- Последний пост
- 6 авг.
- Последнее чтение
- 14 авг.
- Постов за неделю
- 0
- Всего постов
- 20
- Тип
- открытый
- Язык
- und
- В каталоге с
- 14 авг.
- 1/24сутки в ленте
- 127
- 1/48двое суток
- 145
- 1/72трое суток
- 156
Оценка по просмотрам недавних постов: пост набирает почти всё за первые сутки.
Посты
भाई बोला "फोन क्यों किया? " विनोद बोला "भैया आप वो मैन मार्केट वाली दुकान ले लो। मेरे लिए मंडी वाली छोड़ दो। और वो बड़े वाला प्लॉट भी आप ले लो। मै छोटे वाला ले लूंगा। मै कल ही मुकदमा वापस ले रहा हूँ। " सामने से काफी देर तक आवाज नही आई। फिर उसके बड़े भाई ने कहा "इससे तो तुम्हे बहुत नुकसान हो जाएगा छोटे? "विनोद बोला " भैया आज मुझे समझ मे आ गया है सम्बन्धों में हानि लाभ नही देखा जाता। एक दूसरे की खुशी देखी जाती है। उधर से फिर खामोशी छा गई। फिर विनोद को बड़े भाई की रोने की आवाज सुनाई दी। विनोद बोला "रो रहे हो क्या भैया?" बड़ा भाई बोला " इतने प्यार से पहले बात करता तो सब कुछ मै तुझे दे देता रे। अब घर आ जा। दोनों प्रेम से बैठ कर बंटवारा करेंगे। इतनी बड़ी कड़वाहट कुछ मीठे बोल बोलते ही न जाने कहाँ चली गई थी। कल जो एक एक इंच जमीन के लिए लड़ रहे थे वे आज भाई को सब कुछ देने के लिए तैयार हो गए थे। कहानी का मोरल:- त्याग की भावना रखिये। अगर हमेशा देने को तत्पर रहोगे तो लेने वाले का भी हृदय परिवर्तन हो जाएगा। याद रखें सम्बंधों में हानि लाभ नही देखा जाता। अपनो को निकट रखने के लिए अपना अधिकार भी छोड़ना पड़ता है साभार
विनोद हाईवे पर गाड़ी चला रहा था। सड़क के किनारे उसे एक 12-13 साल की लड़की तरबूज बेचती दिखाई दी। विनोद ने गाड़ी रोक कर पूछा "तरबूज की क्या रेट है बेटा? " लड़की बोली " 50 रुपये का एक तरबूज है साहब।" पीछे की सीट पर बैठी विनोद की पत्नी बोली " इतना महंगा तरबूज नही लेना जी। चलो यहाँ से। "विनोद बोला "महंगा कहाँ है इसके पास जितने तरबूज है कोई भी पांच किलो के कम का नही होगा। 50 रुपये का एक दे रही है तो 10 रुपये किलो पड़ेगा हमें। बाजार से तो तू बीस रुपये किलो भी ले आती है। " विनोद की पत्नी ने कहा तुम रुको मुझे मोल भाव करने दो।” फिर वह लड़की से बोली "30 रुपये का एक देना है तो दो वरना रहने दो। " लड़की बोली " 40 रुपये का एक तरबूज तो मै खरीद कर लाती हूँ आंटी। आप 45 रुपये का एक ले लो। इससे सस्ता मै नही दे पाऊँगी।" विनोद की पत्नी बोली" झूठ मत बोलो बेटा। सही रेट लगाओ देखो ये तुम्हारा छोटा भाई है न? इसी के लिए थोड़ा सस्ता कर दो।" उसने खिड़की से झाँक रहे अपने चार वर्षीय बेटे की तरफ इशारा करते हुए कहा। सुंदर से बच्चे को देख कर लड़की एक तरबूज हाथों मे उठाते हुए गाड़ी के करीब आ गई। फिर लड़के के गालों पर हाथ फेर कर बोली " सचमुच मेरा भाई तो बहुत सुंदर है आँटी।" विनोद की पत्नी बच्चे से बोली "दीदी को नमस्ते बोलो बेटा। " बच्चा प्यार से बोला "नमस्ते दीदी। लड़की ने गाड़ी की खिड़की खोल कर बच्चे को बाहर निकाल लिया फिर बोली " "तुम्हारा नाम क्या भैया? " लड़का बोला " मेरा नाम गोलू है दीदी। " बेटे को बाहर निकालने के कारण विनोद की पत्नी कुछ असहज हो गई। तुरंत बोली "अरे बेटा इसे वापस अंदर भेजो। इसे डस्ट से एलर्जी है।"लड़की उसकी आवाज पर ध्यान न देते हुए लड़के से बोली "तु तो सचमुच गोल मटोल है रे भाई। तरबूज खाएगा? "लड़के ने हाँ मे गर्दन हिलाई तो लड़की ने तरबूज उसके हाथों मे थमा दिया। पाँच किलो का तरबूज गोलू नही संभाल पाया। तरबूज फिसल कर उसके हाथ से नीचे गिर गया और फूट कर तीन चार टुकड़ों मे बंट गया। तरबूज के गिर कर फुट जाने से लड़का रोने लगा। लड़की उसे पुचकारते हुए बोली अरे भाई रो मत। मै दूसरा लाती हूँ। फिर वह दौड़कर गई और एक और बड़ा सा तरबूज उठा लाई। जब तक वह तरबूज उठा कर लाई इतनी देर मे विनोद की पत्नी ने बच्चे को अंदर गाड़ी मे खींच कर खिड़की बन्द कर ली। लड़की खुले हुए शीशे से तरबूज अंदर देते हुए बोली "ले भाई ये बहुत मिठा निकलेगा।” विनोद चुपचाप बैठा लड़की की हरकतें देख रहा था। विनोद की पत्नी बोली "जो तरबूज फूटा है मै उसके पैसे नही दूँगी। वह तुम्हारी गलती से फूटा है। "लड़की मुस्कराते हुए बोली "उसको छोड़ो आंटी। आप इस तरबूज के पैसे भी मत देना। ये मैने अपने भाई के लिए दिया है। " इतना सुनते ही विनोद और उसकी पत्नी दोनों एक साथ चौंक पड़े। विनोद बोला " नही बिटिया तुम अपने दोनों तरबूज के पैसे लो।" फिर सौ का नोट उस लड़की की तरफ बढ़ा दिया। लड़की हाथ के इशारे से मना करते हुए वहाँ से हट गई। औ अपने बाकी बचे तरबुजों के पास जाकर खड़ी हो गई। विनोद भी गाड़ी से निकल कर वहाँ आ गया था। आते ही बोला "पैसे ले लो बेटा वरना तुम्हारा बहुत बड़ा नुकसान हो जाएगा।" लड़की बोली "माँ कहती है जब बात सम्बन्धों की हो तो हानि लाभ नही देखा जाता। आपने गोलू को मेरा भाई बताया मुझे बहुत अच्छा लगा। मेरा भी एक छोटा सा भाई था मगर.." विनोद बोला "क्या हुआ तुम्हारे भाई को? " वह बोली "जब वह दो साल का था तब उसे रात मे बुखार हुआ था। सुबह माँ हॉस्पिटल मे ले जा पाती उससे पहले ही उसने दम तौड़ दिया था। मुझे मेरे भाई की बहुत याद आती है। उससे एक साल पहले पापा भी ऐसे ही हमे छोड़ कर गुजर गए थे। विनोद की पत्नी बोली "ले बिटिया अपने पैसे ले ले। " लड़की बोली "पैसे नही लुंगी आंटी।" विनोद की पत्नी गाड़ी मे गई फिर अपने बैग से एक पाजेब की जोड़ी निकाली। जो उसने अपनी आठ वर्षीय बेटी के लिए आज ही तीन हजार मे खरीदी थी। लड़की को देते हुए बोली। तुमने गोलू को भाई माना तो मै तुम्हारी माँ जैसी हुई ना। अब तू ये लेने से मना नही कर सकती। लड़की ने हाथ नही बढ़ाया तो उसने जबरदस्ती लड़की की गोद मे पाजेब रखते हुए कहा "रख ले। जब भी पहनेगी तुझे हम सब की याद आयेगी। "इतना कहकर वह वापस गाड़ी मे जाकर बैठ गई। फिर विनोद ने गाड़ी स्टार्ट की और लड़की को बाय बोलते हुए वे चले पड़े। विनोद गाड़ी चलाते हुए सोच रहा था कि भावुकता भी क्या चीज है। कुछ देर पहले उसकी पत्नी दस बीस रुपये बचाने के लिए हथकण्डे अपना रही थी।कुछ देर मे ही इतनी बदल गई जो तीन हजार की पाजेब दे आई। फिर अचानक विनोद को लड़की की एक बात याद आई "सम्बन्धों में हानि लाभ में नही देखा जाता।" विनोद का प्रॉपर्टी के विवाद को लेकर अपने ही बड़े भाई से कोर्ट मे मुकदमा चल रहा था।। उसने तुरंत अपने बड़े भाई को फोन मिलाया। फोन उठाते ही बोला " भैया मै विनोद बोल रहा हूँ। "
без подписи
