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देश के मजदूर वर्ग को एकजुट करने का एक प्रयास

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  • 📮____📮 क्रान्तिकारी खुदीराम बोस के शहादत दिवस (11 अगस्त) के अवसर पर… एक बार विदाई दे माँ घूरे आसी, हँसबि हँसबि चढ़बो फाँसी देखबे भारतवासी... ब्रिटिश उपनिवेशवादियों के ख़िलाफ़ हमारे देश के संघर्ष का इतिहास ऐसे क्रान्तिकारियों की कुर्बानियों से भरा पड़ा है जिन्होंने आज़ादी के लिए बहुत छोटी उम्र में अपने जीवन को कुर्बान कर दिया। इन क्रान्तिकारियों में खुदीराम बोस का नाम बहुत ऊपर आता है। ब्रिटिश जल्लादों ने जब खुदीराम बोस को फाँसी दी थी तो उनकी उम्र मात्र 18 वर्ष 8 महीना 8 दिन थी। लेकिन *खुदीराम बोस की शहादत ब्रिटिश उपनिवेशवादियों के ख़िलाफ़ देश के युवाओं की तरफ़ से समझौताविहीन संघर्ष का संकल्प बन गया। खुदीराम बोस शहीद हो गए लेकिन ब्रिटिश गुलामी के ख़िलाफ़ देश की जनता के संघर्ष की ऊष्मा बन गए, जनता की स्मृतियों व संकल्पों में ज़िन्दा रहे और ज़िन्दा हैं।* खुदीराम बोस का जन्म 3 दिसम्बर 1889 को बंगाल के मिदनापुर जिले के मोहबनी गाँव में हुआ था। खुदीराम बोस का बचपन उस दौर में शुरु हुआ था जब अंग्रेज़ों की बेरहमी और ‘फूट-डालो, राज करो’ की साज़िश ज़ोरों पर थी। वक़्त ने खुदीराम बोस को कम उम्र में ही बड़ा कर दिया था। खुदीराम बोस 1902 में ही यानि 13-14 वर्ष की छोटी-सी उम्र में अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ सक्रिय हो गये थे। सत्येन्द्रनाथ बसु की प्रेरणा से वो गुप्त क्रान्तिकारी संगठन के सदस्य बने। खुदीराम बोस की बड़ी बहन अनूरूपा देवी ने लिखा है कि ‘..1904 में खुदीराम एक बार बिना बताये कहीं चला गया। काफ़ी दिनों बाद एक चिट्ठी मिली जिसमें खुदीराम ने लिखा था कि -मेरी प्यारी बहन, अब यह मेरे लिए सम्भव नहीं कि मैं एक साधारण गृहस्थ की ज़िन्दगी जिऊँ, और न ही मेरी आगे पढ़ाई जारी रखने की इच्छा है। तो क्यों मैं आप पर बोझ बनकर रहूँ? सो मैंने सन्यास लेने का फ़ैसला कर लिया है। अनूरूपा देवी ने लिखा है कि -तो मेरा प्यारा छोटा भाई सन्यासी बनने निकल पड़ा! लेकिन नहीं वह ईश्वर की खोज में नहीं निकला था वह तो अपने देश के लोगों को अच्छी तरह जानने समझने के लिए निकला था। ….बाद में पता चला कि वो बांकुरा के एक गरीब, अशक्त, भूखों मर रहे बूढ़े परिवार के खेत में काम कर रहा था क्योंकि उनके पास खेत में कोई काम करने वाला नहीं था। अनूरूपा देवी ने लिखा है कि-खुदीराम को मैंने तीन मुट्ठी खुद्दी (चावल के छोटे टुकड़े) (बच्चों को मरने से बचाने का टोटका) देकर खरीदा था। मैं चाहती थी कि वो मेरा होकर रहे, लेकिन वह देश के लोगों के हाथों खरीदा जा चुका था। मैंने उसे तीन मुट्ठी चावल के टुकड़ों से खरीदा था। लेकिन देश के निर्भीक लड़कों ने उसे मुट्ठी भर ख़ून से खरीद लिया था।’ मिदनापुर में हैजा फैला तो खुदीराम लोगों की मदद में लग गए। बाढ़ का प्रकोप हुआ तो चन्दा इकट्ठा कर कपड़े खरीदने, खाना खिलाने में लग गये। छोटे बच्चों व बूढ़ों को कन्धे पर लादकर सुरक्षित जगह लाते रहे। स्वदेशी आन्दोलन शुरू हुआ तो खुदीराम बोस डट गए। चाहे अंग्रेज़ व्यापारियों द्वारा बनाये गये नमक या चीनी की बिक्री बन्द करवाना हो या विदेशी कपड़ा बेचने वाली दुकानों के आगे पिकेटिंग करनी हो। 1906 में ‘वन्देमातरम्’ पर्चा बाँटने की वजह से जेल गये बाद में कम उम्र होने व कुछ खुलासा न होने के कारण छूट गये। 