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𝗧𝗵𝗲 𝗩𝗲𝗱𝗶𝗰 𝗳𝗶𝗹𝗲𝘀

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  • 14 авг.911из RishiUvach

    🔥 NEW VIDEO | Gen Z vs Millennials 🧠 Gen Z या Millennials — कौन है ज़्यादा बुद्धिमान? दो generations, दो अलग सोच और जिंदगी को देखने के दो अलग नज़रिए! ⚡ Jantar Mantar Protest 🆚 Navnirman Andolan 🗣️ Rudeness 🆚 Boldness 👨‍👩‍👧‍👦 Being Alone 🆚 Being With Family 📱 Social Media 🆚 Real Social Life 🧠 Digital Intelligence 🆚 Life Experience क्या Gen Z ज्यादा smart, bold और independent है, या Millennials के पास ज्यादा experience और resilience है? 🔥 Gen Z vs Millennials: Who Is ACTUALLY Smarter? ▶️ वीडियो जरूर देखें और बताएं—आपके अनुसार कौन है ज़्यादा बुद्धिमान? **ऋषि उवाच | Rishi Uvach https://youtu.be/XS3HzlFKIwk?si=b-KTd-qri4LZZKx0

  • 29 июл.675132из RishiUvach

    ब्रह्मा से आरम्भ हुई, इन्द्र और महर्षि वशिष्ठ द्वारा संरक्षित एवं पोषित यह व्यास-परम्परा, महर्षि भरद्वाज से समृद्ध हुई तथा महर्षि शक्ति और महर्षि पराशर से और भी अधिक प्रकाशित एवं तेजस्वी बनी। महर्षि वेदव्यास द्वारा यह परम्परा विशेष रूप से विभूषित हुई। यह व्यास-परम्परा अत्यन्त पवित्र और मंगलमयी है। उस महान् व्यास-परम्परा के अन्तिम व्यास, महर्षि दयानन्द को मैं प्रणाम करता हूँ। मूलशङ्कर ही साक्षात् शङ्कर (कल्याणस्वरूप) हैं; उन गुरुदेव को बारम्बार नमस्कार है।

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  • 28 июл.69063из imkarthikeya

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  • 26 июл.6062из RishiUvach

    🚨 क्या ऋग्वेद को लेकर हमें पूरी सच्चाई बताई गई है? 👀 क्या ऋग्वेद सचमुच संसार का सबसे प्राचीन ग्रंथ है? 📜 या फिर... ❓ क्या प्रथम और दशम मण्डल बाद में जोड़े गए थे? ❓ क्या मैक्समूलर, मैकडॉनेल जैसे विद्वानों का रचनाकाल सही था? ❓ कौन थे वे प्राचीन ऋग्वेद-भाष्यकार, जिनका भाष्य आज लुप्त हो चुका है? ❓ और ऋग्वेद पर लगाए जाने वाले प्रसिद्ध आक्षेपों का उत्तर क्या है? यदि आप इतिहास को केवल सुनी-सुनाई बातों से नहीं, बल्कि प्रमाणों से समझना चाहते हैं, तो यह वीडियो आपके लिए है। Click now https://www.youtube.com/watch?v=wiiHw4eVn-U&feature=youtu.be 🔥 देखना मत भूलिए—हो सकता है यह वीडियो ऋग्वेद के बारे में आपकी धारणा ही बदल दे! #ऋग्वेद #वेद #भारतीयइतिहास #वैदिकज्ञान #महर्षिदयानन्द #RishiUvach

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  • 10-20% students hain baki ke sabko pata hai kaun log hain aur unka agenda kya hai

