Vi$h@L
Статистикаराष्ट्र और धर्म से जुड़ी जानकारियां आपको मिला करेंगी। प्रोपेगैंडा ध्वस्त किये जायेंगे और पॉलिटिकल करंट अफेयर्स पर आप अपडेट रहेंगे
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अब ये Sorrows की किस तरह दूसरी सरकारों में दखल है या यूं कहें कि उन्हें पलटाने में लगा रहता है वो किसी से अब छुपा नही क्योंकि दुनिया भर के देश ये बातें करने लगे हैं। इसी में एक फोटो लगाई है सुनीता विश्वनाथ की जिससे मदरनंदन पप्पू अमरीका में मिल रहा है। हालांकि ऐसे दर्जन से ऊपर कनेक्शन आपको मदरनंदन और Sorrows गैंग के मिल जाएंगे। अब वापिस ऊपर लिखी बात याद करो जो बंगलादेशी पत्रकार ने बताई थी कि लण्डन में मदरनंदन, BNP लीडर खालिदा जिया के बेटे से मिला था और अपना समर्थन इसने हसीना सरकार गिराने के लिए दिया था। अब इसी तरह मणिपुर याद करो जो मैंने गोल्डन ट्रायंगल वाली पोस्ट में बताया था कि कैसे मणिपुर विवाद और कुछ नही बल्कि सीआईए और अदृश्य राज्य का प्रोजेक्ट है जिसमें उसे एक "ईसाई देश" बना ड्रग्स का कारोबार वहां से चलाना है। साथ ही उसे बंगाल की खाड़ी के माध्यम से चीन और भारत पर अपनी दखल बनानी है। इसके साथ ही हसीना की बात याद करो कि एक अमरीकी "गोरा" आया था जो उससे बंग्लादेश मे मिलिट्री बेस मांग रहा था जिसे हसीना ने मना कर दिया। और अब वापिस यूनुस को जकड़ती बाइडन की फ़ोटो देखो जहां ऐसा दिख रहा कि यूनुस कह रहा "We did it Joe" और अब मैं तुम्हे वो मिलिट्री बेस दूंगा और तब तक मैंने बंग्लादेश ने मिलिट्री रूल लगा दिया है ताकि किसी तरह की दोबारा चुनाव कराने की बात न हो और जैसा यूनुस ने खुद कहा था कि मुझे "हालात" संभालने को अभी 5-6 साल चाहिए अर्थात तब तक कोई चुनाव की बात न करना। तब तक मैं अमरीकी हित के सारे फैसले कर दूंगा। और हर कोई जानता है बाइडन सरकार असल मे और कुछ नही बल्कि ओबामा 3.0 सरकार थी/है। और इस तरह एक अमिरिकी पालतू ने बंग्लादेश की चुनी और विकासशील सरकार को गिरवा दिया जिसमें शरिया वाले लोगों की मदद ली जो बंग्लादेश मे वही सब कर रहे जो किसी तालिबानी देश में होता है और जैसा आपको बता है कि तालिबान का अर्थ छात्र ही होता है तो ये "आंदोलन" और कुछ नही बल्कि एक तालिबानी आंदोलन ही था। हालांकि रूस से लेकर भारत ने साल भर पहले से हसीना को आगाह कर दिया था लेकिन हसीना शायद गलतफहमी में थी कि बंगलादेशी मिलिट्री चीफ उसका रिश्तेदार है तो वो ऐसे किसी भी आंदोलन को हैंडल कर देगी। और पुनः याद दिला दूं कि हसीना से समस्या आज की नही बल्कि एक दशक से भी ज्यादा समय से थी और तब से ऐसा माहौल बनाया जा रहा था कि हसीना तानाशाह है।। ठीक उसी तरह जैसे भारत मे माहौल बनाया जाता है कि मोदी तानाशाह है। लेकिन एक बात ये भी पक्की है कि मोदी, हसीना नही है और न भारतीय सेना कोई भाड़े की फौज है। इसलिए यहां ये प्रयास हमेशा विफल ही होते रहेंगे। लेकिन तब भी ये तरह तरह के प्रयास करते रहेंगे, बस हमें पहले से पता रहना चाहिए कि कुछ भी यूं ही नही हो रहा, हर चीज "संयोग नही प्रयोग"(जैसा मोदी ने कहा था) है। पढ़ने के लिए धन्यवाद
☝️☝️☝️ We did it Joe.. कुछ इसी तरह के शब्द कहे होंगे यूनुस ने जब बाइडन ने उसे "शाबाश मेरा मुन्ना" कहकर यूं गले से लगाया। नही, मजाक नही है। हाल में जब यूनुस क्लिंटन ग्लोबल इनिशिएटिव के मंच पर बिल क्लिंटन के साथ खड़ा था तो यही बता रहा था कि कैसे "हमने" कर दिखाया। इसने वहां कहा कि सब कुछ सब बड़ी बारीकी और वेल प्लांड तरीके से हुआ कि किसी को(हसीना को भी) पता नही चल पाया। इसने कहा कि मैं और महफूज आलम इसके(रिजीम चेंज के) पीछे के ब्रेन थे। अच्छा अब ये महफूज आलम कौन है जो बाएं तरफ सबसे नीचे की फ़ोटो में यूनुस और लड़की के बगल में खड़ा है? ये Hizbut Ut-Tahrir का लीडर है। ये एक टँकी संगठन है जो कई देशों में बैन है। भारत मे ये संगठन नही है लेकिन माना जाता कि गुपचुप तरीके से काम करता है क्योंकि इसके पीछे जमात ए इस्लामी है। इसका मोटो है कि पूरी दुनिया को शरिया के अधीन लाना। अब इस महफूज आलम को यनुस ने अपना स्पेशल सेक्रेटरी बना दिया है। ध्यान हो कि बंग्लादेश में जो कुछ हुआ उसको दो ग्रुप लीड कर रहे थे। एक जमात ए इस्लामी और एक BNP. वही BNP जिसकी लीडर खालिद जिया है और जिसके बेटे से लण्डन में पप्पू मिल रहा था और इस रिजीम चेंज के लिए अपना सपोर्ट दे रहा था, जैसा बंगलादेशी पत्रकार ने दावा किया था। इसके अलावा हसीना सरकार को गिराने में इस्लामिक स्टेट खुरासान(ISKP) और अल कायदा के ग्रुप भी शामिल थे, इसीलिए आपने इस "प्रोटेस्ट" में इस्लामिक स्टेट के झंडे भी देखे थे। और जैसा आप जानते हैं कि दुनिया का सबसे बड़ा टँकी संगठन सीआईए है जिसने ही इस्लामिक स्टेट और अल कायदा को पैदा किया था। अब यदि आपको कथित प्रोटेस्ट पता हो तो हसीना सरकार मुक्तिवाहिनी और अन्य को मिलने वाले आरक्षण को खत्म कर देती है। इसके खिलाफ हाईकोर्ट फैसले को पलट देता है। इसका बहाना बन प्रोटेस्ट शुरू होता है। लेकिन हसीना सरकार सुप्रीम कोर्ट में जाकर वापिस हाईकोर्ट के फैसले को पलट आरक्षण खत्म कर देती है। लेकिन ये कथित प्रोटेस्ट फिर भी चलता है और हिंसा में बदल जाता है। आगे क्या हुआ वो आपको पता है। लेकिन सवाल ये था कि आरक्षण तो दुबारा हाइकोर्ट ने लागू किया तो प्रोटेस्ट हाईकोर्ट के खिलाफ क्यों नही हुआ? वो भी उन बहादुर