जन चेतना जागरूकता अभियान
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*क्रांति का वास्तविक और प्रभावी स्वरूप:-* 🎯✅💯🙏🌹 *क्रांति किसी नेता के नेतृत्व में नहीं आएगी...।* *क्रांति तब आएगी जब हम खुद का नेतृत्व करना सीख लेंगे..।* --- *सदियों से हमें सिखाया गया है कि:-* कोई आएगा। कोई मसीहा आएगा, कोई नेता आएगा, कोई अवतार आएगा, जो हमारी सारी समस्याओं को खत्म कर देगा...। हम इंतजार में बैठे रहते हैं...। हम आंखें लगाए देखते हैं कि *कोई मंच पर चढ़े, नारा लगाए और हम उसके पीछे चल पड़ें...।* लेकिन *इतिहास गवाह है:-* नेताओं के भरोसे आई क्रांतियां ज्यादा दिन टिकी नहीं। नेता बदल जाते हैं, कुर्सियां बदल जाती हैं, झंडे बदल जाते हैं, पर व्यवस्था वहीं की वहीं रह जाती है... क्योंकि हम खुद को नहीं बदलते। हमने सिर्फ अपने मालिक बदले हैं...अपनी गुलामी नहीं छोड़ी। *असली क्रांति कभी बाहर से नहीं आती..।* *असली क्रांति अंदर से शुरू होती है...।* जब हर आम आदमी रोज सुबह उठकर यह तय करे कि:- आज मैं किसी का अंधभक्त नहीं बनूंगा..। मैं सवाल पूछूंगा..। मैं आंख बंद करके ताली नहीं बजाऊंगा...। *खुद का नेतृत्व करना क्या है...?* *इसका मतलब है अपनी जिम्मेदारी खुद लेना...।* इसका मतलब है यह मान लेना कि मेरे जीवन की बर्बादी के लिए सिर्फ सरकार, सिस्टम या किस्मत जिम्मेदार नहीं है। मेरी चुप्पी भी जिम्मेदार है। जब सड़क पर कचरा फेंका जा रहा था तब मेरी चुप्पी, जब रिश्वत ली जा रही थी तब मेरी चुप्पी, जब गलत को सही कहा जा रहा था तब मेरी चुप्पी। *खुद का नेतृत्व करने वाला इंसान भीड़ नहीं बनता...।* 🎯 *ऐसा व्यक्ति बनता है जो भीड़ में भी अकेला खड़े होकर सवाल पूछने की हिम्मत रखता है...।* 🎯 जब सब एक तरफ भाग रहे होते हैं तो वह रुककर पूछता है - 🎯 *क्यों....?* *यह सवाल ही क्रांति की पहली ईंट है...।* 🎯 हम सोचते हैं क्रांति का मतलब है सड़क जाम करना, नारे लगाना, झंडे जलाना। नहीं...। 🎯 *क्रांति का सबसे बड़ा रूप है:-* अपने आप को अनुशासित करना..। समय पर उठना, अपना हर काम ईमानदारी से करना, अपने बच्चों को नफरत नहीं, सोचने की ताकत सिखाना, अपने गली मोहल्ले को साफ रखना। व्यवस्थाओं पर चर्चा करना । ये छोटे काम लगते हैं, पर यही बड़े बदलाव की नींव हैं...। 🎯✅💯 *जब तक हम हर चीज के लिए नेताओं या पार्टियों की तरफ देखेंगे तो हम कमजोर ही रहेंगे...।* 1️⃣2️⃣3️⃣ नेता हमें कहेगा क्या सोचना है..? क्या पहनना है..? किससे नफरत करनी है..? और किसे भगवान मानना है...? और हम मान लेंगे.... क्योंकि *सोचना मुश्किल काम है....खुद का नेतृत्व करना सबसे मुश्किल काम है...।* लेकिन जिस दिन हर गली में, हर घर में एक ऐसा व्यक्ति पैदा हो गया जो खुद का नेता बन गया, उस दिन किसी बड़े नेता की जरूरत नहीं रहेगी...। 🙈🙉🙊 *उस दिन किसान यह नहीं पूछेगा कि उसकी फसल का दाम कौन तय करेगा, वह खुद तय करना सीख लेगा..।* 🎯 *उस दिन युवा नौकरी के लिए किसी पार्टी के दफ्तर के चक्कर नहीं लगाएगा, वह खुद अपना रास्ता बनाएगा।* 🎯 *उस दिन औरत अपनी इज्जत के लिए किसी कानून का इंतजार नहीं करेगी, समाज को मजबूर कर देगी कि वह उसे सम्मान दे...।* 🎯 *वो क्रांति शोर नहीं करेगी, वो शोर मचाने वालों को खामोश कर देगी।* *वो खून से नहीं, पसीने से लिखी जाएगी...।* इसलिए किसी का इंतजार मत करो..। *दूसरा कोई नहीं आने वाला..।* *तुम्हें ही उठना होगा..।* *तुम्हें ही अपना दीया खुद बनना होगा..।* *तुम्हें ही अपना नेता खुद बनना होगा..।* और *जिस दिन तुमने खुद का नेतृत्व करना सीख लिया, समझ लेना, क्रांति शुरू हो चुकी है...।* 🌹🙏🌹
