Gulzar poetry (गुलज़ार कविता)
Статистика༒︎🇼 🇪 🇱 🇨 🇴 🇲 🇪༒︎ ✍︎ शायरियां ऐसी जो दिल छू जाए !! ☕︎ .कविता, शेर, नज्म, ग़ज़ल, और दिलचस्प कहानियाँ. आपके दिल के एहसास हमारी शायरी में। ♥️💕 Est: 08-08-2021 ♡ ㅤ ❍ㅤ ⎙ㅤ ⌲ ˡᶦᵏᵉ ᶜᵒᵐᵐᵉⁿᵗ ˢᵃᵛᵉ ˢʰᵃʳᵉ
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रात तक मेरे सिर पर आसमान था, सूरज मेरा था, ये चाँद भी मेरा था, और वे सितारे भी, जो अब जाने कहाँ खो गए हैं। फिर? फिर सुबह हो गई। और मेरे सिर के ऊपर से आसमान जैसे छठ गया। ऐसा नहीं था कि आसमान मुझ पर टूट पड़ा था, नहीं… बस, आसमान अब मेरे पास नहीं था। देखने को कोई छत नहीं थी, और सिर उठाऊँ तो आसमान भी नहीं था। न उम्मीदें थीं, न उन्हें रोकर बहा देने की वजह, न कोई ऐसा कोना जहाँ अपने बिखरे हुए ख़्वाब रख आती। क्या पता, ये सुबह हुई भी थी या नहीं… क्या पता, मैं अब भी उसी रात में हूँ, जहाँ सब कुछ मेरा था, और बस आँख खुलते ही सब कुछ एक सपना हो गया। एक ऐसा बुरा सपना, जो ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रहा। ~ अंशी
काश तुझे ढूँढ पाती, तेरे अवशेषों को अपनी स्मृतियों में छू पाती। अफ़सोस, मुझे तू याद नहीं, तेरे स्पर्श की छुअन भी मेरे पास नहीं। तेरी आवाज़ की खनक अगर मुझे याद होती, तेरे होने की महक मेरे भीतर आबाद होती। मुझे तस्वीर न देखनी पड़ती तुझे बनाने को, काश, मैं तुझे ढूँढ पाती... अपने हृदय में ही सही, तुझे जीवित रख पाती, स्मृतियों का एक कोना होता, जहाँ तुझे समेट पाती। लोगों की कही बातों में नहीं, अपनी यादों में तुझे रख पाती। तेरी कोई धुँधली-सी याद होती, तेरे स्पर्श की कोई अनकही बात होती, तेरी आवाज़ का कोई भूला हुआ स्वर होता, तो शायद तुझसे मेरा रिश्ता कुछ और होता। काश, तेरा चेहरा मेरी स्मृति में ठहरा होता, तेरा नाम मेरे भीतर किसी दीप-सा जला होता। मैं तुझे तस्वीरों में नहीं, अपनी धड़कनों में पहचान पाती... काश तुझे ढूँढ पाती, काश तुझे अपनी स्मृतियों में पा पाती। काश, दुनिया में न सही, कम-से-कम अपने भीतर तुझे बचा पाती। काश... ढूँढ पाती!!! ~ अंशी
दिल करता है तुझसे लिपटकर तुम्हें बताऊं , कितना दर्द होता है तुमसे दूर रहकर जीने में... ~Ashu🙂❤️
Broken is a understatement for feelings like this...So I call it shattering!! ~ Anshi
But why do people treat me like I matter ...only to make me feel otherwise ; ALWAYS?? WHY? ~ Anshi
You think it didn't affect me ..but I cried typing "it's fine" ~ Anshi
मेरी नजरों से गिरने के बाद तुम फलक का चांद बनो या सितारा..मुझे क्या?
मै ठीक ही होती हूं यूं तो, तुम ये प्यार से पूछते हो ना...बस इसीलिए रो देती हु !! ~ अंशी
चटक चाँदनी सी शेरवानी, मूँछों पर वही ताव, माथे पर सजा हुआ तिलक, हाथों में चमकती तलवार। सर पर बँधा वो मोर, चेहरे पर हल्दी का नूर, हाय, कितना पास खड़ा है वो, फिर भी कितना दूर। आज उसकी शादी है, और वो मेरे सामने है, किसी और का होने को सजा है, फिर भी आँखों में कुछ मेरा सा बचा है। नज़रें मिलीं तो वक्त ठहर गया, होंठों पर हर शब्द बिखर गया, दोनों जानते हैं आज के बाद ये पल फिर कहाँ आएगा, ये चेहरा फिर कहाँ इतना पास आएगा। मन करता है पास जाऊँ, तेरी शेरवानी सँवार दूँ, तेरे माथे का तिलक छूकर अपनी सारी उम्र निहार दूँ। सीने से लगा लूँ तुझे, कुछ पल के लिए दुनिया भुला दूँ, तेरे माथे पर आख़िरी चुम्बन रखकर अपना पूरा प्रेम बता दूँ। वो चुम्बन कोई अधिकार नहीं, बस आख़िरी इकरार होगा, जो हमारा था कभी, उस प्रेम का आख़िरी उपहार होगा। तू भी मुझे थामेगा शायद, मैं भी तुझमें सिमट जाऊँगी, आज की इस आख़िरी घड़ी में शायद सारी हदें भूल जाऊँगी। फिर तू मंडप की ओर बढ़ेगा, किसी और का हाथ थामेगा, सात फेरे, सात वचन लेकर उसका जीवन अपना बनाएगा। और मैं यहीं खड़ी