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श्रीमन्निग्रहाचार्यसन्निधानम् (Jagadguru Nigrahacharya जगद्गुरु निग्रहाचार्य)

श्रीमन्निग्रहाचार्यसन्निधानम् (Jagadguru Nigrahacharya जगद्गुरु निग्रहाचार्य)

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यह समूह श्रीमन्महामहिम विद्यामार्तण्ड जगद्गुरु निग्रहाचार्य श्रीभागवतानंद गुरु जी के आधिकारिक लेख, वक्तव्य, प्रवचन, प्रश्नोत्तर, ग्रन्थ एवं कार्यक्रमों से सम्बन्धित सूचना एवं सामग्री हेतु निर्मित है। शास्त्रीय विषयों के अतिरिक्त अन्य वार्तालाप निषिद्ध है।

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  • अशास्त्रीय बुद्धि किसी कुलीन पण्डित की तो हो ही नहीं सकती जो धनलोभ से शास्त्रों का ऐसा बलात्कार करके मानो अपनी माता को ही वेश्यालय में बेचने को अपनी ऐतिहासिक उपलब्धि समझता हो। आर्य समाज एवं आरएसएस के टुकड़ों पर पलने वाला यह गिरोह मोदी का मन्दिर बनने और काशी के शास्त्रीय मन्दिर टूटने पर तो अपने मुख में विष्ठा जमा लेता है, पर शास्त्रविरुद्ध कथन करने के समय पूरी काशी में लंगोटी खोल कर नाचता है। कम से कम ये लोग इतना ही कर लेते कि सत्यार्थ प्रकाश के पहले संस्करण के बाद उसमें जोड़े घटाए प्रक्षिप्त अंशों को ही सुधरवा लेते, यदि दयानन्द को ही अपना बाप बनाना था तो ! दुर्भाग्य से रामनारायण द्विवेदी, जितेन्द्रानन्द जैसे मूर्खजन, जो आरएसएस की अवैध सन्तान ही हैं, ऐसे ब्रह्मराक्षसों ने सरकारी हड्डी चूसने वाले दोपाये श्वानों के समान अपने कुल को कलङ्कित करने का जो कार्य किया है, इस हेतु ये मृत्युदण्ड के पात्र हैं - वध्या मे धर्मध्वजिनस्ते हि पातकिनोऽधिकाः अथवा ततो वध्या भविष्यन्ति वेदमार्गबहिष्कृताः। यद्यपि ब्राह्मण हेतु सीधे मृत्युदण्ड का निषेध भी स्मृतियों में ही स्पष्ट है अतः शास्त्रीय आज्ञा तो यही है कि ऐसे बुद्धिचाण्डालों का बहिष्कारपूर्वक व्यापक विरोध हो एवं सत्पुरुष इनके संसर्ग का परित्याग करें। अधुना, काशी विद्वत् परिषत् के द्वारा छपे साहित्य एवं निर्णय भ्रामक, विधर्मियों से प्रायोजित एवं अग्राह्य समझे जाने चाहिए। सनातन धर्म के समस्त मान्य शङ्कराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य प्रभृति धर्माधिकारियों को, जिनका विवेक जीवित हो एवं जिन्होंने अपना स्वाभिमान नेताओं को न बेचा हो, उन्हें भी काशी विद्वत् परिषत् के इन दण्डनीय मूर्खों का व्यापक विरोध करना चाहिए। अव ब्रह्मद्विषो जहि ― कामाख्याकामरूपमहायोनिपीठस्थ हंसवंशावतंस श्रीमन्महामहिम विद्यामार्त्तण्ड श्रीमज्जगद्गुरु निग्रहाचार्य स्वामिश्री श्रीभागवतानन्द गुरु

