प्रेरक कथाएँ
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https://chat.whatsapp.com/EEitOrRDdFp9V89HcvXsba भगवान बटुक भैरव की संपूर्ण पौराणिक कथा🙏 प्राचीन समय की बात है। जब अधर्म बढ़ने लगा, तब भगवान शिव ने संसार की रक्षा के लिए अपने अनेक रूप धारण किए। उन्हीं दिव्य रूपों में से एक है बटुक भैरव, जो भगवान शिव का बाल स्वरूप माना जाता है। "बटुक" का अर्थ है बालक, और "भैरव" का अर्थ है भय का नाश करने वाला। 1. आपद राक्षस का वध सतयुग में आपद नाम का एक अत्यंत बलशाली राक्षस था। उसने कठोर तपस्या करके ऐसा वरदान प्राप्त किया कि न कोई देवता, न मनुष्य और न ही कोई महान योद्धा उसका वध कर सके। उसका अंत केवल पाँच वर्ष के एक बालक के हाथों ही संभव था। वरदान मिलते ही वह अहंकारी बन गया। उसने तीनों लोकों में आतंक मचा दिया। ऋषियों के यज्ञ नष्ट करने लगा, देवताओं को स्वर्ग से निकालने लगा और धर्म का विनाश करने लगा। देवता भयभीत होकर भगवान शिव की शरण में पहुँचे और प्रार्थना की— "हे महादेव! हमारी रक्षा कीजिए।" भगवान शिव मुस्कुराए और बोले— "जिसका अंत बालक के हाथों लिखा है, उसका अंत भी बालक ही करेगा।" तभी भगवान शिव ने एक तेजस्वी पाँच वर्षीय बालक का रूप धारण किया। यही दिव्य बालक बटुक भैरव कहलाए। बटुक भैरव खेलते-खेलते आपद राक्षस के सामने पहुँचे। राक्षस उस छोटे बालक को देखकर हँसने लगा और उसका उपहास उड़ाने लगा। लेकिन अगले ही क्षण बालक के शरीर से दिव्य प्रकाश निकलने लगा। उनके हाथों में त्रिशूल, डमरू और खप्पर प्रकट हो गए। देखते ही देखते उन्होंने अपने त्रिशूल से आपद राक्षस का संहार कर दिया। राक्षस के मरते ही देवताओं ने पुष्पवर्षा की। चारों ओर "हर हर महादेव" का जयघोष होने लगा। तब भगवान शिव ने कहा— "जो भी भक्त संकट में मेरा बटुक भैरव रूप स्मरण करेगा, उसके सभी भय और बाधाएँ दूर होंगी।" इसी कारण बटुक भैरव को संकट नाशक और आपदाओं से रक्षा करने वाला देवता माना जाता है। 2. ब्रह्मा जी के पाँचवें सिर की कथा एक अन्य प्रसिद्ध कथा के अनुसार, एक समय ब्रह्मा जी और विष्णु जी के बीच यह विवाद उत्पन्न हुआ कि दोनों में श्रेष्ठ कौन है। उसी समय भगवान शिव अनंत ज्योति-स्तंभ के रूप में प्रकट हुए और कहा कि जो इस ज्योति का आदि या अंत खोज लेगा, वही श्रेष्ठ कहलाएगा। विष्णु जी ने अपनी सीमा स्वीकार कर ली, लेकिन ब्रह्मा जी ने असत्य का सहारा लिया और दावा किया कि उन्होंने उस ज्योति का अंत देख लिया है। इस अहंकार और असत्य से भगवान शिव अत्यंत क्रोधित हुए। उनके क्रोध से भयंकर रूप में काल भैरव प्रकट हुए। काल भैरव ने ब्रह्मा जी के उस पाँचवें सिर को काट दिया जिससे उन्होंने असत्य और अहंकारपूर्ण वचन कहे थे। ब्रह्मा जी को अपनी भूल का एहसास हुआ। उन्होंने भगवान शिव से क्षमा माँगी। शिव जी ने उन्हें क्षमा कर दिया, लेकिन यह शिक्षा दी कि अहंकार और असत्य का अंत निश्चित है। बटुक भैरव का स्वरूप बटुक भैरव के स्वरूप में कई गहरे आध्यात्मिक प्रतीक हैं— बाल रूप – मासूमियत, करुणा और भक्तों की रक्षा का प्रतीक। त्रिशूल – अधर्म, अज्ञान और अहंकार का नाश। डमरू – सृष्टि और दिव्य शक्ति का प्रतीक। खप्पर (कपाल) – जीवन की नश्वरता और वैराग्य का संदेश। काला कुत्ता (वाहन) – निष्ठा, सतर्कता और निर्भयता का प्रतीक। बटुक भैरव की पूजा का महत्व मान्यता है कि जो भक्त श्रद्धा से बटुक भैरव की आराधना करता है, उसके जीवन से भय, शत्रु, नकारात्मक शक्तियाँ और अचानक आने वाली बाधाएँ दूर होती हैं। वे अपने भक्तों की रक्षा करते हैं और उन्हें साहस, आत्मविश्वास तथा सफलता का आशीर्वाद देते हैं। 🔱🚩 🙏जय बटुक भैरव महाराज🌹
https://chat.whatsapp.com/EEitOrRDdFp9V89HcvXsba क्या आप जानते हैं कि एक चींटी 72 बार स्वर्ग की राजा (इंद्र) बन चुकी है? पुराणों की यह अद्भुत कथा बड़े से बड़े अहंकार को पल भर में चकनाचूर कर देती है। बात उस समय की है जब देवराज इंद्र ने वृत्रासुर का वध किया था। तीनों लोकों में उनकी जय-जयकार हो रही थी। इस जीत के अहंकार में इंद्र ने विश्वकर्मा जी को बुलाकर कहा, "मेरे लिए एक ऐसा भव्य महल बनाओ, जैसा आज तक किसी ने न बनवाया हो!" महल बन गया—सोने के कंगूरे, हीरों के झरोखे। लेकिन इंद्र का मन नहीं भरा, वे बार-बार उसे और बड़ा करने का आदेश देते रहे। थक हारकर विश्वकर्मा जी भगवान विष्णु की शरण में गए। विष्णु जी मुस्कुराए और बोले— "अहंकार का इलाज हथौड़े से नहीं, आईने से होता है।" अगले दिन इंद्र के दरबार में एक 10 वर्षीय बालक (स्वयं भगवान विष्णु) नंगे पाँव पहुँचा। जब इंद्र ने पूछा कि तुम कौन हो, तो बालक ने उत्तर दिया: "मैं वही हूँ जो तब आता है, जब कोई राजा स्वयं को भगवान समझने लगता है।" इंद्र को क्रोध आया, पर तभी बालक ने फर्श पर चलती काली-भूरी चींटियों की एक लंबी कतार की ओर इशारा करते हुए पूछा, "क्या तुम गिन सकते हो कि इनमें से कितनी चींटियाँ पहले इंद्र बन चुकी हैं?" उसी समय रोम-रोम वाले लोमश ऋषि सभा में पधारे। उन्होंने एक चींटी को उंगली पर उठाया और इंद्र से कहा: "इसे देखो। यह आज एक चींटी है, पर यह 72 बार स्वर्ग के सिंहासन पर बैठकर 'इंद्र' रह चुकी है!" इंद्र हैरान रह गए। तब विष्णु जी ने उन्हें ब्रह्मांड के समय का चक्र समझाया— ब्रह्मा जी के एक दिन में 14 इंद्र बदल जाते हैं। लोमश ऋषि ने अपनी छाती दिखाते हुए कहा, "मेरा एक बाल एक इंद्र के कार्यकाल (आयु) पूरा होने पर झड़ता है। सोचो, मैं ऐसे कितने इंद्र देख चुका हूँ।" उस चींटी की कहानी और भी हैरान करने वाली थी। पहले कल्प में वह 'सत्यव्रत' नाम का एक राजा था। उसने तप किया और इंद्र का पद पाया। लेकिन सत्ता मिलते ही उसे अमर होने का भ्रम हो गया। उसने यज्ञ बंद करा दिए और ऋषियों का अपमान किया। पुण्य खत्म होते ही वह पद से गिरा। पहले हाथी, फिर शेर, कुत्ता और अंततः अपने घमंड के कारण चींटी बना! फिर कुछ बचे हुए पुण्यों के कारण वह वापस उठा और फिर इंद्र