रहूँगी, मुस्कुराकर तुझे विदा करूँगी, अपने हिस्से की मोहब्बत को किस्मत के नाम करूँगी। बस एक बार पलटकर देख लेना, मैं आँखों से सब कह दूँगी, फिर तेरी राह से हटकर ख़ुद को तुझसे जुदा कर लूँगी। तू किसी और का हो जाना, मैं तुझे अपना कहूँगी नहीं, तेरी दुनिया में रहकर भी तेरी दुनिया बनूँगी नहीं। बस आज की इस आख़िरी शाम में तुझे जी भरकर देख लूँ, फिर ऐसे ओझल हो जाऊँ जैसे कभी थी ही नहीं। और अगर कभी याद आऊँ, तो बस इतना याद रखना, एक लड़की थी जो तुम्हें अपना मानकर भी तुम्हें किसी और का होते देखती रही। क्योंकि आज तुम्हारी शादी है, और आज ही मेरी मोहब्बत की आख़िरी रात है। ~ अंशी
मनपसंद औरत के हर एक अंग में नशा होता हैं इतना के सर से लेकर पैरों तक चूमा जा सकता हैं.. 💛😌
बीच रास्ते में मुझे छोड़ के जाने वाले, मुझको नफ़रत है तेरे शहर की हर गाड़ी से... ~ ज़हरा करार
ज़ुल्फ़ों में सजाया है उसने गज़रा मोहब्बत का, अब तो हर महक में सिर्फ़ उसी का नाम आता है.. ~ Ashu Kaushik 🌸🤍
बड़े बेरहम होते हैं, ये मनपसंद लोग.. ~ Ashu ❤️🩹🌸
अजीब चल रही है ज़िंदगी मेरी, ना तो मैं खुद से खुश हूँ, और ना ही कोई मुझसे .... 🌸❤️
स्त्रियों की प्रकृति हैं ये जिसको भी उन्होंने हृदय से प्रेम किया उसमें परमात्मा देखा..💛
मेरा नंबर अभी भी वही हैं, जिसमें तुम घंटो बाते किया करती थी.. ❤️🌸
शायरी भी शराब होती हैं और तुम तो अभी नाबालिग हो... 😌😌
तुमने देखा है केवल पुरुषों को गुस्सा करते हुऐ तुमने देखा है पुरुषों को केवल अधिकार करते हुऐ तुमने देखा है केवल पुरुष को कमाते हुऐ तुमने देखा है केवल पुरुष का रोकना ठोकना.. हाँ मगर.. तुमने नहीं देखा कभि पुरुष का प्रेम तुमने नहीं देखी पुरुष की कोमल औथ गहरी आँखें तुमने नहीं देखा पुरुष को त्याग... तुमने नहीं देखा उसका कभी मन तुमने नहीं देखा वह रोक टोक क्यों करता है ? तुमने नहीं समझी उसकी हँसी के पीछे का दर्द तुमने नहीं समझा "ठीक हूँ" के पीछे का अर्थ पुरुष भी अवकाश चाहते हैं वह भी पितृसत्ता से थोङा मुक्त होकर प्रेम चाहते हैं... ~ Ashu Kaushik 🤍🌸
वो जो अपने बाप से नहीं मांगती कुछ, किसी और के बेटे से क्या मांगेगी कुछ ..?? खैर मोहब्बत अलग चीज़ है, बाप से मांगनी नहीं पड़ती, महबूब से भीख भी मांग लो तो नसीब में न आए!!
क्या हाल बना लिया है, अंशी? क्या हाल बना लिया है, अंशी… तुमने अपना? आँखें सुर्ख़ लाल हैं तुम्हारी, मानो कई रातों से नींद नहीं, बस अधूरी चीख़ें पलकों के नीचे ठहरी हों। और गालों पर ये निशान… मानो आँखों ने समंदर उँडेलना सीख लिया हो। आवाज़ कितनी भारी हो गई है तुम्हारी… मानो हर शब्द बोलने से पहले तुम्हें अपने भीतर दफ़्न किसी ख़ामोशी का बोझ उठाना पड़ता हो। और ये हँसी… ये तुम्हारी हँसी तो बिल्कुल नहीं लगती। इतनी खोखली, इतनी थकी हुई… मानो होंठ मुस्कुराने की रस्म निभा रहे हों और दिल कहीं बहुत पीछे बैठा हुआ तुम्हें देख रहा हो। चेहरे पर कैसी उदासी की परत चढ़ी है, अंशी… मानो सारी रौनक़ तुम्हारी आँखों के रास्ते बहकर चली गई हो और पीछे बस एक ख़ामोश-सा चेहरा रह गया हो। और ये हाथ… खाना खाते-खाते यूँ अचानक क्यों रुक जाते हैं? मानो हर निवाला गले से उतारना नहीं, कोई अनकहा दर्द निगलना हो। मानो भूख से ज़्यादा अब मन थक गया हो… मानो शरीर को भोजन चाहिए, मगर भीतर बैठी उदासी हर बार हाथ पकड़कर रोक देती हो। ये तुम नहीं हो, अंशी… तुम तो वो थी जो टूटे हुए शब्दों से भी कविताएँ बना लेती थी, जो अपनी ही राख में से कोई न कोई ख़्वाब चुन लिया करती थी। फिर आज अपनी ही आँखों में इतनी अजनबी क्यों खड़ी हो? ज़रा आईने में देखो तो… ये चेहरा तुम्हारा है, मगर इसमें तुम कहाँ हो? किस मोड़ पर छोड़ आईं ख़ुद को, अंशी? और सबसे ज़रूरी बात.... तुम्हें वापस अपने पास कौन लाएगा, अगर तुम ख़ुद ही अपना हाथ थामना छोड़ दोगi ~ अंशी