आर्यभूमि : The Land of Aryans
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ये काम 12 साल मे क्यों नहीं किया वो काम 12 साल बाद क्यों याद आया, ये तर्क कुतर्क आपने बहुत देखे होंगे। घरो मे यदि कॉकरोच आ जाये तो आप एक बार इलाज कर देते है मगर क्या वे दोबारा नहीं आते? भले ही अगले साल क्यों ना आये मगर आएंगे जरूर। युद्ध चाहे आमने सामने का हो या फिर इनफार्मेशन के जरिये, वह कभी 1-2 दिन का नहीं होता। उसके पीछे कई वर्षो की योजना होती है और उसके आगे पराजय का विकल्प, तब जाकर एक युद्ध पूरा होता है। राजनाथ सिंह के 5 और अमित शाह के 7 सालो मे जाकर नक्सली खत्म हुए है। ममता का दौर ही देख लीजिए क्या बीते दो तीन महीने मे आपको एक बार भी ऐसा लगा जैसे ममता बनर्जी कोई बहुत बड़ी तोप थी। जबकि एक साल पहले कोई भी रेंडम पोस्ट उठा ले तो ममता बनर्जी हर जगह तुर्रम खान थी। अब रहा सवाल विदेशी आक्रमण का तो ये होते रहेंगे, 2016 मे आखिरी बार JNU ने कोशिश की थी उसके बाद 10 साल लगे मगर वही नौटंकी दोबारा हुई। आप निश्चिन्त रहिये ये नौटंकी फिर से होंगी, कब होंगी यह प्रश्न हो सकता है मगर होंगी अवश्य। आप कितना ही ठोस कानून बना लो अपराध कम हो सकता है समाप्त नहीं, आतंकवादी हमले जितने बीजेपी के कुल 12 वर्ष के शासन मे हुए उतने तो मनमोहन सिंह के समय एक साल मे हो जाते थे। लेकिन क्या पूर्ण अंत हुआ? कभी नहीं क्योंकि समस्या पैदा करना भी तो एक फुल टाइम जॉब है। अभी डोनाल्ड ट्रम्प है तो हमें पता नहीं लग रहा मगर जिस दिन यहाँ फिर से डेमोक्रेट्स आ गए तब आप पाएंगे कि अंधाधुंध पैसे फेके जाएंगे। जो बाईडन के कार्यकाल को भूले नहीं, राहुल गाँधी कितने चक्कर लगाया करता था अब क्यों बंद कर दिये? क्योंकि रिपब्लिकंस की नीति विपरीत है। लेकिन ट्रम्प अमर तो है नहीं, कभी तो जाएंगे? खुद ट्रम्प ने खुलासा किया कि 2024 चुनाव मे अमेरिका ने व्यर्थ पैसा बहाया। इसलिए आप बाहरी आक्रमण नहीं रोक सकते, युद्ध जीतने का एक ही तरीका होता है कि आप हर समय तैयार रहे। नक्सली मारे गए ये बात सही है लेकिन ये नक्सली आज नहीं तो कल फिर से फन तो उठाएंगे। क्योंकि कुछ लोग है जो यही चाहेंगे कि देश आगे ना बढे, इसलिये आवश्यक है कि तैयार रहे। तख्तापलट का प्रयास भी होगा, युद्ध की भी कोशिश होंगी और कोई दुर्घटना भी। ज़ब फ़्रांस मे आतंकी हमला हुआ था तो लोगो ने "not scared" के बोर्ड लगा दिये थे। जबकि उस दिन मेट्रो खाली रही, लोगो मे डर था मगर उन्होंने जताया नहीं। इसके विपरीत भारत मे हम तुरंत विश्लेषक बन जाते है या शायद आलोचक। ये हमेशा ध्यान रखिये कि सत्ता और राष्ट्र को हर जंग जीतना जरूरी है जबकि राष्ट्र विरोधियो को सिर्फ एक जंग जीतनी है। लेकिन इससे राष्ट्र का प्रारब्ध उनके हाथ मे नहीं चला जाता, हर समय के लिए तैयार रहे और प्रतिक्रियावादी के स्थान पर पर्यवेक्षक की भूमिका निभाये। ✍️परख सक्सेना✍️ https://whatsapp.com/channel/0029Va4lf2hL7UVcS5d5x12X
दरसल समय ही खराब चल रहा है, देश का, बीजेपी का और उसके समर्थको का। ज़ब समय अच्छा होता है तो अयोध्या कश्मीर सुलझ जाते है और अब बुरा है तो FCRA जैसी चीज भी नहीं सुलझ सकी। ये वो समय है ज़ब सोने की खदान मे भी हाथ डाल दो तो कोयला हो रही है लेकिन समय की अच्छी बात यही है कि ये बदलता है। मोदीजी एकछत्र राज चलाते है लेकिन ये बात भी है कि जो तानाशाह हम चाहते थे वो ये नहीं है। ये गुण अमित शाह मे है, राहुल गाँधी का कद मोदीजी के सामने उनके जूते तक भी नहीं है लेकिन वो जिस तरह उपहास कर रहा है वो स्वीकार्य नहीं है। यदि ये ही गुजरात वाले मोदीजी होते तो शायद ये इसके जीवन के अंतिम क्षण होते। लेकिन मोदीजी तो अब दिल्ली वाले है, ये पैटर्न अकेले मोदीजी के साथ नहीं है। शिवराज मामा मध्यप्रदेश मे कुछ अलग अवतार मे थे दिल्ली मे अलग, राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी और निर्मला सीतारमण को भी देखे तो ऐसा लग रहा है जैसे ये लोग संघ की शाखा मे बैठे किसी अनुशासन का पालन कर रहे हो। धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफ़ा आया, फिर FCRA बिल अटक गया। कही ना कही मैसेज ये गया कि सरकार झुक गयी, हालांकि ये सब कांग्रेस सरकारों के समय सामान्य बात थी तो थोड़ा खुश भी होना चाहिए कि हमारा पैमाना उनकी तुलना मे कितना ऊँचा हो चुका है। ज़ब आपके पास पूर्ण शक्ति हो और आप शत्रु का दमन ना करो तो उसकी स्थिति वही होती है जो राहुल गाँधी की है। नेशनल हेराल्ड की बंदूक आज भी उसकी कनपटी पर है लेकिन कही ना कही वो जानता है कि सरकार पर दबाव ही इतना ज्यादा है कि वो कुछ नहीं कर सकेगी। कोई प्रधानमंत्री की माँ को अपशब्द कहे और प्रधानमंत्री उसे माफ़ कर दे ये बात सभी को नहीं पचती। मोदीजी की ख़ामोशी का समर्थक नहीं हूँ मगर इन्हे कही ना कही गुजरात प्रकरण ने बहुत कुछ सिखाया है। गुजरात के जो 12 साल निकाले उसमे भी 10 कांग्रेस की केंद्रीय सरकार के अंदर, उसने मोदी शाह को कई सबक सिखाये है। सच पूछो तो 2024 मे तो हमें ये भी संदेह था कि ये गठबंधन सरकार कैसे चलाएंगे लेकिन क्या किसी ने भी काकोली घोष और चंद्रबाबू नायडू को ड्रामा करते देखा? कदाचित ये भारतीय इतिहास का पहला गठबंधन है जहाँ समर्थन देने वाली पार्टियां इतनी शांत और प्रोफेशनल है। ये जादू कैसे हुआ तो यही गुजरात का अनुभव है। समस्या सिर्फ अंदर नहीं बाहर भी है, अमेरिका मे ज़ब बाइडन थे तो तख्तापलट मे लगे थे अब ट्रम्प है तो इन्होने युद्ध मे लगा दिया है। ईरान मे ये यदि इन्होने कोई परमाणु बम फेक दिया तो वो एक अलग ही स्तर की समस्या पैदा कर देगा। युद्ध की वजह से दुनिया भर मे व्यापार अटका हुआ है असर हम पर भी हो रहा है। जीवन या तो थम गया है या पीछे जा रहा है किसी को कोई प्रगति नजर नहीं आ रही और दुर्भाग्यवश यही वो स्थिति है जहाँ वाजपेयी 2004 मे थे, ये बात सही है कि तब और आज मे अंतर आ चुका है। बीजेपी सत्ता के बाहर होंगी ये तो अतिश्योक्ति अलंकार हो जाएगा, लेकिन 2026 किसी भी तरह कट जाए बस। कभी कभी हम गलत नही होते समय भी गलत होता है, इस समय हमारी जीत सिर्फ इसी मे है कि हम ये समय झेल जाए। कुछ अच्छा तो नहीं लग रहा है मगर धैर्य बड़ा आवश्यक है। ✍️परख सक्सेना✍️ https://whatsapp.com/channel/0029Va4lf2hL7UVcS5d5x12X
ज़ब रिकी पोंटिंग वाली ऑस्ट्रेलिया को हराना लगभग असंभव हो गया था तो ICC ने क्रिकेट को रोमांचक बनाने के लिए एक ICC टीम बनाई। अन्य टीमों के बेहतरीन खिलाड़ियों को लेकर इस टीम से ऑस्ट्रेलिया के विरुद्ध दो मैच खिलाये गए और आश्चर्य यह था कि यहाँ भी ऑस्ट्रेलिया ही जीती। भारतीय राजनीति मे इसकी उपमा देने की कोई और आवश्यकता नहीं है, ये भी ध्यान देने योग्य बात है कि ज़ब कही ICC हावी हो जाता तो कमेंट्री मे यही आवाज़ आती थी कि अब उल्टी गिनती शुरू 🤣 ये वो दौर था ज़ब एडम गिलक्रिस्ट या मैथ्यू हैडन आउट हो जाते थे तो उसी मे मैच जीतने की फिलिंग आ जाती। पोंटिंग अच्छा खेलता था तो कहते थे कि बेट मे स्प्रिंग लगाकर आया है, ऑस्ट्रेलिया कम रन पर सिमट जाती थी तो कहते थे कि ब्रेट ली और शेन वार्न ने चीटिंग से गेंदबाजी की। अपना पैमाना इतना ऊँचा रखो कि लोग खरोच को विध्वन्स मानकर बैठ जाए, आपको 240 सीटें मिली जश्न ऐसे मनाया गया मानो 40 पर रोक दिया हो। आपके एक मंत्री ने 5 दिन के उन्माद के बाद महज इस्तीफ़ा दिया मगर उन्हें लगने लगा मानो उन्होंने कोई गृहयुद्ध जीत लिया हो। जर्मनी मे आतंकी हमले के बाद गद्दाफी ने भी यही कहा था कि ये अमेरिका के पतन की शुरुआत है। जबकि सबको पता है आज गद्दाफी कहाँ है और अमेरिका कहाँ। ये मानवीय प्रवृत्ति है डिस्कवरी पर ज़ब खरगोश शेर से बचकर निकल जाता है तो आप प्रसन्न होते है, खरगोश से कोई हमदर्दी नहीं है मगर शेर से एक ईर्ष्या है यहाँ फूड चैन का ज्ञान रखा रह जाता है। जिसे आप चित नहीं कर सकते उससे जलन स्वाभाविक है, यही ईर्ष्या राजनीति मे दिखाई देती है। लेकिन इसी ईर्ष्या का दूसरा पहलू है, जहाँ शक्ति के सामने समर्पण हो जाता है वहाँ से ईर्ष्या शुरू होती है। कुछ यही स्थिति विपक्ष की है। 240 पर रह गए, विधेयक पारित नहीं होने दिये, संसद नहीं चलने दी या हंगामे कर दिये। ये कोई सरकार को झुकाना नहीं है ये एक ध्वनि है कि बस हम इतना कर सकते थे। 240 सांसदों वाली स्थिति मनमोहन सिंह और नरसिम्हाराव की भी रही थी, वाजपेयी और मनमोहन के प्रथम काल ने तो 200 से कम सीटों मे सरकार चला दी थी। एक समय था ज़ब सरकार विपक्ष की सुनती थी, संसद मे चर्चा होती थी और मंत्री इस्तीफे दे दिया करते थे कितना अजीब है कि ये रोजमर्रा की राजनीति अब एक उपलब्धि का रूप ले चुकी है। एक विपक्ष ही नहीं मगर समाज के नाते भी क्या ये हमारा राजनीतिक पतन नहीं है? 2013 मे सोनिया गाँधी हिंसा विरोधी बिल लाना चाहती थी, आसानी से पारित हो जाता क्योंकि संख्या बल था लेकिन सुषमा स्वराज और अरुण जेटली ने सदन मे जो गर्जना की मात्र उसके कारण यह बिल गिर गया। क्या आज ये संभव है? बीते पन्नो को पढ़े तो यही समझ आता है कि जो पहले नॉर्मल था वह आज उपलब्धि थी और तब जो मनमर्जी थी वह आज न्यू नॉर्मल है। इन सबके बाद ज़ब कोई कह दे कि उसने सत्ता पक्ष को झुका दिया तो सत्ता पक्ष का इससे बड़ा सौभाग्य कुछ नहीं हो सकता जिसे शत्रु मिला भी तो शस्त्र के साथ बुद्धि से भी शून्य। ✍️परख सक्सेना✍️ https://whatsapp.com/channel/0029Va4lf2hL7UVcS5d5x12X
