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Samalochan : Literature, Arts, and Ideas

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  • साहित्य और भाषा में अश्लीलता का प्रश्न कोई नया नहीं है. अलंकारशास्त्र में इसे ऐसा दोष माना गया है, जो ‘ग्राम्य’ है. संदर्भ और मन्तव्य ही तय करते प्रतीत होते हैं कि क्या शिष्ट है और क्या नहीं. जेन ज़ी पीढ़ी के ‘जंतर-मंतर’ के असरदार ऐतराज़ के शिल्प और कथ्य इन दिनों चर्चा में हैं. लेखक-पत्रकार त्रिभुवन ने इस विषय को विस्तार से समझते हुए इसके लगभग सभी संभावित पक्षों पर प्रकाश डाला है. ऐसा लेख अभी कहीं देखा नहीं गया है. प्रस्तुत है. https://samalochan.com/the-obscene-language-of-jantar-mantar/

  • जिसका भविष्य है, उसी का कल है. सत्ताएँ गिर गईं, संरचनाएँ बदल गईं. धर्मों से नए धर्म निकल आए. कब तक रोकेंगे? रोक पाएँगे? वे अलग हैं, अनोखे हैं और आपसे बेमेल हैं, इसीलिए तो नए हैं. युवाओं के इन आंदोलनों ने व्यापक स्तर पर लेखकों और कलाकारों को विचलित किया है और प्रभावित भी. वे इसे समझ रहे हैं और अपनी प्रासंगिकता लिख रहे हैं. अपनी निर्मित मूर्ति को बार-बार तोड़ना एक सच्चे कलाकार का आत्महंता आत्मसंघर्ष है. कुमार अम्बुज ऐसे ही कवि हैं. उनकी प्रस्तुत कविताओं में समय अपने तीखे और बेहद विडम्बनात्मक स्वर के साथ उपस्थित है. जब अंतर्विरोध तीखा हो जाता है, तब स्वर उठता है. गुनगुनाने और फुसफुसाने का समय नहीं रह जाता. गहरी बेचैनी से भर देने वाली इन कविताओं में कुमार अम्बुज कथ्य को जोड़ते चलते हैं और देखते-देखते वह एक व्यापक सामाजिक रूपक में बदल जाता है. पुनरावृत्तियाँ इसे और सघन करती हैं. समकालीन यथार्थ की ऐसी सधी हुई व्यापकता अर्जित करना आसान नहीं. प्रस्तुत है यह ख़ास अंक. https://samalochan.com/more-of-kumar-ambujs-poems/

  • प्रेमचंद के कालजयी उपन्यास 'गोदान' के पात्रों की संततियाँ आज कहाँ हैं? 1936 से 2026 तक के इन नब्बे वर्षों में, गुलाम भारत से स्वतंत्र भारत की यात्रा के दौरान क्या उनकी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्थितियों में कोई बुनियादी परिवर्तन आया है? क्या होरी के वंशज आज भी कर्ज़ के उसी दुष्चक्र में फँसे हैं? रविन्द्र कुमार ने 'गोदान' के पात्रों की संततियों का समकालीन परिप्रेक्ष्य में ऐसा सजीव आकलन किया है कि वे मानो हमारे सामने उपस्थित हो उठते हैं. समाज-विज्ञान और साहित्य का यह सृजनात्मक संगम 'गोदान' के अध्ययन का एक नया मार्ग खोलता है. प्रेमचंद जयंती के अवसर पर यह विशेष प्रस्तुति. https://samalochan.com/what-are-the-descendants-of-godaan-doing-today/

  • जेन ज़ी की भाषा को समझने में पुरानी पीढ़ियों को भले कठिनाई हो, उनकी संवेदनाओं, बेचैनियों और संघर्षों को समझने में नहीं. पीढ़ियाँ अंततः इसी तरह एक-दूसरे से जुड़ी रहती हैं. भाषा बदलती है, मनुष्य की आकांक्षाएँ और न्याय की इच्छा नहीं. ‘बेबी बूमर्स’ पीढ़ी के शैलेन्द्र चौहान ने इन कविताओं में भारत सहित दुनिया के अनेक देशों में जेन ज़ी के संघर्षों, उनके प्रतिरोध के तौर-तरीकों और उन्हें लेकर उठने वाले सवालों से संवाद किया है. साहित्य अंततः वही टिकता है जो अपने समय के जन-जीवन, उसके सुख-दुःख, संघर्ष और यातना को स्वर देता है. प्रस्तुत हैं शैलेन्द्र चौहान की ये कविताएँ. https://samalochan.com/poetry-for-gen-z/

