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बोध कणिका ॥ Bodh Kanika

बोध कणिका ॥ Bodh Kanika

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    अंग्रेजों के समय में भारत के कई लोगों की स्थिति। आप खुद सोचिए जिन्होंने उस समय ये वक़्त देख होगा क्या उनको ये कलियुग का अंत ही नहीं लगा होगा? ज्यादा दूर तक जाने की ज़रूरत नहीं है। पिछली कुछ सदियों का ही दुनिया का इतिहास देख लो तो स्पष्ट हो जाएगा कि बीते हुए समय की तुलना में हम एक 10 गुना बेहतर जीवन जी रहे है आज। ये तो सिर्फ भुखमरी की वो तस्वीरें है जो पूर्व भारत में घटी थी, विश्व फ़लक पे देखे तो इससे भी भयानक कई घटनाएं पिछली कुछ ही सदियों में हो चुकी है जिनकी आज हम कल्पना भी नहीं कर सकते। जिन्होंने विश्वयुद्ध, मुग़ल आक्रमण, अंग्रेजी आक्रमण, मानव गुलामी, सुनामी, भूकंप, महामारी, तूफान, ज्वालामुखी फटना आदि जैसी ऐतिहासिक घटनाओं की तस्वीरें और उनमें मरने वाले लोगों के आंकड़े देखे है; जो लोग उन घटनाओं की गहराई में गए है वही समझ सकते है कि हम पिछली कई सदियों के मुकाबले आज कितने अच्छे समय में है। जिन्हें अभी सब से चरम कलियुग लग रहा है उन्हें मानव इतिहास का पूरा पता ही नहीं शायद! शायद हम जिस समय में है उसमें एक विनाशकाल आ सकता है लेकिन यह कलियुग का अंत हो ऐसी संभावना तो जिन्होंने भविष्य मालिका, इतिहास और शास्त्रों को गहराई से यथार्थ पढ़ा है उनको नहीं दिखेगी इसमें कोई दो राय नहीं है।

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  • आजकल सोशल मीडिया पर कुछ लोगों द्वारा श्रीमद्भागवत महापुराण के एक श्लोक का हवाला देकर यह भ्रम फैलाया जा रहा है कि 11 से 17 अगस्त 2026 के बीच 'सतयुग' (सत्ययुग) का आरंभ हो रहा है। वे अपनी बात को सिद्ध करने के लिए इस श्लोक का सहारा लेते हैं: यदा चन्द्रश्च सूर्यश्च तथा तिष्यबृहस्पती । एकराशौ समेष्यन्ति भविष्यति तदा कृतम् ॥ अर्थात् — जिस समय चन्द्रमा, सूर्य और बृहस्पति एक ही समय एक ही साथ पुष्य नक्षत्रके प्रथम पलमें प्रवेश करके एक राशिपर आते हैं, उसी समय सत्ययुगका प्रारम्भ होता है ॥२४॥ ~ श्रीमद्भागवत 12.2.24 (गीता प्रेस) परन्तु, क्या वे लोग आपको यह बताते हैं कि महर्षि वेदव्यास जी ने इसी अध्याय (12वें स्कंध के दूसरे अध्याय) में सतयुग आने से ठीक पहले के समाज, पर्यावरण और मनुष्यों की क्या दुर्दशा बताई है? आइए, भागवत के उसी अध्याय के कुछ श्लोक देखते हैं, जो सतयुग के आगमन से ठीक पहले के भयंकर कलियुग (कलि के अंतिम चरण) का वर्णन करते हैं: अणुप्रायास्वोषधीषु शमीप्रायेषु स्थास्नुषु । विद्युत्प्रायेषु मेघेषु शून्यप्रायेषु सद्मसु ।।१५ अर्थात् — धान, जौ, गेहूँ आदि धान्योंके पौधे छोटे-छोटे होने लगेंगे। वृक्षोंमें अधिकांश शमीके समान छोटे और कँटीले वृक्ष ही रह जायँगे। बादलोंमें बिजली तो बहुत चमकेगी, परन्तु वर्षा कम होगी। गृहस्थोंके घर अतिथि सत्कार या वेदध्वनिसे रहित होनेके कारण अथवा जनसंख्या घट जानेके कारण सूने सूने हो जायँगे ॥१५॥ क्षुत्तृड्भ्यां व्याधिभिश्चैव सन्तप्स्यन्ते च चिन्तया । त्रिंशद्विंशतिवर्षाणि परमायुः कलौ नृणाम् ।।११ अर्थात् — लोग भूख-प्यास तथा नाना प्रकारकी चिन्ताओंसे दुःखी रहेंगे। रोगोंसे तो उन्हें छुटकारा ही न मिलेगा। कलियुगमें मनुष्योंकी परमायु केवल बीस या तीस वर्षकी होगी ।।११।। ~ श्रीमद्भागवत 12.2 (गीता प्रेस) वर्तमान में न तो मनुष्य की औसत आयु 20-30 वर्ष हुई है और न ही वनस्पतियों का ऐसा विनाश हुआ है। जब भागवत महापुराण में बताई गई कलि-अंत की एक भी परिस्थिति अभी तक पूर्ण रूप से घटित नहीं हुई है, तो सतयुग के आगमन का समय इतनी जल्दी कैसे आ सकता है?

