प्रच्छन्न इतिहास (History)
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ध्यानमूलं गुरोर्मूर्तिः पूजामूलं गुरोः पदम्। मन्त्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरोः कृपा॥
असमाजी कमेंट करने के बाद सोचते होंगे कि इसकी पोस्ट पर तो कमेंट करना ही नहीं चाहिए था🤣🤣🤣
जय श्री राम ऊपर जो प्रश्न (poll) आपने देखा। वैसे प्रश्न प्रतिदिन whatsapp channel पर डालता हूं। तो सभी वहां ज्वाइन करें। https://whatsapp.com/channel/0029Va9zxwkKrWR3mk7dkO1Q
नमस्ते सर्व देवानां वरदासि हरिप्रिये ! या गतिः त्वत्प्रपन्नानां सा मे भूयात् त्वदर्चनात्।। E - समिधा के सभी सदस्यों को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं🌸🌺🏵️
क्या सायण ने ऋग्वेदभाष्य की भूमिका में ऋषियों का अस्तित्व स्वीकार किया है? "जीवविशेषैरग्निवाय्वादित्यैर्वेदानामुत्पादितत्वात् । 'ऋग्वेद एवाग्नेरजायत यजुर्वेदो वायोः सामवेद आदित्यात्' ( ऐ० ग्रा० ५।३२) इति " सायणकृत ऋग्वेद भाष्य भूमिका में यह शब्द पूर्वपक्ष वेदों का पौरुषेय सिद्ध करने हेतु कहता है। यह सायण का पक्ष नहीं है। पुनः यहाँ यह प्रश्न भी रहता है कि ऋषियों के लिये "जीवविशेष" ऐसा शब्द का प्रयोजन क्यों हुआ? ऋषि शब्द को क्यों नहीं? क्योंकि संस्कृत में तो जीव का अर्थ पहले ही विस्तृत है। अतः पुनः उक्त वाक्य में यह कहा गया है कि अग्नि वायु आदित्य इन जीवविशेषों द्वारा वेदों की उत्पत्ति हुयी है। पुनः यहाँ शब्द "उत्पत्ति" ध्यान देने योग्य है। यहाँ "हृदय में प्रकाशित" होना नहीं है। दोनों में अंतर है क्योंकि उत्पत्ति उसकी होती है जिसका निर्माण हो, प्रकाश उसका होता है जिसका निर्माण हो चुका हो। एवं ध्यान देने वाली बात भी है कि जो ऐतरेय ब्राहम्ण को उद्धृत किया है वहाँ भी ऋग्वेद अग्नि से, यजुर्वेद वायु से एवं सामवेद आदित्य से उत्पन्न हुये। यहाँ भी इनको वेद दिये नहीं जा रहे, इनसे प्राप्त किये जा रहे हैं। ~ मनु सहायक: @Esamidha
जब मैं और मेरा मित्र किसी विषय पर चर्चा कर रहे हो और बीच में कोई समाजी बोलने लगे तब हम दोनों का रिएक्शन😂😂🤣
अर्थात, ये सुवर्ण मेरा अविनाशी प्रकाश है। क्षेत्र से उत्पन्न होने वाला यह पक्व अन्न (पिण्ड), एवं गौ मेरी कामनाओं को पूर्ण करने वाली है। इस (दक्षिणारूप हिरण्य-अन्न-गौ आदि) को मैं निधि रूप से ब्राह्मणों में प्रतिष्ठित करता हूँ। इन सब साधनों के द्वारा मैं पितरों के लिए वह मार्ग बनाता हूँ, जो सुखप्रद है। यह मंत्र की उक्ति श्राद्ध करने वाले यजमान की है। दान, अन्न आदि मूलतः पितरों के लिए हैं। साथ ही दान में दी जाने वाली गाय यद्यपि ब्राह्मण को दी जाती है, किन्तु इस दान व भोजन से जो अतिशय उत्पन्न होता है, वह श्रद्धासूत्र के द्वारा प्रेतात्मा के साथ सम्बन्धित होता है। श्राद्धकर्म में उपयुक्त पिण्ड एवं ब्राह्मणोपयोगी भोजनान्न भेद से दो भागों में विभक्त है। कृत कर्म में मनुष्य-सुलभ अनृतभाव से होने वाले दोष के मार्जन के लिए ही कर्मान्त में ब्राह्मण भोजन का विधान है। ऋषि को उभयविध अन्न का संग्रह अभीष्ट था, अतः “पक्वम् क्षेत्रात्” कहा है। अतः यह दान अतिशय श्रद्धासूत्र के द्वारा मृतक पितर को तृप्त करता है। प्रेतात्मा जिस मार्ग से जाता है, यह अतिशय उसी सूक्ष्म आतिवाहिक मार्ग से जाता है। और ऐसा ब्राह्मणग्रन्थ की श्रुति भी कहती है: “ता वा एता: - ऋत्विजामेव दक्षिणा:। अन्यं वा एतSएतस्य आत्मानं _ _ _ _ _ दक्षिणा यां ददाति सा - एति। दक्षिणामन्वारभ्य यजमान:” (शतपथ ४.३.४.५, ६, ७) विषय से सम्बन्धित अन्य वेद प्रमाण भी प्रस्तुत हैं: सं ग॑च्छस्वपि॒तृभिः॒ सं य॒मेने॑ष्टापू॒र्तेन॑ पर॒मे व्योमन्। हि॒त्वाव॒द्यंपुन॒रस्त॒मेहि॒ सं ग॑च्छतां त॒न्वासु॒वर्चाः॑॥ (अथर्ववेद १८.३.५८) अर्थात, हे मृतपुरुष, आप उत्तम लोक स्वर्ग में यज्ञादि दान-पुण्य कर्मों के फलस्वरूप अपने पितरगणों के साथ संयुक्त हों। (पितरों के मध्य स्थान प्राप्त करो।) पितरों के राजा जो यम हैं, तुम उनके साथ भी हो जाओ। पितृलोक से भी श्रेष्ठ एवं आकाश में स्थित द्युलोक में दोनों प्रकार के कार्यों से मिलो। शोभन दीप्ति वाली तुम्हारी आत्मा को द्युलोक का सुख भोगने में समर्थ शरीर मिले। इस मंत्र के भाष्य में एक आर्यसमाजी भाष्यकार क्षेमकरण दास "पितर" शब्द का अर्थ "पालक महात्मा" करते हैं, दूसरे आर्यसमाजी हरिशरण सिद्धान्तालङ्कार पितर का अर्थ "पालन कर्म में लगे हुए पुरुष" करते हैं, और तीसरे आर्यसमाजी विश्वनाथ विद्यालङ्कार यहाँ पितर का अर्थ "माता-पिता" कर रहे हैं। अब विचार करें, इस मूर्खता का क्या उपचार है? इसी प्रकार प्रत्येक शब्द का अर्थ सभी आर्यसमाजी भाष्यकार भिन्न-भिन्न करते हैं। वेदों का इस तरह उपहास अन्य किसी के द्वारा नहीं किया गया। फिर सही अर्थ कैसे प्राप्त होगा? इसी प्रकार इन्होंने मंत्र में आए "यम" शब्द का भी ऐसे-ऐसे अर्थ किए हैं, जिनका एक-दूसरे से कोई मेल ही नहीं है। दरअसल, इनके अलग-अलग ऐसे अर्थ करने का कारण यह है कि मूल जो सत्य अर्थ है, उसे छिपाने के लिए खींचतान करते हैं, और सब अलग-अलग अर्थ निकालते हैं। इस तरह आर्यसमाजियों ने एक-एक वेदमंत्र के छह-छह विपरीत अर्थ कर रखे हैं। परा॑ यात पितरःसो॒म्यासो॑ गम्भी॒रैः प॒थिभिः॑ पू॒र्याणैः॑। अधा॑ मासि॒ पुन॒रा या॑त नोगृ॒हान्ह॒विरत्तुं॑ सुप्र॒जसः॑ सु॒वीराः॑॥ (अथर्ववेद १८.४.