https://www.facebook.com/share/p/1DZCVL8Mhf/ *पूरी मानव जाति के लिए अंतिम चेतावनी:- हिंदी अनुवाद सहित ।*
जीवन मंत्र:- जीवन का मौलिक ज्ञान जिसे सीखने के लिए किसी डिग्री की नहीं बल्कि क्रिटिकल और क्रियेटिव थिंकींग यानि सोचने समझने की क्रियात्मक क्षमता होना पर्याप्त है । भय, चिंता, क्रोध, अहंकार और भाग दौड़ से रहित आनंदपूर्ण जीवन । अगर आप जीवन को जीना चाहते हैं तो पहले जीवन का वास्तविक अर्थ और लक्ष्य जानने का प्रयास करें ।
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नैनोबोट्स, नैनो टेक्नोलॉजी:- mRNA Bio-Weapons:- जब नैनोबॉट्स खून में घूम रहे होते हैं तो तुम उन्हें देख भी नहीं सकते...। वे अरबों की संख्या में हो सकते हैं। कल्पना करो... तुम गुस्सा महसूस करते हो और अचानक वह गायब हो जाता है..। तुम डर महसूस करते हो और अचानक शांति आ जाती है...। लेकिन वह शांति तुम्हारी नहीं होती — वह प्रोग्राम की हुई होती है...। तुम्हारा शरीर अब तुम्हारा नहीं। तुम्हारा मस्तिष्क अब तुम्हारा नहीं। तुम्हारी भावनाएँ अब तुम्हारी नहीं। सब कुछ सिस्टम का हो जाता है। ◉ स्वैच्छिकता का मुखौटा कब तक..? ◉ लोग कहते हैं — स्वीडन में कोई ज़बरदस्ती नहीं हुई...। लेकिन सोचो... जब नौकरी के लिए चिप अनिवार्य होगी..? जब बैंक खाता खोलने के लिए चिप चाहिए होगी...? जब अस्पताल में भर्ती होने के लिए चिप माँगी जाएगी..? जब बच्चों के स्कूल में चिप लगवानी पड़ेगी..? जब बिना चिप के ट्रेन में नहीं बैठ पाओगे? बाज़ार से सामान नहीं खरीद पाओगे..? तब तुम क्या करोगे...? विरोध भी प्रतिबंधित होगा क्योंकि सिस्टम जानता होगा कि तुम कहाँ हो....? सिस्टम जानता होगा कि तुम क्या सोच रहे हो..? सिस्टम जानता होगा कि तुम्हारा दिल कितनी तेज़ धड़क रहा है...? और अगर तुम्हारा दिल गलत लय में धड़के — यानी तुम डर जाओ या गुस्सा हो जाओ — तो सिस्टम तुम्हें संदिग्ध मान लेगा...। खाता फ्रीज़... आवाजाही सीमित... सामाजिक रूप से अलग-थलग...। Social Distancing सब कुछ चुपचाप...। बिना किसी हथियार के। सिर्फ कोड के माध्यम से। 💻 ✦ अंतिम परत ✦ यह सब एक संकट के माध्यम से आएगा...। भय पैदा किया जाएगा...। लोग स्वीकार करने के लिए मजबूर होंगे..। कोविड ने सिखा दिया कि कैसे डर फैलाया जा सकता है..? कैसे लोग अपनी आज़ादी के टुकड़े एक-एक करके सौंप देते हैं...? जैसे आज एक्सपेरिमेंटल वैक्सीनेशन को अधिकांश लोग सामान्य मानते हैं..। अगला संकट पिछले से बड़ा होगा और उस संकट के बाद हाथ में चिप सामान्य हो जाएगी। फिर न्यूरालिंक ब्रेन चिप और नैनोबॉट्स। टेथर जैसी कंपनियाँ ब्रेन-चिप में करोड़ों लगा रही हैं...। यूरोपीय निवेश बैंक ग्राफीन इम्प्लांट्स को फंड कर रहा है...। सरकारें डिजिटल ID digital पहचान को बढ़ावा दे रही हैं...। सब एक दिशा में और वह दिशा तुम्हारी आज़ादी की ओर नहीं है.....। दुनिया के मुखौटे उतरने शुरू हो गये हैं....! सुविधा का मुखौटा... प्रगति का मुखौटा... मदद का मुखौटा... स्वास्थ्य का मुखौटा... उसके नीचे नियंत्रण का चेहरा है:- निगरानी का चेहरा है... स्वतंत्रता की हत्या का चेहरा है और सबसे डरावनी बात यह है कि बहुत से लोग अभी भी मुस्कुरा रहे हैं..। वे चिप लगवा रहे हैं...। वे न्यूरालिंक का इंतज़ार कर रहे हैं...। वे ग्राफीन टैटू को फैशन समझ रहे हैं...। वे नहीं जानते कि एक दिन उनकी सोच भी सिस्टम की प्रॉपर्टी बन जाएगी...। रात अभी भी गहरी है लेकिन अब अँधेरा सिर्फ बाहर नहीं... वह शरीर के अंदर घुस चुका है...। त्वचा के नीचे... खोपड़ी के अंदर... खून में... और अंत में... आत्मा में...। 🕳️
