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  • Some specimens of the amounts spent on just one-day PR events of Modi.

  • This is why Entire Mainstream Media of India is Slave of the Modi Govt.

  • A reporter says he was SHOCKED when he did an investigative story on drugs issue in Punjab. Instead of going after him like most govts do, the AAP govt suspended the local SHO based on his report and spoke to him for an hour to understand what else it could do.

  • क्या आपको भी लगता है कि 2014 से यही पेटर्न रिपीट हुआ है‍?

  • It is the government of India that is failing India. If it had the will and is as patriotic as it claims to be. Here are 8 ways the gov. could have stopped the cricket. 1. Deny permission – Refuse team clearance to play Pakistan. 2. Refuse security clearance – Cite safety risks for players/fans. 3. Advise BCCI withdrawal – Direct board to boycott fixtures vs Pakistan. 4. Ban sponsors/broadcasters – Make the match commercially unviable. 5. Restrict travel – Bar Indian team from going to unsafe venues. 6. Invoke national security – Issue directive citing Pakistan as adversary. 7. Law & order grounds – Block match citing risk of unrest/protests. 8. Lobby ICC/ACC – Push for exclusion or refusal to play if Pakistan included. The government never had the will. Commercial interests supersede national interests. It is that simple. Keep crying. But don’t blame the cricketers. If you don’t have the guts to question the government, just shut up.

  • “केजरीवाल-सिसोदिया दिल्ली के बच्चों को शराबी बना रहे हैं” केजरीवाल सरकार तो दिल्ली के बच्चों को “शराबी” नहीं बना पाई, पर रेखा गुप्ता सरकार ज़रूर बनाएगी… पिछले 4 सालों से दिल्ली की जिस शराब नीति को बीजेपी नें घोटाला बताया उसमें शराब पीने की उम्र 25 से घटाकर 21 करना प्रस्तावित था। दिल्ली के पड़ोस, यानि नोएडा और गुरुग्राम में ये उम्र पहले से 21 थी, यहाँ पहले से बीजेपी की सरकार थी। फ़िर भी बीजेपी सरकारों की उसी नीति का बीजेपी नें दिल्ली में ख़ूब विरोध किया। फ़ाइनली, केजरीवाल सरकार की शराब नीति में शराब पीने की उम्र में कोई बदलाव नहीं किया गया। पर अब दिल्ली की बीजेपी सरकार शराब पीने की उम्र 25 से घटाकर 21 करने जा रही हैं। अपने पाखंड पर पर्दा डालने के लिए अब बीजेपी कहेगी कि उम्र की छूट केवल “बियर” के लिए है!! तो जैसे भ्रष्टाचार के आरोपी नेता जब बीजेपी में शामिल हो जाते हैं तो वो “भ्रष्टाचारी” नहीं रहते, अब उसी तरह बीजेपी की पालिसी लागू होने के बाद “बियर” को शराब नहीं माना जाएगा… है न ये बीजेपी के दोगलेपन का नया रिकॉर्ड??