तालिबानियों(छात्रों) द्वारा जिन्होंने रिजीम चेंज के बाद सुप्रीम कोर्ट का घेराव कर सभी जजों से इस्तीफा दिलवा दिया?? तो इसके आपको मणिपुर आना होगा। मणिपुर में भी हाईकोर्ट मैतई समाज को ST का दर्जा दे देता है। यहां भी इसके खिलाफ आंदोलन होने लगता है। लेकिन हाईकोर्ट के खिलाफ नही, मुख्यमंत्री बिरेन के खिलाफ। बिरेन सरकार सुप्रीम कोर्ट जाकर फैसला पलट देती है लेकिन मणिपुर तब भी जलता रहता है क्योंकि मकसद ही बिरेन की सरकार को पलटाना होता है। हालांकि इधर ये सफल न हो सके और अभी भी हिंसा कर रहे हैं जिसका कारण आपको पहले बताया ही है। तो इस तरह के "छात्र आंदोलन" को यूनुस क्रांति बता रहा है। कह रहा है कि मैं खुद साथ मे इस "आंदोलन" को लीड कर रहा था। लेकिन यूनुस कौन है? यूनुस एक अदृश्य राज्य का पालतू है। इसे नोबेल दे रखा है। किसलिये? क्योंकि इसने बंग्लादेश में एक ग्रामीण बैंक खोल था जिसमें महिलाओं को भारी ब्याज(करीब 15-25%) पर लोन दिया जाता था। इसके लिए इसे और इसके बैंक को 2006 में नोबल मिला। लेकिन ये बैंक असल मे काले का सफेद या यूं कहें कि मनी लॉन्ड्रिंग का काम करता है। अब वो पैसा ड्रग का है, ह्यूमन ट्रैफिकिंग, आतंक या किसका है, ये कभी बाहर नही आया और शायद अब आएगा भी नहीं। अच्छा जब इसकी जांच हसीना ने शुरू की तो उसको धमकी पता किससे मिली? हिलेरी क्लिंटन से जो तब अमरीका की विदेश मंत्री थी(2011 में सेक्रेटरी ऑफ स्टेट डिपार्टमेंट)। ये हिलेरी अमरीका के अलग अलग डिपार्टमेंट से यूनुस के बैंक में पैसा पहुंचाती थी जिसका खुलासा अमरीका में ही हुआ था। हिलेरी ने उस समय भी अपने स्टेट डिपार्टमेंट, बंग्लादेश में अमरीकी एम्बेसी और वर्ल्ड बैंक से भी हसीना को धमकी दिलवाई कि यदि हसीना ने यूनुस के खिलाफ कार्यवाही की तो अच्छा नही होगा। यहां तक कि वर्ल्ड बैंक द्वारा पद्मा ब्रिज प्रोजेक्ट को जो 1.2 बिलियन लोन दिया जा रहा था, उसे भी हिलेरी ने हसीना को धमकाने को रुकवाने की कोशिश की। तो इस तरह यूनुस के सम्बंध, हिलेरी परिवार से रहे हैं। अब जैसा कि आप जानते हैं कि अदृश्य राज्य का जो इस समय वर्तमान कबाल अमरीकी पॉलिटिक्स में काम करता है वो है हिलेरी-ओबामा कबाल। 2009 में ओबामा, यूनुस को जो मेडल पहना रहा है वो है "मेडल ऑफ फ्रीडम" जो कि अमरीका का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है। इसके साथ ही अदृश्य राज्य के लिए जो अम्बेसडर का काम करता है उसका नाम जा Sorrows..
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☝️☝️☝️ जिन लोगों को गलतफहमी है कि इस देश मे सब एक से एक कट्टर देशभक्त हैं, उन्हें पहले भी बता चुका हूँ कि नेतन्याहू से पहले जो सरकार चल रही थी उसका गठबंधन एक अरब पार्टी नामक दल से था और ये सब मिलकर सेक्युलर सरकार चला रहे थे। अब फिर आपदा में अवसर के नाम पर इन्होंने सरकार के खिलाफ सड़को पर लाखों लोग खड़े कर दिए क्योंकि अदृश्य राज्य को नेतन्याहू भी बिल्कुल पसंद नही है। अब कंधार हाईजैक पर आ जाइये। आज कांग्रेस कह रही कि भाजपा ने टँकी छोड़ दिये थे जबकि हकीकत ये थी कि सरकार तब हर प्रयास कर रही थी कि कैसे अपने लोग छुड़ाए। लेकिन सोनिया अपने पालतुओं को लेकर प्रधानमंत्री आवास के बाहर चूड़ियां तुड़वाने लगी कि ये भाजपा सरकार अपनी अकड़ में कितने लोगों को विधवा कर देगी। फिर ऑल पार्टी मीटिंग हुई और ये तय हुआ कि हम टँकी छोड़ देंगे अपने नागरिकों के लिए। अब दोनों जगह के कुछ अनकहे पहलुओं की बात हो जाये तो जब अटल जी से पहले ठगबन्धन वाली वामपन्थी सरकार बनी थी जो भले ही कुछ अंतराल की रही हो लेकिन उसने पाकिस्तान से "अमन की आशा" के नाम पर रॉ डेस्क बन्द करवा दी। हमारे सारे एसेट्स निष्क्रिय करा दिए गए और तब जाकर जब कोई कारगिल या कंधार या संसद हमला हुआ तो उस समय हम वापिस पाकिस्तान में अपने एसेट्स बनाने में लगे थे। ये सच है कि सूचना आ रही थी लेकिन एक्सएक्ट सूचना का अभाव था और इसमें तो एक हेमंत करकरे का एंगल भी सामने आता है। और इसी तरह जो हमला 7 अक्टूबर को हुआ, उससे पहले जब नेतन्याहू की सरकार गिर चुकी थी और अरब पार्टी वालों के साथ ठगबंधन वाली सरकार चल रही थी तो अभी कोई नही जानता कि उस ठगबंधन वालों ने मोसाद के कितने एसेट्स निष्क्रिय किये होंगे, जिस वजह से मोसाद को इतने बड़े हमले की पुख्ता जानकारी न मिल पाई हो। खैर, भविष्य में जरूर बाहर आएगा कि उधर भी कहाँ चूक हुई यदि वो बताना चाहेंगे। तो इस तरह एक एन्टी-नेशन सरकार अपने ही देश को खोखला करती है। कभी अटल जी के समय तो NSA तक सोनिया का खास था तो कितनी सूचनाएं देता होगा आप समझ सकते हैं। आज इन्हें अजित डोभाल खटकता है क्योंकि कंधार हाईजैक के समय उनके पास प्लान था, लेकिन इतना दबाव सोनिया और उसका गिरोह बना रहा था कि वो एक्सीक्यूट ही न हो सका। बाकी आप गलतफहमी छोड़ दीजिए कि इज्जरैल वाले सब एक नम्बर के देशभक्त हैं। उधर भी वही हाल है जो इधर है। बस फर्क इतना है कि उसके पास गुंजाइश नही है युद्ध को अपने छोटे से भूभाग के अंदर आने देने की। तबाह हो जाएगा वो इसलिए ऑल अटैक कर डालता है।