Next Level of GenZs Questions:- इस लड़के ने एक नई और स्वाभाविक बहस को जन्म दिया है.... जिसके बारे में बात करना अश्लील माना जाता है, इसे माता पिता का अपमान समझा जाता है या इस विषय को लेकर कोई चर्चा नहीं करना चाहता । ये सवाल पहले भी बहुत बार पूछा गया है... लेकिन इस तरह से इसे ट्रोल और वायरल करने का मौका नहीं आया था..। अधिकांश संस्कृति और सभ्यता की दुहाई देने वाले लोग इस लड़के को ट्रोल कर रहे हैं.... जबकि ये सवाल संस्कारों और सभ्य व्यवहार से आगे का प्रश्न है । कुछ सवाल:- कितने लोग परमिशन लेकर धरती पर आते हैं ? कितने पति पत्नी पूरी तैयारी के साथ एक नये जीवन को धरती पर लाने का कार्य करते हैं ? सच्चाई यही है कि अधिकांश लोग शरीर के आनंद के लिए संभोग करते हैं जिसके परिणामस्वरूप बच्चे पैदा हो जाते हैं । सनातन संस्कृति में जब तक गर्भाधान संस्कार का अनुसरण किया जाता था...तब इसे आंशिक रूप से स्वीकार किया जा सकता था लेकिन वर्तमान समय और परिस्थितियों में ऐसे संस्कार लगभग समाप्त हो चुके हैं सिर्फ जन्म संस्कार और अंतिम संस्कार बचे हैं...। बहुत कम लोग इस लड़के के सवाल से सहमत हैं लेकिन वो भी असली सवाल को नजरंदाज कर रहे हैं । कोई भी इंसान धरती पर किसी की अनुमति लेकर नहीं आता लेकिन अधिकांश माता पिता खासकर शहरी माहौल में रचे बसे माता पिता सिर्फ कार्पोरेट शक्तियों की गुलामी करने के लिए बच्चे को पैदा करते हैं..., पालते हैं और पढ़ाते हैं....। उनके कंधों पर अपने सपनों का पहाड़ लाद देते हैं । जिस कारण से बच्चे अपना नैसर्गिक जीवन जीने से वंचित हो जाते हैं..., अवसाद और अलगाव से भर जाते हैं... और दुर्भाग्यवश ऐसे माता पिता और बच्चों की संख्या करोड़ों में है । ये सवाल उन्ही माता-पिता से है और हमेशा रहेगा कि अगर बच्चों को गुलाम ही बनाना है तो बच्चे पैदा मत करो । इससे अगले लेवल के प्रश्न इसके बाद शुरू होंगे कि अगर हम उस डिवाइन क्रियेटर की मर्जी से धरती पर आए हैं तो क्या कार्पोरेट के गुलाम प्यादों की मानसिकता वाले हमारे माता पिता के अप्रासंगिक और अप्राकृतिक सपनों को पूरा करने के लिए की जाने वाली गुलामी के लिए आए थे...? या अपनी चेतना में सुधार के साथ... अपनी ऊर्जा के पोषण के साथ... अपनी आत्मा के उत्थान के प्रयास के लिए आए थे ? GenZs उन सवालों को भी निःसंकोच होकर पूछ लेते हैं जिनके लिए हमारी 40-50 साल वाली पीढ़ी यानि मिलेनियल जनरेशन को सरेआम कूटा जा सकता था...। इस लड़के ने सही सवाल पूछा है क्योंकि ये उस श्रेणी के माता पिता का बेटा है जो सरकारों और कार्पोरेट की गुलामी को सफलता समझते हैं । लेकिन हमारा सवाल इससे अगले लेवल का होना चाहिए कि क्या परमात्मा द्वारा दिए गए जीवन को चलाने के लिए हमें प्रकृति प्रदत्त संसाधनों की जरूरत है या सरकारों और कार्पोरेट की गुलामी की...? इससे अगले स्तर के प्रश्न हैं:- बच्चों के जन्म की प्रक्रिया को डिलीवरी ही क्यों कहा जाता है ? कार्पोरेट लॉबी द्वारा संचालित सरकारें क्यों चाहती है कि हर बच्चे का जन्म हॉस्पिटल में ही हो ? बच्चे के जन्म पर उसका रजिस्ट्रेशन और पैरों के निशान लेने की प्रक्रिया की वास्तविकता क्या है ? जब बच्चे को प्रकृति से जुड़ने की सबसे ज्यादा जरूरत होती है तो उसे नर्सरी, बाल-बाड़ी, आंगनबाड़ी और इश्कूल में भेजने की जल्दबाजी क्यों की जाती है ? और ये सवाल सिर्फ Gen-Z & Gen-alpha पूछ सकते हैं.... मिलेनियल ने पूछे होते तो आज ऐसे सवाल पैदा ही न होते । मैं इस लड़के के समर्थन में हूं... इस विषय पर आपके क्या विचार हैं ?