  • इस बार सुप्रीम कोर्ट रास्ते में आ रहा है!! 8 नवंबर 2016: मोदी जी ने ख़ुद टीवी पर घोषणा की थी कि उसी रात से ₹500 और ₹1000 के नोट मान्य नहीं होंगे। इसे “नोटबंदी” कहा गया। 24 जून 2025: मोदी जी नहीं, बल्कि चुनाव आयोग ने घोषणा की कि बिहार में वोट देने के लिए अब आधार, राशन कार्ड और मौजूदा वोटर कार्ड मान्य नहीं होंगे। इसे “वोटबंदी” कहा जा रहा है। यानि जो काम 10 साल पहले ख़ुद मोदी जी ने किया वो अब एक इंडिपेंडेंट संवैधानिक संस्था कर रही है, बस उनके एक इशारे पर!! ख़ैर, “नोटबंदी” की विभीषिका तो देश ने देखी और झेली, पर उम्मीद है “वोटबंदी” के तांडव से शायद देश बच जाए। क्यों? क्योंकि इस बार सुप्रीम कोर्ट "पितामह भीष्म" की तरह खामोश रहकर संविधान का चीर हरण होते देखने के मूड में नहीं लग रहा है। पहली ही पेशी में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग अर्थात् मोदी सरकार को बता दिया कि बिना ठोस दलील के वो वोटर लिस्ट के लिए मान्य दस्तावेजों को “पिक एंड चूज” नहीं कर सकते!! वैसे जनता और सुप्रीम कोर्ट के सामने चुनाव आयोग अर्थात् मोदी सरकार की दलील आज भी वही है, जो कल थी- किसी “काले” को कंट्रोल करना। लिहाज़ा जैसे नोटबंदी का “घोषित” मक़सद काले धन को ख़त्म करना था। ठीक उसी तर्ज़ पर "वोटबंदी" यानि स्पेशल इंटेंसिव रिवीज़न का भी “घोषित” मक़सद है “काले भारतीय” यानि ग़ैर क़ानूनी तरीक़े से अपने आप को भारतीय बताकर भारत में रहने वाले लोगों को वोटर लिस्ट से हटाना। और जैसे नोटबंदी देश से "काला धन" ख़त्म नहीं कर पाई उसी तरह वोटबंदी भी "काले नागरिकों" को वोटर लिस्ट से नहीं हटा पाएगी। दस साल पहले देश ने देखा था कि जिनके पास वाक़ई काला धन था, उन्होंने अपनी सेटिंग कर के उसे ठिकाने लगा दिया था। बाद में रिज़र्व बैंक ने भी माना कि लगभग सभी ₹500 और ₹1000 की नोटें वापस आ गए थे। लेकिन अपनी गाढ़ी कमाई, जो कि काला धन नहीं था, उसे ही बैंक से निकालने की अफ़रातफ़री में न जाने कितने मासूमों की जानें गई। और काले धन वाले आराम से अपना धंधा बढ़ाते रहे। अब यही कहानी “वोटबंदी” के नाम पर दोहराने की पूरी तैयारी है। सोचने की बात है कि आख़िर हमारे देश में 10वीं का सर्टिफिकेट जुगाड़ना ज़्यादा आसान है, या आधार कार्ड? पर चुनाव आयोग ने 10वीं के सर्टिफिकेट को अपनी 11 मान्य दस्तावेजों की सूची में रखा था, लेकिन आधार कार्ड को नहीं!! जिन घुसपैठियों के नाम पर ये सारी कवायद हो रही है, और सरकार को शक है की उन्होंने फ़र्ज़ी तरीक़े से आधार कार्ड बनवा रखे हैं, क्या वो किसी दूर दराज़ के बोर्ड से 10वीं का एक सर्टिफिकेट नहीं बनवा सकते? अगर बायोमेट्रिक डेटा वाले आधार कार्ड पर सरकार को भरोसा नहीं है तो फिर पासपोर्ट को छोड़कर बाक़ी 10 डॉक्यूमेंट्स पर कैसे भरोसा किया जा सकता है? तो हक़ीक़त ये है कि दिल्ली और झारखंड के चुनाव में बीजेपी ने जिस तरह से रोहिंग्या- बांग्लादेशी कार्ड खेला था, वही कार्ड बिहार में कुछ अलग तरीक़े से खेलने की मंशा है। चूँकि बिहार में सालों से डबल इंजन की सरकार है तो तथाकथित घुसपैठियों को बसाने की बात कह नहीं सकते, इसलिए बीजेपी उन्हें वोटर लिस्ट से "हटाने" का दावा करेगी। पर जैसे नोटबंदी में कोई काले धन वाला सेठ-साहूकार लाइनों में नहीं खड़ा हुआ था, उसी तरह से वोटबंदी में भी कोई रोहिंग्या- बांग्लादेशी नहीं बल्कि देश का ग़रीब ही एक बार फ़िर ज़िल्लत झेलेगा। उम्मीद है सुप्रीम कोर्ट इस बार मोदी सरकार की मनमानी रोकेगी…

  • HISTORIC FIRST: Punjab exports LITCHIs now 1️⃣ *London* : Started in 2024 - Exported via Amritsar’s cargo facility - Fetched 500% of Market Price India 2️⃣ *UAE & Qatar* : Litchi export started in 2025 - Exported to Lullu Group Details 👇 https://aamaadmiparty.wiki/Achievements/Punjab/LitchiPromotion

