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प्यारी शायरी

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चांद से चेहरे रंगीं आंचल चलते फिरते साए हैं

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Посты

  • 6 авг.727112из mypoetrym

    इससे पहले कि इश्क का ये तिलिस्म टूटे, मैं मौत के आग़ोश में समा जाना चाहती हूं 💜🌸

  • 1 авг.1 341117

    चलो फिर कागजों पर दास्ताने-ए-दर्द लिखते हैं ज़माना मुंतज़िर होगा गमों पर मुस्कुराने को..!!

  • 30 июл.1 5491012

    मशहूर तो बहुत है मेरे अल्फाजों की तासीर मगर वो एक शख्स मुझसे मनाया न गया।

  • 30 июл.1 527117

    जिनसे उम्मीदें खत्म हो जाती हैं फिर उनसे शिकायतें नहीं रहती

  • 29 июл.1 6611310

    कोई तदबीर करो,वक़्त को रोको यारों सुबह देखी ही नहीं,शाम हुई जाती है....!!

  • 28 июл.1 787149из mypoetrym

    तलाश न कर उसकी जो तेरी क़िस्मत में नहीं न ढूंढ वहां ख़ुशी जहाँ तेरी मौजूदगी शामिल नहीं न खो उन परछाईयों में जहां तेरे अक्स को इजाज़त नहीं न ठहर उन राहों पर जहां तेरी कोई मंजिल नहीं कुछ फ़ासले ही बेहतर हैं शायद कोई जरिया तेरे नज़दीक नहीं जितनी भी ख़्वाहिश रख लें हम मौक़े जो मिलते वो काफ़ी नहीं तमाम उम्र ढूंढते हैं हम सुक़ून उलझनें हैं काफ़ी,इत्मीनान हासिल नहीं...

  • 26 июл.1 77762из mypoetrym

    रूह ढूंढती है सुक़ून भटकती है मृगतृष्णा में दर बदर प्रेम के उपालभ्य में भी चाहती है सुक़ून दर्द के अतिरेक में भी चाहना नहीं मिटती अंततः भटकते भटकते मन की तहों में छप जाते हैं अतीत के समस्त अक्षर मीठी तीखी भीनी अंसख्य स्मृतियां... तथापि नहीं थमती तृष्णा सुक़ून की तब किसी बैरागी के शब्द गुंजित हो उठते हैं , मृत्यु पूर्व सुक़ून का मिलना असम्भव है भटकन स्वमेव मिट जाएगी, जब मृत्यु हमारा वरण कर लेगी, समस्त वेदना, समस्त सुख मृत शरीर मे लीन हो जाएंगे इस तरह मृगतृष्णा ही नही वरना मृत शरीर भी हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगा .... 💜🌸

  • 24 июл.1 9182410

    मै बचाता रहा दीमक से घर अपना और चंद कुर्सी के कीड़े पूरा मुल्क खा गए..!!

  • 14 июл.5 0732016

    बहुत मुमकिन है मासूमों को कातिल कह दिया जाए बहुत मुमकिन है कातिल को मसीहा चुन लिया जाए बहुत मुमकिन है मेरा कत्ल हो और मैं ही मुजरिम हूँ बहुत मुमकिन है मेरा घर जले और मैं ही मुल्जिम हूँ बहुत मुमकिन है गद्दारों को मसनद पर बैठाया जाए वफादारों को मुमकिन है कि सूली पर चढ़ाया जाए बहुत मुमकिन है आइंदा से हकगोई पर पहरा हो बहुत मुमकिन है मसनद पर जो बैठा है वह बहरा हो बहुत मुमकिन है जो घर के मुहाफिज हैं लुटेरे हों जिन्होंने सांप पाले हैं वह मुमकिन है सपेरे हों बहुत मुमकिन है जो खामोश हैं वह चीख उठें एक दिन बहुत मुमकिन है वह जो चीखते हैं मर मिटें एक दिन कलाम: कामरान गनी सबा @Pyari_Shayri

  • 10 июл.2 4712112

    वो दे तो शुक्र उसका , न दे तो मलाल नहीं , मेरे रब के फैसले कमाल है , उन फैसलों पे कोई सवाल नहीं !

  • 9 июл.2 846127

    हमें माफ कर देना मेरी बच्ची हमने धर्म जीते मुल्क जीते मेडल जीते चुनाव जीते मनुष्यता से हार गए मेरी बच्ची हमें माफ कर देना कि हम, तुम्हारे रहने लायक मुल्क नहीं बना पाए जहां दिन और रात किसी भी समय सड़क पर बेखौफ घूम सको तुम हम बिकी हुई मनुष्यता वाले मुल्क के नागरिक हैं पहले खुद बिकेंगे फिर तुम्हे बेचेंगे हमने किताबों, ग्रंथों, चलचित्रों, रीलों में कामुकता नहीं भरी जेहन में भरी है जो अब सड़ांध मारने लगी है, हम विश्व की सबसे बड़ी विकृत मानसिकता वाले पुरुष हैं हम कामुकता से भरे चलते फिरते विस्फोटक है जिनसे हर बच्ची को खतरा है हम संकुचित धर्म संकुचित सोच संकुचित मनुष्यता लेकर जीवित हैं और बेशर्मी से उन्नत और विकसित कहते हैं खुद को हमारे विकास पर हमारे उन्नत होने पर हमारे चरित्र पर तुम शक करके बाहर निकलना मेरी बच्ची यह मुल्क दुष्चरित्र पुरुषों से अटा पड़ा है यहां का पुरुष स्त्री के संदर्भ में विश्वास के काबिल कत्तई नहीं है।। वीरेंदर भाटिया

