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Tides - गहरे विचार

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  • 16 авг.सुश्रुत भी वर्षा ऋतु में पाचन और वात की स्थिति को ध्यान में रखते हुए आहार-विहार के विशेष नियम बताते हैं। आज के संदर्भ में इसका एक व्यावहारिक अर्थ और भी है—मानसून में दूषित जल, संक्रमण, फफूँद, खाद्य-संदूषण और मच्छरजनित रोगों का जोखिम बढ़ सकता है। इसलिए ताजा, स्वच्छ, अच्छी तरह पका हुआ और सुपाच्य भोजन तथा सुरक्षित जल का सेवन आधुनिक सार्वजनिक स्वास्थ्य की दृष्टि से भी विवेकपूर्ण है। अर्थात् आयुर्वेद का संदेश था— सावन में प्रकृति बदली है, इसलिए आहार भी बदलो। बचपन की याद भी है सावन। मां झूला झूल रही है। हम बच्चे पेंग मार रहे हैं। मां गा रही है। "हमके मेंहदी मंगा द पिया मोतीझील से जा के साइकिल से ना " कि "छैला छाय रहे मधुबन में सावन सुरत बिसारे मोर। मोर शोर बरजोर मचावै, देखि घटा घनघोर।। कोकिल शुक सारिका पपीहा, दादुर धुनि चहुंओर। झूलत ललिता लता तरु पर, पवन चलत झकझोर।।" अब भी है सावन हमारी प्रतीक्षा में । पर राजनीति के अलावा अब कुछ और दिखाई नहीं देता सावन आया साजन आए ____ सावन! शिव का श्रावण। सजना सजनी का सावन। कालिदास का सावन, माघ का सावन, रेणु का सावन। वेदों के‌ श्रवण का महीना। कारी बदरिया, झूला, कजरी, सोहनी रोपनी, नायक-नायिका, संजोग- विरह, दादुर पाहुन का महीना। सावन रस है, काव्य रस है। पण्डित लोग कह गये हैं कि "रसात्मकम् वाक्यम् काव्यम"! और यह रस अपूर्व है। काव्य रस और सावन इन दोनों में आंसू घुलते हैं। सावन आंसुओं की निष्पत्ति भी है और कसौटी भी। श्रावण संजोग और वियोग दोनों का मूर्तिमान विग्रह है। यह परस्पर विरोधाभासी रसों का मादक 'कॉकटेल' है। सावन रसाग्रही है, रसज्ञाता है रसराज है, रसेश्वर है। होता होगा रास शरद में, रसाकर्षण और रसोत्कर्ष तो सावन में ही होगा। आश्चर्य नहीं कि इस अप्रमेय अनिर्वचनीय मास को शिव की आराधना का समय माना गया। पुरूष सूक्त की बारम्बारता का समय यही तो है। चैत्र मधुमास है परन्तु सावन 'मधुराज' है। यह ऋतुओं का 'गीत-गोविन्द' है। यह कालक्रम का पंचम माह काल- भागवत का रास पंचाध्यायी है। यह कालपुरूष का पञ्चम भाव है। हो भी क्यों नहीं इस माह के आदित्य स्वयं 'इन्द्र' होते हैं, वही 'मघवा'! वर्षा और मेघ का देवता देवराज। प्रम्लोचा अप्सरा इस माह के आदित्य का मनरंजन करती हैं। गांव गिरावं में जब बरसात न हो, किसी जमाने में प्रम्लोचा की देहयष्टि को भी मात देने वाली ग्राम्या नारी रात्रि में निर्वसना हल जोतती थी। अप्सराएं लाज से गड़ जातीं और असहाय इन्द्र मेघों को आदेश करता कि अब बरस! न बरसे बादल! ब्राह्मण वृष्टि सूक्त की आवृत्तियां करेंगे और कहीं लुहेड़ा लोक मेंढक मेंढकी को पकड़कर उनकी चतुष्पदी विवाह करा देगा। बरसोगे नहीं तो जाओगे कहां। यह सावन हमारे मन-काष्ठ के भीतर का हरापन है। यह वह रक्तधमनी है जहां आलोड़न, चुलबुलापन, स्फूर्ति और कैशौर्य बहते हैं। वैदिक ऋषियों के लिए यह वर्षा के देवता पर्जन्य की पिता के रूप स्थापना भी है साथ में उनके पिता होने का बोध भी। वाल्मीकि की उपमा देखिए- वह मेघमाल को ऐसी सीढ़ी कहते हैं जिस पर चढ़कर कुटज और अर्जुन की माला से हम सूर्य का अभिनंदन कर सकते हैं। शूद्रक एक जगह लिखते हैं कि ' सावन आकाश की जम्हाई है'! ऐसा रूपक पूरे संसार के साहित्य में कहीं नहीं। ठाकुर बिल्वमङ्गल जी एक पद में लिखते हैं कि एक तो कर्क संक्रान्ति और सिंह संक्रान्ति को एक साथ सम्भालने वाला मास, दूसरे कि इस माह की पूर्णिमा पर ब्राह्मणों का राजा सोम अपने ही नक्षत्र में होगा, तीजे का क्षत्रियों का राजा इन्द्र इस महीने का आदित्य है और चौथे कि इस माह यौवन पर्वों से मकरन्द झरता है। ऋतुओं का यौवन काल है। 'प्राप्ते तु षोडशे वर्षे गर्दभी अप्सरा भवेत! तो, सावन को घमण्ड क्यों न हो जाए? मर्यादा पुरुषोत्तम भी लपेटे में आ जाते हैं। घन घमण्ड गरजत नभ घोरा। प्रियाहीन मन डरपत मोरा । और बाबू जिस दो टके की नौकरी के लिए तुम मरे जाते हो, सनद रहे कि उसके सामने हमारी नायिकाओं के लिए सावन लखटकिया है। ऋतुसंहार में कालिदास को वर्षा आगमन ऐसा दिखाई देता है, मानों कोई राजा गाजे बाजे के साथ चतुरङ्गिणी सैन साजे चला आ रहा हो। राजा ही है भाई सावन। इसके भय से कहो या प्रभाव से कहो सुकुमार नदियां रजस्वला हो जाती हैं। अगस्त्य के उदयपर्यन्त रजस्वला रहेंगी। और जो समुद्र गामिनी नदियां हैं जिनको पति का साहचर्य सुलभ है, वह रजोधर्म में नहीं होंगी। जानते हैं न नदी किसको कहते हैं? पानी की वह लहर जिसकी गति आठ हजार धनुष कम से कम हो वही नदी है, उसके पहले तो बस गर्त। प्रकृति धन्य है, भारतवर्ष धन्य है। अभी सोलह जुलाई को कर्क संक्रान्ति है। कर्क संक्रांति के प्रारम्भ में तीन दिन तक महानदियां रजस्वला रहती हैं, वे स्त्रियों की भाँति चौथे दिन शुद्ध हो जाती हैं। सिंह संक्रान्ति के समय गौ-प्रसव भी अशुभ।6,90%