  • बैशाख शुक्ल अष्टमीर । गुरुबारटि से दिनर ॥ रात्रर अर्द्धठारे जाण । दलाइ घाइटि प्रमाण ॥ भांगिण हेब नारखार । अन्यस्था होइबेटि नर ॥ पुष्या नक्षत्र शुभ योग । घाइ जे निश्चय भांगिब ॥ अर्थात् — महाप्रभु महापुरुष यशोवंत दास जी से कहते हैं कि— वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि होगी और उस दिन गुरुवार (बृहस्पतिवार) पड़ेगा। यह भली-भांति जान लो कि उसी दिन आधी रात के समय 'दलई घाई' निश्चित रूप से टूटेगा। टूटकर नारखार हो जाएगा और मनुष्य अन्य स्थान पर विस्थापित हो जाएंगे। पुष्य नक्षत्र शुभ योग में, वह घाई (तटबंध) निश्चित रूप से टूटेगा। ~ यशोवंत मालिका, महापुरुष यशोवंत दास

  • 8 авг.561из darshanfiles

    भविष्य मालिका में कदाचित सब से ज्यादा वर्णित कलियुग से उद्धार का महामंत्र: बेद रे स्तुतिरे गोपन, हरे राम मन्त्र सार सकळ मन्त्र ए गर्भर,अण अक्षर एकाक्षर तारक श्य़ाम पञ्चाक्षर, हरे राम मिशिण पाञ्च ए पाञ्च मन्त्र मूळ सञ्च, अण अक्षर मूळ होइ एक अक्षर अङ्कुरइ, तारक अटइ ये डाळ श्य़ाम पञ्चाक्षर फुल, हरेराम ये फळ होइ - गुरुभक्ति गीता वेद और स्तुति में जिसे गुप्त कर दिया गया है वही 'हरे राम' मन्त्र सब का सार है! सब मन्त्र इसके गर्भ में स्थित है | इसके समझाते हुए महापुरुष कहते है की अणाक्षर मन्त्र मूल है, एकाक्षर मन्त्र इसका अंकुर है, तारक मन्त्र इसकी डाली है, श्याम पंचाक्षर मन्त्र इसका फुल है और 'हरे राम' मंत्र इसका फल है | यानी की चैतन्य महाप्रभु ने दिया हुआ 'हरे कृष्ण' महामंत्र जो असल में 'हरे राम' से शुरू होता था और बाद में उलट पुलट होके 'हरे कृष्ण' मन्त्र हो गया जिसका कलि संतरण उपनिषद जैसे ग्रंथो में भी उल्लेख है वही इस वृक्ष का फल है | तात्पर्य ये है की कलियुग में यही महामंत्र सब तत्वों का सार है और इसकी शरण में रहने से ही उद्धार होगा!