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  • 6 июн.2 243221

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  • 5 июн.1 79851из RishiUvach

    https://youtube.com/shorts/qg5JVRwlvvM?si=Rn5tL1W60J-qiaXa

  • 4 июн.1 67473

    विशुद्ध: इसे किसी उदाहरण से समझा सकते हो? कार्तिकेय: एक उदाहरण लीजिये। एक व्यक्ति यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर है, शाकाहारी है, चरित्रवान है और धर्म के लिए पुरुषार्थ करता है। उसका वर्ण ब्राह्मण कहलायेगा चाहे वह शूद्र पिता की संतान हो। उसके विपरीत एक व्यक्ति अनपढ़ है, मांसाहारी है, चरित्रहीन है और किसी भी प्रकार से समाज हित का कोई कार्य नहीं करता, चाहे उसके पिता कितने भी प्रतिष्ठित ब्राह्मण हों, किसी भी प्रकार से ब्राह्मण कहलाने लायक नहीं है। केवल चोटी पहनना और जनेऊ धारण करने भर से कोई ब्राह्मण नहीं बन जाता। इन दोनों वैदिक व्रतों से जुड़े हुए कर्म अर्थात धर्म का पालन करना अनिवार्य है। प्राचीन काल में धर्म रूपी आचरण एवं पुरुषार्थ के कारण ब्राह्मणों का मान था। विशुद्ध: तो इस पूरे विषय का सार क्या है? कार्तिकेय: इस लेख के माध्यम से मैंने वैदिक विचारधारा में ब्राह्मण शब्द को लेकर सभी भ्रांतियों के निराकरण का प्रयास किया है। ब्राह्मण शब्द की वेदों में बहुत महत्ता है। मगर इसकी महत्ता का मुख्य कारण जन्मना ब्राह्मण होना नहीं अपितु कर्मणा ब्राह्मण होना है। मध्यकाल में हमारी वैदिक वर्ण व्यवस्था बदल कर जाति व्यवस्था में परिवर्तित हो गई। विडंबना यह है कि इस बिगाड़ को हम आज भी ढो रहे हैं। जातिवाद से हिन्दू समाज की एकता समाप्त हो गई। भाई-भाई में द्वेष हो गया। इसी कारण से हम कमजोर हुए तो विदेशी विधर्मियों के गुलाम बने। हिन्दुओं के 1200 वर्षों के दमन का अगर कोई मुख्य कारण है तो वह जातिवाद है। वही हमारा सबसे बड़ा शत्रु है। आइये इस जातिवाद रूपी शत्रु को जड़ से नष्ट करने का संकल्प लें।