हिन्दू कितना भयावह या खूंखार हो सकता है? क्या हिन्दू नरसंहार कर सकता है? बस्तिया उजाड़ सकता है? कहानी पढ़कर खुश मत होना अपितु अवलोकन करना कि इतिहास के ये पन्ने गायब क्यों है? 1771 मे मराठे महादजी सिंधिया के नेतृत्व मे दिल्ली को फिर से हासिल करते है और फिर कूच होता है रुहेलखण्ड की ओर। मेरठ से उत्तराखंड की सीमा तक यह इलाका था और ये इलाका आज भले ही हिन्दू बाहुल्य हो मगर उस समय अफगानिस्तान जैसा लगता था क्योंकि यहाँ रोहिल्ले मुसलमानो ने कब्जा कर रखा था। महादजी सिंधिया ने यहाँ पहुंचकर मराठा सैनिको को सीधा आदेश दिया कि ज़ब तक अगला आदेश ना आये सफाई रुकनी नहीं चाहिए। मराठा सैनिको ने एक एक घर मे घुसकर रोहिल्लो को मारा और खदेड़ा और निर्दयता से मारा। ये नरसंहार कितना बड़ा रहा होगा इसे ऐसे समझिये कि आज रुहेलखण्ड मे 7 जिले है, तब का क्षेत्रफल इससे ज्यादा था। 70 हजार रोहिल्ला मुसलमान तो उसी दिन मार दिये गए थे जब महादजी ने पैर रखा था, ये नरसंहार पूरे डेढ़ वर्ष चला और आज जो आप देवभूमि उत्तराखंड देख रहे हो वह भी इसीलिए देवभूमि है क्योंकि इसे जीवनदान मिल गया। आज यदि पाकिस्तान की सीमा कश्मीर और पंजाब तक रुक गयी है तो उसका कारण यही है। ये नरसंहार मगर इतिहास से गायब है, जिन वामपंथी इतिहासकारो को हिन्दुओ को कोसे बिना नींद नहीं आती वो इतना अच्छा मौका नजरंदाज कर गए? दरसल ये नरसंहार इसलिए नहीं लिखा गया ताकि हिन्दू हनुमान की तरह अपनी शक्तियां भूल समुद्र देखता रहे। इस मुहीम मे हिन्दुओ ने सैंकड़ो मस्जिदे और मजार तोड़ी, ये लिख देते तो हिन्दू ग्लानि करता ना करता मगर मजारों मे सिर तो नहीं पीटता। 2014 से पहले एक बड़ी आबादी थी जिसे देवी देवताओं जितना भरोसा मजारों पर था, 2014 से पहले ऐसी हिन्दू कौम भी हुआ करती थी जो मुसलमान शब्द बोलने मे भी डरती थी। जो कॉन्फिडेंस आज सड़को पर घूमने मे आ रहा है वो 2014 से पहले नहीं था। इसे कहते है ब्रेनवाशिंग, इसलिए इतिहास को पढ़िए, अपने पूर्वजों को जानिये, क्या वजह है कि आज के हिन्दू समाज मे महादजी सिंधिया जैसे योद्धा पैदा नहीं होते? या सुश्रुत जैसे चिकित्सा वैज्ञानिक नहीं होते? या फिर तमिलनाडु जैसे मंदिर नहीं बन पाते? सिर्फ इसलिए क्योंकि आपको झूठा इतिहास पढ़ाकर आपसे आपकी पहचान छीन ली गयी। आपको बाध्य किया गया कि हिन्दू समाज की कुरीतियों पर ध्यान दो, वे कुरीतिया जो हमारी थी भी नहीं अपितु थोपी गयी थी। यदि ये पढ़ा दिया होता कि हिन्दुओ ने कभी लाखों की तादाद मे ऐसा नरसंहार भी किया है तो आज उसमे विश्वास होता कि वो कल को पाकिस्तान भी खाली करवा सकता है। आपने कई हिंदूवादियों को ये बोलते देखा होगा कि अखंड भारत बन गया तो पाकिस्तान और बांग्लादेश के मुसलमानो का क्या करोगे? ये अविश्वास इसीलिए है क्योंकि हिन्दुओ ने महादजी सिंधिया के बारे मे कुछ पढ़ा ही नहीं। आज का उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड तो खुद कभी जनसंख्या दृष्टिकोण से अफगानिस्तान था, वो आजाद किया वैसे ये भी होगा। जो नई शिक्षा नीति आयी है वो यही परिवर्तन कर रही है, 15-20 साल बाद आप जो हिन्दू देखेंगे वो हमसे बिल्कुल अलग होगा। उसमे विश्वास होगा कि भारत भी सबकुछ कर सकता है, वह हिन्दू हमारे विपरीत यह समझेगा कि हम पराजित कौम नहीं है अपितु 100 मे से 20 हारी हुई जंगो को रट्टा लगाकर पराजय हमारे दिमाग मे ठूसी गयी है। ये नरसंहार सही था अथवा गलत इस पर कोई निजी टिप्पणी नहीं करूँगा, इसका मूल्यांकन आप करें और साथ मे ये भी गौर करें कि हमें मानसिक गुलामी से कब आजाद होना है। सिर्फ खुद को कट्टर हिन्दू कहना मानसिक आजादी नहीं है, आजादी आत्मविश्वास के बिना बेमानी है। ✍️परख सक्सेना✍️ https://whatsapp.com/channel/0029Va4lf2hL7UVcS5d5x12X
12 साल मे पहली बार किसी केंद्रीय मंत्री ने आंदोलन की वजह से इस्तीफ़ा दिया है। ये दरसल परिसिमन की जल्दी है, सरकार के लिए ये बिल बहुत आवश्यक है। एक बार परिसिमन हुआ जो कि हो जायेगा, उसके बाद देश मे सिर्फ वन पार्टी रुल रह जायेगा। चुनावों का महत्व उतना ही बचेगा जितना गुजरात और मध्यप्रदेश मे बचता है। यह घातक भी है वरदान भी है। इसमें एक चुभने वाली बात ये है कि जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण पर कार्य नहीं किया उन्हें सजा की जगह गिफ्ट मिल रहा है। सबसे ज्यादा आबादी उत्तर प्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र मे बढ़ी है। महाराष्ट्र क्षेत्रफल की दृष्टि से बड़ा है और विकसित है मगर उत्तर प्रदेश और बिहार को लेकर समस्या होंगी ही। उत्तरप्रदेश ने विकास किया है मगर 2017 तक तो कोई झंडे नहीं गाड़े थे जो हुआ बाद मे ही हुआ। बिहार ने जीडीपी की दृष्टि से बहुत सुधार किया, अपराध भी कम हुए लेकिन समाज़वाद इतना गहरा है कि आज भी इसे बिजनेस फ्रेंडली नहीं कहा जा सकता। दोनों राज्यों ने मुलायम, मायावती और लालू जैसे नेताओं के साथ अपना महत्वपूर्ण समय ख़राब किया। ज़ब भारत का बाजार खुला तो बिहार ने विकास की जगह सम्मान चुना था, उत्तरप्रदेश मे अनियमित सरकारों का दौर था। ऐसे मे महाराष्ट्र तो जस्टिफाई हो जायेगा उत्तरप्रदेश और बिहार को कर पाना बड़ा मुश्किल होगा। ये कुछ वैसा है कि खराब रिजल्ट की वजह से किसी को पुरस्कार मिल रहा हो, मैं मध्यप्रदेश से हूँ इसलिए उत्तरप्रदेश और बिहार का समाज समझना बड़ा मुश्किल हो जाता है। हमारे यहाँ अखिलेश यादव का नाम सुनकर लोगो का पेट खराब हो जाता है वहाँ उसे कुछ लोग सिर्फ जाति देखकर वोट दे देते है। ऐसे मे जो चीज सबसे ज्यादा डराती है वो ये कि जैसे पाकिस्तान मे पंजाब का पागलपन पूरे देश को झेलना पड़ता है वैसे ही हमारे यहाँ एक राज्य की वज़ह से पूरा देश ना भुगत बैठे। बिहार की चिंता नहीं है क्योंकि लालू का उन्होंने एन्ड कर दिया मगर उत्तरप्रदेश को लेकर एक डर हमेशा रहता है। जो लोग मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ या गुजरात मे है उन्हें ये बात डराती है कि सिर्फ उत्तरप्रदेश के दम पर समाजवादी पार्टी देश की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी है। ये चार राज्य इसलिए क्योंकि यहाँ भी समाज़वादी घुसने की कोशिश करते है मगर हम उन्हें वैसे ही रोकते है जैसे सेना आतंकवादियों को। लेकिन चूंकि उत्तरप्रदेश मे कुछ लोगो को जूनून है तो हर बिल और संशोधन मे इस पार्टी का प्रभाव पड़ता है और पूरा देश प्रभावित होता है। ये तो हो गयी भौगोलिक स्थिति की बात अब लोकसभा के नियम भी देखिये। ये बात हम भी जानते है कि हमारा विपक्ष मैच्योर नहीं है, पिछले 12 सालो मे लोकसभा सदन से सिर्फ बीजेपी के धाकड़ जवाबो वाले मीम वायरल हुए है। सदन मे चर्चा के लिए समय पार्टी के संख्याबल से निर्धारित होता है ज़ब 543 मे ही कोई चर्चा नहीं हो पाती तो 850 मे कैसे होंगी? होगा ये कि बिना चर्चा के बस बिल पारित होते जायेंगे, ये अभी तो मजा आएगा ज़ब तक कि मोदी शाह है। लेकिन यदि एक भी तुगलक जैसा आ गया तो भट्टा बैठने का भी चांस है। यही दो सबसे बड़ी चिंता के कारण है, उत्तरप्रदेश वाले का निराकरण सामाजिक ढंग से हो सकता है। उत्तरप्रदेश के लोग ये समझें कि उत्तरप्रदेश पूरा भारत नहीं है, आपको ब्राह्मण यादव या दलित की जो राजनीति करनी है आप विधानसभा मे कर लो मगर ज़ब बात राष्ट्रीय चुनाव की हो तो हमें बख्श दो। लोकसभा वाली समस्या का निराकरण यही है कि विपक्ष मे कांग्रेस या समाजवादी की जगह थोड़े परिपक्व निर्दलीय को भेजे, लेकिन यहाँ फिर खरीद फरोख्त होने का चांस है। दूसरी समस्या गंभीर है और आज नहीं तो कल इसके गंभीर परिणाम भी होंगे। विशेषार्थ - उत्तरप्रदेश के मित्र तथा पाठक व्यक्तिगत ना ले, हमारी पहचान एक ही है बस सामाजिक ढांचे का थोड़ा अंतर है। ✍️परख सक्सेना✍️ https://whatsapp.com/channel/0029Va4lf2hL7UVcS5d5x12X
9 अक्टूबर 2009 को घोषणा हुई कि बराक ओबामा को नोबल पुरस्कार मिलेगा, शुक्रवार का दिन था। सोमवार को बराक ओबामा ने एक इंटरव्यू दिया और शांति के बड़े बड़े पाठ सुनाये। गांधीजी तक को अपना आराध्य बता दिया, अगले दिन मंगलवार था जिसे बराक ओबामा के अधिकारी डेड ट्यूसडे कहते थे। हर मंगलवार को ओबामा रक्षा अधिकारियो से मीटिंग करते थे, उनके सामने आतंकवादियो के फोटो रखे जाते थे जो अमेरिकी ड्रोन और मिसाइलो के निशाने पर होते थे। ओबामा जिसकी तस्वीर पर हाथ रखते, सेंट्रल कमांड उसे फ़ौरन ढेर कर देती थी और तथाकथित गांधीवादी शांति का मसीहा मुस्कुराते हुए बाहर निकलता था। कहा जाता है कि युद्ध भले ही जॉर्ज बुश ने शुरू किये थे मगर असली मौत का तांडव बराक ओबामा ने रचा था। आतंकवादियों को मारना गलत नहीं है लेकिन मारने का तरीका विवादित था जैसे आतंकवादी के घर पर मिसाइल दागना या स्कूल पर बम गिराना। लेकिन ओबामा क्लासिक थे लोकतंत्र के नाम पर देश के देश ढेर कर दिये। हर बार अमेरिकी सेना शांति स्थापना के उद्देश्य से उतरती और क्रूरता करके बाहर निकलती। दूसरे देशो का प्रवचन देने का भी बड़ा शोक था, 26/11 पर मनमोहन सरकार की चुप्पी, फिलिप्पिंस, इजरायल और ब्रिटेन भी अपने आंतरिक मामलो मे इनका हस्तक्षेप झेल चुके थे। भारत मे इतनी बड़ी हुडदंग हुई क्या अब तक आपने डोनाल्ड ट्रम्प से एक भी बात सुनी? डोनाल्ड ट्रम्प जुबान के जैसे भी हो पर दिल से साफ है, जो है सामने से बोलते