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वंदे मातरम #Bharat #Hindu

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  • RSS के स्कूल में पढ़े तो कोई दिक्कत नहीं थी, लेकिन आज RSS की विचारधारा से जुड़े हैं तो सवाल उठ रहे हैं! 🤔

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  • श्यामलाल गुप्त “पार्षद” का जन्म 16 सितंबर 1893 को उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले के नर्वल कस्बे में एक वैश्य परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम विश्वेश्वर प्रसाद और माता का नाम कौशल्या देवी था। बचपन से ही देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत पार्षद जी ने अपने पारिवारिक व्यवसाय को अपनाने से मना कर दिया और अध्यापन को अपना पेशा चुना। उन्होंने कानपुर के विभिन्न विद्यालयों में अध्यापन कार्य किया। इसके साथ ही वे देश के स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रूप से कूद पड़े। उन्होंने 'सचिव' नामक एक मासिक पत्र का संपादन और प्रकाशन किया, जिसके माध्यम से वे लोगों में आजादी की अलख जगाते थे। उन्होंने वर्ष 1924 में अपने सबसे प्रसिद्ध देशभक्ति गीत ‘विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झण्डा ऊँचा रहे हमारा’ की रचना की थी। इस प्रेरक गीत ने स्वतंत्रता सेनानियों में अभूतपूर्व जोश भरने का काम किया। उनकी इस महान कृति की महत्ता को देखते हुए वर्ष 1938 के हरिपुरा कांग्रेस अधिवेशन में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की अध्यक्षता में इसे देश के आधिकारिक 'झंडा गीत' के रूप में स्वीकार किया गया था। पार्षद जी जीवनभर सादगी और राष्ट्रसेवा के सिद्धांतों पर चले। स्वतंत्रता के बाद भी उन्होंने किसी राजनीतिक पद की लालसा नहीं की और समाज सेवा में लगे रहे। देश के प्रति उनके इसी निस्वार्थ समर्पण, स्वतंत्रता आंदोलन में दिए गए योगदान और अमूल्य साहित्य सेवा के लिए भारत सरकार ने उन्हें वर्ष 1969 में देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान पद्म श्री से नवाजा था। 10 अगस्त 1977 को 83 वर्ष की आयु में इस महान राष्ट्रभक्त और कवि का निधन हो गया। उनके सम्मान में भारतीय डाक विभाग ने वर्ष 1997 में एक विशेष स्मारक डाक टिकट भी जारी किया था। 🩵 टेलीग्राम चैनल https://telegram.me/jambudweepe 💚 व्हाट्सएप चैनल https://whatsapp.com/channel/0029VaABPDO9Gv7QsuzvhR1H 💛 अराटाई चैनल https://aratt.ai/@lokeshkushwaha