  • भारत के युवा नागरिकों के जंतर-मंतर के आंदोलन ने न केवल भारत बल्कि पड़ोसी देशों के लोकतंत्र के मुरझाते वृक्ष में जीवन-जल डालने का कार्य किया है. इसका असर भारतीय राजनीति पर क्या पड़ेगा, इसे तो समय ही बताएगा, पर इसने नागरिकता का उत्सव ही रच दिया है, यह प्रत्यक्ष है. रविन्द्र कुमार अमेरिका के ओरेगन विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं और भारत आए हुए हैं. वह इसमें शामिल भी हुए और इस पूरे आंदोलन का उन्होंने यह विश्लेषण भी किया है. यह खास आलेख आपके लिए प्रस्तुत है. https://samalochan.com/citizenship-at-jantar-mantar/

  • विश्वप्रसिद्ध चित्रकार सैयद हैदर रज़ा को स्मरण करते हुए उन पर दो दुर्लभ सामग्री प्रस्तुत की जा रही हैं. रज़ा जब फ्रांस पहुँचे ही थे और कला-जगत में अपनी पहचान गढ़ रहे थे, तब रामकुमार ने उनकी विशिष्टता को पहचानते हुए यह उल्लेखनीय लेख लिखा था. बाद के वर्षों में, जब रज़ा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित हो गए और भारत आए, तब प्रयाग शुक्ल ने उनसे यह ख़ास बातचीत की थी. पत्रिकाओं के पुराने अंकों से यह दुर्लभ सामग्री मनोज मोहन ने उपलब्ध कराई है. यह अंक इस जिज्ञासा के साथ प्रस्तुत है कि आज दिल्ली के जंतर-मंतर पर युवाओं का जो आंदोलन चल रहा है, वहाँ हिंसा और क्रूरता के दृश्य हैं, तो साहस, प्रतिरोध और मनुष्यता के भी हैं. यदि रज़ा आज हमारे बीच होते, तो क्या यह उन्हें प्रेरणा से भर नहीं देता? क्या बाद में ही सही, इस अनुभव से उनकी कोई नई कृति जन्म लेती? कला का तात्कालिक जनांदोलनों से क्या संबंध होता है? https://samalochan.com/raza-remembrance/

  • सभ्यताओं की कुंजी उनके प्राचीनतम महाकाव्यों में निहित है. विश्व के लगभग सभी महाकाव्यों में उल्लेखनीय उभयनिष्ठता दिखाई देती है. लगभग दो हजार ईसा पूर्व सुमेरियन भाषा में रचा गया गिलगमेश विश्व का सबसे प्राचीन ज्ञात महाकाव्य है. यह प्राचीन मेसोपोटामिया की सभ्यता की कथा कहते हुए मनुष्य के मृत्यु-बोध, मित्रता और अर्थपूर्ण जीवन की खोज जैसे सार्वकालिक प्रश्नों से हमारा सामना कराता है. इसकी प्रतिध्वनियाँ बाद के अनेक महत्त्वपूर्ण महाकाव्यों में भी सुनी जा सकती हैं. विजयशंकर चतुर्वेदी ने इस महाकाव्य और उसके साहित्यिक, सांस्कृतिक तथा दार्शनिक महत्त्व का विस्तृत और सहज विवेचन किया है. प्रस्तुत है उनका यह विचारोत्तेजक आलेख. https://samalochan.com/gilgamesh/

  • साहित्य, संस्कृति और सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषण-विमर्श के क्षेत्र में प्रफुल्ल कोलख्यान का नाम सुपरिचित है. विभिन्न विषयों पर उनसे महेश मिश्र की यह विचारोत्तेजक बातचीत विशेष रूप से आपके लिए प्रस्तुत है. https://samalochan.com/a-conversation-with-prafulla-kolkhyan-by-mahesh-mishra/

  • प्रमाण दिखाने और ख़ुद को साबित करने की इस महामारी में न जाने कितने लोग पिस रहे हैं. आधार कार्ड, मतदाता पहचान-पत्र, निवास प्रमाण-पत्र, शजरा, खसरा, पट्टा और नागरिकता के काग़ज़ों की इस गिर्दाब में एक गाँव का खेतिहर मुस्तफ़ा भी फँस जाता है. यह कहानी कमोबेश हमारे समय की एक आम यंत्रणा है. उज़्मा कलाम की यह कहानी इसी त्रासद यथार्थ को बखूबी सामने लाती है. प्रस्तुत है. https://samalochan.com/girdab/