६३) अर्थात, हे सोमपानकर्ता पितृगण! आप अपने पितृलोक के गम्भीर असाध्य पितृयाण मार्गों से अपने लोक को जाएँ। तथा अमावस्या के दिन हविष्य का सेवन करने के लिए हमारे घरों में आप पुनः आएँ। हमारे घर शोभन पुत्रों व उत्तम वीरों से युक्त हों। ऊर्जं॒ वह॑न्तीर॒मृतं॑ घृ॒तं पयः॑ की॒लालं॑ परि॒स्रु॑तम्। स्व॒धा स्थ॑ त॒र्पय॑त मे पि॒तॄन्॥ (यजुर्वेद २.३४) “बलप्रद ऊर्जरस, ‘अमृत’ नामक शिवतम सोमरस, घृत नामक आन्तरिक्ष्यरस, दुग्धरस आदि अनेक रसों को धारण करने वाले हे जलदेवता! आप स्वधा बनकर मेरे पितरों को तृप्त करो।” (इस मंत्र में स्पष्ट शब्दों में जलाञ्जलि से पितृतर्पण का उल्लेख हुआ है।) जी॒वाना॒मायुः॒ प्र ति॑र॒ त्वम॑ग्ने पितॄ॒णां लो॒कमपि॑ गच्छन्तु॒ ये मृ॒ताः। सु॑गार्हप॒त्यो वि॒तप॒न्नरा॑तिमु॒षामु॑षां॒ श्रेय॑सीं धेह्य॒स्मै॥ (अथर्ववेद १२.२.४५) हे अग्ने! जीवित दशा में आप (प्राणी की) आयुवृद्धि करें, मरने पर उन्हें पितृलोक पहुँचाने का अनुग्रह करें। कृपण मनुष्य को दग्ध करते, इस प्राणी के शत्रुओं को जलाते हुए, हे अग्ने! इसे जीवात्मा के लिए (प्रेत पितर के लिए) आप कल्याण का ऋणी नूतन-नूतन उषाओं को धारण करें। इन सभी वेदमंत्रों का अवलोकन बिना किसी पक्षपात व पन्थाग्रह के करेंगे, तो स्पष्ट होगा कि पितर एक तत्त्वविशेष है, जिसकी स्थानभेद से अनेक अवस्थाएँ हो जाती हैं। इन पितरों के निमित्त किया गया श्राद्धकर्म, स्वधा, अन्न, दक्षिणा, जलतर्पण आदि कर्मों के फलभोक्ता पितर शब्दों को जीवित पितरपरक नहीं लगा सकते। साभार - शचींद्र शर्मा जी
शचीन्द्र: श्राद्ध-सिद्धान्त में अन्न को पहुँचाने की बात तो है ही नहीं, यह तर्क मूर्खतापूर्ण कल्पना की उपज मात्र है। अन्न को नहीं, बल्कि अन्न के सोमभाग वा अतिशय भाग को पहुँचाया जाता है। यथा: इ॒दं मे॒ ज्योति॑र॒मृतं॒ हिर॑ण्यं प॒क्वं क्षेत्रा॑त्काम॒दुघा॑ म ए॒षा। इ॒दं धनं॒ नि द॑धे ब्राह्म॒णेषु॑ कृ॒ण्वे पन्थां॑ पि॒तृषु॒ यः स्व॒र्गः॥ (अथर्ववेद) आर्यसमाजी: अच्छा, तो फिर सोमभाग या अतिशय को ही कैसे पहुँचाया जा सकता है? कौन और किस प्रकार पहुँचाता है? शचीन्द्र: जिन चन्द्र-सूर्य की किरणों की सहायता से मृत व्यक्ति के शरीर का आकर्षण हुआ था, वे ही किरणें इन पदार्थों से सोमांश को लेकर जाएँगी और उन शरीरों में मिला देंगी। सूर्य या चन्द्र की किरणों के साथ यहाँ के पदार्थों का सम्बन्ध जोड़ने वाली अग्नि है। उसका भी सम्बन्ध श्राद्ध प्रक्रिया में रहता है। अतः एक प्रज्वलित दीपक तो श्राद्ध में अत्यावश्यक माना जाता है। वह दीपकादि की अग्नि अन्न के अंश का सम्बन्ध मंत्रों के प्रभाव से किरणों से जोड़ देती है। आर्यसमाजी: अच्छा, अगर अन्न से सोमांश निकल जाता है, तो फिर उपस्थित अन्न में कुछ न्यूनता तो प्रतीत होनी चाहिए? यदि सूक्ष्मता के कारण आँखों से नहीं दिखता, तो यंत्रों से तोलकर देख लिया जाए, किन्तु अन्न में कोई न्यूनता प्रतीत क्यों नहीं होती? शचीन्द्र: तुम सोमांश क्या है, यह नहीं जानते, इसलिए ऐसा निराधार तर्क करते हो। भ्रमर व मधुमक्खी पुष्प आदि पर बैठकर उसका रस लेते हैं, फिर उसे इकट्ठा करके मधु का एक छत्ता बना देते हैं, जिसमें बहुत सारा मधु प्राप्त होता है। किन्तु मधुमक्खी के बैठने से पहले और उसके रस ग्रहण करने के बाद, क्या आपको पुष्प में कुछ न्यूनता प्रतीत होती है? या आप किसी यंत्र द्वारा तोलकर उस न्यूनता का परिमाण ज्ञात कर सकते हैं? ऐसा सम्भव नहीं है। अर्थात्, आप पुष्प की सूक्ष्म न्यूनता को तोलने में असमर्थ हैं, तो सूर्य-चन्द्र की किरणों द्वारा होने वाली उस अतिसूक्ष्म न्यूनता को तोलने का सामर्थ्य कहाँ से प्राप्त करोगे? इस प्रकार युक्ति द्वारा न्यूनता का सिद्ध होना प्रमाणित है। आर्यसमाजी: यह बताओ, पितृलोक मार्ग में अनेक सूक्ष्म शरीर भ्रमण कर रहे होते हैं, तब एक व्यक्ति का दिया हुआ अन्न माता-पिता के ही वाहक शरीर को प्राप्त होता है, यह नियम किस आधार पर होगा? शचीन्द्र: माता-पिता का सूत्र पुत्र आदि के साथ बंधा होता है, वह सूत्र ही उसे माता-पिता के पास पहुँचा देता है। इसका विवरण इस प्रकार है कि प्रत्येक मनुष्य का, संतानोत्पादन की शक्ति रखने वाला जो शुक्र है, उसमें चौरासी अंश होते हैं, जिन्हें वैदिक शास्त्रों में "सह" कहा जाता है। इनमें छप्पन अंश पूर्व-पुरुषों से प्राप्त हुए हैं और अट्ठाईस स्वयं के अन्नादि से उपार्जित हैं। छप्पन अंशों में २१ पिता के, १५ पितामह के, १० प्रपितामह के, ६ चतुर्थ पुरुष के, ३ पञ्चम पुरुष के और १ छठे पूर्व पुरुष का है। इन चौरासी अंशों में से यह भी संतानोत्पादन के लिए ५६ अंश का शुक्र-निर्वाप करेगा, जिनमें २१ अंश इसके अपने उपार्जित २८ में से जाएँगे और ३५ पूर्व पुरुषों के ५६ में से जाएँगे। अपने से पूर्व के षष्ठ पुरुष का जो एकमात्र अंश इस व्यक्ति में था, वह सूक्ष्म होने के कारण इसकी संतान में नहीं जाएगा। यही क्रम आगे पौत्रादि में चलता रहता है। इसी सूत्र के कारण शास्त्रों में एक व्यक्ति को मध्य में रखकर उसका छह पूर्व पुरुषों से और छह आगे की संतति से सापिण्ड्य माना जाता है। (इसी अंश के कारण ही जिस कन्या के साथ सात पुरुष तक अपना सम्बन्ध मिलता हो, वैदिक संस्कृति में उसके साथ विवाह निषिद्ध माना जाता है, क्योंकि एक ही कुल के अंश का सम्बन्ध वर-कन्या दोनों में रहने के कारण, वे भ्राता और भगिनी कहलाने के अधिकारी हैं।) इस सम्बन्ध-सूत्र के आधार पर श्राद्ध-प्रक्रिया की सपिण्डन-विधि भी चला करती है। आर्यसमाजी: अच्छा, किन्तु इस अन्न-जल-दान आदि का मृत पितरों से सम्बन्ध कराने आदि में कोई वेद-प्रमाण या आर्षग्रन्थों का प्रमाण है? शचीन्द्र: प्रथम तो यह पूरा वर्णन ही आर्ष-ग्रन्थों के आधार पर है। फिर भी अन्न-जल का पितरों के साथ सम्बन्ध कराने का वर्णन वेद के अनेक मंत्रों में है। ब्राह्मण-ग्रन्थों में भी पितरों के अन्नादि प्राप्ति का स्थान-स्थान पर उल्लेख है, यथा: स्वधा पितृभ्य पृथिविषद् भ्य। स्वधापितृभ्य अन्तरिक्ष सदम्य। स्वधा पितृभ्य दिविषद्भ्य। (अथर्ववेद) ये च जीवा ये च मृता ये जाता ये च यश्चिया। तेभ्यो घृतस्य कुल्यैतु मधुधारा व्युन्दती। (अथर्ववेद) सर्वास्तानग्न आवाह पितृन् हविषे अत्तवे। (अथर्ववेद) आयन्तु न पितर सोsम्यासोsग्निप्वात्ता पथिभिद्रेवयानै। (यजुर्वेद) इ॒दं मे॒ ज्योति॑र॒मृतं॒ हिर॑ण्यं प॒क्वं क्षेत्रा॑त्काम॒दुघा॑ म ए॒षा। इ॒दं धनं॒ नि द॑धे ब्राह्म॒णेषु॑ कृ॒ण्वे पन्थां॑ पि॒तृषु॒ यः स्व॒र्गः॥ (अथर्ववेद ११.१.२८)