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अंबेडकर की कितनी भी कड़वी सच्चाई हो लेकिन उसे करोड़ो लोग पूजते हैं। गांधी के कितने ही किस्से हों लेकिन वो भारत की तरफ से एक अंतराष्ट्रीय ब्रांड है। लेकिन चुइयों को चाहिए कि इनका सच बाहर आना चाहिए, परिणाम कुछ भी हो। मैं अक्सर बताता हूँ कि जिन्ना एक सुवर खाने वाला शराबी था लेकिन बुल्लों ने उसे हीरो बनाया क्योंकि कमियों या कारनामो से बड़ा उनके लिए मकसद था। एक और पाकिस्तानी था जिसने पाकिस्तान को परमाणु बम लाकर दिया लेकिम जबतक नही मिला वो हीरो रहा और फिर अहमदिया घोषित कर दिया गया जिसकी कब्र को अब अपमानित किया जाता है। यही अहमदिया तो पाकिस्तान बनाने में सबसे आगे थे जिनको आज काफिर घोषित कर रखा है। जिस उर्दू को पाकिस्तान की राष्ट्र भाषा कहा जाता है उन्ही उर्दू बोलने वालों को आज भी वहां मुहाजिर कहा जाता है। ये सब इसलिए बता रहा कि बुल्ले अपने मकसद के लिए गधे को भी बाप बना देते हैं और जब मकसद पूरा हो जाए तो उसी गधे के फिर लात भी मार देते हैं। वर्तमान में ये बंग्लादेश में हो रहा कि जिस शेख मुजीबुर्रहमान ने बंग्लादेश बनाकर दिया, उसी की मूर्तियां तोड़ दी जा रही हैं और उसकी बेटी भारत मे शरण लिए है। जबकि हिन्दू चुइया मकसद नही समझता, बल्कि बकचोदी करना जानता है। उसे गांधी को गाली देनी है, अंबेडकर हो गाली देनी है... और उम्मीद करता है कि सरकार भी उसका साथ दे, और नही दिया तो सरकार फट्टू है फिर भले ही सत्ता हाथ से चली जाए। वो सत्ता जिसे पाने को शत्रु विदेशी शक्तियों से हाथ मिला, यहां हिन्दुओ को जाति में तोड़ रहा है और आंशिक सफल भी हुआ है। अब इसी क्रम में इनकी हिन्दू शेरनी कंगना है। वो शेरनी जो मुन्नवर जैसे को शो जितवाती है और जिस सुशांत के नाम पर भांडवुड को गाली दी जिसमें सबसे बड़ा हाथ सलमान का बताया जा रहा था, उसी को अपना बाप बता गयी। ऐसी शेरनी इनकी नई अम्मा है आजकल। कोई फर्क नही पड़ता है कि इस शेरनी की बकचोदी से शत्रु मुद्दा भुना ले जाये कि किसानों को बलात्कारी, हत्यारा कहा जा रहा और आज जो पंजाब बॉर्डर पर तमाशा है, कल को हरियाणा जहां भी 70% किसान है वहां कांग्रेस को लाकर, कांग्रेस हरियाणा बॉर्डर खोल इन आढ़तिये आन्दोलनजीवियों को दिल्ली में घुसा दे जिन्हें खट्टर ने हरियाणा में तक घुसने नही दिया था। बस, शेरनी ने तो सच बोल दिया जैसे किसी को तो वो सच पता ही नहीं था और सच जानकर भी कितना फर्क पड़ गया था किसी को। इसीलिए गांधी और अंबेडकर के उदाहरण दिए कि सच किसीका कितना भी हो लेकिन उस सच की बकचोदी करने का क्या परिणाम निकलेगा, उसके बारे में चुइये नही सोचते... लेकिन सरकार को सबकुछ सोचकर चलना पड़ता है। उनके लिए लड़ाई शत्रु को सत्ता से दूर रखने की है नाकि सच की पिपडी बजाने की। वरना सच तो सोनिया के भी बहुत हैं, इस शेरनी कंगना के भी बहुत हैं तो क्या बस सच खोदने में ही लगे रहें बिना उसके दुष्परिणाम के?? इसी तरह पाकिस्तान का उदाहरण इसलिए दिया कि उन्होंने सच तब तक नही स्वीकारा जब तक मकसद पूरा न हो जाये जबकि हमारे मकसद अभी सालों साल पूरे नही होने क्योंकि इतनी सारी डिमांड इन्ही चुइयो की रहती है सरकार से.. हालांकि चुइये इसे कभी नही समझेंगे और न सरकार पर इतना टाइम है कि वो चुइयो को समझाए क्योंकि सरकार चुइयो से ज्यादा चुनौतियों पर फोकस करती है। और चुनौती है कि कैसे इन आसुरी शक्तियों से देश को बचाया जाए वरना ये देश बर्बाद हो जाएगा और जो आज बड़ा फुदकते हैं कि हम तो सच्चाई की औलाद हैं, उन्हें दो मिनट में फिर आसुरी शक्तियों को चुप कराना भी आता है। हाल की ही खबर है कि जयपुर डायलॉग्स पर कर्नाटक में केस कर दिया गया है पप्पू और सोनिया पर बोलने को... वो भी तब जब तीन राज्य में इनकी सरकार है.. इसलिए शायद "खुद की" सरकार की मदद से बच भी जाएंगे... वरना कांग्रेस केंद्र में आ गयी तो किधर जिंदा गाड़ेगी, खुद को भी पता नही चलेगा... ये कांग्रेस का इतिहास रहा है। इसलिए ज्यादा न उछला करो... कोई सरकार तुम्हे कुछ नही कहती तो खुद को तीस मार खां समझना बन्द कर दो। खासकर दो कौड़ी के मठाधीश जिनके दुष्प्रभाव में आकर हर ऐरा गैरा फेसबुकिया भी बकचोदी करने लगता है। ये मठाधीश तो साले बिके हुए दल्ले हैं... चार टुकड़े फेंक दे कोई तो उनके आगे दुम हिलाने लग जाएंगे। हो सकता है कि चुनाव से चार दिन पहले खुद को सबसे बड़ा भक्त बताने लगे जाएं लेकिन पूरे 4 साल 11 महीने ये कितना डेमेज कर देते हैं उसका अंदाजा बस लगाया भर जा सकता है। इसलिए वाकई इस देश मे आसुरी कांग्रेस को नही चाहते तो इन जैसों को सुनना बन्द कर दो। और ये आखरी लाइन का सुझाव सिर्फ अपनो के लिए है। चुइयो को समझाना मैंने बन्द कर दिया है।
☝️☝️☝️ पहले हमारे यहां कितने भी हमले हो जाएं, हमारे अंदर बीमारी थी कि डायलॉग्स बन्द नही होने चाहिए लेकिन अब हमने कुत्तों के आगे रोटी डालना बन्द कर दिया है। पहले आप भी देखते रहे होंगे कि यहां से "अमन की आशा" टाइप ब्रिगेड धड़ल्ले से पाकिस्तान जाया करती थी और सेमिनार आदि के नाम पर वहां ISI से ट्रेनिंग लेकर आती थी कि भारत को कैसे अनरेस्ट रखना है या उनके इशारे पर काम करना है। 