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Rahat indori

Rahat Indori is an Indian poet and Bollywood lyricist.

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  • I hope everyone of you is safe and sound 🙏.

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  • कभी महक की तरह हम गुलों से उड़ते हैं, कभी धुए की तरह परबतों से उड़ते हैं, ये कैंचियाँ हमें उड़ने से ख़ाक रोकेंगी, के हम परों से नहीं हौसलों से उड़ते हैं... -राहत इंदौरी

  • 27 апр. 2024 г.19,1 тыс634

    ज़ुल्फ़ बन कर बिखर गया मौसम, धूप को छांव कर गया मौसम.. मैंने पूछी थी ख़ैरियत तेरी, मुस्करा कर गुज़र गया मौसम.. फिर वो चेहरा नज़र नहीं आया, फिर नज़र से उतर गया मौसम.. तितलियाँ बन के उड़ गयीं रातें, नींद को ख़्वाब कर गया मौसम.. फूल ही फूल थे निगाहों में, दाग ही दाग भर गया मौसम... तुम ना थे तो मुझे पता न चला, किधर आया किधर गया मौसम... आप के आने की ख़बर सुन कर, जाते जाते ठहर गया मौसम... - @rahatindori

  • 26 апр. 2024 г.15,3 тыс421

    प्यार का रिश्ता कितना गहरा लगता है, हर चेहरा अब तेरा चेहरा लगता है... तुमने हाथ रखा था मेरी आँखों पर, उस दिन से हर ख़्वाब सुनहरा लगता है... उस तक आसानी से पहुँचना मुश्किल है, चाँद के दर पर रात का पहरा लगता है... जबसे तुम परदेस गये हो बस्ती में, चारों तरफ़ सेहरा ही सेहरा लगता है... कच्चे घड़े के रिश्ते अब तो ख़त्म हुए, दरिया भी कुछ ठहरा ठहरा लगता है... मज़बूरी रोने भी नहीं देती मुझको, दरियाओं पे आज भी पहरा लगता है... -राहत इंदौरी

  • 25 апр. 2024 г.13,5 тыс432

    मुश्किल से हाँथों में ख़ज़ाना पड़ता है, पहले कुछ दिन आना जाना पड़ता है... ख़ुश रहना आसान नहीं है दुनिया में, दुश्मन से भी हाथ मिलाना पड़ता है... इश्क में सचमुच का नहीं तो वादों का, ताजमहल सबको बनवाना पड़ता है... यूँ ही नहीं रहता है उजाला बस्ती में, चाँद बुझे तो घर भी जलाना पड़ता है... तुम क्या जानो तन्हा कैसे जीते हैं, दीवारों से सर टकराना पड़ता है... तू भी फलों का दावेदार निकल आया, बेटा पहले पेड़ लगाना पड़ता है... मुश्किल फ़न है ग़ज़लों की रोटी खाना, बहरों को भी शेर सुनाना पड़ता है... - राहत इंदौरी

  • 24 апр. 2024 г.11,8 тыс112

    कई दिनों से अंधेरों का बोलबाला है चराग़ ले के पुकारो, कहां उजाला है ख़याल में भी तेरा अक्स देखने के बाद, जो शख़्स होश गँवा दे, वो होश वाला है जवाब देने के अन्दाज़ भी निराले हैं, सलाम करने का अन्दाज़ भी निराला है सुनहरी धूप है सदका तेरे तबस्तुम का, ये चाँदनी तेरी परछाई का उजाला है मैं तुझ को कुफ़्र से तशबीह दूँ कि इमाँ से, पता नहीं कि तू मस्जिद है या शिवाला है मज़ाक उड़ाते हैं पानी के बुलबुले उसका, जिस आदमी ने समन्दर निचोड़ डाला है है तेरे पैरों की आहट ज़मीन की गर्दिश, ये आसमाँ तेरी अँगड़ाई का हवाला है - राहत इंदौरी

  • 23 апр. 2024 г.10,5 тыс318

    जहाँ से गुज़रो धुआँ बिछा दो, जहाँ भी पहुँचो धमाल कर दो, तुम्हे सियासत ने हक दिया है, हरी ज़मीनों को लाल कर दो मोहब्बतों का हूँ मैं सवाली, मुझे भी एक दिन निहाल कर दो, नज़र मिलायो, नज़र मिला कर, फ़कीर को मालामाल कर दो अपील भी तुम, दलील भी तुम, गवाह भी तुम, वकील भी तुम, जिसे भी चाहो हराम लिख दो, जिसे भी चाहो हलाल कर दो है सादगी में अगर ये आलम, कि जैसे बिजली चमक रही है, जो बन संवर के सड़क पे निकलो, तो शहर भर में धमाल कर दो तुम्ही सनम हो, तुम्ही ख़ुदा हो, वफ़ा भी तुम हो, तुम ही जफ़ा हो, सितम करो तो मिसाल कर दो, करम करो तो कमाल कर दो तुम्हें किसी की कहां है परवाह, तुम्हारे वादे का क्या भरोसा, जो पल की कह दो तो कल बना दो, जो कल की कह दो तो साल कर दो अभी लगेगी नई नई सी, ये इक फज़ा है जो सुरमई सी, जो ज़ुल्फ़ चेहरे से तुम हटा लो, तो सारा मंज़र गुलाल कर दो - राहत इंदौरी

  • 22 апр. 2024 г.10,1 тыс35

    अगर नसीब करीब ए दर ए नबी हो जाये मेरी हयात मेरी उम्र से बड़ी हो जाये गुज़रता कैसे है एक एक पल मदीने में अगर सुनाने पे आऊँ तो एक सदी हो जाये दर ए हबीब से हर बार वापसी के वक़्त दुआ ये माँगी के एक और हाज़री हो जाये अंधेरे पाँव ना फैला सकें ज़माने में दरुद पढ़िए के हर सिम्त रोशनी हो जाये कबूतरों के मैं दाने समेट लाया था इसी बहाने सितारों से दोस्ती हो जाये मैं मीम हे लिखूँ फिर मीम लिखूँ दाल लिखूँ ख़ुदा करे के यूँ ही खत्म ज़िन्दगी हो जाये - राहत इंदौरी