1907 में गुप्त संगठन के आर्थिक संकट के समाधान के लिए हाटगछिया में दुर्गा पूजा के दौरान डाक खजाना को लूटा। आखिरी काम था ‘किंग्सफोर्ड’ की बग्घी पर बम फेंकना। बंगाल विभाजन के ख़िलाफ़ आन्दोलन चलाने वाले नवयुवकों को कलकत्ता के इस कुख्यात मजिस्ट्रेट ने कठोर दण्ड दिये थे। इस कुख्यात मजिस्ट्रेट को पदोन्नति देकर मुजफ्फरपुर में सत्र न्यायाधीश के रूप में भेजा गया। इस बदनाम अंग्रेज़ अधिकारी को सबक सिखाने के लिए ‘युगान्तर समिति’ ने निश्चय किया। इस काम के लिए खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी नियुक्त किये। दुर्भाग्य से उस बग्घी में किंग्सफोर्ड नहीं था। पुलिस के घिरने के बाद प्रफुल्ल चाकी ने ख़ुद को गोली मार ली थी जबकि खुदीराम बोस गिरफ़्तार कर लिये गये। अन्ततः अंग्रेज़ी जल्लादों ने 11 अगस्त 1908 को मुजफ्फरपुर जेल में इस नौजवान क्रान्तिकारी को 18 वर्ष 8 महीना 8 दिन की छोटी-सी उम्र में फाँसी पर लटका दिया। खुदीराम बोस के फाँसी के बाद बंगाल के जुलाहे एक ख़ास किस्म की धोती बुनने लगे जिनके किनारे पर खुदीराम लिखा होता था। बंगाल की धरती के इस महान सन्तान के प्रभाव को एक बाउल गायक के अमर गीत से समझा जा सकता है। जिसे सुन ऐसा लगता है मानो खुदीराम ने फाँसी चढ़ते हुए खुद ही गाया हो-एक बार विदाई दे माँ घूरे आसी, हँसबि हँसबि चढ़बो फाँसी देखबे भारतवासी! यह गीत 1910 में एक धोती में छपा हुआ पाया गया। (पूरा लेख पढ़ने के लिए ऊपर दी गई लिंक पर जाएं)

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  • झारखंड में जारी छात्र आंदोलन पर हो रहे पुलिसिया दमन का विरोध करो! #paperleak #protest #jssc #jpsc #jharkhand

  • 📮____📮 क्यों लगातार गिर रहा है भारतीय रुपया? 🖌 अभिनव 🖥 https://mazdoorbigul.net/archives/19022 ------------------------------------ भारतीय रुपया मोदी सरकार के कार्यकाल के दौरान अपने निम्नतम स्तर पर पहुँच चुका है। इस समय भारतीय रुपया एशिया की सबसे ख़राब प्रदर्शन करने वाली मुद्रा है। मोदी जी ने प्रधानमन्त्री बनने से पहले (और प्रधानमन्त्री बनने के लिए!) यह बयान दिया था कि किसी देश की मुद्रा का गिरना उस देश की अर्थव्यवस्था और उसकी प्रतिष्ठा का गिरना है। मतलब, एक बार उन्होंने सच बोला था! लेकिन अब मोदी सरकार के मन्त्री (क्योंकि ख़ुद मोदी जी किसी ठोस प्रश्न पर कुछ बोलते ही नहीं हैं) कह रहे हैं कि “रुपया अपना स्तर ख़ुद ढूँढ लेगा, चिन्तित होने की कोई बात नहीं है!” सही बात है! देश के अमीरज़ादों और धन्नासेठों के लिए निश्चित ही कोई चिन्तित होने की बात नहीं है। लेकिन देश के ग़रीबों को इसकी भारी क़ीमत चुकानी पड़ रही है और आगे इससे भी भयंकर क़ीमत चुकानी पड़ेगी। लेकिन भारतीय रुपया गिर क्यों रहा है? ज़ाहिर है कि इसके लिए गुरुत्वाकर्षण की शक्ति तो ज़िम्मेदार नहीं है! हम मज़दूरों-मेहनतकशों को भी समझना चाहिए कि हमारे देश की मुद्रा के इस अभूतपूर्व अवमूल्यन के कारण क्या हैं। यह लेख लिखे जाने तक भारतीय रुपया अपने ऐतिहासिक निम्न स्तर पर पहुँच चुका था : 1 अमेरिकी डॉलर में 96 रुपये। मई 2025 में 1 अमेरिकी डॉलर 85 रुपये के बराबर था और साल भर के भीतर ही यह 96 रुपये के क़रीब पहुँच गया है और कई अर्थशास्त्री अभी से ही इस बात का कयास लगा रहे हैं कि भविष्य में यह 100 के निशान को भी पार कर जायेगा। इस भारी गिरावट की वजह क्या है? हम बुनियादी सरल बातों को समझते हुए इन वजहों को समझेंगे। अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा विनिमय–दर क्या है? अन्तरराष्ट्रीय विनिमय-दर यह बताती है कि अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा बाज़ार में किसी राष्ट्रीय मुद्रा की क्या “क़ीमत” है। सटीक वैज्ञानिक अर्थों में कहा जाय तो मुद्रा की कोई क़ीमत नहीं होती, बल्कि मुद्रा ही वह इकाई व माध्यम है जिसमें क़ीमत को अभिव्यक्त किया जाता है। दूसरे शब्दों में, मुद्रा की क़ीमत की बात करना वैसा ही है जैसा कि यह कहना कि “1 किलोग्राम का वज़न 1 किलोग्राम है।” यानी, एक मूर्खतापूर्ण दुहराव। लेकिन बुर्जुआ अर्थशास्त्री इसी प्रकार के गोल चक्करों में फँसे होते हैं। (पूरा लेख पढ़ने के लिए ऊपर दी गई लिंक पर जाएं)