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  • केरल में कांग्रेस नीत यूडीएफ की सरकार बनते ही युवाओं के साथ हुआ वादाखिलाफी का खेल उजागर होने लगा है। सत्ता परिवर्तन के दावों के बीच मुख्यमंत्री वी. डी. सतीशन के नेतृत्व में चल रही सरकार ने राज्य के शिक्षित बेरोजगारों की समस्याओं पर पूरी तरह आंखें मूंद ली हैं। केरल में युवाओं और छात्रों का जारी आक्रोश तथाकथित 'केरल मॉडल' के प्रशासनिक तंत्र की जमीनी सच्चाई उजागर करता है। प्रदेश में प्रतियोगी परीक्षाओं की अनिश्चितता, बैकडोर नियुक्तियों और पीएससी (PSC) में भ्रष्टाचार से तंग आकर छात्र और युवा सड़कों पर उतरकर अपना विरोध दर्ज करा रहे हैं। हाल ही में छात्रों ने अपनी बेबसी और आक्रोश व्यक्त करने के लिए मुख्यमंत्री वी. डी. सतीशन के आवास के सामने मुंह में घास दबाकर सांकेतिक विरोध प्रदर्शन किया। जब राज्य का शिक्षित युवा अपनी जायज मांगों और पारदर्शी रोजगार प्रक्रिया के लिए सड़कों पर घास खाने जैसी नौबत तक आ जाए, तो यह पूरी व्यवस्था के पतन और युवाओं के प्रति संवेदनहीनता को दर्शाता है। तथाकथित केरल मॉडल की आर्थिक विसंगति और युवाओं के शोषण का आलम यह है कि स्वास्थ्य महकमे में एक एमबीबीएस डॉक्टर का संविदा मानदेय मात्र 20 हजार रुपये तय किया जा रहा है। कड़े संघर्ष और विशेषज्ञता हासिल करने वाले डॉक्टरों को सफाई कर्मचारियों से भी कम वेतन पर रखने की यह नीति न केवल मेडिकल पेशे का अपमान है, बल्कि यह साफ दर्शाती है कि कांग्रेस सरकार युवाओं और पेशेवरों के भविष्य के साथ किस तरह का खिलवाड़ कर रही है। संविदा प्रथा के नाम पर हो रहा यह आर्थिक शोषण राज्य के प्रशासनिक तंत्र और कांग्रेस की रोजगार नीतियों के खोखलेपन को पूरी तरह नंगा करता है। इन सब गंभीर अनियमितताओं के बावजूद कांग्रेस सरकार की नाकामी और युवाओं के हो रहे दमन पर मीडिया और तथाकथित बुद्धिजीवियों की खामोशी सबसे बड़ा सवाल खड़ा करती है। जब राज्य के युवा अपनी नौकरी और आत्मसम्मान के लिए सड़कों पर प्रतीकात्मक रूप से घास खाने को विवश हैं, तब सरकार जनहित के मुद्दों से मुंह मोड़कर पूरी तरह संवेदनहीन बनी हुई है। पारदर्शी तंत्र देने के नाम पर सत्ता में आई कांग्रेस की यह कार्यशैली यह साबित करती है कि व्यवस्था में कोई सुधार नहीं हुआ है, बल्कि युवाओं का शोषण और सरकारी भर्तियों में भ्रष्टाचार बदस्तूर जारी है। 🩵 टेलीग्राम चैनल https://telegram.me/jambudweepe 💚 व्हाट्सएप चैनल https://whatsapp.com/channel/0029VaABPDO9Gv7QsuzvhR1H 💛 अराटाई चैनल https://aratt.ai/@lokeshkushwaha

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  • 80वें स्वतंत्रता दिवस पर पहली बार लाल किले की प्राचीर से गाया जाएगा 'वंदे मातरम' भारत का 80वां स्वतंत्रता दिवस 15 अगस्त को मनाया जाएगा। इस बार लालकिले पर Gen-Z की छाप छाई रहेगी, सरकार ने इसके लिए प्लान तैयार कर लिया है। दिल्ली में स्वतंत्रता दिवस समारोह में युवाओं के योगदान के लिए 'युवा शक्ति' को भी सम्मानित किया जाएगा। पहली बार लाल किले की प्राचीर से राष्ट्रगान 'वंदे मातरम' गाया जाएगा। --- लोकेश कुशवाहा 🩵 टेलीग्राम चैनल https://telegram.me/jambudweepe 💚 व्हाट्सएप चैनल https://whatsapp.com/channel/0029VaABPDO9Gv7QsuzvhR1H 💛 अराटाई चैनल https://aratt.ai/@lokeshkushwaha