  • ॥ शं नः कौलिकः ॥ काशी विद्वत् परिषत् के ब्रह्मराक्षसों का जीवित रहना धर्म के लिए घातक धर्मप्रेमी सज्जनों ! गौतम ऋषि के द्वारा शापित अनेक राक्षसवृत्ति वाले दुर्जन कुम्भीपाक आदि नरकों से बाहर आ, कलियुग में ब्राह्मणों के वंश में जन्म लेकर धर्म की हानि करेंगे और अधर्म को बढ़ाएंगे, यह भविष्यवाणी श्रीमद्देवीभागवत महापुराण आदि में प्रसिद्ध है। पूर्वं ये राक्षसा राजन् ते कलौ ब्राह्मणाः स्मृताः। पाखण्डनिरताः प्रायो भवन्ति जनवञ्चकाः॥ असत्यवादिनः सर्वे वेदधर्मविवर्जिताः। दाम्भिका लोकचतुरा मानिनो वेदवर्जिताः॥ शूद्रसेवापराः केचिन्नानाधर्मप्रवर्तकाः। वेदनिन्दाकराः क्रूरा धर्मभ्रष्टातिवादुकाः॥ * कलौ युगे प्रवृत्ते तु कुम्भीपाकात्तु निर्गताः। भुवि जाता ब्राह्मणाश्च शापदग्धाः पुरा तु ये॥ (श्रीमद्देवीभागवते) ऐसे ही, अनेक दुर्जनों ने ब्राह्मण वेश धारण करके काशी विद्वत् परिषत् नाम की एक मूर्खमण्डित धनलोभी संस्था के आश्रय से अपना दुष्कर्म प्रसारित किया है। आर्य समाजियों की अवैध सन्तानों के समान कार्य करने वाले इन दुर्जनों ने श्रीमेधातिथि, कुलूकभट्ट, सर्वज्ञनारायण आदि की सर्वमान्य टीकाओं से सज्जित श्रीमनुस्मृति की हत्या करते हुए अपने भाजपा, सङ्घ, आर्यसमाज आदि अनेक बौद्धिक पिताओं की चापलूसी हेतु मनुस्मृति के वर्णाश्रमपोषक शास्त्रीय अंशों को प्रक्षिप्त बोलने और उसमें शेष विषयों को मनमाने ढंग से प्रकाशित करने का निर्णय लिया है। शास्त्र कहते हैं - शास्त्रार्थमन्यथा यस्तु व्याख्यायति सुमन्दधी:। स चापि ब्रह्महत्यायाः पातकी परिगीयते॥ यः पुराणेषु चार्थेषु स्वयं श्लोकादि कल्पयेत्। स चापि ब्रह्महत्यायाः पातकी परिगीयते॥ * कल्पयिष्यन्ति शास्त्राणि स्वबुध्या देवता अपि। त्यक्ष्यन्ति धर्मशास्त्राणि निन्दयिष्यन्ति तान्यपि॥ * अन्तःशठा महाक्रूरा परद्रव्याभिलिप्सवः। भ्रमन्ते वैष्णवैर्वेशधारयिष्यन्त्यसज्जनान्॥ पुराणार्थविदां साधुशीलानाञ्च द्विजन्मनाम्। देवताद्वेषकास्ते वै द्वेषयिष्यन्ति सर्वदा। अन्यवर्णाश्रमश्चिह्नरन्येऽधिष्यन्ति लोभिन:। (बृहद्धर्मपुराणे) जो शास्त्रों का मनमाना अर्थ लगाता है, और जो मूर्ख ऐसा ही व्याख्यान देता है, उसे भी ब्रह्महत्या के समान पातकी जानना चाहिए। जो पुराणों के अर्थों में अपनी कल्पना से ही श्लोकों को बताता है, (अथवा श्लोकों को ही काल्पनिक बताता है) उसे भी ब्रह्महत्या का ही दोषी बताया गया है। कलियुग में लोग अपने मन से शास्त्रों एवं देवताओं की कल्पना करके व्याख्या करेंगे। मान्य धर्मशास्त्रों को छोड़कर, उनकी निन्दा भी करेंगे। अन्दर से शठबुद्धि वाले, अत्यन्त क्रूर स्वभाव वाले, तथा दूसरे के धन के अपहरण की इच्छा रखने वाले लोग, केवल वैष्णव वेश धारण करके और अयोग्य लोगों को वैष्णव वेश धारण करा कर भ्रमण किया करेंगे। जो ब्राह्मण पुराणों के अर्थ को जानने वाले होंगे, अच्छा और शीलयुक्त आचरण करने वाले होंगे, उन लोगों से, तथा देवताओं से भी ये लोग द्वेष करेंगे। साथ ही, बिना शास्त्रोक्त अधिकार के ही अन्य वर्ण या आश्रम के चिह्न को (प्रतिष्ठा आदि के) लोभ से धारण कर लेंगे। आहारशुद्ध्या नृपते चित्तशुद्धिस्तु जायते। शुद्धे चित्ते प्रकाशः स्याद्धर्मस्य नृपसत्तम॥ वृत्तसङ्करदोषेण जायते धर्मसङ्करः। धर्मस्य सङ्करे जाते नूनं स्याद्वर्णसङ्करः॥ (श्रीमद्देवीभागवते) जिसका आहार शुद्ध होगा, उसका चित्त भी शुद्ध होगा। शुद्ध चित्त में ही धर्म का प्रकाश फैलता है। वृत्तसङ्करता के कारण धर्म में सङ्करता आती है। धर्मसङ्कर व्यक्ति वर्णसङ्करता की ओर बढ़ जाता है। वर्णसङ्करता को बढ़ाने वाले लोग वध किये जाने योग्य हैं, ऐसा महाभारत के राजधर्मपर्व का निर्णय है - राज्ञो वधं चिकीर्षेद्यस्तस्य चित्रो वधो भवेत्। आदीपकस्य स्तेनस्य वर्णसङ्करिकस्य च॥ वर्णसङ्करता को बढ़ाने पर लाखों रुपये देने वाली सरकार का विरोध करने के स्थान पर नेताओं के तलवे चाटने वाले ब्रह्मराक्षसों का अब यह दुःसाहस हो गया कि हमारे धर्मशास्त्रों के मान्य अंशों को विधर्मियों के कहने पर हटाने चले हैं ? स्मरण रखो हिन्दुओं ! हमारे रामायण, महाभारत, मनुस्मृति आदि मान्य धर्मशास्त्र प्रामाणिक एवं दिव्य लोकोपकारी हैं, प्रक्षिप्त नहीं। "इस्लाम के बिना हिन्दुत्व अधूरा है, शास्त्रों को बदल देना चाहिए" आदि की बकवास करने वाले सङ्घी मनोरोगियों के गुलामों से सावधान रहो ! पूर्वकाल में भी सम्मानित ऋषियों को ब्राह्मणेतर बताना, कलमा पढ़ाने वाले नागपाल को महाब्रह्मर्षि की उपाधि देना, शास्त्रों के विरुद्ध जाकर मनमाने लोगों को धर्मगुरु बताना और स्वयं को "शंकराचार्य नियुक्त करने का शास्त्रीय अधिकारी" बताकर सनातनी समाज को ठगने वाले ऐसे ब्रह्मराक्षस चतुर्दिक् भर्त्सना के पात्र हैं। ऐसे दुर्जनों के वंश एवं रक्त का भी परीक्षण होना चाहिए कि कहीं किसी विधर्मी के बीज का प्रक्षेपण इनके ही वंश में तो नहीं हो गया, क्योंकि ऐसी नीच