  • 16 авг.हमने समझा सावन न केवल शस्य, भावोद्रेक, रसोत्कर्ष और रजोधर्म का नियंता है अपितु वह इन सबमें अंत:संश्लिष्ट भी है। अब ऐसा लगेगा कि अहा! कितना सुन्दर सावन। पर नहीं ऐसा कतई नहीं। मैथिल-कोकिल महाकवि विद्यापति झूठ तो कहेंगे नहीं- " साओन मास बरिस घन वारि।पंथ न सूझए निसि अंधयारि।।चउदिस देखिअ बीजुरि रेह ।हे सखि! कामिनि जिवन संदेह! अब लाख टके का सवाल कि वो क्या चीज जो कामी-कामिनी के प्राण हरे ले रही। तो बाबू भाई उत्तर है कि सावन की हवा। हां, यह हम नहीं कह रहे, उलटा जपने वाले वाल्मीकि कह गये। कैसी हवा है सावन की।मेघोदरविनिर्मुक्ताःकर्पूरदलशीतलाः है। मने बादलों के गर्भ से निकली कपूर की डली है। और कैसी तो उसकी सुगंध है? सद्य:पुष्पित केतकी के सुगंध जैसी। और हवा की गति कैसी? जैसे योगी जल पीते हैं नासिका से। आदिकवि कहते हैं बिजली इस हवा का साथ ऐसे दे रही मानो आकाश में सोने के कोड़े मारे जा रहे हों। विरही मन तो घायल होगा। कुछ भाविक जन पूछते हैं कि सावन में क्या करें। आचार्य लोग कह गये हैं कि सावन में योग्य ब्राह्मण को घृतकुम्भ और नवयौवना षोडशी का दान करना चाहिए। उदाहरण और सरलता के लिए एक योग्य ब्राह्मण की तस्वीर भी इस लेख के साथ संलग्न है। ✍🏻मधुसूदन उपाध्याय लक्ष्मणपुरी3,13%
  • 11 авг.शिव विवाह कभी कभी शिवरात्रि को शिव विवाह भी कहते हैं। इसके कई अर्थ हैं। सम्बलपुर (पश्चिम ओड़िशा) में ज्येष्ठ शुक्ल षष्ठी (शीतल षष्ठी) को शिव विवाह उत्सव मनाया जाता है। उसमें एक यजमान कन्यादान करते हैं, अन्य वर पक्ष के होते हैं। यह मनुष्य रूप में कार्तिकेय के माता पिता का विवाह है। कार्त्तिकेय के समय अभिजित नक्षत्र का पतन होने से धनिष्ठा नक्षत्र में अर्थात् माघ मास से संवत्सर का आरम्भ हुआ था (महाभारत, वन पर्व, २३०/८-१०)। उस समय धनिष्ठा नक्षत्र से वर्षा आरम्भ होती थी, जो प्रायः १५,८०० ईपू में था। आज भी मिथिला में वर्षा से ही संवत्सर आरम्भ मानते हैं। रामचरितमानस, बालकाण्ड में सावन-भादो मास को ही राम के २ अक्षरों का स्वरूप कहा है। कार्त्तिकेय के समय माघ से वर्षा तथा ज्येष्ठ से शीत ऋतु का आरम्भ होता था। अतः आज भी ज्येष्ठ शुक्ल षष्ठी को शीतल षष्ठी कहते हैं, यद्यपि उस समय सबसे अधिक ताप होता है। तत्त्व रूप में शिव-शक्ति का मिलन कई प्रकार से कहा जाता है। इसके वर्णन से शङ्कराचार्य ने सौन्दर्य लहरी का आरम्भ किया है- शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुम्, न चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि। अतस्त्वामाराध्यां हरिहरविरिञ्चादिभिरपि, प्रणन्तुं स्तोतुं वा कथमकृतपुण्यः प्रभवति॥ लक्ष्मीधर टीका में शिव-शक्ति योग के १९ अर्थ लिखे हैं। अन्य अर्थ भी हैं। शैव दर्शन या शिव सूत्र के अनुसार परमशिव का २ भागों शिव-शक्ति में विभाजन होता है। पुनः उनके मिलन से सृष्टि का आरम्भ होता है। इस मिलन या विवाह को कई प्रकार से कहा गया है-पुरुष-प्रकृति, अग्नि-सोम, भौतिक विज्ञान में पदार्थ-ऊर्ज्जा, या वेद में इट्-ऊर्क, भृगु-अङ्गिरा। मनुष्य रूप में स्थूल शरीर शव जैसा है, वह प्राण रूपी शक्ति के मिलन से स्पन्दन करता है तथा शिव होता है। इस स्पन्दन को रव कहा है, जिससे मनुष्य कर्म तथा यज्ञ करने में सक्षम है। चत्वारि शृङ्गा त्रयो अस्य पादा द्वे शीर्षे सप्त हस्तासो अस्य। त्रिधा बद्धो वृषभो रोरवीति, महोदेवो मर्त्यां आविवेश॥ (ऋक्, ४/५८/३) शरीर में यज्ञ रूपी वृषभ रव करने से ही मनुष्य सम्म्मानित होता था। सर्वप्रथम पुरु ने तीन यज्ञ संस्था प्रचलित की, जिससे उनको सम्मान के लिए पुरु-रवा कहा गया। आज भी शिव-क्षेत्र काशी में सम्मान के लिए रवा शब्द प्रचलित है। इसका विपरीत अनरवा या अनेरिया का अर्थ अकर्मण्य या बेकार है। दक्षिण भारत में भी राव सम्मान सूचक उपाधि है, राजस्थान में रावल है। स्वयं पौलस्त्य भी बहुत रव करता था जिसके कारण उसे रावण कहा गया (तमिल में शब्दके अन्त में न् लगाते हैं जैसे रामन, कृष्णन, तेलुगू में लूटने रामुलू)। केवल शरीर विश्व की प्रतिमा है जिसका वर्णन अ से ह तक के अक्षरों से होता है, जिसे वाक्-अर्थ प्रतिपत्ति कहा है। अतः स्वयं को अहं कहते हैं तथा शक्ति क्षेत्र मिथिला में अहां सम्मान के लिए कहते हैं। शरीर तथा रव रूप शक्ति संयोग आध्यात्मिक शिव-पार्वती विवाह है। काल रूप में रात्रि शक्ति है, तेज शिव रूप है। कालरात्रि के ८ रूप रात्रि सूक्त में हैं। विश्व का निर्माण १० रात्रि या अहः में कहा है जो सृष्टि के १० सर्ग हैं-१ अव्यक्त + ९ व्यक्त- अव्यक्ताद् व्यक्तयः सर्वे प्भवन्त्यहरागमे (गीता, ८/१८) मनुष्य शरीर भी गर्भ में १० चान्द्र परिक्रमा (२७३ दिन) में बनता है। चान्द्र मण्डल का प्रेत शरीर पृथ्वी की १० परिक्रमा में बनता है (दशगात्र)। रात्रि की शान्त स्थिति में निर्माण होता है, अतः यह गर्भ रूप शक्ति है। शक्ति पूजा भी रात्रि में होती है। रात्रि को शिव पूजा ही शिव-शक्ति विवाह है। ✍🏻अरुण उपाध्याय2,00%
  • 11 февр.आज कश्मीर में उनकी पुण्यस्मृतियाँ उनके द्वारा बनावाये गये और उनकी ही इस्लाम द्वारा प्रदूषित कृतघ्न संततियों द्वारा तोड़े गये #मार्तण्ड #मंदिर के ध्वंसावशेषों की ही तरह उपेक्षित है क्योंकि उनकी संततियां जबरदस्ती लादे गये उसी धर्म के विषैले प्रभाव में झूम रहीं हैं जिससे संघर्ष करते हुए उनके इस महान पूर्वज का सारा जीवन बीता था। ---------------- स्रोत: 1- राजतरंगिणी -- कल्हण 2- याज्ञवल्क्य स्मृति 3- किताब उल हिंद - अल बरूनी 4- श्रेण्य युग - आर सी मजूमदार 5- भारत का राजनैतिक व सांस्कृतिक इतिहास : विमल चंद्र पांडे 6- हरमन गोट्ज 7-आंद्रे विट्ज ------------ #Unsung #Heroes - 5 ------------- विश्व इतिहास में एक से एक महान साम्राज्य बने व बिगड़े - ईरानियों का साम्राज्य - यूनानियों का साम्राज्य - रोमन्स का साम्राज्य - अरबों का साम्राज्य - मंगोलों का साम्राज्य - तुर्कों का साम्राज्य -अंग्रेजों का साम्राज्य भले ही ये अलग अलग काल खंड और अलग अलग भूक्षेत्र में स्थापित हुए हों पर इन सबमें एक मूल समानता है? ये सभी के सभी तलवार के जोर पर स्थापित हुए। ये अपने विजित क्षेत्रों को अपना उपनिवेश मानते थे और वहाँ के निवासियों को अपना गुलाम। वे उनका हर प्रकार से शोषण करते थे और अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया से तो वहाँ के मूलनिवासियों का समूल नाश ही कर दिया गया ....