Next Level of GenZs Questions:-
⑤ नितांत अकेले होने का खालीपन सहना:— पिशाच हटेगा तो खालीपन आएगा..। यही सबसे कठिन परीक्षा है..। इसी खालीपन से डरकर लोग वापस लौट जाते हैं..। ठहर गए तो वही खालीपन तुम्हारी अपनी शुद्ध ऊर्जा से भर जाएगा...। --- ❖ अंतिम सत्य ❖ कुछ रिश्ते हमेशा के लिए नहीं होते..। कुछ सबक दोहराने नहीं, भ्रमों को तोड़ने के लिए भी आते हैं..। सजग सचेत और जागरूक रहें:- अज्ञान का अंधेरा अभी भी गहरा है..। जंजीरें अभी भी कहीं छिपी हैं...। मंदिर-मस्जिद-चर्च से संसद तक ऊर्जा-पिशाच पूरी तरह से सक्रिय हैं — धर्मगुरु, कथावाचक और नेता-मंत्री के रूप में लेकिन अब तुम्हारे हाथ में रोशनी है। और वह रोशनी...जो तुम्हारी अपनी है...। ✦ ✦ Skip the Matrix of illusions and Deep Psychological Mind Programming based Control and Slavery...! Save Your Energy.....Save Your Soul....! 🎯✅💯
सोल कॉन्ट्रैक्ट – आत्मा का अनुबंध 🎯 आत्मा कैसे बिक जाती है...? हमारी जानकारी के बिना... लेकिन हमारी सहमति से हमारे समय और ऊर्जा को खरीद लिया जाता है और अदृश्य जंजीरें हमारी आत्मा को बाँध लेती हैं । कुछ अनुबंध कागज़ पर नहीं लिखे जाते। वे रक्त से भी नहीं...। वे ऊर्जा से लिखे जाते हैं..। जन्म से पहले, किसी ऐसी जगह पर जहाँ प्रकाश और अँधेरा एक-दूसरे को देख सकते हैं, जहाँ समय रुक जाता है — वहाँ आत्माएँ बैठकर अपने आने वाले जीवन के हर घाव, हर धोखे और हर भूखे रिश्ते का फैसला करती हैं...। यह कोई साधारण वादा नहीं..। यह एक जंजीर है..। कभी प्रेम की, कभी कर्म की, और कभी... किसी ऐसी चीज़ की जो आपकी ऊर्जा पर पलती है...। --- ✧ पृथ्वी — सबसे कठिन परीक्षा ✧ पृथ्वी पर अवतार लेना आसान नहीं। यह ब्रह्मांड का सबसे घना, सबसे भूलने वाला ग्रह है..। यहाँ जन्म से पहले आपकी आत्मा तय करती है — ⊹ कौन से माता-पिता होंगे...? ⊹ किस भूमि की मिट्टी आपके पैरों तले होगी...? ⊹ कौन से घाव दोबारा खुलेंगे...? ⊹ और कौन सी आत्माएँ आपके ऊर्जा क्षेत्र में प्रवेश करेंगी..? आपने सब चुना, क्योंकि आपकी आत्मा जानती थी — बिना आग के आप जाग नहीं सकते.. पर हर आत्मा ईमानदार नहीं होती..। कुछ सिर्फ भूख लेकर आती हैं...। ✧ कर्म का हिसाब ✧ कुछ अनुबंध प्रेम के लिए नहीं, हिसाब चुकाने के लिए होते हैं..। पिछले जन्म में आपने जिसे तोड़ा, वह इस जन्म में पति, पत्नी, दोस्त, बॉस या अपने बच्चे के रूप में सामने खड़ा है..। आप जानते हैं कुछ गलत है, फिर भी छोड़ नहीं पाते...। क्योंकि अनुबंध अधूरा है और अधूरा कर्म... भूखा रहता है..। हर बार जब आप लौटते हैं, जंजीर और कस जाती है...। ✧ जब अनुबंध टूटने लगता है ✧ जब जागरूकता बढ़ती है, तो पुराने अनुबंध पकड़ खोने लगते हैं। ⊹ पुराना चुंबकीय आकर्षण गायब हो जाता है । ⊹ बातचीत नीरस लगने लगती है । ⊹ सपने में संदेश आता है — "यह अध्याय खत्म हो चुका है" ⊹ जीवन की कल्पना में हल्कापन लगता है उस क्षण जो कर्मिक था, वह तटस्थ हो जाता है...। जो दर्द था, वह ज्ञान बन जाता है...। --- ❖ दानव और पिशाच में अंतर ❖ लोग समझते हैं "शैतान से सौदा" और "आत्मा का अनुबंध" एक ही है। नहीं। ☾ देव — दिव्य ज्योतिर्मय प्राणी। स्रोत से जुड़े हैं। वे शक्ति नहीं चूसते, वे जलाते हैं ताकि अशुद्धि मिटे..। वे सिखाते हैं — संप्रभुता और आत्म-नियंत्रण। ☠ पिशाच — स्रोत से कटे हुए। ये आपकी ऊर्जा पर जीते हैं। ये रूप बदलकर व्यवस्थाओं को आकार देते हैं... और उनके माध्यम से आपकी ऊर्जा का शोषण करते हैं । --- ✦ मंदिर-मस्जिद से संसद तक : ऊर्जा-पिशाच ✦ ये ऊर्जा-पिशाच सिर्फ अदृश्य लोक में नहीं हैं...। वे आज धर्मगुरु, कथावाचक और नेता या मंत्री के रूप में उतरते हैं...। ⊹ धर्मगुरु / कथावाचक — मंच से कथा सुनाते हैं, भक्ति का पाठ पढ़ते हैं लेकिन इसके पीछे