  • ग्यान कहै अग्यान बिनु तम बिनु कहै प्रकास| निरगुन कहै जो सुगन बिनु सो गुरु तुलसीदास|| प्रस्तुत दोहे में तुलसीदासजी कहते हैं कि जो अज्ञान का कथन किए बिना ज्ञान का प्रवचन करे, अंधकार का ज्ञान कराए बिना ही प्रकाश का स्वरूप बतला दे और सगुण को समझाए बिना ही निर्गुण का निरूपण कर दे, वह मेरा गुरु है कहने का तात्पर्य यह है कि अज्ञान के बिना ज्ञान, अंधकार के बिना प्रकाश और सगुण के बिना निर्गुण की सिद्धि नहीं हो सकती, निर्गुण कहते ही सगुण की सिद्धि हो जाती है| ~ दोहावली, गोस्वामी तुलसीदासजी

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  • नामु राम को कलपतरू कलि कल्यान निवासु| जो सुमिरत भयो भांग तें तुलसी तुलसीदास|| प्रस्तुत दोहे में तुलसीदासजी कहते हैं कि भगवान श्रीरामचंद्रजी का नाम इस कलियुग में कल्पवृक्ष अर्थात मनचाहा फल प्रदान करने वाला है और कल्याण का निवास अर्थात मुक्ति का घर है, जिसका स्मरण करने से तुलसीदास भांग से अर्थात विषय मद से भरी और दूसरों को भी विषयमद उपजाने वाली साधुओं द्वारा त्याज्य स्थिति से बदलकर तुलसी के समान निर्दोष, भगवान का प्यारा, सबका आदरणीय और जगत को पावन करने वाला हो गया| ~ दोहावली, तुलसीदास

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  • पर हित सरिस धर्म नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई॥ निर्नय सकल पुरान बेद कर। कहेउँ तात जानहिं कोबिद नर॥1॥ भावार्थ — हे भाई! दूसरों की भलाई के समान कोई धर्म नहीं है और दूसरों को दुःख पहुँचाने के समान कोई नीचता (पाप) नहीं है। हे तात! समस्त पुराणों और वेदों का यह निर्णय (निश्चित सिद्धांत) मैंने तुमसे कहा है, इस बात को पण्डित लोग जानते हैं॥1॥ ~ रामचरितमानस, उत्तरकाण्ड

  • नर पीड़ित रोग न भोग कहीं। अभिमान बिरोध अकारनहीं।। लघु जीवन संबतु पंच दसा । कलपांत न नास गुमानु असा ।। मनुष्य रोगोंसे पीड़ित हैं, भोग (सुख) कहीं नहीं है। बिना ही कारण अभिमान और विरोध करते हैं। दस-पाँच वर्षका थोड़ा-सा जीवन है, परन्तु घमंड ऐसा है मानो कल्पान्त (प्रलय) होनेपर भी उनका नाश नहीं होगा ॥ २ ॥ ~ रामचरितमानस, उत्तरकाण्ड इस कलियुग में भी बोहोत लोग हैं, जो खुद को भक्त समझते हैं, या देवी-देवता उनका घमंड ऐसा हैं कि जल्दी से जल्दी युद्ध और प्रलय हो जाए बाकी सब मारे जाए और वे बच जाए। बल्कि मालिका में यह लिखा हैं कि भक्त लोग अपनी दृष्टि से युद्ध का आगमन देखकर बहुत संतप्त (दुखी) होंगे। युद्ध आगमन देखिण दृष्टिरे बहुत सन्तापि हेबे | | (कल्पटीका)

  • जे अपकारी चार तिन्ह कर गौरव मान्य तेइ । मन क्रम बचन लबार तेइ बकता कलिकाल महुँ ॥ ९८ (ख) ॥ जिनके आचरण दूसरोंका अपकार (अहित) करनेवाले हैं, उन्हींका बड़ा गौरव होता है और वे ही सम्मानके योग्य होते हैं। जो मन, वचन और कर्मसे लबार (झूठ बकनेवाले) हैं, वे ही कलियुगमें वक्ता माने जाते हैं ॥ ९८ (ख) ॥ ~ रामचरितमानस, उत्तरकाण्ड

