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  • 11 окт. 2025 г.2 15591из Kapila_Samkhya

    गीता की विस्मृति :- स्वबुद्धि चिंतन अक्सर कुछ प्रश्न सदैव ही मन में उठते हैं, योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को ज्ञान दिया , पश्चात् स्वयं उन्हें वो ज्ञान विस्मृत कैसे हुआ ? हुआ भी था या नहीं ? किस प्रकार यह ज्ञान दिया गया था ? इसे ४ प्रकार से समझते हैं । १. विस्मृति को समझने हेतु प्रथम स्मृतिवृत्ति को समझना आवश्यक है । स्मृति अर्थात् अनुभूत विषय का अस्तेय/असम्प्रमोष या पूर्वग्राह्य विषय की अनुभूति । योगीजन उभयविध समाधि करते समय स्मृति का निरोध करते हैं, क्योंकि स्मृति पञ्चवृत्तियों पर ही आश्रित है । प्रमाण या विपर्यय के अभाव में प्रख्याबोध संभव नहीं , जिससे पूर्वानुभूतविषय प्रत्यय की अनुपलब्धि से "यह अब ज्ञात हुआ" ऐसी कालाश्रित ख्याति होती है । यदि ऐसा माना जाए तो यह भगवान् श्रीकृष्ण से मुखोद्भूत योगविषयक ज्ञान सन्दर्भ से विपर्यस्त अव्याप्तिदोष का कारण बनेगा । निद्रावृत्ति की जाड्यता की निवृत्ति हेतु सत्वसंसेवन या सम्प्रजन्यरूप ज्ञानाभ्यास करने से ध्रुवा स्मृति जनित होती है, परन्तु यह स्मृति भी एकाग्रभूमि में निरुद्ध होती है क्योंकि यह भी पूर्ववृत्ति पर आश्रित है । पूर्वस्मृति पर आधारित होने से यदि हम इस ज्ञान को स्मृति का आधार मानें तो अनवस्थादोष आता है । विषयभूत विकल्पवृत्ति समाधिस्थ योगी की ऋतंभराप्रज्ञा से निरुद्ध होती है, अतः यह कहना कि भगवान् श्रीकृष्ण की स्मृति पूर्वोद्धरित किसी भी पञ्चवृत्ति से बाधित थी, यह संभव नहीं । २. मनोमालिन्यरहित निर्माणचित्त तथा योगजकर्माशय में विहित अकृष्णाशुक्ल कर्मो के कारण आशयहीनता के कारण स्मृतिलोप होना संभव नहीं । उदाहरण देते हैं, वारि द्वारा अग्निशमन होना । पूर्व में समझा चुके हैं की किस प्रकार समाधिजन्य ज्ञान अबाध होता है । क्लिष्टा व अक्लिष्टा वृत्तियों से अनाभिभूत यह ख्याति निर्माणचित्त द्वारा ही जिज्ञासुओं को प्रदान की जाती है , जैसा अर्जुन के साथ हुआ था । यदि यह क्लिष्टावृत्ति से बाधित हो तो यह योगप्रतिपक्षी प्रमाद रूपी अन्तराय की जननी होती है । यथा भाष्यकार का वचन है, अक्लिष्टाछिद्र से क्लिष्टा का भी जन्म हो सकता है , सुतरां समाधिसाधनों का सुविशुद्ध और निर्विप्लव होना अत्यंत आवश्यक है । जैसा प्रभु गीता में कहते हैं "प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् । उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम् ।।" श्वेतार्क जहाँ प्राणवायु देता है , वहीँ विष से पीड़ा भी दे सकता है। यही मनोमालिन्यता है जिसकी एकाग्र भूमि में निवृत्ति होती है । इनकी निवृत्ति के पश्चात् ही निर्माणचित्त व निर्माणतनु की उपलब्धि होती है । योगी का निर्माणचित्त उसके प्रशांतवाहिता चित्त से शुद्धास्मिता से निर्मित होने के कारण स्वयं भी पूर्णतः क्लेशमलरहित होता है । आशयहीनता योगियों के अकृष्णाशुक्लकर्मों में ही होती है अतः वे नवसंस्कार उद्भूत न होकर चित्त में ही अव्यक्तप्रलीन रहते हैं । अतः चित्त की समाधिसिद्ध भूमियों (एकाग्र, निरुद्ध) में अक्लिष्टा वृत्तियों की अनुपस्थिति होने के कारण स्मृतिबाध होना संभव नहीं । ३. प्रवृत्यालोक में मनोस्थिति :- समाधि के समय ज्योतिष्मती प्रवृत्ति योगी के मनोभाव को निस्तरंग महासागर जैसे शांत करती है , जिससे समस्त विप्रकृष्ट और सूक्ष्म विषय भी प्रकाशित होते हैं । ४. वक्तु-श्रोत दृष्टव्य :- वक्ता का ज्ञान श्रोता पर भी निर्धारित है । आप्तपुरुषों द्वारा किसी भी ज्ञान को शिष्य के सामने व्यपदिष्ट करना शिष्य की मति अनुरूप होता है , यथा विरोचन-इन्द्र-का प्रजापति द्वारा समानरूप ज्ञान को अन्यबोध और अलग उहापोह से समझना और इन्द्र के सत्यदर्शी होने से प्रजापति द्वारा उसे सही उपदेश का ज्ञान । यह केनोपनिषद् में यक्ष-इन्द्र और उमा हैमवती के संवाद में भी दृष्टिगोचर होता है । अर्जुन का चित्त मलिन था , क्षणिक स्थिर होने के कारण गीत के समय विक्षिप्तभूमि में स्थित था , वहीँ श्रीकृष्ण का एकाग्रभूमि में निर्माणचित्त में । अतः विस्मृति अर्जुन को थी , श्रीकृष्ण को नहीं । जैसा अर्जुन ने महाभारत में बारम्बार "एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम्" इत्यादि वाक्यों में अपने ज्ञान की सीमितता और "नष्टं मे भ्रष्टचेतसः" में अपने विक्षिप्तभूमि में निहित चित्त को भलीभांति दिखाया है । वहीँ भगवान् केशव ने इसी कारण अर्जुन को "दुर्मेधा" युक्त बोलकर स्वयं को "पूरा ज्ञान यथापूर्व दोहरा नही सकता" कहकर अर्जुन के प्रति अशक्ति नहीं , अपनी करुणा ही व्यक्त की है । अर्जुन को सरल शब्दों में समझकर ही उनके अन्दर के विक्षिप्तता का भलीभांति निवारण किया जा सकता था, इसका अनुमान होने के कारण ही श्रीकृष्ण द्वारा ऐसे वाक्य संभव हैं । अन्यथा योगेश्वर को ज्ञान विस्मृत होना अनवस्थिता और अलब्धभूमिकता अन्तराय के प्रतिक होंगे ,जिससे उनकी आप्तता संदेहास्पद होगी । ~ मेरे विचार Follow us at :- @Kapila_Samkhya