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  • देश की सिर्फ 32% खानपान वाली जगह ही हाइजीनिक : सर्वे हाल ही में 'लोकल सर्कल्स' की एक सर्वे रिपोर्ट सामने आई है। इस रिपोर्ट में सामने आया है कि केवल 32% लोगों ने ही अपने शहर या इलाके के एयर कंडीशंड रेस्टोरेंट की साफ-सफाई और फूड सेफ्टी को अच्छा या बहुत अच्छा बताया। वहीं, 42% लोगों ने इसे औसत माना है, जबकि 9% ने खराब या बहुत खराब बताया है। इस सर्वे में देश के 244 जिलों के 91 हजार से ज्यादा लोगों ने हिस्सा लिया। इनमें 64% पुरुष और 36% महिलाएं थीं, जिसमें से करीब 47% लोग टियर-1 सिटी से, 33% लोग टियर-2 सिटी से और 20% लोग टियर-3 एंड 4 सिटी से थे। --- लोकेश कुशवाहा 🩵 टेलीग्राम चैनल https://telegram.me/jambudweepe 💚 व्हाट्सएप चैनल https://whatsapp.com/channel/0029VaABPDO9Gv7QsuzvhR1H 💛 अराटाई चैनल https://aratt.ai/@lokeshkushwaha

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  • आयुष्मान भारत योजना में बड़ा एक्शन फर्जीवाड़े और नियमों के उल्लंघन पर 2,359 अस्पताल योजना से बाहर, 1,200 अस्पताल निलंबित आयुष्मान भारत-PMJAY में संदिग्ध क्लेम, अनधिकृत बिलिंग और अन्य नियमों के उल्लंघन पर सरकार की बड़ी कार्रवाई। 📍29 FIR दर्ज 📍 ₹328.49 करोड़ का जुर्माना 📍 AI और मशीन लर्निंग से संदिग्ध क्लेम की निगरानी आयुष्मान कार्ड से इलाज कराने वाले मरीज अस्पताल का मौजूदा एम्पैनलमेंट स्टेटस जरूर जांचें। --- लोकेश कुशवाहा 🩵 टेलीग्राम चैनल https://telegram.me/jambudweepe 💚 व्हाट्सएप चैनल https://whatsapp.com/channel/0029VaABPDO9Gv7QsuzvhR1H 💛 अराटाई चैनल https://aratt.ai/@lokeshkushwaha

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  • एक तस्वीर झारखंड के स्टूडेंट कृष्णा की है, जो आज पुलिस के लाठीचार्ज में बुरी तरह घायल है और इस हालात में इसे हॉस्पिटल भर्ती कराया गया है और दूसरी तस्वीर झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के ट्वीट की है। मुख्यमंत्री आज जो कुछ हुआ उसके लिए पुलिस और प्रशासन को धन्यवाद दे रहे हैं। --- लोकेश कुशवाहा 🩵 टेलीग्राम चैनल https://telegram.me/jambudweepe 💚 व्हाट्सएप चैनल https://whatsapp.com/channel/0029VaABPDO9Gv7QsuzvhR1H 💛 अराटाई चैनल https://aratt.ai/@lokeshkushwaha

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  • राजनीतिक मंचों और न्यूज़ चैनलों के प्राइम टाइम पर अक्सर ‘लोकतंत्र खतरे में है’ और ‘अभिव्यक्ति की आजादी का गला घोंटा जा रहा है’ जैसी भारी-भरकम पंक्तियाँ गूँजती रहती हैं। दिल्ली के वातानुकूलित कमरों में बैठकर केंद्र सरकार को बात-बात पर तानाशाही का पर्याय बताने वाले बुद्धिजीवियों के पास अक्सर इस बात का लंबा-चौड़ा भाषण होता है कि कैसे देश में प्रेस की स्वतंत्रता समाप्त हो चुकी है। लेकिन जैसे ही सत्ता का समीकरण बदलता है और यही घटना किसी गैर-भाजपा शासित राज्य में घटित होती है, वैसे ही लोकतंत्र के इन स्वयंभू रक्षकों