  • क्या अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया को जेल भेजना भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ कारवाई थी? क्या अब तथाकथित क्लासरूम घोटाला, अस्पताल घोटाला भ्रष्टाचार निवारण अभियान है? क्या पिछले 11 सालों में मोदी सरकार का एक भी क़दम भ्रष्टाचार ख़त्म करने के लिए था? सभी का जवाब है, बिल्कुल नहीं!! न तो बीजेपी के बड़े इंजन, और न ही छोटे इंजन की सरकार भ्रष्टाचार मुक्त भारत या दिल्ली चाहती है। अगर भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ मोदी सरकार ने एक रत्ती भी काम किया होता तो इसके दो निश्चित परिणाम होते: पहला, सरकारी कर्मचारी आम जनता से इज़्ज़त से पेश आते और बिना रिश्वत के काम होता। दूसरा, महँगाई इस कदर न होती क्योंकि व्यापारियों को नेताओं-अधिकारियों को कमीशन और पार्टियों को नजायज़ चंदा न देना होता। इसलिए ख़ुद से पूछिये, क्या पिछले 11 सालों में आपका काम, चाहे वो सरकारी दफ़्तर में हो या पुलिस स्टेशन में, बिना किसी को रिश्वत दिए हुआ है? और ये भी पूछिये अपने आप से कि पिछले दशक में आपकी सैलरी जितनी बढ़ी है, क्या उससे कम दर से आपकी ज़रूरत वाली चीज़ों के दाम बढ़े हैं? अगर एक का भी जवाब “न” है तो पूछिये मोदी सरकार से कि भ्रष्टाचार के नाम पर CBI, ED, IT, ACB के खेल से जनता को क्या मिला? भ्रष्टाचार के नाम पर बीजेपी की राजनीति तो ख़ूब चमकी पर आम जनता के जीवन पर इसका क्या असर पड़ा? क्या देश के किसी भी विभाग में पहले से चल रहे भ्रष्टाचार में एक रुपये की भी कमी आई? ऐसा नहीं है की देश में भ्रष्टाचार पर लगाम नहीं लगाई जा सकती। केजरीवाल सरकार ने अपने 49 दिनों के शासन में यही किया था। भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ 2013 में केजरीवाल सरकार का कदम ऐसा था जिससे आम जनता को राहत मिली, उनके काम बिना बाबुओं को रिश्वत दिए होने लगे थे। पर उसे मोदी सरकार ने चलने नहीं दिया। क्यों? क्योंकि मोदी सरकार देश से भ्रष्टाचार हटाना ही नहीं चाहती, उसे तो सिर्फ़ भ्रष्टाचार का तमग़ा एक हथियार के रूप में अपने राजनैतिक विरोधियों के ख़िलाफ़ इस्तेमाल करना है। और हो भी क्यों न.. आख़िर जब भ्रष्टाचार की काल्पनिक कहानी सुनाने से ही मोदी सरकार और बीजेपी का काम चल जाता है तो फ़िर सचमुच के भ्रष्टाचार को हटाने की क्या ही ज़रूरत!! और अब तो इसी गुरुमंत्र के सहारे दिल्ली में बीजेपी की छोटे इंजन वाली सरकार भी एसीबी के ज़रिए अपने विरोधियों के काल्पनिक भ्रष्टाचार की कहानी सुनाने में लग गई है… इसलिए जब तक बीजेपी का ये सर्कस चल रहा है तब तक आम जनता रिश्वत देकर और महंगाई झेलकर अपना काम चलाती रहे!!

  • 100 दिन शिक्षा के नाम पर, दिल्ली की बीजेपी सरकार के राज में, अब तक... क्या हुआ? -स्कूल ऑफ़ स्पेशलाइज्ड एक्सीलेंस की जगह सीएम-श्री स्कूल बनाए जायेंगे -हैप्पीनेस करिकुलम हटा कर साइंस ऑफ़ लिविंग लागू होगी -देशभक्ति करिकुलम नहीं, राष्ट्रनीति पढ़ाई जाएगी -बिज़नेस ब्लॉस्टर का पुनर्जन्म, नीव के रूप में होगा नोट: ये बदलाव सिर्फ़ नाम का नहीं है, ये शुरुआत है सरकारी स्कूलों को वापस 2015 से पहले वाले ढर्रे पर ले जाने की!! क्या नहीं हुआ? -प्राइवेट स्कूलों की मनमानी फीस के ख़िलाफ़ न तो विधानसभा में कोई बिल आया, न ही अध्यादेश जारी हुआ -बोर्ड रिजल्ट्स आने के हफ्तों बाद तक मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री ने सरकारी स्कूलों के बच्चों की कोई सुध नहीं ली -सरकारी स्कूलों के बोर्ड परीक्षा में परफ़ॉर्मेंस की कोई रिपोर्ट ज़ारी नहीं हुई वैसे ये कोई शिकवा-शिकायत नहीं है क्योंकि इसी बदलाव का तो वादा किया था बीजेपी ने, अब बदलाव सबके सामने है...

