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इससे पहले कि इश्क का ये तिलिस्म टूटे, मैं मौत के आग़ोश में समा जाना चाहती हूं 💜🌸
चलो फिर कागजों पर दास्ताने-ए-दर्द लिखते हैं ज़माना मुंतज़िर होगा गमों पर मुस्कुराने को..!!
मशहूर तो बहुत है मेरे अल्फाजों की तासीर मगर वो एक शख्स मुझसे मनाया न गया।
जिनसे उम्मीदें खत्म हो जाती हैं फिर उनसे शिकायतें नहीं रहती
कोई तदबीर करो,वक़्त को रोको यारों सुबह देखी ही नहीं,शाम हुई जाती है....!!
तलाश न कर उसकी जो तेरी क़िस्मत में नहीं न ढूंढ वहां ख़ुशी जहाँ तेरी मौजूदगी शामिल नहीं न खो उन परछाईयों में जहां तेरे अक्स को इजाज़त नहीं न ठहर उन राहों पर जहां तेरी कोई मंजिल नहीं कुछ फ़ासले ही बेहतर हैं शायद कोई जरिया तेरे नज़दीक नहीं जितनी भी ख़्वाहिश रख लें हम मौक़े जो मिलते वो काफ़ी नहीं तमाम उम्र ढूंढते हैं हम सुक़ून उलझनें हैं काफ़ी,इत्मीनान हासिल नहीं...
रूह ढूंढती है सुक़ून भटकती है मृगतृष्णा में दर बदर प्रेम के उपालभ्य में भी चाहती है सुक़ून दर्द के अतिरेक में भी चाहना नहीं मिटती अंततः भटकते भटकते मन की तहों में छप जाते हैं अतीत के समस्त अक्षर मीठी तीखी भीनी अंसख्य स्मृतियां... तथापि नहीं थमती तृष्णा सुक़ून की तब किसी बैरागी के शब्द गुंजित हो उठते हैं , मृत्यु पूर्व सुक़ून का मिलना असम्भव है भटकन स्वमेव मिट जाएगी, जब मृत्यु हमारा वरण कर लेगी, समस्त वेदना, समस्त सुख मृत शरीर मे लीन हो जाएंगे इस तरह मृगतृष्णा ही नही वरना मृत शरीर भी हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगा .... 💜🌸
मै बचाता रहा दीमक से घर अपना और चंद कुर्सी के कीड़े पूरा मुल्क खा गए..!!
बहुत मुमकिन है मासूमों को कातिल कह दिया जाए बहुत मुमकिन है कातिल को मसीहा चुन लिया जाए बहुत मुमकिन है मेरा कत्ल हो और मैं ही मुजरिम हूँ बहुत मुमकिन है मेरा घर जले और मैं ही मुल्जिम हूँ बहुत मुमकिन है गद्दारों को मसनद पर बैठाया जाए वफादारों को मुमकिन है कि सूली पर चढ़ाया जाए बहुत मुमकिन है आइंदा से हकगोई पर पहरा हो बहुत मुमकिन है मसनद पर जो बैठा है वह बहरा हो बहुत मुमकिन है जो घर के मुहाफिज हैं लुटेरे हों जिन्होंने सांप पाले हैं वह मुमकिन है सपेरे हों बहुत मुमकिन है जो खामोश हैं वह चीख उठें एक दिन बहुत मुमकिन है वह जो चीखते हैं मर मिटें एक दिन कलाम: कामरान गनी सबा @Pyari_Shayri
वो दे तो शुक्र उसका , न दे तो मलाल नहीं , मेरे रब के फैसले कमाल है , उन फैसलों पे कोई सवाल नहीं !
