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ऋषि उवाच®️

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🚩 यह केवल एक चैनल नहीं, वैदिक धर्म के पुनर्जागरण की ज्योति है! मेरा कोई ज्ञान नहीं। सारा ज्ञान ब्रह्मा से लेकर दयानंद तक के महान ऋषियों का है, और युधिष्ठिरजी, भगवद्दत्तजी, उदयवीरजी, ब्रह्ममुनिजी जैसे ऋषिभक्तों का है। हम करते हैं केवल सिद्धान्त की बात

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  • 🔥 NEW VIDEO | Gen Z vs Millennials 🧠 Gen Z या Millennials — कौन है ज़्यादा बुद्धिमान? दो generations, दो अलग सोच और जिंदगी को देखने के दो अलग नज़रिए! ⚡ Jantar Mantar Protest 🆚 Navnirman Andolan 🗣️ Rudeness 🆚 Boldness 👨‍👩‍👧‍👦 Being Alone 🆚 Being With Family 📱 Social Media 🆚 Real Social Life 🧠 Digital Intelligence 🆚 Life Experience क्या Gen Z ज्यादा smart, bold और independent है, या Millennials के पास ज्यादा experience और resilience है? 🔥 Gen Z vs Millennials: Who Is ACTUALLY Smarter? ▶️ वीडियो जरूर देखें और बताएं—आपके अनुसार कौन है ज़्यादा बुद्धिमान? **ऋषि उवाच | Rishi Uvach https://youtu.be/XS3HzlFKIwk?si=b-KTd-qri4LZZKx0

  • अध्यात्मतत्त्वका चिन्तन करनेवाले विद्वान् प्रकृतिको ही सम्पूर्ण भूतोंका उपादान कारण समझते हैं

  • 13 авг.13352удалён 14 авг.

    आध्यात्मतत्त्व का चिन्तन करनेवाले विद्वान प्रकृति को ही समस्त भूतो का उपादानकारण समझते है - महाभारत

  • अद्वैति कहते है कि आदि शङ्कराचार्य चार वेद पढे थे। उनसे मेरा प्रश्न है। अपने मत की सिद्धि के लिए उन्होंने सामवेद के कौन से मन्त्र का प्रमाण दिया है? अथर्ववेद के किस मंत्र को उद्बोधित किया है? उत्तर की प्रतीक्षा रहेगी। कृपया उपनिषद को वेद बताने का छल मत करिएगा।

  • https://youtube.com/shorts/hBdK015zZ3g?si=MeBOZvLoEF8HZZP0

  • https://youtube.com/shorts/XugT79kEXXw?si=a8bD8NZ8UDSvcNEJ

  • ह्येनसांग लिखता है की भगवान बुद्ध की शिक्षा अनुसार भिक्षु श्रावणमास की प्रतिपदा से आश्विन पूर्णिमा तक “वास” ग्रहण करते है। कहीं पर वह लोग अषाढ मास से वास ग्रहण करते है। देवशयनी और देवउठनी उत्सवो का मूल बौद्धधर्म से है। सनातनधर्म में देवता सदा जागृत रहते है।