है। ट्रम्प चाचा ने सीधा बोल दिया कि वेनेजुएला का तेल चाहिए, ईरान मे सत्ता परिवर्तन करना है। कोई लोकतंत्र या शांति का चोला नहीं ओढ़ा, बीच मे चार साल जो बाइडन आये थे और हम सबने देखा कि अमेरिका किस स्तर तक हस्तक्षेप करने लगा था। ट्रम्प चाचा ज़ब से आये है उन्होंने भारत की अप्रत्यक्ष रूप से मदद ही की है। ट्रम्प के आने के बाद ही यूरोप के लिए भारत का महत्व बढ़ गया, जापान के साथ संबंध आप खुद देख रहे है और सबसे बड़ी बात कि चीन के साथ संबंध सुधर रहे है। CIA के असेट्स मानो काम ही नहीं कर पा रहे, अमेरिका युद्ध मे उलझा हुआ है और खुद उनके सेना प्रमुख कह रहे है कि युद्ध 20 साल चलेगा। मैं शायद ट्रम्प के गिने चुने भारतीय समर्थको मे एक बचा हूँ, ट्रम्प जान बूझकर तो नहीं लेकिन अनजाने मे भारत का काम आसान और तेज कर रहे है। इस NEET वाले मुद्दे पर अमेरिका का हस्तक्षेप ना आना भी ट्रम्प को साधुवाद की वज़ह है, यदि बाइडन होते और दक्षिण एशिया को देखने डोनाल्ड लू ही बैठा होता तो क्या दृश्य गड़बड़ नहीं हो सकते थे? डोनाल्ड ट्रम्प का ये कार्यकाल वरदान है, CIA के असेट्स डिसमेंटल कीजिये, ईरान मे अब ये बुरी तरह फस गए है। हो सकता है अमेरिका ईरान मे सत्ता परिवर्तन कर भी दे मगर अपने दाँत तुड़वा बैठेगा। हम भी यही चाहते है कि अमेरिका युद्ध तो जीते मगर ईरान उसे इतना कमजोर तो कर दे कि अगले 20-25 साल अमेरिकी युद्ध के नाम से भी काँपने लगे। ✍️परख सक्सेना✍️ https://whatsapp.com/channel/0029Va4lf2hL7UVcS5d5x12X
जातिवादी बात नहीं है और आंदोलन भी धीरे धीरे शीत हो रहा है लेकिन सामान्य वर्ग के छात्रों को कुछ समझाने की जरूरत है। दिमाग को ठंडा करो और पीछे हो जाओ, ये लड़ाई आपकी तो बिल्कुल भी नहीं है। आपका प्राथमिक संघर्ष आज भी वही है कि आपका सिलेक्शन 500 मे भी नहीं होगा और किसी का 300 मे भी हो जायेगा, आप सरकार को इस मुद्दे पर घेर सकते है लेकिन जैसे ही घेरोगे दाए बाए वाले कॉकरोच आपको कुचल देंगे। कॉकरोच तो आपके विरुद्ध ये तक नारा दे रहे है कि तिलक तराजू और तलवार को मारो। मोदीजी की दिवंगत माताजी को अपशब्द कह रहे है क्या ये आपके घरो की परवरिश हो सकती है। बचपन मे जिन बच्चो के साथ खेलने को मना किया जाता था ये वही बच्चे है। इतिहास किताब पढ़ने वाले बनाते है ना कि रील्स स्क्रॉल करने वाले, इसलिए इस अलगोरीदम के जाल से निकलिए। ये आंदोलन नहीं फूहड़ता है जहाँ नारा ए तकबीर के नारे लग रहे है, इस पूरे फसाद मे तीन लोग है पीछे दंगाई, बीच मे आप और सामने लाठी पकड़े सत्ता। दोनों ही दिशा मे आपकी पिटाई होना तय है। ये दृश्य है जहाँ पुलिस की गाडी तोड़ने वालो के फिंगर प्रिंट उठ रहे है। यदि आपने हाथ भी लगाया है तो फिंगर प्रिंट मिलेगा और कार्रवाई होंगी, जो बच्चे गिरफ्तार होंगे उनका आगे पूरा करियर खत्म है। यहाँ न्याय और समता का आंदोलन नहीं हो रहा है, खुल्ले नारे लग रहे है कि तिलक तराजू और तलवार को मारो। एक बार इन दंगाईयों को बोलकर देखो कि आरक्षण पर चर्चा ही कर ले आपको फ़ौरन आपकी हैसियत दिखा दी जायेगी। ये आंदोलन छात्रों का नहीं है, जैसे जेपी आंदोलन से लालू जन्मा और अन्ना आंदोलन से केजरीवाल उसी तर्ज पर एक तीसरा गिद्ध जन्म लेगा। ये तीसरा गिद्ध भी अपने बच्चो की कसम खायेगा, आपके दम पर उठेगा और बड़ा होकर उसी बीजेपी के गले मिलेगा जिसे उखाड़ने की आप बात कर रहे हो। आपके हाथ रह जायेगी जेल की सलाखे और खुली किताबों मे पड़ा आपका भविष्य। सामान्य वर्ग वालो के लिए इसलिए भी है क्योंकि इस वर्ग मे ज्यादातर लोग मिडिल क्लास है, कुछ सिंगल चाइल्ड भी होंगे। यदि आप जेल गए तो पीछे आपका परिवार है, 18 साल की पूरी मेहनत तबाह हो जाएगी सिर्फ इस चक्कर मे कि किसी को राजनीति चमकानी थी तो उसने आपको आगे कर दिया। पत्थर पीछे से पड़े या लाठी आगे से चले दोनों स्थिति मे मरण होना है, इसलिए बेहतर है समय रहते लौट जाओ जैसे बाकि बच्चे लौट रहे है। ये आंदोलन 20 को उग्र था, 21 को शांत पड़ गया और 22 को राजनीतिक संगठन के कार्यकर्ताओ के चलते फिर बढ़ गया और आज 23 को फिर शांत हो रहा है। धीरे धीरे मूल छात्र पीछे हो रहे है और राजनीति वाले आगे आ रहे है, अब सिर्फ दंगे होने है और गिरफ्तारी होंगी। आपकी तो निश्चित होंगी क्योंकि राजनीति वाला आगे तो नहीं आएगा, एक बार गिरफ्तार होंगे और सबकुछ समाप्त। माता पिता वकीलों के पीछे भाग रहे होंगे, ये जो आज कुछ डॉक्टर और वकील समर्थन कर रहे है ये पूछने भी नहीं वाले। रहा प्रश्न सत्ता परिवर्तन का, तो वो दंगों से तो नहीं होगी। इसलिये भी क्योंकि हम ही नहीं होने देंगे, वोट आप कर सकते हो। राहुल गाँधी का एक विकल्प है, स्टैंफोर्ड से पढ़कर आया है, जीनियस है पिछले 12 साल से तो हम खुद उसके समर्थको से हर साल सुनते आ रहे है कि अब वो मैच्योर हो गया है। हमें तो अच्छा विकल्प नहीं लगा इसलिए इन्हे बैठा दिया था, आपको अच्छा लगे तो पाड़े को बैठाओ। बाकि धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से कुछ बदल जाएगा तो कुछ नहीं होगा, विलासराव देशमुख के इस्तीफे के बाद भी कोई आतंकी हमला नहीं रुका था। इन सबसे जरुरी, व्यवस्था मे परिवर्तन करना है तो आपका जेल से बाहर रहना जरुरी है। आपके पास सीटें कम है, प्रतियोगिता बड़ी है, आज 100 मैदान मे हो तो लगभग एक लाख इस समय घर मे पढ़ाई कर रहे है। जो आपके इर्द गिर्द है वो 30-35% मे भी जंग जीत लेंगे, इसलिए आपका कुरुक्षेत्र जंतर मंतर नहीं बल्कि पुस्तके है। छात्र धीरे धीरे लौट रहे है आप भी लौट आइये, इससे पहले कि बहुत देर हो जाये और पछतावा रह जाए। ✍️परख सक्सेना✍️ https://whatsapp.com/channel/0029Va4lf2hL7UVcS5d5x12X
जातिवादी बात नहीं है और आंदोलन भी धीरे धीरे शीत हो रहा है लेकिन सामान्य वर्ग के छात्रों को कुछ समझाने की जरूरत है। दिमाग को ठंडा करो और पीछे हो जाओ, ये लड़ाई आपकी तो बिल्कुल भी नहीं है। आपका प्राथमिक संघर्ष आज भी वही है कि आपका सिलेक्शन 500 मे भी नहीं होगा और किसी का 300 मे भी हो जायेगा, आप सरकार को इस मुद्दे पर घेर सकते है लेकिन जैसे ही घेरोगे दाए बाए वाले कॉकरोच आपको कुचल देंगे। कॉकरोच तो आपके विरुद्ध ये तक नारा दे रहे है कि तिलक तराजू और तलवार को मारो। मोदीजी की दिवंगत माताजी को अपशब्द कह रहे है क्या ये आपके घरो की परवरिश हो सकती है। बचपन मे जिन बच्चो के साथ खेलने को मना किया जाता था ये वही बच्चे है। इतिहास किताब पढ़ने वाले बनाते है ना कि रील्स स्क्रॉल करने वाले, इसलिए इस अलगोरीदम के जाल से निकलिए। ये आंदोलन नहीं फूहड़ता है जहाँ नारा ए तकबीर के नारे लग रहे है, इस पूरे फसाद मे तीन लोग है पीछे दंगाई, बीच मे आप और सामने लाठी पकड़े सत्ता। दोनों ही दिशा मे आपकी पिटाई होना तय है। ये दृश्य है जहाँ पुलिस की गाडी तोड़ने वालो के फिंगर प्रिंट उठ रहे है। यदि आपने हाथ भी लगाया है तो फिंगर प्रिंट मिलेगा और कार्रवाई होंगी, जो बच्चे गिरफ्तार होंगे उनका आगे पूरा करियर खत्म है। यहाँ न्याय और समता का आंदोलन नहीं हो रहा है, खुल्ले नारे लग रहे है कि तिलक तराजू और तलवार को मारो। एक बार इन दंगाईयों को बोलकर देखो कि आरक्षण पर चर्चा ही कर ले आपको फ़ौरन आपकी हैसियत दिखा दी जायेगी। ये आंदोलन छात्रों का नहीं है, जैसे जेपी आंदोलन से लालू जन्मा और अन्ना आंदोलन से केजरीवाल उसी तर्ज पर एक तीसरा गिद्ध जन्म लेगा। ये तीसरा गिद्ध भी अपने बच्चो की कसम खायेगा, आपके दम पर उठेगा और बड़ा होकर उसी बीजेपी के गले मिलेगा जिसे उखाड़ने की आप बात कर रहे हो। आपके हाथ रह जायेगी जेल की सलाखे और खुली किताबों मे पड़ा आपका भविष्य। सामान्य वर्ग वालो के लिए इसलिए भी है क्योंकि इस वर्ग मे ज्यादातर लोग मिडिल क्लास है, कुछ सिंगल चाइल्ड भी होंगे। यदि आप जेल गए तो पीछे आपका परिवार है, 18 साल की पूरी मेहनत तबाह हो जाएगी सिर्फ इस चक्कर मे कि किसी को राजनीति चमकानी थी तो उसने आपको आगे कर दिया। पत्थर पीछे से पड़े या लाठी आगे से चले दोनों स्थिति मे मरण होना है, इसलिए बेहतर है समय रहते लौट जाओ जैसे बाकि बच्चे लौट रहे है। ये आंदोलन 20 को उग्र था, 21 को शांत पड़ गया और 22 को राजनीतिक संगठन के कार्यकर्ताओ के चलते फिर बढ़ गया और आज 23 को फिर शांत हो रहा है। धीरे धीरे मूल छात्र पीछे हो रहे है और राजनीति वाले आगे आ रहे है, अब सिर्फ दंगे होने है और गिरफ्तारी होंगी। आपकी तो निश्चित होंगी क्योंकि राजनीति वाला आगे तो नहीं आएगा, एक बार गिरफ्तार होंगे और सबकुछ समाप्त। माता पिता वकीलों के पीछे भाग रहे होंगे, ये जो आज कुछ डॉक्टर और वकील समर्थन कर रहे है ये पूछने भी नहीं वाले। रहा प्रश्न सत्ता परिवर्तन का, तो वो दंगों से तो नहीं होगी। इसलिये भी क्योंकि हम ही नहीं होने देंगे, वोट आप कर सकते हो। राहुल गाँधी का एक विकल्प है, स्टैंफोर्ड से पढ़कर आया है, जीनियस है पिछले 12 साल से तो हम खुद उसके समर्थको से हर साल सुनते आ रहे है कि अब वो मैच्योर हो गया है। हमें तो अच्छा विकल्प नहीं लगा इसलिए इन्हे बैठा दिया था, आपको अच्छा लगे तो पाड़े को बैठाओ। बाकि धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से कुछ बदल जाएगा तो कुछ नहीं होगा, विलासराव देशमुख के इस्तीफे के बाद भी कोई आतंकी हमला नहीं रुका था। इन सबसे जरुरी, व्यवस्था मे परिवर्तन करना है तो आपका जेल से बाहर रहना जरुरी है। आपके पास सीटें कम है, प्रतियोगिता बड़ी है, आज 100 मैदान मे हो तो लगभग एक लाख इस समय घर मे पढ़ाई कर रहे है। जो आपके इर्द गिर्द है वो 30-35% मे भी जंग जीत लेंगे, इसलिए आपका कुरुक्षेत्र जंतर मंतर नहीं बल्कि पुस्तके है। छात्र धीरे धीरे लौट रहे है आप भी लौट आइये, इससे पहले कि बहुत देर हो जाये और पछतावा रह जाए। ✍️परख सक्सेना✍️ https://t.me/aryabhumi