बना। गिरो, 84 लाख योनियों में भटको, फिर पुण्य से उठो... यही संसार का चक्र है। यह सुनकर इंद्र का घमंड टूट गया। चींटियों की वह कतार अब उन्हें अपना 'अतीत' नजर आने लगी। उन्होंने तुरंत विश्वकर्मा जी को बुलाया और कहा: "यह महल तोड़ दो। यह मेरा नहीं है, मैं यहाँ केवल एक किरायेदार हूँ... और किरायेदार घर पर अपना नाम नहीं लिखवाते।" बालक रूपी भगवान विष्णु ने अपना चतुर्भुज रूप दिखाते हुए इंद्र को अंतिम उपदेश दिया: "जब तक तुम 'मैं इंद्र हूँ' कहोगे, तब तक गिरोगे। जिस दिन तुम 'मैं दास हूँ' कहोगे, उसी दिन उठोगे।" सत्ता और पद अस्थायी हैं मित्र कोई भी पद (चाहे वह कितना भी बड़ा क्यों न हो) हमेशा के लिए नहीं होता। अहंकार पतन का कारण है। इंसान अपने पुण्यों और मेहनत से ऊपर उठता है, लेकिन उसका अहंकार उसे वापस ज़मीन पर (या उससे भी नीचे) गिरा देता है। महानता सेवा में है: पद मिलने से आत्मा बड़ी नहीं होती, आत्मा बड़ी होती है सेवाभाव से। जब भी लगे कि आप सबसे ऊपर हैं, ज़मीन पर चलती चींटियों को देख लें। और जब खुद को छोटा समझें, तब भी उन्हें देखें— कर्म और सेवा से एक चींटी भी इंद्र बन सकती है! *धीरज जी की और से साभार*
https://chat.whatsapp.com/EEitOrRDdFp9V89HcvXsba *खाई औऱ ब्रिज (पूल)* दो भाई साथ साथ खेती करते थे। मशीनों की भागीदारी और चीजों का व्यवसाय किया करते थे। चालीस साल के साथ के बाद एक छोटी सी ग़लतफहमी की वजह से उनमें पहली बार झगडा हो गया था झगडा दुश्मनी में बदल गया था। एक सुबह एक बढई बड़े भाई से काम मांगने आया. बड़े भाई ने कहा “हाँ ,मेरे पास तुम्हारे लिए काम हैं। उस तरफ देखो, वो मेरा पडोसी है, यूँ तो वो मेरा भाई है, पिछले हफ्ते तक हमारे खेतों के बीच घास का मैदान हुआ करता था पर मेरा भाई बुलडोजर ले आया और अब हमारे खेतों के बीच ये खाई खोद दी, जरुर उसने मुझे परेशान करने के लिए ये सब किया है अब मुझे उसे मजा चखाना है, तुम खेत के चारों तरफ बाड़ बना दो ताकि मुझे उसकी शक्ल भी ना देखनी पड़े." “ठीक हैं”, बढई ने कहा। बड़े भाई ने बढई को सारा सामान लाकर दे दिया और खुद शहर चला गया, शाम को लौटा तो बढई का काम देखकर भौंचक्का रह गया, बाड़ की जगह वहा एक पुल था जो खाई को एक तरफ से दूसरी तरफ जोड़ता था. इससे पहले की बढई कुछ कहता, उसका छोटा भाई आ गया। छोटा भाई बोला “तुम कितने दरियादिल हो , मेरे इतने भला बुरा कहने के बाद भी तुमने हमारे बीच ये पुल बनाया, कहते कहते उसकी आँखे भर आईं और दोनों एक दूसरे के गले लग कर रोने लगे. जब दोनों भाई सम्भले तो देखा कि बढई जा रहा है। रुको! मेरे पास तुम्हारे लिए और भी कई काम हैं, बड़ा भाई बोला। मुझे रुकना अच्छा लगता ,पर मुझे ऐसे कई पुल और बनाने हैं, बढई मुस्कुराकर बोला और अपनी राह को चल दिया. दिल से मुस्कुराने के लिए जीवन में पुल की जरुरत होती हैं खाई की नहीं। छोटी छोटी बातों पर अपनों से न रूठें।
https://chat.whatsapp.com/EEitOrRDdFp9V89HcvXsba *स्वास्थ्य के प्रति रहे सजग💐* एक पार्टी चल रही थी, एक महिला को थोड़ी ठोकर सी लगी और वह गिरते गिरते संभल गई, मगर उसने अपने आसपास के लोगों को यह कह कर आश्वस्त कर दिया कि -"सब कुछ ठीक है, बस नये जूतों की वजह से एक ईंट से थोड़ी ठोकर लग गई थी"। (यद्यपि आसपास के लोगों ने ऐम्बुलैंस बुलाने की पेशकश भी की...) साथ में खड़े मित्रों ने उन्हें साफ़ होने में मदद की और एक नई प्लेट भी आ गई! ऐसा लग रहा था कि महिला थोड़ा अपने आप में सहज नहीं है! उस समय तो वह पूरी शाम पार्टी एन्जॉय करती रहीं, पर बाद में उसके पति का लोगों के पास फोन आया कि उसे अस्पताल में ले जाया गया जहाँ उसने उसी शाम दम तोड़ दिया!! दरअसल उस पार्टी के दौरान महिला को ब्रेन-हैमरेज हुआ था! अगर वहाँ पर मौजूद लोगों में से कोई इस अवस्था की पहचान कर पाता तो आज वो महिला हमारे बीच जीवित होती..!! माना कि ब्रेन-हैमरेज से कुछ लोग मरते नहीं है, लेकिन वे सारी उम्र के लिये अपाहिज़ और बेबसी वाला जीवन जीने पर मजबूर तो हो ही जाते हैं!! स्ट्रोक की पहचान- बामुश्किल एक मिनट का समय लगेगा, आईए जानते हैं- न्यूरोलॉजिस्ट कहते हैं- अगर कोई व्यक्ति ब्रेन में स्ट्रोक लगने के, तीन घंटे के अंदर, अगर उनके पास पहुँच जाए तो स्ट्रोक के प्रभाव को पूरी तरह से समाप्त (reverse) किया जा सकता है। उनका मानना है कि सारी की सारी ट्रिक बस यही है कि कैसे भी स्ट्रोक के लक्षणों की तुरंत पहचान होकर, मरीज़ को जल्द से जल्द (यानि तीन घंटे के अंदर-अंदर) डाक्टरी चिकित्सा मुहैया हो सके, और बस दुःख इस बात का ही है कि अज्ञानतावश यह सब ही execute नहीं हो पाता है!!! मस्तिष्क के चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार स्ट्रोक के मरीज़ की पहचान के लिए तीन अतिमहत्वपूर्ण बातें जिन्हें वे STR कहते हैं, सदैव ध्यान में रखनी चाहिए। अगर STR नामक ये तीन बातें हमें मालूम हों तो मरीज़ के बहुमूल्य जीवन को बचाया जा सकता है। ये 3 बातें इस प्रकार हैं- *1) S = Smile अर्थात उस व्यक्ति को मुस्कुराने के लिये कहिए।* *2) T = Talk यानि उस व्यक्ति को कोई भी सीधा सा एक वाक्य बोलने के लिये कहें, जैसे- 'आज मौसम बहुत अच्छा है' आदि।* और तीसरा... *3) R = Raise अर्थात उस व्यक्ति को उसके दोनों बाजू ऊपर उठाने के लिए कहें।* अगर उस व्यक्ति को उपरोक्त *तीन कामों में से एक भी काम करने में दिक्कत है, तो तुरंत ऐम्बुलैंस बुलाकर उसे न्यूरो-चिकित्सक के अस्पताल में शिफ्ट करें और जो आदमी साथ जा रहा है उसे इन लक्षणों के बारे में बता दें ताकि वह पहले से ही डाक्टर को इस बाबत खुलासा कर सके।* इनके अलावा *स्ट्रोक का एक लक्षण यह भी है- उस आदमी को अपनी जीभ बाहर निकालने को कहें। अगर उसकी जीभ सीधी बाहर नहीं आकर, एक तरफ़ मुड़ सी रही है, तो यह भी ब्रेन-स्ट्रोक का एक प्रमुख लक्षण है।* एक सुप्रसिद्ध कार्डियोलॉजिस्ट का कहना है कि अगर इस मैसेज़ को पढ़ने वाला, इसे ज्यादा नही तो आगे, कम से कम अगर दस लोगों को भी भेजे, तो निश्चित तौर पर, कुछ न कुछ बेशकीमती *"जानें"* तो *बचाई ही जा सकती हैं*!!! आवश्यक है कि इस जानकारी को अधिकतम शेयर करें....//