  • 4 июн.1 21443

    shanka samadhaan part 2 विशुद्ध: आजकल कुछ लोग केवल अपने पूर्वजों के आधार पर स्वयं को ब्राह्मण बताते हैं। क्या इतना पर्याप्त है? कार्तिकेय: नहीं। आजकल कुछ लोग केवल इसलिए अपने आपको ब्राह्मण कहकर जाति का अभिमान दिखाते हैं क्योंकि उनके पूर्वज ब्राह्मण थे। यह सरासर गलत है। योग्यता अर्जित किये बिना कोई ब्राह्मण नहीं बन सकता। हमारे प्राचीन ब्राह्मण अपने तप से, अपनी विद्या से, अपने ज्ञान से सम्पूर्ण संसार का मार्गदर्शन करते थे। इसीलिए हमारा आर्यव्रत देश विश्वगुरु था। विशुद्ध: फिर ब्राह्मण को श्रेष्ठ क्यों माना गया? कार्तिकेय: ब्राह्मण एक गुणवाचक वर्ण है। समाज का सबसे ज्ञानी, बुद्धिमान, शिक्षित, समाज का मार्गदर्शन करने वाला, त्यागी, तपस्वी व्यक्ति ही ब्राह्मण कहलाने का अधिकारी बनता है। इसीलिए ब्राह्मण वर्ण श्रेष्ठ है। विशुद्ध: क्या वैदिक व्यवस्था में ब्राह्मणों को केवल सम्मान ही मिलता था? कार्तिकेय: नहीं। वैदिक विचारधारा में ब्राह्मण को अगर सबसे अधिक सम्मान दिया गया है तो ब्राह्मण को सबसे अधिक गलती करने पर दंड भी दिया गया है। एक ही अपराध के लिए शूद्र को सबसे कम दंड, वैश्य को दोगुना, क्षत्रिय को तीन गुना और ब्राह्मण को सोलह या 128 गुणा दंड मिलता था। - मनुस्मृति 8/337 एवं 8/338 इन श्लोकों के आधार पर कोई भी मनु महाराज को पक्षपाती नहीं कह सकता। विशुद्ध: क्या कोई शूद्र ब्राह्मण बन सकता है और ब्राह्मण शूद्र बन सकता है? कार्तिकेय: ब्राह्मण, शूद्र आदि वर्ण क्योंकि गुण, कर्म और स्वभाव के आधार पर विभाजित हैं, इसलिए इनमें परिवर्तन संभव है। कोई भी व्यक्ति जन्म से ब्राह्मण नहीं होता। अपितु शिक्षा प्राप्ति के पश्चात उसके वर्ण का निर्धारण होता है। ब्राह्मण शूद्र बन सकता और शूद्र ब्राह्मण हो सकता है। इसी प्रकार क्षत्रिय और वैश्य भी अपने वर्ण बदल सकते हैं। - मनुस्मृति 10/64 विशुद्ध: इसका कोई और प्रमाण भी मिलता है? कार्तिकेय: हाँ। शरीर और मन से शुद्ध-पवित्र रहने वाला, उत्कृष्ट लोगों के सानिध्य में रहने वाला, मधुरभाषी, अहंकार से रहित, अपने से उत्कृष्ट वर्ण वालों की सेवा करने वाला शूद्र भी उत्तम ब्राह्मण जन्म और द्विज वर्ण को प्राप्त कर लेता है। - मनुस्मृति 9/335 जो मनुष्य नित्य प्रातः और सांय ईश्वर आराधना नहीं करता उसको शूद्र समझना चाहिए। - मनुस्मृति 2/103 जब तक व्यक्ति वेदों की शिक्षाओं में दीक्षित नहीं होता वह शूद्र के ही समान है। - मनुस्मृति 2/172 विशुद्ध: तो क्या एक ब्राह्मण भी अपने आचरण से पतित हो सकता है? कार्तिकेय: बिल्कुल। ब्राह्मण-वर्णस्थ व्यक्ति श्रेष्ठ–अतिश्रेष्ठ व्यक्तियों का संग करते हुए और नीच-नीचतर व्यक्तियों का संग छोड़कर अधिक श्रेष्ठ बनता जाता है। इसके विपरीत आचरण से पतित होकर वह शूद्र बन जाता है। - मनुस्मृति 4/245 जो ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य वेदों का अध्ययन और पालन छोड़कर अन्य विषयों में ही परिश्रम करता है, वह शूद्र बन जाता है। - मनुस्मृति 2/168 विशुद्ध: एक बात और समझाओ। क्या आज जो लोग अपने आपको ब्राह्मण कहते हैं, वही हमारी प्राचीन विद्या और ज्ञान की रक्षा करने वाले प्रहरी हैं? कार्तिकेय: इसका उत्तर व्यक्ति के कर्म पर निर्भर करता है। आजकल जो व्यक्ति ब्राह्मण कुल में उत्पन्न होकर अगर प्राचीन ब्राह्मणों के समान वैदिक धर्म की रक्षा के लिए पुरुषार्थ कर रहा है तब तो वह निश्चित रूप से ब्राह्मण के समान सम्मान का पात्र है। अगर कोई व्यक्ति ब्राह्मण कुल में उत्पन्न होकर ब्राह्मण धर्म के विपरीत कर्म कर रहा है, तब वह किसी भी प्रकार से ब्राह्मण कहलाने के लायक नहीं है।