  • असुभ बेष भूषन धरें भच्छाभच्छ जे खाहिं। तेइ जोगी तेइ सिद्ध नर पूज्य ते कलिजुग माहिं ॥ ९८ (क) ॥ जो अमङ्गल वेष और अमङ्गल भूषण धारण करते हैं और भक्ष्य-अभक्ष्य (खाने योग्य और न खाने योग्य) सब कुछ खा लेते हैं, वे ही योगी हैं, वे ही सिद्ध हैं और वे ही मनुष्य कलियुगमें पूज्य हैं ॥ ९८ (क) ॥ ~ रामचरितमानस, उत्तरकाण्ड

  • निराचार जो श्रुति पथ त्यागी । कलिजुग सोइ ग्यानी सो बिरागी ॥ जाकें नख अरु जटा बिसाला । सोइ तापस प्रसिद्ध कलिकाला ॥ जो आचारहीन है और वेदमार्गको छोड़े हुए है, कलियुगमें वही ज्ञानी और वही वैराग्यवान् है। जिसके बड़े-बड़े नख और लंबी-लंबी जटाएँ हैं, वही कलियुगमें प्रसिद्ध तपस्वी है ॥ ४॥ ~ रामचरितमानस, उत्तरकाण्ड

  • मारग सोइ जा कहुँ जोइ भावा। पंडित सोइ जो गाल बजावा॥ मिथ्यारंभ दंभ रत जोई। ता कहुँ संत कहइ सब कोई॥ भावार्थ:- कलियुग मे जिसको जो अच्छा लग जाए, वही मार्ग है। जो डींग मारता है, वही पंडित है। जो मिथ्या आडंबर रचता है और जो दंभ में रत है, उसी को सब कोई संत कहते हैं । * सोइ सयान जो परधन हारी। जो कर दंभ सो बड़ आचारी॥ जो कह झूँठ मसखरी जाना। कलिजुग सोइ गुनवंत बखाना॥ भावार्थ:- कलियुग मे जो (जिस किसी प्रकार से) दूसरे का धन हरण कर ले, वही बुद्धिमान है। जो दंभ करता है, वही बड़ा आचारी है। जो झूठ बोलता है और हँसी-दिल्लगी करना जानता है, कलियुग में वही गुणवान कहा जाता है। ~ रामचरितमानस, उत्तरकाण्ड