  • श्रीराम ने शम्बूक को क्यों मारा? शम्बूक-वध — मूल रामायण या प्रक्षेप? रामायण का शम्बूक-वध प्रसंग आज भी अनेक गंभीर प्रश्न खड़े करता है। एक ओर आलोचक कहते हैं कि शम्बूक शूद्र था और तपस्या कर रहा था, इसलिए श्रीराम ने उसका वध किया—और इसी आधार पर श्रीराम पर जातिवाद का आरोप लगाया जाता है। दूसरी ओर कुछ परम्परागत व्याख्याएँ भी यह स्वीकार करती हैं कि शम्बूक का वध शूद्र होकर तपस्या करने के कारण हुआ, लेकिन इसे वर्णधर्म की रक्षा के रूप में प्रस्तुत करती हैं। लेकिन यदि दोनों पक्षों की मूल धारणा यही है, तो प्रश्न स्वाभाविक है— क्या श्रीराम को जातिवादी कहा जाना चाहिए? या इससे भी पहले हमें यह पूछना चाहिए— क्या शम्बूक-वध का प्रसंग मूल वाल्मीकि रामायण का हिस्सा है? इसी प्रश्न से रामायण के पाठ-इतिहास की एक अत्यन्त रोचक चर्चा प्रारम्भ होती है। 📜 क्या रामायण में प्रक्षेप हुए हैं? 📜 प्रक्षेप पहचानने के शास्त्रीय एवं ऐतिहासिक आधार क्या हैं? 📜 क्या प्रक्षेप का सिद्धान्त केवल आर्य समाज की देन है? 📜 क्या महर्षि दयानन्द से पहले भी भारतीय विद्वानों ने ग्रन्थों में प्रक्षेप स्वीकार किए थे? 📜 Critical Edition क्या होती है और उसे कैसे तैयार किया जाता है? 📜 रामायण की विभिन्न पाण्डुलिपियाँ हमें क्या बताती हैं? 📜 रामायण की प्राचीनता के ऐतिहासिक प्रमाण क्या हैं? 📜 और क्या उत्तरकाण्ड मूल वाल्मीकि रामायण का ही भाग है? इन प्रश्नों पर भावनाओं और राजनीतिक धारणाओं से अलग हटकर मूल संस्कृत पाठ, प्राचीन परम्परा, पाण्डुलिपियों, पाठभेदों और ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार पर विस्तृत चर्चा— 🎙️ प्रोफेसर ज्वलंतकुमार शास्त्री जी के साथ 📺 ऋषि उवाच पर नया विशेष संवाद “श्रीराम ने शम्बूक को क्यों मारा?” आस्था हो या आलोचना—दोनों की कसौटी प्रमाण होना चाहिए। प्रश्न भी होंगे। शास्त्र भी होंगे। प्रमाण भी होंगे। ▶️ वीडियो अवश्य देखें और अपने विचार साझा करें। https://youtu.be/y-X722Wma6M?si=XL2qG6G3snHHU-Sc

  • https://youtube.com/shorts/ZdF_3chuUc4?si=OzryRVI12dKbQufp

  • 3 авг.688119

    स्त्री का पुनर्विवाह अनेक जटिल प्रश्नों को जन्म देता है। मेरी एक क्लायंट हैं। उनका युवा पुत्र लगभग 34 वर्ष की आयु में बीमारी के कारण असमय चल बसा। वह विवाहित था और उसके पीछे पत्नी तथा दो छोटे बच्चे—एक पुत्र और एक पुत्री—हैं। पत्नी की आयु भी स्वाभाविक रूप से लगभग 32–33 वर्ष होगी। ससुराल पक्ष का भी मत है कि बहू को अपने भविष्य के विषय में विचार करना चाहिए। मायके वाले भी इसी पक्ष में हैं। किन्तु समस्या बच्चों के प्रश्न पर आकर अटक जाती है। उस महिला ने पुनर्विवाह के लिए एक ऐसे व्यक्ति का चयन किया है, जिसका पहले ही तलाक हो चुका है। परन्तु उस व्यक्ति के माता-पिता बच्चों को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं। दूसरी ओर, माता अपने बच्चों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं है। वहीं ससुराल पक्ष का कहना है कि वे अपने पुत्र की संतान को किसी दूसरे परिवार में नहीं भेजना चाहते। मृतक की माता का कहना है, "यही बच्चे मेरे बेटे की अंतिम निशानी हैं। हम उनका पालन-पोषण कर लेंगे।" महिला के मायके वाले भी नहीं चाहते कि बच्चे किसी अन्य परिवार में जाएँ। किन्तु बहू अपने निर्णय पर दृढ़ है। उसका कहना है कि वह विवाह भी करेगी और अपने बच्चों को भी साथ लेकर जाएगी। यदि नए पति के माता-पिता बच्चों को स्वीकार नहीं करेंगे, तो वे अलग रहेंगे। परन्तु प्रश्न यह है कि अलग रहने पर भी क्या वे बच्चे वास्तव में नए परिवार द्वारा सहज रूप से स्वीकार किए जा सकेंगे? इस एक पुनर्विवाह के कारण तीन परिवारों में तनाव और कलह की स्थिति उत्पन्न हो गई है। संभवतः यही कारण था कि प्राचीन भारत में विधवा-विवाह को सामान्य रूप से प्रोत्साहित नहीं किया गया। महर्षि दयानन्द सरस्वती ने भी विधवा-विवाह के स्थान पर देवर के साथ नियोग की व्यवस्था पर बल दिया। उनका विचार था कि इससे स्त्री उसी परिवार में सुरक्षित रहती है, बच्चों का पालन-पोषण अपने पैतृक परिवार में होता है और परिवार का विघटन भी नहीं होता। विश्व के अनेक समाजों में भी पति के भाई के साथ विवाह (Levirate Marriage) की परम्परा किसी न किसी रूप में स्वीकृत रही है। महर्षि दयानन्द की इस दृष्टि का अनेक लोग उपहास करते हैं। किन्तु जब ऐसी जटिल परिस्थितियाँ सामने आती हैं, तब उनके विचारों की व्यावहारिकता पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता अनुभव होती है। किसी मत का मूल्यांकन केवल भावनाओं के आधार पर नहीं, बल्कि उसके सामाजिक परिणामों और व्यावहारिक उपयोगिता के आधार पर भी किया जाना चाहिए।