  • 7 окт. 2025 г.1 6487из Kapila_Samkhya

    सांख्य-योग के विविध ऋषियों , आचार्यों और योगियों के ऊपर शीघ्र ही पोस्ट आएगी । कृपया थोडा समय दें । कृपया आरम्भ से हमारी पुरानी ज्ञानवर्धन अथवा खंडनात्मक पोस्ट पढ़ें , जिनकी लिंक नीचे दी जा रही है :- १. कर्माशय तथा मुक्ति २. महत् तत्त्व की उत्पत्ति ३. पुनरावृत्ति और आदिशंकराचार्य ४. सांख्याचार्य विन्ध्यवासी द्वारा बौद्ध विद्वान् मनोरथा की पराजय ५. वसुबन्धु के सांख्यखंडन की भ्रान्ति का निवारण ६. सांख्योक्त अष्टसिद्धियां (अणिमादि नहीं) ७. परमर्षि कपिल :- (१) - (२) ८. महाभारतीय सांख्य :- भाग १ ९. महाभारतीय सांख्य :- भाग २ १०. सांख्य की दृष्टि से विकासवाद ११. सांख्ययोगियों को शरण १२. मोक्ष से पुनरावृत्ति :- (१) आत्यंतिक मोक्ष की व्याख्या १३. सांख्य द्वारा अन्धपरम्परा का विरोध १४. षष्ठीतंत्र की प्राचीनता १५. दुःखों की जगदव्यापकता १६. सांख्य की व्याख्या १७. मोक्षप्राप्ति १८. सांख्य की श्रुतिमूलकता १९. सांख्याचार्य माधव द्वारा याज्ञिकी हिंसा का विरोध २०. सूत्रमत और कारिकामत की एकता २१. व्यासभाष्य और पशुबलि २२. सलिलदृष्टान्त प्रयोजन और प्रकृतिप्रवृत्ति आशय में भेद २३. जैगीषव्य-आवट्य संवाद २४.अद्वैत और सांख्य की जगतप्रपंच व्याख्या २५. सांख्यसूत्र में पुनरावृत्ति शंका समाधान २६. शान्तब्रह्मवाद :- सांख्य का ब्रह्मवादन २७. त्रिविध कर्मशरीरभेद २८. विषयाश्रित त्रिविधदुःख For Evolution and Modern Science :- CLICK HERE !! Follow us at :- @Kapila_Samkhya

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  • Mother Goddess and Lord Kartikeya worshipping in South India :- Worshipping Lord Kartikeya (Murugan) with the clear evidence of Fowl Emblems and Tridents dates back to 1200-800 BCE , in Adichanallur. Most of the tridents and Fowl banners belong to 1000-600 BCE with some of the fragments of 1200 BCE while this bronze figurine of Mother Goddess Korrovai is dated back to 1500 BCE. Korrovai is the tamil of the name "Durga". The fact that the concept of Devī as Matrí was well propounded in those times. Source :- 1. A history of South India by KA Nilakantha Sashtri T Satyamurthy 2004-05. Shubha Navaratri !! Glory to the Great Mother ! 🙏🙏 ●▬▬▬▬🌼🌸🌼▬▬▬▬● ┏━━━❀❀•𝗝𝗢𝗜𝗡•❀❀━━━━🌼 ┠◈👉 @scienceinsightdharma ┗━━━━❀❀❀❀━━━━━━━🌼

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  • 18 авг. 2025 г.1 2057из Kapila_Samkhya