भी लाखों करोड़ों का धंधा बुलंद होता है । ⊹ नेता-मंत्री — वादे करते हैं, सेवा का ढोंग रचते हैं, और आपकी उम्मीदों की ऊर्जा चूसते हैं। ⊹ मंदिर-मस्जिद से संसद तक — पूजा-पाठ, सेवा और देशभक्ति के नाम पर वे आपकी आत्मा से जुड़ जाते हैं.. बड़े बड़े वादों के साथ। मनमोहन नारों के साथ । नये नये चेहरों के साथ । वह अनुबंध कागज़ पर नहीं लिखा जाता...। वह आपकी ऊर्जा पर लिखा जाता है...। मंदिर-मस्जिद से संसद तक: ऊर्जा-पिशाच — Soul Harvester Parasites यही सोल कॉन्ट्रैक्ट का सबसे डरावना रूप है। ✧ अनुबंध के प्रकार ✧ ❖ कर्मिक अनुबंध — सबसे भारी, अदृश्य जंजीरें, पिछले जन्मों का हिसाब ❖ आत्मा साथी — प्रेम और विकास के लिए । ❖ शिक्षक-छात्र — ज्ञान के लिए ❖ पारिवारिक / पैतृक — प्रेम , दर्द और वफादारी के लिए । इसके अलावा ❖ पिशाची अनुबंध — सिर्फ ऊर्जा के शोषण के लिए... यही अनुबंध आज धर्मगुरु, कथावाचक और नेता-मंत्री के माध्यम से मंदिर-मस्जिद से संसद तक सक्रिय है...। ✦ ऊर्जा-पिशाचों से मुक्ति — जब जंजीरें टूटती हैं ✦ मुक्ति मंत्र से नहीं, होश से होती है...। ① पहचान :— जिसके पास जाकर आप भारी हो जाते हो, थक जाते हो, सपने काले पड़ते हैं — समझो वहाँ ऊर्जा पिशाच सक्रिय है.। ② अनुमति वापस लेना — अकेले बैठकर कहो — "मैंने जो अनुमति दी थी, वह आज से रद्द है। मेरी ऊर्जा अब तुम्हारी नहीं।" No Justification No Judgement No Obligation No Contract ! ③ दूरी — मंदिर-मस्जिद-चर्च से संसद तक फैले इन स्रोतों से दूरी बनाओ। उनकी आवाज, कथा, वादे मत सुनो जब तक जंजीर न टूटे..। भूखा पिशाच खुद कमजोर पड़ जाता है...। ④ ऊर्जा वापस माँगना:— रात को लेटकर कल्पना करो, सूर्य की किरणों की तरह तुम्हारी ऊर्जा लौट रही है। कहो — "मेरी ऊर्जा वापस करो।"
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MEDEA The Greek Goddess of illusions...! मिडिया= भ्रम की देवी । https://medium.com/@MedeaEthereum/medea-goddess-of-illusion-f8e26ca41fe7 Create and manipulate the News for Broad-cast illusions by Anchors through Channels and internet (अंतर्जाल {इंद्रजाल}).....! और हां अगर गांधी के एक बंदर की तरह मिडिया गूंगी होती कुछ न बोलती तब भी सही था पर ये तो कार्पोरेट की सुपारी पर पिछवाड़ा टिका कर बैठी है और हर एजेंडे को प्रमोट करने में दिन-रात एक्टिव है.....। Who Owns Your News Channels.....? 👁️👀❓ Skip the Matrix and Save Your Soul from any type of Broad-cast. ☝️⚡🕸️🌅 If you can't see the Spells and hidden meaning behind every spell of Language.. (Words=S-Words Swords) A simulation based on manipulation of actual Reality...You can't observe the Real Truth and Facts...🎯 You can find the Devil only in Details.....! https://youtu.be/jCXzlHYU4xA?si=nrVJZWe6FlAu2bYy
भ्रम का मायाजाल कैसे मजबूत होता है:- 👁️👀❓🤔 आजकल हर आदमी की कमाई उसके खर्चे पूरे कवर नहीं कर पा रही है। इसमें असली समस्या क्या है ? पुराने जमाने में मुहल्ले में एक फोन होता था। पूरा मोहल्ला उसी का नंबर रिश्तेदारों को दे देता था कि इमरजेंसी हो तो इस नंबर पे काल कर लेना। वो बुला देंगे। और खुद जरूरत पड़ने पे पीसीओ से जाके काल कर लेते थे। सबके घर में टीवी नहीं था। और डिश तो वैसे भी रईस लोगों के घर में था। क्या वो आम लोग भीख मांग रहे थे ? उनके पास बिल्कुल पैसे नहीं थे ? नहीं.. पैसे थे... लेकिन बच्चों की पढ़ाई, लिखाई, शादी, घर वगैरह जैसी अन्य चीजों को ज्यादा जरूरी समझते थे। तो उस कमाई को वहां खर्च करते थे। क्या वो लोन लेके, खेत बेच के फोन नहीं लगवा सकते थे, 📡 डिश नहीं लगवा सकते थे ? बिल्कुल लगवा सकते थे । लेकिन उनके लिए ये फिजूल खर्च था। या हूं कहें कि लक्जरी