उनकी आवाज़ टूट चुकी थी। उन्होंने काँपते हाथों से आख़िरी पन्ना खोला। उस पर सिर्फ़ एक इच्छा लिखी थी— «"अगर मेरी मौत के बाद कभी सच सामने आए… तो मेरी चिता पर फूल मत चढ़ाना। उस पैसे से किसी अनजान बच्चे की स्कूल फीस भर देना। यही समझूँगा… मेरा मोहन आज भी किसी न किसी बच्चे की मुस्कान बनकर ज़िंदा है।"» ... पूरा गाँव फूट-फूटकर रो पड़ा। रामू लोहार सबसे पहले अर्थी के पास गया। उसने हरिराम के पैरों पर सिर रख दिया। "भैया… माफ़ कर दो…" फिर सवित्री काकी आईं… फिर मास्टर साहब… फिर एक-एक करके पूरा गाँव। जिस अर्थी को सुबह चार कंधे नहीं मिल रहे थे… अब उसे कंधा देने के लिए सैकड़ों लोग खड़े थे। कई लोग रोते हुए कह रहे थे— "पहला कंधा मैं दूँगा…" "नहीं… पहले मैं…" आख़िर गाँव के बुज़ुर्ग ने कहा— "आज हरिराम को चार नहीं… पूरा गाँव कंधा देगा।" और सचमुच… लोग बारी-बारी से कंधा बदलते रहे। श्मशान तक शायद ही कोई ऐसा आदमी बचा हो जिसने उस अर्थी को एक बार न उठाया हो। --- उसकी तेरहवीं के दिन पंचायत ने एक और संदूक चौपाल में रख दिया। उस पर लिखा था— "हरिराम सहायता पेटी" नीचे एक छोटी-सी पंक्ति थी— "जिस दिन किसी की मदद करो… अपना नाम मत लिखना।" कहते हैं… आज भी उस पेटी में हर महीने चुपचाप पैसे आ जाते हैं। किसी को नहीं पता कौन डालता है। शायद… हरिराम की सबसे बड़ी दौलत उसके रुपये नहीं थे… उसका चरित्र था। और चरित्र की सबसे बड़ी पहचान यही है— वह इंसान के चले जाने के बाद भी लोगों के दिलों में ज़िंदा रहता है। ✍️
वह आदमी मैं था। मैं सामने इसलिए नहीं आया... क्योंकि मुझे डर था, अगर तुम जान गईं कि पैसे मैंने दिए हैं, तो तुम अपनी बची हुई ज़मीन बेचकर मुझे लौटा दोगी। मुझे तुम्हारे पैसे नहीं... तुम्हारा बेटा ज़िंदा चाहिए था। माफ़ करना... —हरिराम।"» सवित्री काकी वहीं बैठ गईं। उनके हाथ काँप रहे थे। उन्होंने अर्थी की तरफ़ देखा... और पहली बार दोनों हाथ जोड़ दिए। "बेटा..." बस इतना ही कह पाईं। पूरा आँगन रोने लगा। --- अब तीसरा लिफ़ाफ़ा खोला गया। इस बार नाम पढ़ते ही सरपंच चौंक गया। "गोविंद मास्टर।" गाँव के रिटायर्ड शिक्षक आगे आए। वकील पढ़ने लगे— «"मास्टर साहब, आपको हमेशा लगा कि मैं पढ़ाई का दुश्मन हूँ। क्योंकि जब स्कूल के लिए चंदा माँगा गया था, तब पूरे गाँव में सिर्फ़ मैंने एक रुपया भी नहीं दिया था। उस दिन आपने बच्चों के सामने मुझे शर्मिंदा किया था। आप सही थे... शायद मैं भी आपकी जगह होता तो यही करता। लेकिन आपको एक बात कभी नहीं पता चली। स्कूल की नई लाइब्रेरी बनाने के लिए शहर के जिस ट्रस्ट ने सबसे बड़ा दान दिया था... वह ट्रस्ट मेरे ही नाम से बना था। मैं नहीं चाहता था कि बच्चे लाइब्रेरी का नाम हरिराम के नाम से याद रखें। मैं चाहता था... वे सिर्फ़ किताबों को याद रखें। इसलिए मैंने अपना नाम छिपा लिया। मुझे माफ़ करना।"» गोविंद मास्टर की छड़ी हाथ से छूट गई। उनकी आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे। उन्होंने काँपती आवाज़ में कहा— "मैंने... मैं बच्चों को सालों तक यही पढ़ाता रहा कि हरिराम जैसा मत बनना..." "आज लगता है... मुझे खुद हरिराम जैसा बनने की ज़रूरत थी।" --- अब तक गाँव में सन्नाटा फैल चुका था। किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी कि हरिराम को बुरा कह सके। लेकिन तभी भीड़ में से एक आवाज़ आई। "अगर वो इतना अच्छा था... तो सारी ज़िंदगी सच क्यों नहीं बताया?" सबकी नज़र वकील दयानंद पर गई। उन्होंने गहरी साँस ली। "इस सवाल का जवाब..." उन्होंने संदूक के सबसे नीचे रखा एक मोटा-सा लिफ़ाफ़ा उठाया। उस पर लिखा था— "इसे सबसे अंत में पढ़ना... यही मेरी असली सज़ा है।" वकील ने लिफ़ाफ़ा अपने सीने से लगा लिया। उनकी आँखें भी भीग चुकी थीं। उन्होंने धीमे स्वर में कहा— "इसमें ऐसा सच लिखा है... जो शायद इस गाँव को हमेशा के लिए बदल देगा।" आँगन में खड़े हर आदमी की साँसें थम गईं। हरिराम की अर्थी अब भी वहीं रखी थी... लेकिन अब कोई उसे "कंजूस" नहीं कह रहा था। सबके मन में सिर्फ़ एक सवाल था— "आख़िर ऐसा कौन-सा दर्द था... जिसे छिपाने के लिए उसने पूरी ज़िंदगी बदनाम रहना स्वीकार कर लिया?" पूरा आँगन खामोश था। हरिराम की अर्थी वैसे ही पड़ी थी। लेकिन अब किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी कि उसकी तरफ़ आँख उठाकर देख सके। वकील दयानंद ने संदूक के सबसे नीचे रखा मोटा-सा लिफ़ाफ़ा उठाया। उस पर लिखा था— "इसे तभी पढ़ना… जब लोग मुझे बुरा कहना छोड़ दें।" वकील की आवाज़ काँप रही थी। उन्होंने चिट्ठी खोली। उसमें लिखा था— «"अगर यह चिट्ठी पढ़ी जा रही है, तो शायद पहली बार गाँव वाले मुझे सुनने के लिए तैयार हैं। तुम सब सोचते रहे कि मैं जन्म से कंजूस था। लेकिन सच यह है कि मैं ऐसा पैदा नहीं हुआ था… मुझे ऐसा बनना पड़ा। आज से बाईस साल पहले मेरा भी एक बेटा था—मोहन। वह सिर्फ़ दस साल का था। उसे दिल का ऐसा रोग था, जिसका इलाज शहर में होना था। डॉक्टर ने कहा था—तीन लाख रुपये जमा कर दो, बच्चा बच जाएगा। मैं पूरे गाँव में हाथ जोड़ता रहा। जिसके खेत जोते… उसके सामने रोया। जिसकी बेटी की शादी में मुफ़्त काम किया… उसके पैरों में गिरा। लेकिन हर किसी ने एक ही बात कही—'हमारे पास नहीं है।' उस रात मेरा बेटा मेरी गोद में मर गया।"» आँगन में खड़े लोगों के शरीर में जैसे जान ही नहीं रही। कुछ बुज़ुर्ग सिर झुकाकर रोने लगे। वकील आगे पढ़ने लगे— «"उस दिन मैंने किसी से नफ़रत नहीं की। बस एक फैसला किया। मैं अपनी ज़िंदगी में इतना पैसा जोड़ूँगा कि मेरे गाँव का कोई पिता पैसे के कारण अपना बच्चा न खोए। मैंने खाना कम खाया… नए कपड़े नहीं खरीदे… त्योहार नहीं मनाए… इसलिए नहीं कि मुझे पैसे से प्यार था… बल्कि इसलिए कि मुझे किसी और के आँसू से डर लगता था।"» लोग एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे। जिन फटे कपड़ों पर वे हँसते थे… आज वही कपड़े उनकी शर्म बन चुके थे। वकील की आँखों से आँसू गिर रहे थे। उन्होंने आख़िरी पन्ना खोला। «"तुम सबके मन में एक सवाल होगा—अगर मैं मदद करता था, तो नाम क्यों छिपाता था? क्योंकि जिस दिन मेरा बेटा मरा था… उसने आख़िरी साँस लेते हुए मुझसे कहा था— 'पापा… किसी की मदद करना… लेकिन उसे कभी एहसान मत महसूस होने देना।' मैंने उसी दिन उससे वादा किया था। इसलिए मैंने हर मदद के बदले अपनी बदनामी चुनी। लोग मुझे कंजूस कहते रहे… और मैं चुप रहा। क्योंकि किसी की इज़्ज़त बचाने से बड़ी कोई कमाई नहीं होती।"» वकील अब पढ़ नहीं पा रहे थे।