  • ଚହଲ ହେବ ରାଜା ହେବ ହତ । କେଶରୀ ରାଜା ହୋଇବ ଗୁପତ । ୧୪୫ । କେଶରୀ ରାଜା ଯିବଟିରେ ସଖୀ । ଖଣ୍ଡଗିରିରେ ଗୁପତରେ ରହିଂ । ୧୪୬ । ଆକାଶୁ ଶୁଭିବ ଘୋର ଶବଦ । ଜନମ ହେବ ସେ ସଂସାର ମଧ୍ଯ । ୧୪୭ । ହାତୀର କନ୍ଧରେ ଥିବ କଳସ । ଘେନି ବୁଲିବ ସଖୀ ଦେଶ ଦେଶ । ୧୪୮ । ଇଚ୍ଛା ସୁଖରେ ସେ ହାତୀ ସେ ଯିବ । ଯାହାର ଶିରେ କଳସ ଢାଳିବ । ୧୪୯ । ଆମ୍ଭେ ଗୁପତେ ସଖୀ ଥିବୁ ରହିଂ । କାୟା ପ୍ରକାଶ ଯେ ହୋଇବ ଯାଇଂ । ୧୫୦ । ଦିବ୍ୟ ବାଳକ ରୂପ ଥିବୁ ହୋଇଂ । ଶଙ୍ଖ ଚକ୍ର ଗଦା ପଦ୍ମ ଶୋହଇଂ । ୧୫୧ । ଥିବ ସଙ୍ଗତେ ବାଳକ ସୋଦର । ଖେଳୁ ଯେ ଥିବୁ ବଳଗଣ୍ଡି ଠାର । ୧୫୨ । କୁମ୍ଭ ସପ୍ତମୀ ଦିନ ଗୋ ଜାଣି । ଆଦିତ୍ୟ ରୋହିଣୀରେ ଥିବେ ଲଗ୍ନ । ୧୫୩ । ଖେଡ଼ ରହସ୍ୟେ ଥିବୁ ଆମ୍ଭେ ମାତ । ଏମନ୍ତ ବେଳେ ମିଳିବ ସେ ହାତୀ । ୧୫୪ । ସକଳ ଦେବ ଆଣି ମୋର ମାଥ । ବେଗେ ଢାଳିବେ ଗଜମତେ ମତ । ୧୫୫ । ସ୍ଵର୍ଗରୁ ସଖୀ ଗୋ ଶୁଭିବ ଧୁନି । ଅତି ଶୋଭା ପାଇବ ମେଦିନୀ । ୧୫୬ । ଗନ୍ଧର୍ବେ ଭଗତେ କରିବେ ନୃତ୍ୟ । ସୁସ୍ଵରେ ଗାଇବେ ମଙ୍ଗଳ ଗୀତ । ୧୫୭ । ନାରଦ ବଜାଇବେ ବୀଣାଯନ୍ତ୍ର । ଦେବେ କରିବେ ସେ ତାଣ୍ଡବ ନୃତ୍ୟ । ୧୫୮ । କୁସୁମ ବରଷିବେ ମୋହ ଶିରେ । ଦେବ ଗନ୍ଧର୍ବେ ବୋଲି ହରେ ହରେ । ୧୫୯ । ସଙ୍ଗତେ ଥିବେ ମୋ ସକଳ ଭକ୍ତ । ଆନନ୍ଦେ କରିବେ ଯେ ନୃତ୍ୟ ଗୀତ । ୧୬୦ । ବିଜେ କରାଇବେ ଚଢି ମତ୍ତ ଗଜ । ହୋଇବୁ ଆମ୍ଭେ ଯେ ଦେବାଧିରାଜ । ୧୬୧ । ତଦନ୍ତେ ସଖୀ ଅନନ୍ତ କେଶରୀ । ସମସ୍ତେ ବୋଲନ୍ତି ସେ ହରି ହରି । ୧୬୨ । ବିଂଶ ନବ ଅଙ୍କେ ହୋଇବେ ହତ । ସେହି ଅଙ୍କକୁ ଦେଇଥିବ ଚିତ୍ତ । ୧୬୩ । ଧଉଲିଠାରୁ ଯେ ହେବୁ ବାହାର । ଚଢି ଥିବୁ ମତ୍ତଗଜ ଉପର । ୧୬୪ । ଲକ୍ଷେ କୋଟି ବଳ ଥିବେଟି ସଙ୍ଗେ । ଦୁନ୍ଦୁଭିମାନ ବାଜୁଥିବ ରଙ୍ଗେ । ୧୬୫ । अर्थात् — प्रभु रुक्मिणी देवी से कह रहे हैं कि, "घोर कलिकाल में भारी हलचल (अशांति) मचेगी और राजा मारा जाएगा, तथा केशरी राजा गुप्त हो जाएगा। हे सखी, वह केशरी राजा जाकर खंडगिरि में गुप्त रूप से रहेगा। आकाश से घोर शब्द सुनाई देगी और इस संसार के मध्य उनका जन्म होगा। एक हाथी के कंधे पर कलश रखा होगा और हे सखी, वह हाथी उसे लेकर देश-देश में घूमेगा। वह हाथी अपनी इच्छानुसार जहाँ चाहेगा वहाँ विचरण करेगा और जिसके भी सिर पर वह कलश ढालेगा, हे सखी! हम गुप्त रूप से निवास कर रहे होंगे, और फिर उस समय जाकर अपनी काया को प्रकट करेंगे। हम दिव्य बालक रूप में होंगे, और शंख, चक्र, गदा तथा पद्म (कमल) सुशोभित हो रहे होंगे। हमारे साथ हमारे सहोदर भी बालक रूप में उपस्थित होंगे और हम 'बलगंडी' (पुरी का एक स्थान) के पास खेल रहे होंगे। हे सखी, यह भली-भांति जान लो कि वह कुंभ मास की सप्तमी का दिन होगा और उस समय सूर्य रोहिणी लग्न में स्थित होंगे। प्रभु आगे कहते हैं कि, "हे सखी! हम अपनी लीला के खेल में मग्न होंगे, और उसी समय वह हाथी वहाँ आ पहुँचेगा। सभी देवता वहाँ उपस्थित होंगे और वह गजराज शीघ्रता से मेरे मस्तक पर कलश का जल ढालकर मेरा अभिषेक करेगा। हे सखी! तब स्वर्ग से जयजयकार की मंगल ध्वनि सुनाई देगी और यह पृथ्वी अत्यंत शोभायमान हो जाएगी। गंधर्व और भक्तजन नृत्य करेंगे तथा सुमधुर स्वरों में मंगल गीत गाएंगे। देवर्षि नारद अपनी वीणा बजाएंगे और देव तांडव नृत्य करेंगे। देवता और गंधर्व 'हरे-हरे' का उच्चारण करते हुए मेरे मस्तक पर पुष्पों की वर्षा करेंगे। मेरे सभी भक्त मेरे साथ रहेंगे, और वे आनंद में मग्न होकर नृत्य तथा गान करेंगे। भक्त मुझे मतवाले हाथी पर सवार कराकर विराजमान कराएंगे, और हम 'देवाधिराज' होंगे। उसके बाद, हे सखी अनंत केसरी सभी बोलेंगे वह 'हरि-हरि'। बीस नौ अंक में मारे जाएंगे उसी अंक पर अपना चित्त (ध्यान) लगाए रखना। हम धौली से बाहर निकलेंगे, और मतवाले हाथी के ऊपर सवार होंगे। लाख-करोड़ की सेना हमारे साथ होगी, और पूरे उत्साह के साथ दुंदुभियां बज रही होंगी। ~ परम गुप्त गीता, महापुरुष अच्युतानंद दास