किन्तु कोई कहे कि प्रकृति-नियमानुसार ही क्षीणता की पूर्ति होती रहेगी, तो भी श्राद्ध व्यर्थ नहीं होगा। क्योंकि ऐसा मानने पर भी यदि वायुमण्डल की मात्रा ही उनमें बढ़ जाएगी और सूर्य-चन्द्र के अंश - बुद्धि या मन - वायु से आक्रान्त होकर दब जाएँगे, तो सूर्य-चन्द्र का आकर्षण उन पर न रहने से उनकी सूर्याभिमुख व चन्द्राभिमुख गति रुक जाएगी। विज्ञान के नियमानुसार सजातीय पर ही आकर्षण हो सकता है। मन और बुद्धि चन्द्रमा व सूर्य के अंश हैं, अतः इन पर चन्द्रमा व सूर्य का ही आकर्षण हो सकता है। वायु पर उनका कोई आकर्षण नहीं हो सकता। ऐसी स्थिति में आत्मा की गति रुक जाएगी और वह इन लोकों में न जाकर वायु में ही इतस्तत् भ्रमण करती रहेगी। वायवीय शरीर प्रेत-पिशाचादि का होता है। अतः श्राद्ध न होने पर जीवात्मा के प्रेत-पिशाचादि योनि को प्राप्त होने की आशंका बनी रहती है। इसी कारण सनातन धर्म के अनुयायियों में प्रसिद्ध है कि - "अमुक व्यक्ति का श्राद्ध नहीं हुआ, वह तो वायु में उड़ता फिरता है।" इसी आपत्ति से पिता-माता के सूक्ष्म शरीरों को बचाने के लिए वेद पुत्रों को आदेश देते हैं कि - "जिस समय तुम शरीर-विहीन थे, उस समय माता-पिता ने ही अपने अंशों से तुम्हारा शरीर बनाया था। आज वे माता-पिता शरीर-विहीन होते जा रहे हैं, तो तुम्हारा कर्तव्य है कि उनका शरीर बनाओ।" इसी वेदाज्ञा के अनुसार चावल आदि के पिण्डों में से सोम (सोम ही चन्द्र है) भाग पहुँचाकर, अनुशय भाग (शरीर) की पुष्टि करना ही गात्र-पिण्डों का उद्देश्य है। यथा: ये न॑ पि॒तुःपि॒तरो॒ ये पि॑ताम॒हा य आ॑विवि॒शुरु॒र्वन्तरि॑क्षम्। य आ॑क्षि॒यन्ति॑पृथि॒वीमु॒त द्यां तेभ्यः॑ पि॒तृभ्यो॒ नम॑सा विधेम॥ (अथर्ववेद १८.२.४९) अर्थात, हमारे पिता के जन्मदाता पितर, पितामह के जन्मदाता पितर, तथा वे पितर जो विशाल अन्तरिक्ष में प्रविष्ट हुए हैं, तथा जो पितर स्वर्ग अथवा पृथ्वी पर निवास करते हैं, इन सब लोकों में निवास करने वाले पितरों का नमस्कारों के द्वारा पूजन करते हैं। वैसे तो आर्यसमाजी खींचतान करके अपने मत की सिद्धि के लिए शब्दों की मनमानी व्याख्या करते हैं, तथापि कुछ मंत्रों के अर्थ से स्पष्ट है कि सत्य छिपाने से नहीं छिपता। इस मंत्र में आर्यसमाजी पृथ्वी के अतिरिक्त अन्य द्युलोक में पितरों का निवास स्वीकार करते हुए, अन्तरिक्ष में विचरण करने वाले मृतकों की पितर संज्ञा भी स्वीकार कर रहे हैं और उन्हें नमस्कार भी कर रहे हैं। इस मंत्र का लगभग यही अर्थ आर्यसमाज के क्षेमकरण दास ने भी किया है, और आर्यसमाज के ही विद्वान सातवलेकर ने भी इस मंत्र में अन्तरिक्ष में विचरण करने वाले मृतक पितरों को ही नमस्कार किया है। अतः यहाँ आर्यसमाज के ही भाष्य से उनका सिद्धान्त खण्डित हो जाता है। अतः गात्र-पिण्डों का उद्देश्य चावल आदि के पिण्डों से सोम-भाग पहुँचाकर श्रद्धा-रूप अनुशय भाग की पुष्टि करना होता है। वाहक शरीर में सोम-भाग परिपूर्ण होता रहे और चन्द्रमण्डल का आकर्षण उन पर पड़ता रहे। इसका संकेत वेदमंत्र में भी स्पष्ट है: यद् वो अग्निरजहादेकमङ् पितृभ्यो गमयन् जातवेदा:। तद् व एतत् पुनराप्यययामि साङ्गा पितर: स्वर्गे मादयध्वम्॥ अर्थात, “हे पितृलोक के पथिकों, अग्नि ने तुम्हारा एक शरीर जलाकर तुमसे छीन लिया है, एवं सूक्ष्म शरीर से तुमको पितृलोक में भेजा है। उस तुम्हारे छीने हुए शरीर को मैं पुनः पुष्ट कर देता हूँ, तुम साङ्ग बनकर स्वर्ग में आनन्द करो।” (यह पिण्ड देने वाला पुत्र कहता है।) येऽअ॑ग्निष्वा॒त्ता येऽअन॑ग्निष्वात्ता॒ मध्ये॑ दि॒वः स्व॒धया॑ मा॒दय॑न्ते। तेभ्यः॑ स्व॒राडसु॑नीतिमे॒तां य॑थाव॒शं त॒न्वं कल्पयाति॥ (यजुर्वेद १९.६०) “अग्नि से खाए हुए, अतएव ‘अग्निष्वात्ता’ नाम से प्रसिद्ध, अग्नि से न खाए हुए, अतएव ‘अनग्निष्वात्ता’ नाम से प्रसिद्ध पितर (हमारे दिए हुए) स्वधा अन्न से अन्तरिक्ष में आनन्दित हो रहे हैं। उन मोदमान पितरों के लिए दीप्तिमान अग्नि कामनानुसार नवीन शरीर (आतिवाहिक शरीर) को निर्माण करता है।” यहाँ यह भी विचारणीय है कि ऐसी समस्त वैज्ञानिक प्रक्रिया को जानने वाले ऋषियों ने श्राद्ध में उन्हीं वस्तुओं को प्रशस्त माना है, जिनमें सोम की प्रधानता है। यास्ते॑ धा॒नाअ॑नुकि॒रामि॑ ति॒लमि॑श्राः स्व॒धाव॑तीः। तास्ते॑ सन्तू॒द्भ्वीःप्र॒भ्वीस्तास्ते॑ य॒मो राजानु॑ मन्यताम्॥ (अथर्ववेद १८.४.२६) अर्थात, “मैं तेरे लिए जिन काले तिलों से युक्त खीलों को बिखेरता हूँ, वे तुझे परलोक में प्रचुर परिमाण में प्राप्त हों तथा उन्हें खाने के लिए यमराज तुझे आज्ञा दे।” आर्यसमाजी: विदेश गए मनुष्य तक या छत पर बैठे मनुष्य तक भी जब अन्न का दाना नहीं पहुँचाया जा सकता, तो फिर अन्य लोक में गए जीव तक कैसे पहुँचाया जा सकता है?