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ये पृथ्वीराज की दिल्ली नहीं है जहाँ मुहम्मद गौरी को बिठा दोगे ये अमित शाह की दिल्ली है, हमले का सोचा भी तो अफगानिस्तान भी खो दोगे। कॉकरोच दिल्ली का तख़्त हिलाने निकले थे लेकिन इस दिल्ली साम्राज्य का महाराजा वो है जिसने 12 साल गुजरात मे सिर्फ षड़यंत्र झेला है। पांडव कुरुक्षेत्र जीते क्योंकि उसके पीछे एक कारण इतने वर्षो का वनवास भी था, दुर्योधन ने समस्या पैदा कर करके उन्हें मजबूत बना दिया था और इसका परीक्षण विराट युद्ध मे हुआ जब अकेले अर्जुन ने पूरी हस्तिनापुर की सेना को पस्त कर दिया। सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मे अमित शाह के साथ जो सब हुआ उसने उन्हें कई सालो तक परेशान रखा, गुजरात छोड़ना पड़ गया मगर उस संघर्ष से जो अमित शाह आज बन गए है वो ही अब विपक्ष के लिए घातक है। भारत के गृहमंत्री के लिए सबसे जरुरी तीन ही प्रोजेक्ट थे एक आतंकवादी हमले रोकना, दूसरे घुसपैठियों को रोकना और तीसरा जो सबसे जरूरी और सबसे कठिन था नक्सलवाद। अमित शाह को 7 साल हो गए है और तीनो ही समस्या हल हो गयी है। आतंकी हमले हुए होंगे मगर 2008-09 वाला डर नहीं है, जितनी सरलता से ISI जो मर्जी किसी भी शहर मे धमाके कर रही थी वो अब बंद हो गए है। घुसपैठ रोकने के लिए अंतिम दीवार बंगाल बची थी जो भी अब मजबूत हो गयी। गजवा ए हिन्द का प्रोजेक्ट अब कम से कम 50 साल पीछे जा चुका है और वो भी इस पर निर्भर है कि कांग्रेस को कम से कम 15 साल तो मिले तब ही भारत इस्लामिक राष्ट्र बन सकता है अन्यथा अब सारे दरवाजे बंद है। लेकिन तीसरा और सबसे जरूरी है नक्सलवाद, ये रूस की क्रांति पर आधारित है। कम्युनिस्ट नहीं चाहते थे कि कांग्रेस को सत्ता मिले इसलिए उन्होंने हथियारों का सहारा लिया, ये कम्युनिस्ट तीन श्रेणी मे बंटे थे। एक जो जंगलो मे नक्सलवाद फैला रहे थे, दूसरे जो कॉलेज और यूनिवर्सिटीज मे बच्चों के माध्यम से सरकार विरोधी मुहीम छेड़ रहे थे और तीसरे जो राजनीति मे उतरकर हल्ला मचा रहे थे, तीनो ही विदेशो से मिलने वाले समर्थन पर टिके थे। विदेशो से जो फंडिंग हो रही थी वही इनकी ऑक्सीजन थी। लेकिन फिर होती है नोटबंदी, इसके बाद से ही असल मे सबकी कमर टूटी है। आतंकी घटनाये हथेली पर गिनने योग्य रह गयी है, नक्सली बर्बाद हो गए और पड़ोस मे पाकिस्तान भी पतन के रास्ते आगे बढ़ गया। 2019 मे अमित शाह गृहमंत्री बने और यही से असली क्रेकडाउन भी शुरू हुआ, सबसे पहले कॉलेज यूनिवर्सिटीज मे चुन चुन कर वे प्रोफेसर शांत कराये गए जो साम्यवाद का सपना देख रहे थे। अधिकारियो और जजों की नियुक्ति भी उसी हिसाब से बदली गयी, सोहराबुद्दीन को देसी ढंग से मारा था उसका भी सबक ले लिया। नक्सलीयों के एक एक सरगना को बड़ी ही कसाईंनुमा मौत दी और वो भी क्लासिक ढंग से, मीडिया मैंनेजमेंट भी शानदार रहा कौन सी खबर किस तरह से दिखाई जायेगी यह भी सुनिश्चित हो गया। कम्युनिस्टो को हर राज्य मे साम नाम दंड भेद से मात दी और आज नतीजा ये है कि इस कैंसर का इलाज हो गया। 2029 तक भारत के गृहमंत्री के लिए इन 3 प्रोजेक्टस से जरूरी और कुछ नहीं होगा। अमित शाह सरदार पटेल के बाद सबसे योग्य गृहमंत्री है, मोहन यादव और भजनलाल शर्मा जैसी शिकायते जरूर है मगर वो शिकायते हमें इतना दिवालिया भी नहीं बनाती कि हम अमित शाह की योग्यता पर शक करें। 2016 मे जेएनयू के आंदोलन हुए थे तब एक अलग ही माहौल था, मीडिया की रिपोर्टिंग, बॉलीवुड का सपोर्ट और विपक्ष का हंगामा देखकर हम सभी ये सोचने को मजबूर थे कि 2014 मे सिर्फ सत्ता मिली है काम करने के लिए अभी एक अलग ही लड़ाई लड़नी है। लेकिन आज सोनम वांगचुक का जो हाल हुआ है वो बता रहा है कि व्यवस्था कितनी बदल गयी है। आज बॉलीवुड कही नहीं है अब यदि आपको स्वरा भास्कर बॉलीवुड की पहचान लगने लगे तो गेट वेल सून ही कहूंगा। सोनम वांगचुक यदि खुद अपना आंदोलन करते तो शिकायत ना होती मगर इन्होने ऐसा प्लेटफॉर्म पकड़ा जहाँ सच मे कॉकरोच ही है। यदि अरुनधति रॉय जैसी महिला आपके बगल मे बैठती है तो इससे जलील कुछ हो ही नहीं सकता। अभिजीत दीपके चाहता था कि एयरपोर्ट पर उसे गिरफ्तार कर ले ताकि केजरीवाल वाली नौटंकी वो भी खेले लेकिन हुआ उल्टा ही, पुलिस ने खुद जंतर मंतर की इज़ाज़त दे दी। इस आंदोलन ने वैसे भी इथेनॉल वाला संकट लोगो को भुला दिया। अब सिर्फ नौटंकी हो रही है, 19 दिन बहुत ज्यादा होते है। मुझे निजी रूप से लगता है कि ये बंदा कुछ ना कुछ तो खा रहा है, अब समस्या यही है कि दिन निकलते जाएंगे और इसके पास विकल्प नहीं बचेगा। 20 को ये संसद भवन का घेराव करेंगे, जाहिर है पुलिस ही लाठी मारेगी, इनमे आधे से ज्यादा तो ABVP से हारे लेफ्ट छात्र संगठन है। अमित काका आप तो दंड बजाओ हम आपके साथ है, जंगलो मे ज़ब सेना ने नक्सलियो को मारा वो हम नहीं देख पाए लेकिन दिल्ली की बीच सड़को पर ज़ब पुलिस नक्सलियो को पीटेगी वो 22 जनवरी और 5 अगस्त जितना ही ऐतिहासिक क्षण होगा।
2002 मे भारत के पेट्रोलियम मंत्री राम नाईक बगदाद गए थे जहाँ वे इराक के तानाशाह सद्दाम हुसैन से मिले। सद्दाम हुसैन इस्लामिक जगत का पहला मुस्लिम शासक था जिसने द्विपक्षीय वार्ता के समय कहा कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। गुजरात दंगों के कारण घिरी बीजेपी सरकार के लिए ये किसी वरदान से कम नहीं था। लेकिन तब तक अमेरिका मे 9/11 का हमला हो चुका था, क्लिंटन जा चुके थे और बुश आ चुके थे। वाजपेयी सरकार की विदेश नीति का सबसे बड़ा सिरदर्द यही था कि अमेरिका और इराक की सुलह नहीं हो सकी। जॉर्ज बुश और उनके मंत्री लगातार सद्दाम हुसैन पर दोष गढ़ रहे थे। दुनिया मानने लगी थी कि अमेरिका इराक पर जरूर हमला करेगा, अफगानिस्तान मे लादेन मिल नहीं रहा था इसलिए अमेरिकी सेना ने बर्बरता शुरू कर दी। ये इतने ज्यादा गुस्सा हो चुके थे कि अफगानिस्तान मे एक बारात को उड़ा दिया था। 10 मार्च 2003 को जॉर्ज बुश ने टीवी पर आकर सद्दाम हुसैन को धमकी दी कि इराक छोड़ दे अन्यथा अमेरिका आक्रमण करेगा। बगदाद मे खलबली मच गयी और दिल्ली भी चिंता भी आ गयी, फ़ौरन वाजपेयी जी ने बृजेश मिश्रा को काम पर लगाया और मिश्रा इजरायल के साथ एक डील करके आये। मिश्रा चाहते थे कि किसी तरह भारत, अमेरिका और इजरायल के बीच एक सन्धि हो जाए। अमेरिका इराक पर आक्रमण ना करें और भारत जो सद्दाम हुसैन से अच्छे संबंध रखता आया था वह कोई रास्ता निकाले। जॉर्ज बुश को कोई आपत्ति नहीं थी लेकिन इजरायल पूरा मन बना चुका था क्योंकि सद्दाम से छुटकारा पाने का उसे इससे अच्छा मौका नहीं मिलता। बुश भी ट्रम्प की तरह इजरायल के इशारे पर नाच रहे थे, फिर भी इजरायल भारत के साथ ऊपर से खुश था क्योंकि भाजपा शासन मे वह भी गणना कर रहा था कि भारत इजरायल की दोस्ती गहरी होंगी। 18 मार्च को वाजपेयी जी ने दिल्ली मे होली खेली, उसकी तस्वीरे आपको यूट्यूब पर मिलेगी साथ मे वर्तमान प्रधानमंत्री मोदीजी भी उनके साथ नाचते दिखेंगे। तत्कालीन प्रधानमंत्री आश्वास्त थे कि अमेरिका इराक पर हमला नहीं करेगा लेकिन 2 दिन बाद ही अचानक इराक का आसमान अमेरिकी मिसाइलो से घिर गया। 3 अप्रैल तक बगदाद गिर गया और अमेरिकी सेना के डर से इराकी सेना भाग खड़ी हुई, सद्दाम हुसैन खुद किसी बंकर मे छुप गया। फिर शुरू हुआ 8 महीने का तलाशी अभियान, अमेरिका ने सद्दाम की तलाश मे पूरा इराक खोद दिया। 8 महीने बाद दिसम्बर मे आखिरकार सद्दाम मिला और उसे गिरफ्तार किया गया। जैसे आज ईरान युद्ध की वज़ह से बुरा हाल है वैसे ही तब इराक युद्ध की भी स्थिति थी, वाजपेयी सरकार के इंडिया शाइनिंग को इसी युद्ध का ग्रहण लगा था। वाजपेयी सरकार मे अपार विकास हुआ सबकुछ गुड टू गो था मगर इस एक युद्ध ने महंगाई की जो मार दी उसने 10 साल की मुग़ल सल्तनत को जन्म दे दिया। सद्दाम को लेकर हमारा रवैया क्या होगा वह बहस का विषय हो सकता है लेकिन ये गद्दाफी की तरह उतना सनकी नहीं था। गद्दाफी पूरी तरह पाकिस्तान की ओर था मगर सद्दाम हुसैन को लेकर राय अलग बनाई जा सकती है। दिसम्बर मे ज़ब सद्दाम पकड़ा गया तो अमेरिका ने फिर भारत को याद किया। फोन पर यशवंत सिन्हा ने कलिन पॉवल से बात की तो कोई खुशी प्रकट नहीं की बस इराक मे शांति बहाल करने को कहा। अमेरिका सद्दाम को पकड़ने के बाद भी नहीं रुका आप अबू गरीब जेल के विषय मे पढ़िए, अमेरिकियो ने मानवाधिकार के जहाँ मर्जी वहाँ उल्लंघन किये। ईरान युद्ध मे भी यही मत है कि डोनाल्ड ट्रम्प जॉर्ज बुश से कही बेहतर है, जॉर्ज बुश चेहरे पर स्माइल रखकर देशो को खंडहर बनाते गए। ट्रम्प कम से कम खुलकर तो कहते है कि तेल चुराना है या सत्ता पलटना है, लेकिन दोनों मे एक बात कॉमन है कि दोनों क्रूर है। जो इराक मे हुआ वही ईरान मे भी होगा। अमेरिका ने अभी जमीन पर सेना नहीं उतारी है जिस दिन उतार दी तब आपको ड्रोन से नहीं बन्दूको से लड़ना होगा और तब आप बच नहीं सकते। अमेरिकी सैनिक ज़ब तेहरान मे उतरेंगे तो बगदाद से ज्यादा तबाही मचाएंगे। इराक युद्ध ने वाजपेयी सरकार की नीतियों को प्रभावित किया हालांकि 2004 के चुनावों के और भी आयाम है। ईरान युद्ध भी मोदीजी की नीतियों को प्रभावित कर रहा है, लेकिन चुनावों मे अभी 3 साल है। डोनाल्ड ट्रम्प को भी जॉर्ज बुश की तरह जमीन पर सेना उतारनी होंगी, लगभग केजरीवाल जितने ही यूटर्न लिए है एक दो और ले लेंगे तो विरासत नहीं बिगड़ेगी। ✍️परख सक्सेना✍️ https://whatsapp.com/channel/0029Va4lf2hL7UVcS5d5x12X