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  • 📚 देश-दुनिया का बेहतरीन साहित्य 📚 _____ कहानी - क़िस्सा यह कि एक देहाती ने दो अफ़सरों का कैसे पेट भरा ✍️ मिख़ाईल सल्तिकोव-श्चेद्रीन (अनुवाद - मदनलाल ‘मधु’) 🖥 This story is available in English as well. To read please visit this link - https://unitingworkingclass.blogspot.com/2024/02/story-how-muzhik-fed-two-officials.html _____ कहते हैं कि कभी किसी ज़माने में दो अफ़सर थे। दोनों ही थे बड़े तरंगी और मनमौजी। जाने एक बार उन्हें क्या तरंग आयी, क्या धुन समायी कि दोनों एक ऐसे द्वीप में जा पहुँचे जहाँ आदमी का नामो-निशान भी नहीं था। दोनों अफ़सरों ने उम्र-भर किसी दफ़्तर में नौकरी की थी। वे वहीं जन्मे, वहीं उनका पालन-पोषण हुआ और उसी दफ़्तरी घेरे में बन्द रहे। परिणाम यह कि कूपमण्डूक हो गये, न कुछ जानें न समझें। सिर्फ़ इन शब्दों तक ही दौड़ थी उनकी - "अपनी वफ़ादारी का यक़ीन दिलाता हूँ।" कुछ वक़्त गुज़रा, उस दफ़्तर की ज़रूरत न रही, उसे बन्द कर दिया गया। इन दोनों अफ़सरों की वहाँ से छुट्टी हो गयी। जब करने-धरने को कुछ न रहा, तो दोनों पीटर्सबर्ग की पोद्याचेस्काया सड़क पर आ बसे। दोनों ने अलग-अलग मकानों में डेरा जमाया, दोनों ने अलग-अलग बावर्चिन रखी और दोनों अपनी पेंशन पाने लगे। एक दिन अचानक हुआ क्या कि दोनों एक ऐसे द्वीप में जा पहुँचे, जहाँ न आदमी था, न आदमज़ाद। आँख खुली तो क्या देखते हैं कि दोनों एक ही रज़ाई ओढ़े पड़े हैं। ज़ाहिर है कि शुरू में तो दोनों एक-दूसरे का मुँह ताकते रहे, कुछ न समझ पाये कि क़िस्सा क्या है। फिर ऐसे बतियाने लगे मानो कुछ हुआ ही न हो। "महानुभाव, अभी-अभी एक अजीब-सा सपना देखा है, मैंने," एक अफ़सर ने कहा। "देखता क्या हूँ कि एक ऐसे द्वीप में जा पहुँचा हूँ, जहाँ आदमी का नाम है, न निशान" इतना कहकर वह एकदम उछल पड़ा। दूसरा अफ़सर भी उछला। "हाय राम। यह क्या माज़रा है! कहाँ हैं हम?" दोनों अफ़सर एकसाथ ही चिल्ला उठे। बिल्कुल परायी-परायी-सी थी उनकी आवाज़। यह जानने के लिए कि सपना है या सत्य, वे लगे एक-दूसरे को छूने। मगर वे जितना अपने को यह समझाने की कोशिश करते कि वह सपने से अधिक कुछ नहीं था, उतना ही उन्हें अफ़सोस के साथ यह मानने के लिए मजबूर होना पड़ता कि वह ठोस हक़ीक़त है। (पूरी कहानी पढ़ने के लिए ऊपर दी गई लिंक पर जाएं) 1869 ➖➖➖➖➖➖➖➖ 🖥 प्रस्‍तुति - Uniting Working Class 👉 हर दिन कविता, कहानी, उपन्‍यास अंश, राजनीतिक-आर्थिक-सामाजिक विषयों पर लेख, रविवार को पुस्‍तकों की पीडीएफ फाइल आदि व्‍हाटसएप्‍प, टेलीग्राम व फेसबुक के माध्‍यम से हम पहुँचाते हैं। अगर आप हमसे जुड़ना चाहें तो इस लिंक पर जाकर हमारा व्‍हाटसएप्‍प चैनल ज्‍वाइन करें - http://www.mazdoorbigul.net/whatsapp

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  • अब सपने उपलब्ध नहीं हैं स्वप्नदर्शियों को न ही गीत गायकों को कहीं-कहीं अँधेरी रात और ठंडे लोहे का ही शासन है पर सपनों की वापसी होगी और गीतों की भी तोड़ दो इनके कारखाने को। ✍️ लैंग्स्टन ह्यूज Now dreams Are not available To the dreamers, Nor songs To the singers In some lands Dark night And cold steel Prevail But the dream will come back, And the song Break its jail ✍️ Langston Hughes