    आज एक अति हास्यास्पद लेख दृष्टिगोचर हुआ जहाँ महाभारतीय सांख्य के यथार्थ अर्थों को बिगाड़ते हुए उसे अद्वैत बताया जा रहा है | वैसे इस पर हमने एक लेख पहले भी लिखा था , परन्तु पूर्वपक्षियों ने शायद वो नहीं पढ़ा होगा | अब इनके लेख के एक-एक वाक्य और अभ्यर्थन की समीक्षा करते हैं | १. वेदांत प्रकृत्यादि चौबीस तत्त्वों को मायोत्पन्न मानता है | उत्तर :- ऐसा नहीं है | यदि प्रकृति को मायाजन्य माना जाये तो उसको मिला "अजा" विशेषण निरर्थक होगा | श्रुति में भी प्रकृति को मायोत्पन्न न बोलकर प्रकृति को ही माया बोला गया है, यथा "माया तु प्रकृति विद्यमायिनं तु महेश्वरः" | इसके शाङ्करपरम्परागत भाष्य में भी "प्रकृतिर्मायैवेति विद्याद्विजानियात्" कहकर यही समझाया गया है कि वह ब्रह्म की अस्वतन्त्रा शक्ति प्रकृति को माया जानो और उसके स्वामी को महेश्वर | अतः प्रकृति मायाजन्य न होकर माया का ही पर्याय है , यह सिद्ध है | २. प्रकृति को विनाशशीला कहा गया है | यदि सांख्य का आशय होता तो दो तत्त्वों को अविनाशी बोला जाता , न कि एक पुरुष को ही | साथ ही नानात्व को क्षर और एकत्व को अक्षर बोल दिया है , अतः यहाँ अद्वैत का भाव ही होना चाहिए , न की सांख्य | उत्तर :- यदि आपने महाभारतीय सांख्य अच्छे से पढ़ा होता तो प्रथम प्रश्न करने की आवश्यकता ही नहीं होती | पूर्व श्लोकों में क्षर की व्याख्या "क्षर व्यक्तसंज्ञकम" कहकर की गयी है , अर्थात् प्रकृति के २३ व्यक्त तत्त्व ही क्षर संज्ञा में आते हैं | वशिष्ठजी बताते हैं :- "महान्श्चैवाग्रजो नित्यमेतत्क्षरदर्शनं" अर्थात् यह नित्यरूप से ध्यान रखने योग्य है कि क्षर तत्त्वों में भी अग्रज अथवा सर्वप्रथम महान् अथवा महत् तत्त्व है | अतः सिद्ध है कि क्षर का विनाशशील अर्थ व्यक्त अथवा प्रकृति के कार्यरूप जगत के सन्दर्भ में है | गीता १५/१७ के शाङ्करभाष्य में भी "क्षरः सर्वाणि भूतानि समस्तं विकारजातं इत्यर्थः" कहकर क्षर रूप में जगतप्रपंच तथा विकारजन्य भूतवर्ग (अंतःकरणसंवलित चेतना) का अर्थ ही ग्रहण किया है | आप अद्वैतविशारद हैं, इसे मुझसे अधिक ही जानते होंगे | प्रकृति का क्षरत्व उसकी परिणामी नित्यता से पर नहीं है | आगे के श्लोकों में अव्यक्त की इसी परिणामी नित्यता का प्रतिपादन करते हुए वशिष्ठजी कहते हैं :- "एतदक्षरमित्युक्तं क्षरतीदमंयथा जगत | जगन्मोहात्मकं प्राहुरव्यक्ताद् संज्ञकम्" अर्थात् इससे भिन्न तत्त्व को अक्षर कहा गया है | यह अक्षर अव्यक्त है , जिससे यह क्षरणशील जगत उत्पन्न होता है | यही प्रसंग क्षरनिरूपण के अंतिम श्लोक में समझाते हुए पुनः कहते हैं "एवमव्यक्तविषयं क्षरमाहुर्मनीषिणः" अर्थात् जीव प्रकृतित्व से युक्त होने के कारण ही क्षर ("जन्य, मरणधर्मा" रूप से) कहा जाता है | उपरोक्त में यदि अव्यक्त -अक्षर को चेतन के अर्थ में लिया जाये तो सिद्धांतहानि होगी क्योंकि क्षरतत्त्वों की उत्पत्ति पुरुष से नहीं होती , जो आगे ऋषि ने स्वयं स्पष्ट किया है :- "अव्यक्तमाहुः प्रकृति परां प्रकृतिवादिनः | तस्मान्महत्समुत्पन्नं द्वितीयं राजसत्तम |" अर्थात् प्रकृतिवादी प्रथम मूलप्रकृति को ही अव्यक्त कहते हैं | उससे महत तत्त्व की उत्पत्ति होती है , जो दूसरा तत्त्व है | इसके अलावा वशिष्ठ ऋषि ने अगले अध्यायों में पुरुष-प्रकृति दोनों को ही स्पष्टतः अक्षर कहकर संबोधित किया है :- "उभावेतौक्षरावुक्तावुभावेतौ च अक्षरौ" तथा अगले श्लोक में ही "अनादिनिधनावेतावुभाववेश्वरो मतो" आदि वचनों से अव्यक्त के ही सृष्टि का कार्य होने तथा क्षर (परिणामी) और उसका अनादिनिधन (अनादि , अविनाशी) होना सिद्ध होता है | एकत्व की नित्यता और नानात्व की अनित्यता की बात करें तो २३ व्यक्त तत्त्व क्षर होने से अनित्य और मूलप्रकृति और पुरुष के क्रमशः , एका और एकजातीय होने से नित्य सिद्ध होती है | श्रुतिवचन है "अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां , बह्वीः प्रजाः सृजमानां सरूपाः" अर्थात् अजा (उपादानकारण रहित) और एका प्रकृति जो सत्वरजतमस रूप से त्रिविधरूपा (शुक्ललोहितकृष्ण) है , वह अनेकों प्रकार की प्रजा (भूतवर्ग) की जननी है | व्यासभाष्य में भी "यस्मिन् परिणम्यमानेतत्त्वं न विहन्यते तन्नित्यं" कहकर प्रकृति के गुणत्रय की परिणामी नित्यता का परिचय दिया गया है | जहाँ तक एकत्व से मुक्ति की बात है, वह "अनेन साम्य यास्यामि" पद से स्पष्ट है | अतः स्पष्ट है कि पुर्वपक्षी ने महाभारतीय सांख्य का यथार्थ विवेचन न कर, बिना अन्य श्लोक देखे ही अपने पक्ष का प्रतिपादन किया है | अतः उनका मत हेय और त्याज्य है | निष्कर्ष में युक्तिदीपिका का वचन है "यतश्च नारायण-मनु-जनक-वशिष्ठ-द्वैपायन प्रभृतिरचार्यैः प्रधानपुरुषादयःपदार्थाः परिगृहीताश्चोपदिष्ठाश्च प्रशस्ताश्चातः" उससे भी वशिष्ठ जी का सांख्यवादी होना सिद्ध होता है | अतः उपरोक्त प्रसंग सांख्य का ही है , इसकी सिद्धि होती है | Follow us at :- @Kapila_Samkhya