के गले में अचानक माइक की जगह चुप्पी का ताला लग जाता है। रांची के मैदान में जब राष्ट्रवादी पत्रकार अमन चोपड़ा छात्रों के प्रदर्शन की जमीनी हकीकत और उनके गुस्से को कैमरे में कैद करने पहुंचे, तो हेमंत सोरेन सरकार की पुलिस को शायद सच्चाई का वह आईना बेहद चुभने लगा। आनन-फानन में पुलिस बल को सक्रिय किया गया और निर्भीक पत्रकारिता का पुरस्कार देते हुए अमन चोपड़ा को उठाकर सीधे हिरासत में ले लिया गया। यह दृश्य उन सभी सिद्धांतों के मुंह पर एक करारा थप्पड़ था जो दिन-रात प्रेस फ्रीडम का ढोल पीटते नहीं थकते, क्योंकि यहाँ एक राज्य सरकार सिर्फ इसलिए खौफजदा हो गई कि कहीं छात्रों का सच और उनकी आवाज जनता के सामने न आ जाए। मित्रों मुझे फॉलो कर लो नहीं तो मैं खो जाऊंगा। https://www.facebook.com/share/p/1E1mJhVS2j/ झारखंड पुलिस की इस तत्परता को देखकर तो यही लगता है कि राज्य में कानून-व्यवस्था बनाए रखने से ज्यादा जरूरी काम सच बोलने वाले पत्रकारों की आवाज को दबाना बन चुका है। जिस सरकार को जनता के सवालों का जवाब देना चाहिए था, वह सवाल पूछने वाले का ही मुंह बंद करने में जुट गई। दिलचस्प बात तो यह है कि जो लोग केंद्र सरकार पर जरा सी बात पर तानाशाह का ठप्पा लगाने के लिए हाथ में तख्तियां लेकर सड़कों पर उतर आते हैं, वे इस खुलेआम अधिनायकवाद और पुलिसिया धौंस पर पूरी तरह से धृतराष्ट्र बने बैठे हैं। जब अपने विचार से मेल खाने वाली पुलिस किसी पत्रकार को हिरासत में लेती है, तब यह तानाशाही नहीं बल्कि ‘कानून-व्यवस्था का पालन’ बन जाता है, लेकिन अगर यही प्रक्रिया कहीं और हो तो उसे सीधे लोकतंत्र की हत्या घोषित कर दिया जाता है। निष्पक्षता का चोला ओढ़े इन गिरोहों का यह दोहरा चरित्र आज पूरे देश के सामने नंगा हो चुका है। सत्ता के खौफ में सच्चाई को छुपाने की यह नाकाम कोशिश यह साफ बता देती है कि असली तानाशाही कहाँ पल रही है और कौन सच के उजाले से इस कदर डरा हुआ है कि पत्रकारिता का गला घोंटने से भी नहीं हिचकता। TAP - The Aman Podcast --- लोकेश कुशवाहा 🩵 टेलीग्राम चैनल https://telegram.me/jambudweepe 💚 व्हाट्सएप चैनल https://whatsapp.com/channel/0029VaABPDO9Gv7QsuzvhR1H 💛 अराटाई चैनल https://aratt.ai/@lokeshkushwaha

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  • वाह! राजनीति के इस दिव्य रंगमंच पर कलाकारिता के नए-नए कीर्तिमान स्थापित हो रहे हैं। संसद भवन के प्रांगण में एक ऐसा अभूतपूर्व और ऐतिहासिक दृश्य अवतरित हुआ, जिसे देखकर स्वयं कुदरत भी सोच में पड़ गई होगी कि बारिश की बूंदें ज़मीन पर गिर रही हैं या सीधे ऑस्कर की ट्रॉफी पर। अमूमन ज़माना देखता आया है कि जब बदरा बरसते हैं, तो सुरक्षा में तैनात वीवीआईपी को छाते की सुरक्षा मिलती है ताकि उनके राजसी वस्त्रों पर पानी का एक कतरा भी न पड़े। मगर यहाँ तो पूरी अंकगणित और भौतिकी के नियमों को ही उलट कर रख दिया गया। कमांडो साहब बड़े आराम से विशालकाय