पर........ ...पर घृणा और शोषण की इस दुनियाँ में एक साम्राज्य एसा भी था जिसका जन्म हुआ एक "प्रेम" से, एक विदेशी और एक स्थानीय लडकी" के बीच की प्रेम कहानी से और उनके इस "प्रेम" ने एशिया के एक पूरे भूखंड में सभ्यता , संस्कृति , स्थापत्य , शांति और समृद्धता के एक युग का सूत्रपात किया । साम्राज्य "प्रेम" का ........ साम्राज्य "हिंदू संस्कृति" का ....... साम्राज्य "भारतीयता" का .. -----------> कंबोडिया का समुद्री तट, प्रथम शताब्दी ईसवी दो सशस्त्र समूह एक दूसरे के आमने सामने खडे हैं . स्थल की ओर खडा समूह पूर्णतः नग्न और आक्रामक मुद्रा में जिसका नेतृत्व कर रही थी मंगोल मुखमुद्रा और पीतवर्णी, बलिष्ठ और बेहद सुंदर परंतु पूर्णतः नग्न स्त्री , जिसे इतिहास ने नाम दिया - नाग राजकुमारी "#सोमा" दूसरी ओर समुद्र की तरफ अभी अभी उतरा नाविकों का दल - पूर्णतः कवच सज्जित, सशस्त्र एवं सावधान और उसके आगे खडा था एक भारतीय मुखमुद्रा वाला दीर्घकाय , बलिष्ठ ,तेजस्वी युवक जो शीघ्र ही संपूर्ण दक्षिण पूर्वी एशिया में भारतीय संस्कृति का प्रतीक बनने वाला था ------- ---------------#अश्वत्थामा #का #वंशज ---------------- ................." #शैलराज #कौंडिन्य " .................. युवक के हाथों में एक प्रचंड दीर्घ भाला था परंतु उसकी भावभंगिमा अनाक्रामक और मुखमुद्रा एकदम शांत थी . विदेशियों की अनाक्रामक भावभंगिमा का असर नग्न स्त्री पुरुषों की भीड पर भी होता है और वे भी शांत हो जाते हैं . आक्रामकता का स्थान कौतूहल ले लेता है . दोनों एक दूसरे के बारे में जानना चाहते हैं परंतु दोंनों एक दूसरे की भाषा से अंजान ...............परंतु --- .......कहते हैं ना , प्रेम जाति , वंश , आयु और भाषा से परे होता है ... और यहाँ भी यही हुआ ...दोंनों की आंखें मिलीं और पहली नजर में ही प्यार हो गया ... युवक की आँखों में लहराते प्रेम और करुणा ने ' सोमा ' में नारी सुलभ लज्जा को जागृत किया और वहीं प्रारंभ हुआ सभ्यता का पहला पाठ - "वस्त्र " . आगुंतक विदेशियों को बस्ती में लाया गया। बस्ती में पहुँचकर अविलंब कौंडिन्य ने वस्त्र , संगठन , चिकित्सा , कृषि , पशुपालन , शिक्षा आदि सभ्यता के मूल तत्वों का प्रसार प्रारंभ किया . कौंडिन्य के आह्वान पर भारत से वेदपाठी ब्राह्मण , क्षत्रिय , व्यापारी , शिल्पकार और कुशल श्रमिक आये और इस भूखंड पर हिंदू संस्कृति के रूप में मानवता का विस्तार होने लगा और साथ ही जन्म लेने लगा एक "राज्य"। .............................कौंडिन्य इस राज्य का राजा बना , सोमा बनी रानी और वह बस्ती कहलाई-- ................."व्याधिपुर".................... भावी #ख्मेर #साम्राज्य का केन्द्र। इसी बीच कौंडिन्य की भांति "कृण्वन्तो विश्वं आर्यम्" का जयघोष करते और " वसुधैव कुटुंबकम", का उदात्त भाव धारण किये भारतीय तरुण पूर्वी एशिया में अन्य स्थानों पर जा पहुंचे और वहाँ पर भी हिंदू सत्ता के साथ साथ "हिंदू संस्कृति" की स्थापना की गयी--- ब्रह्मद्वीप ( म्यामां ) के "थातोन" में , स्याम ( थाईलैंड ) के "प्र प्रथोम" में , चंपा (वियेतनाम) के "टोकिंग" व "अनाम" में श्रीमार द्वारा यवद्वीप ( जावा , इंडोनेशिया) में आजिशक द्वारा जो आगे जाकर बना #शैलेन्द्र #साम्राज्य।1,20%
  • 17:55विषय में तो कुछ भी नहीं लिखा है। अतएव किसी सुनिश्चित विद्वान को किसी सिद्धान्त का मौलिक श्रेय प्रदान करना बहुत कठिन हो जाता है। ✍🏻 साभार भारतीय धरोहर0,00%
  • 17:55उदाहरण के लिये मध्य प्रदेश के अमरिया जिले से होकर कर्क रेखा गुजरती है। इसके ठीक उत्तर में लखनऊ जिला है। कर्क संक्रान्ति के दिन लखनऊ में शंकु की स्थापना से 3.2 अंश का कोण प्राप्त होता है। भूमध्यरेखा से कर्क रेखा 23.36 है। अत: भूमध्य रेखा से लखनऊ का अक्षांश 23.36 +3.2 = 26.56 सिद्ध होता है। परन्तु कर्क रेखा के सापेक्ष लखनऊ जिले की धरती का झुकाव 3.2 अंश है। साथ ही यह भी जान लिया गया है कि उमरिया की कर्क रेखा से लखनऊ की दूरी 352 किलोमीटर है। अत: अनुपात विधि से भूपरिधि का मान निकलेगा 352 x 360 = 39600 किलोमीटर 3.2 इस अनुपात विधि को इस श्लोक में प्रकट किया गया है— पुरान्तरं चेदिदमुत्तरं स्यात्तदक्षविश्लेषलवैस्तदा किम्। चक्रांशकैरिव्यनुपात युक्तया युक्तं निरुक्तं परिधे: प्रमाणम्।। सिद्धांत शिरोमणि, भुवनकोश, श्लोक 14 अर्थात् भूमध्यरेखा से उस आलोच्य स्थान A के अक्षांश में से कर्क रेखा के अक्षांश को घटाने पर प्राप्त अक्षांश में यदि पुरात्तर अर्थात् उस AB रेखा के बीच इतनी दूरी है, तो सम्पूर्ण चक्रांश 360 अंश में कितने योजन की दूरी होगी। इस अनुपात के प्रयोग से सम्पूर्ण भूपरिधि का प्रमाण ज्ञात होता है। जैसे, उपरिलिखित उदाहरण में, भूमध्य रेखा के सापेक्ष लखनऊ का अक्षांश — 26.56 कर्क रेखा का अक्षांश — 23.36 कर्क रेखा के सापेक्ष लखनऊ का झुकाव — 26.56—23.36 = 3.2 इस 3.2 अंश झुकाव पर कर्क रेखा से लखनऊ की दूरी पर अनुपात विधि का प्रयोग करने से भूपरिधि का प्रमाण ज्ञात होता है। आधुनिक विज्ञान तथा भूगोल की पाठ्य पुस्तकों में इसके लिये