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  • झारखण्ड में परीक्षाओं में धांधली के ख़िलाफ़ संघर्षरत छात्रों के साथ नौजवान भारत सभा मज़बूती से खड़ी है! शिक्षा व्यवस्था में भ्रष्टाचार और परीक्षा घोटाले युवाओं के भविष्य पर सीधा हमला हैं। निष्पक्ष परीक्षाएँ और न्यायपूर्ण भर्ती हर छात्र का अधिकार है। इस लड़ाई में छात्रों की आवाज़ को दबाया नहीं जा सकता। नौजवान भारत सभा छात्रों के इस न्यायपूर्ण संघर्ष का पूर्ण समर्थन करती है।

  • 📮______📮 फ्रेंड्स! कानों में जनता की आवाज़ से तकलीफ़ होती है। जन्तर-मन्तर के प्रदर्शन स्थल को हटाये जाने की कोशिश में लगा भाजपा और संघ परिवार। दिल्ली में जन्तर-मन्तर के प्रदर्शन स्थल को बदले जाने की साजिश का विरोध करो। शान्तिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार पर हमला नहीं सहेंगे! भाजपा सरकार नागरिकों से उनके हड़ताल और प्रदर्शन करने के अधिकार को छीनने की तैयारी कर रही है। पेपर लीक के ख़िलाफ़ प्रदर्शन के ख़त्म होते ही सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गयी जिसमें यह कहा गया कि जन्तर-मन्तर प्रदर्शन के लिए उपयुक्त जगह नहीं है और प्रदर्शन के लिए किसी अन्य जगह को निर्दिष्ट किया जाए। इसके पीछे तर्क यह दिया गया है कि इससे आवश्यक सेवाओं को पहुँचाने में बाधा होती है और स्थानीय निवासियों को समस्याओं का सामना करना पड़ता है। याचिका की सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश ने इसे एक "बेहद महत्वपूर्ण" मसला बताया और केन्द्र सरकार व अन्य अधिकारियों को नोटिस भेज कर जवाब माँगा है। छात्रों के प्रदर्शन के बाद इस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का रवैया कई ज़रूरी सवाल खड़े करता है। जिस न्यायपालिका के पास छात्रों पर हुई बर्बरता के मसले की सुनवाई करने के लिए समय नहीं है, देश में चल रहे भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी, अशिक्षा जैसे मुद्दों पर संज्ञान लेने का समय नहीं है, वही न्यायपालिका प्रदर्शन स्थल के जगह को बदलने के लिए इतनी फुर्ती से क़दम उठा रही है! बिल्कुल यह मसला भाजपा और संघ परिवार के लिए "महत्वपूर्ण" है और इसलिए ही जस्टिस सूर्यकान्त बिना किसी देरी के इसकी सुनवाई कर रहें हैं। भाजपा सरकार के राज में अपने हक़ों की आवाज़ उठाना ही बेहद मुश्किल बना दिया गया है। जन्तर-मन्तर जैसे घोषित प्रदर्शन स्थल पर भी लोग अपनी मर्ज़ी से आकर प्रदर्शन नहीं कर सकते हैं। इसके लिए भी आपको पुलिस से दो हफ़्ते पहले इजाज़त की माँग करनी होगी और अपनी तमाम निजी जानकारियों को साझा करना होगा। इसके बाद भी कोई ज़रूरी नहीं कि आपको प्रदर्शन करने की अनुमति मिल ही जाए। प्रदर्शन के अनुमति की प्रक्रिया इतनी जटिल बना दी गयी है कि कोई आम इंसान इसे पूरा ही न कर पाए। यह कुछ और नहीं बल्कि फ़ासीवादी भाजपा सरकार द्वारा लोगों की आवाज़ को दबाने का हथकण्डा है। देश के कई भाजपा शासित राज्यों में प्रदर्शन स्थल को शहर से काफ़ी दूर कर दिया गया है और राजधानी में भी यही करने की कोशिश की जा रही है। जन्तर-मन्तर पर वर्षों से शान्तिपूर्ण प्रदर्शन होते आ रहें हैं मगर कभी भी कोई क़ानून व्यवस्था के भंग होने की ख़बर नहीं आयी। यह कौन नहीं जानता है कि पुलिस-प्रशासन और सरकार की मिलीभगत से ऐसी परिस्थितियाँ तैयार की जाती हैं जिससे लोगों के शान्तिपूर्ण आन्दोलन को बदनाम करके उससे ख़त्म किया जा सके। छात्रों के आन्दोलन