जातः’ (पुरुष सूक्त)। इससे मनप्रधान सूक्ष्म शरीर का उसी सजातीय चन्द्रमा की ओर आकर्षण होता है। इसलिए चन्द्रमा के आकर्षण में बंधकर वह पितृलोक ही पहुँचता है, जहाँ दिव्य पितरों का निवास है। वही मुख्य पितृलोक है। यदि मन की प्रधानता न रहे और सूक्ष्म शरीर का कोई अन्य भाग प्रधान बन जाए, तो फिर उसके अनुसार गति होगी। जो तपस्वी, योगी या प्रबल उपासक होते हैं, वे बुद्धि-शक्ति को प्रबल कर मन को दबा देते हैं। बुद्धि सूर्य का अंश है, इसलिए इस वैज्ञानिक प्रक्रिया के अनुसार बुद्धि प्रधान होने के कारण उन पर सूर्य का आकर्षण होता है। अतः वे सूर्य की ओर जाते हैं। सूर्यमण्डल देवप्राणों की समष्टि है, इसलिए इस मार्ग को देवयान मार्ग कहा जाता है। तीसरी गति जघन्य है। पृथ्वी के धन, पशु, गृह आदि पदार्थों में जिसका मन अधिक फँस गया है, वहाँ पृथ्वी का आवरण मन पर चढ़ जाता है। जिस प्रकार तैरने की शक्ति होने पर भी तुम्बे को मिट्टी से लपेट देने पर वह डूब जाता है, उसी प्रकार पार्थिव वस्तुओं की वासना प्रबल होने पर मन की शक्ति दब जाती है, जिसके फलस्वरूप चन्द्रलोक की गति नहीं बनती और जीव भूमि पर उत्पन्न होने व सैकड़ों बार मरने वाले कीट-पतंगों के प्रभाव में पड़ जाता है। इसे ही श्रुति ने ‘जायस्व म्रियस्व’ (जन्म लो, भोगो, मरो) कहकर तीसरी गति कहा है। सूक्ष्म शरीर, जो भिन्न-भिन्न मार्गों पर भिन्न-भिन्न लोकों में जाता है, वह किस प्रकार जाएगा? सूक्ष्म शरीर में ये अंश आते कैसे हैं? क्योंकि सूक्ष्म शरीर या आत्मा तो शक्तिविशेष है। इसका उत्तर वेदों के आधार पर विचार करके ब्रह्मसूत्र में इस प्रकार दिया गया है कि जिन पदार्थों का परस्पर सम्बन्ध होता है, संयोग रहता है, उनके वियोग होने पर भी एक पदार्थ का कुछ अंश दूसरे में बना रहता है। अर्थात्, जिन पदार्थों का परस्पर साथ रहता है, वे जब अलग होते हैं, तो एक का अनुशय-रूप कुछ अंश दूसरे के साथ देर तक बना रहता है। जैसे, एक लोटे में घी भर दें, तो घी निकाल लेने पर भी चिकनाई देर तक बनी रहती है, वह घृत का अनुशय या अंश है। ऐसे ही पुष्प से पवन का सम्बन्ध होने पर पुष्प का कुछ अंश पवन के साथ संयुक्त हो जाता है, जिसके कारण हमें वायु में पुष्प की सुगंध की प्रतीति होती है। इसी प्रकार सूक्ष्म शरीर ने जिस स्थूल शरीर में वास किया है, उसके कुछ अंश को वह अपने साथ लेकर निकलता है। उसी सूक्ष्म अंश को वेदों ने "अनुशय" या "श्रद्धा" कहा है - “तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा श्रद्धाज्जुह्वति”। जिस प्रकार वायु द्वारा आकर वस्त्र पर गर्द जम जाती है, उसी प्रकार पञ्चभूतों का एक स्तर जम जाने पर प्रज्ञात्मा का शरीर बन जाता है। इसे ही यातना शरीर, भोग शरीर या वाहक शरीर कहते हैं। जब तक दूसरे लोकों में भ्रमण करने वाला जीव नया शरीर ग्रहण नहीं करता, तब तक यह भोग शरीर नहीं मिटता। इस सम्बन्ध में यातना शरीर की उत्पत्ति या परिवर्तन का क्रम मनुस्मृति में भी विशद रूप से निरूपित है। तो यह मार्ग के शरीर की स्थिति हुई। लोकान्तरों में उनके अनुकूल ही शरीर बनता है। जैसे पृथ्वी पर आने के बाद भौतिक अनुशय ही पृथ्वी के पञ्चभूतों को ग्रहण कर नया शरीर बनाता है, और इस प्रकार शरीर-संयुक्त होने को ही "जन्म" कहते हैं। किन्तु पृथ्वी के बाद अन्य लोकों में जीव के जाने पर यह भौतिक शरीर यहीं नष्ट हो जाता है। केवल अनुशय लेकर वह चन्द्रमा में जाता है, जहाँ चन्द्रमा का रस सोम-भाग इसमें सम्मिलित होकर एक सौमिक शरीर बनाता है। यह शरीर चन्द्रमा से अन्यत्र कहीं नहीं जा सकता। चन्द्रलोक से अन्यत्र जाने पर जीव इस सौमिक शरीर को छोड़ केवल अनुशय भाग लेकर ही सूर्य या पृथ्वी में जाता है। सूर्य में भी वहाँ के अनुशय के कारण सूर्य का रस मिश्रित होकर सौर-शरीर बनता है। यह वैज्ञानिक प्रक्रिया ही कर्म-बन्धन-चक्र में परिभ्रमण का क्रम है। भिन्न-भिन्न शरीर ही भिन्न-भिन्न लोकों में जीवन के लिए स्थिति के कारण वैदिक विज्ञान से सिद्ध होते हैं। वैदिक संस्कृति में जो श्राद्ध-प्रक्रिया चलती है, उसका मुख्य वैज्ञानिक सम्बन्ध इस चन्द्रलोक-गति के साथ है। क्योंकि श्राद्ध के भोक्ता पितरों का निवास चन्द्रमण्डल में ही होता है। उक्त प्रक्रिया में हम जो श्रद्धा-रूप भूतों का अनुशय बताए हैं, उसके पोषण के लिए ही श्राद्धकर्म किया जाता है। मृत्यु के पश्चात् दाह होने के बाद सबसे पहले दस दिनों में दशगात्र-पिण्ड दिए जाते हैं। गात्र-पिण्ड का अर्थ है - शरीर के बनाने वाले पिण्ड। यह सिद्ध है कि प्रत्येक वस्तु में निर्गमन के द्वारा क्षीणता आती है। उसकी पूर्ति का भी आयोजन होना चाहिए। जैसे हमारे इस भौतिक शरीर को एक बार भोजन प्राप्त कराने पर पुनः भोजन की आवश्यकता पड़ जाती है। यहाँ हम समर्थ होने के कारण अपनी क्षीणता की पूर्ति उद्योग से आहार द्वारा कर लेते हैं। किन्तु मृतात्मा के वाहक शरीर में जो क्षीणता आती है, उसकी पूर्ति करने में वे असमर्थ होते हैं।