  • कल JEE-Advanced का रिज़ल्ट आया, दिल्ली सरकार के स्कूलों से कितने बच्चे सलेक्ट हुए, पता नहीं.. पिछले साल 158 बच्चे सलेक्ट हुए थे। दो महीने पहले JEE-Mains का रिज़ल्ट आया था, दिल्ली सरकार के स्कूलों से कितने बच्चे सलेक्ट हुए, अभी तक नहीं पता.. पिछले साल 783 बच्चे सेलेक्ट हुए थे। पिछले महीने बोर्ड परीक्षा के रिजल्ट्स आए थे, दिल्ली सरकार के स्कूलों का क्या परफॉरमेंस रहा, कोई ख़बर नहीं.. पिछले साल 12वीं में 97% और 10वीं में 94% रिजल्ट्स था। आख़िर इतनी खामोशी क्यों है? क्या ये सिर्फ़ बीजेपी सरकार की उदासीनता है, या फिर से सरकारी स्कूलों को हाशिए पर भेज कर प्राइवेट स्कूलों के लिए बाज़ार तैयार करने की मंशा?

  • आज इतिहास बना है। पंजाब के सरकारी स्कूलों के 32 बच्चों ने JEE एडवांस जैसे देश के सबसे कठिन एग्ज़ाम को पास कर लिया है ….और अब ये बच्चे IITs में पढ़ेंगे। कल तक पंजाब के जिन सरकारी स्कूलों में दीवारें तक नहीं थीं, आज वहाँ से बच्चों के सपने उड़ान भर रहे हैं … सीधा IIT तक। इन बच्चों की कहानियाँ ही इस बदलाव की सबसे बड़ी मिसाल हैं … - अर्शदीप, जिसकी माँ एक सफाई कर्मचारी हैं और अकेले ही बेटे को पढ़ा रही हैं। - जसप्रीत, जिसके पिता की महीने की आमदनी सिर्फ़ ₹7000 है। - लखविंदर, जो एक दलित परिवार से है और आज पूरे समाज के लिए प्रेरणा बन गया है। यह कोई संयोग नहीं है। यह @ArvindKejriwal और @BhagwantMann की सरकार का शिक्षा मॉडल है। जहाँ अच्छी शिक्षा सिर्फ कुछ खास का विशेषाधिकार नहीं, बल्कि हर गरीब, किसान, मज़दूर, दलित, पिछड़े वर्ग के बच्चे का हक़ है। यह कोई आंकड़ा नहीं … यह एक क्रांति है। जात, धर्म, वर्ग और गरीबी से परे .. हर बच्चे को समान अवसर देने की क्रांति। पंजाब बदल रहा है। अब गरीब का बच्चा भी कह सकता है - मेरा सपना IIT है, और मैं उसे हासिल कर सकता हूँ।

  • दिल्ली के एलजी साहेब के आदेश पर डीडीए ने सैकड़ों पेड़ काट दिए। सुप्रीम कोर्ट बहुत नाराज़ हुई। नतीज़ा - एलजी साहेब दोष मुक्त, अधिकारियों पर जुर्माना! दिल्ली की एक कोर्ट दिल्ली पुलिस से कपिल मिश्रा की दिल्ली दंगों से संबंधित जाँच में सुस्ती पर नाराज़ है। नतीज़ा- सुस्त जाँच ज़ारी है, कपिल मिश्रा बाइज्जत मंत्री पद पर क़ायम हैं! गुल्फ़िशा फ़ातिमा से कोई भी कोर्ट नाराज़ नहीं है। नतीज़ा- गुल्फ़िशा पिछले पाँच सालों से जेल में है। उनकी ज़मानत याचिका दिल्ली हाई कोर्ट में लंबित है। ये कौतूहल का विषय है कि आख़िर जब कोर्ट नाराज़ होती है तो क्या करती है? कुछ कह नहीं सकते। शायद ये देखती है की सामने कौन खड़ा है!! इसी को समझने के लिए जॉर्ज ऑरवेल ने अपनी किताब “एनिमल फ़ार्म” में लिखा था: “ऑल एनिमल्स आर इक्वल, बट सम एनिमल्स आर मोर इक्वल देन द अदर्स” अर्थात् सब जानवर बराबर हैं, पर कुछ जानवर बाक़ी सभी से ज़्यादा बराबर हैं...

