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A mountain as beautiful as jade, Two red beans of longing for you; A wandering soul yearning for a home but life is too cold. There is no reflection of autumn lake in your eyes. The gaze is too deep, too serene; like hiding the burning desires in its wake. My heart flapped its wings like a humming bird, under those crystal clear eyes. Your touch is cold, yet it soothes the invisible wounds of mine. The past was beautiful like a misty haze, when shall we reunite to live that again? Lakshita
मैं अनंत पथ में लिखती जो / महादेवी वर्मा मै अनंत पथ में लिखती जो सस्मित सपनों की बाते उनको कभी न धो पायेंगी अपने आँसू से रातें! उड़् उड़ कर जो धूल करेगी मेघों का नभ में अभिषेक अमिट रहेगी उसके अंचल- में मेरी पीड़ा की रेख! तारों में प्रतिबिम्बित हो मुस्कायेंगी अनंत आँखें, हो कर सीमाहीन, शून्य में मँडरायेगी अभिलाषें! वीणा होगी मूक बजाने- वाला होगा अंतर्धान, विस्मृति के चरणों पर आ कर लौटेंगे सौ सौ निर्वाण! जब असीम से हो जायेगा मेरी लघु सीमा का मेल, देखोगे तुम देव! अमरता खेलेगी मिटने का खेल!
भूलने में सुख मिले तो भूल जाना / रामेश्वर शुक्ल 'अंचल' भूलने में सुख मिले तो भूल जाना । एक सपना-सा समझना ज्यों नदी में बाढ आना भूलने में सुख मिले तो भूल जाना । थीं सुनी तुमने बहुत-सी जो लड़कपन में कहानी शेष जिनकी सुधि नहीं — मैं था उन्हीं का एक प्राणी ! सोच लेना — था किसी अनजान पँछी का तराना । झूमते लय-भार से जिस राग के मिजराब सारे भूल जाते वे उसे तत्क्षण — गगन ज्यों भग्न तारे ठीक वैसे तुम मुझे यदि सुख मिले तो भूल जाना । भूल जाती गन्ध अपना कुँज जाती दूर जब उड़ भूल जाते प्राण काया छोड़ते ही शून्य में मुड़ हो कभी विह्वल न मेरी याद में भर अश्रु लाना । भूल जाता फूल डाली को क्षणों में ही बिछुड़कर याद मेघों को न करती दामिनी भी आ धरा पर बढ़ गया जो दीप उसमें अब न तुम बाती सजाना । वेदना इससे बड़ी होगी मुझे क्या और सुनकर तुम विकल हो याद करती हो मुझे चीत्कार-कातर क्यों उठे, मेरा वही फिर दर्द छाती का पुराना भूलने में सुख मिले तो भूल जाना ।
औरतें / रमाशंकर यादव 'विद्रोही' कुछ औरतों ने अपनी इच्छा से कूदकर जान दी थी ऐसा पुलिस के रिकॉर्ड में दर्ज है और कुछ औरतें अपनी इच्छा से चिता में जलकर मरी थीं ऐसा धर्म की किताबों में लिखा हुआ है मैं कवि हूँ, कर्त्ता हूँ क्या जल्दी है मैं एक दिन पुलिस और पुरोहित दोनों को एक साथ औरतों की अदालत में तलब करूँगा और बीच की सारी अदालतों को मंसूख कर दूँगा मैं उन दावों को भी मंसूख कर दूंगा जो श्रीमानों ने औरतों और बच्चों के खिलाफ पेश किए हैं मैं उन डिक्रियों को भी निरस्त कर दूंगा जिन्हें लेकर फ़ौजें और तुलबा चलते हैं मैं उन वसीयतों को खारिज कर दूंगा जो दुर्बलों ने भुजबलों के नाम की होंगी. मैं उन औरतों को जो अपनी इच्छा से कुएं में कूदकर और चिता में जलकर मरी हैं फिर से ज़िंदा करूँगा और उनके बयानात दोबारा कलमबंद करूँगा कि कहीं कुछ छूट तो नहीं गया? कहीं कुछ बाक़ी तो नहीं रह गया? कि कहीं कोई भूल तो नहीं हुई? क्योंकि मैं उस औरत के बारे में जानता हूँ जो अपने सात बित्ते की देह को एक बित्ते के आंगन में ता-जिंदगी समोए रही और कभी बाहर झाँका तक नहीं और जब बाहर निकली तो वह कहीं उसकी लाश निकली जो खुले में पसर गयी है माँ मेदिनी की तरह औरत की लाश धरती माता की तरह होती है जो खुले में फैल जाती है थानों से लेकर अदालतों तक मैं देख रहा हूँ कि जुल्म के सारे सबूतों को मिटाया जा रहा है चंदन चर्चित मस्तक को उठाए हुए पुरोहित और तमगों से लैस सीना फुलाए हुए सिपाही महाराज की जय बोल रहे हैं. वे महाराज जो मर चुके हैं महारानियाँ जो अपने सती होने का इंतजाम कर रही हैं और जब महारानियाँ नहीं रहेंगी तो नौकरियाँ क्या करेंगी? इसलिए वे भी तैयारियाँ कर रही हैं. मुझे महारानियों से ज़्यादा चिंता नौकरानियों की होती है जिनके पति ज़िंदा हैं और रो रहे हैं कितना ख़राब लगता है एक औरत को अपने रोते हुए पति को छोड़कर मरना जबकि मर्दों को रोती हुई स्त्री को मारना भी बुरा नहीं लगता औरतें रोती जाती हैं, मरद मारते जाते हैं औरतें रोती हैं, मरद और मारते हैं औरतें ख़ूब ज़ोर से रोती हैं मरद इतनी जोर से मारते हैं कि वे मर जाती हैं इतिहास में वह पहली औरत कौन थी जिसे सबसे पहले जलाया गया? मैं नहीं जानता लेकिन जो भी रही हो मेरी माँ रही होगी, मेरी चिंता यह है कि भविष्य में वह आखिरी स्त्री कौन होगी जिसे सबसे अंत में जलाया जाएगा? मैं नहीं जानता लेकिन जो भी होगी मेरी बेटी होगी और यह मैं नहीं होने दूँगा.