में भी इस तरह की तमाम कोशिशें की गयी मगर सरकार उसमें नाकामयाब रही। इसलिए ही, अब यह नई कोशिश की जा रही है ताकि आने वाले समय में लोग आन्दोलन,प्रदर्शन कर ही न पाये। आवश्यक सेवाओं की आपूर्ति का बाधित होना और क़ानून व्यवस्था इत्यादि को बनाये रखने के समस्या उत्पन्न होना सिर्फ़ बहाना है, असल मक़सद लोगों के मूलभूत अधिकार को छीनना है। दिल्ली के जन्तर-मन्तर पर चले छात्रों के आन्दोलन ने न सिर्फ़ मोदी सरकार को झुकने पर मजबूर कर दिया बल्कि देशभर में जनता के अलग-अलग हिस्सों में इस सरकार की जनविरोधी नीतियों के ख़िलाफ़ व्याप्त आक्रोश को भी सामने रखा। इससे ही घबराकर मोदी सरकार न्यायपालिका की आड़ में लोगों के बुनियादी अधिकार को ही छीनने की तैयारी के लगी हुई है। इस याचिका का मक़सद साफ़ है कि आने वाले वक़्त में जन्तर-मन्तर के प्रदर्शन स्थल को प्रति बन्धित कर दिया जाएगा और शहर से दूर किसी जगह को नया प्रदर्शन स्थल घोषित कर दिया जाएगा। यह सीधे तौर पर फ़ासीवादी भाजपा सरकार द्वारा विरोध की आवाज़ को कुचलने का षड़यंत्र है। आन्दोलन, प्रदर्शन के बुनियादी अधिकार को छीनने की तैयारी है। भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी इसका कड़ा विरोध करती है। साथ ही, सभी जनवादी अधिकारों, नागरिक अधिकारों के लिए संघर्षरत संगठनों से अपील करती है की जन्तर-मन्तर के प्रदर्शन स्थल को बदलने की कोशिश का विरोध करें। हम तमाम न्यायप्रिय, इंसाफ़पसन्द नागरिकों का भी आह्वान करते हैं की भाजपा सरकार द्वारा हमारे लोकतान्त्रिक अधिकार पर हो रहे इस फ़ासीवादी हमले के ख़िलाफ़ अपनी आवाज़ उठायें।

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  • दिल्ली में बारिश के बाद घर हुए बर्बाद | घुसा गटर का गंदा पानी - लोग हुए परेशान

  • 📮____📮 (जो लोग थोड़ा ज्यादा ही निराश-हताश हो गये हैं, उनके लिए यह टिप्पणी, एक बार फिर) ✍️ कविता कृष्णपल्लवी एक था रंगा ! एक था बिल्ला ! मैं जर्मनी और इटली वाले रंगा-बिल्ला की बात कर रही हूँ जो 80-90 साल पहले धूमकेतु की तरह उभरे थे और लाशों की ढेरियों पर चढ़कर, गलियों में बहते लहू में अपने बूट छपछपाते हुए सत्ता के शिखर तक पहुँचे थे I उन्होंने ढेरों अभेद्य जेलें बनवाईं, तहखाने-दर तहखाने वाले कत्लगाह, फाँसीघर और टार्चर चैम्बर I फिर उन्होंने पूरे मुल्क को ही जेलखाना बना दिया I जो उनके बनाए साम्राज्य के नक्शे में रिहाइश के क़ाबिल नहीं था उसे गैस चैम्बर्स में गीली-सूखी लकड़ियों की तरह जला दिया गया I उनके आसपास सिर्फ़ जैकारा लगाते लोग थे, उनकी हर स्कीम को हर कीमत पर अंजाम देते लोग थे I मुल्क की सड़कों पर गश्त लगाती सेना-पुलिस थी, या उन्मादी बर्बरों की टोलियाँ थीं I उनसे जो भी मिलता था, उन्हें महानों में महान बताता था I वे सोचते थे कि उनके सभी देशवासी उन्हें महानों में महान मानते हैं ! फिर वे चाहने लगे कि दुनिया के सभी देशों के सभी लोग उन्हें महानों में महान मानें ! इसके लिए उन्होंने चारों दिशाओं में अपनी फौजों के लश्कर दौड़ा दिए और इसतरह अपने ताक़त का इजहार किया ! रंगा हज़ार साल उम्र वाला साम्राज्य बनाना चाहता था और खुद को चिन्तक, कला-पारखी, लेखक -- सबकुछ मानता था, इतिहास का महानतम सेनापति और साम्राज्य-निर्माता तो मानता ही था I बिल्ला जब कला-संस्कृति की बात सुनता था तो उसका हाथ अपनी पिस्तौल के हत्थे पर खुद-ब-खुद चला जाता था और हर सोचने वाले दिमाग को वह खतरनाक मानता था और उसे हमेशा के लिए चुप कर देना चाहता था या जेल की अँधेरी कोठरी में उसे सड़ने के लिए छोड़ देना चाहता था ! क्या-क्या उन्होंने नहीं सोच रखा