अर्थात, जो पितर अग्नि द्वारा संस्कृत हुए, जो गाड़ने आदि के द्वारा संस्कृत हुए, और जो पिण्ड, पितृयाग आदि से तृप्त होकर आकाश में निवास करते हैं। हे अग्नि, तुम उन्हें भली-भाँति जानते हो, वे अपनी संतानों द्वारा किए जाने वाले पितृयाग आदि का सेवन करें। अथर्ववेद १८.४.७८, ७९, ८० में वर्णित है: स्व॒धापि॒तृभ्यः॑ पृथिवि॒षद्भ्यः॑॥ - पृथ्वी पर स्थित पितरों हेतु यह स्वधा हो। स्व॑धापि॒तृभ्यो॑ अन्तरिक्ष॒सद्भ्यः॑॥ - अन्तरिक्ष में स्थित पितरों हेतु यह स्वधा हो। स्वधापितृभ्यो दिविषद्भ्यः॥ - द्युलोक में स्थित पितरों हेतु यह स्वधा हो। दे॒वाः पि॒तरो॑ मनु॒ष्या गन्धर्वाप्स॒रस॑श्च॒ ये। उच्छि॑ष्टाज्जज्ञिरे॒ सर्वे॑ दि॒वि दे॒वा दि॑वि॒श्रितः॑॥ (अथर्ववेद ११.७.२७) उपरोक्त मंत्रों में स्पष्ट रूप से पितरों को मनुष्यों से भिन्न बताया गया है। अतः स्वतः ही मनुष्य से भिन्न पितरों की सिद्धि हो जाती है, और पितरों को केवल मनुष्य बताने का आर्यसमाजी सिद्धान्त खण्डित हो जाता है। इस मंत्र का अर्थ पाँच आर्यसमाजी भाष्यकारों ने किया है, और पाँचों ने एक-दूसरे से भिन्न अर्थ किए हैं। किन्तु देवता, पितर और मनुष्य, जो ये तीन योनियाँ भेद सहित इस मंत्र में बताई गई हैं, इन तीनों शब्दों का अर्थ "मनुष्य" कर दिया है। अपने पंथ के मत की रक्षा हेतु निकृष्ट स्तर पर जाने के इस छल को सामान्य व्यक्ति भी सहज ही समझ सकता है। आर्यसमाजी: नियम यह है कि किसी अन्य के किए कर्म का फल किसी अन्य को नहीं मिल सकता। जो करता है, वही भोगता है। अतः हमारे किए हुए श्राद्धरूपी कर्म का फल पितरों को कैसे मिल सकता है? शचीन्द्र: यह नियम तो है, किन्तु औत्सर्गिक है, प्रायोवाद है। यह नियम सर्वत्र लागू नहीं होता। उदाहरण के लिए, धन कमाने के लिए श्रम तो पिता ने किया, किन्तु उनकी मृत्यु के बाद उनके कर्मों के फलस्वरूप अर्जित संपत्ति का सुख पुत्र भोग रहा है। अतः यहाँ एक का कर्म दूसरे पर प्रभाव डालता है। मृतक के धन का अधिकारी पुत्र को इसलिए बनाया जाता है क्योंकि वह श्राद्ध आदि कर्म करता है। पुन्नाम नरकात् त्रायेति पुत्रः। (ऐतरेयब्राह्मण)। अन्यथा पिता की संपत्ति पुत्र को ही प्राप्त हो, ऐसा कोई अन्य निर्दिष्ट प्रमाण प्राप्त नहीं होता। अतः जो आर्यसमाजी श्राद्ध नहीं करते, उन्हें अपने पिता की संपत्ति सभी रिश्तेदारों में समान रूप से बाँट देनी चाहिए और स्वयं बिल्कुल न लेना चाहिए, क्योंकि उनके अनुसार किसी के किए का फल किसी अन्य को नहीं मिल सकता। यह नियम अनिवार्य नहीं है। स्वामी दयानन्द ने अपनी पुस्तक "पंचमहायज्ञ विधि" में कई बार दोहराया है कि - "हे ईश्वर, हम आपकी प्रसन्नता के लिए होम करते हैं।" अब जीव के होमरूपी कर्म से ईश्वर को प्रसन्नतारूपी फल प्राप्त होना स्वामी जी के वचनों से सिद्ध हुआ। फिर श्राद्धकर्म से पितरों को तृप्ति एवं प्रसन्नता मिलने में क्या शंका शेष रही? अतः श्राद्धकर्म हेतु अधिकृत होने के कारण ही पुत्र को संपत्ति का अधिकारी बनाना हमारे पूर्वजों द्वारा निश्चित किया गया। यह श्राद्धकर्म इतना महत्त्वपूर्ण है कि जब महाभारत युद्ध के समय अर्जुन अपने सम्बन्धियों को देखकर व्यथित हुए, तब उन्हें कुल के नष्ट होने पर भी श्राद्धकर्म की चिन्ता थी: सङ्करो नरकायैव कुलजानां कुलस्य च। पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः॥ (श्रीमद्भगवद्गीता) वर्णसंकर कुलघातियों को और कुल को नरक में ले जाने के लिए ही होता है। लुप्त हुई पिण्ड और जल की क्रियाओं वाले, अर्थात् श्राद्ध और तर्पण से वंचित, इनके पितर भी अधोगति को प्राप्त होते हैं। आर्यसमाजी: मृत्यु के बाद जीवात्मा न तो कुछ खाता है, न कुछ पीता है। अतः उसे श्राद्ध-तर्पण की क्या आवश्यकता है? बल्कि उसका तो तुरन्त ही पुनर्जन्म हो जाता है। अतः यह श्राद्धकर्म व्यर्थ हुआ। इसमें क्या वैज्ञानिकता है? शचीन्द्र: तत्क्षण पुनर्जन्म होता है, ऐसा कहीं नहीं लिखा है। बल्कि क्रम से जीव भिन्न-भिन्न लोकों की यात्रा करता है और अपने कर्मानुसार वहाँ निवास करता है। कर्मों की क्षति होने पर वह पुनः लौटता है। इसका विवरण सामवेद के ताण्ड्यमहाब्राह्मण के छान्दोग्य उपनिषद् में विस्तार से मिलता है। इससे ज्ञात होता है कि मृत्यु के पश्चात् तीन प्रकार की गति होती है - अर्चिमार्ग, धूममार्ग और उत्पत्ति-विनाश मार्ग। पूर्व के दो मार्गों को ही देवयान और पितृयान मार्ग कहा जाता है। विज्ञान के अनुसार, प्रत्येक वस्तु अपने सजातीय घन की ओर स्वभावतः जाती है। इसलिए पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच प्राण, मन और बुद्धि तत्त्व से बना सूक्ष्म शरीर ही पार्थिव शरीर से निकलकर अन्य लोकों और जन्मों में जाता है। इन सत्रह तत्त्वों में मन ही प्रधान है और वही मन चन्द्रमा की ओर वाहिक शरीर के आकर्षण का कारण है। क्यों? क्योंकि विज्ञान का नियम है कि सजातीय पदार्थों में आकर्षण होता है। इसी तरह मन चन्द्ररूप है, ‘चन्द्रमा मनसो
आर्यसमाजी - श्राद्ध का अर्थ है सत्य का धारण करना अथवा जिसे श्रद्धा से धारण किया जाए। श्रद्धापूर्वक मन में प्रतिष्ठा रखकर विद्वान, अतिथि, माता-पिता, आचार्य आदि जीवित पुरुषों की सेवा करने का नाम ही श्राद्ध है। साथ ही, "पितर" शब्द "पा रक्षेण" धातु से बनता है, अतः पितर का अर्थ पालक, पोषक, रक्षक तथा पिता होता है। शचीन्द्र (सनातन वैदिक धर्मी) - रूढ़ शब्दों का प्रकृत अर्थ केवल विग्रह से नहीं निकलता। उदाहरण के लिए, "गौ:" शब्द का विग्रह होगा - "गच्छति इति गौ: (जो जाता है, वह गाय है)।" इस अर्थ से तो संसार के सभी प्राणी गाय हो जाएँगे। किन्तु यहाँ विग्रह का अर्थ नहीं लिया जा सकता; अन्य शास्त्रीय संकेतों से समझकर ही, "गौ" का अर्थ गाय, लोकाचार-शास्त्राचार की परिभाषा से निकाला जाता है। परन्तु आर्यसमाजी यही मूर्खता