  • 16 авг. 2025 г.91051из Kapila_Samkhya

    वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूर मर्दनम् । देवकी परमानन्दं , कृष्णम् वन्दे जगद्गुरुं ।। नारायणावतार योगेश्वर श्रीकृष्ण की पावन जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं 🙏🙏 Join us at 👇⬇️ @Scienceinsightdharma @Kapila_Samkhya

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  • देवजातीय वर्ण-व्यवस्था :- प्राचीन भारत में समाज के मुख्यतः चार विभाग थे , जिन्हें चातुर्वर्ण्य कहते हैं | देवता भी इससे असंश्लिष्ट नहीं हैं | शांतिपर्व में भीष्म पितामह के अनुसार देवों में भी चातुर्वर्ण्य व्यवस्था होती है | कश्यप-अदिति के पुत्र आदित्यों को क्षत्रिय माना जाता है , वहीँ दितिपुत्र मरुतों को वैश्यवर्ण का माना गया है | प्रजापति मार्तण्ड के पुत्र नासत्य-दस्र अर्थात् दोनों अश्विनों को शूद्रवर्ण का माना गया है , वहीँ ऋषि अंगिरा के ७ पुत्रों (यवक्रीत आदि) को ब्राह्मणवर्णिक देव माना गया है | आश्चर्य की बात है कि ब्राह्मण पिता से जन्म लेने के पश्चात् भी ये ऋषिपुत्र देवता अलग-अलग द्विजवर्णों से हैं , वहीँ क्षत्रिय सूर्यवंश के आद्यपिता भगवान् मार्तण्ड के दोनों पुत्र शूद्र हैं | प्रश्न है , क्या वर्ण-व्यवस्था यथार्थतः वैसी ही थी जैसा जात्यहंकारियों का कहना है , अथवा सत्य कुछ और ही है ?? सन्दर्भ :- बोरी क्रिटिकल एडिशन शांतिपर्व , अध्याय २०१ Follow us at :- @scienceinsightdharma

  • उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम् | वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः || समुद्र के उत्तर तथा हिमालय के दक्षिण में जो भूमि है , उसे भारतभूमि तथा उसकी संतानों को भारती कहते हैं। ~ विष्णु पुराण २.३.१ स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं 🇮🇳🇮🇳 Join us at 👇⬇️ @scienceinsightdharma