मोहन यादव को लेकर बीजेपी एक गड़बड़ कर रही है वो यह कि जनता मूर्ख नहीं है। जनता हिंदुत्व और विकास के नाम पर वोट डाल रही है मगर इसका मतलब ये नहीं कि उसे कुछ समझ नहीं आ रहा। ऐसी ही गलतियां करके कांग्रेस ने केजरीवाल और क्षेत्रीय दलों के द्वार खोले थे। मोदीजी ज़ब से प्रधानमंत्री बने है तब से बीजेपी की सबसे बड़ी उपलब्धि ही यह रही कि उसने कोई घोटाला नहीं किया। व्यापम मोदी युग से पहले का है और शिवराज जननेता थे इसलिये बाल बाल बच गए। लेकिन मोहन यादव ने जो क्लासलेस ढंग से घोटाला तो नहीं मगर कुछ वैसा ही कांड किया उससे आप नहीं बच सकते। मध्यप्रदेश की जनता जानती है कि मोहन यादव के पास उज्जैन मे क्या कुछ नहीं है। आप राष्ट्रीय स्तर पर नैरेटिव परोस भी दे मगर मध्यप्रदेश मे नुकसान हो जाएगा। मध्यप्रदेश की विशेषता बस इतनी है कि पृथ्वीराज के ऊपर गौरी को नहीं रखेंगे, लेकिन जिस दिन ये उसूल टूटा उस दिन बीजेपी हाशिये पर आ जाएगी। आज मध्यप्रदेश बीजेपी का गढ़ है, हमारी पूरी एक नस्ल निकल चुकी है हमने भी सामान्य ज्ञान के पेपर मे मुख्यमंत्री का नाम उमा भारती लिखा था और हमारे बच्चे मोहन यादव लिखने की तैयारी मे है। एक पूरी पीढ़ी बीजेपी के ध्वज तले निकली है ऐसे मे मोहन यादव को बैठाना और मनमानियो को नजरन्दाज करना भारी पड़ेगा। मोहन यादव का एकमात्र अच्छा फीडबैक यह है कि ये मध्यप्रदेश मे अब तक के सबसे बड़े हिंदूवादी मुख्यमंत्री है। लेकिन ये बात मूर्खतापूर्ण है, राजस्थान मे होते तो बात समझ आती क्योंकि वहाँ कांग्रेस का शासन था मगर मध्यप्रदेश मे तो आप 20 वर्ष के शासन की अगली कड़ी थे। यहाँ आपका हिंदूवादी होना कोई बड़ा मील का पत्थर नहीं है। राजनीति मे कभी कभी गढ़ पहले ढह जाता है, 1975 तक किसने सोचा होगा कि 2 साल मे कांग्रेस बंगाल से समाप्त हो जायेगी? 1989 मे उत्तरप्रदेश, 1995 मे गुजरात, 2003 मे मध्यप्रदेश और 2014 मे महाराष्ट्र ये कांग्रेस के गिरते किले है और गलती बस इतनी ही करी कि जनता को मूर्ख मान लिया। अब गलती सुधारने का सही मौका है मोहन यादव पर एक्शन लीजिए, जमीने खरीदना गलत नहीं है लेकिन जिस तरह से सत्तातंत्र का दुरूपयोग हुआ वो अक्षम्य है। महाराष्ट्र मे अशोक चव्हाण ने इससे भी छोटे घोटाले मे इस्तीफ़ा दे दिया था, यदि ये बच गए तो गलती सुधारेंगे नहीं बल्कि इसे जनता का अज्ञान मानकर इससे बड़े घोटाले करेंगे। रीवा जबलपुर तरफ के किसी विधायक को उठाकर मुख्यमंत्री बना दीजिये, क्योंकि लम्बे समय से भोपाल की कमान मालवा वालो के हाथ मे है। लेकिन ये जो रायता फैला है उसे इग्नोर मत कीजिये, बीजेपी स्वाहा नहीं भी हुई तो कमजोर पड़ जायेगी। मध्यप्रदेश मे क्षेत्रीय नेताओं की विफलता जनता को चुभ रही है। जनता की समस्या बस इतनी है कि कांग्रेस के अलावा कोई विपक्ष नहीं है और मध्यप्रदेश मे कांग्रेस को चुनना उसूलो से समझौता करना हो जाता है। इसका एक उपाय यह है कि अगली बार भी बीजेपी यदि वर्तमान विधायकों को ही खड़ा करें तो आप EVM मे जिसका नाम सबसे ऊपर हो उस निर्दलीय को वोट दीजिये। बीजेपी का विधायक हारेगा और निर्दलीय जीतेगा वैसे भी अंत मे बीजेपी इन्हे खरीद लेगी, सत्ता बीजेपी को ही मिलेगी मगर एक सबक के साथ। साँप भी मरेगा और लाठी भी नहीं टूटेगी, साथ ही गैर भाजपाई हिंदूवादियों से अनुरोध है अपने बीच मे एक श्यामा प्रसाद मुखर्जी या गुरु गोलवलकर किस्म के लोगो को खडे कीजिये। एक कट्टर हिंदूवादी पार्टी की सख्त जरूरत है जो विकास को समझें, बीजेपी को ना भी हरा सके तो कम से कम दबाव तो बना सके। लोग पृथ्वीराज की जगह गौरी को भले ही ना चुने मगर भीमदेव सोलंकी को खुशी खुशी बैठा लेंगे। ✍️परख सक्सेना✍️ https://whatsapp.com/channel/0029Va4lf2hL7UVcS5d5x12X
आज पाड़ा 56 का हो गया, इंच मे नहीं साल मे। ऋषि सुनक एक चुनाव हारे और करियर खत्म, जस्टिन ट्रूडो हारे भी नहीं मगर उनकी वजह से पार्टी की प्रतिष्ठा पर आँच आयी और वे भी बाहर हो गए, एड मिलिबेंड जैसे नेता का भी करियर स्वाहा हो गया। ये लोकतंत्र का सबसे क्रूर चेहरा है। लेकिन इसी लोकतंत्र के इतिहास मे पहला और शायद आखिरी नेता भी जन्मा है जिसके लिए पराजय का आकाश अनंत है। राहुल गाँधी की हर पराजय पहले वाली की तुलना मे तीव्र होती है मगर उतनी ही तीव्रता से उसे ढाल दी जाती है। ब्रिटेन और कनाडा के उदाहरण छोड़ दीजिये भारत मे नरसिम्हाराव, सीताराम केसरी, खुद वाजपेयी और आडवाणी भी इसके शिकार हुए है। ज़ब ज़ब पार्टी हारी या कमजोर हुई है नेताओं ने इसकी जिम्मेदारी लेकर नेपथ्य चुना है। आपको शायद हँसी आये मगर ये विषय मज़ाक का है ही नहीं, ये सीधे हम सभी से जुडा है। राहुल गाँधी के जन्मदिन पर एक पोस्ट डाला जाता है उस पर एक 50+ के अंकल कमेंट कर रहे है कि ये हम genz के नेता है। कुछ तो शर्म करो कम से कम एक फेक आईडी बनाकर कमेंट कर देते। इस तरह गलत डेटा फैलाना या बनाना आप सही ठहरा भी दे मगर उस डेटा को सच मानना जिसे गलत बनाने वाले आप खुद है, ये तो कोर राहुल गाँधी फैन वाली बात है। इसमें हमारा नुकसान और कांग्रेस का सत्यानाश हुआ है। आप मे से कितने लोग बता पाएंगे कि नॉर्थ ईस्ट मे मोदी सरकार की क्या परियोजना चल रही है? एयरपोर्ट या रेल की वहाँ क्या स्थिति है? थोड़ा बुरा लगे मगर नॉर्थ ईस्ट वालों के पास आज भारत से अलग होने के पर्याप्त कारण है सिर्फ उनकी कट्टर देशभक्ति उन्हें रोके हुए है। कश्मीर को आपने कृत्रिम ढंग से रोका हुआ है मगर नॉर्थ ईस्ट के लोगो ने देशभक्ति को जीकर दिखाया है। उत्तर प्रदेश के एक मित्र कह रहे थे कि यदि योगीजी को हटाया तो हम बीजेपी को हरा देंगे। ये हम मेनलैंड वालो की देशभक्ति बची है? हमारा एक नेता नहीं बैठाया तो हम देश अतीक अहमद वालो के हवाले कर देंगे, सोचिये नॉर्थ ईस्ट जैसे हालात उत्तरप्रदेश के होते तो ये तो शायद एक अलग देश बनाने की ही बात करते। नॉर्थ ईस्ट वाले फर्स्ट इंडियन है, देश मे सुबह सबसे पहले वही होती है, उनके साथ नस्लभेद होता है, 2014 के पहले तो उनका विकास शून्य के ही लगभग था। इसके बावजूद वो एक आवाज़ पर भारत माता की जय के नारे लगाने लगते है। अब सवाल ये है कि ऐसे नॉर्थ ईस्ट के लिए सरकार ने कितना काम किया? निःसंदेह आप कमेंट बॉक्स मे 10-12 उपलब्धिया लिख भी दे मगर अगला प्रश्न है कि विपक्ष ने नॉर्थ ईस्ट के कितने मुद्दे उठाये? ये तो नरेंद्र मोदी की कमिटमेंट है कि बिना विपक्ष के नॉर्थ ईस्ट मे कुछ हो रहा है, कोई और प्रधानमंत्री होता तो उसे बाध्य करने वाला कोई नहीं है। मध्यप्रदेश मे मंडीदीप नाम का औद्योगिक शहर बना था ज़ब बना था तब बीजेपी सरकार ने बड़ी बड़ी उड़ाने भरी थी, आज मध्यप्रदेश मे चूंकि विपक्ष ही नहीं है तो बीजेपी फ्री के रन दौड़ रही है। पिछले 4-6 महीने के अख़बार मे मैंने तो मंडीदीप से जुडी कोई बड़ी डेवलपमेंट नहीं पढ़ी, शहर ही अनाथ बना हुआ है। गुजरात दंभ रहा है क्योंकि यहाँ भी नरेंद्र मोदी और अमित शाह की व्यक्तिगत प्रतिबद्धता है। लोकल बीजेपी कुछ करें ना करें उस पर विपक्ष का दबाव तो कतई नहीं है, इसलिये विपक्ष बहुत जरूरी है और अच्छा वाला विपक्ष जरूरी है ये नहीं कि सोरोस से पैसे लेना शुरू कर दे। यदि ये पोस्ट दिग्विजय सिंह, कमलनाथ, अशोक गहलोत या डीके शिवकुमार जैसे कांग्रेसी पढ़ रहे हो और आपके बुजुर्ग हाथ पैरो मे थोड़ी बहुत जान बची है तो कमान ले लो भाई। कुछ तो करो, कितने राफेल गिरे की जगह हम F-35 क्यों नहीं खरीद रहे इस पर चर्चा करो, वोट चोरी के बजाय थोड़ा नॉर्थ ईस्ट या FDI पर चर्चा कर लो। ट्रम्प क्या बोलते है उसकी जगह भारत अपना नैरेटिव कैसे बनाये इस पर मुद्दे उठा लो। ये ही वे मुद्दे है जो विपक्ष को जीवंत कर सकते है शेष सभी बीजेपी को ही फायदा करेंगे और कोई सकारात्मक परिवर्तन भी नहीं लाएंगे। सत्ता आपको दोनों केस मे नहीं मिलनी क्योंकि भविष्य अब अन्नामलाई जैसे लोगो का है लेकिन आपकी क्रेडिबिलिटी बनी रहेगी। पाड़ा 56 का हो गया उसे बधाई दो लेकिन अब बाड़े मे बाँध दो और कांग्रेस का पुनः गठन कर लो क्योंकि मोदी और शाह के बाद जो तानाशाही आएगी वो भक्तो को भी महँगी पड़ेगी और आपकी तो सहनशक्ति के ही बाहर होंगी। ✍️परख सक्सेना✍️ https://whatsapp.com/channel/0029Va4lf2hL7UVcS5d5x12X