  • 2 июл.3 005146

    जिसने तकदीरें लिखी है उसने कुछ तो सोचा होगा यूं बेवजह तो कोई किसी का नहीं होता

  • 19 июн.3 9771512

    सारे ज़माने को मेरे अल्फ़ाज़ समझ आते हैं, तुम बताओ तुम किस दौर की ज़ाहिल हो,,,

  • 15 июн.4 3791413из shayar_ke_lafz

    हमीं तक रह गया क़िस्सा हमारा किसी ने ख़त नहीं खोला हमारा पढ़ाई चल रही है ज़िंदगी की अभी उतरा नहीं बस्ता हमारा मुआ'फ़ी और इतनी सी ख़ता पर सज़ा से काम चल जाता हमारा किसी को फिर भी महँगे लग रहे थे फ़क़त साँसों का ख़र्चा था हमारा यहीं तक इस शिकायत को न समझो ख़ुदा तक जाएगा झगड़ा हमारा तरफ़-दारी नहीं कर पाए दिल की अकेला पड़ गया बंदा हमारा तआ'रुफ़ क्या करा आए किसी से उसी के साथ है साया हमारा नहीं थे जश्न-ए-याद-ए-यार में हम सो घर पर आ गया हिस्सा हमारा हमें भी चाहिए तन्हाई 'शारिक़' समझता ही नहीं साया हमारा

  • 6 июн.4 481127

    धूप का नाम जो है साया तो साया ही सही आप कहते हैं अगर ऐसा तो ऐसा ही सही हम भी जीने का मोहब्बत में तमाशा कर लें ज़िंदगी जो है तमाशा तो तमाशा ही सही ग़ैर ही क़त्ल करे मुझ को ज़रूरी तो नहीं मेरा क़ातिल है शनासा तो शनासा ही सही हम ने कब इश्क़ को समझा है तिजारत जानाँ इश्क़ तुम से है ख़सारा तो ख़सारा ही सही प्यार तो कर के निभा लूँ मैं क़सम से 'ख़ंदा' प्यार गर वहम है धोका है तो धोका ही सही @shayar_ke_lafz

  • 6 июн.4 17484

    पल में मनुश है राम पुजारी पल में चेला रावन का पाप और पुन के बीच का धागा देखो कितना कच्चा है — सय्यद आशूर काज़मी

  • 4 июн.4 337156

    मैं रोना चाहता हूँ ख़ूब रोना चाहता हूँ मैं और इस के बअ'द गहरी नींद सोना चाहता हूँ मैं ये कच्ची मिट्टियों का ढेर अपने चाक पर रख ले तिरी रफ़्तार का हम-रक़्स होना चाहता हूँ मैं तिरे होंटों के सहरा में तिरी आँखों के जंगल में जो अब तक पा चुका हूँ उस को खोना चाहता हूँ मैं मिरे सारे बदन पर दूरियों की ख़ाक बिखरी है तुम्हारे साथ मिल कर ख़ुद को धोना चाहता हूँ मैं @shayar_ke_lafz

  • 30 мая4 302157

    कल तक तो आशना थे मगर आज गैर हो दो दिन में ये मिज़ाज़ है आगे की खैर हो....!!

  • 29 мая4 25366из shayar_ke_lafz

    तुझ से मिल कर तो ये लगता है कि ऐ अजनबी दोस्त तू मिरी पहली मोहब्बत थी मिरी आख़िरी दोस्त लोग हर बात का अफ़्साना बना देते हैं ये तो दुनिया है मिरी जाँ कई दुश्मन कई दोस्त तेरे क़ामत से भी लिपटी है अमर-बेल कोई मेरी चाहत को भी दुनिया की नज़र खा गई दोस्त याद आई है तो फिर टूट के याद आई है कोई गुज़री हुई मंज़िल कोई भूली हुई दोस्त मैं उसे अहद-शिकन कैसे समझ लूँ जिस ने आख़िरी ख़त में ये लिक्खा था फ़क़त आप की दोस्त

  • 28 мая3 8552418

    अगर तलाश करूँ कोई मिल ही जाएगा मगर तुम्हारी तरह कौन मुझ को चाहेगा तुम्हें ज़रूर कोई चाहतों से देखेगा मगर वो आँखें हमारी कहाँ से लाएगा न जाने कब तिरे दिल पर नई सी दस्तक हो मकान ख़ाली हुआ है तो कोई आएगा मैं अपनी राह में दीवार बन के बैठा हूँ अगर वो आया तो किस रास्ते से आएगा तुम्हारे साथ ये मौसम फ़रिश्तों जैसा है तुम्हारे बा'द ये मौसम बहुत सताएगा! बशीर बद्र