2014 के बाद इस अमन की आशा, बड़ी बिंदी ब्रिगेड पर ताले लग गए। इसके बाद इन्होंने नया हथकंडा अपनाया कि जो ISI के अन्य देशों में डेस्क हैं ये वहां विदेशी टूर के नाम पर जाने लगी। चूंकि ISI दुनिया भर में अपनी ऐसी डेस्क ऑपरेट करता है जिसका स्पेशल बजट भी होता है तो वो इन ब्रिगेड वालों को होस्ट करता है और फिर इन्हें आदेश देता है कि क्या करना है और कैसे करना है। सोवियत के समय तक अमेरिका को भी यदि भारत मे दखल देनी होती थी तो वो इसी iSI की मदद लेता था क्योंकि ISI के यहाँ असेट्स बन रखे थे लेकिन सोवियत के टूटने के बाद जहां उसके असेट्स को चीन ने हथिया लिया, उसी तरह अब ISI के असेट्स पर डायरेक्ट अब सीआईए की पहुंच हो गयी चूंकि पाकिस्तान भी कमजोर होने लगा था। आज जो भी लिब्राण्ड, गद्दार किस्म के आपको भारत से बाहर जाकर एजेंडा सेट करने में लगे रहते हैं ये वही असेस्ट्स या उनकी नई नस्ल हैं। ये लोग ISI के ही विदेशी डेस्क का प्रयोग करते हैं लेकिन पैसा चूंकि पाकिस्तान के पास नही है तो उसकी फंडिंग चीन या अमेरिका द्वारा होती है। ये लोग अब खुलकर पाकिस्तान भक्ति नही कर पाते तो सोरोस या चीन भक्ति के नाम पर देश मे वही सब करना चाहते हैं जो ISI कभी इनसे करवाता था। ISI को भी इसमें फायदा दिखता है क्योंकि वो तो चाहता ही भारत की बर्बादी है तो वो इन्हें पूरा सपोर्ट देता है। इसीलिए आप देखते भी होंगे कि पाकिस्तान पर कोई चोट करो इन्हें दर्द होता है। उसकी भाषा ये दुनिया भर में बोलते हैं। पैसों के लिए चीन या सोरोस के गोद मे भी ये खुलेआम आपको बैठे मिलते हैं और जैसा इन्हें सीखाया होता है ये वो कहते हैं। " भारत तेरे टुकड़े होंगे" अब खुलकर नही बोलते तो कोई भारत को यूनियन बताएगा, जातिवाद करेगा, अल्पसंख्यक खतरे में कहेगा, तो कोई सनातन को ही समाप्त करने की बात करेगा।
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☝️☝️☝️ भारत का सबसे बड़ा पत्रकार वर्तमान में कोई है तो वो है अर्नब गोस्वामी। कोई अर्नब को पसन्द करे या न करे लेकिन यही सच है। इसलिए जब ये बंग्लादेश में अदृश्य राज्य ने घुसपैठ की तो मुझे पूरी उम्मीद थी कि अगर कोई इसके खिलाफ मीडिया फील्ड से सामने खड़ा किया जाएगा तो वो अर्नब ही होगा। और यही करना भी था। हम कहते हैं कि उनके लोग हमारे यहां दखल दे रहे, अपने एजेंट्स तैयार कर रहे तो हम क्यों नही करते? लेकिन इसका जवाब यहां छुपा था कि आज जो उधर वाले कर रहे उससे पहले उन्होंने अपनी मीडिया से भारत के खिलाफ प्रोपेगैंडा करना शुरू किया था, फिर वो इनका CNN हो, BBC हो, अल जजीरा हो या इनके NYT जैसे प्रिंट मीडिया वाले हों। अब मैं क्यों कहा रहा कि मुझे उम्मीद थी कि अर्नब को ही खड़ा किया जाएगा सबसे पहले तो, अर्नब ही वो बंदा है जिसने कहा था कि मैं अपनी मीडिया को इंटरनेशनल ले जाऊंगा। वैसे तो DD न्यूज से लेकर अडानी(NDTV) भी ये कह चुके थे लेकिन DD न्यूज की भारतीयों के बीच ही वो पकड़ अब नही बची जैसी बीबीसी(सरकारी) की अभी तक दुनिया भर में कायम है। अडानी ने तो NDTV खरीदा नही था कि उसपर हमला हो गया था तो अडानी का प्लान अभी रुका हुआ है तो एकमात्र कोई ये शुरुआत कर सकता था जिसकी रीच भारत के हर घर तक है तो वो है अर्नब... और सबसे अच्छी बात ये हुई कि जिस अर्नब को अंग्रेजी घरों का टॉपमोस्ट पत्रकार माना जाता था, उसने अपना हिंदी चैनल लांच कर अपनी पहुंच बाकी के लोगों तक भी पहुंचानी पहले ही शुरू कर दी थी। इसी वजह से अर्नब ने वो काम शुरू किया है जहां से शुरुआत करनी है। अर्नब चाहे तो अपनी मीडिया को इंटरनेशनल बनाने को फंडिंग भी मांग सकता है, ठीक उसी तरह जैसे भाजपा के सांसद ने ही अर्नब को रिपब्लिक लॉन्च करने को फंड किया था(हालांकि अब अर्नब ने वो सारा पैसा चुका दिया है)। क्योंकि सबसे पहले हमें अपना CNN या BBC या अल जजीरा चाहिए। एक बार ये हो जाये तो हम दुनिया भर से एन्टी अदृश्य राज्य वालों को अपनी टेबल पर ला सकते हैं, इसके बाद जब ये हो जाएगा तो हमारे दूतावासों का खेल शुरू होगा जिसको प्रचारित हमारा मीडिया करेगा कि फलां को आज उस एम्बेसी ने मीटिंग में बुलाया या फलां डिप्लोमेट उस एन्टी अदृश्य राज्य वाले से मिला। क्योंकि अभी जब हम ये करते भी हैं तो हमारी रीच नही है दुनिया मे इसे फैलाने की जैसी वेस्ट की मीडिया की है। आप ऐसे में बुला भी देंगे तो भी वेस्ट इसे कवर नही करेगा या अपने हिसाब से इसे कवर करेगा। दोनों सूरत में हमारा फायदा नही होगा क्योंकि फिर जो आगे आकर कुछ कहना चाहते होंगे वो किस प्लेटफॉर्म पर आकर अपनी बात रखेंगे। ऊपर से सोशल मीडिया भी उनके कंट्रोल में है। इसलिए अर्नब से शुरुआत अच्छी हुई है। बाकी भारतीय मीडिया भी यदि एक दूसरे से जलन भुला आगे आये तो ये हमारे फायदे में होगा लेकिन इधर तो बुरा हाल ये है कि जब अर्नब गिरफ्तार कराया गया तो कोई भी दूसरा "राष्ट्रवादी" पत्रकार उसके समर्थन में एक न्यूज फीड तक नही चलाया।
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मोहनदास भी तो ऐसा ही कॉरिडोर चाहता था जो भारत को चीरकर वेस्ट से ईस्ट पाकिस्तान जाए। लेकिन नाथूराम ब्रो ने कहा "मुझे मंजूर नही है" बाकी जूट(टेक्सटाइल) का काम अब हम देख लेंगे, कंगलुओं को शरिया मुबारक। अगले 5 साल में हमारा टारगेट 350 बिलियन तक के एक्सपोर्ट पर पहुंचने का है जो अभी 60 बिलियन पर चल रहा है।