एरोतोस्थोनस नामक एक प्राचीन ग्रीक विद्वान को श्रेय प्रदान किया जाता है तथा उसकी कहानी को रोचक रीति से प्रस्तुत किया जाता है। कहानी यह है कि मिश्र के सिकन्दरिया में एक विशाल पुस्तकालय था। उसके पहले पुस्तकालयाध्यक्ष के रूप में भूगोल के ज्ञाता एरातोस्थोनस की नियुक्ति हुई थी। उन्हें यह ज्ञात हुआ कि कर्क—संक्रान्ति के दिन सियोना नगर में वहां के कुओं में सूर्य की किरणें एकदम सीधी पड़ती हैं। लेकिन उस दिन सिकन्दरिया में सूर्य की किरणें सीधी नहीं, अपितु तिरछी पड़ती हैं। उन्होंने वहां उनके झुकाव का कोण ज्ञात किया। साथ ही उन्होंने यह भी ज्ञातकर लिया कि सियेना से सिकन्दरिया की दूरी 5,000 स्तादिया अर्थात लगभग 925 किलोमीटर थी। इस कोण तथा दूरी, इन दो सूचनाओ के आधार पर उन्होंने भूपरिधि की माप प्राप्त कर ली। उन्होंने यह देखा कि यदि कर्क रेखा के सापेक्ष सिकन्दरिया में धरती का 7.64 अंश अंश का झुकाव है तथा वहां से इनकी 925 किलोमीटर की दूरी है तो 360 अंश में 43586 किलोमीटर की भूपरिधि होगी। कहानी के अन्य विवरण में कहा गया है कि उन्होने ओबेलिस्क पर्वत की चोटी पर कर्क संक्रान्ति के दिन धरती के झुकाव के अनुसार किरणों के झुकाव का कोण ज्ञात किया था। यहां भास्कराचार्य के अनुसार सूत्र का उपयोग करने पर भूमध्य रेखा के सापेक्ष सिकन्दरिया का अक्षांश— 31 अंश कर्क रेखा का अक्षांश — 23.36 कर्क रेखा के सापेक्ष सिकन्दरिया का झुकाव— 31 अंश —23.36= 7.64 इस झुकाव पर दूरी के साथ अनुपात विधि का प्रयोग किया गया है। आधुनिक युग में भी भूपरिधि इसी विधि से नापी जाती है परन्तु सूक्ष्म यन्त्रों के प्रयोग से यह कार्य अत्यन्त सूक्ष्मता से किया जाता है। प्राचीन रीति से सम्पूर्ण भूपरिधि का प्रमाण ज्ञात करने के पश्चात् एक अंश में धरती के फासले को भी आसानी से जाना जाता है। प्राचीन काल में कालखण्ड के आधार पर भी धरती की दूरी का पता लगाया जाता है। उस समय एक अहोरात्र में 60 घटी माने गए थे। अत: 39600/60 = 660 किलोमीटर, यह एक घटी देशान्तर कहा जाता है। इसका निर्देश भास्कराचार्य ने एक श्लोक में प्रदान किया है। आधुनिक युग में भी इसी रीति से एक घण्टा देशान्तर को प्रकट करने की परम्परा है। आधुनिक गणना अनुसार 1 अहोरात्र 24 घण्टे का होता है। अत: 39600/24 =1650 किलोमीटर को एक घण्टा देशान्तर कहा जाता है। घटी से देशान्तर को प्रकट करने की परम्परा आधुनिक पंचागों में भी पाई जाती है। भारतीय गणित ज्योतिष के इन ग्रन्थों में अनेक सिद्धान्त प्राप्त होते हैं, जिनसे आधुनिक खगोल विज्ञान लाभान्वित हुआ है। प्रमाणों के अभाव में यह सुनिश्चित नही हो पाता कि उनका मूल आविष्कारक कौन था। प्रस्तुत प्रसंग में भी यह बता पाना कठिन है कि भास्कराचार्य को इस सिद्धान्त के लिये कहां से प्रेरणा प्राप्त हुई। सिकन्दरिया के उस भूगोल विज्ञानी ने यह आविष्कार स्वयं किया था, यह अन्य किसी की प्रेरणा का परिणाम था। भारत में अनेक विषयों के महत्वपूर्ण ग्रन्थों में प्रणेता के काल तथा उसके विषय में जानकारी उपलब्ध नहीं होती। इस देश के सबसे महान् वैयाकरण पाणिनी, सबसे बड़े कविकुलगुरु कालिदास के विषय में हम बहुत कम जानते हैं। अत एवं उनके स्थान काल आदि के विषय में विद्वानों में मतभेद बने रहते है। उन्होंने अपने ग्रन्थ की प्रेरणा के0,00%
  • 17:55कैसे नापी भास्कराचार्य ने पृथ्वी की परिधि लेखक:- सुद्युम्न आचार्य निदेशक, वेद वाणी वितान, प्राच्य विद्या शोध संस्थान,सतना(म.प्र.) महाविज्ञानी आर्यभट्ट के ग्रन्थों में भूपरिधि की नाप का विधि का अस्पष्ट निर्देश प्राप्त होता है। 11वीं शताब्दी में भास्कराचार्य ने इसकी विधि का स्पष्ट उल्लेख किया है। इसे ज्ञात करने के लिये प्रमुखत: दो तथ्यों को जानना आवश्यक होता है। प्रथम, किसी निश्चित स्थान B के सापेक्ष किसी अन्य स्थान A पर पृथ्वी का झुकाव। अथवा भूमध्य रेखा के सापेक्ष उसके उत्तर या दक्षिण में किसी स्थान पर पृथ्वी का झुकाव या उसका अक्षांश। इसे प्राचीन ग्रन्थों में सार्थक रूप से अक्षांश नाम दिया गया था। इसका मौलिक अर्थ है, अक्ष यानी पृथ्वी की धुरी या केन्द्रबिन्दु से भूपरिधि के किसी बिन्दु B तक खीची गई रेखा तथा उसी केन्द्रबिन्दु से भूपरिधि के किसी अन्य बिन्दु A तक खींची गई रेखा की परस्पर कोणात्मक दूरी या अंश ही अक्षांश है। द्वितीय तथ्य, उस B स्थान से A स्थान की दूरी। इन दो तथ्यों को जानने के पश्चात् भूपरिधि को जानने के लिये अनुपात—विधि का प्रयोग होता है यदि B के सापेक्ष A स्थान के झुकाव पर B से A की अमुक दूरी हो तो गोल पृथ्वी के 360 अंश झुकाव पर कितनी दूरी होगी। भारतीय ज्योतिष में इन सूचनाओं के आधार पर भूपरिधि का मान ज्ञात कर लिया गया था। सूर्य सिद्धान्त में पृथ्वी का मान 1600 योजन बताया है तथा 1600 & 10 को भूपरिधि माना है। प्राचीन काल में योजन का मान अनिश्चित रहा है। पर हवेन्सांग के एक विवरण के अनुसार 16,000 या हस्त का एक योजन होता है2, तथा इस प्रकार 24,000 फीट का एक योजन होगा। इंग्लिश माप के अनुसार 4854 फीट का एक मील होता है। इस प्रकार 4.94 मील का एक योजन सिद्ध होता है। इस गणना के अनुसार 7904 मील पृथ्वी का व्यास तथा 24994 मील भूपरिधि बनती है। इसे 8/5 से गुणित करने पर 39991 किलोमीटर भूपरिधि सिद्ध होती है। आधुनिक मान्यता इसके बहुत समीप है। प्रकटत: उन्होंने अपनी रीति से भूपरिधि का सही मान प्राप्त करने में सफलता पाई थी। उपरिलिखित विवरण अनुसार इस विधि के परिचालन के लिये उस स्थान