था। और उनका पैसा सिर्फ उनकी आवश्यकताओं पर खर्च हो रहा था, लक्जरी पर नहीं। आज हर दूसरे हाथ में एक iphone है। जबकि आंकड़ों के अनुसार 80% लोग EMI पर iPhone लेते हैं। अगर अनऑर्गेनाइज्ड सेक्टर को मिला लें तो करीब 90-95% iPhone किसी न किसी तरह के उधार के पैसे पे खरीदे जा रहे हैं। लोन का नाम बदल के एप्लायंस लोन रख देने से कर्जा नहीं बदल जाएगा...। सच ये है कि आज कल आम लोगों की उतनी परचेसिंग पावर नहीं है लेकिन इन्हें खरीदना आईफोन (या कोई अन्य मंहगा फोन) ही है। चाहे उधार लेना पड़े। खरीदना बढ़िया टीवी है। बढ़िया अन्य गैजेट है। फिर उसकी EMI चुकाने के चक्कर में जरूरी खर्चे रुक जाते हैं। पुराने जमाने में रईस आदमी छुट्टियां मनाने जाता था। अब इंस्टाग्राम आने के बाद आप अगर छुट्टी मनाने नहीं जाते तो आप पिछड़े हैं। छुट्टी वो मनाने जाते थे जिनके पास खर्चे के बाद सेविंग, और सेविंग के बाद भी पैसा बचता था। नहीं तो नानी, मौसी , दादा के यहां बच्चों को छुट्टियों में भेज दिया जाता था। पहले लोग अपनी कमाई के अनुसार अपना लाइफस्टाइल तय करते थे। अब सबका लाइफस्टाइल कार्पोरेट द्वारा तय किया जाता है, लोन उठा के मेंटेन भी कर लिया, उसकी EMI के हिसाब से कमाई ढूंढ रहे हैं। जिंदगी जीने के लिए है, मजे करने के लिए है लेकिन आज के मजे कल के कर्जे पे नहीं करने हैं .. आज के मजे आज की कमाई के हिसाब से करने हैं सिर्फ..। यही है वो भ्रम का मायाजाल जो हर व्यक्ति के जीवन को प्रभावित और नियंत्रित कर रहा है । illusion of Matrix
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डिजिटल स्लेवरी:- मानव जाति के अस्तित्व को नियंत्रित करने की सबसे बड़ी योजना..... यह तस्वीर एक डायस्टोपियन (डरावना भविष्यवादी) दृश्य प्रस्तुत करती है। “डिजिटल जेल एल्गोरिदम”। चारों ओर निगरानी कैमरे, डिजिटल प्रोफाइल, सोशल क्रेडिट स्कोर (382/1000 रैंक: सिटीजन, स्टेटस: मॉनिटर्ड, बिहेवियर एनालिसिस, थॉट मॉनिटर, एक्टिविटी लॉग और सर्विलांस फीड दिखाए गए हैं। नीचे चेतावनी लिखी है – “FREEDOM IS AN ERROR – OBEDIENCE IS SURVIVAL”। एक अकेला व्यक्ति लाल रोशनी वाले शहर की सड़क पर चल रहा है, जहाँ हर कदम ट्रैक हो रहा है। यह तस्वीर प्रतीकात्मक रूप से बताती है कि कैसे तकनीक, डेटा और एल्गोरिदम मिलकर अप्रत्यक्ष नियंत्रण का जाल बुन रहे हैं – जहाँ शारीरिक जेल की जरूरत नहीं, मन और व्यवहार को ही नियंत्रित कर लिया जाता है...। --- विस्तृत विश्लेषण:- 1. डिजिटल प्रोफाइल और पहचान:- हर व्यक्ति का डेटा (उम्र, लिंग, लोकेशन, व्यवहार) लगातार इकट्ठा किया जा रहा है। वास्तविक दुनिया में यह सोशल मीडिया, मोबाइल ऐप्स, कैमरा नेटवर्क और सरकारी डिजिटल सिस्टम के माध्यम से होता है..। 2. सोशल क्रेडिट स्कोर:- तस्वीर में स्कोर बहुत कम (382) दिखाया गया है। चीन जैसे देशों में वास्तविक सोशल क्रेडिट सिस्टम मौजूद है, जहाँ व्यवहार, खर्च, सोशल मीडिया पोस्ट और अनुपालन के आधार पर स्कोर तय होता है। कम स्कोर मतलब यात्रा, नौकरी, लोन और सेवाओं पर प्रतिबंध। 3. व्यवहार और विचारों की निगरानी का तंत्र:- “Compliant, Obedient, Loyal, Trustworthy, Social Activity” जैसे प्रतिशत दिखाए गए हैं। एल्गोरिदम सिर्फ कार्य नहीं, बल्कि पैटर्न, खोज इतिहास, दोस्तों के नेटवर्क और यहां तक कि भावनाओं का भी विश्लेषण करते हैं। यह “अप्रत्यक्ष नियंत्रण” का मुख्य हथियार है – जहां लोग खुद को स्वेच्छा से नियंत्रित करने लगते हैं...। 4. एक्टिविटी लॉग और निरंतर निगरानी:- लोकेशन चेक, ऑनलाइन सर्च, फेस स्कैन, वॉइस एनालिसिस – सब कुछ रिकॉर्ड हो रहा है। आज के समय में स्मार्टफोन, स्मार्ट सिटी कैमरे, ऐप परमिशन और AI फेस रिकग्निशन यही काम कर रहे हैं...। 