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काव्य कुटीर ( पंक्तियां, कविताएँ, शायरी, व्यंग)

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  • शाम हमेशा उतनी ही देर से उतरती है, जितनी देर से कोई पुरानी बात याद आती है। रोशनी पहले आँगन छोड़ती है, फिर दीवारें, और अंत में चेहरों से चली जाती है। तब लगता है, मनुष्य का सबसे सच्चा चेहरा शायद अँधेरे में ही दिखाई देता होगा। मैंने कई बार सोचा... इतिहास कहाँ लिखा जाता है...? उन किताबों में जिनके पन्ने पीले पड़ चुके हैं, या उस बूढ़ी स्त्री की आँखों में जो हर शाम दरवाज़े की ओर देखती है, जैसे कोई अभी आएगा, जबकि उसे भी मालूम है कि अब कोई नहीं आएगा। स्मृतियाँ अजीब चीज़ होती हैं। वे कभी लौटकर नहीं आतीं, फिर भी हमारे भीतर से कहीं जाती भी नहीं। वे धूप में रखे उस पुराने गिलास की तरह हैं, जिसमें पानी नहीं है, लेकिन होंठों पर अब भी उसकी ठंडक बची है। शायद प्रेम भी ऐसा ही होता है। वह साथ रहते हुए इतना दिखाई नहीं देता, जितना चले जाने के बाद हर वस्तु पर अपनी अनुपस्थिति छोड़ जाता है। एक कुर्सी, जिस पर अब कोई नहीं बैठता। एक किताब, जिसमें रखा सूखा पत्ता बरसों बाद भी अपना मौसम नहीं भूलता। एक खिड़की, जो हर सुबह खुलती है, हालाँकि उसे मालूम है कि जिस रास्ते की ओर वह खुलती है, वहाँ से अब कोई लौटकर नहीं आएगा। हम सब शायद अपनी-अपनी अनुपस्थितियों के साथ जीते हैं। बाहर से हम बातचीत करते हैं, हँसते हैं, अपने दिनों का हिसाब रखते हैं। भीतर एक कमरा हमेशा बंद रहता है। वहीं कुछ अधूरे वाक्य पड़े रहते हैं, कुछ नाम, जिन्हें हम वर्षों से पुकारते नहीं, और कुछ आँसू, जो रोए जाने की प्रतीक्षा भी छोड़ चुके हैं। समय किसी नदी की तरह नहीं बहता। वह कभी-कभी एक पुराने घर की तरह ठहर जाता है, जहाँ धूल भी धीरे-धीरे गिरती है। और तब समझ में आता है... मनुष्य को उसकी सफलताओं ने नहीं, उसकी बची हुई कोमलता ने बचाया है। जो इतने वर्षों बाद भी किसी अनजान बच्चे को देखकर मुस्कुरा सके, किसी पेड़ की छाया में दो मिनट चुप बैठ सके, या किसी पुराने गीत को सुनकर अपने भीतर की नमी पहचान ले... शायद वही इतिहास से बाहर भी थोड़ा-सा जीवित रह जाता है। - सूर्यभान "सूरी"🌷 (कविता: जो बचा रह जाता है)