  • 3 июн.946103

    shanka samadhaan part 1 विशुद्ध: कार्तिकेय, ब्राह्मण शब्द को लेकर इतनी बहस क्यों होती है? कोई कहता है यह जाति है, कोई कहता है यह जन्म से मिलता है। कार्तिकेय: यही सबसे बड़ी समस्या है। ब्राह्मण शब्द का वास्तविक अर्थ समझे बिना लोगों ने इसे केवल जन्म से जोड़ दिया। मनुस्मृति 2/28 के अनुसार पढ़ने-पढ़ाने से, चिंतन-मनन करने से, ब्रह्मचर्य, अनुशासन, सत्यभाषण आदि व्रतों का पालन करने से, परोपकार आदि सत्कर्म करने से, वेद, विज्ञान आदि पढ़ने से, कर्तव्य का पालन करने से, दान करने से और आदर्शों के प्रति समर्पित रहने से मनुष्य का यह शरीर ब्राह्मण किया जाता है। विशुद्ध: तो क्या ब्राह्मण कोई जाति नहीं है? कार्तिकेय: नहीं। ब्राह्मण वर्ण है, जाति नहीं। वर्ण का अर्थ है चयन या चुनना। व्यक्ति अपनी रुचि, योग्यता और कर्म के अनुसार इसका स्वयं वरण करता है, इस कारण इसका नाम वर्ण है। वैदिक वर्ण व्यवस्था में चार वर्ण हैं—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। विशुद्ध: फिर इन चारों के कार्य क्या बताए गए हैं? कार्तिकेय: ब्राह्मण का कर्म है विधिवत पढ़ना और पढ़ाना, यज्ञ करना और कराना, दान प्राप्त करना और सुपात्रों को दान देना। क्षत्रिय का कर्म है विधिवत पढ़ना, यज्ञ करना, प्रजाओं का पालन-पोषण और रक्षा करना, सुपात्रों को दान देना, धन ऐश्वर्य में लिप्त न होकर जितेन्द्रिय रहना। वैश्य का कर्म है पशुओं का लालन-पोषण, सुपात्रों को दान देना, यज्ञ करना, विधिवत अध्ययन करना, व्यापार करना, धन कमाना, खेती करना। शूद्र का कर्म है सभी चारों वर्णों के व्यक्तियों के यहाँ पर सेवा या श्रम करना। शूद्र शब्द को मनु अथवा वेद ने कहीं भी अपमानजनक, नीचा अथवा निकृष्ट नहीं माना है। मनु के अनुसार चारों वर्ण ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र आर्य हैं। - मनुस्मृति 10/4 विशुद्ध: लेकिन आज तो लोग अलग-अलग जातियों की बात करते हैं। मनुष्यों में वास्तव में कितनी जातियाँ हैं? कार्तिकेय: मनुष्यों में केवल एक ही जाति है। वह है "मनुष्य"। अन्य की जाति नहीं है। विशुद्ध: फिर चार वर्णों का विभाजन किस आधार पर किया गया? कार्तिकेय: वर्ण बनाने का मुख्य प्रयोजन कर्म विभाजन है। वर्ण विभाजन का आधार व्यक्ति की योग्यता है। आज भी शिक्षा प्राप्ति के उपरांत व्यक्ति डॉक्टर, इंजीनियर, वकील आदि बनता है। जन्म से कोई भी डॉक्टर, इंजीनियर, वकील नहीं होता। इसे ही वर्ण व्यवस्था कहते हैं। विशुद्ध: तो क्या कोई व्यक्ति जन्म से ब्राह्मण नहीं होता? कार्तिकेय: व्यक्ति की योग्यता का निर्धारण शिक्षा प्राप्ति के पश्चात ही होता है, जन्म के आधार पर नहीं। किसी भी व्यक्ति के गुण, कर्म और स्वभाव के आधार पर उसके वर्ण का चयन होता है। कोई व्यक्ति अनपढ़ हो और अपने आपको ब्राह्मण कहे तो वह गलत है। जैसे लकड़ी से बना हाथी और चमड़े का बनाया हुआ हरिण सिर्फ़ नाम के लिए ही हाथी और हरिण कहे जाते हैं वैसे ही बिना पढ़ा ब्राह्मण मात्र नाम का ही ब्राह्मण होता है। - मनुस्मृति 2/157 विशुद्ध: लेकिन अगर किसी का पिता ब्राह्मण हो तो क्या उसकी संतान स्वतः ब्राह्मण कहलाएगी? कार्तिकेय: यह भ्रान्ति है। जैसे एक डॉक्टर की संतान तभी डॉक्टर कहलाएगी जब वह MBBS उत्तीर्ण कर लेगी। जैसे एक इंजीनियर की संतान तभी इंजीनियर कहलाएगी जब वह BTech उत्तीर्ण कर लेगी। बिना पढ़े नहीं कहलाएगी। वैसे ही ब्राह्मण एक अर्जित की जाने वाली पुरानी उपाधि है। माता-पिता से उत्पन्न संतति का माता के गर्भ से प्राप्त जन्म साधारण जन्म है। वास्तविक जन्म तो शिक्षा पूर्ण कर लेने के उपरांत ही होता है। - मनुस्मृति 2/147 विशुद्ध: प्राचीन काल में ब्राह्मण बनने के लिए क्या करना पड़ता था? कार्तिकेय: प्राचीन काल में ब्राह्मण बनने के लिए शिक्षित और गुणवान दोनों होना पड़ता था। वेदों में पारंगत आचार्य द्वारा शिष्य को गायत्री मंत्र की दीक्षा देने के उपरांत ही उसका वास्तविक मनुष्य जन्म होता है। - मनुस्मृति 2/148 ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य, ये तीन वर्ण विद्याध्ययन से दूसरा जन्म प्राप्त करते हैं। विद्याध्ययन न कर पाने वाला शूद्र, चौथा वर्ण है। - मनुस्मृति 10/4