छाते के नीचे सूखे-सूखे खड़े हैं और हमारे आदरणीय नेताजी राहुल गांधी तथा उनकी बहन प्रियंका वाड्रा जी मूसलाधार बारिश में पूरी निष्ठा के साथ भीग रहे हैं। इसे देख तो ऐसा लगा कि शायद देश की सुरक्षा नीति में कोई गुप्त संशोधन हुआ है जिसके तहत एनएसजी के छातों को भीगने से बचाना अब वीवीआईपी का नया संवैधानिक कर्तव्य घोषित कर दिया गया है। नौटंकी शब्द तो इस महान कला के आगे बहुत छोटा, तुच्छ और बौना महसूस कर रहा होगा। भाई साहब, इसे महज़ राजनीतिक ड्रामा कहना तो उस उच्च दर्जे की अदाकारी का सीधा-सीधा अपमान है जो कैमरे के ऑन होते ही इतनी सहज़ता से शुरू हो जाती है। स्क्रिप्ट एकदम सीधी और पारदर्शी है जब तक कैमरे का लेंस चमक रहा है और रिकॉर्डिंग का लाल बटन जल रहा है, तब तक बारिश के हर एक कतरे को अपने शरीर पर झेलकर 'जनता के दुख-दर्द में शरीक होने' का जीवंत और करुण अभिनय पूरा करना है। जैसे ही कैमरामैन साहब 'कट' बोलकर अपना ट्राइपॉड समेटेंगे, वैसे ही हमारे ये जननायक तुरंत उस ठंडी-ठंडी भीगी हवा से निकलकर कमांडो साहब के उसी छाते की शरण में पधार जाएँगे। फिर किसे क्या ही पता चलने वाला है कि कैमरे के पीछे का सच क्या था और पर्दे के आगे का ढोंग क्या था? जनता तो बस वही देखेगी जो उसे रील्स और सोशल मीडिया के जरिए दिखाया जाएगा। और वैसे भी, असली जादू तो इस दृश्य के बाद शुरू होता है। जब नेताजी खुद अपनी ब्रांडिंग करके थक जाते हैं, तब उनके दरबार में मौजूद आज्ञाकारी चाटुकारों की पूरी की पूरी जमात मोर्चे पर तैनात हो जाती है। ये वो निष्ठावान प्राणी हैं जो नेताजी के एक बार छींक देने पर भी उसे महामानव का 'ऐतिहासिक संदेश' घोषित कर सकते हैं। अब जब नेताजी खुद जल-अभिषेक करवा चुके हैं, तो ये दरबारी अपने-अपने कीबोर्ड तोड़ते हुए सोशल मीडिया पर 'त्याग', 'समर्पण' और 'जननायक' की ऐसी बाढ़ ला देंगे कि असली बारिश भी उनके इस प्रचार के आगे शरमा जाए। जो काम नेताजी का भीगना नहीं कर पाता, उससे सौ गुना ज्यादा बड़ा प्रचार तो ये चमचे अपनी अति-उत्साही भक्ति से कर डालते हैं। वास्तव में, ऐसी अद्भुत राजनीति और उसके उससे भी महान कलाकार इस देश के सिवा और कहाँ देखने को मिल सकते हैं! --- लोकेश कुशवाहा 🩵 टेलीग्राम चैनल https://telegram.me/jambudweepe 💚 व्हाट्सएप चैनल https://whatsapp.com/channel/0029VaABPDO9Gv7QsuzvhR1H 💛 अराटाई चैनल https://aratt.ai/@lokeshkushwaha

  • किसी को राम में प्रेम दिखाई देता है, किसी को शिव में करुणा दिखाई देती है, किसी को शक्ति में मातृत्व दिखाई देता है, किसी को कृष्ण में माधुर्य दिखाई देता है। रूप अनेक हैं, अनुभूति अनेक हैं, मार्ग अनेक हैं— पर सत्य एक है। जैसे एक ही सूर्य अलग-अलग जल-पात्रों में अलग-अलग दिखाई देता है, वैसे ही परमात्मा भक्तों की भावना के अनुसार अलग-अलग रूपों में प्रकट होता है मेरा इष्ट श्रेष्ठ है, इसलिए तुम्हारा इष्ट गलत है। अपने इष्ट में परमात्मा दिखाई देते हैं, इसलिए मैं तुम्हारे