  • एक पत्र प्रधानमंत्री मोदी के नाम माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी, सादर प्रणाम। मैं आपको यह पत्र किसी राजनीतिक विरोधी के रूप में नहीं, बल्कि इस देश के एक सामान्य नागरिक के रूप में लिख रहा हूँ। उस नागरिक के रूप में, जिसने आपकी अनेक बातों पर विश्वास किया है,युवाओं के सपनों पर, नए भारत के संकल्प पर और उस भारत पर, जहाँ मेहनत को उसका सम्मान मिलेगा। लेकिन आज यह पत्र लिखते हुए मन भारी है। पिछले कुछ दिनों से जंतर-मंतर की तस्वीरें देख रहा हूँ। वहाँ बैठे छात्र मुझे प्रदर्शनकारी नहीं दिखते; वे मुझे अपने ही घर के बच्चे लगते हैं। कोई अपने माता-पिता के अधूरे सपनों को लेकर बैठा है, कोई वर्षों की मेहनत को बचाने की उम्मीद में, तो कोई केवल इस भरोसे के लिए कि इस देश में उसकी आवाज़ सुनी जाएगी। प्रधानमंत्री जी, एक विद्यार्थी जब किताबों पर अपना यौवन खर्च करता है, तब वह केवल परीक्षा की तैयारी नहीं कर रहा होता; वह इस देश के भविष्य में अपना स्थान खोज रहा होता है। लेकिन जब वही छात्र सड़क पर बैठने को मजबूर हो जाए, तो प्रश्न केवल उसकी नौकरी का नहीं रह जाता, प्रश्न उस व्यवस्था का हो जाता है जिस पर उसने भरोसा किया था। मुझे सबसे अधिक पीड़ा तब हुई जब इन युवाओं के प्रश्नों का उत्तर संवाद से अधिक पुलिस के घेरे में दिखाई दिया। मैं जानता हूँ कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना सरकार का दायित्व है, लेकिन क्या लोकतंत्र में हर असहमति को बैरिकेड और लाठी के बीच ही खड़ा होना चाहिए...? क्या इन युवाओं से बातचीत करना इतना कठिन था...? क्या उनके प्रतिनिधियों को बुलाकर उनकी बातें सुनना लोकतंत्र को कमज़ोर कर देता...? प्रधानमंत्री जी, मैं यह नहीं कहता कि हर माँग सही होती है। मैं यह भी नहीं कहता कि हर आंदोलन निष्पक्ष होता है। लेकिन मैं इतना अवश्य मानता हूँ कि हर पीड़ा सुनने योग्य होती है। आप देश के प्रधानमंत्री हैं। आपके एक शब्द से करोड़ों लोगों में आशा जगती है। इसलिए जब ऐसे समय में सरकार की ओर से संवेदनशील संवाद नहीं दिखता, तब निराशा केवल जंतर-मंतर तक सीमित नहीं रहती; वह देश के लाखों युवाओं के मन में घर कर जाती है। मुझे यह भी लगा कि हम कहीं न कहीं उन युवाओं की करुणा को समझने में असफल रहे। वे केवल अपने लिए नहीं बैठे थे; वे उस व्यवस्था पर प्रश्न उठा रहे थे, जिसमें मेहनत करने वाला स्वयं को असुरक्षित महसूस करने लगा है। प्रधानमंत्री जी, सत्ता की सबसे बड़ी शक्ति आदेश देने में नहीं, सुनने में होती है। इतिहास उन शासकों को अधिक सम्मान देता है जिन्होंने विरोध की आवाज़ को दुश्मन नहीं, लोकतंत्र का दर्पण माना। मैं आपसे आग्रह करता हूँ कि जंतर-मंतर पर बैठे उन छात्रों को विपक्ष की भीड़ मत मानिए। उन्हें भारत का भविष्य मानिए। उनके साथ संवाद कीजिए। यदि व्यवस्था में कहीं कमी है तो उसे स्वीकार कीजिए। यदि सुधार की आवश्यकता है तो उसे कीजिए। यदि युवाओं का विश्वास टूट रहा है तो उसे जोड़ने का प्रयास कीजिए। क्योंकि एक टूटा हुआ पुल फिर बनाया जा सकता है, एक टूटी हुई सड़क भी बन सकती है; लेकिन यदि युवाओं का विश्वास टूट जाए, तो उसे लौटाने में पीढ़ियाँ लग जाती हैं। अंत में बस इतना कहना चाहता हूँ... देश की सीमाएँ सैनिक बचाते हैं, संविधान न्यायपालिका बचाती है, लेकिन किसी राष्ट्र का भविष्य उसके छात्र बचाते हैं। यदि वही छात्र निराश होकर सड़कों पर बैठ जाएँ, तो यह केवल उनका संकट नहीं, पूरे राष्ट्र की चिंता है। मुझे विश्वास है कि आप इस पत्र को आलोचना नहीं, एक नागरिक की सच्ची चिंता के रूप में पढ़ेंगे। - सूर्यभान "सूरी" ( एक आम नागरिक कोई कॉकरोच नहीं)