भीतर से 'बचाओ बचाओ' की चीखें, चेहरे पर मुस्कुराहट से दबा देता है, हर शख्स टूट कर बिखर चुका पर, हर कोई खुश रहने की सलाह देता है। हर दौड़ते शख्स में एक ठहराव है यहाँ, मर्म जितना भी हो, बेकार है यहाँ, गिला किससे और कब तलक करूँ, जिसे देखूँ मुझसे अधिक हैरान है यहाँ। इन्हें देखूँ तो लगता है जैसे, ये वो कश्तियाँ हैं, जो सभी को पार कराती हैं, और स्वयं सदा पड़ी रहती हैं पानी में। कभी कभी लगता है हम ढूंढते हैं दुख, और साथ ही ढूंढते हैं कोई ऐसा, जिससे मिलते हों हमारे दुख, हम उपेक्षाओं से ठगे हुए लोग हैं, कोई ऐसा साथ चले जिसने ये, नाउम्मीदी का रास्ता पहले भी देखा हो, उसके साथ सफर हल्का हो जाता है। मै इन्हें हारे हुए लोग नहीं मानता, मेरी हैसियत भी नहीं है, यार मेरी मानो तो मुस्कुराते हुए, पलकों से आँसू पौंछ देने वाला शख्स, भीतर से मसान हो चुका है, अब दुनिया को भय इसके क्रोध से नहीं, इसके मौन से होना चाहिए। इनकी आशाएं मरी नहीं, वो इनके मौन और शून्यता के सामने, शिथिल पड़ चुकी हैं, असहाय हैं, नतमस्तक हैं, वो भी, मैं भी। ~ विशाल सैनी।
तू साथ है तो डर कैसा? तू साथ नहीं तो डर कैसा? ~ विशाल सैनी।
जहाँ नदियाँ पहाड़ों से निकलती हैं और जहाँ समुद्र में गिरती हैं वहां क्या है मेरा ज्ञात नहीं लेकिन एक दिन जाना है उधर.... किसी को उस ओर जाते देखते न जाने कैसी हसरत भङकती है मन में!
मन को थी मुक्ति की चाह, मुक्ति मन के अधीन रही, मृत्यु को जीवन की लालसा, सजीवता मृत्यु के अंतर्निहित रही, आत्मा को चाह परमात्मा की थी, जो देह के मोह में विलीन रही, मृगतृष्णा केवल मृग की बात नहीं, समस्त सृष्टि की सत्यता रही। मृगतृष्णा, सजीवता का प्रतीक है, या चेतना का? क्या केवल सजीव होना, कभी चेतना के आड़े आयेगा? या चेतना बुद्धि को विमुक्त करेगी? बुद्धि ने कहा मुक्ति अन्तिम मार्ग है, चैतन्य बोला मुक्ति प्रथम चरण होगा, विविध विचित्रता मात्र एक लोक में, पर समस्त ब्रह्माण्ड एक सा? कैसे इसकी विवेचना की हो? मानो सभी में चेतना हो, जल, जर, चर-अचर सभी क्षर? ऐसी दिव्यता क्या संभव है, और कैसे इसकी रचना हो? बीते कल में की गई कल्पनाएं, जिनसे जन्मी अन्तर्मन में व्यथाएं, कुछ कृत्रिम तो कुछ वास्तविकताएं, यथार्थ हैं या सौविक क्रियाएं? क्या परिणामों का भय, आरम्भ का अवरोध है? या गतिरोध की विवेचना, मनोरम अंत का आरम्भ? अंत.... अंत यदि निश्चित है, तो प्रारम्भ के नए मानक लिखने होंगे, प्रतिदिन लिखने होंगे, स्वयं। ~ विशाल सैनी।
वो तोल्स्तोय के शहर से था.... और मैं दोस्तोयेव्स्की के मोहल्ले में रहती थी।
"To those who do not know that the world is on fire, I have nothing to say." - Bertolt Brecht
People often push what they cannot accomplish onto the next life. To carry the debts of this life into the next.... how exhausting!!
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कभी कभी आखिरी मुलाकात आखिरी ही रह जाती है ... ~आकांक्षा श्रीवास्तव ~
How could one possibly understand someone completely from just a single encounter? What we perceive as understanding is merely another person's judgment!!
रोशनी की तलाश में अंधेरे से निकले हम लोग, क्या समय रहते रोशनी तक पहुँच पाएंगे!!!
Happy Women's Day to every woman!! You deserve the world🌻🌻
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सुनो, प्रश्न यह है क्या तुम ठहर जाओगे युग के अंत तक हाथ थाम कर चल सकोगे सभी रीति-रिवाजों रिवाजों को दरकिनार कर क्या मेरा हाथ थमते तुम्हारा विकल हृदय शांत हो जायेगा ? जहां शब्द की शून्यता हो चेतना की अधिकता हो जहां बस एक सत्यता हो जहां प्रेम असीम हो प्रश्न यह यही है? ~आकांक्षा श्रीवास्तव ~