता है। ★ इंट्यूशन शक्ति बढ़ती जाती है जिससे किसी भी परिस्तिथि, व्यक्ति एवं घटनाओं के प्रति ज्यादा सजग होने शुरू हो जाते है। अन्य अनेको अनुभव है जो व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता है।

  • माता निकुंबला की मायावी चमत्कारी साधना माता निकुंबला की उत्पति तामसिक माता से हुई है। तामसिक मायावी शक्तियों से भरपूर। कोई भी माया फैला सकती है। जब इसकी साधना सफल हो जाती है तब इसका प्रयोग छोटे छोटे स्तर पर शुरू करने चाहिए। इससे एक अंतर्ज्ञान होगा और धीरे-धीरे बड़े स्तर पर कार्य करने का अंतर्ज्ञान होगा। मूर्खों के लिए यह साधना नहीं है। जिसकी सोच शक्ति अच्छी है वे इस साधना को सफल कर लेंगे और कोई अवसर पड़ने पर मायावी शक्ति फैलाकर मनोरूप कार्य कर सकेंगे। यह उच्च स्तर की तामसिक साधना है अतः सावधानी पूर्वक किया जाए। साधना विधि - कमलगट्टे की तामसिक माला। सुरक्षा के लिए तामसिक स्वरूपा काली के सिद्ध तंत्र। समर्थ हो तो माता निकुंबला गुप्त यन्त्र आसन और वस्त्र -लाल या सबकुछ काला। साधना का समय रात दस बजे के बाद। शनिवार, मंगल या रविवार से साधना शुरू करना चाहिए जो शुभ मुहूर्त में पड़ा हो। साधना की दिशा- दक्षिण। -यदि दिन शनिवार पड़ा हो तो पश्चिम की दिशा कभी चुनाव कर सकते हैं। साधना स्थल पर अरंडी तेल की दीपक का प्रयोग करें। साधना करने से पहले अपने गुरु को प्रणाम करें , बाद में ,उच्छिष्ट गणपति को प्रणाम करें। उसके बाद माता निकुंबला का ध्यान करें -"हे सर्वजगत को क्षण भर में मोह लेने वाली, हे महा तामसिक दैविक शक्ति, जिसके प्रभाव से ब्रह्माण्ड के कण -कण पर अधिकार हो जाता है और सारे ब्रह्मांडीय नियम भी साधक के अनुकूल हो जाते हैं जिससे सभी शक्तिया क्षणभर में साधक के वश में होकर सभी षट्कर्मों की सिद्धि दिलाने में समर्थ हो जाते हैं , युद्ध में , हर विपत्तियों में विजयी दिलाने वाली हैं , ऐसे महा तामसिक देवी माता निकुंबला को मैं प्रणाम करता हूँ। मूल मंत्र है -ऐंग नभ्य नभ्यान्तर महा भयंकरी महा मायावी निकुंबला सः स्वाहा / aing nabhya nabhyantar maha bhayankari maha mayawi nikumbla sah swaha. इस मंत्र की नौ माला जप करें। 51 दिन करें। जप की पूर्णता के बाद इसका दशांश हवनादि कर्म करें। दशांश हवन के नियम पूर्णतः तामसिक हैं। अतः तामसिक भोजन करने वाली स्त्रियों को तामसिक भोजन कराएं। स्त्रियों की संख्या 51 होनी चाहिए। स्त्री कुंआरी हो या विवाहित -दोनों को भोजन करा सकते हैं। दोनों ही ना कर पाने की स्थिति में हमारी सहायता ले सकते हैं। प्रयोग विधि की अब चर्चा की जाती है जिसे दीक्षा के बाद बताई जाएगी। यह लेख सिर्फ़ जानकारी हेतु बतायी गई है गलती से भी सिर्फ पोस्ट देख कर साधना करने ना बैठ जाए दीक्षा एवं आवश्यक सामग्री की उपलब्धता के बाद ही साधना करें। अत्यंत उग्र और शक्तिशाली साधना है अतः शक्ति उपासक साधकों को यह साधना अवश्य करनी चाहिए

  • यह स्वर्ण चंपा का फूल है यदि यहाँ जुड़े हुए किसी सदस्य के आस पास या नजर में यह पुष्प उपलब्ध हो तो अवश्य सूचित करें। हमे माँ को हवन में अर्पण करने हेतु आवश्यकता है। जय माँ