https://chat.whatsapp.com/EEitOrRDdFp9V89HcvXsba *घर पर बच्चे मोटापे का शिकार क्यों हो रहे हैं? बच्चों के लिए बड़ी स्वास्थ्य समस्या, बढ़ते वजन के परिणाम होते हैं खतरनाक....* आलस्य, ऊब, अकेलापन, अवसाद, मोटापा, अनिद्रा कुछ ऐसी समस्याएं हैं जो आजकल हर किसी में बढ़ रही हैं, खासकर युवाओं में। आइए सबसे पहले उन कारणों पर नजर डालें कि क्यों ये समस्याएं कम उम्र में ही बच्चों को परेशान करती हैं। छोटे बच्चे देर तक सोते हैं, अक्सर आधी रात में कुछ अस्वास्थ्यकर चीज़ खा लेते हैं, फिर सो जाते हैं। व्यायाम की कमी. फिर उन्हें दिन में आलस महसूस होता है। कोई प्रयास नहीं, इसलिए कोई कड़ी मेहनत करने जैसा महसूस नहीं होता, कम कैलोरी जलती है और इसे वसा में परिवर्तित कर देती है। इसका एक अहम कारण बिगड़ी हुई दिनचर्या है। *माता-पिता की उपेक्षा...* माता-पिता के पास बच्चों के लिए ज्यादा समय नहीं है, वे नौकरी-धंधे में फंसे हैं, आर्थिक जरूरतें बहुत बड़ी हैं। माता-पिता-बच्चे का जुड़ाव और संचार कम होना। बच्चों और माता-पिता का समय मेल नहीं खाता। बच्चे अकेलापन महसूस करने लगते हैं. 3. बच्चों के पास समय और स्कूल के समय की कमी है। पहले जब बच्चे स्कूल जाते थे, तो बच्चे दो स्कूल सत्रों में स्कूल जाते थे और समय पर घर आते थे, इसलिए कक्षा, खेलना, सोना आदि सभी गतिविधियाँ समय पर होती थीं; लेकिन अब स्कूल का शेड्यूल लंबा हो गया है. सुबह स्कूल के लिए निकलने वाले बच्चे शाम चार बजे घर आते हैं। यात्रा में समय लगता है. फिर बच्चों के पास अन्य कक्षाओं, शिक्षण के लिए खाली समय नहीं होता। ऐसा नहीं होता कि बहुत सारे बच्चे खेलते हों. जो बचता है वह स्क्रीन टाइम ख़त्म कर देता है। ================== *बच्चों में बढ़ते मोटापे को रोकने के उपाय* आजकल बच्चे गलत दिनचर्या और खानपान की वजह से मोटापे का शिकार हो रहे हैं। इससे न केवल उनका शारीरिक स्वास्थ्य प्रभावित होता है, बल्कि मानसिक विकास भी बाधित होता है। इस समस्या को रोकने के लिए माता-पिता को कुछ महत्वपूर्ण उपाय अपनाने चाहिए: *1. संतुलित आहार दें* ✅ जंक फूड, कोल्ड ड्रिंक्स, पैकेज्ड स्नैक्स और तले-भुने खाने से बचाएं। ✅ घर का बना हेल्दी खाना खिलाएं, जिसमें हरी सब्जियाँ, फल, दालें और दूध शामिल हों। ✅ ज्यादा शुगर और प्रोसेस्ड फूड से बचें। *2. बच्चों को एक्टिव बनाएं* ✅ रोजाना कम से कम 1-2 घंटे आउटडोर खेल खेलने के लिए प्रेरित करें। ✅ वीडियो गेम, मोबाइल और टीवी स्क्रीन का समय सीमित करें। ✅ स्कूल के अलावा कोई खेल, डांस या योगा क्लास जॉइन करने के लिए प्रेरित करें। *3. सोने और जागने का सही शेड्यूल बनाएं* ✅ रात में देर तक जागने और अनियमित दिनचर्या से बचें। ✅ रोजाना 8-10 घंटे की अच्छी नींद लें। ✅ सोने से पहले भारी खाना न दें, इससे वजन बढ़ने की संभावना रहती है। *4. माता-पिता बच्चों को समय दें* ✅ बच्चों के साथ बैठकर खाना खाएं और बातचीत करें। ✅ बाहर जाने के बजाय घर पर हेल्दी कुकिंग और एक्टिविटी गेम्स खेलें। ✅ अकेलापन महसूस न हो, इसके लिए उनसे भावनात्मक जुड़ाव बनाए रखें। *5. स्कूल और पढ़ाई के बोझ को संतुलित करें* ✅ बच्चों के लिए पढ़ाई के साथ फिजिकल एक्टिविटी को भी जरूरी बनाएं। ✅ उन्हें पढ़ाई और खेलने दोनों के लिए समय मैनेज करना सिखाएं। ✅ स्कूल के लंबे शेड्यूल के बाद ब्रेक लेने और थोड़ा खेलने के लिए प्रेरित करें। *6. स्क्रीन टाइम को करें कम* ✅ मोबाइल, टीवी और लैपटॉप का उपयोग सीमित करें। ✅ बच्चों को फिजिकल बुक्स पढ़ने और क्रिएटिव एक्टिविटी करने के लिए प्रेरित करें। ✅ परिवार के साथ ज्यादा समय बिताने की आदत डालें। *7. मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखें* ✅ बच्चों को मोटिवेट करें और उन पर बेवजह दबाव न डालें। ✅ अगर वे उदास या चिड़चिड़े दिखें तो उनके साथ समय बिताएं और उनकी समस्याएँ समझें। ✅ मेडिटेशन और योग की आदत डालें, जिससे मानसिक शांति बनी रहे। *निष्कर्ष* बच्चों का मोटापा सिर्फ खानपान की वजह से नहीं, बल्कि गलत दिनचर्या और माता-पिता की व्यस्तता की वजह से भी बढ़ता है। सही आहार, शारीरिक गतिविधि, संतुलित दिनचर्या और माता-पिता का प्यार—ये सब मिलकर बच्चों को स्वस्थ और खुशहाल बना सकते हैं। *याद रखें, स्वस्थ बच्चे ही उज्जवल भविष्य की नींव रखते हैं।*
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*जय श्री राम जी* 🙏 *एक छोटा कदम, एक बच्चे का उज्ज्वल भविष्य!* 🙏 नमस्कार साथियों, इस आने वाले *रविवार (संडे*) को हम सभी मिलकर एक ज़रूरतमंद बच्चे की पूरे साल की शिक्षा के लिए *₹600* का योगदान जमा करेंगे। शिक्षा से बड़ा कोई दान नहीं है। क्या आप सभी इस नेक काम में अपना सहयोग देने के लिए तैयार हैं? *राम जी सबका भला करे* 🙏🏻🙏🏻
https://chat.whatsapp.com/EEitOrRDdFp9V89HcvXsba भृगु ऋषि द्वारा त्रिदेवों की परीक्षा:: एक समय सरस्वती नदी के तट पर अनेक महर्षियों का महान यज्ञ चल रहा था। यज्ञ की पूर्णाहुति से पहले यह प्रश्न उठा— "इस यज्ञ का प्रथम भाग किस देवता को अर्पित किया जाए?" कोई ब्रह्मा जी का पक्ष लेने लगा, कोई शिव जी का और कोई विष्णु जी का। तब सभी ऋषियों ने महर्षि भृगु से कहा— आप स्वयं जाकर त्रिदेवों की परीक्षा लें और लौटकर बताइए कि सबसे श्रेष्ठ कौन हैं। भृगु ऋषि ने सहमति दी। १. ब्रह्मा जी की परीक्षा:: सबसे पहले वे ब्रह्मलोक पहुँचे। ब्रह्माजी ने प्रसन्न होकर उनका स्वागत करना चाहा, किन्तु भृगु ऋषि ने न प्रणाम किया और न ही सम्मान प्रकट किया। ब्रह्माजी क्रोधित हो उठे। किन्तु उन्होंने सोचा— "यह मेरा पुत्र है।" इस कारण उन्होंने अपने क्रोध को रोक लिया। शास्त्र कहते हैं— क्रोधोऽभवत् प्रजापतेः स्वात्मजं प्रति भृगुम्। स्नेहात्तु संयमं प्राप्य न शशाप महामुनिम्॥ ब्रह्माजी को क्रोध आया, किन्तु पुत्र समझकर उन्होंने उसे रोक लिया। भृगु ऋषि समझ गए कि यहाँ रजोगुण का प्रभाव है। २. शिवजी की परीक्षा:: फिर वे कैलास पहुँचे। भगवान शिव अत्यन्त प्रसन्न होकर उन्हें गले लगाने दौड़े। किन्तु भृगु ऋषि पीछे हट गए और बोले— आप श्मशान में रहने वाले, भस्म धारण करने वाले हैं। मुझे स्पर्श मत कीजिए। यह सुनकर शिवजी अत्यन्त क्रोधित हो उठे। उन्होंने त्रिशूल उठा लिया। माता पार्वती ने तुरंत उनके चरण पकड़ लिए और कहा— "नाथ! ये महर्षि हैं। क्रोध न करें।" शिवजी का क्रोध शांत हो गया। भृगु ऋषि समझ गए— यहाँ तमोगुण का प्रभाव है। ३. विष्णु भगवान की परीक्षा:: अब भृगु ऋषि वैकुण्ठ पहुँचे। भगवान विष्णु उस समय माता लक्ष्मी की गोद में विश्राम कर रहे थे। भृगु ऋषि ने न प्रणाम किया, न कुछ कहा। सीधे जाकर उन्होंने भगवान विष्णु की छाती पर जोर से पैर मार दिया। भगवान विष्णु की अद्भुत विनम्रता जिस छाती पर श्रीलक्ष्मी निवास करती हैं… जिस वक्षस्थल पर श्रीवत्स का चिन्ह है… उसी दिव्य वक्ष पर भृगु ने लात मारी। किन्तु भगवान विष्णु तनिक भी क्रोधित नहीं हुए। वे तुरंत उठ खड़े हुए, भृगु ऋषि के चरण पकड़ लिए और अत्यंत विनम्रता से बोले— अहो महाभाग! आपके चरण अत्यन्त कोमल हैं। मेरी कठोर छाती से आपके चरणों में कहीं पीड़ा तो नहीं हुई? फिर उन्होंने उनके चरण दबाने आरम्भ कर दिए। उन्होंने कहा— अद्याहं भगवन् लक्ष्म्या एकान्तभाजनं कृतः। भवत्पादरजोभिर्मे पवित्रं वक्ष आहितम्॥ "भगवन्! आज मैं धन्य हो गया। आपके चरणों की धूलि से मेरा वक्षस्थल पवित्र हो गया।" भगवान आगे बोले— "ऋषिवर! कृपया मुझे क्षमा करें। आपको खड़े-खड़े प्रतीक्षा करनी पड़ी।" भृगु ऋषि का हृदय परिवर्तन:: यह देखकर भृगु ऋषि स्तब्ध रह गए। उनकी आँखों से अश्रुधारा बहने लगी। वे सोचने लगे— "जिस भगवान की छाती पर मैंने लात मारी, वही मेरे चरण दबा रहे हैं!" उनका अहंकार उसी क्षण समाप्त हो गया। वे भगवान के चरणों में गिर पड़े। उन्होंने कहा— "प्रभो! आप ही परम करुणामय, परम क्षमाशील और समस्त जगत के पालनकर्ता हैं।" ऋषियों के पास वापसी भृगु ऋषि यज्ञस्थल लौटे और बोले— "मैंने त्रिदेवों की परीक्षा ली। ब्रह्माजी में रजोगुण, शिवजी में तमोगुण का स्पर्श दिखाई दिया, किन्तु भगवान विष्णु पूर्ण सात्त्विक, असीम दयालु और क्षमाशील हैं।" तब सभी ऋषियों ने एक स्वर में भगवान विष्णु को यज्ञ का प्रथम भाग अर्पित किया। इस कथा का संदेश:: १. सच्ची महानता विनम्रता में है। जो वास्तव में महान होता है, वह अपमान होने पर भी धैर्य नहीं खोता। २. क्षमा सबसे बड़ा बल है। क्षमा वीरस्य भूषणम्। क्षमा वीरों का आभूषण है। ३. अहंकार ज्ञान का सबसे बड़ा शत्रु है। अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्। विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते॥ — श्रीमद्भगवद्गीता (18.53) जो अहंकार, दर्प, क्रोध और आसक्ति का त्याग कर देता है, वही परम शांति और ब्रह्मभाव को प्राप्त होता है। ४. भगवान भक्त के अपराध को भी क्षमा कर देते हैं, यदि उसके हृदय में पश्चात्ताप और सत्य की खोज हो। भृगु ऋषि की यह कथा केवल त्रिदेवों की परीक्षा नहीं, बल्कि क्षमा, करुणा, विनम्रता और अहंकार-विनाश का दिव्य संदेश है। भगवान विष्णु ने यह दिखाया कि परम शक्ति का सर्वोच्च स्वरूप क्रोध नहीं, बल्कि दया और प्रेम है। यही कारण है कि उनके वक्षस्थल पर स्थित श्रीवत्स और माँ लक्ष्मी का निवास करुणा, सौम्यता और दिव्य संरक्षण के प्रतीक माने जाते हैं।
https://chat.whatsapp.com/EEitOrRDdFp9V89HcvXsba *एक बार एक गाँव में पंचायत लगी थी। वहीं थोड़ी दूरी पर एक सन्त ने अपना बसेरा किया हुआ था। जब पंचायत किसी निर्णय पर नहीं पहुच सकी तो किसी ने कहा कि क्यों न हम महात्मा जी के पास अपनी समस्या को लेकर चलें, अतः सभी सन्त के पास पहुँचे।* *जब सन्त ने गांव के लोगों को देखा तो पुछा कि कैसे आना हुआ ? तो लोगों ने कहा, “महात्मा जी गाँव भर में एक ही कुआँ हैं और कुँए का पानी हम नहीं पी सकते, बदबू आ रही है।”* *सन्त ने पुछा- हुआ क्या ? पानी क्यों नहीं पी सकते हो ?* *लोग बोले- तीन कुत्ते लड़ते लड़ते उसमें गिर गये थे। बाहर नहीं निकले, मर गये उसी में। अब जिसमें कुत्ते मर गए हों, उसका पानी कैसे पिये महात्मा जी ?* *सन्त ने कहा - 'एक काम करो, उसमें गंगाजल डलवाओ।* *कुएं में गंगाजल भी आठ दस बाल्टी छोड़ दिया गया। फिर भी समस्या जस की तस रही। लोग फिर से सन्त के पास पहुँचे। अब सन्त ने कहा, "भगवान की कथा कराओ।”* *लोगों ने कहा, “ठीक है।” कथा हुई, फिर भी समस्या जस की तस। लोग फिर सन्त के पास पहुँचे। अब सन्त ने कहा, उसमें सुगंधित द्रव्य डलवाओ। सुगंधित द्रव्य डाला गया, नतीजा फिर वही। ढाक के तीन पात। लोग फिर सन्त के पास, अब सन्त खुद चलकर आये।* *लोगों ने कहा- महाराज ! वही हालत है, हमने सब करके देख लिया, गंगाजल भी डलवाया, कथा भी करवायी, प्रसाद भी बाँटा और उसमें सुगन्धित पुष्प और बहुत चीजें डालीं।* *अब सन्त आश्चर्यचकित हुए और पूछा- कि तुमने और सब तो किया, वे तीन कुत्ते जो मरे पड़े थे, उन्हें निकाला कि नहीं ?* *लोग बोले - उसके लिए न आपने कहा था न हमने निकाला, बाकी सब किया। वे तो वहीं के वहीं पड़े हैं।* *सन्त बोले - "जब तक उन्हें नहीं निकालोगे, इन उपायों का कोई प्रभाव नहीं होगा।"* *ऐसी ही कथा हमारे जीवन की भी है। इस शरीर नामक गाँव के अंतःकरण के कुएँ में ये काम, क्रोध और लोभ के तीन कुत्ते लड़ते झगड़ते गिर गये हैं।* *हम उपाय पूछते हैं तो लोग बताते हैं, तीर्थयात्रा कर लो, गंगा स्नान कर लो, थोड़ा पूजा करो, थोड़ा पाठ।* *सब करते हैं, पर बदबू उन्हीं दुर्गुणों की आती रहती है। तो पहले इन्हें निकाल कर बाहर करें तभी जीवन उपयोगी होगा।* 🙏🙏 *जो प्राप्त है-पर्याप्त है* *जिसका मन मस्त है* *उसके पास समस्त है!!* *सरोज मलिक जी की और से साभार*