के अक्षांश का परिज्ञान आवश्यक है। इसके लिये यह श्लोक कहा गया है — शंकुच्छायाहते त्रिज्ये विषुवत्कर्णभाजिते। लम्बाक्षज्ये तयोश्चापे लम्बाक्षौ दक्षिणौ सदा।। अर्थात् शंकु और उसकी छाया को अलग—अलग त्रिज्या से गुणा करके प्रत्येक गुणनफल को विषुवत्कर्ण से भाग देने पर लम्बज्या और अक्षज्या प्राप्त होती है, जिनके चाप अथवा कोण क्रमश: लम्बांश और अक्षांश होते हैं। इससे प्रकट है कि उस स्थान A पर शंकु और कर्ण के बीच बनने वाला धनु या कोण उस स्थान का अक्षांश होता है। इसे प्राप्त करने की विधि इस प्रकार है। विषुव संक्रान्ति के दिन जब दिन रात बराबर होते हैं। अथवा यों कहें कि जिस दिन भूमध्य रेखा पर सूर्य सीधा अथवा लम्बवत् चमकता है, (स्पष्टत: उस दिन मध्याह्न में किसी सीधे शंकु या डण्डी की छाया बिल्कुल नहीं बनेगी) उस दिन उस भूमध्यरेखा से उत्तर या दक्षिण दिशा में किसी सुदूर स्थान पर 12 अंगुल की सीधी डण्डी अवनदध करते हैं। इससे उत्तर दिशा मे उत्तर कि ओर उस डण्डी की पलमा अथवा छाया पडेगी। अधिकाधिक उत्तर की ओर जाने पर यह छाया अधिकाधिक लम्बी होती जायगी इस डण्डी तथा धरती पर पडी छाया से जो कर्ण बनेगा, वह भूमध्य के सापेक्ष उस स्थान पर धरती के झुकाव को सूचित करेगा। अत: शंकु और कर्ण पर बनने वाला कोण ही वहां का झुकाव अथवा उस स्थान का अक्षांश सिद्ध होता है। किसी कोण को बनाने वाली दो सरल रेखाओं को चाहे जितना बढ़ाया जाय, उनसे कोणात्मक दूरी बदलती नही है केवल योजानात्मक दूरी बदलती है यह यहां धरती के केन्द्रबिन्दु से परिधि तक चलने वाली दो रेखाएं बहुत बड़ी है तथा शंकु और कर्ण की रेखाएं बहुत छोटी है। फिर भी इस शंकु कर्ण पर बनने वाला कोण तदनुरूप है, अत: धरती के अक्षांश के ठीक समतुल्य कोण को प्रकट करता है। इसे रेखा गणितीय नियमो के आधार पर भी सिद्ध किया जा सकता है। प्रस्तुत संलग्न चित्र में पृथ्वी के केन्द्रबिन्दु पर BQA कोण प्राप्त किया गया है, जो कि 30 अंश है। यही भूपरिधि के A बिन्दु का आक्षांश है। चित्र से स्पष्ट देखा जा सकता है कि इस A बिन्दु पर किसी शंकु को अवनद्ध करने पर जो छायाकर्ण बनता है, वह भी ठीक 30 अंश कोण बनाता है। इससे वराहमिहिर का यह कथन समुचित है कि यह कोण अक्षांश कोण को प्रकट करता है। चित्र से यह भी देखा जा सकता है कि भूमध्य रेखा B पर सूर्यकिरणें सीधी लम्बवत् पड़ रही है। छोटे त्रिभुज के छायाकर्ण QB पर भी वह सीधी पड़ रही है। परन्तु हमारी दृष्टि से QB छायाकर्ण टेढ़ा है तथा क्त्र शंकु सीधा है। यह QA शंकु QB छायाकर्ण के साथ उतना कोण बनाता है, जितना कोण भूमध्य रेखा B के सापेक्ष परिधि के A स्थान पर हम स्वयं प्राप्त करते है। अत: यही कोण अक्षांश कोण है।0,00%
  • 06:53नरेशों को द्रुहु का वंशज बताया गया है। ययाति के पांच पुत्रों में से एक द्रुहु था। ययाति के प्रमुख 5 पुत्र थे- 1.पुरु, 2.यदु, 3.तुर्वस, 4.अनु और 5.द्रुहु। इन्हें वेदों में पंचनंद कहा गया है। गांधार महाजनपद के प्रमुख नगर थे- आज के पाकिस्तान का पश्चिमी तथा अफगानिस्तान का पूर्वी क्षेत्र उस काल में भारत का गंधार प्रदेश था। आधुनिक कंदहार इस क्षेत्र से कुछ दक्षिण में स्थित था। अंगुत्तरनिकाय के अनुसार बुद्ध तथा पूर्व-बुद्धकाल में गंधार उत्तरी भारत के सोलह जनपदों में परिगणित था। सिकन्दर के भारत पर आक्रमण के समय गंधार में कई छोटी-छोटी रियासतें थीं, जैसे अभिसार, तक्षशिला आदि। मौर्य साम्राज्य में संपूर्ण गंधार देश सम्मिलित था। पुरुषपुर (आधुनिक पेशावर) तथा तक्षशिला इसकी राजधानी थी। इसका अस्तित्व 600 ईसा पूर्व से 11वीं सदी तक रहा। * कंबोज :आधुनिक अफगानिस्तान; राजधानी राजापुर। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार कंबोज जनपद सम्राट अशोक महान का सीमावर्ती प्रांत था। कंबोज देश का विस्तार कश्मीर से हिन्दूकुश तक था। इसके दो प्रमुख नगर थे राजपुर और नंदीपुर। राजपुर को आजकल राजौरी कहा जाता है। पाकिस्तान का हजारा जिला भी कंबोज के अंतर्गत ही था। कंबोज के पास ही गांधार जनपद था। कंबोज उत्तरापथ के गांधार के निकट स्थित था जिसकी ठीक-ठाक स्थिति दक्षिण-पश्चिम के पुंछ के इलाके के अंतर्गत मानी जा सकती है। वाल्मीकि रामायण के अनुसार कंबोज वाल्हीक और वनायु देश के पास स्थित है। आ‍धुनिक मान्यता के अनुसार कश्मीर के राजौरी से तजाकिस्तान तक का हिस्सा कंबोज था जिसमें आज का पामीर का पठार और बदख्शां भी हैं। बदख्शां अफगानिस्तान में हिन्दूकुश पर्वत का निकटवर्ती प्रदेश है और पामीर का पठार हिन्दूकुश और हिमालय की पहाड़ियों के बीच का स्थान है। कनिंघम ने अपने सुप्रसिद्ध ग्रंथ 'एंशेंट जियोग्राफी ऑव इंडिया' में राजपुर का अभिज्ञान दक्षिण-पश्चिम कश्मीर के राजौरी नामक नगर (जिला पुंछ, कश्मीर) के साथ किया है। यहां नंदीनगर नामक एक और प्रसिद्ध नगर था। सिकंदर के आक्रमण के समय कंबोज प्रदेश की सीमा के अंतर्गत उरशा (पाकिस्तानी जिला हजारा) और अभिसार (कश्मीर का जिला पुंछ) नामक छोटे-छोटे राज्य बसे हुए थे। जिन स्थानों के नाम आजकल काबुल, कंधार, बल्ख, वाखान, बगराम, पामीर, बदख्शां, पेशावर, स्वात, चारसद्दा आदि हैं, उन्हें संस्कृत और प्राकृत-पालि साहित्य में क्रमश: कुंभा या कुहका, गंधार, बाल्हीक, वोक्काण, कपिशा, मेरू, कम्बोज, पुरुषपुर (पेशावर), सुवास्तु, पुष्कलावती आदि के नाम से जाना जाता था। * कुरु :महाभारत काल के पूर्व दक्षिण कुरुओं का राज्य हिन्दुकुश के आगे से कश्मीर तक था। बाद में पांचालों पर आक्रमण करके उन्होंने