  • बड़ी बड़ी इमारत बनाते हुए मज़दूरों और उसके आस पास धूल में खेलते उनके छोटे छोटे बच्चों को देखकर अक्सर ये ख़्याल आता था: “ये इमारत, इसे बनाने वाले मज़दूरों या उनके बच्चों के लिए नहीं है, शायद वो कभी इसमें क़दम भी न रख सकेंगे” पर मनीष सिसोदिया के साथ दिल्ली सरकार के निर्माणाधीन स्कूलों की विजिट के दौरान ये भाव नहीं होता था। क्योंकि वहाँ खेलते हुए मज़दूरों के बच्चों की आँख में आँख डालकर हम ये कह पाते थे: “बच्चों आप के माँ- बाप जो आलीशान इमारत बना रहे हैं, वो आप के लिए है, आपका स्कूल है। यहाँ की एक एक ईंट आपकी ज़िंदगी को नई ऊँचाई देगी।" बस यही था दिल्ली शिक्षा क्रांति का मक़सद- मज़दूर का बच्चा मज़दूर बनने के लिए मज़बूर न हो!! वो भी सम्मान और समानता के साथ स्कूल जाए। वो भी अच्छे से पढ़े, खुलकर हँसे, खेले, बेख़ौफ़ बड़े बड़े सपने देखे और उसे पूरा करे। अब आज के हुक्मरान इसे न समझ सकें तो इसमें उनका कोई दोष नहीं है। इस भाव को समझने के लिए जो कलेजा चाहिए, वो है ही नहीं उनमें…

  • झारखंड में तथाकथित शराब घोटाला हुआ, आबकारी विभाग के प्रमुख सचिव और जॉइंट कमिश्नर जेल गए। दिल्ली में तथाकथित शराब घोटाला हुआ, एक भी अधिकारी जेल नहीं गया!! दिल्ली में जेल कौन गया- तत्कालीन मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री और राज्यसभा सांसद… सीबीआई और ईडी की माने तो मनीष सिसोदिया ने "बोला", संजय सिंह ने "टाईप किया", अरविंद केजरीवाल ने "साईन किया" और बन गई दिल्ली की नई शराब नीति, न कोई आगे, न कोई पीछे!! वहीं झारखंड में आरोप ये है कि वहाँ के आबकारी विभाग नें छत्तीसगढ़ के शराब कारोबारियों से मिलीभगत करके, ऐसी शराब नीति बनाई जिससे सरकारी ख़ज़ाने को करोड़ों का नुक़सान हुआ। कुछ सुना सुना लग रहा है न, दिल्ली जैसा? लेकिन झारखंड के केस में आरोप के दायरे में अधिकारी हैं, न कि झारखंड या छत्तीसगढ़ के मंत्री/मुख्यमंत्री/सांसद!! पर दिल्ली के केस में लगता है जैसे सभी अधिकारी उन दिनों लंबी छुट्टी पर थे लिहाज़ा नई शराब नीति तीन नेताओं ने अकेले बनाई, बनाने के बाद इन्हीं तीनों ने लागू भी की और इन्हीं तीनों ने करोड़ों का वारा न्यारा भी किया!! एक बात और। झारखंड राज्य है। आसान नहीं है किसी भी अधिकारी का अपने मंत्री या मुख्यमंत्री की बात न मानना, या ख़ुद इतना बड़ा नीतिगत निर्णय लेना। फ़िर भी जब जाँच और कारवाई होती है तो सबसे पहले अधिकारियों पर गाज गिरती है, सीधे मंत्री या मुख्यमंत्री पर नहीं। दिल्ली राज्य नहीं है। और तो और, 2015 से लेकर 2023 तक केंद्र की बीजेपी सरकार ने नोटिफिकेशन और क़ानून के ज़रिए, दिल्ली के मंत्री और मुख्यमंत्री के अधिकार भी एलजी को दे दिए। यही नहीं, अप्रैल 2021 में देश की संसद ने केंद्र की बीजेपी सरकार के उस संशोधन प्रस्ताव को मंज़ूरी दी जिसके तहत “दिल्ली सरकार का मतलब उपराज्यपाल” है। तो दिल्ली में अधिकारी अपने मंत्री और मुख्यमंत्री के किसी भी आदेश को मानने के लिए बाध्य नहीं थे। और एलजी भी कैबिनेट की “ऐड एंड एडवाइज़” के बग़ैर निर्णय ले सकते थे। ऐसे में उसी दिल्ली के दर्जनों अधिकारियों ने बिना अपना दिमाग़ लगाए नई शराब नीति की फाइल पर आँख बंद करके क्यों साइन किया? और फ़िर एलजी साहेब ने भी, जो वैसे तो हर बात में अड़ंगा लगाते थे, पर नई शराब नीति को क्यों मंज़ूरी देकर नोटिफिकेशन के आदेश दिए? और फिर जब जाँच होती है, कारवाई होती है तो कोई भी अधिकारी जेल नहीं जाता, और न ही तत्कालीन एलजी से कोई पूछताछ होती है! और जेल कौन जाता है- तत्कालीन मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री और राज्यसभा सांसद… है न कमाल? तो दिल्ली में हुए इस कमाल के बाद भी है कोई जिसे लगता है कि दिल्ली का शराब घोटाला सिर्फ एक राजनैतिक साज़िश नहीं थी?