था, सिकंदर, चंगेज़ खान, कुबलाई खान, नेपोलियन वगैरह को पीछे छोड़ दुनिया का महानतम साम्राज्य-निर्माता बनने के लिए ! पर दो दहाइयों का समय भी नहीं बीता था कि रंगा को चारो ओर से घिरा हुआ बंकर में खुद को गोली मार लेनी पड़ी और बिल्ला को लोगों ने उसके दरबारियों सहित मारकर सड़कों पर घसीटा, उनकी लाशों पर पेशाब किया और फिर चौराहों पर उल्टा टांग दिया I पिछले 70-80 वर्षों के दौरान, कई बार दुनिया के अलग-अलग देशों में पैदा हुए अलग-अलग साइज़ और औकात के रंगा और बिल्ला I उन्होंने भी अपनी औकात के हिसाब से अपना ताक़तवर साम्राज्य बनाने के बाबत सोचा, इसके लिए दंगे करवाए, खून की नदियाँ बहाईं, उन्माद की आँधी चलाई, खूँख्वार काले क़ानून बनाए, घपलों-घोटालों से भरे चुनाव करवाए, फर्जी मुठभेड़ें करवाईं, धार्मिक-नस्ली नफ़रत का सैलाब पैदा किया, लाशों की ढेरियाँ लगाईं और उनपर चढ़कर आसमान में रखे सिंहासनों तक पहुँचे I भक्तों के जुनूनी नारों, खरीदे गए कवियों की विरुदावलियों, टुकड़ों पर पालने वाले बौद्धिकों के लेखन और सड़कों पर छाये सन्नाटे को सभी बौने और मंझोले साइज़ के रंगा-बिल्ला अपनी अजेय ताक़त का प्रमाण मानते थे और होता यह था कि सिर्फ़ वे बोलते थे और लोग सुनते थे ! पर इनमें से किसी भी रंगा-बिल्ला का साम्राज्य मुश्किल से ही एक दशक का समय पार कर पाया ! इनमें से कुछ घसीटकर अपने ही बनवाये किसी जेल में ठूँस दिए गए, कुछ सड़कों पर कुत्तों की तरह मरे और कुछ भागकर सात समंदर पार अपने सरपरस्तों की दर पर जा पहुँचे, एक दयनीय किस्म की गुमनामी में ज़िल्लत और घुटन भरा अपना बुढ़ापा काटने के लिए I इतिहास तो बार-बार आगाह करता है दुनिया के तमाम रंगाओं-बिल्लाओं को कि लाशों की ढेरियों, खून के चहबच्चों, जेलों, क़त्लगाहों, आतंक और सन्नाटे से भरे साम्राज्य कभी भी टिकाऊ नहीं होते और और एकछत्र हुकूमत करने से लाख गुना बेहतर होता है मनुष्य की तरह जीना और समस्त मानवीय चीज़ों को प्यार करना, पूँजी की सेवा करने से लाख गुना बेहतर होता है आम लोगों की सेवा करना, लेकिन हर रंगा-बिल्ला की सबसे बड़ी खासियत यह होती है कि वे इतिहास की आवाज़ पर कभी कान नहीं देते I अगर कभी रंगा-बिल्ला की जोड़ी किसी देश में एक साथ पैदा हो जाये और आतंक, दमन और तबाही की अपनी सारी ताक़त का मुजाहिरा करे, तो भी उसका साम्राज्य हज़ार साल तो क्या, सौ साल तो क्या, पचास साल तो क्या, बीस साल भी बमुश्किल-तमाम नहीं चल सकता I इतिहास की यह अकाट्य, निरपवाद शिक्षा है I लेकिन इतिहास की एक अकाट्य शिक्षा यह भी है कि कोई भी रंगा-बिल्ला इतिहास से कभी कोई सबक नहीं सीखता और इतिहास के हाथों कठोरतम दंड पाना उसकी नियति होती है I

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  • 📚 देश-दुनिया का बेहतरीन साहित्य 📚 _ उपन्‍यास अंश : ‘‘मुझे तो कोई खतरा नहीं है, पर आपको है, सर!’’ 🖌हावर्ड फास्ट, अनुवाद: सुरेन्द्र कुमार 🖥 http://dishasandhaan.in/archives/1631 ------------------------------------ हावर्ड फास्ट के प्रख्यात, पर आज दुर्लभ उपन्यास ‘सिलास टिम्बरमन’ का एक अध्याय हम यहां प्रस्तुत कर हैं। ‘सिलास टिम्बरमन’ अमरीका के एक विश्वविद्यालय के एक गुमनाम-से कालेज के प्रोफेसर की कहानी है, जो शिक्षा-जगत में आजाद ख्यालों के लोगों का पीछा कर रहे शिकारी कुत्तों और भेड़ियों के उन्माद और हुआं-हुआं के शोर से उत्पन्न भयावह चक्रवात में फंस गया है। यह कहानी है उस दौर की जब प्रगति और परिवर्तन के हामी हर विचार और हर व्यकित को कुचलने की राष्ट्रव्यापी साजिशें रची जा रही थीं और साथ ही यह समाज से कटे एक बुद्धिजीवी के जागने और उन