गाँव का सबसे कंजूस आदमी मर गया… उसके पुराने संदूक से पैसे नहीं, 417 अधूरी माफ़ीनामे वाली चिट्ठियाँ निकलीं "मर गया हरिराम…!" सुबह पाँच बजे जैसे ही यह खबर पूरे गाँव में फैली, किसी के चेहरे पर दुख नहीं था। चौपाल पर बैठे बुज़ुर्ग बोले, "अच्छा हुआ… भगवान ने देर से ही सही, इंसाफ़ कर दिया।" किसी ने ताना मारा, "अब उसके संदूक से लाखों रुपये निकलेंगे… सारी उम्र एक रुपया किसी को नहीं दिया।" औरतें आपस में बातें कर रही थीं— "इतना कंजूस आदमी हमने आज तक नहीं देखा।" "अपनी फटी बनियान सिलकर पहनता था… लेकिन किसी की मदद नहीं करता था।" बच्चे भी उसे देखकर रास्ता बदल लेते थे। पूरा गाँव उसे एक ही नाम से जानता था— 'हरिराम कंजूस।' हरिराम की अर्थी आँगन में रखी थी। लेकिन उसे कंधा देने के लिए चार आदमी भी नहीं मिल रहे थे। आख़िरकार पंचायत ने चार मज़दूर बुलाए। अर्थी उठने ही वाली थी कि हरिराम के पुराने वकील, दयानंद, तेज़ी से आते दिखाई दिए। उन्होंने ऊँची आवाज़ में कहा— "अर्थी पाँच मिनट रुकेगी।" सब चौंक गए। "अब क्या बाकी रह गया?" वकील ने जेब से एक पुराना लिफ़ाफ़ा निकाला। "हरिराम ने मरने से पहले कहा था— 'जब तक मेरा संदूक पूरे गाँव के सामने न खुले… मेरी अर्थी मत उठाना।'" गाँव वाले हँस पड़े। "लो… मरकर भी पैसे नहीं छोड़ रहा।" "ज़रूर सोना छिपाकर रखा होगा।" "देखना… नोटों से भरा होगा।" --- हरिराम का कमरा खोला गया। कमरे में बस एक चारपाई… एक मिट्टी का घड़ा… और कोने में रखा एक पुराना लोहे का संदूक। संदूक पर मोटी धूल जमी थी। वकील ने ताला खोला। सबकी साँसें थम गईं। लेकिन… संदूक खुलते ही पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया। अंदर न सोना था… न चाँदी… न नोटों की गड्डियाँ… सिर्फ़ पुराने कागज़। सैकड़ों कागज़। वकील ने उन्हें बाहर निकाला। हर कागज़ एक अलग लिफ़ाफ़े में था। सभी पर किसी न किसी गाँव वाले का नाम लिखा था। और ऊपर लाल स्याही से एक ही शब्द— "माफ़ करना…" वकील ने गिनती की। एक… दो… दस… पचास… कुल... 417 लिफ़ाफ़े। पूरा आँगन खामोश हो गया। "ये क्या है?" सरपंच ने पूछा। वकील ने काँपती आवाज़ में कहा— "ये हरिराम की आख़िरी इच्छा है।" "उसने कहा था— 'मेरी चिता को आग तब तक मत देना… जब तक इन चिट्ठियों में से पहली पाँच चिट्ठियाँ पढ़ न ली जाएँ।'" --- पहला लिफ़ाफ़ा खोला गया। उस पर नाम लिखा था— 'रामू लोहार।' रामू आगे आया। हँसते हुए बोला— "देखते हैं… मरने के बाद क्या लिख गया।" वकील ने पढ़ना शुरू किया— «"रामू… मुझे माफ़ करना। बीस साल पहले तेरी बेटी की शादी में तू मेरे घर पैसे माँगने आया था। मैंने पूरे गाँव के सामने तुझे डाँटकर भगा दिया था। उस दिन तू मुझे सारी उम्र कोसता रहा। लेकिन सच यह है कि उसी रात मैंने तेरे दरवाज़े के बाहर बिना नाम लिखे पचास हज़ार रुपये रखवा दिए थे। अगर मैं सामने से देता… तो तू कभी नहीं लेता। इसलिए मैंने बुरा बनना मंज़ूर किया… लेकिन तेरी बेटी की शादी टूटने नहीं दी। तू मुझे मरते दम तक कंजूस समझता रहा… यही मेरी सज़ा थी। —हरिराम"» रामू के हाथ से चिट्ठी गिर गई। उसके चेहरे का रंग उड़ चुका था। वह काँपती आवाज़ में बोला— "उस रात… सचमुच किसी ने दरवाज़े पर पैसे रखे थे…" "मैं आज तक समझता रहा… भगवान ने भेजे थे…" और पहली बार… रामू फूट-फूटकर रो पड़ा। पूरा गाँव स्तब्ध था। यह वही रामू था… जो अभी कुछ मिनट पहले हरिराम को सबसे बड़ा कंजूस कह रहा था। अब सबकी नज़रें दूसरे लिफ़ाफ़े पर थीं… और किसी के मन में पहली बार एक सवाल उठा— "क्या हम हरिराम को कभी समझ ही नहीं पाए…?" रामू लोहार ज़मीन पर बैठ गया। उसकी आँखों से आँसू रुक ही नहीं रहे थे। वह बार-बार सिर्फ़ एक ही बात दोहरा रहा था— "मैंने... मैंने सारी ज़िंदगी उसे गालियाँ दीं... और वो मेरी बेटी की इज़्ज़त बचा गया..." आँगन में खड़े सैकड़ों लोग अब पहली बार हरिराम की अर्थी की तरफ़ देखने से भी झिझक रहे थे। कुछ देर पहले जिस इंसान को लोग कंजूस, पत्थरदिल और स्वार्थी कह रहे थे... अब उसी के बारे में उनके मन में सवाल उठने लगे थे। वकील दयानंद ने दूसरा लिफ़ाफ़ा उठाया। उस पर नाम लिखा था— "सवित्री काकी" भीड़ से एक लगभग सत्तर साल की बूढ़ी औरत काँपते हुए आगे आई। "मेरे नाम...?" वकील ने चिट्ठी खोली। «"सवित्री काकी, तुमने मुझे कभी माफ़ नहीं किया। शायद आज भी नहीं करोगी। तुम्हें याद होगा... पंद्रह साल पहले जब तुम्हारे बेटे का ऑपरेशन होना था, तुम मेरे दरवाज़े पर रोती हुई आई थीं। मैंने तुम्हें डाँटकर भगा दिया था। पूरा गाँव बोला—'हरिराम के दिल में पत्थर है।' लेकिन उसी रात शहर के अस्पताल में तुम्हारे बेटे का पूरा बिल किसी अनजान आदमी ने जमा कर दिया था।
без подписи
🔥 अटल सत्य: मृत्यु से कोई नहीं भाग सकता 🔥 एक बहुत ही गहरी और सोचने पर मजबूर कर देने वाली कथा है... प्राचीन काल में एक ज्ञानी पंडित अपने एक मित्र से मिलने दूसरे गाँव जा रहा था। रास्ते में उसे 'महाकाल' नाम का एक सहयात्री मिला। पंडित ने देखा कि महाकाल जिस भी गाँव में रुकता, वहाँ कोई न कोई मृत्यु की घटना घट जाती। 💀 यमदूत का रहस्य पंडित ने जब उससे पूछा, तो महाकाल ने अपना असली रूप बताया: "मैं यमदूत हूँ। प्राण हरना मेरा काम है।" पंडित ने डरते हुए पूछा, "अगली मृत्यु किसकी है?" महाकाल ने कहा, "तुम्हारे उसी मित्र की, जिससे तुम मिलने जा रहे हो।" यह सुनकर पंडित घबरा गया और उल्टे पाँव अपने गाँव लौटने लगा। महाकाल ने उसे रोका और कहा, "होनी को कोई नहीं टाल सकता।" और तभी, उसका मित्र जो उससे मिलने आ रहा था, पंडित के सामने ही हृदयाघात से मर गया। ⏳ पंडित की मृत्यु का समय पंडित ने कांपते हुए अपनी मृत्यु के बारे में पूछा। महाकाल ने बताया: "ठीक छह महीने बाद, दूसरे राज्य में, फांसी लगने से।" 🏰 बचने का प्रयास पंडित ने अपने राजा के पास जाकर शरण ली। राजा ने उसे छह महीने तक अपने महल में सुरक्षित रखने का इंतजाम किया। लेकिन नियति का खेल देखिए, पंडित को नींद में चलने की बीमारी थी, जिसका उसे खुद पता नहीं था। ⛓️ नियति का खेल मृत्यु वाली रात, पंडित नींद में चलते हुए दूसरे राज्य के राजा के शयनकक्ष में पहुँच गया। सुबह राजा ने उसे देखकर क्रोध में फांसी की सजा सुना दी। जब सच्चाई पता चली, तो राजा को पछतावा हुआ, लेकिन सजा बदली नहीं जा सकती थी। ⚡ कच्चा धागा और अंतिम सत्य मंत्रियों ने सुझाव दिया कि कच्चे धागे का फंदा बनाकर सजा पूरी कर ली जाए, ताकि पंडित की जान बच जाए। लेकिन विधि का विधान कौन बदल सकता है? कच्चे धागे का फंदा तो टूट गया, पर उससे पंडित के गले की नस कट गई और अत्यधिक खून बहने से उसकी मृत्यु हो गई। 📜 शिक्षा: यह कहानी हमें सिखाती है कि मृत्यु एक अटल सत्य है। इससे भागने की कोशिश व्यर्थ है। हमें इससे घबराना नहीं चाहिए, बल्कि अपने कर्मों को सुधारना चाहिए। हर जीव का समय निश्चित है। "मृत्यु भय नहीं, जीवन का एक पड़ाव है।" जय श्री राम 🙏🙏