  • इस साल दिल्ली सरकार के स्कूलों का बोर्ड परीक्षा रिजल्ट्स कैसा रहा? 2016 से 2024 तक ये ज़वाब सीबीएसई द्वारा रिजल्ट्स घोषित होने के चंद घंटों में मिल जाता था। इस बार 4 दिन बाद भी नहीं है!! यही नहीं, अगले दिन के अख़बार दिल्ली सरकार के स्कूलों के परफॉरमेंस और बच्चों को बधाई संदेश से भरे होते थे। इस बार ऐसा कुछ नहीं हुआ। दिल्ली की बीजेपी सरकार ने इस बार 10वीं और 12वीं के दिल्ली सरकार के स्कूलों के नतीजों को अलग से जारी नहीं किया!! आख़िर क्यों दिल्ली की बीजेपी सरकार इन आंकड़ों को जनता के सामने नहीं लाना चाहती? शायद इसलिए क्योंकि 2025 का रिजल्ट्स पिछली सरकार के टर्म का आख़िरी रिज़ल्ट है। इस रिजल्ट का जो भी क्रेडिट है वो पिछली सरकार का है। पर हाँ, 2025 का रिजल्ट बीजेपी सरकार का बेसलाइन ज़रूर है। इसे मेंटेन रखने या आगे ले जाने की ज़िम्मेदारी नई सरकार पर है। और शायद बीजेपी सरकार कॉन्फ़िडेंट नहीं है कि जो लकीर आप सरकार ने खींची है, वो उससे बड़ी लकीर खींच पाएगी। इसलिए ये खामोशी है!! बता दें कि जब केजरीवाल सरकार ने दिल्ली की कमान संभाली थी तो उस साल, यानि उनके बेसलाइन साल में दिल्ली सरकार के स्कूलों का 12वीं का रिज़ल्ट क्या था: -2015 में 1.4 लाख बच्चों में से 88% पास हुए थे -2024, यानि पिछले साल, 1.51 लाख बच्चों में से 97% पास हुए थे -और 2025, अभी पता नहीं… ख़ैर, मुद्दा सिर्फ़ आंकड़ों का नहीं है, ये बीजेपी सरकार की संवेदनहीनता का मसला है। दिल्ली सरकार के लगभग एक हज़ार स्कूल हैं। इस स्कूलों में तीन लाख से ज़्यादा बच्चों ने इस बार 10वीं और 12वीं की परीक्षा दी थी। रिज़ल्ट आया, बहुत सारे बच्चे सफ़ल हुए, कुछ असफल भी हुए होंगे। क्या दिल्ली की मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री का फ़र्ज़ नहीं बनता की वो अपनी ही सरकार के स्कूलों के बच्चों के लिए दो शब्द बोल दें? या कुछ न कह कर वो दिल्ली को संदेश देना चाहते हैं कि अब 2015 से पहले की तरह फ़िर से दिल्ली सरकार के स्कूल, दिल्ली सरकार की प्राथमिकता नहीं होंगे? और दिल्ली सरकार के स्कूलों और उनमें पढ़ने वाले बच्चों के प्रति मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री का कोई भावनात्मक लगाव नहीं होगा? अपने ही बच्चों के साथ कोई ऐसा व्यवहार नहीं करता। उम्मीद है बीजेपी सरकार कम से कम बच्चों के मामले में दलगत राजनीति से ऊपर उठने की कोशिश करेगी…