5. चेतावनी का संदेश:- “Freedom is an error” – यह बताता है कि सिस्टम स्वतंत्र सोच को गलती मानता है। आज्ञाकारिता ही सुरक्षा है। यह मनोवैज्ञानिक दबाव पैदा करता है...। मुख्य निष्कर्ष:- प्रत्यक्ष जेल की दीवारें नहीं, बल्कि डेटा + एल्गोरिदम + स्कोरिंग मिलकर एक अदृश्य जेल बनाते हैं। आप स्वतंत्र महसूस करते हैं, लेकिन विकल्प पहले से सीमित कर दिए जाते हैं...। --- डिजिटल जेल एल्गोरिदम – क्या हम पहले से अंदर हैं...? तस्वीर देखकर सिहरन हो रही है न? एक स्कोर… एक कैमरा… एक एल्गोरिदम… और आपका पूरा जीवन “मॉनिटर्ड” हो जाता है। यह सिर्फ फिक्शन नहीं है। यह मानव इतिहास की सबसे बड़ी खामोश और खतरनाक लड़ाई है – अप्रत्यक्ष नियंत्रण की लड़ाई...। जब आपका हर सर्च, हर लोकेशन, हर दोस्त, हर राय रिकॉर्ड हो रही हो… जब “अच्छा नागरिक” का स्कोर तय किया जा रहा हो कि आप ट्रेन में बैठ सकते हैं या नहीं…? जब स्वतंत्र सोच को “एरर” कहा जाने लगे…? तब समझ लो – जेल की दीवारें अब लोहे की नहीं, कोड की बनी हैं। लेकिन याद रखो – एल्गोरिदम शक्तिशाली हैं, लेकिन वे सर्वशक्तिमान नहीं...। वे डेटा पर चलते हैं..। वो डेटा हम उन्हें देते हैं..। हम अगर जागरूक हों, सवाल पूछें, अपनी प्राइवेसी की रक्षा करें, डिजिटल साक्षर बनें और अपनी पहचान को न बेचें… तो यह जेल टूट सकती है। आज चुनो – क्या तुम हमेशा सिर्फ “Comply” करते रहोगे...? या तुम सोचने वाले, पूछने वाले और स्वतंत्र रहने वाले इंसान बनोगे? स्वतंत्रता कोई एरर नहीं है। स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। जागो। समझो। बचाओ। क्योंकि जो आज स्कोर है… कल कोड बन सकता है और वही कोड एक अदृश्य जंजीर बन सकता है...। 🎯✅💯
असली इतिहास वर्तमान और भविष्य का निष्पक्ष अध्ययन आकलन और विश्लेषण पर आधारित एक रिपोर्ट जो संपूर्ण मानव जाति के खिलाफ रचे जा रहे मानव इतिहास के सबसे बड़े षड्यंत्र का पर्दाफाश:- श्री राजीव दीक्षित जी के सहयोगी श्री योगेश मिश्रा जी द्वारा प्रस्तुत की गई रिपोर्ट:- क्या 1947 में हमें सच में आज़ादी मिली थी या हम पहले कागजी और अब 'डिजिटल और ग्लोबल चक्रव्यूह' में फंसा दिए गए हैं....? 🚨 अगर आपको लगता है कि आप एक आज़ाद देश के स्वतंत्र नागरिक हैं और अपने फैसले खुद लेते हैं तो यह सच आपको अंदर तक झकझोर कर रख देगा! सत्ता, बैंक, स्वास्थ्य और आपके अपने पैसे पर आपका कितना अधिकार है.....? इस 20 मिनट के वीडियो में कुछ ऐसे खौफनाक और कड़वे सच का पर्दाफाश किया गया है, जिसे सुनकर आपके पैरों तले ज़मीन खिसक जाएगी। यहाँ उन खौफनाक सच्चाइयों की एक झलक है, जो हमारे साथ एक सोचे-समझे षड्यंत्र के तहत की जा रही हैं: 🏛️ 1. आज़ादी का भ्रम और विदेशी नियंत्रण:- हमें बताया गया कि 1947 में एक बड़े संघर्ष के बाद हमें आज़ादी मिली। लेकिन कड़वा सच यह है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो गई थी और उनके पास भारत पर नियंत्रण रखने का पैसा नहीं बचा था। उन्होंने हमें 'कॉमनवेल्थ' के दायरे में आज़ादी दी। आज भी हमारे चुने हुए सांसद और प्रधानमंत्री नीतियां खुद नहीं बनाते, बल्कि UNO, WTO, WORLD BANK, WHO (विश्व स्वास्थ्य संगठन) जैसी विदेशी संस्थाओं के मापदंडों पर काम करने के लिए विवश हैं। देश हमारा, नेता हमारे, लेकिन फैसले विदेशी ताकतों के...! 👁️ 2. बायोमेट्रिक स्कैनिंग:- इंसान अब महज़ एक 'बारकोड' है सोचिए, आपसे आपके फिंगरप्रिंट और रेटिना (आंखों) का स्कैन क्यों लिया गया? जिस तरह किसी भी सामान पर बारकोड लगाकर उसकी कीमत तय कर दी जाती है, ठीक उसी तरह आपकी बायोमेट्रिक पहचान के ज़रिए आपको एक 'डिजिटल प्रोडक्ट' बना दिया गया है। फिर इस पहचान पत्र को ज़बरदस्ती आपके बैंक खातों से जोड़ दिया गया, ताकि आपकी हर छोटी-बड़ी आर्थिक गतिविधि की जानकारी अंतरराष्ट्रीय ताकतों के सर्वर तक पहुंच सके। 