https://chat.whatsapp.com/EEitOrRDdFp9V89HcvXsba *स्वर्ग और नरक* एक बुजुर्ग औरत मर गई, यमराज लेने आये। औरत ने यमराज से पूछा, आप मुझे स्वर्ग ले जायेगें या नरक। यमराज बोले दोनों में से कहीं नहीं। तुमनें इस जन्म में बहुत ही अच्छे कर्म किये हैं, इसलिये मैं तुम्हें सिधे प्रभु के धाम ले जा रहा हूं। बुजुर्ग औरत खुश हो गई, बोली धन्यवाद, पर मेरी आपसे एक विनती है। मैनें यहां धरती पर सबसे बहुत स्वर्ग - नरक के बारे में सुना है मैं एक बार इन दोनों जगाहो को देखना चाहती हूं। यमराज बोले तुम्हारे कर्म अच्छे हैं, इसलिये मैं तुम्हारी ये इच्छा पूरी करता हूं।चलो हम स्वर्ग और नरक के रसते से होते हुए प्रभु के धाम चलेगें। दोनों चल पडें, सबसे पहले नरक आया। नरक में बुजुर्ग औरत ने जो़र जो़र से लोगो के रोने कि आवाज़ सुनी। वहां नरक में सभी लोग दुबले पतले और बीमार दिखाई दे रहे थे। औरत ने एक आदमी से पूछा यहां आप सब लोगों कि ऐसी हालत क्यों है। आदमी बोला तो और कैसी हालत होगी, मरने के बाद जबसे यहां आये हैं, हमने एक दिन भी खाना नहीं खाया। भूख से हमारी आत्मायें तड़प रही हैं बुजुर्ग औरत कि नज़र एक वीशाल पतीले पर पडी़, जो कि लोगों के कद से करीब 300 फूट ऊंचा होगा, उस पतीले के ऊपर एक विशाल चम्मच लटका हुआ था। उस पतिले में से बहुत ही शानदार खुशबु आ रही थी। बुजुर्ग औरत ने उस आदमी से पूछा इस पतिले में क्या है। आदमी मायूस होकर बोला ये पतीला बहुत ही स्वादिष्ट खीर से हर समय भरा रहता है। बुजुर्ग औरत ने हैरानी से पूछा, इसमें खीर है,तो आप लोग पेट भरके ये खीर खाते क्यों नहीं, भूख से क्यों तड़प रहें हैं। आदमी रो रो कर बोलने लगा, कैसे खायें,ये पतीला 300 फीट ऊंचा है हममें से कोई भी उस पतीले तक नहीं पहुँच पाता। बुजुर्ग औरत को उन पर तरस आ गया सोचने लगी बेचारे, खीर का पतिला होते हुए भी भूख से बेहाल हैं। शायद ईश्वर नें इन्हें ये ही दंड दिया होगा, यमराज बुजुर्ग औरत से बोले चलो हमें देर हो रही है। दोनों चल पडे़, कुछ दूर चलने पर स्वरग आया। वहां पर बुजुर्ग औरत को सबकी हंसने,खिलखिलाने कि आवाज़ सुनाई दी। सब लोग बहुत खुश दिखाई दे रहे थे। उनको खुश देखकर बुजुर्ग औरत भी बहुत खुश हो गई। पर वहां स्वर्ग में भी बुजुर्ग औरत कि नज़र वैसे ही 300 फूट उचें पतीले पर पडी़ जैसा नरक में था, उसके ऊपर भी वैसा ही चम्मच लटका हुआ था। बुजुर्ग औरत ने वहां लोगो से पूछा इस पतीले में क्या है। स्वर्ग के लोग बोले के इसमें बहुत टेस्टी खीर है।बुजुर्ग औरत हैरान हो गई,उनसे बोली पर ये पतीला तो 300 फीट ऊंचा है। आप लोग तो इस तक पहुँच ही नहीं पाते होगें,उस हिसाब से तो आप लोगों को खाना मिलता ही नहीं होगा, आप लोग भूख से बेहाल होगें। पर मुझे तो आप सभी इतने खुश लग रहे हो, ऐसे कैसे, लोग बोले हम तो सभी लोग इस पतिले में से पेट भर के खीर खाते हैं,औरत बोली पर कैसे,पतीला तो बहुत ऊंचा है। लोग बोले तो क्या हो गया पतीला ऊंचा है तो ,यहां पर कितने सारे पेड़ हैं, ईश्वर ने ये पेड़ पौधे, नदी, झरने हम मनुष्यों के उपयोग के लिये तो बनाईं हैं। हमनें इन पेडो़ कि लकडी़ ली, उसको काटा, फिर लकडियों के टूकडो़ को जोड़ के विशाल सीढी़ का निर्माण किया। उस लकडी़ की सिढी़ के सहारे हम पतीले तक पहुंचते हैं और सब मिलकर खीर का आंनद लेते हैं,बुजुर्ग औरत यमराज कि तरफ देखने लगी । यमराज मुसकाये बोले:-ईश्वर ने स्वर्ग और नरक मनुष्यों के हाथों में ही सौंप रखा है,चाहें तो अपने लिये नरक बना लें, चाहे तो अपने लिये स्वरग, ईश्वर ने सबको एक समान हालातो में डाला हैं। उसके लिए उसके सभी बच्चें एक समान हैं, वो किसी से भेदभाव नहीं करता। वहां नरक में भी पेेड़ पौधे सब थे, पर वो लोग खुद ही आलसी हैं, उन्हें खीर हाथ में चाहिये,वो कोई कर्म नहीं करना चाहते, कोई मेहनत नहीं करना चाहते, इसलिये भूख से बेहाल हैं। क्योंकि ये ही तो ईश्वर कि बनाई इस दुनिया का नियम है, जो कर्म करेगा, मेहनत करेगा, उसी को मीठा फल खाने को मिलेगा।स्वर्ग और नरक आपके हाथ में है,मेहनत करें, अच्छे कर्म करें और अपने जीवन को स्वर्ग बनाएं।
*सावन का पहला सोमवार (3 अगस्त 2026)* भगवान शिव की कृपा पाने के लिए सबसे उत्तम दिन माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सावन के सोमवार का व्रत रखने और विधि-विधान से पूजा करने से जीवन के सभी संकट दूर होते हैं और मनोकामनाएं पूरी होती हैं *यहाँ सावन के पहले सोमवार की पूजा विधि, सामग्री, नियम और इसकी महिमा की पूरी जानकारी दी गई है* : *सावन सोमवार की सरल पूजा विधि (Step-by-Step)स्नान और संकल्प* : सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और साफ (संभव हो तो हरे, पीले या सफेद) वस्त्र धारण करें। इसके बाद हाथ में जल लेकर व्रत और पूजा का संकल्प लें。 *जलाभिषेक*: घर के मंदिर या पास के शिव मंदिर जाएं। तांबे के लोटे से शिवलिंग पर शुद्ध जल और गंगाजल अर्पित करें। (ध्यान रखें, तांबे के बर्तन से दूध नहीं चढ़ाना चाहिए)। *पंचामृत स्नान*: जल चढ़ाने के बाद पीतल या चांदी के पात्र से कच्चे दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से बने पंचामृत से शिवलिंग का अभिषेक करें। इसके बाद दोबारा शुद्ध जल चढ़ाएं। *श्रृंगार और तिलक* : शिवलिंग पर सफेद चंदन या भस्म से तिलक लगाएं। इसके बाद वस्त्र के रूप में कलावा (मोली) और जनेऊ अर्पित करें। *पूजन सामग्री अर्पण*: भगवान शिव को अत्यंत प्रिय बेलपत्र, धतूरा, भांग, शमी के पत्ते, सफेद आंकड़े के फूल और अक्षत (बिना टूटे चावल) चढ़ाएं। *भोग और आरती*: महादेव को मौसमी फल, मिठाई या खीर का भोग लगाएं। धूप-दीप जलाकर सावन सोमवार की व्रत कथा पढ़ें या सुनें। अंत में 'ॐ नमः शिवाय' मंत्र का जाप करते हुए आरती करें。 *क्षमा याचना*: पूजा के अंत में हाथ जोड़कर अनजाने में हुई गलतियों के लिए भगवान शिव से क्षमा मांगें। *पूजा के लिए जरूरी सामग्री* (Puja Samagri) *अभिषेक के लिए*: गंगाजल, शुद्ध जल, गाय का कच्चा दूध, दही, शहद, देसी घी, और बुरा/शक्कर。