करते हैं। यदि इन्हें "गौ" शब्द से गाय का निषेध करना हो, तो "गच्छति इति गौ:" (जो जाता है, वह गाय) के विग्रह को दिखाकर कहते हैं कि गौ का अर्थ चार पैरों वाली, दूध देने वाली गाय नहीं, बल्कि सभी चलने वाले प्राणियों को गाय कहा है। ऐसा ही ये "श्राद्ध" शब्द के साथ कर रहे हैं, जो कि योगरूढ़ शब्द है। प्रकृत में श्राद्ध शब्द केवल योगिक शब्द नहीं है। अतः योगरूढ़ "श्राद्ध" शब्द का शास्त्रसम्मत अर्थ होगा - "मृतक पुरुषों के निमित्त यथाविधि जो तर्पणादि कर्म श्रद्धा से किए जाते हैं, वह श्राद्ध है।" इसके अतिरिक्त अन्य किसी कर्म को श्राद्ध नहीं कहा जा सकता, और न ही कहा जाता है। क्या किसी आर्यसमाजी ने घर आए अतिथि से कभी कहा है कि - "आइये हुजूर, बैठिए, आपका श्राद्ध करता हूँ"? अथवा जीवित माता-पिता की सेवा के लिए भी श्राद्ध शब्द न तो किसी ग्रंथ में प्रयुक्त हुआ है, न ही लोक-व्यवहार में है। इसी प्रकार "पितर" शब्द के साथ भी इनका यही व्यवहार रहता है। पितर का अर्थ ये केवल पालक, पोषक, रक्षक मान लेते हैं। किन्तु "पा रक्षेण" से तो "पति" शब्द भी सिद्ध होता है। तब जिन वेदमंत्रों में आर्यसमाजी स्त्री अपने पति से कहती है - "हे पति, मुझमें गर्भ का आधान करो," तब वहाँ पति शब्द का अर्थ वैवाहिक पति क्यों मानते हैं? तब भी "पा रक्षेण" धातु से रक्षा करने वाले को ही "पति" मानकर उस महिला से कह दिया जाए कि यहाँ पति का अर्थ वही है जो रक्षा करता है। यदि उसका पति विदेश गया हो और रक्षा घर का कोई अन्य पुरुष करता हो, तो वह उसका पति हो गया? यदि वह भी न हो, तो जो नेपाली रात को "जागते रहो" कहते हुए चौखट बजाकर जाता हो, वह पति हुआ? इस तरह पग-पग पर रक्षा करने वाले सभी उसके पति हो गए, जो गर्भ का आधान करने योग्य हैं। सोचिए, यह कितनी मूर्खतापूर्ण बात होगी। ऐसी मूर्खता ही आर्यसमाजी नित्य करते हैं। याज्ञवल्क्य स्मृति में उल्लिखित है: ‘श्राद्धं नामादनीयस्य तत्स्थानीयस्य वा। द्रव्यस्य प्रेतोद्देशेन श्रद्धया त्यागः।।’ अर्थात् - पितरों के उद्देश्य से उनके निमित्त श्रद्धापूर्वक किए गए द्रव्य का त्याग, "श्राद्ध" है। ‘श्राद्धं वा पितृयज्ञ स्यात्’ (कात्यायन स्मृति १३/४) ‘श्राद्धं तत्कर्म शास्त्रत:’ (अमरकोश २/७/२१) ‘पाणिनि’ ने ‘श्राद्धिन्’ और ‘श्राद्धिक’ को "वह जिसने श्राद्ध-भोजन कर लिया हो" के अर्थ में निश्चित किया है। निम्नलिखित वेदमंत्र को भी देखें, जिसका अर्थ हमने नहीं किया, बल्कि आर्यसमाज के दामोदरदास सातवलेकर द्वारा किए गए भाष्य से लिया गया है: उदी॑रता॒मव॑र॒ उत्परा॑स॒ उन्म॑ध्य॒माः पि॒तर॑: सो॒म्यास॑:। असुं॒ य ई॒युर॑वृ॒का ऋ॑त॒ज्ञास्ते नो॑ऽवन्तु पि॒तरो॒ हवे॑षु॥ (ऋग्वेद १५.१०.१) (अवरे उत् उदीरताम्) जो पितर पृथ्वी पर हैं, वे उन्नत स्थान को प्राप्त करें। (परास: पितर: उत्) जो पितर स्वर्ग में उच्च स्थान पर हैं, वे वहीं रहें। (मध्यमा सोम्यास:) जो मध्यम स्थान का आश्रय करके रहते हैं, वे उच्च स्थान को प्राप्त करें। जो सोमरस पीते हैं, सत्यस्वरूप, केवल प्राणरूप और शत्रुरहित पितर हैं, वे यज्ञकाल में हमारी रक्षा करें। उक्त मंत्र में भिन्न लोकों में निवास करने वाले पितरों का ही वर्णन है। आर्यसमाजी विचार करें कि क्या उनके जीवित माता-पिता में से कुछ स्वर्ग में, कुछ पृथ्वी पर और कुछ मध्यम-अन्तरिक्ष में उड़ते हैं? ये निखा॑ता॒ येपरो॑प्ता॒ ये द॒ग्धा ये चोद्धि॑ताः। सर्वां॒स्तान॑ग्न॒ आ व॑ह पि॒तॄन्ह॒विषे॒अत्त॑वे॥ (अथर्ववेद १८.२.३४) अर्थात, “जो पितर भूमि में गाड़े गए हैं, जो पानी में बहा दिए गए हैं, जो अग्नि में जला दिए गए हैं, हे अग्ने, उन सबको आप हवि भक्षणार्थ बुलाइए।” ये अ॑ग्निद॒ग्धाये अन॑ग्निदग्धा॒ मध्ये॑ दि॒वः स्व॒धया॑ मा॒दय॑न्ते। त्वं तान्वे॑त्थ॒ यदि॒ तेजा॑तवेदः स्व॒धया॑ य॒ज्ञं स्वधि॑तिं जुषन्ताम्॥ (अथर्ववेद १८.२.३५)
जिन आर्य समाजियों को ये लगता है कि श्राद्ध जीवित माता पिता का होता है। उनसे मेरा अनुरोध है कि अपने नवीन मत का अनुसरण करते हुए अपने जीवित माता पिता का अवश्य श्राद्ध तर्पण करें। हो सकता है आपकी विद्वता से प्रभावित होकर वो भी अपने जीवित पुत्र का पिंडदान कर दें। 😄😄
वेद प्रति जलाने वाले आर्य पथिक लेखराम
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स्वामी दयानन्द , सत्यार्थ प्रकाश में कहते है कि - "जो पति संतानोंत्पत्ति में असमर्थ होवे तब अपनी पत्नी को आज्ञा देवे - हे सौभाग्य की इच्छा करने हारी स्त्री, तू मुझसे दूसरे पति की इच्छा कर। " यानि स्वामी दयानन्द , पति के जीते जी , पति से ही , पत्नी को किसी अन्य पुरुष के साथ संभोग करने का आदेश दे रहे है, और ऐसे कार्य को वेद का आदेश बताते है। अब आप सोचिए , कल को आलोक या पर्णानन्द आर्य आदि कोई आर्यसमाजी अपनी बचपन की गलतियो से हुये किसी गुप्त रोग के कारण समर्थ न हुआ , तो क्या वो अपनी पत्नी से ऐसे कहेगा कि - "अरी प्यारी , दवाई डॉक्टर सब फालतू की बाते है , तू अपने लिए कोई अन्य मुस्टंडा ढूंढ ? एक से काम न बने तो दो ढूंढ, चार ढूंढ । अरी में तो कहता हू तू काफिर शचीन्द्र को छोडकर कोई से भी 11 पुरुष ले आ, में खुद अपने हाथो से बिस्तर पर लाल गुलाब की पंखुड़िया बिखेरकर उन्हे लाइन से भेजता रहूँगा।" बताओ है किसी आर्यसमाजी में साहस ?? नियोग के समर्थक आर्यसमाजी ऐसा कहने का साहस रखते है , तो ही यहाँ आकर स्वामी दयानन्द की कही