  • 1 июн.82423из RishiUvach

    *क्या पाताल सच में था… या सिर्फ कल्पना? 🤯* आजकल कुछ लोग पुराणों के “पाताल लोक” को Fantasy कहकर dismiss कर देते हैं। YouTuber नित्यानन्द मिश्र ने भी महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती के पाताल संबंधी विचारों का मज़ाक उड़ाते हुए उसे केवल कल्पना बताया। 😶 लेकिन दूसरी ओर Ritter, नन्दलाल डे जैसे शोधकर्ता पाताल को वास्तविक मानकर उसका भौगोलिक स्थान खोजने का प्रयास करते हैं। 🌎 तो आखिर सच क्या है? 🔹 क्या पाताल कोई underground दुनिया थी? 🔹 क्या यह अमेरिका या पृथ्वी के दूसरे भागों का संकेत था? 🔹 या फिर बाद की कल्पनाओं ने इसके अर्थ को बदल दिया? इस वीडियो में हम शास्त्र, इतिहास, भूगोल और वैदिक दृष्टि से पाताल के रहस्य को decode करेंगे। 🔥 https://www.youtube.com/shorts/Kt9ahZ7c7GQ

  • 30 мая1 05873

    अन्न : आरोग्य, बल और जीवन का आधार मंत्र: अन्नपतेऽन्नस्य नो देह्यनमीवस्य शुष्मिणः। प्र-प्र दातारं तारिष ऊर्जं नो धेहि द्विपदे चतुष्पदे॥ — यजुर्वेद 11.83 यजुर्वेद का यह मंत्र बताता है कि अन्न केवल भोजन नहीं, बल्कि आरोग्य (Health), बल (Strength), ऊर्जा (Energy) और जीवन का आधार है। वेद हमें शुद्ध, पौष्टिक और रोगरहित भोजन ग्रहण करने, अन्नदाता का सम्मान करने तथा मनुष्य और पशुओं दोनों के पोषण का ध्यान रखने की शिक्षा देता है। अन्न का सम्मान, कृतज्ञता और संयमपूर्ण जीवन ही वास्तविक समृद्धि का मार्ग है। • अन्नपते — अन्न का वास्तविक स्वामी परमात्मा है। • अनमीवस्य अन्नस्य — ऐसा भोजन जो रोगों से बचाए और स्वास्थ्य दे। • शुष्मिणः — बल, सामर्थ्य और ऊर्जा प्रदान करने वाला अन्न। • दातारं तारिष — अन्नदाता (किसान आदि) का सम्मान और कल्याण। • ऊर्जं नो धेहि द्विपदे चतुष्पदे — मनुष्य और पशु, दोनों के पोषण व कल्याण की कामना। • भोजन केवल taste ke liye nahi, health aur character building ke liye bhi hona chahiye. • Jaisa ann, waisa tan aur mann — Vedic wisdom ka core message.

  • 25 мая1 33186

    Aryavart 🚩

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