  • 11 авг. 2025 г.89581из Kapila_Samkhya

    सांख्य सूत्र १/१५९ में मोक्ष से पुनरावृत्ति ?? "इदानीमिव सर्वत्र नात्यन्तोच्छेदः" सूत्र के आधार पर कुछ लोग मोक्ष से पुनरावृत्ति का दावा करते हैं | परन्तु ये पक्ष अश्वतरी-गर्भ की भांति ही अस्तित्वहीन और निःसार है | आज हम इसी पक्ष की समीक्षा कर यथार्थ को जानने का प्रयत्न करेंगे | पूर्वपक्षी :- अनादि काल से चली आ रही सृष्टि में यदि सभी आत्माओं का मोक्ष हो गया और मोक्ष नित्य है तो संसारोच्छेद हो जायेगा | उत्तरपक्षी :- आपकी शंका अनुचित है | हमारे दृष्टि में पुरुष अनंत हैं , अतः मोक्ष नित्य होने से भी संसार का उच्छेद नहीं होगा | अतः संसार अनादिकाल से अनंतकाल तक चलता रहेगा | पूर्वपक्षी :- वामदेवादि ऋषियों को भी अगर हम मुक्तश्रेणी में न रख ये मान लें कि आज तक संसार में किसी का मोक्ष नही हुआ तो ? उत्तरपक्षी :- यदि अनादिकाल से किसी का मोक्ष नहीं हुआ होगा तो आगे भी नहीं होगा , क्योंकि यदि अनादि काल से किसी का मोक्ष नहीं हुआ हो , तो आगे भी नहीं होगा | अर्थात् यदि आज तक कोई भी पुरुष भी मुक्त नहीं हुआ , तो आगे भी कोई मुक्त नहीं हो सकेगा , यह अनुमान से सिद्ध होगा | शंका :- आचार्य विज्ञानभिक्षु ने इस सूत्र में मोक्ष में भी बंधन का अत्यंतोच्छेद नहीं माना | अतः इस सूत्र में पुनरावृत्ति समर्थित है | समाधान :- ऐसा नहीं है | किसी भी सूत्र में पूर्वपक्ष के अनुसार ही उत्तरपक्ष होता है | यहाँ पूर्वपक्ष "आज तक किसी भी पुरुष ने मोक्ष नही पाया" ऐसा है | यह पूर्वपक्ष है की बन्ध का अनादि काल से कभी उच्छेद नहीं हुआ | सुतरां आचार्य ने सामान्यतोदृष्ट अनुमान द्वारा अनुमित किया कि सर्वकालों में (अर्थात् अनादि संयोग से लेकर आज तक) किसी का मोक्ष नहीं होने से आगे भी किसी का मोक्ष नही होगा | अतः ब्रह्मविद्या की "अथ योगानुशासनम्" "अथत्रिविधदुःखअत्यंतनिवृत्तिरत्यंतपुरुषार्थः" आदि सूत्रों से भी विरोध देखने को मिलेगा | सो आचार्य विज्ञानभिक्षु ने भी यहाँ मोक्ष को अनित्य नहीं कहा और कहते भी क्यों ? वस्तुतः प्रकरण मोक्ष नित्य है या नहीं , यह तो था ही नहीं ! इतना ही नहीं अगर यहाँ मुक्त-पुरुष के पुनरावृत्ति का आशय होता तो अन्य सूत्रों की भांति यहाँ भी आचार्य इसकी चर्चा करते परन्तु संबंधित सूत्रों के पूरे भाष्य में भी कहीं मोक्ष , यहाँ तक की निर्मोक्षापत्ति और पुनर्बन्ध जैसे दोषों की भी चर्चा नहीं आई | अगर और स्पष्टीकरण देखना हो तो आचार्य द्वारा वर्णित मोक्ष का लक्षण ही देख लीजिये :- "पूर्वोत्पन्नकर्मणां चाऽविद्यारागादिसहकार्युच्छेदरूपदाहेन विपाकानारम्भकत्वाद् आरब्धसमाप्त्यनन्तरं पुनर्जन्माभावेन..... मोक्षो भवतीति" अर्थात् पूर्वोत्पन्न कर्मों तथा सहकारी रूप अविद्यादि क्लेशों का दाह , विपाक (कर्मफल क्षेत्रभूमि) का अनारंभ (पुनः आरंभ नही होना) , आरब्ध (संयोग) की समाप्ति के अनंतर तथा जिससे पुनर्जन्म का अभाव हो जाता है| इतनी व्याख्याओं से तो बन्धनों का अत्यंतोच्छेद (पूर्णध्वंस) ही मालूम होता है , अल्प नहीं | आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि प्रसिद्द आर्यविद्वान आचार्य उदयवीर शास्त्री जी (पुनरावृत्ति समर्थक विद्वान) ने भी इस सूत्र तथा संबंधित सूत्रों को पुनरावृत्ति से नहीं जोड़ा | न ही वृत्तिकार आचार्य अनिरुद्ध , न वृत्तिसार कर्ता महादेववेदांती किसी ने भी इन सूत्रों में पुनरावृत्ति नहीं मानी | विद्वानशिरोमणि गजानन शास्त्री (विज्ञानभिक्षु के भाष्यानुवादक) और डॉ रामशंकर भट्टाचार्य जी ने भी इन सूत्रों में पुनरावृत्ति नहीं मानी है | आप पूर्वपक्षी कल्पित पूर्वपक्ष मानकर इस लेख का खंडन करने में स्वतंत्र हैं क्योंकि हम जानते हैं कि बिना हमारे लेख को पढ़े और चिंतन किये , अपशब्द लिखने और अकारण दोष निकालने से सत्य परिवर्तित नहीं होता | यह लेख शंका-समाधान हेतु है , अन्धपरम्परावादियों के लिए नहीं | ~ आधुनिक सत्कार्यवादी Follow us at :- @Kapila_Samkhya