अपना क्षेत्र विस्तार किया। महाभारत काल में कुरुओं का क्षेत्र था मेरठ और थानेश्वर के आसपास था क्षेत्र और राजधानी थी पहले ‍हस्तिनापुर और बाद में इन्द्रप्रस्थ। बौद्ध कल में यह संपूर्ण क्षेत्र कुषाणों के अधीन हो चला था। * पंचाल :बरेली, बदायूं और फर्रूखाबाद; राजधानी अहिच्छत्र तथा काम्पिल्य। इसके नाम का सर्वप्रथम उल्लेख यजुर्वेद की तैत्तरीय संहिता में 'कंपिला' रूप में मिलता है। पांडवों की पत्नी, द्रौपदी को पंचाल की राजकुमारी होने के कारण पांचाली भी कहा गया। कनिंघम के अनुसार वर्तमान रुहेलखंड उत्तर पंचाल और दोआबा दक्षिण पंचाल था। पांचाल को पांच कुल के लोगों ने मिलकर बसाया था। यथा किवि, केशी, सृंजय, तुर्वसस और सोमक। पंचालों और कुरु जनपदों में परस्पर लड़ाई-झगड़े चलते रहते थे। * कोशल: अवध; राजधानी साकेत और श्रावस्ती। * शूरसेन: मथुरा के आसपास का क्षेत्र; राजधानी मथुरा। * काशी :वाराणसी; राजधानी वाराणसी। * मगध :दक्षिण बिहार, राजधानी गिरिव्रज (आधुनिक राजगृह)। * वत्स :प्रयाग (इलाहाबाद) और उसके आसपास; राजधानी कौशांबी। * अंग :भागलपुर; राजधानी चंपा। * मत्स्य :जयपुर; राजधानी विराट नगर। * वज्जि :जिला दरभंगा और मुजफ्फरपुर; राजधानी मिथिला, जनकपुरी और वैशाली। * मल्ल :ज़िला देवरिया; राजधानी कुशीनगर और पावा (आधुनिक पडरौना) * चेदि :बुंदेलखंड; राजधानी शुक्तिमती (वर्तमान बांदा के पास)। * अवंति :मालवा; राजधानी उज्जयिनी। * अश्मक :गोदावरी घाटी; राजधानी पांडन्य।0,00%
  • 06:53कारणों से पतञ्जलि के समय आर्याव्रत की सीमाएं काफी सिकुड़ गई थी पतञ्जलि ने शक यवन किष्किन्धा गब्दिक और सौर्यकौंच को आर्याव्रत को सीमा से बाहर कहा एक किष्किन्धा गोरखपुर में था जिसे पाली साहित्य में खुखुन्दो कहा चंबा रियासत के गद्दी प्रदेश के प्राचीन नाम गाब्दिक था और वह पतञ्जलि के समय बाहर समझा जाता था किन्तु पाणिनि के समय गंधार से मगध तक संस्कृत भाषा का अखण्ड प्रवाह फैला हुआ था उसी समय प्राच्य और उदीच्य दो स्वाभाविक भाग माने जाते थे । ✍🏼प्रमोद कुमार अष्टाध्यायी में वर्णित भारत और प्रान्तों का भूगोल ================================== आचार्य पाणिनि ने अष्टाध्यायी में अनेक विधाओं का वर्णन किया है । उसमें न केवल व्याकरण है, अपितु उसमें दर्शन, आयुर्वेद, धर्म, संस्कृति, सभ्यता, इतिहास, भूगोल सब कुछ प्राप्य है । आज हम अष्टाध्यायी में वर्णित भारत के कुछ भागों का वर्णन करेंगे । (१.) कपिशी---- भारत के उत्तर-पश्चिम में कापिशी (४.२.९९) नगरी का उल्लेख है । प्राचीन काल में यह प्रसिद्ध राजधानी थी । यह काबूल से उत्तर में लगभग ५० मील दूर इसके अवशेष मिले हैं । इसे कपिशा भी कहा गया है । आजकल इसका नाम बेग्राम है । कापिशी से और भी उत्तर में कम्बोज (४.१.१७५) जनपद था, जहाँ इस समय दक्षिण एशिया का पामीर पठार है । कम्बोज के पूर्व में तारिम नदी के पास "कूचा" प्रदेश था, जिसे पाणिनि ने "कूच-वार" (४.३.९४) कहा है । (२.) मद्र जनपद---- तक्षशिला के दक्षिण-पूर्व में मद्र जनपद (४.२.१३१) था, जिसकी राजधानी शाकल (वर्त्तमान में स्यालकोट) थी । (३.) त्रिगर्त देशः--- मद्र के दक्षिण में उशीनर (४.२.११८) और शिवि जनपद थे । वर्त्तमान पंजाब का उत्तर-पूर्वी भाग जो चम्बा से कांगडा तक फैला हुआ है, प्राचीन त्रिगर्त देश था । इसका नाम त्रिगर्त इसलिए पडा, क्योंकि यह तीन नदियों की घाटियों में बसा हुआ था, ये तीन नदियाँ थीं--सतलुज, व्यास और रावी । (५.३.११६) (४. भरत जनपदः--- दक्षिण-पूर्वी पंजाब में थानेश्वर-कैथल-करनाल-पानीपत का भूभाग "भरत-जनपद" कहलाता था । इसी का दूसरा नाम प्राच्य भरत (४.२.११३) भी था, क्योंकि यहीं से देश के उदीच्य और प्राच्य इन दो खण्डों की सीमाएँ बँट जाती थीं । (४.) कुरु जनपदः--- दिल्ली-मेरठ का प्रदेश कुरु-जनपद (४.१.१७२) कहलाता था । इसकी राजधानी हस्तिनापुर थी (४.२.१०१) । अष्टाध्यायी (४.२.१०२) में उसका रूप हास्तिनपुर था । (५.) पञ्चाल जनपद---- गंगा और रामगंगा के बीच में प्रत्यग्रथ नामक जनपद (४.१.१७१) था, जिसे पञ्चाल जनपद भी कहते थे । (६.) कोशल और काशि--- मध्यदेश में कोशल (४.१.१७१) और काशि (४.२.११६) जनपद थे । (७.) मगध जनपद---- इसके पूर्व में मगध जनपद (४.१.१७०) था । (८.) कलिंग जनपद--- पूर्वी समुद्र तट पर कलिंग देश था, जहाँ इस समय महानदी बहती है । (९.) सूरमस जनपद---- सूत्र (४.१.१७०) में पाणिनि ने सूरमस जनपद का नामोल्लेख किया है । इसका पहचान असम प्रान्त की सूरमा नदी की घाटी और गिरि-प्रदेश से की जा सकती है । (१०.) कच्छ जनपद--- पश्चिम में समुद्र तटवर्ती कच्छ जनपद (४.२.१३३) था । (११.) अश्मक जनपद---- दक्षिण में गोदावरी तटवर्ती अश्मक जनपद (४.१.१७३) का नामोल्लेख भी हुआ है । अश्मक की राजधानी प्रतिष्ठान थी , जो गोदावरी के बाएँ किनारे, मुम्बई और हैदराबाद की सीमा पर वर्त्तमान पैठन है । कलिंग और अश्मक एक ही अक्षांश रेखा पर थे । इस प्रकार पश्चिम में कम्बोज (पामीर) से लेकर पूर्व में कामरूप असम के छोर तक के फैले हुए जनपदों का ताँता अष्टाध्यायी में पाया जाता है । उत्तर के पहाडों में हिमालय का नाम "हिमवत्" (४.४.११२) था । पाणिनि को भारतीय समुद्रों का भी परिचय था । किनारे के पास के द्वीपों को पाणिनि ने अनुसमुद्र द्वीप (४.३.१०) कहा है । जो वस्तुएँ इन द्वीपों में होती थीं, उन्हें "द्वैप्य" कहा जाता था । बीच समुद्र में स्थित द्वीपों में उत्पन्न वस्तुएँ "द्वैप" कहलाती थीं । अयनांशों के बीच के देशों के लिए पाणिनि ने अन्तरयन (८.