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  • 18 июл.1 047102

    कितनी देर तक मैं लिखता रहूँ बारिश की पहली बूँद, चिड़ियों की उड़ान, और शाम का सुनहरा आकाश...? जबकि मेरे ही शहर में एक आदमी अपनी आख़िरी उम्मीद सरकारी दफ़्तर की कुर्सियों पर छोड़ आया है। प्रेम पर दुनिया ने अनगिनत गीत लिखे हैं। कवि, अब उन चीख़ों का भी व्याकरण लिखो जिन्हें इतिहास हर बार हाशिए पर छोड़ देता है। (सोनम वांगचुक के लिए) - सूर्यभान "सूरी"🌷

  • 23 июн.1 582102

    जब भी तुमसे मिला, लगा दुनिया अभी पूरी तरह बाज़ार नहीं हुई है। कुछ शब्द अब भी अपना अर्थ बचाए हुए हैं, और कुछ लोग मनुष्य। - सूर्यभान 'सूरी'🌷 (पोस्टर: फिल्म थ्री ऑफ़ अस)

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  • 9 июн.1 899122

    मेरे भीतर एक अधूरा नागरिक जागता है हर रात। वह पूछता है... तुमने जिन अन्यायों को देखा, उनमें तुम्हारी चुप्पी का हिस्सा कितना था...? मैं उत्तर खोजता हूँ, पर उत्तरों के चारों ओर अपने ही लाभ की धूल जमी है। जिम्मेदारी, आत्मा का वह कठोर दर्पण है जिसमें सबसे पहले अपना चेहरा कटघरे में दिखाई देता है। ~ सूर्यभान 'सूरी'🌷

  • 5 июн.1 870

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  • 5 июн.1 798104

    धीरे-धीरे पेड़ कम हुए, फिर छाँव कम हुई, फिर बातचीत कम हुई, और फिर लोग। अब शहर में सब मौजूद हैं; लेकिन मिलने पर भी कोई किसी को नहीं मिलता। शायद पेड़ सिर्फ़ जंगल से नहीं, हमारे भीतर भी कटे हैं। ~ सूर्यभान 'सूरी' #WorldEnvironmentDay