अवैदिक घृणित नियोगविधि का समर्थन करे। ऐसा नहीं है कि स्वामी दयानन्द के इस अवैदिक कुकर्म की हम ही निंदा करते है । स्वयं आर्य प्रतिनिधि सभा , पंजाब ने "वेदामृत" नाम की पुस्तक में, स्वामी दयानंद के इस सिद्धान्त का खंडन किया। आर्यसमाज के ही बड़े विद्वान , प. नरदेव शास्त्री वेदतीर्थ ने अपनी पुस्तक 'आर्यसमाज का इतिहास में लिखा है कि -- "चारो वेद में एक भी ऐसा मंत्र नहीं है, जिसमें स्पष्ट रीति से इस 'नियोग' का प्रतिपादन किया हो। इसलिए हम स्पष्ट रूप से कह सकते है कि वेद इस नियोग के सिद्धान्त के पोषक नहीं है"। इसके अतिरिक्त आर्यसमाज के ही , क्षेमकरण दास, श्री दामोदर सातवलेकर और प्रोफेसर राजाराम आदि अनेकों विद्वानो ने यम-यमी सूक्त को भाई-बहन का ही माना है। निरुक्त एवं आचार्य सायण आदि भाष्यो में भी ऐसा ही है। किन्तु स्वामी दयानन्द बलात् मनमानी व्याख्या करके , इसे पति-पत्नी सूक्त सिद्ध करने पर तुले, क्यो कि उन्हे स्त्री और पुरुषो से नियोग के नाम पर व्यभिचार ही कराना था अथवा स्वयं के लिए व्यभिचार का मार्ग खोलना था। किन्तु दुष्ट आर्यसमाजियों ने स्वामी दयानन्द को नियोग करने हेतु आमंत्रित नहीं किया, फलस्वरूप वो नन्हीजान और रमाबाई के चक्कर में पड़कर अपना दिल तुड़वा बैठे। और क्रोध में आकर अपने वेदभाष्य में आर्यसमाजियों को आदेश दे गए कि - अपने गुदाभाग में सर्प घुसाओ , बकरे का दूध पीओ और बकरी, बैल और मेढ़ा से भोग करो। फिर आगे स्वामी दयानन्द कहते है कि - "जब तक स्त्री गर्भवती रहे, पति पत्नी आपस में भोग न करे " । और ये कहने के बाद स्वामी दयानन्द सत्यार्थ प्रकाश में कहते है कि - "लेकिन अगर इस बीच पति से न रहा जाये तो वो अन्य किसी स्त्री से नियोग कर ले।" । यहाँ स्पष्ट दिख रहा है कि , स्वामी जी के कथानुसार , सेक्स की इच्छा जब प्रबल हो तो व्यक्ति को , नियोग के लिए स्त्री खोजनी चाहिए, ताकि उसके साथ नियोग के नाम पर सेक्स कर करके , वो अपनी वासना शांत कर सके। साथ ही स्वामी जी इस आनंदपूर्ण श्रंखला को रुकने भी नहीं देना चाहते , वो कहते है कि - पुरुष ग्यारह स्त्रियो से नियोग कर सकता है और स्त्री भी ग्यारह पुरुषो से नियोग कर सकती है" । यानि स्वामी दयानन्द के हिसाब से, वैश्याओ के पास जाना तो व्यभिचार है , किन्तु आर्यसमाजी नियोग के नाम पर एक दूसरे के घर की महिलाओ पर वासना की शांति के लिए चढ़ते चले, अपनी पत्नी पर ग्यारह पुरुषो को चढ़ाये और खुद दूसरी ग्यारह स्त्रियो पर जाकर चढ़े, ये उनके कथित निराकार ईश्वर की आज्ञा है। किन्तु स्वामी दयानन्द के इस अवैदिक सिद्धान्त का खंडन अनेक आर्यसमाजियों ने ही किया है । किन्तु फिर भी आज के समय में अनेक नियोग से उत्पन्न आर्यसमाजी इसका समर्थन करते है । (नोट - ग्यारह भिन्न भिन्न जाति-धर्मो के पुरुषो के सम्मिलित अथक नियोगरूपी श्रम से उत्पन्न कोई आर्यसमाजी यहाँ पर महाभारत, रामायण आदि के उदाहरण न दे , क्यो कि स्वामी दयानन्द का घृणित नियोग उससे सिद्ध नहीं होता है , और न ही आर्यसमाजी इन शास्त्रो को मानते है , अतः वह नियोगज आर्यसमाजी यहाँ पर केवल वेद से ही प्रमाण दिखाये ) , और साथ ही ये भी अवश्य बताए, कि स्वामी दयानन्द के नर्कलोक जाने के बाद से लेकर अब तक 140 वर्ष में क्यो किसी भी एक आर्यसमाजी ने, दयानन्द के कहे अनुसार ढ़ोल नगाड़े बजाते हुये, धूमधाम से नियोग की क्रिया सम्पन्न क्यो नहीं की है? ) साभार - शचींद्र शर्मा ( Facebook )
भय को जितने का एकमात्र उपाय है– शक्ति साधना। दुर्गा,काली देवी मूर्तियां साक्षात् शक्ति के स्वरूप हैं। – सुभाषचन्द्र बोस @Esamidha
वास्तविक नहीं। न्याय शास्त्र में कहा गया है - "प्रधानशब्दानुपपत्तेः गुणशब्देन अनुवादः, निंदाप्रशंसोपपत्तेः"। ऐसे स्थलों पर निंदा-प्रशंसा ही विवक्षित होती है, वास्तविकता नहीं। जो शास्त्रीय रीति नहीं समझते अथवा किसी सांप्रदायिक दुराग्रह से ग्रस्त होते हैं, ऐसे अज्ञानी न शास्त्रों की शैली समझते हैं, न रीति, न ही बुद्धि-विवेक का प्रयोग करते हैं। केवल अपनी मतांधता में शास्त्रों के सैकड़ों प्रमाणों की अवहेलना करके, ऐसे श्लोकों से गलत भाव ग्रहण करके भ्रम फैलाते हैं। साभार - शचीन्द्र शर्मा जी
"जन्मना जायते शूद्रः संस्काराद् द्विज उच्यते"। इस श्लोक का कर्मणा वर्ण-व्यवस्था मानने वालों द्वारा बड़ा प्रचार किया जाता है। आर्यसमाजी कहते हैं कि - "देखो, देखो, सभी जन्म से शूद्र ही उत्पन्न होते हैं, और संस्कारों से वे द्विज कहलाते हैं"। हालांकि इस श्लोक से उनका मंतव्य तो सिद्ध नहीं होता, उल्टा अनजाने में इससे जन्मना वर्ण-व्यवस्था ही सिद्ध हो जाती है। क्यों कि इस श्लोक में "जन्म" से सबको शूद्र वर्ण का मान लिया गया, तब कर्मणा वर्ण-व्यवस्था तो खंडित हो गई। क्यों कि शूद्र का कर्म सेवा करना माना जाता है। अब जन्म लेने वाले ने सेवा-कर्म तो कोई किया नहीं, उल्टा सेवा करवा रहा है, फिर भी "केवल जन्म के कारण" उसे कर्मणा-व्यवस्था के विरुद्ध शूद्र मान लेने से तो 'कर्मणा व्यवस्था की धज्जियाँ ही उड़ गईं, और जन्मना वर्ण सिद्ध हो गया। आर्यसमाजियों के सामने फिर एक और बड़ी समस्या खड़ी होगी। वह यह कि - शूद्र के उपनयन संस्कार की विधि किसी शास्त्र में नहीं मिलती। स्वामी दयानंद भी शूद्रों के उपनयन-संस्कार का विधान बताकर नहीं गए हैं, अर्थात् वे शूद्रों का उपनयन-संस्कार का निषेध कर