  • 6 авг. 2025 г.1 18571из Kapila_Samkhya

    जगत-प्रपंच पर सांख्य-अद्वैत के विचार :- सांख्य और अद्वैत दोनों ही चेतन-जगत विषयक भ्रांतियों पर गहन-चिंतन करते हैं | आज हम इनके जगत सम्बन्धी परस्पर भिन्न विचारों को देखेंगे | आदि शंकराचार्य जी के अनुसार जगत का उपादान कारण अविद्या-उपाधि युक्त ब्रह्म है | ये जगत तिमिर-रोगी के द्विचंद्र दर्शन की भांति अलीक है | ये उपाधि उसके साथ कैसे होती है तथा मिथ्या जगत के आरोपित होने से भी उसमें विकार क्यूँ नहीं आते ? समाधान में आदि शंकराचार्य जी का कहना है :- "न हि तेनाविद्याविषयेणानृतेनप्राणेन सप्राणत्वं परस्य स्यादपुत्रस्य स्वप्नदृष्टेनेव पुत्रेण सपुत्रत्वं" अर्थात् जिस प्रकार स्वप्न में देखे गए पुत्र से पुत्रहीन व्यक्ति पुत्रवान नहीं हो सकता , उसी प्रकार अविद्योपाधि उत्पन्न केवल नामधेय और अनृतस्वरुप प्राण से परब्रह्म का सप्राणत्व होना सिद्ध नहीं होता | इससे अन्य स्वप्नदृष्टा के बनाये पदार्थों के दृष्टान्त से भी उन्होंने यही समझाया है | इसके विपरीत सांख्य का कहना है :- " प्रकृतिवास्तवे च पुरुषस्याध्याससिद्धिः" अर्थात् प्रकृति के सत्य/वास्तविक होने से पुरुष के अध्यास की सिद्धि होती है | त्रिगुणात्मक जगत से भिन्न निर्गुण पुरुष में कर्तृत्व-भोक्तृत्व की आपत्ति/आरोप होना ही उसका अध्यास है | स्फटिकलौहित्य न्याय से ऋषिवर समझाते हैं :- जिस प्रकार से जपाकुसुम पुष्प के सानिध्य से स्फटिकमणि में रंजित दिखती है उसी प्रकार बुद्धयारूढ़ गुणव्यक्त दृश्य का दृष्टा पर आरोप होता है | दृश्य की अलीकता में ये जन्म नही ले सकता, क्योंकि दृष्टा में उन गुणों के अभाव के कारण प्राकृत धर्मो जेसे सृष्टोपाधिक गुणों का उपरंजन तभी संभव है जब सृष्टि सत्य हो | अतः प्रकृति की सत्ता वास्तविक सिद्ध होती है | Follow us at :- @Kapila_Samkhya