💸 3. नोटबंदी और 'डिजिटल करेंसी' का छिपा हुआ एजेंडा:- आपके घरों में जो पैसा आपकी माताओं-बहनों ने आपातकाल, बच्चों की पढ़ाई या बेटियों की शादी के लिए सुरक्षित रखा था, उसे नोटबंदी के ज़रिए ज़बरदस्ती बैंकों में डलवा दिया गया। आज हमें 'डिजिटल करेंसी' (Google Pay, Paytm) की आदत डाल दी गई है लेकिन सोचिए...। अगर कल को कोई बड़ा 'साइबर अटैक' हो जाए और बैंकों के सर्वर नष्ट हो जाएं, तो आपके पास क्या बचेगा? कुछ नहीं..! आपकी जीवन भर की कमाई एक झटके में शून्य (Zero) हो जाएगी क्योंकि आपके हाथ में नकद (Cash) नहीं है..। 💉 4. मेडिकल तानाशाही और लोकतंत्र की हत्या:- वैक्सीन लगानी है या नहीं? मास्क पहनना है या नहीं? इन विषयों पर देश की संसद में कोई खुली बहस क्यों नहीं हुई? बिना विशेषज्ञों और दोनों पक्षों के डॉक्टरों की राय लिए, इन चीज़ों को डंडे के ज़ोर पर हम पर क्यों थोप दिया गया...? सबसे बड़ा सवाल:— जब प्रायोजित महामारी कोरोना के समय में काढ़ा पीने और प्राकृतिक चिकित्सा से अधिकांश लोग ठीक हुए, तो बजट में एलोपैथी (अंग्रेज़ी दवाओं) के लिए 75,000 करोड़ और आयुर्वेद/होम्योपैथी के लिए मात्र 7,000 करोड़ क्यों दिए जाते हैं..? यह साफ दर्शाता है कि बड़ी विदेशी फार्मा कंपनियां हमारे नीति-निर्माताओं पर पूरी तरह हावी हैं...। 🏢 5. खत्म होता रोजगार और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का जाल:- आज लाखों रुपये खर्च करके डिग्रियां लेने वाले नौजवान दर-दर भटक रहे हैं..। कंपनियां बंद हो रही हैं, रोजगार छीने जा रहे हैं और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) के ज़रिए इंसानों को सिस्टम से बाहर किया जा रहा है..। आपके पास संपत्ति हो सकती है, लेकिन आज बाज़ार में कोई खरीदार नहीं है...। 🛑 निष्कर्ष:- हम एक ऐसी 'आधुनिक गुलामी' की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ हमारे जीवन का हर एक हिस्सा:— हमारी आजीविका, हमारी आज़ादी, हमारा पैसा और हमारी सेहत— किसी अदृश्य विदेशी ताकत के कंट्रोल में है...। 🕸️ अगर आप अपने और अपने बच्चों के भविष्य को लेकर ज़रा भी चिंतित हैं, तो अपनी आंखें खोलिए...! यह समय सच्चाई को स्वीकार करने और सवाल पूछने का है...। 👇 यह पूरा अंतरराष्ट्रीय खेल कैसे रचा गया है...? इसका पूरा भंडाफोड़ इस 20 मिनट के वीडियो में किया गया है...। 🔗 https://youtu.be/s9WJ3M6GJ5E?si=JUNBePnqRsHejdc3
वर्तमान समय हमारे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण और निर्णायक समय है जब हमारा और हमारी आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का निर्धारण होगा:- ये समय एक दूसरे की टांग खिंचाई का नहीं है बल्कि एक दूसरे का हाथ पकड़ कर साथ देने का है..... सब भटके हुए साथी एकजुट हो जाओ । अन्याय के प्रति अधर्म के प्रति और हिंसा के प्रति भले ही वो किसी के साथ भी हो रहा हो....। जो आज दूसरों के साथ हो रहा है वो कल को हमारे आपके साथ भी हो सकता है क्योंकि हम आज उसका समर्थन कर रहे हैं तो कल विरोध किस मुंह से करेंगे । खेल गहरा है और ब्रेनवाश लोग ऊपर ऊपर देख रहे हैं । सरकारें जो कंपनियों और कार्पोरेशनों का समूह है इनका नियंत्रण बढ़ता जाएगा.... स्वायत्तता स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता घटती जाएगी.... आपसी सहयोग सद्भाव और विश्वास खत्म होगा और पूरी मानव जाति डिजिटल स्लेवरी का शिकार हो जाएगी । इसलिए आपस में मत लड़ो उनसे लड़ो जिन्हें हमारे लड़ने से फायदा होता है.... उन्हें पहचानो। कार्पोरेट (परजीवी) जगत के प्रायोजित प्यादों के द्वारा निर्मित, निर्धारित, स्थापित और संचालित व्यवस्था से मुक्त होने की लड़ाई सबसे महत्वपूर्ण और सबसे बड़ी लड़ाई है सबसे बड़ा धर्म है । 🌹🙏🌹
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