  • “मेरे बच्चों का सिस्टम पर से विश्वास उठ गया है” ये कहना है उस पिता का, जिसके 2 बच्चे उन 32 बच्चों में हैं जिन्हें DPS द्वारका ने स्कूल से निकाल दिया। ये बच्चे अपने पेरेंट्स से पूछते हैं कि: -आज कोर्ट में क्या हुआ -वो कल स्कूल जा सकेंगे या नहीं -टीचर उन्हें क्लास में बैठने देंगी की नहीं -वो अपने दोस्तों से मिल पाएंगे या नहीं -जब वो स्कूल वापस जायेंगे तो बाक़ी बच्चे उनका मज़ाक़ तो नहीं बनायेंगे… अब दिल्ली हाई कोर्ट का निर्णय चाहे जो हो, इन मासूम बच्चों के दिलों पर जो घाव लगा है, वो आसानी से नहीं भरेगा। ये बच्चे पढ़ना ही तो चाहते हैं न, उस स्कूल में जहाँ वो सालों से पढ़ रहे थे, जहाँ उनके दोस्त है!! और ये तंगदिल व्यवस्था इन 32 बच्चों को प्यार और सम्मान के साथ उनका स्कूल भी उन्हें नहीं दे सकती? शिक्षा का अधिकार क़ानून कहता है कि किसी भी बच्चे को 8 वीं क्लास तक की पढ़ाई पूरी होने तक किसी भी परिस्थिति में स्कूल नहीं निकाल सकता!! तो फ़िर 5 वीं में पढ़ने वाले बच्चे को DPS द्वारका ने कैसे स्कूल से निकाल दिया? दिल्ली की बीजेपी सरकार ने तो DPS द्वारका की जाँच के नाम पर डीएम को भेज कर राजनैतिक खानापूर्ति कर दी, पर बच्चे तो अपनी क्लास से बाहर ही रहे!! अगर दिल्ली की बीजेपी सरकार वाक़ई बच्चों की हितैषी होती, तो मजाल नहीं है कि कोई भी स्कूल बच्चों को इस तरह मानसिक यातना देने की सोचे भी। ज़्यादा पुरानी बात नहीं है जब दिल्ली बाल अधिकार आयोग ख़ुद इतना सक्षम था कि कोई प्राइवेट स्कूल किसी भी बच्चे को आँख न दिखा सके, और आज दिल्ली सरकार के डीएम भी “पॉवरलेस” हैं!! आख़िर क्या चाहते हैं ये बच्चे? पढ़ना, और पढ़ाई के लिए इतनी जद्दोजहद, इतनी बेबसी? लानत है ऐसी व्यवस्था पर!! और ये बातें करते हैं राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर अमल करने की, भारत को विश्वगुरु बनाने की…

  • मोदी जी महान हैं भले ही वो भारतीय सेना में 1 लाख 80 हज़ार जवानों की संख्या कम कर दें। मोदी जी महान हैं भले ही वो अग्निवीर योजना लाकर जवानों की नौकरी 4 साल कर दें। मोदी जी महान हैं भले ही वो तीन गुना ज़्यादा दाम में राफ़ेल ख़रीदें मोदी जी महान हैं भले ही वो सूट बदल बदल कर पूरी दुनिया की सैर करें लेकिन वक़्त पड़ने पर एक भी देश समर्थन के लिए आगे न आये। मोदी जी महान हैं जिस देश में वो जाते हैं देश का भला हो न हो अडानी को ठेका ज़रूर दिलाते हैं। मोदी जी महान हैं भले ही वो पाकिस्तान को हथियार देने वाले चीन को लाखों करोड़ का व्यापार दें। मोदी जी महान हैं भले ही वो सर्वदलीय बैठक से ग़ायब रहकर बिहार की चुनावी रैली संबोधित करते हैं। मोदी जी महान हैं भले ही वो POK पर कब्जा और बलूचिस्तान को पाकिस्तान से अलग कराने सुनहरा मौक़ा गवाँ दें। मोदी जी महान हैं भले ही वो पहलगाम में हमारी बहनों का सिंदूर उजाड़ने वाले दरिंदे आतंकवादियों को न मार पायें मोदी जी महान हैं भले ही वो आतंकवादी देश पाकिस्तान पर भरोसा कर लें मोदी जी महान हैं भले ही वो बहादुर भारतीय सेना को ट्रम्प के दबाव में सीजफायर करके रोक दें मोदी जी महान हैं भले ही वो तीसरे देश की मध्यस्थता स्वीकार कर लें। मोदी जी महान हैं भले ही वो ट्रम्प के व्यापार बंद करने की धमकी के कारण सीजफायर कर दें। मोदी जी, “हमने तो सोचा था आप लीडर हैं,आप तो डीलर निकले”