शक्तियों के खिलाफ आवाज बुलन्द करने की कहानी है। – सम्पादक --------------------------------------- 2 नवम्बर, बुधवार की रात और कैम्पस में आइक एम्सटरडम के पक्ष में आयोजित होने वाली विरोध सभा से एक दिन पहले की बात है। सिलास देर गये रात तक अगले दिन के लिए अपना बयान तैयार कर रहा था। वह एक तथ्य पर ऐसे अन्दाज में, जिसमें कुछ अचरज और उससे कुछ ज्यादा विनम्रता का भाव था, सोच में डूबा हुआ था: उसे ध्यान आया कि उसकी अब तक की जिन्दगी में हालांकि एक के बाद दूसरा दिन क्लासरूमों में लेक्चर देते हुए ही कटा था, पर वह इससे पहले कभी किसी आम सभा में नहीं बोला था। अपने मन और मस्तिष्क पर बुरी तरह छायी नाना प्रकार की शंकाओं और आशंकाओं का विवेचन कर चुकने के बाद वह इस नतीजे पर पहुंचा कि इन शंकाओं-आशंकाओं में सबसे भयावह स्थान इस तथ्य का है कि उसे तो इस बार क्लासरूम की चहारदीवारी से घिरी पनाहगाह के बाहर जाकर बोलना था (पनाहगाह की तो उसकी जिन्दगी में गहरी जगह थी, उसकी जिन्दगी का एक महत्वपूर्ण कारक था।) शायद उसकी जिन्दगी के एक अच्छे-खासे हिस्से का सरोकार एक ऐसी ही पनाहगाह की तलाश में रहा-उन तमाम उन्मत्त तूफानों से बचने के लिए पनाहगाह की तलाश जो सारी दुनिया में गर्जन-तर्जन किया करते थे, परन्तु जिनसे वह अछूता रहा; यह थी उन भयावह कृत्यों से जो एक मनुष्य दूसरे मनुष्य के विरुद्ध किया करता है, बचने के लिए पनाहगाह की तलाश; यह थी भूख और ठंड के राक्षसी पंजों से बचने के लिए पनाहगाह की तलाश; विषादमय, उलझनभरे विवादों-कलहों से, जिन्हें राजनीति का नाम दिया जाता है, बचने के लिए पनाहगाह की तलाश। क्लासरूम एक ऐसी ही पनाहगाह थी, जहां मनुष्य उसमें, अपने क्लासरूम में राजा हुआ करता था, जहां उसकी बातें उसके छात्र सुना करते थे और जहां वह, प्रोफेसर टिम्बरमन, सदा ही ऐसा व्यक्ति हुआ करता था जो पास में बैठे व्यक्ति से कुछ ज्यादा ही जानता था। परन्तु इस समय तो उसे पक्का यकीन नहीं था कि वह पास में बैठे व्यक्ति से कुछ ज्यादा ही जानता है। अपने एक नजदीकी और प्रिय व्यक्ति के साथ जो कुछ हो रहा था, उसके प्रति अपना आक्रोश प्रकट करने के लिए वह शब्द ढूंढ़ने के लिए भटक रहा था, जूझ रहा था। लेकिन लगता था कि वह इस मामले में जरा भी आगे नहीं बढ़ पा रहा है और गहरा सच तो यह था कि वह अपनी इच्छा के विरुद्ध लिख रहा था; और सब कुछ के बावजूद असलियत तो यही थी कि उसकी इच्छा अब भी अपनी जिन्दगी शान्तिपूर्वक बसर करने की थी-किसी का भी हाथ उसके खिलाफ न उठे। उसने अपने छोटे-से अध्ययन कक्ष के चारों ओर नजर दौड़ायी और मन ही मन सोचा कि यही तो असल में वह चीज है, जिसकी मनुष्य कामना करता है – मजबूत आधार पर टिकी सुख-सुविधाएं। इनके अपने पास रहने का यकीन; बांज की लकड़ी की बड़ी टिकाऊ आरामदेह मेज जिसके पास कुर्सी पर बैठकर वह लिखा करता है; फर्श से ऊपर छत तक फैले किताबों के शेल्फ; शताब्दियों से प्रवहमान ज्ञान-प्रज्ञान का नन्हा-सा सागर; उनमें से प्रत्येक मूल, संस्कृति, परम्परा के धागों से बुने गुच्छों के अन्दर मजबूती से संरक्षित हैं; उनमें से प्रत्येक मनुष्य के चिन्तन और सभ्यता के एक या दूसरे पहलू को आलोकित कर रहा है; वे सब इस आलोक को नयनाभिराम हरी छटा दे रहे हैं। (पूरी कहानी पढ़ने के लिए ऊपर दी गई पर जाएं)