हमें माफ कर देना मेरी बच्ची हमने धर्म जीते मुल्क जीते मेडल जीते चुनाव जीते मनुष्यता से हार गए मेरी बच्ची हमें माफ कर देना कि हम, तुम्हारे रहने लायक मुल्क नहीं बना पाए जहां दिन और रात किसी भी समय सड़क पर बेखौफ घूम सको तुम हम बिकी हुई मनुष्यता वाले मुल्क के नागरिक हैं पहले खुद बिकेंगे फिर तुम्हे बेचेंगे हमने किताबों, ग्रंथों, चलचित्रों, रीलों में कामुकता नहीं भरी जेहन में भरी है जो अब सड़ांध मारने लगी है, हम विश्व की सबसे बड़ी विकृत मानसिकता वाले पुरुष हैं हम कामुकता से भरे चलते फिरते विस्फोटक है जिनसे हर बच्ची को खतरा है हम संकुचित धर्म संकुचित सोच संकुचित मनुष्यता लेकर जीवित हैं और बेशर्मी से उन्नत और विकसित कहते हैं खुद को हमारे विकास पर हमारे उन्नत होने पर हमारे चरित्र पर तुम शक करके बाहर निकलना मेरी बच्ची यह मुल्क दुष्चरित्र पुरुषों से अटा पड़ा है यहां का पुरुष स्त्री के संदर्भ में विश्वास के काबिल कत्तई नहीं है।। वीरेंदर भाटिया
जिसने तकदीरें लिखी है उसने कुछ तो सोचा होगा यूं बेवजह तो कोई किसी का नहीं होता
सारे ज़माने को मेरे अल्फ़ाज़ समझ आते हैं, तुम बताओ तुम किस दौर की ज़ाहिल हो,,,
हमीं तक रह गया क़िस्सा हमारा किसी ने ख़त नहीं खोला हमारा पढ़ाई चल रही है ज़िंदगी की अभी उतरा नहीं बस्ता हमारा मुआ'फ़ी और इतनी सी ख़ता पर सज़ा से काम चल जाता हमारा किसी को फिर भी महँगे लग रहे थे फ़क़त साँसों का ख़र्चा था हमारा यहीं तक इस शिकायत को न समझो ख़ुदा तक जाएगा झगड़ा हमारा तरफ़-दारी नहीं कर पाए दिल की अकेला पड़ गया बंदा हमारा तआ'रुफ़ क्या करा आए किसी से उसी के साथ है साया हमारा नहीं थे जश्न-ए-याद-ए-यार में हम सो घर पर आ गया हिस्सा हमारा हमें भी चाहिए तन्हाई 'शारिक़' समझता ही नहीं साया हमारा
धूप का नाम जो है साया तो साया ही सही आप कहते हैं अगर ऐसा तो ऐसा ही सही हम भी जीने का मोहब्बत में तमाशा कर लें ज़िंदगी जो है तमाशा तो तमाशा ही सही ग़ैर ही क़त्ल करे मुझ को ज़रूरी तो नहीं मेरा क़ातिल है शनासा तो शनासा ही सही हम ने कब इश्क़ को समझा है तिजारत जानाँ इश्क़ तुम से है ख़सारा तो ख़सारा ही सही प्यार तो कर के निभा लूँ मैं क़सम से 'ख़ंदा' प्यार गर वहम है धोका है तो धोका ही सही @shayar_ke_lafz
पल में मनुश है राम पुजारी पल में चेला रावन का पाप और पुन के बीच का धागा देखो कितना कच्चा है — सय्यद आशूर काज़मी
मैं रोना चाहता हूँ ख़ूब रोना चाहता हूँ मैं और इस के बअ'द गहरी नींद सोना चाहता हूँ मैं ये कच्ची मिट्टियों का ढेर अपने चाक पर रख ले तिरी रफ़्तार का हम-रक़्स होना चाहता हूँ मैं तिरे होंटों के सहरा में तिरी आँखों के जंगल में जो अब तक पा चुका हूँ उस को खोना चाहता हूँ मैं मिरे सारे बदन पर दूरियों की ख़ाक बिखरी है तुम्हारे साथ मिल कर ख़ुद को धोना चाहता हूँ मैं @shayar_ke_lafz
कल तक तो आशना थे मगर आज गैर हो दो दिन में ये मिज़ाज़ है आगे की खैर हो....!!
तुझ से मिल कर तो ये लगता है कि ऐ अजनबी दोस्त तू मिरी पहली मोहब्बत थी मिरी आख़िरी दोस्त लोग हर बात का अफ़्साना बना देते हैं ये तो दुनिया है मिरी जाँ कई दुश्मन कई दोस्त तेरे क़ामत से भी लिपटी है अमर-बेल कोई मेरी चाहत को भी दुनिया की नज़र खा गई दोस्त याद आई है तो फिर टूट के याद आई है कोई गुज़री हुई मंज़िल कोई भूली हुई दोस्त मैं उसे अहद-शिकन कैसे समझ लूँ जिस ने आख़िरी ख़त में ये लिक्खा था फ़क़त आप की दोस्त
अगर तलाश करूँ कोई मिल ही जाएगा मगर तुम्हारी तरह कौन मुझ को चाहेगा तुम्हें ज़रूर कोई चाहतों से देखेगा मगर वो आँखें हमारी कहाँ से लाएगा न जाने कब तिरे दिल पर नई सी दस्तक हो मकान ख़ाली हुआ है तो कोई आएगा मैं अपनी राह में दीवार बन के बैठा हूँ अगर वो आया तो किस रास्ते से आएगा तुम्हारे साथ ये मौसम फ़रिश्तों जैसा है तुम्हारे बा'द ये मौसम बहुत सताएगा! बशीर बद्र