  • सकल कामना हीन जे, राम भगति रस लीन। नाम सुप्रेम पियूष हृद, तिन्हहुँ किए मन मीन॥ अर्थात् — प्रस्तुत दोहे में तुलसीदासजी कहते हैं कि जो समस्त कामनाओं से रहित हैं और श्री रामजी के भक्तिरस में डूबे हुए हैं, उन महात्माओं ने भी राम नाम के सुंदर प्रेमरूपी अमृत-सरोवर में अपने मन को मछली बना रक्खा है (अर्थात् नामामृत के आनंद को वे क्षण भर के लिए भी त्यागने में मछली की भांति व्याकुल हो जाते हैं)। ~ दोहावली, तुलसीदास

  • सबरी गीध सुसेवकनि, सुगति दीन्हि रघुनाथ। नाम उधारे अमित खल, बेद बिदित गुन गाथ॥ श्री रघुनाथ जी ने तो शबरी, जटायु आदि अपने श्रेष्ठ सेवकों को ही सुगति दी; परंतु राम नाम ने तो असंख्य दुष्टों का उद्धार कर दिया। राम नाम की यह गुणगाथा वेदों में प्रसिद्ध है। ~ दोहावली, तुलसीदास

  • नाम गरीबनिवाज को, राज देत जन जानि। तुलसी मन परिहरत नहिं, धुरविनिआ की वानि॥ तुलसीदास जी कहते हैं कि गरीब निवाज (दीनबंधु) श्री राम का नाम ऐसा है, जो जपने वाले को भगवान का निज जन जानकर राज्य (प्रजापति का पद या मोक्ष-साम्राज्य तक) दे डालता है। परंतु यह मन ऐसा अविश्वासी और नीच है कि घूरे (कूड़े के ढेर) में पड़े दाने चुगने की ओछी आदत नहीं छोड़ता (अर्थात् गदे विषयो में ही सुख खोजता है)। ~ दोहावली, तुलसीदास