  • गौ-महिमा :- "गौदान कभी हिंसापरक कार्यों के लिए नहीं होना चाहिए | गौ कभी वध हेतु प्रदान नहीं की जानी चाहिए और न ही कभी कसाइयों को दी जानी चाहिए | मनीषियों (ऋषियों) के अनुसार इन व्यक्तियों को गौदान करने वाला पापात्मा व्यक्ति सुदीर्घकाल तक नारकीय दुःख भोगता है |" ~ महाभारत क्रिटिकल एडिशन , अनुशासन पर्व , दानधर्म पर्व , अध्याय ६६ भारत में गौहत्या पर प्रतिबन्ध लगाना आवश्यक है | Join us at 👇⬇️ @scienceinsightdharma

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  • Upanishadic Shruti in Inscriptions !! चित्तोडगढ किले से एक 6th century का लेख प्राप्त होता है , जो औपनिषदिक ब्रह्म के विषय में एक वाक्य बताता है :- "जिन परमवपु तक मन,वाणी भी नहीं पहुँच सकते |" इसमें विष्णुदत्त नामक एक वणिक(वैश्य) की भी चर्चा है | इतिहासकार Sircar and Gui के अनुसार इसकी संगति केनोपनिषद् में वर्णित "न वाक् गच्छति नो मनः" से मिलती है | परन्तु इसकी एक अन्य व्याख्या भी है जो सांप्रदायिक हो सकती है , जैसे ये भगवान् विष्णु या भगवान् शिव को समर्पित भी हो सकता है | चित्तोडगढ से समकालिक एक और लेख भी प्राप्त होता है जिसमे वणिक विष्णुदत्त का वर्णन , भगवान् शिव की स्तुति की गयी है , तथा मनोरथस्वामी (कदाचित विष्णु) के मंदिर की चर्चा है | भागवतम के अष्टम स्कंध में भी "नमो गिरां विदूराय मनसश्चेतसामपि " कहकर ही स्तुति की गयी है | चूँकि ये श्रुति से ही लिया गया वाक्य है , अतः श्रुत्यार्थ भी माना जा सकता है , जैसा Sircar & Gui ने केनश्रुति को माना है | Source :- Inscriptions of Aulikaras and Associates by Daniel Balogh Follow us at - @scienceinsightdharma

  • Challenging Casteism :- Vashishta and Agastya were used as an example for the rebuttal of casteism & untouchability. These references could be traced into some of the Puranas. Interestingly , the reference shown above isn't from any Vedic/Hinduism linked text , but from a Buddhist Sangam text. Buddhist Sangam text Manimekalai , 2nd-3rd century Join us at 👇⬇️ @scienceinsightdharma

  • प्रज्ञानं ब्रह्म 🙏🚩 pinned «जैसा कि हम पहले भी बता चुके हैं कि सांख्ययोग परम्परा के आचार्य कभी भी हिंसा का समर्थन नही करते , भले ही वह यज्ञरूप में भी क्यों न हो | हमने ऊपर आचार्य माधव के वचन का उद्धरण भी दिखाया था | आइये इसी श्रृंखला में व्यासभाष्याकार का मत समझते हैं | योगसूत्र :-…»

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