ऑपरेशन लोटस उस जमाने मे शुरू हुआ था ज़ब लोटस भी नहीं था, बीजेपी का नाम जनसंघ था और कमल की जगह दीपक का चुनाव चिन्ह था। 1967 मे राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने मध्यप्रदेश मे डीपी मिश्रा की सरकार गिरा दी थी, उन दिनों एक तिहाई विधायक तोड़कर भी दल विरोधी कानून से बचा जा सकता था। 1975 मे यही ऑपरेशन लोटस गुजरात मे भी हुआ मगर आपातकाल लग गया और जनसंघ का दीप जलते जलते रह गया। वाजपेयी युग शुरू हुआ तो ऑपरेशन लोटस स्वतः स्थगित हो गया क्योंकि वाजपेयी जी तोड़फोड़ की राजनीति के सख्त खिलाफ थे। लेकिन वाजपेयी जी का दुर्भाग्य देखिए कि तोड़ फोड़ की राजनीति के सबसे बड़े शिकार भी वे ही बने, पहले इंदिरा गाँधी ने जनता पार्टी तुड़वाई फिर 1999 मे सोनिया गाँधी ने साम नाम, ऊंच नींच का प्रयोग करके एक वोट से सरकार गिरवा दी। 1999 मे ज़ब जयललिता ने वाजपेयी सरकार से समर्थन वापस लिया तो वाजपेयी सरकार अल्पमत मे आ गयी। DMK ने समर्थन दे भी दिया, हरियाणा के चौटाला भी बीजेपी के साथ हो गए लग रहा था कि वाजपेयी सरकार बच जायेगी। मगर अंत समय मे मायावती ने खेल बिगाड़ा, इंद्र कुमार गुजराल और सैफुद्दीन जैसे लोग जो सरकार मे थे उन्होंने खंजर घोपा। मर्यादाये तो तब पार हुई ज़ब उड़ीसा के नए नवेले मुख्यमंत्री भी वोट डालने पहुँच गए। इन्होने लोकसभा से इस्तीफ़ा नहीं दिया था, गिरधर गमांग नाम था। वाजपेयी ने कहा भी कि नैतिकता मत छोड़िये मगर ये नेहरू की नहीं सोनिया की कांग्रेस थी, सोनिया गाँधी वाजपेयी पर हॅसती रही और चुनी हुई सरकार एक वोट से गिर गयी। नीचता यही नहीं रुकी, सरकार गिरते ही कारगिल युद्ध हो गया। कांग्रेस को लगा कि इससे बीजेपी को फायदा होगा तो चुनाव आयोग ने चुनाव ही देरी से करवाये, इसमें आयरनी यह है कि तब के चुनाव आयुक्त ने बाद मे कांग्रेस ज्वाइन की और मनमोहन के समय तो मंत्री भी बने। आज चुनाव आयोग को रोती कांग्रेस कितनी अच्छी लगती है। 2005 मे वाजपेयी जी ने सन्यास ले लिया, इसके बाद RSS मे मोहन भागवत का युग शुरू हुआ। नितिन गडकरी दिल्ली भेजे गए और ऑपरेशन लोटस को फिर से शुरू किया गया, पहली रणभूमि कर्नाटक बना। कांग्रेस और जनता दल के विधायकों को तोड़कर बीजेपी मे लाया गया और सरकार मजबूत हुई। 2016 मे नीतीश कुमार तोड़े गए, हरियाणा मे चौटाला लाये गए, कश्मीर मे मुफ़्ती साथ आये और सबसे बड़ी क़ामयाबी मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र मे मिली ज़ब ज्योतिरादित्य सिंधिया और एकनाथ शिंदे तोड़े गए। गोवा और गुजरात मे भी ऑपरेशन लोटस चला और आज वक़्त का तकाजा देखिये कि सोनिया गाँधी खून के आंसू रो रही है। कोई बहुत बड़ी बात नहीं है यदि कांग्रेस के भी सांसद टूट जाए, इस बार अमित शाह को बस इतना बोलने की देर है कि हम संभाल लेंगे आप अपनी अंतर्रात्मा को सुनो। सांसद तोड़ने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी और आपके प्रस्तावो पर कांग्रेस का समर्थन आता रहेगा। कांग्रेस मे सिर्फ गाँधी ही रह जाए तो कोई बड़ी बात नहीं है। गिरधर गमांग जिसने वाजपेयी सरकार गिराई थी वो तक बीजेपी मे घुसने की कोशिश कर चुका है, 2015 मे गमांग ने अमित शाह को मक्खन लगाते हुए कहा था कि मै तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रशंसक हूँ। बेशर्मी की हद देखते हुए आप यह भी गौर करे कि कांग्रेस मे कितने बड़े बड़े चाटुकार भरे हुए है। खैर जो काम तब कांग्रेस ने किया था वही आज बीजेपी ने किया, गलत वो भी थे गलत ये भी है। बस कांग्रेस की अपनी कोई विचारधारा नहीं थी कैसे सोनिया और राहुल सत्ता मे रहे वो इसी मे लगे थे इसके विपरीत बीजेपी के पास हिन्दुराष्ट्र और अखंड भारत का लक्ष्य है। अभी वाले नहीं करेंगे तो अगले वाले करेंगे इसलिए हम बीजेपी के साथ है। लेकिन बीजेपी भी आग से खेल रही है, तानाशाही ही पतन का कारण बनती है। बड़े नेताओं पर नहीं मगर हर 10 साल मे अपने विधायक और सांसद बदलते रहिये, जनता को मोदी शाह नहीं ये विधायक और इनके छुठभैये परेशान करेंगे जो खुद को किसी राजा से कम नहीं समझते। ✍️परख सक्सेना✍️ https://whatsapp.com/channel/0029Va4lf2hL7UVcS5d5x12X
हम लोकतान्त्रिक परिवर्तन के उस दौर मे है जहाँ वन पार्टी रुल देखने को भी मिल रहा है मगर उसमे मजा भी आ रहा है। अब तीन तरह के नेता देश मे है एक जो बीजेपी के साथ है दूसरे जिन्हे बीजेपी साथ नहीं लेना चाहती, तीसरे ओवैसी जैसे कुछ अपवाद हो सकते है। सायनी घोष के साथ ये बात तो साफ हो गयी कि बीजेपी जिसे चाहे अपने साथ ले सकती है। बहरामपुर के मुसलमानो ने अप्रत्यक्ष रूप से बीजेपी को वोट दिया था ये कितना हास्यास्पद है। अमित शाह को वैसे एक झटका तो फिर भी लगा है, बागी गुट ने कुछ ज्यादा अक्लमंदी दिखा दी। NDA को बाहर से समर्थन करते तो कुछ खास मिलता नहीं ऐसे मे इन्होने खुद का विलय NDA की ही एक पार्टी मे कर दिया। NCPI की एक सीट भी नहीं थी और अब आयी तो अचानक से 20 आ गयी, NDA मे बीजेपी के बाद ये अचानक से दूसरा सबसे बड़ा दल बन गया जबकि कल तक तो खुद NDA समर्थको को नहीं पता था कि ऐसी भी कोई पार्टी उनके साथ है। ये मास्टर स्ट्रोक है, अब मोदीजी को दो केबिनेट मंत्री पद तो देने ही पड़ेंगे। शायद काकोली घोष और शताब्दी रॉय को ही ये पद मिले, चंद्रबाबू नायडू की TDP को भी दो मंत्री पद दिये गए थे ऐसे मे इन्हे भी देने तो पड़ेंगे। पार्टी के हिसाब से तो वो 2022 से ही आपका हिस्सा है बस उस पार्टी के रातोरात दिन पलट गए, ज़ीरो से नंबर दो पर आ गयी ये संविधान मे मौजूद अपवादों का ही परिणाम है। कलेजे पर पत्थर रखो या चट्टान, मंत्री तो आपको बनाना ही पड़ेगा, DMK भी ऐसा कुछ कर सकती है। ये लालची पार्टियां है इन्हे पता है कि अपनी दम पर कभी दिल्ली नहीं जीत सकते, इन्हे सत्ता का ऑक्सीजन भी चाहिए। वर्तमान परिदृश्य मे कांग्रेस नंबर दो पार्टी जरूर है मगर 2024 उसने सिर्फ 330 के लगभग सीटों पर लड़ा था। आज 150 सीटें तो वैसी है जहाँ बीजेपी को बिना लड़े ही लीड मिलती है जबकि इसमें मध्यप्रदेश, गुजरात और छत्तीसगढ़ की 66 सीटें अभी जोड़ी नहीं है। गणित का खेल है जो हर सांसद करता है, सांसद छोड़िये मुसलमान भी करता है। इसीलिए महाराष्ट्र मे NCP को रिकॉर्ड तोड़ मुस्लिम वोट मिले। क्या महाराष्ट्र का मुसलमान नहीं जानता था कि NCP का BJP के साथ गठबंधन है? लेकिन ये सत्ता की ताकत है जिसे सब सलाम करते है। एक बात और है जो सोचने लायक है कि आज बीजेपी को समर्थन दे रही पार्टियां अधिकांश वे है जो कभी कांग्रेस का हिस्सा थी। TDP को एनटीआर ने कांग्रेस से अलग किया था आज वो बीजेपी के साथ है, जनता दल की तो जननी ही कांग्रेस मे हुई बगावत है, अब TMC भी आ गयी है, सुनेत्रा पवार की NCP भी कभी कांग्रेस का हिस्सा थी। वो छोड़िये पवन कल्याण भी कभी कांग्रेसी ही हो चुके थे जबकि आज दक्षिण के अशोक सिंघल बन चुके है। सिवाय शिवसेना के, NDA मे ऐसा कोई नहीं है जो कांग्रेस का कभी हिस्सा ना रहा हो। कांग्रेस से इन्हे 100 शिकायते थी मगर BJP से खुशी खुशी जुड़े हुए है, बीजेपी कल को हिन्दुराष्ट्र का प्रस्ताव भी ले आये तो ये उसके समर्थन मे वोट करेंगे। हालांकि ये दल विशुद्ध कांग्रेस नहीं है उसकी फ़िल्टर लगी क्रीमी लेयर है, इन्होने कांग्रेस को मात दी है और अब ज़ब बीजेपी को नहीं दे पाए तो उससे दोस्ती कर ली। ये तो सदियों से होता आ रहा है, बीजेपी का अश्वमेध यज्ञ चल रहा है या तो विलय कर लो या युद्ध मे परिणाम भुगतो। बस इस अश्वमेध यज्ञ मे फैसले बीजेपी ले रही है कि उसे घोड़ा कहाँ रुकवाना है और कहाँ दौड़ाना है। स्टालिन के लिए ये रेड सिग्नल है, शांति से NDA मे शामिल हो जाओ कल को यदि दयानिधि मारन ही बागी हो जाए तो अब तो किसी को आश्चर्य भी नहीं होगा। सांसद अपनी मर्जी से टूटे उससे अच्छा है यज्ञ के घोड़े के सामने खुद ही झुक जाओ, नाम के लिए ही सही तुम्हारे पास पार्टी रह जायेगी जिसके फैसले दिल्ली से अमित शाह ले रहे होंगे। ✍️परख सक्सेना✍️ https://whatsapp.com/channel/0029Va4lf2hL7UVcS5d5x12X
तमिलनाडु मे बीजेपी का सबसे अच्छा प्रदर्शन 1999 लोकसभा चुनाव मे ही था। तब DMK बीजेपी के साथ लड़ी थी, बीजेपी के 6 मे से 4 उम्मीदवार जीत गए थे। देखा जाए तो उस चुनाव मे NDA ने सबसे अच्छा प्रदर्शन दक्षिण भारत मे ही किया था। तमिलनाडु मे 26 सीटें NDA को मिली थी। करूणानिधि और वाजपेयी जी की दोस्ती प्रसिद्ध हुई थी, लोग दंग हो गए थे कि ब्राह्मण विरोध करने वाली DMK आज एक ब्राह्मण को दिल्ली के सिन्हासन पर बैठाने मे पसीना बहा रही थी। वाजपेयी ज़ब चेन्नई पहुंचे तो एयरपोर्ट से करूणानिधि के घर तक जुलुस निकालकर स्वागत हुआ। करूणानिधि के घर मे एक चाँदी की कुर्सी थी जिस पर वह बैठता था लेकिन इस कुर्सी पर उसने वाजपेयी जी को बैठाया। करूणानिधि तब मुख्यमंत्री भी था, 1999 मे तो करूणानिधि का भाग्य जोर मार गया लेकिन उसके बाद उल्टी गिनती शुरू हो गयी। 2001 मे जयललिता ने विधानसभा चुनाव जीता और मुख्यमंत्री बनी। 2002 मे गुजरात दंगे हुए, वाजपेयी सरकार घिरने लगी। चंद्रबाबू नायडू पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री थे जिन्होंने सरकार मे रहते इसका विरोध किया, रामविलास पासवान ने इस्तीफ़ा दे दिया लेकिन DMK तब आत्म अवलोकन कर रही थी। दूसरी ओर जयललिता एक बार फिर बीजेपी के करीब आने का मन बना रही थी। 2002 मे ही गुजरात मे मुस्लिम शिविरो पर बुलडोजर चला दिया गया, मोदीजी ने बयान दिया कि ये शिविर इसलिये नहीं है कि बच्चे पैदा करने की फैक्ट्री चलती रहे। मोदीजी का ये बयान आज भी भारतीय राजनीति का सबसे ताकतवर बयान कहूंगा, क्योंकि ये 2002 के समय का बयान है ज़ब सेक्युलरिज्म की शपथ ली जाती थी। यहाँ DMK को महसूस हुआ कि उसकी सेक्युलर छवि को तमिलनाडु मे नुकसान ना हो, उसने कुछ आपत्ति जताई लेकिन वाजपेयी सरकार ने नजरंदाज कर दिया क्योंकि अब अम्मा यानि जयललिता बीजेपी के समर्थन मे आ चुकी थी। 