  • 28 мая1 65111

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  • 28 мая1 75371

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  • 28 мая1 4832

    #FilmReview #Kartavya #कर्तव्य साथियों आज बात करेंगे हाल में नेटफ्लिक्स पर आई फ़िल्म #Kartavya की। यह फिल्म एक डिसेंट क्राइम थ्रिलर है और अपने इरादों से महत्वाकांक्षी फिल्म है। यह केवल एक मर्डर इनवेस्टिगेशन नहीं करना चाहती, बल्कि भारतीय सामाजिक संरचना खासकर सत्ता, जाति और संस्थागत हिंसा पर टिप्पणी करने की कोशिश करती है। और यही उसकी सबसे बड़ी ताकत भी है, और सीमा भी। फिल्म का शुरुआती हिस्सा बेहद प्रभावशाली है। निर्देशक छोटे शहर की बेचैनी को बहुत नियंत्रित विजुअल लैंग्वेज के साथ रचता है। कैमरा अक्सर स्थिर रहता है, गलियाँ सूनी हैं, और पात्रों के बीच एक अदृश्य तनाव लगातार मौजूद रहता है। यह वातावरण दर्शक को तुरंत अपनी ओर आकर्षित कर लेता है। लीड परफॉर्मेंस की बात करे तो यही फिल्म की सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरती हैं। सैफ अली खान अपने किरदार को किसी टिपिकल हीरोइक कॉप की तरह नहीं निभाते, बल्कि भीतर से थके, टूटे और नैतिक उलझनों में फँसे इंसान की तरह खुद को प्रस्तुत करते हैं। उनकी एक्टिंग में एक रेस्ट्रेंड इंटेंसिटी है, कई सीन्स में उनकी चुप्पी, उनकी आँखों की बेचैनी और संवादों के बीच का ठहराव कैरेक्टर को गहराई देता है। वहीं संजय मिश्रा अपनी बेहद उम्दा और सहज अभिनय शैली से फिल्म में अलग वजन जोड़ते हैं। उनका किरदार कम बोलकर भी असर छोड़ता है। संजय मिश्रा की खासियत हमेशा की तरह यही रहती है कि वे साधारण दिखने वाले आदमी के भीतर की टूटन और व्यंग्य को बहुत स्वाभाविक ढंग से सामने ले आते हैं। लेकिन फिल्म की सबसे बड़ी समस्या उसका लेखन है। जो कि वध वाले पुलकित ने किया है. स्क्रीनप्ले कई गंभीर मुद्दों को उठाती तो है, मगर उन्हें पर्याप्त गहराई नहीं दे पाती। कुछ महत्वपूर्ण पात्र केवल नैरेटिव डिवाइसेज बनकर रह जाते हैं। फिल्म कई बार यह तय नहीं कर पाती कि वह एक इन्वेस्टिगेटिव थ्रिलर है या सामाजिक टिप्पणी। परिणामस्वरूप उसका इमोशनल पूरी ताकत से नहीं आ पाता। पहला हॉफ एटमॉस्फेरिक और ग्रिपिंग लगता है, लेकिन दूसरे हॉफ में नैरेटिव मोमेंटम कमजोर पड़ने लगता है। कुछ सीन्स केवल मूड सेट करने के लिए मौजूद लगते हैं, कहानी आगे नहीं बढ़ाते। क्लाइमैक्स टेक्निकली ठीक है, लेकिन इमोशनली अधूरा महसूस होता है.. जैसे फिल्म ने अपने सबसे कठिन सवालों से पूरी तरह सामना करने के बजाय थोड़ा सुरक्षित रास्ता चुन लिया हो। आख़िर में, बोलें तो #Kartavya टेक्निकली फिल्म काफी सक्षम है। ऐसी फिल्म है जो अपने विषय और अभिनय के कारण याद रह जाती है, भले ही उसकी स्क्रीनप्ले उसे एक अच्छी सिनेमा बनने से रोक देती हो। यह गहराई और नैरेटिव शार्पनेस नहीं हासिल कर पाती जहाँ से कोई क्राइम ड्रामा वास्तव में असाधारण बनता है। यह मेरी राय है. आप भी देखिए और अपनी राय बनाइये और हमें बताइए। आप नेटफ्लिक्स पर देख सकते हैं। ✍️: सूर्यभान 'सूरी'

  • 14 мая1 640

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  • 3 мая2 34096

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  • 3 мая2 1101

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  • 1 мая2 144111

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  • 1 мая1 7628

    वे कहते हैं-- मजदूर देश बनाते हैं। मैं देखता हूँ... वे बस अपने ही जीवन को धीरे-धीरे गिरवी रखते हैं। हर ईंट एक उधार है, जो उनकी सांसों से चुकाया जाता है। और विडंबना यह है-- उनका कर्ज़ तब भी खत्म नहीं होता। शहर चमकता है उनकी बुझती आँखों से, और ताली किसी और के नाम पर बजती है। मजदूर दिवस...? हाँ, मनाओ— एक दिन की इज़्ज़त देकर बाकी दिनों की चुप्पी छुपाना आसान होता है। ~ सूर्यभान 'सूरी' #मजदूरदिवस #LabourDay

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  • 23 апр.2 0651712

    किताबें चुप रहती हैं अक्सर, पर उनके भीतर अनगिनत आवाज़ें होती हैं-- कुछ तुम्हारी, कुछ मेरी, और कुछ उन ख्वाबों की जो अभी तक जिए ही नहीं गए। वे हमें बदलती नहीं, बस धीरे-धीरे हमसे हमारी पहचान करा देती हैं। ~ सूर्यभान 'सूरी' #WorldBookDay

  • 11 апр.2 12153

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