  • हमेशा से अंतर्राष्ट्रीय समुदाय भारत और पाकिस्तान का नाम एक साथ, एक सुर में लिया करता था। यहाँ तक कि पश्चिमी देशों के राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री जब भारत आते, तो उसी ट्रिप में पाकिस्तान भी जाते थे। अंतर्राष्ट्रीय संबंध की भाषा में इस अनचाहे गठजोड़ को hyphenated relation (-) कहते हैं। प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी और डॉ. मनमोहन सिंह ने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की भारत और पाकिस्तान को hyphenated चश्मे से देखने की आदत छुड़वा दी थी। पिछले तीन दशकों में जहाँ भारत हर क्षेत्र में आगे बढ़ा, वहीं पाकिस्तान पश्चिमी देशों के “गंदे काम” करने में उलझा रहा.. इस दौरान भारत न सिर्फ़ आर्थिक महाशक्ति के रूप में विश्वपटल पर उभरा बल्कि सामान्य जनता के जीवन स्तर में भी खासा सुधार हुआ, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार हुआ। साथ ही सरकार में धर्म और सेना का कोई दख़ल न होना, समय पर निष्पक्ष चुनाव और शांतिपूर्ण सत्ता परिवर्तन की वजह से भारत आम पढ़े-लिखे पाकिस्तानियों की नज़र में भी एक रोल मॉडल के रूप में उभरा। इन वजहों से अंतर्राष्ट्रीय जगत को भी मानना पड़ा कि भारत को पाकिस्तान के साथ जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। लिहाज़ा दोनों देशों के बीच रिश्ता de-hyphenated हो गया। और फ़िर 2014 में भारत को नरेंद्र मोदी के रूप में मिले एक "यशस्वी" प्रधानमंत्री। इन्होंने दिन रात “मेहनत” करके फ़िर से भारत को पाकिस्तान के बराबर खड़ा कर दिया… मोदी जी को ये लगता रहा कि अंतर्राष्ट्रीय पटल पर भारत की जो इज़्ज़त है वो इन्होंने अपनी तथाकथित छप्पन इंच की छाती, बड़बोले भाषणों और विदेशी नेताओं के साथ सेल्फी के बल पर अर्जित की है!! मोदी जी और इनके द्वारा पोषित मीडिया और भक्तों की ज़मात कभी नहीं मानेगी की अभी जिन परिस्थियों में पाकिस्तान के साथ भारत का "सीज़फायर" हुआ है, वो देश के स्वाभिमान पर बहुत बड़ी चोट है। आज भारत की हैसियत फ़िर से पाकिस्तान के बराबर हो गई है। अमेरिका के राष्ट्रपति एक साथ, एक सुर में फ़िर से भारत-पाकिस्तान का नाम ले रहे हैं। वो भारत और पाकिस्तान को एक साथ, एक ही लालच, और एक ही धमकी के बूते पर अपनी बात मनवाने का दावा कर रहे हैं। ये किसी भी स्वाभिमानी भारतीय के लिए त्रासदी से कम नहीं है!! अफ़सोस ये भी है कि कई दशकों की मेहनत से कमाई देश की इज़्ज़त को मिट्टी में मिलाने के बाद इन्हें एक बूँद भी शर्म नहीं आ रही है...

  • जिस दिन बीजेपी सरकार प्राइवेट स्कूलों की फीस पर क़ानून लाने वाली थी, उसी दिन 34 बच्चों को फ़ीस न देने पर प्राइवेट स्कूल नें निकाल दिया.. 13-14 मई को दिल्ली विधानसभा का दो दिनों का विशेष सत्र होने वाला था। इस सत्र में प्राइवेट स्कूलों की फीस रेगुलेट करने के लिए दिल्ली की बीजेपी सरकार एक क़ानून लाने वाली थी। अचानक एक दिन पहले विधानसभा का ये सत्र कैंसिल कर दिया जाता है!! और उसी दिन DPS द्वारका, जिसकी जाँच माननीय शिक्षा मंत्री जी ने डीएम से करवाई थी, 34 बच्चों को बढ़ी हुई नाजायज़ फ़ीस न देने के कारण स्कूल से निकाल देता है!! क्या ये क्रोनोलॉजी महज़ एक इत्तेफ़ाक़ है??