इष्ट का भी सम्मान करता हूँ।” रामभक्ति यदि हृदय में है, तो उसमें करुणा होगी। शिवभक्ति यदि हृदय में है, तो उसमें विनम्रता होगी। देवीभक्ति यदि हृदय में है, तो उसमें शक्ति के साथ मातृत्व भी होगा। जिस भक्ति में प्रेम नहीं, वह केवल प्रदर्शन है। जिस साधना में विनय नहीं, वह केवल अहंकार का नया रूप है। शिव और राम दो अलग-अलग सत्ता नहीं, बल्कि एक ही परम चेतना के दो दिव्य आयाम हैं। शिव में राम हैं, राम में शिव हैं, दोनों में एक ही परम तत्त्व है। जय श्री सीताराम.. 🕉️ *हर हर महादेव*

  • *🚩 श्री रामेश्वरम् 🚩* श्री राम के ईश्वर शिव हैं या शिव के ईश्वर राम है यह उलझन का विषय है और यह तर्क का विषय भी नहीं है, क्योंकि-: शिव और राम — एक ही परम सत्य के दो प्रकाश है... शिव राम का नाम जपते हैं और राम शिव की पूजा करते हैं। एक ओर कैलासवासी महादेव रामनाम को अपना प्राण मानते हैं, दूसरी ओर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम समुद्र तट पर शिवलिंग स्थापित करके भगवान शिव का पूजन करते हैं। रामहि केवल प्रेमु पिआरा। प्रभु को केवल निष्कपट प्रेम प्रिय है। श्रीरामकथा का आरंभ शिव-वंदना से होता है तुलसीदास जी ने रामकथा का आरंभ ही शिव और पार्वती की वंदना से किया "भवानी शंकरौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ।" -भवानी श्रद्धा का स्वरूप हैं। - शंकर विश्वास का स्वरूप हैं। - श्रद्धा के बिना साधना आरंभ नहीं होती। - विश्वास के बिना साधना पूर्ण नहीं होती। जिस हृदय में श्रद्धा और विश्वास दोनों जागते हैं, उसी हृदय में रामकथा का वास्तविक प्रकाश उतरता है। प्रभु राम को समझने के लिए केवल बुद्धि पर्याप्त नहीं हृदय में श्रद्धा चाहिए। शिव को पाने के लिए केवल बाहरी पूजा पर्याप्त नहीं भीतर अटूट विश्वास चाहिए। शिव — रामभक्ति के प्रथम आचार्य है। क्योंकि रामचरितमानस में शिवजी स्वयं पार्वती को श्रीराम की कथा सुनाते हैं। इसका अर्थ यह है कि भगवान शिव केवल राम के भक्त ही नहीं, बल्कि रामतत्त्व के महान ज्ञाता और आचार्य भी हैं। शिवजी राम के बाहरी राजसी रूप से आगे उनके परमात्मस्वरूप को देखते हैं। उनके लिए राम केवल अयोध्या के राजा नहीं, बल्कि वही परम ब्रह्म हैं जो भक्तों के कल्याण के लिए मानव रूप धारण करते हैं। शिव की दृष्टि हमें सिखाती है कि ईश्वर को केवल उनके रूप, वेश और लीला से नहीं, बल्कि उनके भीतर छिपे परम तत्त्व से पहचानना चाहिए। शिवजी के संबंध में भक्ति परंपरा में कहा गया है कि वे निरंतर रामनाम का स्मरण करते हैं— "राम नाम सिव सुमिरन लागा, मिटहिं सकल भवसंकट भागा॥" यहाँ रामनाम केवल एक नाम नहीं, बल्कि चेतना को शुद्ध करने वाली शक्ति है। शिव का रामनाम जपना यह बताता है कि - ज्ञान का अंतिम आश्रय भक्ति है। - वैराग्य का अंतिम सौंदर्य प्रेम है। - तपस्या का अंतिम फल ईश्वर-स्मरण है। - विद्वता का अंतिम उद्देश्य अहंकार नहीं, शरणागति है। महादेव स्वयं रामनाम में लीन हैं, तो साधारण मनुष्य