इसलिए यहां प्रश्न ये है कि क्या हिन्दू को जो चाहिए वो उसके लिए किसी मुस्लिम परस्त कांग्रेस को लाने की गलती कर सकता है अपनी बेवकूफियों से?? क्योंकि फिर जो उसके लिए बने भविष्य के प्लान होंगे वो छोड़ो, वर्तमान का ही बहुत कुछ मुस्लिम लीग वाले बर्बाद कर देंगे और आपको तब जाकर एहसास हुआ भी तो वापिस सत्ता में आने के बाद फिर से शुरुआत से शुरू करना पड़ जायेगा। अंत मे कि, वर्तमान भी एक महाभारत है। एक धर्म युद्ध। इसमें भी सिर्फ तलवार भांजने भर से युद्ध नही जीता जाएगा बल्कि स्ट्रेटजी के साथ तलवार भांजने पर ही सफलता मिलेगी। हर युद्ध मे वही जीतता है जिसके पास स्ट्रेटजी हो और स्ट्रेटजी से पहले सब्र हो। क्योंकि धैर्यपूर्वक एक स्ट्रेटजी बनाकर हम 2 हफ्ते में बंग्लादेश बना दिए थे जबकि जिस रूस ने तब मदद की वो बिना स्ट्रेटजी के यूक्रेन में कूद गया और 2 साल हो चुके, युद्ध वहीं का वहीं अटका हुआ है। इसलिए युद्ध मे बलिदान होने का शौक भी है तो एक सफल बलिदान देना चाहिए, वरना मृत्यु व्यर्थ ही मानी जाती है।।
इस देश मे दो प्लान पर काम हो रहा है। 2047 तक मुस्लिम राष्ट्र बनाना या 2047 तक हिन्दू राष्ट्र बनाना मोदी का जो डाक्ट्रिन है वो 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने का है। जिस दिन भारत ट्रिलियन्स डॉलर इकोनॉमी बन जायेगा, उसकी हुकूमत दुनिया पर चलेगी। हमारी कही बात को दुनिया मानेगी। हमसे निवेश की मांग करने दुनिया के छोटे देश आएंगे। हमारी पॉलिसी दुनिया पर लागू होंगी। हम जब कर्ज देंगे या हथियार या तकनीक, तो दुनिया हमारी बात पर चला करेगी। एक विकसित राष्ट्र यही सब तो करता और करवाता है। क्योंकि उसके पास पैसा है, तकनीक है, दूसरे का सबकुक बिगाड़ देने की क्षमता है। यही अमरीका करता है, यही चीन कर रहा है। और जब आपके पास क्षमता होती है तो आपके लाख पाप माफ हो जाते हैं। दुनिया मे कोई आवाज उठाने वाला नही होता। मीडिया से लेकर बुद्धिजीवी आपके कंट्रोल में होते हैं। और यही तो हिन्दू राष्ट्र बनाने का सपना है नाकि किसी कागज पर खुद को हिन्दू राष्ट्र लिख देना। नेपाल भी हिन्दू राष्ट्र था लेकिन क्या उखाड़ लिया उसने? उल्टा वहां से हिन्दू राजशाही उखड़ गयी क्योंकि वो एक कमजोर राष्ट्र भर था। उल्टा जैसे जैसे आपका वैभव बढ़ेगा तो आपके फैसलों पर कोई प्रश्नचिन्ह नही लगा पायेगा। आपके पास अगले 24-25 साल हैं। एक राष्ट्र के रूप में इतना समय चुटकियों जैसा होता है। अगर कोई सोचे कि मेरे जीते जी मुझे सब चाहिए तो वो मूर्ख है। इन 25 सालों में जैसे जैसे आप आगे बढ़ेंगे, आपके हित के फैसले भी आते रहेंगे। कुछ पिछले 10 साल में आये तो कुछ इस पांच साल में आएंगे। ऐसे ही आगे के समय मे भी हिंदुओं को असली हिन्दू राष्ट्र देने के फैसले होते रहेंगे। इस साल वक्फ पर कानून आ रहा तो इस कार्यकाल में UCC भी आएगा। किसी साल NRC आ जायेगा तो किसी साल जनसँख्या नियंत्रण कानून। कोई साल धर्मांतरण बिल का होगा तो क्या पता कोई साल घर वापसी बिल ही आ जाये। किसी साल भारत के संविधान से सेक्युलर हटा, भारत एक सनातनी देश है भी आ जाये.... और ऐसे ही कुछ न कुछ समय के साथ आता जाएगा। बस शर्त इतनी होगी कि क्या हम अपनी सरकार अगले 25 साल तक बना कर रख पाएंगे या "अभी नही तो कभी नही" के ढर्रे पर चलकर अपना नुकसान करेंगे। क्योंकि किसी बड़े मकसद के लिए सबसे पहले धैर्य लगता है। 70 साल में जो आपके खिलाफ हुआ, उसी मिशन की बात 2047 तक पूरी करने का प्लान है कि आजादी के 100 साल में 1947 में जैसा पाकिस्तान बना, वैसे ही भारत को भी इस्लामिक राष्ट्र बना देंगे। तब तक उनकी कोशिश है कि सत्ता उनके हाथ मे वापिस आये क्योंकि उनके मिशन को ब्रेक लग गया है। इस वजह से उन्हें कोई फर्क नही पड़ता कि कांग्रेस सॉफ्ट हिन्दू का नाटक करे या हिन्दू को जातियों में तोड़ अपनी हुकूमत बनाये क्योंकि उन्हें पता है कि कांग्रेस का डीएनए ही इस्लामिक है तो इसके आने से इस्लाम ही मजबूत होगा। इस वजह से ही वो कोई शिकायत नही करते। शिकायत छोड़ो, किसी घटना पर यूं मुंह फेर देते हैं कि कुछ हुआ ही नही है। लेकिन हम क्या कर रहे हैं सवाल ये है। हमारे अंदर ऐसा सब्र है क्या कि हम आजादी के 100 साल में अपने को कहां देखना चाहते हैं? क्या हमारे अंदर ये सब्र है कि जो आज नही मिला वो कल मिल जाएगा, बस हम अपनी सरकार को सत्ता से दूर नही होने देंगे। क्योंकि यहां तो सबसे बड़ा कीड़ा "सही को सही गलत को गलत" करने वाला है जो शत्रु के अंदर बिल्कुल नही है। इसे इस तरह समझो कि हमें नैतिकता से युद्ध करना सिखाया, सांझ होते ही हथियार रखने की सीख दी... लेकिन शत्रु ने न नैतिकता देखी और न रात, वो जब मौका लगा टूट पड़ा और हम सब हार गए। क्योंकि शिकायतें तो कभी खत्म नही होती। आज जो जो मांग है वो सब आज ही पूरी हो जाएं तो क्या नई माँग पैदा कर हम वही राग नही अलापने लग जाएंगे कि ये नही मिला तो हम सबक सीखा देंगे? हम जरूर करेंगे क्योंकि डीएनए तो हिन्दुओ का ऐसा ही है। हिन्दू एक अतृप्त आत्मा है जिसे भगवान भी तृप्त नही कर सकता।। इसलिए कह रहा कि क्या हमारे अंदर सब्र है क्योंकि सरकार की पाइपलाइन में तो बहुत से प्रोजेक्ट होंगे। कुछ ऐसे भी होंगे जिनपर हिन्दुओ का अभी ध्यान तक नही है। लेकिन सबका टाइम उनके हिसाब से आएगा। सरकार बहुमत से दूर हुई तो उस हिसाब से उस टाइमलाइन में फेरबदल भी होगा, और सरकार बहुमत में रही तो एक ही साल में दो बड़े कानून तक आ जाएंगे। बस शर्त ये है कि हमे अपनी सरकार अगले 25 साल तक चाहिए। क्योंकि जब एक कांग्रेस की सरकार किसी हिमांचल या कर्नाटक में आती है तो वो 5 साल में उस राज्य की आर्थिक हालत तक बर्बाद कर देती है, बाकी सब तो भूल ही जाओ.... जिसे फिर अगले 5 साल भाजपा को भरने में ही लग जाते हैं जिस वजह से अपना योगदान तो वो पूरी तरह दे ही नही पाते,