शिव जी के प्रिय: बेलपत्र (साफ और साबुत), धतूरा, भांग, शमी पत्र, और सफेद फूल।तिलक और अन्य: सफेद या पीला चंदन, भस्म, अक्षत (साबुत चावल), कलावा, जनेऊ, कपूर, धूप, और घी का दीपक।भोग: मौसमी फल, मिठाई, या पंचामृत। *भूलकर भी न करें ये गलतियां* (महत्वपूर्ण नियम)वर्जित सामग्रियां: शिवलिंग पर कभी भी तुलसी दल, हल्दी, सिंदूर, और केतकी का फूल न चढ़ाएं。 *शंख का प्रयोग*: शिव जी की पूजा या अभिषेक में शंख का इस्तेमाल पूरी तरह वर्जित माना जाता है。*खान-पान का नियम*: व्रत के दौरान पूरी तरह सात्विक रहें। लहसुन, प्याज, मांस-मदिरा, और बैंगन खाने से बचें। *बेलपत्र की दिशा*: शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाते समय हमेशा उसका चिकना हिस्सा नीचे (शिवलिंग की तरफ *सावन के पहले सोमवार की महिमा* (Significance) *मां पार्वती का तप*: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए सावन के महीने में ही कठोर तपस्या और व्रत की शुरुआत की थी। इसलिए यह व्रत वैवाहिक जीवन को सुखी बनाने के लिए अचूक माना जाता है। *मनोकामना पूर्ति* : सावन के पहले सोमवार से शिव जी अपने भक्तों पर विशेष कृपा बरसाते हैं। अविवाहित कन्याओं को सुयोग्य वर मिलता है और पुरुषों को व्यापार व करियर में तरक्की मिलती है।कष्टों से मुक्ति: इस दिन शिवलिंग पर काले तिल मिलाकर जल चढ़ाने से शनि, राहु और केतु के दोष शांत होते हैं और मानसिक शांति मिलती है।
मधुमेह से ग्रसित रोगियों को फुट इन्फेक्शन बहुत जल्दी हो जाता है, इसलिए उन्हें अपने पैरों को बचाने के लिए सही तरीका अपनाना चाहिए। यदि आप फटी एड़ियों से ग्रसित हैं तो आप सही नाप के तथा आरामदायक जूतों का चुनाव करें। इससे पैरों को आराम मिलेगा। फटी एड़ियों की परेशानी के दौरान परहेज बिवाई में ये परहेज करना चाहिएः- कभी भी नंगे पांव नहीं रहें। खुरदरी जमीन पर ज्यादा समय तक ना खड़े रहें। नहाने के लिए अधिक गर्म पानी का प्रयोग ना करें। चमड़े के जूते पहनने से बचें, क्योंकि इनमें संक्रमण होने का बहुत ज्यादा खतरा होता है। पैरों से मृत कोशिकाओं को हटाने के लिये कभी-कभी रेजर या ब्लेड का सहारा नहीं लेना चाहिए नहीं तो फुट इन्फेक्शन या फिर तेज घाव हो सकता है। फटी एड़ी से जुड़े सवाल-जवाब आयुर्वेद के अनुसार, एड़ियों के फटने का क्या कारण है? रूखापन वायु का गुण है। वायु की प्रधानता से पैरों की एड़ियां फट जाती हैं। आमतौर पर रूखेपन या मोइश्चर (नमी) की कमी के कारण एड़ियां फटती हैं। कभी-कभी एड़ियों से खून भी निकलने लगता है। अगर ऊपर के उपाय से फायदा नहीं मिला तो उसका क्या कारण हो सकता है? यदि आपको फटी एड़ियों में आयुर्वेदिक उपाय करने के बाद भी कोई फायदा ना मिले, तो उसके बहुत से कारण हो सकते हैं जैसे- आपने आयुर्वेदिक उपायों का पालन ठीक से ना किया हो। आयुर्वेदिक उपायों का पालन करते समय परहेज ना करना। रोजाना बिना जूते-चप्पल के चलना। भरपूर पानी का सेवन ना करना। पोषक द्रव्यों से रहित आहार का सेवन करना। अपनी एड़ियों का ध्यान ना रखना। अपने पैरों को अधिक समय तक पानी में डुबोए रखना। उपाय करते समय गलत नाप के जूते चप्पल पहनना। फटी हुई एड़ी की अवस्था में डॉक्टर से कब सम्पर्क करना चाहिए? यदि आपकी एड़ियां फटी हुई हैं, और उसमें घाव होने के साथ-साथ खून भी आ रहा है, तो तुरन्त जाकर डॉक्टर से सम्पर्क करना चाहिए। यदि पैरों में लोशन या तेल से मालिश करने पर भी कोई फायदा ना मिले तो आपको सावधान हो जाना चाहिए। ऐसी स्थिति में डॉक्टर से जल्द सम्पर्क करना चाहिए।
एड़ियों के फटने पर ग्लिसरीन तथा गुलाब जल का उपयोग फटी एड़ियों की समस्या में ग्लिसरीन तथा गुलाब जल लें। इन्हें मिला लें। इसे पैरों पर लगाएं। इससे आपकी फटी एड़ियां मुलायम हो जाएंगी। एड़ियों के फटने पर चावल का उपयोग मृत त्वचा निकालने के लिए यह उपाय काफी असरदार साबित होता है। चावल के आटे, शहद और सेब के सिरके का प्रयोग कर पेस्ट बनाएं। इस पेस्ट का प्रयेग अपनी एड़ियों पर करें। इससे लाभ होगा। फटी एड़ियों का घरेलू इलाज शहद से शहद में अनेक गुण होते हैं। शहद की सहायता से भी फटी एड़ियां ठीक हो सकती हैं। बेहतर उपाय के लिए किसी आयुर्वेदिक चिकित्सक से परामर्श जरूर लें। फटी एड़ियों का घरेलू उपचार नारियल से फटी एड़ियों के लिए नारियल पानी बहुत ही फायदेमंद होता है। आप ऐसी क्रीम का प्रयोग भी कर सकते हैं, जिनमें नारियल रस हो। बिवाई (फटी एड़ियां) का घरेलू इलाज मोम और सरसों के तेल से जब बाकि सारे उपाय पूरी तरह से असफल हो जाएं, तब मोम और सरसों के तेल से उपचार करें। 50 मि.ली. सरसों के तेल को गर्म करें। जब तेल उबलने लगे तो धीरे-धीरे 25 ग्राम मोम मिला दें। जब मोम पूरी तरह घुलकर जाए, तो बर्तन को ठंड़ा होने दें। थोड़ा गुनगुना रहने पर इसमें 5 ग्राम कपूर ( भीमसेनी कपूर के फायदे ) मिला लें। इस तरह तैयार मलहम को रात में सोने से पहले एड़ियों पर लगायें। कुछ ही दिन में लाभ होने लगता है। बिवाई (फटी एड़ियां) का घरेलू उपचार पैराफिन वैक्स से पैर की एड़ियां ज्यादा फट गयी हो, और ज्यादा दर्द करती हो तो पैराफिन वैक्स आपको तुरन्त आराम देता है। इस्तेमाल की जानकारी विशेषज्ञ से जरूर लें। नीम से फटी एड़ियों का घरेलू इलाज एक मुट्ठी नीम की पत्ती पीस कर पेस्ट बना लें। इसमें तीन चम्मच हल्दी का पाउडर अच्छी तरह मिला लें। फटी एड़ी पर पेस्ट लगाएं। आधे घंटे तक लगा छोड़ दें। इसके बाद पैरों को गर्म पानी से धो लें। साफ कपड़े से पोंछ लें। फटी एड़ियों (बिवाई) का उपचार पेट्रोलियम जेली से पेट्रोलियम जेली का इस्तेमाल करके रूखी, खुरदुरी, स्किन और फटी एड़ियों से बचा जा सकता है। बेहतर परिणाम के लिए किसी आयुर्वेदिक चिकित्सक से जानकारी जरूर लें। बिवाई का इलाज नींबू से गर्म पानी में नीम्बू का रस डालकर 10 से 15 मिनट तक पैर को डुबो कर रखें। ध्यान दें कि पानी ज्यादा गर्म ना हो। पैरों