  • 17 мая1 013

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  • 15 мая1 192

    कर्ण मातंगी साधना - यह एक ऐसी साधना है जो आपके भविष्य में होने वाली घटनाओं को स्वप्न के माध्यम से दिखा सकती है एवं ७० प्रतिशत के ऊपर सिद्धि प्राप्ति पर कान में भी बताती हैं । इस प्रकार साधक होने वाली अशुभ घटनाओं को पूर्व ही जान लेने पर सचेत हो जाता है और उन घटनाओं को टाल भी सकता है। मूल मंत्र है - ऐं नम: श्री मातंगि अमोघे सत्यवादिनि ममकर्णे अवतर अवतर सत्यं कथय एह्येहि श्री मातंग्यै नम:। AING NAMAH MATANGI AMOGHE SATYAWADINI MM KARN AWATAR AWATAR SATYAM KATHAY EHYEHI SHREE MATANGYAI NAMAH यह माँ मातंगी के स्वरूप की ही श्रेष्ठ साधना है। लेकिन इसकी साधना विधि राजसिक साधनाओं जैसी है। इसका डेढ़ लाख जप पूरा करें। यह माता का ही एक स्वरुप है न कि कर्णपिशाचिनी का। .१.५ लाख जाप पर ही कई लोगो को दिव्य सिद्धि प्राप्त होती है लेकिन मेरा अनुभव है की ३ लाख २०००० जाप लेना चाहिए।यदि सब कुछ ठीक रहा एवं साधना की सभी आवश्यकता आपने पूरी की तो यह सिद्धि मिलनी ही मिलनी है । इस साधना से जीवन के किसी भी घटनाओं को जान सकेंगे इसके अलावा दैविक कृपा की सहायता से कई समस्याओं का उन्मूलन कर सकेंगे। आपके हर प्रश्न के उत्तर प्राप्त कर सकते हैं जो स्वप्न के माध्यम से प्राप्त होता है एवं विशेष सिद्धि मिलने पर कान में आवाज के माध्यम से। हा ,की ध्वनि कान में आना और आपके प्रश्नों के उत्तर देना यह इसकी मूल सिद्धि है । एक साधक को पुरश्चरण करने के बाद सबसे प्रथम बार कान में ध्वनि जो आई वो थी ” दो “ तो उन साधक को सात्विक बलि देने का निर्देश दिया गया था हालांकि यह बहुत ना के बराबर ही होता है।खैर ये सब बहुत दूर की बाते है साधक का कार्य है अपना तप और धैर्य रख कर मेहनत करना सिद्धि देना ना देना माँ के हाथ में है अपना कार्य सिर्फ सही मार्गदर्शन में प्रयास करना मात्र है। हर साधना की कुछ कुंजी होती है जो कुंजी आपको साधना में सफलता के बिलकुल करीब ले जाती है यह कुंजिया गुरु से प्राप्त होती है अतः सिर्फ लेख पढ़ कर ऐसी साधनाएँ करने से उचित फल नहीं मिलता इसमें दीक्षा अति आवश्यक अंग है। आवश्यक सामग्री - संस्कारित कमलगट्टे की तामसिक माला , भैरव या बगलामुखी तंत्र। आसन और वस्त्र- लाल साधना की दिशा - पूर्व साधना का समय रात 10 बजे के बाद से हो। अरंडी के तेल की दीपक , साधना करने के समय अवश्य जला लें। यह साधना किश्तों में भी की जा सकती है। कम से कम 8000 जप का किश्त रखें। चाहे जितना भी दिन लगे , 8000 पूरा करने में। जप करने के दौरान मुख को जूठा रखें। इसलिए मुँह में पान , सुपारी , लौंग या इलायची अवश्य रखें रहें। आप चाहें तो मांस-मदिरा-मछली आदि से दशांश हवन भी कर सकते हैं। इससे विशेष शक्ति मिलेगी। अन्यथा कोई हवन करने की जरुरत नहीं है। सिद्धि के बाद कोई आवश्यक प्रश्न मन में रखकर एक माला मूलमंत्र का जप करें और सो जाएं। उत्तर स्वप्न में मिलने लगेगा। एवं कान में मार्गदर्शन मिलने हेतु साधना के दौरान ही विशेष प्रयोग करने होते है जिस दीक्षा के बाद ही बताया जाना उचित होता है जो मूल कुंजी है । जय माँ