एक सेठ की स्टेशन मास्टर से साँठ-गाँठ हो गयी। सेठ को आधी कीमत पर बासमती चावल मिलने लगा । सेठ ने सोचा कि इतना पाप हो रहा है , तो कुछ धर्म-कर्म भी करना चाहिए। एक दिन उसने बासमती चावल की खीर बनवायी और किसी साधु बाबा को आमंत्रित कर भोजनप्रसाद लेने के लिए प्रार्थना की। साधु बाबा ने बासमती चावल की खीर खायी। दोपहर का समय था । सेठ ने कहाः "महाराज ! अभी आराम कीजिए । थोड़ी धूप कम हो जाय फिर पधारियेगा। साधु बाबा ने बात स्वीकार कर ली। सेठ ने 100-100 रूपये वाली 10 लाख जितनी रकम की गड्डियाँ उसी कमरे में चादर से ढँककर रख दी। साधु बाबा आराम करने लगे। खीर थोड़ी हजम हुई । साधु बाबा के मन में हुआ कि इतनी सारी गड्डियाँ पड़ी हैं, एक-दो उठाकर झोले में रख लूँ तो किसको पता चलेगा ? साधु बाबा ने एक गड्डी उठाकर रख ली। शाम हुई तो सेठ को आशीर्वाद देकर चल पड़े। सेठ दूसरे दिन रूपये गिनने बैठा तो 1 गड्डी (दस हजार रुपये) कम निकली। सेठ ने सोचा कि महात्मा तो भगवतपुरुष थे, वे क्यों लेंगे.? नौकरों की धुलाई-पिटाई चालू हो गयी। ऐसा करते-करते दोपहर हो गयी। इतने में साधु बाबा आ पहुँचे तथा अपने झोले में से गड्डी निकाल कर सेठ को देते हुए बोलेः "नौकरों को मत पीटना, गड्डी मैं ले गया था।" सेठ ने कहाः "महाराज ! आप क्यों लेंगे ? जब यहाँ नौकरों से पूछताछ शुरु हुई तब कोई भय के मारे आपको दे गया होगा । और आप नौकर को बचाने के उद्देश्य से ही वापस करने आये हैं क्योंकि साधु तो दयालु होते है।" साधुः "यह दयालुता नहीं है । मैं सचमुच में तुम्हारी गड्डी चुराकर ले गया था। साधु ने कहा सेठ ....तुम सच बताओ कि तुम कल खीर किसकी और किसलिए बनायी थी ?" सेठ ने सारी बात बता दी कि स्टेशन मास्टर से चोरी के चावल खरीदता हूँ, उसी चावल की खीर थी। साधु बाबाः "चोरी के चावल की खीर थी इसलिए उसने मेरे मन में भी चोरी का भाव उत्पन्न कर दिया। सुबह जब पेट खाली हुआ, तेरी खीर का सफाया हो गया तब मेरी बुद्धि शुद्ध हुई कि 'हे राम.... यह क्या हो गया ? मेरे कारण बेचारे नौकरों पर न जाने क्या बीत रही होगी । इसलिए तेरे पैसे लौटाने आ गया । "इसीलिए कहते हैं कि.... जैसा खाओ अन्न ... वैसा होवे मन। जैसा पीओ पानी .... वैसी होवे वाणी । जैसी शुद्धी.... वैसी बुद्धी.... । जैसे विचार ... वैसा संसार
पुराने ज़माने की बात है रामदीन नाम का एक युवक किसी जमीदार के यहाँ नौकरी करता था. कई सालों तक नौकरी करते-काते रामदीन को अपने परिवार की याद सताने लगी.एक दिन उसने जमीदारसे अपने मन की चिंता कही. जमींदार ने कहा, ‘जरूर जाओ बेटा, लेकिन जाने से पहले तुम्हारी तनख्वाह के अलावा मैं तुम्हें उपहारस्वरूप कुछ देना चाहता हूँ. उपहार के रुप में तुम्हारे पास दो विकल्प हैं. पहला, सोने को तीन मोहरे और दूसरा विकल्प है, तीन ज्ञान की बातें. रामदीन अपने मालिक को चतुराई से काफी प्रभावित था. उसने कहा, मालिक पैसे तो मेरे पास हैं. मैंने तनख्वाह के पैसों में भी काफी बचत की है. मुझे आप ज्ञान की तीन बाते बता दें. जमींदार ने कहा, “तो ध्यान से सुनो. पहली ज्ञान की बात है. कभी भी पुराने के बदले नया रास्ता चुनोइ की गे, तो तुम्हें नई मुसीबतों का सामना करता पडेगा. दूसरी बात हैं, देखो ज्यादा, और बोलो बिल्कुल कम…. और ज्ञान की तीसरी बात है, कोई भी चीज करने से पहले अच्छी तरह सोच लो.’ ऐसा कहकर जमीदार ने उसे एक मोटी-भी रोटी दी और कहाकि जब भी वह सचमुच खुशी महसूस को तब तुम रोटी को तोड़ लेना है. रामदीन जमीदार से विदा लेकर चल दिया. रास्ते में उसे दुसरे राहगीर मिले. उन्होंने रामदीन से कहा ‘हम तो छोटे रास्ते से आगे बढेंगे, समय कम लगेगा’. तभी रामदीन को जमीदार की कही बात याद आ गयी, उसने कहा नहीं दोस्तों मै तो इसी रास्ते से आगे जाऊंगा.यह कहकर रामदीन आगे बढ़ गया. आधे रास्ते आगे चलने पर उसने कुछ धमाके सुने. वह समझ गया कि उसके साथ चल रहे दूसरे लोग, जो छोटे रास्ते से गये हैं, डकैतों के शिकार वन गए है. और कुछ समय आगे जाने पर रामदीन को भूख लग आई थी. वह एक सराय में भोजन और आराम करने पहुंचा. उसे खाना परोसा गया. रामदीन को खाना कुछ अजीब लगा. उसने देखा, उसे जो माँस परोसा गया था, वह इंसान का था. उसने सराय के मालिक को डांटने फटकारने की बात सोची. लेकिन तभी जमींदार की कही दूसरी बात याद आ गयी. उसने चुपचाप खाने के पैसे चुकाए और आगे चढ़ने लगा. तभी सराय के मालिक ने कहा, “सुनो! आज तुमने अपनी जान बचा ली. जिसने भी आजतक भोजन में मीनमेख निकाला, उन्हें मैंने खूब पीटा और मार डाला, फिर उनका माँस पका कर बेच दिया.’ रामदीन ने उसकी बात सुन ली, लेकिन कुछ कहा नहीं. शाम तक रामदीन अपने घर पहुंच गया. उसने देखा कि घर में उसकी पत्नी एक युवक के साथ हंस-हंस कर बाते कर रही हैं. उसे बहुत गुस्सा आया. वह वहाँ पड़ी एक लाठी से उस युवक का सिर फोड़ने ही वाला था. तब तक उसे जमींदार को तीसरी बात याद आ गई. वह पत्नी के नजदीक पहुंचा, तो पत्नी खुशी से उछल पड़ी. उसने युवक से कहा, ‘अरे दीपक! ये तुम्हारे पिताजी हैं.’ फिर उसने रामदीन से कहा, ‘यहआपका बेटा है है देखो केसेसंयोग हैं. यह भी कई ‘सालों तक पढाई करके आज ही घर लौटा है, और आप भी.’ रामदीन को खुशी का ठीकाना न रहा. अगर उसने जमींदार से ज्ञान की तीन बातें न सीखी होती तो या तो वह घर पहुँच ही नहीं पाता, किसी तरह पहुंच पता तो अब बेटे की हत्या कर बैठता. तभी उसे जमींदार द्वारा दी गई रोटी को याद आई, उसने कहा था कि सचमुच खुश होने पर रोटी को तोड़ना. रोटी तोड़ते भी उसमें से तीन सोने को मोहरें निकलीं, जिसे उसके दयालु मालिक ने छिपा कर रखा थl
" दुनिया गोल है " सेठ ने अभी दुकान खोली ही थी कि एक औरत आई और बोली :- "सेठ जी यह अपने दस रुपये लो".. सेठ उस गरीब सी औरत को प्रश्नवाचक नजरों से देखने लगा,जैसे पूछ रहा हो कि ... मैंने कब तुम्हे दस रुपये दिये? औरत बोली :- कल शाम को मै सामान ले कर गई थी... तब आपको सौ रुपये दिये थे, 70 रुपये का सामान खरीदा था ... आपने 30 रुपये की जगह मुझे 40 रुपये वापस दे दिये। "सेठ ने दस रुपये को माथे से लगाया,फिर गल्ले मे डालते हुए बोला कि एक बात बताइये बहन जी? आप सामान खरीदते समय कितने मोल भाव कर रही थी। पाँच रुपये कम करवाने के लिए आपने कितनी बहस की थी,और अब यह दस रुपये लौटाने चली आई ???? औरत बोली :- "पैसे कम करवाना मेरा हक है" मगर एक बार मोल भाव होने के बाद, "उस चीज के कम पैसा देना पाप है। सेठ बोला ... " लेकिन, आपने कम पैसे कहाँ दिये? आपने पूरे पैसे दिये थे,यह दस रुपया तो मेरी गलती से आपके पास चला गया...रख लेती,तो मुझे कोई फर्क नही पड़ने वाला था " औरत बोली :- " आपको कोई फर्क नही पड़ता ? मगर मेरे मन पर हमेशा ये बोझ रहता कि मैंने जानते हुए भी,आपके पैसे खाये। इसलिए मै रात को ही,आपके पैसे वापस देने आई थी l मगर उस समय आपकी दुकान बन्द थी। " सेठ ने महिला को आश्चर्य से देखते हुए पूछा :- "आप कहाँ रहती हो"..? वह बोली ;- "मैं सेक्टर आठ मे रहती हूँ"... सेठ का मुँह खुला रह गया ... बोला :- "आप 7 किलोमीटर दूर से",यह दस रुपये देने दूसरी बार आई हो ? औरत सहज भाव से बोली :- "हाँ दूसरी बार आई हूँ , मन का सुकून चाहिए तो ऐसा करना पड़ता है । मेरे पति इस दुनिया मे नही है मगर उन्होंने मुझे एक ही,बात सिखाई है कि "दूसरे के हक का एक पैसा भी,मत खाना" क्योंकि इंसान चुप रह सकता है मगर ऊपर वाला कभी भी हिसाब माँग सकता है और उस हिसाब की सजा मेरे बच्चों को भी मिल सकती है ...." इतना कह कर वह औरत चली गई। सेठ ने तुरन्त गल्ले से तीन सौ रुपये निकाले और स्कूटी पर बैठता हुआ अपने नौकर से बोला तुम दुकान का ख्याल रखना,मै अभी आता हूँ। सेठ बाजार मे ही एक दुकान पर पहुँचा। फिर उस दुकान वाले को तीन