४.२५) शब्द का प्रयोग किया है । कर्क के अयनांश रेखा कच्छ-भुज से आनर्त अवन्ती जनपदों को पार करती हुई सूरमस तक चली गई है । इसके दक्षिण में भारतवर्ष का भूभाग "अन्तरयन" कहलाता था । प्राचीन भारत के 16 महाजनपद की राजधानी को आज क्या कहते हैं? भारत के सोलह महाजनपदों का उल्लेख ईसा पूर्व छठी शताब्दी से भी पहले का है। ये महाजनपद थे- * गांधार :राजधानी तक्षशिला। पाकिस्तान स्थित पश्चिमोत्तर क्षेत्र रावलपिंडी से 18 मील उत्तर की ओर और इस्लामाबाद से 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। पाकिस्तान का पश्चिमी तथा अफगानिस्तान का पूर्वी क्षेत्र ही गांधार राज्य के अंतर्गत आता था। गंधार का अर्ध होता है सुगंध। गांधारी गांधार देश के 'सुबल' नामक राजा की कन्या थीं। क्योंकि वह गांधार की राजकुमारी थीं, इसीलिए उनका नाम गांधारी पड़ा। पुराणों (मत्स्य 48।6; वायु 99,9) में गंधार0,00%
  • 06:53पाणिनि कालीन भारत -------------@----------- पाणिनि सूत्रों में पठित निश्चित स्थान नामो की सहायता से पाणिनि कालीन भौगोलिक बिस्तार का परिचय मिलता है उत्तर पश्चिम में कापिषी(४/२/६९) का उल्लेख मिलता है यह नगरी प्राचीन काल में अतिप्रसिद्ध राजधानी थी काबुल से लगभग ५० मिल उत्तर इसके प्राचीन अवशेष मिलते है यहाँ से प्राप्त एक शिलालेख में इसे कपिषा कहा गया है आजकल इसका नाम बेग्राम है कापिषि से भी और उत्तर में कम्बोज (४/१/१७५ पा ०सूत्र) जनपद था जहाँ इस समय मध्य एशिया का पामीर पठार है कम्बोज के पूर्व में तारिम नदी के समीप कूचा प्रदेश था जो सम्भवतः वहीँ है जिसे पाणिनि ने कुच वार (४/३/९४) में कहा है तक्षशिला के दक्षिण पूर्व में मद्र जनपद (४/२/१३१) था जिसकी राजधानी शाकल (बर्तमान) स्यालकोट थी मद्र के दक्षिण में उशीनर (४/२/११८) और शिबि जनपद थे बर्तमान पंजाब का उत्तर पूर्वी भाग जो चंबा से कांगड़ा तक फैला हुआ है प्राचीन त्रिगर्त देश था सतलुज,व्यास,और रावी,इन तीन नदियों की घाटियों के कारण इसका नाम त्रिगर्त पड़ा (पा०सूत्र ५/३/११६)दक्षिण पूर्व पंजाब में थानेश्वर कैथल करनाल पानीपत का भूभाग भरत जनपद था इसी का दूसरा नाम प्राच्य भरत (पा०सूत्र ४/२/११३) भी था क्यों की यहीं से देश के उदीच्य और प्राच्य इन दो खण्डों की सीमाएं बंट जाती थी दिल्ली मेरठ का प्रदेश कुरु जनपद (४/१/१७२) कहलाता था उसकी राजधानी हस्तिनापुर था अष्टाध्यायी में उसका रूप हस्तिनापुर (४/२/१०१) है गंगा और रामगंगा के बीच में प्रत्यग्रथ नामक जनपद(४/११७१) था जिसे पांचाल भी कहा जाता था मध्यप्रदेश में कोशल (४/१/१७१) और काशी (४/२/११६) जनपदों का नाम उल्लेख किया गया है इससे पूर्व में मगध (४/१/१७०) जनपद था पूर्वी समुद्र तट पर कलिंग देश था इस समय महानदी बहती है (४/१/१७०) में पाणिनि में सुरमस जनपद का नामोउल्लेख किया है इसकी पहचान असम प्रांत की सुरमा नदी की घाटी और गिरी प्रदेश से की जा सकती है इस प्रकार पश्चिम में कम्बोज (पामीर) से लेकर पूरब के कामरूप असम के छोर तक फैले हुए जनपदों का तांता अष्टध्य्यायी में पाया जाता है पश्चिम के समुद्रतटवर्ती कच्छ जनपद (४/२/१३३) और दक्षिणमे गोदावरी तटवर्ती अस्मक जनपद (४/१/१७३) का भी नामोउल्लेख था अस्मक की राजधानी प्रतिष्ठान थी जो गोदावरी के बाएं किनारे बम्बई और हैदराबाद की सीमा पर बर्तमान पैठण है कलिंग और अस्मक एक ही अक्षांश रेखा पर थे उत्तर के पहाड़ में हिमालय का नाम हिमवत (४/४/११२) आया है पाणिनि को भारतीय समुद्रों का भी परिचय था कर्क की अयनांश रेखा कच्छ भुज से अनार्ट अवंति जनपदों को पार करती हुई सुरमस तक चली गई है इसके दक्षिण में भारतवर्ष का भूभाग अंतरयन कहलाता था पाणिनि ने देश के उदीच्य और प्राच्य इन दो भागो का उल्लेख किया है इन दोनों के बीच भरत जनपद था जहाँ इस समय कुरुक्षेत्र है प्राच्य भरत पद पर पतञ्जलि ने लिखा है कि वस्तुतः प्राच्य देश भरत के पूरब से प्रारम्भ होता था पाणिनि ने शरावती नदी का उल्लेख (शारदीनां च ६/३/१२०)किया है नागेश के एक प्राचीन श्लोक का प्रमाण देते हुए लिखा है कि शरावती प्राच्य और उदीच्य देशों की बिच की सीमा थी अमरकोश से ज्ञात होता है कि गुप्त काल में भी शरावती उदीच्य और प्राच्य के बीच की सीमा मानी जाती थी और वही प्राची और उदीच्य की सीमा को अलग करती थी पाणिनि की दृष्टि में प्राच्य और उदीच्य दोनों प्रदेशो में बोली जाने वाली भाषा शिष्टसम्मत थी उसके शब्द ब्याकरण के बिषय थे शब्दो के शुद्ध रूप जानने के लिए जिस लोक का प्रमाण दिया जाता था वह यही था गांधार और वाहीक दोनों मिलकर उदीच्य कहलाते थे सिंधु और शतद्रु तक का प्रदेश वाहीक था जिसके अंतर्गत मद्र उशीनर और त्रिगर्त थे तीन मुख्य भाग थे तक्षशिला से काबुल तक का प्रदेश गांधार कहलाता था पाणिनि की समकालीन संस्कृत भाषा का क्षेत्र गांधार से प्राच्य तक फैला हुआ था पाणिनि लगभग पांचवी शताब्दी बिक्रम पूर्व में हुए थे उसके लगभग दो शती पीछे यवनों का और शको का आगमन इस देश में हुआ था शक और यवन के कारण बाल्हीक और गंधार प्रदेश भारतवर्ष के राजनैतिक सिमा से कुछ काल के लिए अलग हो गए थे और उसके साथ संस्कृत सम्बन्ध में ढील पड़ने लगे थे और इस लिए पतञ्जलि भाष्य में शक और यवनों के प्रदेश को आर्याव्रत को बाहर कहा और भाषा भेद के कारण उन्हें शिष्ट संस्कृत क्षेत्र से अलग समझा पतञ्जलि के दृष्टि में आर्याव्रत की शिष्टजनो की भाषा प्रतिमानित संस्कृत थी और तत्कालीन संकुचित आर्यवर्त हिमालय के दक्षिण परियात्र पर्वत के उत्तर आदर्श के पूर्व और कालक वन पश्चिम अवस्थित था आदर्श प्रायः आदर्शन या सरस्वती नदी को सुख जाने (विनशन) का प्रदेश समझाजाता है किन्तु काशिका में उसे एक जनपद के नाम से कहा गया है (४/२/१२४) और नागेश ने उसे कुरुक्षेत्र की पहाड़ी कहा है कालका वन पाली साहित्य के अनुसार साकेत एक भाग था इस प्रकार हम देखते है की राजनैतिक0,00%