2002 और 2003 के दौर मे जो भी प्रस्ताव बीजेपी लाती उसे DMK तो समर्थन देती ही लेकिन अन्नाद्रमुक भी पीछे नहीं थी। 2001 मे जयललिता ने आख़िरकार करुणानिधि को उसके घर से घसीटकर गिरफ्तार करवाया, करूणानिधि के कपड़े फट गए थे और खुद स्टालिन के कंधे पर आज तक चोट के निशान है। ये किसी पुराने मामले की जाँच मे हुई गिरफ्तारी थी, करूणानिधि इस गुमान मे था कि दिल्ली मे वाजपेयी सरकार का पहिया है। करूणानिधि को लगने लगा था कि वे उपेक्षित होने लगे है, तब जयललिता ने एक इंटरव्यू दिया और खुद को हनुमान भक्त बताया। MGR के समय ही अन्नाद्रमुक पार्टी ने मंदिरो मे रूचि दिखाना शुरू कर दिया था, जयललिता इसे अगले लेवल पर ले गयी और खुद को एक बड़ी धार्मिक महिला के रूप मे प्रस्तुत करने लगी। कही ना कही DMK को सन्देश चला गया कि अब जयललिता बीजेपी की नयी दोस्त है और वैचारिक विभिन्नता DMK को बीजेपी से दूर कर देगी। दूसरी ओर प्रमोद महाजन भी अम्मा के पक्ष मे थे, पहली बात अम्मा मुख्यमंत्री थी दूसरा तमिलनाडु मे अब तक लोकसभा मे उसी का पलड़ा भारी होता था जो मुख्यमंत्री हो। 2003 मे आख़िरकार DMK ने ही खुद को NDA से अलग कर लिया, हालांकि वो बीजेपी को फिर भी बाहर से समर्थन करती रही। 2004 मे DMK अलग से लड़ी और दुर्भाग्य देखिये कि बीजेपी की नयी पार्टनर अम्मा खाता भी नहीं खोल सकी। इसके बाद फिर कभी DMK और BJP एक साथ नजर नहीं आये। DMK ने वोट ना बंटे इस डर से कांग्रेस के साथ गठबंधन किया हुआ था, जयललिता ज़ब तक जीवित रही तब तक इस गठबंधन का मतलब भी था मगर 2026 तक क्यों ढोया ये भगवान ही जाने। DMK ने बयानबाजी भी ऐसी कर रखी है कि अब बीजेपी के साथ प्रत्यक्ष गठबंधन तो मुश्किल है हालांकि दक्षिण के चाणक्य पवन कल्याण कुछ भी कर सकते है। अब कांग्रेस ने ज़ब पीठ पर छूरा घोपा तो स्टालिन ने दूरी बनाई है, पूरे 10 साल विलम्ब लिया निर्णय है। DMK के पास इस समय ना राज्य मे कोई शक्ति है ना ही केंद्र मे, महल खंडहर होना शुरू हो चुका है। क्षेत्रीय पार्टियों के लिए DMK एक पीएचडी का विषय है। कांग्रेस का पतन भी देखिए, DMK अपने वोट ना टूटे इसलिए कांग्रेस के साथ लड़ती थी। मतलब कांग्रेस अब चाहे तो खुद को तमिलनाडु मे खड़ा करना शुरू कर सकती है लेकिन इतने सुनहरे अवसर पर इन्होने विजय की पूँछ पकड़ी हुई है। DMK सबक देती है कि बतौर क्षेत्रीय पार्टी केंद्र की सत्तारूढ़ पार्टी से मत भिड़ो, कांग्रेस सीखाती है कि उदासीन नेतृत्व पुरानी से पुरानी पार्टी को पिछलग्गू बनाकर रख देता है। ✍️परख सक्सेना✍️ https://whatsapp.com/channel/0029Va4lf2hL7UVcS5d5x12X
पिछली पोस्ट्स मे ज़ब लिखा कि भारत अब वन पार्टी रुल मे आ चुका है तो कई लोगो के विपरीत मत थे। बीजेपी के बाद कांग्रेस ही दूसरी बड़ी पार्टी है ये तो निर्विवाद है, लेकिन कितनी बड़ी? 543 लोकसभा सीटों मे 249 सीटें सिर्फ पाँच बड़े राज्यों से आती है, उत्तरप्रदेश, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, बिहार और तमिलनाडु। अपने दिल से पूछिए कांग्रेस का कितने राज्यों मे कितना अस्तित्व है? कांग्रेस इन पाँच राज्यों मे अपनी दम पर बहुत अच्छा भी कर ले तो 15 सीटें बहुत है। 2024 वाले गणित का जवाब भी आगे मिलेगा। मगर यदि नए गणित से देखे तो कांग्रेस के पास अब स्कोप 300 सीटों के इर्द गिर्द रह जाता है। इसके बाद गुजरात, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की 66 सीटों मे कांग्रेस लगभग शून्य है। सिर्फ इन्ही 8 राज्यों को यदि ले लिया जाए तो कांग्रेस के पास 250 से ज्यादा सीटों पर तो कोई अवसर भी नहीं है। जबकि इन्ही 300 सीटों पर बीजेपी का औसत 250 का है, अब यदि कांग्रेस को फिर भी सत्ता मे आना ही है तो शेष सभी सीटों पर उसे पूर्ण विजय चाहिए और बीजेपी हारनी चाहिए। लेकिन शेष राज्यों मे उत्तरी भारत भी है, नॉर्थ ईस्ट मे हिमांता के साथ ही कांग्रेस समाप्त हो चुकी थी। तो फिर बचा क्या? 2024 की बात भी कर लेते है, कांग्रेस बकायदा उधार मांगकर चुनाव लड़ी। तमिलनाडु मे 9 और उत्तरप्रदेश मे 17 सीटों लायक कांग्रेस का क्या वोटर बेस था? ये भानुमति का कुनबा था जो ईंट और रोढ़े मांगकर जोड़ा गया था। ये राहुल गाँधी का वही प्रदर्शन था जो 1984 मे राजीव गाँधी का था, व्यक्तित्व से नहीं बस एक दुर्घटना से जीती सीटें है। यही बात 2024 चुनाव के बाद भी लिखी थी मगर तब लोग भावनाओं मे ज्यादा सोच रहे थे। राहुल गाँधी एक ब्रांड लग रहा था, 240 सीटें कम लग रही थी, 99 तो ऐसा लग रहा था मानो राहुल ही शपथ लेगा। मगर आशा है अब आप इसका सही आंकलन कर पा रहे होंगे। कांग्रेस के लिए अभी जीतना नहीं अस्तित्व बचाना आवश्यक है, पश्चिम बंगाल मे आज बीजेपी के सामने कोई दल नहीं है ऐसे मे बजाय ममता को पकड़ने के आप खुद को खड़ा क्यों नहीं करते? बीजेपी अपने कार्यकर्ताओ के खून का बदला ले रही है, आप बदला नहीं ले सकते लेकिन उनके साथ तो खडे हो जाइये। कांग्रेस को फिर किसी महात्मा गाँधी की जरूरत है, कुछ ऐसे लोग चाहिए जो RSS के नेटवर्क का चक्रव्यूह तोड़कर जमीन से पार्टी को खड़ा कर सके। उसके लिए राहुल गाँधी को सड़क पर आना होगा, वो जो ओछे शॉर्ट कट ढूंढ रहा है उसके बजाय जनता के असली मुद्दे समझने होंगे। भारत बहुत बड़ा देश है यहाँ जिले बदलते ही मुद्दे बदल जाते है इसीलिए RSS को इतना समय लग गया। आपको भी 30-40 साल देने होंगे जो कि एक वंशानुगत पार्टी के लिए असंभव है। RSS इसलिये सफल हुआ क्योंकि गुरु गोलवलकर या देवरस को अपने परिवार वालो को गद्दी नहीं देनी थी। इस पूरे लेख मे अब भी कुछ छूट रहा है, विचारधारा! कांग्रेस के पास आज कोई विचारधारा नहीं है, देश आज़ाद हुआ तो विचारधारा थी लेकिन सोनिया युग आते आते बस राजनीति रह गयी। इसके विपरीत बीजेपी पहले राम मंदिर और कश्मीर जनता को बेच रही थी, अब विकसित भारत बेच रही है और कल को अपने कार्ट मे अखंड भारत भी जोड़ लेगी। कांग्रेस के पास ऐसे मुद्दे ही नहीं है कि जनता को खींच सके, रोज ट्रैफिक लाइट तोड़ते व्यक्ति को लोकतंत्र या संविधान की कोई परवाह नहीं है आप उसे ज़बरदस्ती बेच रहे हो। यही कुछ बाते है कि कांग्रेस अब फिर से नहीं उठ सकती और बीजेपी का वन पार्टी रुल अभी कई वर्षो तक चलेगा। वो अलग बात है कि बीजेपी कोई बड़ा घोटाला कर दे, या फिर भारत उसके नेतृत्व मे कोई युद्ध हार जाए। हालांकि भारत मे युद्ध सत्ता पक्ष के लिए वरदान सिद्ध होता है। इस समय सिर्फ दो ही नेता है जो बीजेपी का विकल्प बन सकते है, एक नवीन पटनायक दूसरे चंद्रबाबू नायडू। लोकतंत्र का दुर्भाग्य यह है कि नवीन बाबू कभी वाजपेयी और मोदी की तरह मास लीडर नहीं बन सके और नायडू भाषायी ज्ञान के चलते तेलुगु क्षेत्र से नहीं निकले। आयु भी एक बड़ा तत्व तो है। हालांकि के अन्नामलाई बीजेपी से अलग हुए है, उनके अंदर भारत का एक भविष्य दिखता है हालांकि अभी बहुत काम करना है। वैसे भी बीजेपी से बागी हुए नेता या तो वापस लौटकर आते है या फिर अदृश्य हो जाते है। ईश्वर करें अन्नामलाई बीजेपी से बड़ी पार्टी बनाये और ज्यादा कट्टर हिन्दू साबित हो। अन्नामलाई की राह कठिन है मगर शुरुआत तो ऐसे ही होती है, 1952 मे बीजेपी को 3 सीटें मिली थी। श्यामा प्रसाद मुखर्जी या गुरु गोलवलकर ने भी कभी नहीं सोचा होगा कि कभी 240 सीटें भी जीतेंगे जो भी लोगो को कम लगेगी। लगे रहो अन्नामलाई, वापस बीजेपी मे विलय करो या नयी बीजेपी खड़ी करके दिखाओ। दोनों स्थिति मे हमारा तो समर्थन है। ✍️परख सक्सेना✍️ https://whatsapp.com/channel/0029Va4lf2hL7UVcS5d5x12X
ममता बनर्जी की जो हालत कर दी है वो राजनीति का सबसे बड़ा संतोषजनक क्षण है। कांग्रेस अब भी ममता के साथ है ये और ज्यादा सुकून देने वाली बात है, दरसल बंगाल मे अब देखे तो बीजेपी के अलावा कोई पार्टी बची ही नहीं। ऐसा लगा था कि कांग्रेस उस गेप को भरेगी लेकिन हम भूल जाते है इनका नेता राहुल गाँधी है। इतिहास यदि नरेंद्र मोदी का आंकलन करेगा तो उसमे 2002 के दंगे को सबसे बड़ा मील का पत्थर कहा जाएगा। दंगों के बाद जिस तरह की राजनीति खेली गयी उसने नरेंद्र मोदी को पूरी ट्रेनिंग दी, पहली लड़ाई तो खुद प्रधानमंत्री वाजपेयी से हुई। उस लड़ाई मे मोदीजी समझ चुके थे कि RSS के बिना आगे बढ़ना मुश्किल है। ज़ब वाजपेयी सरकार की विदाई हुई उसके बाद कांग्रेस बुरी तरह से नरेंद्र मोदी के विरुद्ध लामबंद हुई। नरेंद्र मोदी के खिलाफ एक से एक हथकंडे अपनाये गए, आपको जानकर आश्चर्य होगा कि दूरदर्शन पर मोदीजी बैन थे जबकि गुजरात दंगो पर एंटी मोदी बात करने वाले लोगो को उसी दूरदर्शन के विशेष कार्यक्रम मे बुलाया जाता था। आज ज़ब ये ही कांग्रेसी बोलते है कि बीजेपी राजनीति खेल रही है तो बड़ा सुकून मिलता है। सोहराबुद्दीन के एनकाउंटर के समय अमित शाह को गुजरात तक छोड़ना पड़ा था, गुजरात तो छोड़िये मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के भी बजट कट गए थे। ज़ब गुजरात मे कोई निवेशक आना चाहता तो कांग्रेस का इको सिस्टम काम पर लग जाता, गुजरात के विरुद्ध लेख छपते थे। मध्यप्रदेश मे उन दिनों इंदौर मे समिट हुई थी, एक अमेरिकी कंपनी को निवेश के लिए तैयार किया गया था। संयोग देखिए कि अगले ही दिन मध्यप्रदेश मे जल बचाने के लिए आंदोलन हो गए। नरेंद्र मोदी और शिवराज को बीच कार्यकाल मे गिराने के लिए एक दर्जन प्रयास हुए। मोदीजी सही कहते थे लाठी खाने से ही उनकी पीठ मजबूत हुई, यदि कांग्रेस ने उन्हें इतना