सौ रुपये देते हुए बोला यह अपने तीन सौ रुपये लीजिए प्रकाश जी। कल जब आप सामान लेने आये थे,तब हिसाब मे ज्यादा जुड़ गए थे। प्रकाश हँसते हुए बोला "पैसे हिसाब मे ज्यादा जुड़ गए थे,तो आप तब दे देते जब मै दुबारा दुकान पर आता"...। इतनी सुबह सुबह आप तीन सौ रुपये देने चले आये। सेठ बोला, :- जब आप दुबारा आते तब तक मै मर जाता तब"..?? आपके मुझमे तीन सौ रुपये निकलते है,यह आपको तो पता ही नही था न..? इसलिए देना जरूरी था। पता नही "ऊपर वाला कब हिसाब माँगने लग जाए".. और... "उस हिसाब की सजा मेरे बच्चों को भी मिल सकती है । सेठ तो चला गया मगर प्रकाश के दिल मे खलबली मच गई। क्योंकि चार साल पहले उसने अपने एक दोस्त से "दस लाख रुपये"उधार लिए थे मगर पैसे देने के दूसरे ही दिन दोस्त मर गया था। दोस्त के घर वालों को पैसों के बारे मे पता नही था इसलिए किसी ने उससे पैसे वापस नही माँगे थे। प्रकाश के दिल मे लालच आ गया था इसलिए खुद पहल करके पैसे देने वह नही गया। आज दोस्त का परिवार गरीबी मे जी रहा था। दोस्त की पत्नी लोगों के घरों मे झाडू पौंछा करके बच्चों को पाल रही थी फिर भी, प्रकाश उनके पैसे हजम किये बैठा था। सेठ का यह वाक्य " पता नही कब ऊपर वाला हिसाब माँगने बैठ जाए" और ...."उस हिसाब की सजा मेरे बच्चों को भी मिल सकती है" प्रकाश को डरा रहा था । प्रकाश दो तीन दिन तक टेंशन में रहा , आखिर मे उसका जमीर जाग गया। उसने बैंक से रुपये निकाले और पैसे लेकर दोस्त के घर पहुँच गया। दोस्त की पत्नी घर पर ही थी, प्रकाश जाकर उसके पैरों मे गिर गया। एक एक रुपये के लिए संघर्ष कर रही,उस "विधवा औरत"के लिए इतने रुपये बहुत बड़ी रकम थी। पैसे देखकर उसकी आँखों मे आँसू आ गए। वह प्रकाश को"दुआएँ"देने लगी,जो उसने ईमानदारी दिखाते हुए,पैसे लौटा दिये। यह वही औरत थी जो सेठ को दस रुपये लौटाने दो बार गई थी । अपनी "मेहनत" और "ईमानदारी"का खाने वालो की ईश्वर "परीक्षा" जरूर लेता है मगर कभी भी,उन्हे अकेला नही छोड़ता, एक दिन जरूर सुनता है "ऊपर वाले पर भरोसा रखिये"। भगवान के घर देर जरूर है पर अन्धेर नहीं है... " साभार "
मैंने सुना है, एक भिखारी एक दिन अमेरिका के एक अरबपति एण्ड्रू कार्नेगी के पास गया। सुबह ही सुबह जाकर उसने बड़ा शोरगुल मचाया। तो एण्ड्रू कार्नेगी खुद बाहर आया और उसने कहा कि इतना शोरगुल मचाते हो! और भीख मांगनी हो तो वक्त से मांगने आओ! अभी सूरज भी नहीं निकला है, अभी मैं सो रहा था। उस भिखारी ने कहा, रुकिए; अगर मैं आपके व्यवसाय के संबंध में कोई सलाह दूं आपको अच्छा लगेगा? एण्ड्रू कार्नेगी ने कहा कि बिलकुल अच्छा नहीं लगेगा। तुम सलाह दे भी क्या सकते हो मेरे व्यवसाय के संबंध में! तुम्हारा कोई अनुभव नहीं है। उस भिखारी ने कहा, आप भी मत दें सलाह। आपको भी कोई अनुभव नहीं है। जब तक हम उत्पात न करें, तब तक कोई देता है? वक्त से आने पर आपसे मिलना ही मुश्किल था। सेक्रेटरी होता, पहरेदार होते। अभी बेवक्त आया हूं तो सीधा आपसे मिलना हो गया। सलाह आप मुझको मत दें, मेरा पुराना धंधा है, और बपौती है, बाप—दादे भी यही करते रहे हैं। एण्ड्रू कार्नेगी ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि मैं खुश हुआ उस आदमी की बात से। मैंने उससे कहा कि तुम क्या चाहते हो? उस आदमी ने कहा कि मैं ऐसे मुफ्त कभी किसी से कुछ लेता नहीं। मैं कोई भिखारी नहीं हूं। लेकिन एक काम मैं कर सकता हूं जो आप नहीं कर सकते। और अगर कुछ दाव पर लगाने की इच्छा हो, तो बोलिए! एण्ड्रू कार्नेगी ने लिखा है कि मुझे भी रस लगा कि वह क्या कह रहा है। कौन—सा काम है, जो वह कर सकता है और मैं नहीं कर सकता! तो मैंने उससे कहा, अच्छा, सौ डालर दाव पर। वह कौन—सा काम है? उसने कहा कि मैं एक सर्टिफिकेट ला सकता हूं कि मैं भिखारी हूं पर आप सर्टिफिकेट नहीं ला सकते। एण्ड्रू कार्नेगी ने अपने संस्मरण में लिखा है, सौ डालर मैंने उसे दिए, लेकिन फिर मैं सोचता रहा कि सर्टिफिकेट मैं ला सकूं या न ला सकुं भिखारी तो मैं भी हूं। अरबों रुपए मेरे पास हैं, इससे क्या फर्क पड़ता है! भीख तो जारी है, अभी भी मांग तो जारी है, अभी भी मैं खोज तो रहा ही हूं। कोई मुझे सर्टिफिकेट नहीं देगा, क्योंकि अगर मैं भिखारी हूं तो इस जगत में कोई भी समृद्ध नहीं है। दस अरब रुपए एण्ड्रू कार्नेगी छोड्कर मरा है। पर उसने लिखा है कि भिखारी तो मैं हूं उस आदमी ने बात तो ठीक ही कही है। क्योंकि अभी भी मेरी मांग है, आका्ंक्षा है। मेरा भिक्षा का पात्र अभी भी हाथ में है। अभी भी मुझे कुछ मिल जाए तो मैं सब खोने को तैयार हूं कुछ मिल जाए तो अपने को और लगाने को तैयार हूं। एण्ड्रू कार्नेगी जब मरा, तो मरने के दो दिन पहले जो आदमी उसकी जीवन—कथा लिख रहा था, उससे उसने पूछा कि अगर तुम्हें परमात्मा यह मौका दे, तो तुम एण्ड्रू कार्नेगी के सेक्रेटरी होकर उसकी आत्म—कथा लिखना पसंद करोगे? या तुम एण्ड्रू कार्नेगी बनना पसंद करोगे और एण्ड्रू कार्नेगी तुम्हारी आत्मकथा लिखे? तो उस सेक्रेटरी ने कहा, क्षमा करें, आप बुरा न मानें; एण्ड्रू कार्नेगी बनना मैं कभी पसंद नहीं करूंगा। मैं ठीक हूं कि आपकी आत्म—कथा लिख रहा हूं। तो एण्ड्रू कार्नेगी ने कहा, इसका क्या कारण है? तो उसने कहा कि देखें, मैं आता हूं ग्यारह बजे; पांच बजे मेरी छुट्टी हो जाती है। आपके दफ्तर के क्लर्क आते हैं दस बजे, पांच बजे उनकी छुट्टी हो जाती है। चपरासी आता है नौ बजे, पाच बजे उसकी भी छुट्टी हो जाती है। आपको मैं सुबह सात बजे से दफ्तर में रात ग्यारह बजे तक देखता हूं। चपरासी से गई बीती हालत आपकी है। एण्ड्रू कार्नेगी भगवान मुझे कभी न बनाए। वह मैं नहीं होना चाहता। एण्ड्रू कार्नेगी ठीक ही कह रहा है कि मैं भी भिखारी तो हूं ही। सब पाकर भी अगर आत्मा न मिले, तो भिखमंगेपन का अनुभव होगा। और सब खो जाए, आत्मा बच जाए, तो भीतर के सम्राट का पहली दफा अनुभव होता है।
किसी जंगल में एक गधा रहता था। उसने बाकी जीवों से कहना आरंभ कर दिया कि, शेर एक अच्छा राजा नहीं है। उसमें कोई दम नहीं है। संकट काल में वह तुम्हारी मदद नहीं कर पाएगा। अतः तुम सब लोग मुझे अपना राजा मान लो। इसपर जंगल के सभी जीव हंसने लगे। गधा अपने आप को बलशाली दिखाने के लिए सुरक्षित अंतर से शेर को गालियां बकने लगा। उस पर भिन्न-भिन्न प्रकार के आरोप लगाने लगा। गधा शेर को आवाहन करने लगा कि, अगर आप में साहस है, तो मुझसे लड़कर दिखाओ। कुशल कामकाजी शेर ने गधे की तरफ बिल्कुल ध्यान ही नही दिया और निष्ठापूर्वक अपना काम करता रहा। थक-हारकर गधा वापस चला गया और फिर बाकी जीवों को बताने लगा कि, शेर तो बिल्कुल कमजोर है। मैंने उसे इतनी गालियां दीं, आवाहन दिया, परंतु वह चुपचाप सुनता रहा। बकरी, खरगोश जैसे कुछ जीव, जो गधे के उपकार मानते थे, क्योंकि गधा उन्हें भोजन के लिए हरि घास के मैदानों का पता बताता था, वे गधे की हां में हां मिलाने लगे। गधे के जाने के बाद शेर के महामंत्री