कुछ दिनों पहले पाकिस्तान पर BLA की मजीद ब्रिगेड का जबरदस्त हमला हुआ था। TTP वाले भी आय दिन लाहौरी आर्मी को पेलते हैं और कुछ दिन पहले ब्रिगेडियर जनरल(शायद) और उसके परिवार को अगवाह कर ले गए। दूसरी तरफ गार्डियन ने खबर छापी थी कि Raa, TTP के अंदर घुसपैठ कर चुकी है और उनके हाथों अपने दुश्मनों का खात्मा करवा रही है। सीआईए की एक अधिकारी भी इस तरह का प्लान बता चुकी है। फैंटम ब्रोज़ तो खैर ब्रिटेन कनाडा में तक झंडे गाड़ चुके हैं। अमरीका में भी गाड़ लेते लेकिन पन्नू बच गया जिसके बाद उसने प्लान बनाया कि भारत पर आरोप लगाता हूँ कि वो मुझे मारना चाहता है जिसपर अमरीका ने यूरोप से किसी बंदे को गिरफ्तार किया लेकिन कुछ समय पहले वाशिंगटन पोस्ट में खबर छपी कि पन्नू ने सारा विक्टिम प्लान रचा था। कहने का मतलब कि अमरीका की भी औकात न है कि उसकी लफंगी सीआईए हमारे लोगों को पकड़ सके। खैर, ये सब इसलिए कि अभी हाल में पाकिस्तान के एक बड़े आतंकी ने कहा है कि भारत के रेल नेटवर्क पर हमला कर भारत की सप्लाई चेन बाधित करो। मोदी घृणा में पहले से ही वंदे भारत पर हमला होता है क्योंकि इंडी गिरोह के समर्थकों के लिए वो "मोदी की ट्रेन" है। ठीक वैसे ही जैसे एयर इंडिया वन, मोदी का प्लेन है या प्रधानमंत्री आवास, मोदी महल है। इससे आप समझ चुके होंगे कि रेल जिहाद की जो कोशिशें हो रही वो कहाँ से ऑपरेट हैं। दूसरी तरफ आप बंग्लादेश में देख रहे कि जमात ए इस्लामी खुलकर नंगा नाच कर रहा क्योंकि वो पाकिस्तान की पालतू संस्था है जिसका गर्भनाल भारत है जिस वजह से इधर भी बंग्लादेश जैसे हालात के सपने देखे जाते हैं। जबकि उधर जिस मुक्ति वाहिनी को रॉ ने प्रशिक्षित किया था वो बंग्लादेशी जिहादियों के दुश्मन हैं क्योंकि उन्होंने गजवा ए हिन्द की प्रयोगशाला(पाकिस्तान) को दो टुकड़ों में काट दिया था जो इनके लिए बहुत बड़ा धक्का था। इसलिए शेख हसीना समर्थक हो या हिन्दू, दोनों इनके लिए काफिर और इस्लाम का शत्रु है। इसके उलट जैसा शुरू में बताया कि BLA हो या TTP वो लाहौरी आर्मी को ठोक रही है। फिलहाल सब दबे मुंह से बात करते हैं कि इन्हें सूचना से लेकर ट्रेनिंग या लॉजिस्टिक कौन देता है लेकिन ये तब तक किसी मुक्ति वाहिनी की तरह खुलकर सामने नही आएगा जब तक मिशन सफल नही हो जाता। इसी की फ्रस्ट्रेशन जम्मू कश्मीर से लेकर बंगलादेशी बॉर्डर पर दिखती है। म्यांमार बॉर्डर पर भी दिखती है क्योंकि चीन के भी हित इन कामो से खटाई में पड़ जाते हैं। अमरीका को तो खैर हर जगह ही दिक्कत है क्योंकि अगर तुम ब्रिटेन और कनाडा जैसे देशों में दखल दोगे तो वो भी तुम्हारे पड़ोस में आकर अपनी औकात दिखायेगा ही। बाकी... ये लगातार चलने वाला चेस गेम है। बस तुम्हे अपनी साइड चुनकर रखनी है और अपनी लीडरशिप पर विश्वास बनाये रखना है।
मदरनंदन अमरीका जा रहा है। अमरीका में चुनाव हो रहे हैं। लेकिन मदरनंदन की उन्हें इसके लिए जरूरत है नहीं क्योंकि अमरीका के 80% हिन्दू वीजा और ग्रीनकार्ड के लिए डेमोक्रेट्स को वोट देते हैं और इस बार भी देंगे। उधर के हिन्दू भी यहां वाले ही हैं जिन्हें खुद की जेब देखनी होती है। इंडी गिरोह का "हिन्दू?" भी तो ऐसा ही है जो अपना फायदा देखता है। साथ ही अमरीका हो या भारत दोनों जगह हिन्दू के लिए अपना फायदा पहले है देश बाद में। आज आप इंडी गिरोह के "हिन्दू" के पास चले जाइये तो उसे क्या जियोपोलिटिक्स की समझ है? उसे तो ये भी नही पता रहता कि एक महंगाई भी आज दुनिया के किसी कोने से आपके देश मे आ सकती है। लेकिन उसे लगेगा कि इसका कारण मोदी है। और फिलहाल मैं ये बात भी नही करूँगा कि कांग्रेस के समय महंगाई क्या थी या आज क्या है क्योंकि इतना सोचने का दिमाग तक उसके पास नही होता। यही कारण भी तो है कि जो हिन्दू आज से 10 साल पहले की याद नही रख सकता, उसे आप कैसे याद दिलाएंगे कि तुम्हारे ही पूर्वज थे जिनके दम पर मुट्ठी भर अंग्रेज इस देश पर शासन कर है थे। आज भी वही हो रहा है। आज के अंग्रेज, अदृश्य राज्य वाले हैं और वो किनके दम पर इस देश मे शासन करना चाहते हैं? इन्ही इंडी गिरोह वाले हिन्दुओ के दम पर या उन मोदी समर्थकों के दम पर भी जो शेयर मार्केट में खुद डूब जाएं तो उसका दोष भी मोदी का होता है, इनका नहीं। और इसी का फायदा आज अदृश्य राज्य के नए अंग्रेज उठा रहे हैं क्योंकि उन्हें पता है कि हिन्दू 2 पैसे में बिकता है। न सिर्फ अदृश्य राज्य को बल्कि पाकिस्तान जैसे को भी पता है और तभी तो वो ब्लैकमेल करता है कि उसकी कौम एकमुश्त वोट देगी, बताओ कौन सी पार्टी हमारे आगे तेल चटाई बिछा लेटने को तैयार है। यही हिन्दू की हकीकत है। दुनिया भर के हिन्दू की जो जब यहां से गया तो भारत को गाली देकर गया कि इस देश मे उन्हें कुछ नही मिल सकता, सब बिके हैं लेकिन विदेश जाकर भी खुद बिका हुआ है। अमरीका में भी डेमोक्रेट्स को पूछो कि आप हिन्दू के लिए क्या सोचते हैं तो वो बन्द कैमरा कहते हैं कि इनके लिए क्या सोचना, इन्होंने तो हमें ही वीजा के लिए वोट देना है। ठीक उसी तरह जैसे यहां इंडी गिरोह कहता है कि हिन्दू के लिए क्या सोचना, दो फ्रीबीज फेंककर मारेंगे तो ये हमें वोट करने आएगा। इसलिए उधर डेमोक्रेट्स इलीगल लोगों को साध रहा है और यहां इंडी गिरोह एक कौम को, क्योंकि दोनों का मकसद तो अपने देशों में डेमोग्राफी में बदलाव कर, सत्ता को अपने कब्जे में लेना है कि हम जिसे चाहेंगे वो सरकार बनेगी। इसलिए पप्पू जैसे अमरीका में जाकर सिर्फ ये काम