गए हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य का उपनयन तो स्वामी दयानंद अपनी पुस्तक 'संस्कार विधि' में लिख गए हैं, किस आयु में करना है, सब बताकर गए हैं, किंतु शूद्र का नहीं बताकर गए हैं। तब ये जो जन्म से सब आर्यसमाजी शूद्र पैदा होंगे, इनका उपनयन ही नहीं हो पाएगा, न वेद पढ़ पाएंगे, तब तो सब समाजी शूद्र ही रहेंगे, द्विज कैसे बन पाएंगे? ये श्लोक भी तब कैसे फलित होगा? अर्थात् यदि जन्म से सबको वास्तविक शूद्र माना गया होता, तब तो प्रत्येक शास्त्र में शूद्र के उपनयन आदि संस्कारो का विधान दिया गया होता, किंतु वह तो किसी शास्त्र में है ही नहीं। इस प्रकार यह पक्ष पूर्णतः खंडित हो गया। अतः इस श्लोक का तात्पर्य यह नहीं है कि जन्म से सब शूद्र वर्ण के होते हैं। इसका तात्पर्य है कि उपनयन-कर्म से पूर्व एकज होने से सब शूद्र के समान होते हैं। क्यों कि शूद्र का उपनयन नहीं होता है। अर्थात् यहाँ असंस्कृत अवस्था कही गई है। अब समाजी कहें कि - श्लोक में "शूद्रवत्" शब्द है ही नहीं तो नहीं, फिर "शूद्र के समान" अर्थ क्यों ग्रहण करें? इसके समाधान के लिए पतंजलि का महाभाष्य देखें, उसमें आता है - "अंतरेणापि वतिमतिदेशो गम्यते। तद् यथा - एष ब्रह्मदत्तः। अब्रह्मदत्तं ब्रह्मदत्त इत्याह, तेन मन्यावहे - ब्रह्मदत्तवद् अयं भवति।" अर्थात - जो "वह" न हो, किंतु उसको "वह" कह दिया जाए, तो उसका भाव होता है - "उसके समान"। अतः ऐसे स्थलों पर "वत्" प्रत्यय न होने पर भी "वत्" का अर्थ लग जाता है। जैसे कि कहा गया है - "विद्याविहीनः पशुः" अर्थात् विद्याविहीन मनुष्य पशु होता है। अब यहाँ क्या मनुष्य साक्षात चार पैरों वाला पशु हो जाता है? नहीं, बल्कि अपनी बुद्धि का प्रयोग करते हुए यहाँ पर "पशुरिव" अर्थ लिया जाएगा। पशु के समान उसे समझा जाता है। इसी प्रकार उपनयन के पूर्व ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि को शूद्र कहना भी अर्थवाद है। जैसे कि कहा जाता है - "दुर्जनः सर्पः" - तब दुर्जन को क्या वास्तविक साँप समझकर आर्यसमाजी उसे स्वामी दयानंद के कहे अनुसार अंधा करके "बेडरूम" में लेकर भाग पड़ेंगे? कहा जाए - "कायरः मृतकः", तब आर्यसमाज में कोई मनुष्य कायरता दिखाए तो उसे मृतक ही मानकर समाजी उसका दाह संस्कार करने का उद्योग करने लगेंगे? "आलसीः पाषाणः" - आलसी मनुष्य को पत्थर मानकर समाजी उस पर सिर मारेंगे? स्वयं आर्यसमाजी ही स्वामी दयानंद के लिए कहते हैं कि - "दयानन्दः सिंहः आसीत्।" - स्वामी जी शेर थे। तब आर्यसमाजी अपनी बुद्धि का उपयोग करके उन्हें "सिंह के समान" मानेंगे अथवा "जन्मना जायते शूद्रः" की भाँति स्वामी जी को शिकार करने वाला, नरभक्षी, मांस खाने वाला, शेरनियों से भोग करने वाला, जंगल का शेर ही मान लेंगे? स्मृतियों में ऐसे अनेक वाक्य मिलते हैं - "ब्राह्मणाद्याः शूद्रतां यांति संस्कारहीनाः" - अर्थात - ब्राह्मण आदि, संस्कारों के अभाव में शूद्रतुल्य हो जाते हैं। बस यही शूद्रवत् होना संस्कारों के अभाव में जन्म से होना कहा गया है। इसी प्रकार "ब्रह्म जानाति ब्राह्मणः" का भी समझना चाहिए। वैसे यह उत्तरार्ध किसी टीका में मिलता नहीं है। लेकिन हो भी तो यह ब्रह्मज्ञान का प्रशंसार्थवाद है। अन्यथा उपनिषदों में वर्णित अश्वपति, प्रवाहण, जनक, अजातशत्रु, यम आदि ब्रह्मज्ञाता थे किंतु उन्हें ब्राह्मण नहीं कहा गया है। और ब्रह्मविद्या न जानने वालों को भी अब्राह्मण नहीं कहा गया, बल्कि ब्राह्मण ही कहा गया है। जैसे कि नचिकेता, गार्ग्य, बालाकि आदि ब्रह्मविद्या न जानते हुए भी ब्राह्मण ही कहे और माने गए हैं। शास्त्रो में ऐसे हजारो उदाहरण हैं, लेकिन जन्म से सबको शूद्र जाति का समझा गया हो, ऐसा कोई उल्लेख कही नहीं मिलता। अतः ऐसे कथन प्रशंसार्थवाद और औपचारिक होते है।
जैसे ही कोई आपदा आतंकवादी हमला भारत पाकिस्तान टेंशन होती तो लोगो को उग्र साधना की याद आती धर्म रक्षण के लिए । एक पोस्ट तो सीधे यज्ञ के लिए सहयोग के लिए थी। सीधे आपदा में अवसर कमा लिया जाए कुछ। भैया 13 से 16 के बीच मेरे एक मित्र और मैंने खूब कोशिश की कि लोगो की टीम बन जाये जो एक डेढ़ घण्टे राष्ट्र के।लिए धर्म के लिए जप कर सके ।लेकिन 4 5 लोगो के सिवा कोई मिला ही नही।उन्होंने तो सीखना बन्द कर दिया । मैंने तो ये देखा लोग खुद के लिए करने को तैयार नही ,खुद की समस्या हल करने के लिए तांत्रिक खोज रहे राष्ट्र के लिए खाक करेगे। वो इंतजार करते किसी सिद्ध का अवतार का नायक का जो सबकी समस्या हल करेगा। खैर ये लड़ाई एक दिन की नही रोज की है- 1.अपनी शक्तियों को पोषित करे जप, पाठ हंवन बलि के द्वारा। 2. अधिक से अधिक लोगो को प्रेरित करे जप पाठ के लिए हनुमान चालीसा, शिव शिव, राम राम काली काली दुर्गा दुर्गा का जप करे। 3. महीने में कम से कम एक बार हवन करवाये या करे। 4. अपने कुल की शक्तियों को भोग वर्ष में एक बार की जगह कई बार दे। 5. जो करना चाहते उन्हें तन्त्र सिखाएं। 6. एस्ट्रल की लड़ाई जीते जिससे भौतिक में हिन्दू धर्म का भाग्य सुधरे। आपका नेता ऊपर जाने पे पिलपिला न हो जाये गुजरात का मोदी रहे उसमें मोती की आत्मा न घुसे। मैं 4 5 उग्र विद्या नॉर्मली करवाता हु दुर्गा जी,दक्षिण काली, बगलामुखी,भैरव ,कमला आदि बाकी भी योग्यता होने पे दे सकता हूँ भैरवी तारा प्रत्यंगिरा। साभार - श्री आशुतोष देवलिया सम्पूर्णानन्द जी