हाथी ने उससे पूछा :- महाराज! वो गधा आपको इतनी गालियां बकता रहा, आपको लड़ने के लिए आवाहन करता रहा, फिर भी आप चुप क्यों रहे ? आप चाहते, तो पंजे के मात्र एक वार से ही उसका काम समाप्त कर सकते थे। अथवा मुझे आदेश दे देते, तो मैं क्षण भर में उसकी चटनी बना देता। इससे जंगल आपकी धाक भी कायम रहती। शेर ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया :- गजराज! इसके तीन कारण हैं। प्रथम कारण :- अगर मैं अथवा आप गधे से लड़ते, तो अन्य जीव यह कहते कि, हमारा राजा तो तानाशाह है। भला गधे जैसे निरीह जीव से भी कोई बुद्धिमान लड़ता है ? द्वितीय कारण :- लड़ाई में गधा मर जाता, तो उसकी माँ, परिवार वाले और चमचे उसे शहीद बता कर बाकी जीवों की सहानुभूति अर्जित करके उन्हें हमारे विरुद्ध विद्रोह के लिए उकसाते। तृतीय कारण :- गधे के परिवार को वास्तव लाभ मिलता देख कई अन्य जीव भी शहीद बनने की जुगाड में लग जाते। मैं उस गधे के अथवा उसके सखाओं के कारण जंगल का राजा अर्थात वनराज नहीं हूं। न अभिषेको न संस्कार: सिंहस्य क्रियते वने। विक्रमार्जित सत्वस्य स्वयमेव मृगेन्द्रता।। अर्थ :- जंगल में सिंह का राज्याभिषेक संस्कार आदि कुछ नहीं किया जाता। उसके पराक्रम के कारण उसे स्वयमेव राज-पद अर्जित हो जाता है।
दो मित्र और कुल्हाड़ी एक गाँव में दो घनिष्ठ मित्र रहते थे। दोनों साथ-साथ ही अधिकतर काम करते थे और अक्सर सड़क पर घूमने भी निकल जाया करते थे। एक दिन दोनों मित्र बातचीत करते हुए सड़क पर जा रहे थे। रास्ता सुनसान था और इधर-उधर झाड़ियाँ फैली हुई थीं। चलते-चलते अचानक एक मित्र की नज़र झाड़ी के पास किसी चमकती हुई वस्तु पर पड़ी। उसने पास जाकर देखा तो वहाँ एक तेज़ धार वाली कुल्हाड़ी पड़ी थी। वह प्रसन्न होकर चिल्लाया – “अरे! देखो, मुझे क्या मिला है! यह कुल्हाड़ी अब मेरी हुई।” यह सुनकर उसका साथी कुछ गंभीर स्वर में बोला – “मित्र, यह ठीक नहीं है कि तुम कहो ‘मुझे मिली है’। हम दोनों साथ चल रहे थे, इसलिए यह हमारी संयुक्त प्राप्ति है। हमें कहना चाहिए – ‘हमें कुल्हाड़ी मिली है।’” परंतु पहले मित्र ने हँसते हुए उत्तर दिया – “नहीं-नहीं, इसे मैंने देखा और मैंने ही उठाया, इसलिए यह सिर्फ मेरी है।” इसी बात पर दोनों में तकरार शुरू हो गई। पहले मित्र का ज़ोर था कि चीज़ उसी की है, जबकि दूसरा मित्र बराबर समझाता रहा कि सुख-दुख, लाभ-हानि सब मिल बाँटकर ही साझा करने चाहिए। लेकिन पहले मित्र पर लालच का पर्दा चढ़ चुका था, वह कुछ सुनने को तैयार ही नहीं था। इसी बीच कुल्हाड़ी का असली मालिक वहाँ आ पहुँचा। वह अपनी कुल्हाड़ी को ढूँढ़ता-ढूँढ़ता उसी रास्ते से गुजर रहा था। जैसे ही उसने उन दोनों को कुल्हाड़ी हाथ में लिए देखा, वह गुस्से से चिल्ला उठा – “चोर! तुम दोनों ने मेरी कुल्हाड़ी चुराई है।” उसका क्रोध देखकर दोनों मित्र डर गए और चुपचाप खड़े रह गए। कुल्हाड़ी का मालिक बार-बार उन्हें डाँटते हुए चोर कहता रहा। तब तक पहला मित्र, जिसने कुल्हाड़ी उठाई थी, अपने साथी से धीरे से बोला – “हाय! अब तो हम गए काम से, अब तो सज़ा मिलकर ही रहेगी।” यह सुनते ही दूसरा मित्र तुरंत बोला – “नहीं भाई, जब कुल्हाड़ी मिली थी तब तुमने कहा था ‘मुझे मिली है’। तब तुमने मेरा हिस्सा नहीं माना। अब जब संकट आ गया है तो ‘हम’ क्यों कह रहे हो? कहो – ‘मैं गया काम से।’” इस घटना ने पहले मित्र को गहरा सबक सिखाया। वास्तव में, जो सुख के समय साथियों को नज़रअंदाज़ करता है, उसे दुख और संकट के क्षण भी अकेले ही झेलने पड़ते हैं। --- कहानी का संदेश यह है कि मित्रता और जीवन का असली अर्थ सुख-दुख को साझा करने में है। यदि इंसान केवल सुख अपने पास रखना चाहे और कठिनाई से भागना चाहे, तो अंततः उसे कठिनाई अकेले ही झेलनी पड़ती है।
चालाकी का परिणाम एक गाँव में एक कंजूस बूढ़ी महिला रहती थी। उसके पास धन-दौलत तो बहुत थी, लेकिन उसके स्वभाव के कारण कोई उसे पसंद नहीं करता था। घर में उसकी कई नौकरानियाँ थीं, जिन पर वह दिन-रात हुकूमत चलाती थी। महिला की आदत थी कि जैसे ही सुबह उसके घर का मुर्गा बाँग देता, वह उसी समय जाग जाती। मुर्गे की बाँग सुनते ही वह नौकरानियों को जोर-जोर से आवाज़ देती और तुरंत काम में जुटा देती। चाहे अँधेरा हो या ठंडी सुबह, नौकरानियों को बर्तन माँजने, आँगन साफ़ करने और अन्य काम करने के लिए दौड़ाया जाता। नौकरानियों को यह आदत बिल्कुल पसंद नहीं थी। वे चाहती थीं कि सुबह देर तक सो सकें, लेकिन मुर्गे की बाँग और मालकिन की आवाज़ से उनकी नींद हर दिन टूट जाती। धीरे-धीरे उनके मन में मुर्गे के प्रति चिढ़ और गुस्सा बढ़ता गया। एक दिन उन्होंने आपस में सलाह की—"अगर यह मुर्गा नहीं रहेगा, तो हमारी मुसीबत आधी हो जाएगी। बूढ़ी मालकिन देर तक सोती रहेगी और हमें भी चैन से सोने का मौका मिलेगा।" सभी इस बात से सहमत हो गईं। रात को जब सब सो गए, नौकरानियों ने चुपके से मुर्गे को पकड़कर मार डाला और सोचने लगीं कि अब सुबह का झंझट खत्म हो जाएगा। लेकिन अगले ही दिन उनकी समझ में आ गया कि उन्होंने कितनी बड़ी गलती कर दी है। सुबह मुर्गे की बाँग नहीं सुनाई दी तो बूढ़ी महिला घबरा गई। उसने सोचा—"अब मुर्गा नहीं रहा, तो कहीं मैं देर तक सो न जाऊँ।" यही सोचकर उसने और सतर्क रहना शुरू कर दिया। वह रात के किसी भी समय उठ जाती और नौकरानियों को काम में लगा देती। कभी आधी रात को झाड़ू लगवाती, तो कभी अँधेरे में ही बर्तन मँजवाती। अब नौकरानियों की नींद और भी बुरी तरह खराब होने लगी। पहले तो उन्हें सिर्फ सुबह जल्दी उठना पड़ता था, लेकिन अब तो दिन-रात चैन ही नहीं बचा। कुछ दिनों बाद उन्हें अपने कर्म पर पछतावा हुआ। वे सोचने लगीं—"हमने चालाकी दिखाकर मुर्गे को मार तो दिया, लेकिन इससे हमारी मुसीबत कम होने के बजाय और बढ़ गई।" इस घटना से उन्हें एक बड़ी सीख मिली कि चालाकी और स्वार्थ में किया गया काम हमेशा लाभकारी नहीं होता। कई बार छोटी-सी चालाकी भी बड़े नुकसान का कारण बन जाती है। नीति: बहुत अधिक चालाकी दिखाने पर कई बार हानि हो जाती है।