को धो लें और तौलिये से पोंछ लें। बिवाई के इलाज के लिए अन्य घरेलू उपाय आप फटी एड़ी के लिए अन्य घरेलू उपाय को भी आजमा सकते हैंः- यदि आपकी एड़ियां फटी हैं तो हमेशा जूतों के साथ मोजे पहन कर रखें। ताजे फलों और सब्जियों का रस निकालें, और फटी एड़ियों वाले पैरों को इनमें डाल कर 15 मिनट तक रखें। यदि जलन हो तो घबराएं नहीं। एक टब या बाल्टी में गर्म पानी में साबुन डालें, और अपने पैरों को डुबोयें। इसके बाद व्युमिस स्टोन की मदद से क्रब करें। इन्हें अच्छे से धोकर पूरी तरह सुखा लें। अब अपने पैरों की एड़ियों में किसी भी तेल का प्रयोग करें, एवं उसके बाद मोजे पहन लें। राल और सेंधा नमक समान लेकर चूर्ण बना लें। इसे शहद और घी के साथ मिलाकर पर्याप्त मथें। इसमें सरसों का तेल मिलाकर रखें। इसे एड़ियों में लगाने से पाँवों के फटने में आराम मिलता है। गुड़, सेंधा नमक, इमली और घी 1-1 भाग मिला कर पीसें। इसमें दोगुना गोमूत्र मिलाकर फटी हुई बिवाई पर लगाएं। यह सर्वोत्तम दवा है। फटी एड़ियों की समस्या के दौरान आपका खान-पान बिवाई को ठीक करने के लिए आपका खान-पान ऐसा होना चाहिएः- हरी पत्तेदार सब्जियों का सेवन करना चाहिए। दूध, दही, मक्खन आदि स्निग्ध और मधुर आहार द्रव्यों का सेवन करना चाहिए। यदि आप फटी एड़ियों से छुटकारा चाहते हैं तो अधिक से अधिक पानी पीने की आदत डालें। रोजाना 2 से 3 लीटर पानी पीना चाहिए। खान-पान सही रखने से भी फटे पैर, फटी एड़ियों की समस्या दूर हो सकती है। सही खान-पान के लिए दूध, दही, ताजी सब्जियां, मांस तथा अन्य पोषक पदार्थों का सेवन करें। फटी एड़ियों की समस्या में आपकी जीवनशैली बिवाई को ठीक करने के लिए आपकी जीवनशैली ऐसी होनी चाहिएः- पैरें की अच्छे से देखभाल करें। जब भी घर में रहें, हमेशा पांव में जूते या चप्पल पहनें। हर रोज पैरों को साफ करने के बाद मोजे पहनकर जूते पहनें। पैरों की रोजाना गर्म पानी से भरे टब में डालें। 10 से 15 मिनट उसमें रहने दें। इसके अलावा जब आप रोज नहाते हैं तो भी पत्थर लेकर अपनी फटी एड़ियों को रगड़ सकते हैं। इसके बाद पैरों पर हल्का सा मोश्चराइजर भी लगाएं। बरसात का समय पैरों के लिए बहुत खतरनाक माना जाता है, क्योंकि इस समय पैरों में बैक्टीरियल इन्फेक्शन होने की बहुत संभावना होती हैं। इस समय पैर हमेशा गीले रहते हैं, इसलिए बाहर से जब भी घर पर आएं, तब अपने पैरों को अच्छे से साबुन से धोएं। इसके बाद पैरों को तौलिए से पोंछ कर तेल से हल्की मालिश करें।
https://chat.whatsapp.com/EEitOrRDdFp9V89HcvXsba *फटी एड़ियों से छुटकारा पाने के लिए अपनाएं ये घरेलू नुस्खे* आपकी एड़ियां फट (बिवाई) चुकी है? आप फटी एड़ियों का इलाज कराना चाहती हैं? तो सबसे पहले आपको यह जानना होगा कि आपकी एड़ियों के फटने के कारण क्या हैं? एड़ियों के फटने के अनेक कारण हो सकते हैं। किसी व्यक्ति का वजन सामान्य से अधिक हो तो उसका दुष्प्रभाव एड़ियों (हील्ज) पर भी पड़ता है। यदि त्वचा ड्राई है तो वह अधिक वजन नहीं सहन कर पाती, और फट जाती है। फटी हुई एड़ियों के कारण चलने-फिरने में काफी दर्द होता है। फटी हुई एड़ी की वजह से कभी-कभी इन्फेक्शन होने का खतरा भो हो जाता है। क्या आप जानती हैं कि फटी एड़ियों का घरेलू इलाज भी किया जा सकता है? जी हां, फटी एड़ियों के इलाज के लिए आयुर्वेद में कई तरीके बताए गए हैं। आप इन उपाय से फटी हुई एड़ी को कोमल बना सकती हैं। 1 एड़ियों का फटना क्या है? 2 एड़ियां फटने के कारण 3 फटी एड़ियों के इलाज के लिए घरेलू उपाय 3.1 फटी एड़ियों का इलाज केले से 3.2 फटी एड़ियों के इलाज सोडियम तथा वेसिलीन से 3.3 एड़ियों के फटने पर ग्लिसरीन तथा गुलाब जल का उपयोग 3.4 एड़ियों के फटने पर चावल का उपयोग 3.5 फटी एड़ियों का घरेलू इलाज शहद से 3.6 फटी एड़ियों का घरेलू उपचार नारियल से 3.7 बिवाई (फटी एड़ियां) का घरेलू इलाज मोम और सरसों के तेल से 3.8 बिवाई (फटी एड़ियां) का घरेलू उपचार पैराफिन वैक्स से 3.9 नीम से फटी एड़ियों का घरेलू इलाज 3.10 फटी एड़ियों (बिवाई) का उपचार पेट्रोलियम जेली से 3.11 बिवाई का इलाज नींबू से 3.12 बिवाई के इलाज के लिए अन्य घरेलू उपाय 4 फटी एड़ियों की समस्या के दौरान आपका खान-पान 5 फटी एड़ियों की समस्या में आपकी जीवनशैली 6 फटी एड़ियों की परेशानी के दौरान परहेज 7 फटी एड़ी से जुड़े सवाल-जवाब एड़ियों का फटना क्या है? एड़ियों के फटने को बिवाई भी कहा जाता है। जब आपके पैरों के तलवों और एड़ियों की सेंसिटिव स्किन ड्राई हो जाती है, तो यह फट जाती है। पैरों में रूखापन होने के कारण एड़ियों में दरारे पड़ जाती हैं। इसे ही एड़ियों का फटना कहते हैं। डायबिटीज वाले रोगी का ब्लड शुगर कन्ट्रोल में नहीं रहने के कारण एड़ियां फटने की सम्भावना बढ़ जाती है। डायबिटीज वाले मरीज के पैरों की नब्ज डैमेज हो जाती है, और इससे पैरों की त्वचा रूखी पड़ जाती है। इसलिए डायबिटीज से ग्रसित व्यक्ति को अपने पैरों का अधिक ध्यान रखना पड़ता है, क्योंकि एड़ियों में क्रैक होने से इन्फैक्शन हो सकता है। एड़ियां फटने के कारण एड़ियों के फटने (बिवाई) के निम्नलिखित कारण हो सकते हैं- थायरॉइड की बीमारी से। दूध का सेवन ना करने से। पैरों में नमी की कमी होना। अधिक गर्म पानी से नहाना। सूखे पैरों की क्रबिंग करना। विटामिन, मिनरर्ल्स आदि की कमी। पैरों की देखभाल ठीक से नहीं करना पोषण रहित आहार का सेवन करना। पैरों को अधिक गर्म पानी में देर तक रखना। ठण्ड के मौसम में अक्सर एड़ियां फट जाती हैं। बिना जूते-चप्पल के चलने से भी एड़ियां फटती हैं। एड़ियां फटने का कारण शुष्क हवा भी हो सकती है। हरि पत्तेदार सब्जियाँ एवं फलों का सेवन ना करने से। लम्बे समय तक खड़े रहने से भी एड़ियां फट सकती हैं। एड़ियां फटने की मुख्य वजह शरीर में कैल्शियम की कमी होती है। पैरों में ऐसे साबुन का प्रयोग करना, जिसमें बहुत सारे केमिकल हों। अत्यधिक जंक खाद्य पदार्थ जैसे पिज्जा, बर्गर आदि का सेवन करने से। गलत फुटवियर ना सिर्फ आपके पैरों को दर्द देते हैं, बल्कि एड़ियां फटने का भी एक कारण होते हैं। बढ़ती उम्र में फटती एड़ियों की समस्या ज्यादा होती है। इसका कारण त्वचा में रूखापन का बढ़ना है। जब आप भरपूर मात्रा में पानी नहीं पीते हैं, तो शरीर में पानी की कमी की वजह से भी एड़ियां फट जाती हैं। मोटापा, सोराइसिस और अर्थराइटिस जैसी बीमारियों की वजह से भी एड़ियां फटने की शिकायत हो सकती है। अत्यधिक रूक्ष आहार का सेवन करने से शरीर में रूखापन आ सकता है, जिसकी वजह से एड़ियां फट सकती हैं। फटी एड़ियों के इलाज के लिए घरेलू उपाय आप फटी एड़ी का घरेलू इलाज इन उपायों से कर सकते हैंः- फटी एड़ियों का इलाज केले से मसले हुए पके केले को अपनी फटी हुई एड़ियों पर लगाएं। इसे 15 मिनट के लिए इसी तरह छोड़ दें। 