  • बुद्ध के महापरिनिर्वाण के पश्चात जब सम्राट अशोक राज्यासन पर बैठा तब उसका विश्वास इस धर्म पर नहीं था। भगवान बुद्ध के पवित्र स्मृति-चिह्नों को नष्ट करने के अभिप्राय से वह सेना-सहित इस स्थान पर वृक्ष का नाश करने के लिए आया था। उसने वृक्ष को जड़ से काट डाला था। तना, डाली, पत्तियाँ आदि सब टुकड़े-टुकड़े करके स्थान से पश्चिम की ओर थोड़ी दूर पर ढेर कर दिए गए। इसके उपरान्त राजा ने एक ब्राह्मण को आज्ञा दी कि वृक्ष में आग लगाकर यज्ञ का समारोह करें। सम्पूर्ण वृक्ष जल कर निर्धूम होने पर ही था कि एकाएक एक दूसरा वृक्ष पहले वृक्ष से दुगुना उस ज्वाला में से निकल आया। इसके पत्ते इत्यादि पक्षियों के पर के समान चमकीले थे। इस कारण इसका नाम ‘भस्मबोधिवृक्ष’ हुआ। सम्राट अशोक इस चमत्कार को देखकर अपने अपराध पर बहुत पश्चाताप करने लगा। उसने प्राचीन वृक्ष की जड़ों का सुगन्धित दुग्ध से सिंचन किया। दूसरे दिन सवेरा होते ही पहले के समान वृक्ष उग आया। सम्राट अशोक इस घटना से बहुत ही विचलित हो गया और बुद्ध-धर्म पर उसका विश्वास इतना अधिक बढ़ गया कि वह धार्मिक कर्म में ऐसा लिप्त हुआ कि घर लौटना भूल गया। उसकी स्त्री (तिष्यरक्षिता—सं.) भी विरोधियों में से थी। उसने गुप्तरूप से एक मनुष्य को भेजा जिसने आकर रात्रि के प्रथम पहर में वृक्ष को फिर से काट कर गिरा दिया। दूसरे दिन सवेरे जब सम्राट अशोक वृक्ष की पूजा करने के लिए आया तो वृक्ष की दुर्दशा देखकर ही दुःखी हो गया। बड़े श्रद्धाभाव के साथ प्रार्थना करते हुए वृक्ष की पूजा करके उसने फिर जड़ों को उसी प्रकार सुगन्धित दुग्ध इत्यादि से सिंचित किया जिससे दिन भर के भीतर-ही-भीतर वृक्ष नवीन हो गया। सम्राट अशोक ने इस विलक्षणता को देखकर और अगाध श्रद्धाभाव में मग्न होकर वृक्ष के चारों ओर ईंटों से 10 फीट ऊँची दीवार बनवा दी जो अब तक वर्तमान है। अन्तिम समय में शशांक राजा ने, विरोधियों का अनुयायी होकर, बौद्ध-धर्म पर मिथ्या कलंक लगाने के लिए ईर्ष्यावश अनेक संघारामों को खुदवा डाला और बोधिवृक्ष को काट कर गिरा दिया। इतने पर भी उसे सन्तोष नहीं हुआ। उसने पानी के स्रोत तक भूमि को खुदवा डाला, परन्तु जड़ का अन्त न मिला। तब उसने उसे फुँकवा दिया और ईख के रस से भरवा दिया, जिससे इसका सर्वथा नाश हो जाये और चिह्न तक न बचा रहे। हेनसांग