एक बार एक पत्रकार ने हेनरी फोर्ड से पूछा, "आप सबसे ज्यादा वेतन किसको देते हैं?" फोर्ड मुस्कुराए, और पत्रकार को अपने प्रोडक्शन रूम में ले गए। ●● वहां लोग दौड़ रहे थे, घंटियाँ बज रही थीं। और लिफ्टें चल रही थीं। अफरातफरी का माहौल था। उस अफरातफरी के बीच एक कैबिन था, जिसमें एक व्यक्ति आराम से कुर्सी पर पैर टेबल पर रखकर लेटा था। उसके चेहरे पर हैट था। फोर्ड ने उसका कंधा थपथपाया।व्यक्ति ने हैट उठाकर देखा और थकी हुई आवाज में बोला-"हैलो हेनरी, आप ठीक हैं?" फोर्ड मुस्कुराए और सिर हिलाया। पत्रकार चकित होकर पूरा दृश्य देखता रहा। फोर्ड बोले- यह व्यक्ति मेरी कंपनी में सबसे ज्यादा वेतन लेता है।" ●● पत्रकार हैरानी से पूछा-किस काम के? फोर्ड बोले- कुछ नहीं। यह बस आता है, और सारा दिन टेबल पर पैर रखकर बैठा रहता है।" - तो आप इसे सबसे ज्यादा वेतन क्यों देते हैं?" फोर्ड की आवाज गम्भीर हो गयी। बोले- "क्योंकि यह मेरे लिए सबसे उपयोगी व्यक्ति है मैंने इस व्यक्ति को सोचने के लिए रखा है।मेरी कंपनी के सारे सिस्टम और गाड़ियों के डिजाइन इसी व्यक्ति के आइडियाज़ हैं। यह आता है, कुर्सी पर लेटता है, सोचता है, नए आइडियाज़ तैयार करता है, और मुझे भेज देता है। मैं उन पर काम करता हूँ और करोड़ों डॉलर कमाता हूँ।" ●● दोस्तों- दुनिया में सबसे कीमती चीज़ें आइडियाज़ होते हैं, और आइडियाज़ के लिए आपको फ्री टाइम चाहिए होता है। पूर्ण शांति, हर तरह की बकबक से आज़ादी। यदि आप दिन-रात व्यस्त रहेंगे, तो आपके दिमाग में नए आइडियाज़ और नए प्रोजेक्ट्स नहीं आ सकते। इसलिए फोर्ड जी ने एक समझदार व्यक्ति को सिर्फ सोचने के लिए रखा है। उसे आर्थिक आज़ादी भी दी हुई है ताकि वह रोज कोई नया आइडिया दे सके।" यह सुनकर पत्रकार ताली बजाने पर मजबूर हो गया। ■■■■
अगले दिन तिलकराज दुकान पर गया। उसका दुकान पर मन नहीं लग रहा था। वह सारा दिन सोचता लेकिन उसे तो सेठ जी का पता मालूम ही नहीं था। रात के समय वह दुकान बंद करके घर जा रहा था। तभी उसका ध्यान एक शादी समारोह में गया। वहां काफी भीड़ थी। वह भी वहां देखने पहुंच गया। लड़की के पिता गुस्से में अपने समधी से लड़ रहे थे – ‘‘आप ये नकली गहने लेकर हमारी लड़की को अपने घर की बहु बनाने आये थे आपको शर्म आनी चाहिये।’’ जब तिलकराज ने देखा तो ये तो वही सेठ जी थे और वहीं पास में सारे जेवर रखे थे। सेठ जी ने कहा – ‘‘आप एक काम कीजिये अपने जान पहचान के किसी सुनार को बुलाईये उससे गहनों की जांच करवाईये।’’ सुनार को बुलाया गया। उसने गहनों की जांच की और कहा इनमें कुछ मिलावट है। यह सुनकर सेठ जी को बहुत गुस्सा आया वे बोले – ‘‘माफ कीजिये समधी जी ये धोका मुझे उस तिलकराज सुनार ने दिया हैं मैं कल ही उसकी दुकान बंद करवा दूंगा। उसे जेल करवा दूंगा।’’ तभी तिलकराज आगे आया और बोला – ‘‘सेठ जी आपके गहनों में गलती से मिलावट हो गई। गहने बन नहीं पा रहे थे। उनकी मजबूती के लिये हमें मिलावट करनी पड़ी। मैं सोना साथ में लेकर आपको ढूंढ रहा हूं। अपाका कोई पता नहीं था। तभी अचानक मैं यहां शादी में आ गया। मुझे माफ कर दीजिये। यह रहा आपका सोना।’’ यह कहकर तिलकराज ने सोना सेठ जी को दे दिया। सुनार ने सोना तोला तो बराबर मिलावट के जितना था। सेठजी ने कहा – ‘‘अगर तुम समय पर नहीं आते तो समाज में मेरी बहुत बेज्जती हो जाती।’’ लड़की के पिता ने सेठ जी से माफी मांगी और विवाह की रशमें शुरू हो गईं। तिलकराज घर आया आज वह बहुत खुश था। उसने सारी बात कावेरी को बताई। कावेरी बोली – ‘‘देखा आपकी जरा सी बेईमानी से एक शादी टूट जाती और अगर इस सब में सेठ जी को कुछ हो जाता तो उनकी मौत के जिम्मेदार भी आप होते।’’ तिलकराज बोला – ‘‘हां अब मैं आगे से कभी ऐसा काम नहीं करूंगा।’’ अगले दिन से वह सबको ईमानदारी से गहने बेचने लगा।
चंद्रपुर नगर में एक सोने का व्यापारी था उसका नाम था तिलकराज। वह सोने के गहने बना कर बेचता था। वह सोने में मिलावट नहीं करता था। उस बाजार में और भी सुनारों की दुकानें थीं, लेकिन सबसे ज्यादा भीड़ तिलकराज की दुकान पर ही रहती थी। बाकी दुकानदार तिलकराज से बहुत परेशान रहते थे। क्योंकि वे मिलावट करके ज्यादा मुनाफा कमाना चाहते थे। एक दिन तिलकराज रात के समय अपनी दुकान बंद करके घर जा रहा था। तब वहां के कुछ सुनारों ने उसे बुलाया और कहा – ‘‘भाई तुम तो हम सबका धंधा बंद करवा दोगे। तुम भी हमारी तरह सोने मिलावट करके मौटा पैसा बना सकते हो। इतनी ईमानदारी से तुम्हें मिलता ही क्या होगा।’’ उनकी बात सुनकर तिलकराज के मन में लालच आने लगा। वह यही सब सोचता हुआ घर पहुंचा। घर पर उसकी बेटी जिसकी उम्र पांच साल थी। वह आकर अपने पिता के गले लग गई। तिलकराज ने उससे बहुत प्यार किया तभी उसकी पत्नी कावेरी उसके लिये खाना ले आई। आज कावेरी तिलकराज को देख रही थी। उसका मन खाने में नहीं है। हर दिन तिलकराज कावेरी के बनाये खाने की तारीफ करता था। लेकिन आज उसे खाना कैसा लगा ये भी उसने नहीं बताया। कावेरी उसके पास बैठ गई और बोली – ‘‘आज खाना अच्छा नहीं बना क्या?’’ तिलकराज जैसे किसी नींद से जगा उसने कहा – ‘‘नहीं नहीं खाना तो बहुत अच्छा है। शायद मेरा ध्यान ही कहीं और था। कावेरी मैं तुमसे कुछ बात करना चाहता हूं। तुम मेरी हालत जानती हों हम लोग केवल अपने खर्चे ही चला पाते हैं। ऐसे में मेरे साथ के दुकान वाले पहले से बहुत अमीर हैं क्योंकि वे सोने में मिलावट करते हैं। जिसका पता ग्राहक को कभी नहीं लगता। इस तरह वे उस गहने की चार गुना कीमत वसूल कर लेते हैं।’’ कावेरी बोली – ‘‘आप साफ साफ बताईये बात क्या है?’’ यह सुनकर तिलकराज बोला – ‘‘आज कई दुकानदारों ने मुझे रोक कर कहा कि मुझे भी मिलावट करनी चाहिये। मैं भी सोच रहा हूं अगर थोड़ी सी मिलावट कर ली जाये तो किसी को क्या पता लगेगा। इतने सालों में विश्वास मैंने कमाया है उसे अब इस्तेमाल करना चाहिये हम भी अमीर बन जायेंगे। कावेरी हमारी बच्ची का भी तो भविष्य है, उसके लिये भी हमें पैसे जोड़ने हैं।’’ कावेरी यह सुनकर बहुत आश्चर्यचकित हो गई उसने कहा – ‘‘मुझे समझ नहीं आता आज तक आप बिल्कुल ईमानदारी से चलते थे। आप पर लोग भरोसा करते हैं। आज आपको क्या हो गया। आज मन में ये बेईमानी का ख्याल कैसे आ गया।’’ तिलकराज ने झुझलाते हुए कहा – ‘‘अरे तुम तो कुछ समझ ही नहीं रही हों। हमें अपनी बच्ची के भविष्य के लिये ये काम कर लेना चाहिये। कुछ साल ऐसा करके हमारे पास पैसा आ जाये फिर हम ये सब नहीं करेंगे।’’ यह सुनकर कावेरी को बहुत गुस्सा आया उसने कहा – ‘‘क्या आप अपनी बच्ची को चोरी के पैसों से पालपोस कर बड़ा करेंगे। यह तो सही नहीं है।’’ लेकिन तिलकराज अपनी जिद पर अड़ा था। वह अब किसी भी कीमत पर अमीर बनना चाहता था। उसने कावेरी से आगे बात करना ठीक नहीं समझा और चुपचाप खाना खाकर सोने चला गया। कावेरी उसके इस तरह के इरादे से बहुत सदमे में थी। उसे लग रहा था, कि कहीं इन पैसों से उनके घर का सुख चैन न चला जाये। अगले दिन तिलकराज दुकान पर गया और अपने कारीगर से सोने के जेवर में मिलावट करने के लिये कहा, कारीगर ने थोड़े से तांबे की मिलावट करके जेवर बना दिये। अगले दिन ग्राहक जब अपने जेवर लेने आये तो बोले – ‘‘भाई तिलकराज जी मेरे बेटे की शादी है इसीलिये मैंने ये जेवर बनाये हैं। हम लोगों में रिवाज है कि बहु के मायके में ज्यादा से ज्याद जेवर लेकर जाते हैं। जिससे हमारी शान बढ़ जाये।’’ तिलकराज ने जेवर दे दिये और पैसे लेकर रख लिये। शाम को उसके कारीगर ने बचा हुआ सोना तिलकराज को दे दिया। तिलकराज सोना लेकर घर आ गया। उसे अब यह लग रहा था, कि अगर इतना ही सोना रोज बच जाये तो वह बहुत अमीर बन जायेगा। कुछ दिन बाद इस बने जेवर से ही गहने बना कर बेच दूंगा। उस रात तिलकराज अपने भविष्य के बारे में सोच कर खुश हो रहा था। इधर कावेरी को जब ये पता लगा तो वह बहुत परेशान हो गई। उसने तिलकराज को फिर से समझाने की कोशिश की, लेकिन उसने अपनी पत्नी को मूर्ख बताया और वह सो गया। रात को उसने सपना देखा कि उसकी बेटी बड़ी हो गई और उसका विवाह का दिन आ गया। जिस दिन उसका विवाह था। उसी दिन तिलकराज की चोरी का पता लड़के वालों को लग जाता है और वे बारात वापस ले जाते हैं। तिलकराज की आंख खुली वह पसीने में नहा गया था। उसने कावेरी को सपने के बारे में बताया। कावेरी ने कहा – ‘‘आपकी ईमानदारी ही हमारे लिये सबसे बड़ी दौलत है। ये काम छोड़ दीजिये।’’ तिलकराज बोला – ‘‘हां अब में आगे से कभी ये काम नहीं करूंगा लेकिन अब इस सोने का क्या करूं सेठ जी को वापस करना ही सही रहेगा। लेकिन वो मेरी बात पर विश्वास नहीं करेंगे।’’ कावेरी ने कहा – ‘‘तुम कल उनके घर चले जाओ और ये वापस करके माफी मांग लेना। या कोई बहाना लगा देना।’’