15 मिनट बाद धो लें। यह एक काफी आसान नुस्खा है, जिसका इस्तेमाल आप बिना किसी परेशानी के कर सकती हैं। फटी एड़ियों के इलाज सोडियम तथा वेसिलीन से घर में पानी गर्म करें। इस पानी में सोडियम तथा वेसिलीन मिलाएं। इस मिश्रण में 1 घंटे तक पैरों को डुबोकर रखें। कुछ समय के बाद एड़ियों को साफ करें। सोने से पहले पैरों की एड़ियों में क्रीम लगाकर सोएं। इससे कुछ दिनों में फायदा होने लगेगा।
https://chat.whatsapp.com/EEitOrRDdFp9V89HcvXsba *गणेश को दुर्वा और मोदक चढाने का महत्व क्यों?* भगवान् गणेशजी की 3 या 5 गांठ वाली दूर्वा (एक प्रकार की घास) अर्पण करने से वह प्रसन्न होते हैं और भक्तों को मनोवांछित फल प्रदान करते हैं। इसीलिए उन्हें दूर्वा चढ़ाने का शास्त्रों में महत्त्व बताया गया है। इसके संबंध में पुराण में एक कथा का उल्लेख मिलता है- "एक समय पृथ्वी पर अनलासुर नामक राक्षस ने भयंकर उत्पात मचा रखा था। उसका अत्याचार पृथ्वी के साथ-साथ स्वर्ग और पाताल तक फैलने लगा था। वह भगवद् भक्ति व ईश्वर आराधना करने वाले ऋषि-मुनियों और निर्दोष लोगों को जिंदा निगल जाता था। देवराज इंद्र ने उससे कई बार युद्ध किया, लेकिन उन्हें हमेशा परास्त होना पड़ा। अनलासुर से त्रस्त होकर समस्त देवता भगवान् शिव के पास गए। उन्होंने बताया कि उसे सिर्फ गणेश ही खत्म कर सकते हैं, क्योंकि उनका पेट बड़ा है इसलिए वे उसको पूरा निगल लेंगे। इस पर देवताओं ने गणेश की स्तुति कर उन्हें प्रसन्न किया। गणेशजी ने अनलासुर का पीछा किया और उसे निगल गए। इससे उनके पेट में काफी जलन होने लगी। अनेक उपाय किए गए, लेकिन ज्वाला शांत न हुई। जब कश्यप ऋषि को यह बात मालूम हुई, तो वे तुरंत कैलास गए और 21 दूर्वा एकत्रित कर एक गांठ तैयार कर गणेश को खिलाई, जिससे उनके पेट की ज्वाला तुरंत शांत हो गई। गणेशजी को मोदक यानी लड्डू काफी प्रिय हैं। इनके बिना गणेशजी की पूजा अधूरी ही मानी जाती है। गोस्वामी तुलसीदास ने विनय पत्रिका में कहा है- गाइए गनपति जगबंदन । संकर सुवन भवानी नंदन। सिद्धि-सदन गज बदन विनायक।कृपा-सिंधु सुंदर सब लायक ॥ मोदकप्रिय मुद मंगलदाता। विद्या वारिधि बुद्धि विधाता ॥ इसमें भी उनकी मोदकप्रियता प्रदर्शित होती है। महाराष्ट्र के भक्त आमतौर पर गणेशजी को मोदक चढ़ाते हैं। उल्लेखनीय है कि मोदक मैदे के खोल में रखा, चीनी, मावे का मिश्रण कर बनाए जाते हैं। जबकि लड्डू मावे व मोतीचूर के बनाए हुए भी उन्हें पसंद हैं। जो भक्त पूर्ण श्रद्धाभाव से गणेशजी को मोदक या लड्डुओं का भोग लगाते हैं, उन पर वे शीघ्र प्रसन्न होकर इच्छापूर्ति करते हैं। मोद यानी आनंद और 'क' का शाब्दिक अर्थ छोटा-सा भाग मानकर ही मोदक शब्द बना है, जिसका तात्पर्य हाथ में रखने मात्र से आनंद की अनुभूति होना है। ऐसे प्रसाद को जब गणेशजी को चढ़ाया जाए, तो सुख की अनुभूति होना स्वाभाविक है। एक दूसरी व्याख्या के अनुसार जैसे ज्ञान का प्रतीक मोदक मीठा होता है, वैसे ही ज्ञान का प्रसाद भी मीठा होता है। गणपति अथर्वशीर्ष में लिखा है- यो दूर्वाकुरैर्यजति स वैश्रवणोपमो भवति। यो लाजैर्यजति स यशोवान भवति स मेघावान भवति ॥ यो मोदक सहस्रेण यजति स वांछित फलमवाप्राप्नोति ॥ अर्थात् जो भगवान् को दूर्वा चढ़ाता है, वह कुबेर के समान हो जाता है। जो लाजो (धान-लाई) चढ़ाता है, वह यशस्वी हो जाता है, मेधावी हो जाता है और जो एक हजार लड्डुओं का भोग गणेश भगवान् को लगाता है, वह वांछित फल प्राप्त करता है। गणेशजी को गुड़ भी प्रिय है। उनकी मोदकप्रियता के संबंध में एक कथा पद्द्मपुराण में आती है। एक बार गजानन और कार्तिकेय के दर्शन करके देवगण अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने माता पार्वती को एक दिव्य लड्डू प्रदान किया। इस लड्डू को दोनों बालक आग्रह कर मांगने लगे। तब माता पार्वती ने लड्डू के गुण बताए "इस मोदक की गंध से ही अमरत्व की प्राप्ति होती है। निस्संदेह इसे सूंघने या खाने वाला संपूर्ण शास्त्रों का मर्मज्ञ, सब तंत्रों में प्रवीण, लेखक, चित्रकार, विद्वान, ज्ञान-विज्ञान विशारद और सर्वज्ञ हो जाता है।" फिर आगे कहा- "तुम दोनों में से जो धर्माचरण के द्वारा अपनी श्रेष्ठता पहले सिद्ध करेगा, वही इस दिव्य मोदक को पाने का अधिकारी होगा।" माता पार्वती की आज्ञा पाकर कार्तिकेय अपने तीव्रगामी वाहन मयूर पर आरूढ़ होकर त्रिलोक की तीर्थयात्रा पर चल पड़े और मुहूर्त भर में ही सभी तीर्थों के दर्शन, स्नान कर लिए। इधर गणेशजी ने अत्यंत श्रद्धा-भक्ति पूर्वक माता-पिता की परिक्रमा की और हाथ जोड़कर उनके सम्मुख खड़े हो गए और कहा कि तीर्थ स्थान, देव स्थान के दर्शन, अनुष्ठान व सभी प्रकार के व्रत करने से भी माता-पिता के पूजन के सोलहवें अंश के बराबर पुण्य प्राप्त नहीं होता है, अतः मोदक प्राप्त करने का अधिकारी मैं हूं। गणेशजी का तर्कपूर्ण जवाब सुनकर माता पार्वती ने प्रसन्न होकर गणेशजी को मोदक प्रदान कर दिया और कहा कि माता-पिता की भक्ति के कारण गणेश ही यज्ञादि सभी शुभ कार्यों में सर्वत्र अग्रपूज्य होंग
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