के लिए नाम-स्मरण से बड़ा साधन और क्या हो सकता है? प्रभु श्रीराम द्वारा शिव-पूजन अनोखा उदाहरण समझिए-: लंका-विजय से पहले श्रीराम समुद्र तट पर शिवलिंग की स्थापना करके भगवान शिव की पूजा करते हैं। यही स्थान आगे चलकर रामेश्वरम् के नाम से प्रसिद्ध हुआ। यह प्रसंग अत्यंत गहरा संदेश देता है। श्रीराम स्वयं परमात्मा हैं, फिर भी वे शिव की पूजा करते हैं। इसका कारण यह नहीं कि राम शिव से छोटे हैं या शिव राम से बड़े हैं इसका कारण है—ईश्वर स्वयं संसार को आचरण द्वारा धर्म सिखाते हैं। राम यह बताते हैं कि महानता का अर्थ दूसरों को छोटा समझना नहीं, बल्कि योग्य और पूजनीय तत्त्व के सामने विनम्र होना है। जो व्यक्ति वास्तव में बड़ा होता है, वह झुकना जानता है। जो भीतर से छोटा होता है, वही अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए दूसरों का अपमान करता है। शिव द्रोही का स्पष्ट संदेश श्रीराम का अत्यंत प्रसिद्ध वचन है— "शिव द्रोही मम दास कहावा। सो नर सपनेहुँ मोहि नहिं पावा॥" अर्थात्~ जो व्यक्ति शिव का विरोधी होकर स्वयं को राम का भक्त कहता है, वह स्वप्न में भी राम को प्राप्त नहीं कर सकता। यह चौपाई केवल धार्मिक सहिष्णुता की बात नहीं करती यह भक्ति के मूल चरित्र को स्पष्ट करती है। यदि किसी की भक्ति से - अहंकार बढ़े, - द्वेष बढ़े, - संकीर्णता बढ़े, - दूसरे देवस्वरूपों के प्रति घृणा उत्पन्न हो, तो वह भक्ति नहीं, बल्कि अपने मत का अभिमान है। सच्चा रामभक्त शिव का सम्मान करेगा। सच्चा शिवभक्त राम के आदर्शों को अपनाएगा। शिव और राम — ज्ञान और मर्यादा है शिव और राम के स्वरूपों को इस प्रकार समझा जा सकता है— शिव हमें भीतर की शांति, वैराग्य, ध्यान और आत्मबोध की ओर ले जाते हैं। राम हमें धर्म, मर्यादा, कर्तव्य, सत्य और आदर्श जीवन का मार्ग दिखाते हैं। शिव हमें सिखाते हैं कि संसार के बीच रहते हुए भी भीतर से निर्लिप्त कैसे रहें। राम हमें सिखाते हैं कि कठिन परिस्थितियों में भी धर्म का त्याग न किया जाए। शिव का मौन और राम का आचरण—दोनों मिलकर पूर्ण जीवन का दर्शन बनाते हैं। केवल ज्ञान हो और आचरण न हो, तो जीवन अधूरा है। केवल कर्म हो और आत्मबोध न हो, तो जीवन तनावपूर्ण हो जाता है। शिव और राम का समन्वय केवल दो देवताओं को एक मान लेने का विषय नहीं है। यह हमारे भीतर के विभाजन को समाप्त करने का संदेश है। मनुष्य बाहर मंदिरों में देवताओं को बाँटता है, पर परमात्मा स्वयं कभी विभाजित नहीं होता।

  • सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर एल्गोरिदम, कंटेंट मॉडरेशन और निष्पक्षता को लेकर उठ रहे सवाल वर्तमान समय में डिजिटल स्पेस का एक बड़ा और संवेदनशील मुद्दा हैं। भारत में सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही तय करने के लिए इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी पर संसद की स्थायी समिति समय-समय पर मेटा, गूगल और एक्स (ट्विटर) जैसी कंपनियों के शीर्ष अधिकारियों