  • 17 авг.पिघल गया? #लेकिन ऐसे मजाक के प्रतिकार के लिए शिवत्व को रूद्रत्व में बदलने की आवश्यकता है। ✍🏻 डा.मधुसूदन उपाध्याय लखनऊ0,00%
  • 17 авг.कालिदास भारतीय साहित्य परम्परा में शलाका पुरुष हैं। कालिदास शिवभक्त थे, हालांकि उनके शाक्त झुकाव के अभिमत भी प्राप्त होते हैं। वे ऋग्वेद की परम्परा बढ़ाते हुए "कुमारसम्भव" में कहते हैं, "ब्राह्मा, विष्णु, महेश एक ही मूर्ति के तीन रूप हैं। कभी शिव विष्णु से बढ़ जाते हैं, कभी ब्रह्मा इन दोनों से और कभी ये दोनों ब्रह्मा से बढ़ जाते हैं।" यहीं कालिदास ब्रह्मा के मुंह से शिव महिमा कहलवाते हैं, "शंकर अन्धकार से पार रहने वाले परमतेज हैं। अविद्या उन्हें छू नहीं पाती। हम और विष्णु उनकी महिमा का ठिकाना नहीं लगा पाये।" रघुवंश के पहले श्लोक में कालिदास शिव पार्वती का स्मरण करते हैं। #कालिदास शिवभक्त थे, ब्रह्मवादी थे, ब्रह्म को शिव मानते थे। तुलसीदास भी दार्शनिक स्तर पर ब्रह्मवादी थे। रामभक्त थे, समूची सृष्टि का सियाराममय देखते थे, लेकिन उन्होंने अपने आराध्य श्रीराम से शंकर की उपासना करवाई और "शिवद्रोही मम दास कहावा सो नर सपनेहुं मोहि न पावा" की बात स्वयं श्रीराम ने कही। #महाभारत की रचना तुलसी की रामचरित मानस से पुरानी है। बेशक रामकथा त्रेता की है, महाभारत उसके बाद द्वापर की। जैसे भगवान श्रीराम परमात्म -पुरुष होकर भी शिव उपासक हैं, वैसे ही भगवान श्रीकृष्ण भी शिव उपासक थे। महाभारत के अनुशासन पर्व में कृष्ण की शिव उपासना का प्रीतिकर वर्णन है। कृष्ण की एक पत्नी जाम्वती के पुत्र नहीं हुए। कृष्ण पुत्र की इच्छा से तप के लिए हिमालय गये। उनकी भेंट शिवभक्त उपमन्यु से हुई। उपमन्यु ने कृष्ण को बताया "आप भगवान शिव को खुश कीजिए। इसमें कोई संशय नहीं आप अपने समान पुत्र पायेंगे।" (अनुशासन पर्व 14.68-70) भारतीय देवतंत्र के सारे देवता ऋग्वैदिक काल से ही अमृत बन्धु हैं। वे अमर हैं परन्तु शिव की बात दूसरी है वे पाशुपत अस्त्र से युक्त हैं। इस अस्त्र के लिए ब्रह्मा विष्णु भी अबध्य नहीं हैं। (वही : 264)। #परशुराम को भी शिव ने ही परशु दिया था। सभी देवता शिव को वरिष्ठ मानते हैं। ब्रह्मा ने रथंतर साम के जरिए शिव आराधना की। इन्द्र ने शतरूद्री पढ़ी (14.282-84) सो कृष्ण ने उपमन्यु से शिव स्तुति की सीख ली, तप किया। कृष्ण को शिव के दर्शन मिले। कृष्ण ने कहा, "सहस्त्रों सूर्यों का सा तेज दिखाई पड़ा।" अर्जुन ने कृष्ण का विश्वरूप देखकर जो शब्द कहे थे, ठीक वही शब्द "दिव्य सूर्य सहस्त्राणि" कृष्ण ने शिव दर्शन के बाद कहे। फिर कहते हैं "जब मैंने भगवान हर (शिव) को देखा, मेरे रोंगटे खड़े हो गए। 12 आदित्य, 8 वसु, विश्वेदेव, अश्विनी कुमार आदि देव महादेव की स्तुति कर रहे थे। इन्द्र और विष्णु अदिति और ब्रह्मा शिव के निकट रथंतर सामगान कर रहे थे।" (14.386-92) यहां कृष्ण ऋग्वैदिक परम्परा वाले देवताओं के नाम दुहराते हैं। कहते हैं, "पृथ्वी, अंतरिक्ष, ग्रह, मास, पक्ष, ऋतु संवत्सर, मुहूर्त निमेष, युग चक्र तथा दिव्य विद्याएं शिव को नमस्कार कर रहे थे।" #यहां विज्ञान की ताजी टाइम-स्पेस दिक्काल धारणा साफ है। काल की छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी इकाई शिव आराधक हैं। शिव महाकाल हैं। शिव ने कृष्ण से कहा, "तुमने पहले भी सैकड़ों-हजारों बार मेरी आराधना की है।" (वही) वैदिक परम्परा के सारे देवता परम ऐश्वर्यवान हैं। अग्नि, इन्द्र, विष्णु, मरूद्गण और अश्विनी कुमार भी सारी सृष्टि को प्रभावित करते हैं। अदिति को ही देखिए, "अदिति: द्यौ:, अदिति: अंतरिक्ष- अदिति द्यावा है, अदिति अंतरिक्ष है।" अदिति: माता, स: पिता, स: पुत्र: अदिति: विश्वे देवा: और जो कुछ पीछे हुआ, आगे होगा वह भी अदिति। (ऋ.1.89.10) यही स्थिति वाणी देवी की भी है। वाणी सारे भुवनों को धारण करती है। अदिति की जगह शिव या अन्य कोई भी नाम रख दें, तत्व निरूपण वही होगा। #ऋग्वैदिक ऋषियों ने छोटे बड़े देवता नहीं देखे, जिन्हें देखा, पूरा का पूरा देखा। भारत के सुदूर अतीत में दिव्य दृष्टि और प्रीतिकर सत्य खोजी परम्परा है। उसी परम्परा का पाथेय लेकर हम सबको सामाजिक पुनर्गठन के आदर्श लेने चाहिए। सम्प्रति भारत को एक जन, एक संस्कृति, एक राष्ट्र न मानने वाली शक्तियां यहां के देव प्रतीकों, आस्था और आस्था केन्द्रों पर आक्रामक हैं और भारतीय परम्परा का मजाक बनाती हैं। भारतीय संस्कृति का रूप विधान सत्य, शिव और सुन्दर है। इसका शिव प्रतीक लिंग रूपा है। बड़े हिम्मतवर थे हमारे पूर्वज, शिव को लिंग रूप में देखा और पूजा। #इसी परम्परा में इसी तरह की हिम्मत और आस्था से ओत-प्रोत लाखों श्रद्धालु आज भी कष्टसाध्य यात्रा करते हुए जान की बाजी लगाकर अमरनाथ दर्शन को जाते हैं, वे बर्फ का शिवलिंग ही नहीं देखने जाते। बर्फ अस्थाई रूप है, बर्फ पानी बनती ही है। पानी भी अस्थाई रूप है, वह भाप बनता है। रूप बदला करते हैं, अरूप जस का तस रहता है। रूप देखा जाता है, अरूप का दर्शन होता है। जाहिर है कि दर्शन का मतलब सिर्फ देखना नहीं होता। दर्शन आत्मिक अनुभूति है। क्या हुआ जो बर्फ का शिवलिंग0,00%