  • 2 авг.1 18735

    🚨 NEW VIDEO DROPPED! 🔥 🔥 हिन्दू धर्म का Real Version: Myth vs Reality Gen Z ke paas questions hain. ऋषि उवाच के पास उत्तर हैं। ❌ ना अंधविश्वास। ❌ ना क्लिकबेट। ❌ ना प्रोपेगैंडा। ✅ केवल वेद। ✅ केवल उपनिषद। ✅ तर्क, इतिहास और प्रमाण। 🤔 क्या हिन्दू धर्म सिर्फ़ “Way of Life” है? 🕉️ ब्रह्म क्या है? ⚖️ धर्म का वास्तविक अर्थ क्या है? 🙏 क्या मूर्ति पूजा अनिवार्य है? 📜 अगर आप भी इंटरनेट पर फैली आधी-अधूरी जानकारी, वायरल मिथकों और बिना प्रमाण वाले दावों से परेशान हैं, तो यह श्रृंखला आपके लिए है। 🎥 Watch Now! 💬 अपना सबसे कठिन प्रश्न कमेंट में लिखिए। अगला एपिसोड शायद आपके सवाल पर हो। 🔥 Gen Z Asks. Rishi Uvach Replies. 📖 सोचिए प्रमाण से, ट्रेंड से नहीं। https://youtu.be/J_-ylYxDaIo?si=duBfoI_wUFkLF8tw #RishiUvach #Hinduism #Sana

  • https://youtube.com/shorts/vY62G63ENU0?si=PseVk42k8fkLEi1_

  • 1 авг.588116

    'एक भी बच्चे का शव ये देश नहीं देखेगा, मेरी जान चली जाए, मेरी सरकार चली जाए, लेकिन सभी बच्चे सही सलामत घर लौटने चाहिए’ सत्ता के शिखर पर बैठे व्यक्ति से ये सुनना यक़ीन से परे था। लेकिन मोदी जी सामान्य व्यक्ति थोडी है, राजर्षि है। धैर्य से काम किया। आन्दोलनकारीओने मोदी जी को, उनकी माता को - बहुत गालीया दी। यह गालियों का वीडियो सामान्य जनता तक पहुंचने पर सामान्य जनता मोदी जी के साथ हो गई। सब लोग सोचने लगे कि आखिर यह कैसी भाषा है? Gen Z आन्दोलनकारीओ के विरुद्ध जनमत बनने लगा। उन्हें सझा देने की मांग उठने लगी। कहीं-कहीं स्थानों पर तो जनता खुद यह गालीबाजों की रेल बनाने लगी। मोदी जी एक इशारा करते तो जनता इन सब गालीबाजो को घर से उठाकर चोराहे पर पीटती। लेकिन मोदी जी ने भव्य ऋषि परंपरा का अनुसरण किया। महर्षि दयानन्द ने अपने को विष देने वाले तक को क्षमादान दिया था। मोदी जी ने भी उनको गाली देने वाले लोगों को क्षमादान दिया, एक नया अवसर दिया। सुधरने का मौका दिया। हमारे जैसे सामन्य लोग भी अपने परिवार के प्रति अपशब्द सुनकर आक्रोशित हो जाते है, लेकिन देश के सब से शक्तिशाली व्यक्तिने उदारता दिखायी। आशा है गालीबाज सुनेंगे, सुधरेंगे और सही राह चुनेंगे। रिल लाईफ और रियल लाईफ में बहुत अन्तर होता है।

  • हम हमारे जीवनकाल में एक पाखंडी परंपरा का अंत देखेगे। सामान्य हिंदू भी शंकराचार्यो के लिए वही बोलेगा जो वैदिक आर्य बोलते है। इनके मठो पर ताले पडने का समय नीकट है।

  • शंका श्रीरामने सुग्रीव को बहुविवाह करने से क्यों नहीं रोका? सुग्रीव की पत्नी रूमा था। अपने भाई वाली के मृत्यु के पक्षात सुग्रीव ने अपनी भाभी तारा को अपनी पत्नी बना लिया था। अगर यह अधर्म था तो श्रीराम ने इस पर सम्मति क्यों दी?

  • आर्य समाज बैंकॉक ( थाई लैंड ) हेतु यज्ञ संस्कार आदि कर्म करवाने मे निपुण एक सुयोग्य पुरोहित जिनकी आयु 50 वर्ष या उससे अधिक हो की आवश्यकता है. जो व्यक्ति सेवा समर्पण हेतु इच्छुक हों वे मुझसे निम्न लिखित फोन नंबर पर सम्पर्क करने की कृपा करें. अन्य जानकारियां फोन कर प्राप्त कर सकते हैँ. दक्षिणा योग्यतानुसार. कम से कम दो वर्ष का समय देना अनिवार्य होगा. डॉ. विनय प्राणाचार्य प्रधान - आर्य समाज गोरखपुर (उ. प्र.) मो. 9919916999.

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