करते हैं कि मालिक ये बताओ कि आपकी कौन सी पॉलिसी पर अब काम करना है? चुनावों वाली पॉलिसी तो इधर मदरनंदन ने भी वही सेम चलाई जो कमला उधर चला रही है। कमला को उधर मस्क को अरेस्ट कर उसके ट्विटर के व्यापार खत्म करना है और इधर मदरनंदन को अडानी खत्म करना है। कमला को उधर अपने इलीगल वोटरों को हिस्सेदारी देनी है और इधर मदरनंदन को हिन्दुओ से छीन कौम वालो को देना था। कमला उधर ट्रम्प आएगा तो चुनाव से लेकर संविधान खत्म करने की बात कर रही और इधर यही बात मदरनंदन कर चुका। लेकिन इसके बाद भी कितने हिन्दुओ को समझ आया या आ रहा कि खेल क्या चल रहा है? कौन सी पोलिटिक्स दुनिया भर में चल रही? और कैसे सेम स्क्रिप्ट पर हर जगह काम हो रहा? इसीलिए कहा कि हिन्दू अपनी जेब से आगे सोच ही नही सकता, जियोपोलिटिक्स समझना तो बहुत दूर की बात है। और जबतक हिन्दू को ये समझ नही आएगा कि उसका शत्रु कौन है, तो मदरनंदन जैसे जाकर नई स्क्रिप्ट तो लेकर आएंगे ही। इस समय अमरीका के चुनाव भी है तो ऐसे समय तो तरह तरह की स्क्रिप्ट चलती हैं तो उन्ही में से कोई एक यहां लाकर चेप दी जाएगी। बस शक्लें अलग हो सकती हैं जैसे उधर किसी इलीगल के लिए होगी तो यहां किसी कौम या जाति के लिए। बाकी, सीआईए इधर काम कर ही रही है। अमरीकी एम्बेसी काम कर ही रही है। मदरनंदन तो उधर से ऑर्डर, फंडिंग और समर्थन लेकर आएगा कि बस आपका साथ चाहिए।
साथ ही रूसी वामपंथ के नामपर आपके पास व्यापार नही था क्योंकि पूंजीपति तो चोर होता है तो आपके पास गरीबी और महंगाई दोनों थी और टैक्स तो 97% तक था क्योंकि वामपन्थी भिखारी अर्थव्यवस्था में जनता से ही तो सब चूस देश जैसे तैसे चलाना था। इस तरह अदृश्य राज्य ने आपके साथ खेल खेला। और जैसा शुरू में कहां कि दूसरे नम्बर की दुनिया की सबसे बड़ी टँकी संस्था ISI थी तो उसने अमरीका के कहने पर आपको हमेशा एक ऐसा देश बनाकर रखा जो सुरक्षित नही है निवेश के लिए। आपका बहुत बड़ा पैसा तो अपना क्षेत्र संभालने से लेकर देश सुरक्षा में ही खर्च हो जाता था। इस देश के अंदर जो मिनी पाकिस्तान चल रहे थे वो भी ISI ने चलाये ताकि ये देश दंगो में झुलसा रहे और एक थर्ड वर्ल्ड बना रहे। इसी ISI ने कितने हनी ट्रेप कर आपके नेता अपनी ओर किये। इसी ISI ने सीआईए के साथ मिलकर इस देश मे विदेशी एजेंट सरकार(बल्कि खानदान) के अंदर बिठा दिए जो 2014 तक इस देश को कंट्रोल करते थे। ISI का काम ये भी था कि जिनके दिल मे पाकिस्तान धड़कता है उनके वोट उस पार्टी को एकमुश्त दिलवाना। उन्हें खुश करने को बम धमाके करवाना ताकि वो कौम खुश रहे कि हिन्दू मर रहा है और जब कोई एयर चीफ कहे कि बदला लेते हैं तो प्रधानमंत्री कहे कि इससे कौम नाराज होगी, छोड़ो कुछ सौ हिन्दू मर भी गए तो। इस तरह की सांठगांठ के बाद सीआईए और ISI दोनों के पास ऐसे सत्ता लोभियों की सारी कुंडली भी आ गयी जो फिर इन्हें अपने इशारों पर चलाने के काम आयी। इसी तरह चीन भी जब 2000 के बाद थोड़ा पैसे वाला बना तो उसने रूसी वामपन्थी गिरोह को अपनी ओर कर लिया। इनकी मदद से चीन ने ऐसे लोगों को लालच दिया कि अपना पैसा मकाऊ जैसी जगह सुरक्षित रख सकते हो क्योंकि तब तक दुनिया भर से आवाज आ गयी थी कि स्विजरलैंड जैसे देशों से बेनामी पैसे को सार्वजनिक किया जाए जो हिटलर के समय से वहां दुनिया भर का पड़ा था। लालची लोग चीन के चक्कर मे आ गए तो पैसा मकाऊ शिफ्ट हो गया और वहीं से फिर सिंगापुर से लेकर मॉरीशस रुट से पैसा भारत के बाजार में आता, वित्त मंत्रालय अफवाह फैलाता, बाजार नीचे जाता और फिर ये उससे कमाते और फिर पैसा वापिस सिंगापुर मॉरीशस होते हुए मकाऊ चले जाता। कहने का मतलब शार्ट सेलिंग आज की बात नही है तब से चल रही जब खुद ये सरकार में थे। हां भूल गया था कि अदृश्य राज्य के आदमी वित्त मंत्रालय नही बल्कि RBI में भी थे और आखरी अमरीकी ग्रीन कार्ड होल्डर को आप जानते हैं जिसका काम हर दिन भारत को बर्बाद देखने की भविष्यवाणी करना है और कम ग्रोथ जो भगवान की कृपा से अब तक नही हुई, उसे हिन्दू ग्रोथ कहना है। तो इस तरह जब चीन भी भारत मे घुसा तो MoU साइन हुए और तय हुआ कि चीन भारत को अपना डंपिंग ग्राउंड बनाएगा। चीन बल्क में उत्पादन करेगा और भारत टैरिफ नही लगाएगा जिससे भारत का बाजार चीन से भर जाए और हमारे MSME बर्बाद हो जाएं। बड़े बाजार चीन के पास तब बन रहे थे और भारत मे ब्रांडेड खरीदने जितना पैसा नही था तो चीन ने छोटे उद्योग कब्जे में किये। साथ ही MoU का ही कारण बना कि चीन भारत को घेरने को स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स बनाएगा लेकिन भारत आंख मूंदकर रहेगा। भारत के सारे पड़ोसी चीनी प्रभाव में आएंगे और भारत हिंदी चीनी भाई भाई करेगा। इस तरह चीन फिर कुछ कुछ अंतराल में भारत की भूमि भी कब्जायेगा और भारत कहेगा कि ये छोटी बाते हैं और हम अपना इंफ्रास्ट्रक्चर तक बॉर्डर पर नही बनाएंगे। और ये सब इसलिए हो रहा था कि चीन उस समय अमरीका का ब्लू आइड बॉय था जिसे अमरीका ही बड़ा बना रहा था। चीन ने भी अमरीका का अच्छा बेवकूफ बनाया था लेकिन जिनपिंग को दूसरा माओ बनने का भूत बन गया तो चीन फिलहाल विलन है। कल को जिनपिंग न रहा और कोई अमरीकी पालतू आ जाये तो ठीक हो जाएगा जैसा 1990 के बाद रूस में आ गया लेकिन 1998 आते पुतिन जैसा वहां सत्ता में आ गया तो रूस भी फिर से दुश्मन बन गया। इसी तरह कोई मोदी निपट जाये और कोई खानदान वापिस आ जाये तो फिर भारत भी दुश्मन नही रहेगा। क्योंकि फिर सब मिलकर अदृश्य राज्य के एजेंडे अपने देशों में चलाएंगे और खुद को शक्तिशाली बनाने से रोक किसी NATO की तरह अमरीका की गुलामी करेंगे। शुभ रात्रि