  • आचार्य की परिभाषा जानें लिङ्गपुराण के अनुसार ...

  • ज्यूडिशियल माफिया पर स्पष्ट और निर्भय सत्य कहने हेतु अधिवक्ता घनश्याम उपाध्याय को आशीर्वाद एवं अभिनन्दन !

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  • क्यों कहा जगद्गुरु निग्रहाचार्य ने - साधो ! यह दोगलों का देश | Jagadguru Nigrahacharya | Eye Opener https://youtu.be/uhMgvKJl06c

  • धर्मगुरुओं से आशा करना ही हिन्दुओं की निराशा का कारण | जगद्गुरु निग्रहाचार्य | Jagadguru Nigrahacharya https://youtu.be/X0NNt1eux8Y

  • ‎⇨ से वीडियो

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  • यह सितम्बर - अक्टूबर 2025 में रिकॉर्ड तथा प्रसारित हुए हमारे साक्षात्कार का एक अंश है जो अभी कई लोग प्रसारित करके दुष्प्रचार कर रहे हैं। यह ध्यान रहे कि सम्बन्धित वक्तव्य तब का है जब Cockroach Janta Party आदि का कोई अस्तित्व नहीं था किन्तु छात्रों के साथ विश्वासघात एवं शिक्षा व्यवस्था की दुर्दशा तब भी एक वास्तविक समस्या थी। जो अम्बेडकरवादी धर्मद्रोही राष्ट्रद्रोही तत्त्व, संघी - भाजपाई, कांग्रेसी, सपाई, आपिये आदि हैं, यह वक्तव्य उनका समर्थन नहीं करता है। जो वास्तविक रूप से परिश्रमी एवं निर्दोष छात्र हैं, किसी राजनैतिक दल से सम्बद्ध न होकर वास्तविक रूप से परीक्षा हेतु परिश्रम करके विश्वासघात के शिकार हुए हैं, यह वक्तव्य उनके समर्थन में दिया गया था। CJP आदि के उपद्रवों के विरुद्ध दो बार हमारे वीडियो वक्तव्य आ चुके हैं, इस बात को ध्यान में रखें।

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  • कॉकरोच जनता पार्टी Cockroach Janta Party का आन्दोलन, छात्रों का अधिकार या विदेशी षड्यन्त्र ? भारत में अपराध करने के लिए सरकार से हाथ मिलाना आवश्यक ! धर्मगुरुओं से भी नहीं है अधिक आशा - जगद्गुरु निग्रहाचार्य का दूरदर्शी विश्लेषण (कुहासे के कारण आधे वीडियो में थोड़ा धुंधलापन है) https://youtu.be/izDnJnUGopA

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