को समन करती रही है। यह सोशल मीडिया पर फैला एक भ्रामक दावा है। लेकिन यह बात पूरी तरह तथ्यात्मक है कि भारतीय संसद और आईटी मंत्रालय ने एल्गोरिदम की पारदर्शिता, यूजर सुरक्षा और राजनीतिक निष्पक्षता को लेकर टेक कंपनियों के सामने कड़ा रुख अपनाया है और उन्हें देश के कानूनों के दायरे में काम करने की सख्त चेतावनी दी है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स का मूल बिजनेस मॉडल अटेंशन और एंगेजमेंट पर टिका होता है। इनके एल्गोरिदम इस तरह डिजाइन किए गए हैं कि वे उन पोस्ट्स को ज्यादा बढ़ावा देते हैं जिन पर लोग अधिक प्रतिक्रिया यानी लाइक, शेयर, गुस्सा या कमेंट दर्ज करते हैं। अक्सर यह देखा गया है कि तीखी आलोचना, विवादित बयान या आक्रामक कंटेंट पर एंगेजमेंट तेजी से बढ़ता है, जिसके कारण एल्गोरिदम अनजाने में उसे लाखों लोगों तक पहुंचा देता है। इसके विपरीत, सामान्य समर्थन या सकारात्मक सामग्री पर सीमित प्रतिक्रिया मिलने के कारण उसकी रीच दब जाती है। इसे तकनीकी भाषा में आउटरेज इकॉनमी कहा जाता है। आम यूजर इसे किसी खास विचारधारा या राजनीतिक दल के खिलाफ पूर्वाग्रह के रूप में देखते हैं, जो लोकतांत्रिक बातचीत के संतुलन को प्रभावित करता है। डिजिटल स्पेस में एक और बड़ी चुनौती संगठित मास रिपोर्टिंग की है। कई बार संगठित समूह या फर्जी बॉट अकाउंट्स किसी एक विशेष विचार या समुदाय से जुड़े अकाउंट्स को एक साथ निशाना बनाते हैं। जब सैकड़ों अकाउंट्स किसी एक पोस्ट या प्रोफाइल को एक साथ रिपोर्ट करते हैं, तो मेटा का ऑटोमेटेड आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सिस्टम बिना गहराई से तथ्य जांचे उस अकाउंट को सस्पेंड, शैडोबैन या डिलीट कर देता है। इस प्रक्रिया में सबसे बड़ी कमी यह है कि टेक कंपनियां फर्जी रिपोर्ट करने वाले अकाउंट्स की जांच करने या उन्हें ब्लॉक करने में नाकाम रहती हैं। केवल रिपोर्ट की संख्या देखकर एक्शन लेने की यह प्रणाली निष्पक्ष विचार व्यक्त करने वाले वास्तविक यूज़र्स के लिए अन्यायपूर्ण साबित हो रही है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का तटस्थ होना केवल एक व्यावसायिक नियम नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति की आजादी की रक्षा के लिए अनिवार्य है। सोशल मीडिया कंपनियों को अपने एल्गोरिदम का निष्पक्ष ऑडिट कराना होगा और ऑटोमेटेड AI मॉडरेशन की जगह मानवीय समीक्षा को प्राथमिकता देनी होगी। जब तक मास रिपोर्टिंग करने वाले फर्जी अकाउंट्स पर नकेल नहीं कसी जाएगी और एल्गोरिदम को केवल विवादों के बजाय तथ्य और गुणवत्ता के आधार पर रीच देने के लिए दोबारा तैयार नहीं किया जाएगा, तब तक यूज़र्स का इन प्लेटफॉर्म्स की निष्पक्षता पर सवाल उठाना स्वाभाविक है। --- लोकेश कुशवाहा 🩵 टेलीग्राम चैनल https://telegram.me/jambudweepe 💚 व्हाट्सएप चैनल https://whatsapp.com/channel/0029VaABPDO9Gv7QsuzvhR1H 💛 अराटाई चैनल https://aratt.ai/@lokeshkushwaha