अदृश्य राज्य का सारा खेल अमरीका के दो मंत्रालय चलाते हैं। एक है विदेश मंत्रालय और दूसरा है रक्षा मंत्रालय। दुनिया की सबसे बड़ी टँकी संस्था का नाम है सीआईए.. दूसरे नम्बर पर ISI जो उसकी ही पालतू है। ये आलतू फालतू के टँकी संगठन तो इनकी प्रॉक्सी हैं। ये सीआईए वैसे तो स्वायत्त है लेकिन ये दिखावे के लिए काम करती है विदेश मंत्रालय के अधीन। इसका काम दूसरे देशों में हस्तक्षेप करना है। जब ये अपने गुर्गे कहीं एक्टिव कर देती है तो विदेश मंत्रालय अपने राजदूत या अन्य माध्यम से उस देश मे आधिकारिक घुस जाता है। फिर इनका काम शुरू होता है कि दूसरे देश की सरकार उसके आदेश पर चलेगी या नहीं। नहीं, तो उस सरकार के खिलाफ तख्तापलट जैसे काम शुरू हो जाते हैं। इस तरह विदेश मंत्रालय काम करता है। और वो ये काम करता है रक्षा मंत्रालय के लिए। रक्षा मंत्रालय डायरेक्ट अदृश्य राज्य के अधीन है फिर सरकार किसी की भी हो। अदृश्य राज्य का मिलिट्री इंडस्ट्रियल कॉम्प्लेक्स इससे सुनिश्चित करता है कि उसके धंधे दूसरे देशों में जमें। धंधे जमाने को कोई मिलिट्री बेस चाहिए, वहां के खनिज संसाधन चाहिए, वहां का बिजनेस चाहिए या वहां से अपने दुश्मनों के खिलाफ एक्शन, सब यही कॉम्प्लेक्स देखता है। इसके अंदर ही हथियार माफिया हैं, आयल माफिया हैं, फार्मा माफिया हैं। और अब तो डिजिटल माफिया भी हैं और MNC माफिया भी जिन्हें किसी देश मे अपना बिजनेस चाहिए और वो भी एकाधिकार के साथ। और इन दोनों के बीच आता है वित्त मंत्रालय। इसका काम है फंडिंग देना वो भी अमरीकी जनता के टैक्स का। खुद का पैसा ये बहुत कम लगाते हैं और अमरीकी जनता का तो एक अफगानिस्तान में ही 2 ट्रिलियन डॉलर लगा दिया और करीब 200 बिलियन अब तक यूक्रेन के नाम पर लगा चुके हैं। ये पैसा कभी न अफगानिस्तान के विकास पर लगा और न यूक्रेन के लगेगा। उल्टा ये पैसा अमरीकी कांग्रेस(संसद) से पास होता है किसी देश के नाम पर और फिर वित्त मंत्रालय उसे इस मिलिट्री कॉम्प्लेक्स को दे देता है जो खुद से कॉन्ट्रैक्ट कर अपनी हथियार कम्पनी या कंस्ट्रक्शन कंपनी को वो पैसा देती है और फिर वो उस देश मे जाकर हथियार चलाते हैं या बिल्डिंग/रोड आदि बनाने का नाटक करते हैं जिसमें भी 20% काम होता है और 80% जेब मे चले जाता है। इसके अलावा भी अमरीकी जनता को वामपंथ के चूरन के नाम पर बेवकूफ बना चंदा लिया जाता है और फिर अपने पालतू NGO को दुनिया भर में दे दिया जाता है। इसी पैसे से फिर दूसरे देश के प्रभावशाली लोग खरीदे जाते हैं फिर वो ज्यूडिशरी से हों, मीडिया से, ग्लेमर जगत से, अकेडमिया से या अब तो सोशल मीडिया से भी। इसके अलावा जब किसी देश को बर्बाद कर दिया जाता है ताकि वो गरीब देश इनपर ही आश्रित हो जाए तो फिर अदृश्य राज्य की दो बड़ी संस्था वर्ल्ड बैंक और IMF सामने आती हैं। ये दोनों संस्था अमरीकी सरकार के अधीन नहीं हैं। यहां तक कि अमरीका का रिजर्व बैंक भी जिसे फेडरल रिजर्व कहा जाता है। फिर इनका काम होता है उस देश की तमाम पॉलिसी को अपने कंट्रोल में लेना। इनका डॉलर ही उसका सबसे बड़ा हथियार है जो बिना किसी बैक अप के अंधाधुंध छपता है। हम आप नही छाप सकते। इस तरह ये लोग उस देश को पूरी तरह टेक ओवर कर देते हैं। आपका राष्ट्राध्यक्ष दिखने को आपका लगेगा लेकिन होता उनका है। यहां तक कि जब 1990 में हमारे देश की हालत इस तरह हो गयी थी कि गोल्ड गिरवी रखना पड़ा तो वो IMF की शर्तें ही थीं कि भारत अपना बाजार उनके लिए खोले, वरना वो पैसा नही देंगे। इस तरह भारत ने ग्लोबलाइजेशन में पैर रखा जिसे लोग कोई मनमोहन(नरसिम्हा राव) की क्रांतिकारी नीति कहते हैं। जबकि सच्चाई ये थी कि वो अदृश्य राज्य की शर्त थी कि हमें भारत मे घुसना है क्योंकि अब सोवियत संघ टूट चुका था जो उससे पहले भारत को कंट्रोल करता था। एक बात और कि उस समय से लेकर 2014 तक इस देश मे सरकार किसी की भी हो लेकिन वित्त मंत्री वो तय करते थे। उसी तरह जैसे पाकिस्तान में सरकार हो या मिलिट्री रूल लेकिन आर्मी चीफ कौन होगा वो अमरीका तय करता है। इसके लिए उन्होंने बड़ी चालाकी से अपने प्यादे भारत मे भेजे। भारत के गुलाम इस से ही खुश थे कि कोई ऑक्सफ़ोर्ड, केम्ब्रिज, हावर्ड का पढा लिखा आ गया है जबकि वो वैसे ही अर्थशास्त्री थे जैसे आज बंग्लादेश में मोहम्मद यूनुस है जिसे तो नोबल भी दे रखा अलग से। और ये काम तो अदृश्य राज्य सोवियत के समय से ही कर रहा था। रूसियों के पास अपने देश को चलाने(बचाने) का पैसा तो था नही बस एक विचारधारा भर थी जो आगे चलकर दुनिया मे फेल हो गयी लेकिन अमरीका के पास था। इसलिए नेहड़ु काल से ही भारत के रुपये का अवमूल्यन होना शुरू हो गया क्योंकि जितना आपका रुपया कमजोर होगा उतना आप उनपर निर्भर होंगे और हर भीख के साथ आपको अपना पैसा और गिराना होगा।
एक ये मटरचोर मौलाना मुख्तार भी कानपुर पुलिस ने पकड़ा है जो खुद 70 साल का है और एक 7 साल की बच्ची से कुकर्म कर रहा था। इसने बच्ची को चॉकलेट देने के बहाने फुसलाया और फिर कमरे में ले गया लेकिन किसी बच्चे की नजर पड़ गयी और वो इसके पीछे गया और इसकी वीडियो बनाने के साथ ही आस पास से लोग बुला लिए।