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  • 📮____📮 कभी- कभी न्याय भी मिल जाता है ताकि रोज -रोज के अन्याय की तरफ से निगाह हटी रहे।कभी -कभी सच भी बोल दिया जाता है ताकि असत्य की महिमा में कमी न आ सके।कभी -कभी हत्यारे पकड़ भी लिये जाते हैं, ताकि बलात्कारियों और हत्यारों को खुलकर खेलने के मौके दिए जा सकें। कभी- कभी की राहत,कभी -कभी का न्याय सबसे बड़ा धोखा है।हमें कभी- कभी कुछ नहीं चाहिए, हमें तुम्हारा यह तोहफा नहीं चाहिए, इसे अपने पास रखो और खुश रहो।हमें हमारा हक चाहिए।वह तुम दोगे नहीं और हम लिये बगैर रहेंगे नहीं। यह आज की आवाज है और आज ही नहीं मिटेगी। ✍️ विष्णु नागर

  • 📮______📮 आज प्रसिद्ध व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई का स्मृति दिवस (10 अगस्त) है। हरिशंकर परसाई ने व्यंग्य की शैली में धार्मिक पाखण्ड, साम्प्रदायिकता, जातिवाद, चुनावबाज़ पार्टियों के चरित्र, आरएसएस व धार्मिक कट्टरपन्थियों के साम्प्रदायिक एजेण्डे आदि की बखिया उधेड़ कर रख दिया है। आरएसएस के चरित्र पर उनका कटाक्ष इतना सटीक और मारक था कि आरएसएस के गुण्डों ने जबलपुर में उन पर हमला कर दिया था। इसमें उन्हें काफ़ी चोट आई थी। लेकिन इन सबके बावजूद ग़लत चीज़ों पर मारक व्यंग्य और सत्य के प्रति उनकी प्रतिबद्धता अटूट बनी रही। भारतीय राजनीति, समाज के विविध पहलुओं, आरएसएस के चरित्र आदि पर लिखे उनके व्यंग्य आज भी बेहद प्रासंगिक हैं। हरिशंकर परसाई ने व्यंग्य के अलावा कहानी, उपन्यास, आख्यान, संस्मरण, बाल साहित्य आदि भी लिखा है लेकिन व्यंग्य लेखन उनकी सबसे महत्वपूर्ण पहचान है। वैष्णव की फिसलन, आवारा भीड़ के ख़तरे, तुलसीदास चन्दन घिसे, ठिठुरता गणतंत्र, विकलांग श्रद्धा का दौर, निठल्ले की डायरी आदि उनकी प्रमुख व्यंग्य रचना है। उनके व्यंग्य से कुछ प्रासंगिक हिस्से प्रस्तुत हैं- ◾स्वामी जी, पश्चिम के देश गौ की पूजा नही करते, फिर भी समृद्ध है? - उनका तो भगवान दूसरा है बच्चा! उन्हें कोई दोष नही लगता। - यानी भगवान रखना भी एक झंझट ही है। वह हर बात दण्ड देने लगता है। - तर्क ठीक है, बच्चा, पर भावना ग़लत है। - स्वामीजी, जहाँ तक मैं जानता हूँ, जनता के मन में इस समय गोरक्षा नहीं है, महँगाई और अर्थिक शोषण है। जनता महँगाई के ख़िलाफ़ आन्दोलन करती है। वह वेतन और महगाई भत्ता बढ़वाने के लिए हड़ताल करती है। जनता आर्थिक न्याय के लिए लड़ रही है। और इधर आप गोरक्षा आन्दोलन लेकर बेठ गए है। इसमें तुक क्या है? - बच्चा, इसमें तुक है। देखो जनता जब आर्थिक न्याय की माँग करती है, तब उसे किसी दूसरी चीज में उलझा देना चाहिए, नहीं तो वह ख़तरनाक हो जाती है। जनता कहती है- हमारी माँग है महँगाई बन्द हो, मुनाफ़ाखोरी बन्द हो, वेतनबढ़े, शोषण बन्द हो, तब हम उससे कहते हैं कि नहीं तुम्हारी बुनियादी माँग गोरक्षा है। बच्चा! आर्थिक क्रान्ति की तरफ़ बढ़ती जनता को हम रास्ते में ही गाय के खूंटे से बाँध देते है। यह आन्दोलन जनता को उलझाये रखने के लिए है। (निठल्ले की डायरी) ◾दिशाहीन, बेकार, हताश, नकारवादी, विध्वंसवादी बेकार युवकों की यह भीड़ ख़तरनाक होती है। इसका उपयोग महत्वाकांक्षी ख़तरनाक विचारधारा वाले व्यक्ति और समूह कर सकते हैं। यह भीड़ धार्मिक उन्मादियों के पीछे चलने लगती है। यह भीड़ किसी भी ऐसे संगठन के साथ हो सकती है जो उनमें उन्माद और तनाव पैदा कर दे। फिर इस भीड़ से विध्वंसक काम कराए जा सकते हैं। यह भीड़ फ़ासिस्टों का हथियार बन सकती है। हमारे देश में यह भीड़ बढ़ रही है। इसका उपयोग भी हो रहा है। आगे इस भीड़ का उपयोग सारे राष्ट्रीय और मानव मूल्यों के विनाश के लिए, लोकतंत्र के नाश के लिए करवाया जा सकता है। (आवारा भीड़ के ख़तरे) ◾समस्याओं को इस देश में झाड़-फूँक, टोना-टोटका से हल किया जाता है। साम्प्रदायिकता की समस्या को इस नारे से हल कर लिया गया - हिन्दू-मुस्लिम, भाई-भाई! (अपील का जादू)

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