तंग ना किया होता तो आज मोदीजी बीजेपी की शायद दूसरी लाइन मे ही खडे होते। लेकिन चुनौती मिलती रही, वे लड़ना सीखते रहे और आज भारतीय लोकतंत्र के सबसे सफल प्रधानमंत्री ही नहीं बल्कि राजनीतिज्ञ भी बन गए। जिस IAS अफसर ने 2002 मे उन्हें गांधीनगर मे देखा होगा और आज यदि वह अफसर दिल्ली मे बैठा हो तो वो आसानी से बता सकता है कि दिल्ली वाला मोदी गांधीनगर वाले से बहुत अलग है। ऊपर से शांत रहते है मगर अंदर ज्वालामुखी है, नीतीश कुमार, ममता, लालू, सोनिया, राहुल और ठाकरे समेत तमाम विरोधियो को ठिकाने लगा चुके है मगर मजाल आँखों मे कोई उस बेरहमी को ढूंढ निकाले। ममता बनर्जी के साथ जो हो रहा है उसे आप पूरी पिक्चर मत समझना, ये तो ट्रेलर भी नहीं टीजर मात्र है। अखिलेश से स्टालिन तक इन सभी का प्रारब्ध किसी भयावह अंत पर ही जाएगा। ये सब ज्यादा दूर नहीं 2029-30 तक हो जाएगा। भारत मे लोकतंत्र तो जीवित रहेगा लेकिन अब दो या उससे अधिक पार्टियों का नहीं होगा। RSS को ही बागडोर मिलेगी, यही एक संगठन है जहाँ नेता जमीन से उठकर आते है। आगे की राजनीति मे यही होना है जो नेता आएंगे वे RSS से आएंगे या उसकी विचारधारा से निकले होंगे। इसका पूरा क्रेडिट कांग्रेस के उस इको सिस्टम को जाता है जो उसने नरेंद्र मोदी को गिराने मे लगाया। मोदी समय के साथ उठते रहे लेकिन उन्होंने किसी को माफ़ नहीं किया, यदि गुजरात दंगों को लेकर उन्हें ज़बरदस्ती परेशान ना किया जाता तो शायद इतिहास ही कुछ और होता मगर अब तो परेशान कर दिया। ममता बनर्जी तो बहुत छोटी शुरुआत है, अभी तो बड़े बड़े राजनीतिक वध होने है। लिखना तो नहीं चाहिए मगर अब अगले 7 सालो मे जो होना है उसके बाद कई मोदी विरोधी ये भी कहेंगे कि मौत ज्यादा बेहतर होती। भारतीय इतिहास नरेंद्र मोदी को शायद एक जननायक के रूप मे या फिर सबसे महानतम शासक के रूप मे याद रखे लेकिन उनका निर्दयी प्रतिशोध शायद कभी इतिहास मे नहीं लिखा जाएगा। ✍️परख सक्सेना✍️ https://whatsapp.com/channel/0029Va4lf2hL7UVcS5d5x12X
इजरायल के प्रधानमंत्री ने भारत की तारीफ़ मे दबाकर कसीदे पढ़े है भारत के लोगो मे खुशी है लेकिन इसे थोड़ा डिकोड करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि भारत मे उनकी निंदा नहीं होती ये तो निर्विवाद है, इजरायल को सबसे ज्यादा पसंद भारत मे ही किया जाता है ये भी अतिश्योक्ति तो नहीं लग रही उल्टे ये तो भारत के भी साथ होता है। भारत को लेकर यदि दुनिया मे सबसे सकारात्मक कोई देश है तो वो इजराइल ही है। लेकिन इसके पीछे कहानी कुछ और ही है आप भूल जाइये कि आप भारतीय है, आप बस कोई जापानी बनकर भारत को देखिये। नरेंद्र मोदी कोई बड़े नेता है, बीजेपी बस एक बड़े देश की रूलिंग पार्टी है आपको इतना ही पता है। अब एक स्वतंत्र दृष्टिकोण से देखिये कि भारत ने इजरायल को लेकर कैसे कदम उठाये है। गाजा के विरुद्ध इजरायल की हर कार्रवाई पर भारत का विदेश मंत्रालय छोटी मोटी निंदनीय टिप्पणी कर रहा था जबकि संयुक्त राष्ट्र मे भारत का राजदूत वोटिंग या तो इजरायल के पक्ष मे कर रहा था या फिर वोट ना डालकर इजरायल का साथ दे रहा था। फिलिस्तीन को मान्यता देने पर भारत स्पेन का स्वागत करता है मगर उसी दिन हथियारों से भरे भारतीय जहाज इजरायल पहुँचते है। फरवरी मे यूएई के राष्ट्रपति सिर्फ एक घंटे के लिए दिल्ली आकर नरेंद्र मोदी से मिलते है, फिर मोदीजी इजरायल जाते है और 2 दिन बाद ईरान मे खामनई मर जाता है। ज्ञातव्य हो कि ये ऑब्जरवेशन आप एक जापानी बनकर कर रहे है, एक वैश्विक नेता का इजरायल जाना और दो दिन बाद हमला होना यदि सामान्य घटना है तो ऐसा कदाचित भूराजनीति मे पहली और आखिरी बार ही हुआ है। ये असंभव है, नरेंद्र मोदी और सेवातीर्थ के अफसर जानते थे कि ईरान की बेंड बजने वाली है। ईरान को परमाणु ऊर्जा के लिए यूरेनियम का संवर्धन करना था, 3% तक संवर्धन करता तो काम हो जाता, लेकिन वो 90% तक जाने की फिराक मे था जो कि परमाणु बम के करीब होता। भारत सरकार ने कई बार ईरान को परमाणु ऊर्जा बेचने का भी प्रस्ताव रखा था, यदि ईरान मान लेता तो ना अमेरिका को दुख होता ना ही इजरायल को। मगर प्रश्न है भारत ने ये प्रस्ताव रखा ही क्यों? कही ना कही एक सीक्रेट डील थी कि भारत और इजरायल मिलकर ईरान को बिना किसी युद्ध के रोक सकते, ईरान ने फिर भी संवर्धन किया और भारत को भरोसे मे रखकर इजरायल ने हमला कर दिया। वैश्विक राजनीति समुद्र के हिमखंडो जैसी होती है, जितनी ऊपर होती है उससे कही ज्यादा नीचे होती है। अमेरिका इजरायल को लेकर क्या सोचता है वो पता नहीं लेकिन भारत के लिए भी कही ना कही इजरायल ही अब प्राथमिकता बन चुका है। भारत की वर्तमान सरकार पूरा मन बना चुकी है कि इजरायल किसी भी तरह एशिया का द्वार बन जाए। IMEC कोरिडोर भारत के लिए बहुत आवश्यक है, ये बन गया तो बस यूएई और सऊदी अरब को सुरक्षित रखना है। विदेश नीति मे ये परिवर्तन ऐतिहासिक है, इसे लिख लीजिए क्योंकि युद्ध तो आज नहीं कल खत्म हो जाएगा मगर इजरायल के गेटवे बनने से भारत की मौज पक्की है। ईरान मे क्या करना है इसकी स्पष्टता इस समय दुनिया मे सिर्फ नेतन्याहू को है और ये बात भी भारत जानता है। ये विदेश नीति मे बहुत बड़ा बदलाव है, 2014 तक भारत एक अघोषित मुस्लिम राष्ट्र की तरह व्यवहार करता रहा लेकिन 2014 के बाद यह व्यवहार मुस्लिम विरोधी राष्ट्र की तरह हो रहा है। ये अब आप एक जापानी बनकर निष्कर्ष लगा सकते है, भारत मे फिलहाल बीजेपी के बाद कोई दूसरी पार्टी है नहीं। भारत मे लोकतंत्र फिर से पुनः परिक्षण के मार्ग पर है, बीजेपी का विकल्प जो भी पार्टी आएगी वो बीजेपी से ज्यादा दो गुना दक्षिणपंथी और चार गुना इजरायल परस्त होंगी। ✍️परख सक्सेना✍️ https://whatsapp.com/channel/0029Va4lf2hL7UVcS5d5x12X
7 सांसद टूटने का धक्का तो बहुत बड़ा लगा है इसलिये CJP नाम से एक पेज बना और प्रोपोगंडा शुरू हो गया। केजरीवाल अब भी वही गलती कर रहा है जो 14 साल से लगातार करता आ रहा था। प्रोपोगंडा फैलाकर आप मनमोहन सिंह की सरकार गिरा सकते थे मगर नरेंद्र मोदी की नहीं। हर 2-4 साल मे एक बार कोई ऐसी ही सोशल मीडिया की क्रांति होती है, मेटा एड्स रन करके ये अपने फॉलोवर्स बढ़ा लेते है। बेरोजगारों की एक छोटी टुकड़ी लाइक कमेंट करने के काम पर लगा देते है लेकिन जैसे ही जमीनी असर की बात आती है उसमे कोई परिवर्तन नहीं होता। चुनाव मे युवा बीजेपी के साथ ही खड़ा मिलता है। सरकार युवाओं को इतना विश्वास दिलाने मे सफल हुई है कि भारत का नवाचार नेपाल या श्रीलंका जैसा नहीं है। यहाँ पाकिस्तान या बांग्लादेश की तर्ज पर दंगे होना असंभव के बहुत करीब है। लेकिन प्रयास तो करने चाहिए वही केजरीवाल कर रहा है, केजरीवाल विशेष रूप से इसलिये क्योंकि ये CJP का जो नया गुब्बारा फुला है उसके सीधे लिंक्स केजरीवाल से ही है। आंदोलन से बनी पार्टी है, फिर से आंदोलन का ही विकल्प तलाश करेंगी, इसके अलावा कांग्रेस भी है लेकिन कांग्रेस एक क्लासलेस पार्टी है। यदि ये कांग्रेस कर रही होती तो राहुल गाँधी ने अब तक एक सेल्फ गोल तो दागा होता। अभी NEET को लेकर गुस्सा है तो कही ना कही केजरीवाल ही है जिसमे इसे भुनाने की क्षमता है। लेकिन प्रोपोगंडा फैलाना ही था तो थोड़ा स्टेप मे फैलाते, पहले धर्मेंद्र प्रधान को निशाना बनाते और उससे जुड़े लोगो को घेरते लेकिन वही 2011 वाला ढर्रा अपनाया और पूरी सरकार को घेर लिया। जो लोग 2005 या उसके बाद जन्मे है वे ध्यान दे कि मनमोहन सरकार के गिरने मे अन्ना आंदोलन की 25% से ज्यादा भूमिका नहीं थी। मनमोहन सरकार गिराने मे मुख्य भूमिका खुद मनमोहन सरकार की थी, पी चिदंबरम, सुशील कुमार शिंदे, करूणानिधि का खानदान और खुद सोनिया गाँधी इसके जिम्मेदार थे। आज तो वैश्विक मंदी है लेकिन उन दिनों मध्य पूर्व मे एक रस्सी बम भी फट जाता तो भारत का स्टॉक मार्केट गिर जाता था। चीन की घुसपैठ की खबरें चोरी डकैती की खबरों की तरह रोज आया करती थी, पाकिस्तान ने 2008 मे तो भारत को आतंक की प्रयोगशाला बना रखा था। दूसरे बड़े घटक थे नरेंद्र मोदी, जिस समय भारत अँधेरे मे डूब रहा था उस समय गुजरात वाइब्रेन्ट हो रहा था। गुजरात ने उस दौर मे कई देशो की विकास दर को मात दे रखी थी, सोशल मीडिया नया नया था तो हिन्दू चेतना का विकास शुरू हो गया था जो पूरी तरह बीजेपी के पक्ष मे गयी। फिर कही आता है अन्ना आंदोलन, लेकिन केजरीवाल को लग रहा है कि एक आंदोलन करके आप सत्ता पलट सकते है जो कि बकवास है। भारत के युवा ने कभी मनमोहन सिंह के खिलाफ भी पथराव नहीं किया तो नरेंद्र मोदी के खिलाफ कहाँ से दंगे फसाद कर लेगा। CJP का भी कोई भविष्य नहीं है, आप देखेंगे 4 महीने अभी हर प्लेटफॉर्म पर इनके बोट हर जगह कमेंट्स करेंगे, कुछ पेज पर तो आपको भी आश्चर्य होगा, लेकिन इस अस्थायी हंगामे के बाद फिर हताश होकर बैठ जाएंगे। तकनीक की विशेषता ही यही है कि आप प्रोपोगंडा तो फैला सकते हो लेकिन आंदोलन नहीं। बाकी नीट वाला प्रकरण गंभीर तो है, धर्मेंद्र प्रधान के विषय मे सरकार को कुछ सोचना तो होगा। ये एक ऐसा मंत्रालय है जो लगातार नकारात्मक कारणों से सुर्खियों मे है, मनमोहन सरकार की लंका लगाने मे के राजा और कनिमोझी का ही हाथ था। हालांकि अभी अप्रूवल रेटिंग अच्छी है मगर फिर भी सावधानी जरूरी है। ✍️परख सक्सेना✍️ https://whatsapp.com/channel/0029Va4lf2hL7UVcS5d5x12X