कल बाज़ार में फल खरीदने गया, तो देखा कि एक फल की रेहड़ी की छत से एक छोटा सा बोर्ड लटक रहा था, उस पर मोटे अक्षरों से लिखा हुआ था… घर मे कोई नहीं है, मेरी बूढ़ी माँ बीमार है, मुझे थोड़ी थोड़ी देर में उन्हें खाना, दवा और टॉयलट कराने के लिए घर जाना पड़ता है, अगर आपको जल्दी है तो अपनी मर्ज़ी से फल तौल लें, रेट साथ में लिखे हैं। पैसे कोने पर गत्ते के नीचे रख दें, धन्यवाद!!” अगर आपके पास पैसे नहीं हो तो मेरी तरफ से ले लेना, इजाज़त है..!! मैंने इधर उधर देखा, पास पड़े तराजू में दो किलो सेब तोले दर्जन भर केले लिये, बैग में डाले, प्राइस लिस्ट से कीमत देखी, पैसे निकाल कर गत्ते को उठाया, वहाँ सौ-पचास और दस-दस के नोट पड़े थे, मैंने भी पैसे उसमें रख कर उसे ढंक दिया। बैग उठाया और अपने फ्लैट पे आ गया, रात को खाना खाने के बाद मैं उधर से निकला, तो देखा एक कमज़ोर सा आदमी, दाढ़ी आधी काली आधी सफेद, मैले से कुर्ते पजामे में रेहड़ी को धक्का लगा कर बस जाने ही वाला था, वो मुझे देखकर मुस्कुराया और बोला “साहब! फल तो खत्म हो गए।” उसका नाम पूछा तो बोला: “सीताराम” फिर हम सामने वाले ढाबे पर बैठ गए। चाय आयी, वो कहने लगा, “पिछले तीन साल से मेरी माता बिस्तर पर हैं, कुछ पागल सी भी हो गईं है और अब तो फ़ालिज भी हो गया है, मेरी कोई संतान नहीं है, बीवी मर गयी है, सिर्फ मैं हूँ और मेरी माँ..!! माँ की देखभाल करने वाला कोई नहीं है, इसलिए मुझे ही हर वक़्त माँ का ख्याल रखना पड़ता है”… एक दिन मैंने माँ के पाँव दबाते हुए बड़ी नरमी से कहा, “..माँ!! तेरी सेवा करने को तो बड़ा जी चाहता है पर जेब खाली है और तू मुझे कमरे से बाहर निकलने नहीं देती, कहती है, तू जाता है तो जी घबराने लगता है, तू ही बता मै क्या करूँ?” न ही मेरे पास कोई जमा पूंजी है।.. ये सुन कर माँ ने हाँफते-काँपते उठने की कोशिश की। मैंने तकिये की टेक लगवाई, उन्होंने झुर्रियों वाला चेहरा उठाया अपने कमज़ोर हाथों को ऊपर उठाया, मन ही मन राम जी की स्तुति की फिर बोली.. “तू रेहड़ी वहीं छोड़ आया कर, हमारी किस्मत का हमें जो कुछ भी है, इसी कमरे में बैठकर मिलेगा।” मैंने कहा, “माँ क्या बात करती हो, वहाँ छोड़ आऊँगा तो कोई चोर उचक्का सब कुछ ले जायेगा, आजकल कौन लिहाज़ करता है? और बिना मालिक के कौन फल खरीदने आएगा?” कहने लगीं.. “तू राम का नाम लेने के बाद बाद रेहड़ी को फलों से भरकर छोड़ कर आजा बस, ज्यादा बक-बक नहीं कर, शाम को खाली रेहड़ी ले आया कर, अगर तेरा रुपया गया तो मुझे बोलियो!” ढाई साल हो गए हैं भाईसाहब सुबह रेहड़ी लगा आता हूँ … शाम को ले जाता हूँ, लोग पैसे रख जाते हैं.. ..फल ले जाते हैं, एक धेला भी ऊपर नीचे नहीं होता, बल्कि कुछ तो ज्यादा भी रख जाते हैं, कभी कोई माँ के लिए फूल रख जाता है, कभी कोई और चीज़!! परसों एक बच्ची पुलाव बना कर रख गयी, साथ में एक पर्ची भी थी “अम्मा के लिए!” एक डॉक्टर अपना कार्ड छोड़ गए पीछे लिखा था, ‘माँ की तबियत नाज़ुक हो तो मुझे कॉल कर लेना, मैं आ जाऊँगा, कोई ख़जूर रख जाता है, रोजाना कुछ न कुछ मेरे हक के साथ मौजूद होता है। न माँ हिलने देती है न मेरे राम कुछ कमी रहने देते हैं, माँ कहती है, तेरे फल मेरा राम अपने फरिश्तों से बिकवा देता हैl
पाप का गुरु कौन - प्रेरणादायक कहानी #trendingpost #lifelessons एक समय की बात है। एक पंडित जी कई वर्षों तक काशी में शास्त्रों का अध्ययन करने के बाद गांव लौटे। पूरे गांव में शोहरत हुई कि काशी से शिक्षित होकर आए हैं और धर्म से जुड़े किसी भी पहेली को सुलझा सकते हैं। शोहरत सुनकर एक किसान उनके पास आया और उसने पूछ लिया- पंडित जी आप हमें यह बताइए कि पाप का गुरु कौन है? प्रश्न सुन कर पंडित जी चकरा गए, उन्होंने धर्म व आध्यात्मिक गुरु तो सुने थे, लेकिन पाप का भी गुरु होता है, यह उनकी समझ और ज्ञान के बाहर था। पंडित जी को लगा कि उनका अध्ययन अभी अधूरा रह गया है। वह फिर काशी लौटे। अनेक गुरुओं से मिले लेकिन उन्हें किसान के सवाल का जवाब नहीं मिला। अचानक एक दिन उनकी मुलाकात एक गणिका (वेश्या) से हो गई। उसने पंडित जी से परेशानी का कारण पूछा, तो उन्होंने अपनी समस्या बता दी। गणिका बोली- पंडित जी ! इसका उत्तर है तो बहुत सरल है, लेकिन उत्तर पाने के लिए आपको कुछ दिन मेरे पड़ोस में रहना होगा। पंडित जी इस ज्ञान के लिए ही तो भटक रहे थे। वह तुरंत तैयार हो गए। गणिका ने अपने पास ही उनके रहने की अलग से व्यवस्था कर दी। पंडित जी किसी के हाथ का बना खाना नहीं खाते थे। अपने नियम-आचार और धर्म परंपरा के कट्टर अनुयायी थे। गणिका के घर में रहकर अपने हाथ से खाना बनाते खाते कुछ दिन तो बड़े आराम से बीते, लेकिन सवाल का जवाब अभी नहीं मिला। वह उत्तर की प्रतीक्षा में रहे। एक दिन गणिका बोली- पंडित जी ! आपको भोजन पकाने में बड़ी तकलीफ होती है। यहां देखने वाला तो और कोई है नहीं। आप कहें तो नहा-धोकर मैं आपके लिए भोजन तैयार कर दिया करूं। पंडित जी को राजी करने के लिए उसने लालच दिया- यदि आप मुझे इस सेवा का मौका दें, तो मैं दक्षिणा में पांच स्वर्ण मुद्राएं भी प्रतिदिन आपको दूंगी। स्वर्ण मुद्रा का नाम सुनकर पंडित जी विचारने लगे। पका-पकाया भोजन और साथ में सोने के सिक्के भी ! अर्थात दोनों हाथों में लड्डू हैं। पंडित जी ने अपना नियम-व्रत, आचार-विचार धर्म सब कुछ भूल गए। उन्होंने कहा- तुम्हारी जैसी इच्छा, बस विशेष ध्यान रखना कि मेरे कमरे में आते-जाते तुम्हें कोई नहीं देखे। पहले ही दिन कई प्रकार के पकवान बनाकर उसने पंडित जी के सामने परोस दिया। पर ज्यों ही पंडित जी ने खाना चाहा, उसने सामने से परोसी हुई थाली खींच ली। इस पर पंडित जी क्रुद्ध हो गए और बोले, यह क्या मजाक है ? गणिका ने कहा, यह मजाक नहीं है पंडित जी, यह तो आपके प्रश्न का उत्तर है। यहां आने से पहले आप भोजन तो दूर, किसी के हाथ का पानी भी नहीं पीते थे, मगर स्वर्ण मुद्राओं के लोभ में आपने मेरे हाथ का बना खाना भी स्वीकार कर लिया। यह लोभ ही पाप का गुरु है।