  • वरिष्ठ पत्रकार-लेखक त्रिभुवन जिस विषय पर भी लिखते हैं, उसे व्यापक परिप्रेक्ष्य प्रदान करते हुए उसकी जड़ों तक पहुँच जाते हैं. उल्लेखनीय यह है कि इस पूरी रचनात्मक यात्रा में पठनीयता कहीं क्षीण नहीं होती. राजकमल प्रकाशन से हाल ही में प्रकाशित गीताश्री की पुस्तक ‘हब्बा की खोज: बुलबुल-ए-कश्मीर: शख़्सियत और शायरी’ के बहाने उन्होंने दक्षिण एशिया की स्त्री-चेतना का एक व्यापक वृत्तांत ही रच डाला है, जो इतिहास को वर्तमान से भी जोड़ता है. यह आलेख इस ख़ित्ते की तमाम ‘हब्बाओं’ को सजीव करता है. प्रस्तुत है. https://samalochan.com/habba-khatoon/

  • समुद्र की अथाह गहराइयों से होते हुए जीवन धरती के समतल पर पसरता चला गया. लाखों वर्षों के परिवर्तनों के साथ उसने जल के भीतर रहना छोड़ दिया, पर जल उससे कभी नहीं छूटा. जितना जल उसके भीतर है, उतना ही उसके बाहर भी. उसके पास एक नाव थी, जिसके सहारे वह जब-तब पर अपने पुराने घर लौटता रहता था. भारतीय संस्कृति में समुद्र का केंद्रीय महत्व है और समुद्र-यात्राओं का भी. प्रलय जलराशि के बिना संभव नहीं, इसलिए हर कल्पांत में समुद्र उपस्थित है. वेद, पुराण और समूचा संस्कृतवाङ्मय समुद्र की सरस लीलाओं से भरा पड़ा है. पतन का पहला संकेत भाषा में दिखाई देता है. न जाने कब और क्यों समुद्र-यात्रा को निषिद्ध मान लिया गया. परिणाम यह हुआ कि समुद्री-सहचरों ने एक-एक करके हमें पदाक्रांत करना शुरू कर दिया. भारतीय स्वाधीनता-संग्राम केवल राजनीतिक संघर्ष नहीं था. वह चेतना का भी संघर्ष था. एक विलक्षण विद्वान थे महामहोपाध्याय मधुसूदन ओझा, जिन्होंने संस्कृत वाङ्मय के प्रमाणों के आधार पर समुद्र-यात्रा निषेध की धारणा को छिन्न-भिन्न कर दिया और यह मार्ग फिर से प्रशस्त हुआ. भारतीय संविधान नवजागरण का नवनीत है. उसने निषेध, वर्जना और भेदभाव के उलझे, जटिल और मजबूत जाल को एक झटके में काट दिया. अन्यथा विदेशों से आने जाने वाले भारतीय तरह-तरह के प्रायश्चित्त ही करते रहते. इस आलेख में विद्वान लेखक-विचारक राधावल्लभ त्रिपाठी समुद्र के ऐसे आयामों से हमारा परिचय कराते हैं, जिनमें कोई कल्पनाशील कथाकार अनेक उपन्यासों की संभावनाएँ देख सकता है. समुद्र-यात्रा की प्रस्तुत यह बहस हमें दिखाती है कि रूढ़ियों और वर्जनाओं का प्रतिकार उसके भीतर से भी किया जा सकता है. दो खंडों में एक साथ प्रकाशित यह आलेख हमें उस दुनिया में ले जाता है, जो न जाने कैसे हमसे कटती चली गई. सभ्यताओं की यात्राएँ इसी तरह अवरुद्ध होती हैं और फिर नए विचारों के सहारे अपने लिए नई राह भी बनाती हैं. यह यात्रा फिर कभी अवरुद्ध न हो, यही हमारे समय की बड़ी चुनौती है. यह विशिष्ट आलेख विशेष रूप से आपके लिए प्रस्तुत है. इसे केवल एक लेख के रूप में नहीं, बल्कि एक आवश्यक बौद्धिक हस्तक्षेप के रूप में पढ़िए. इसमें बहुत कुछ ऐसा है, जो आपके विचारों को समृद्ध करेगा, और लंबे समय तक आपके साथ बना रहेगा. https://samalochan.com/debate-on-the-ocean-and-sea-voyage-in-sanskrit-literature/

  • गरिमा श्रीवास्तव पिछले कई दशकों से तैयारी, तल्लीनता और तसल्ली के साथ लेखन, आलोचना तथा संचयन-संपादन का कार्य कर रही हैं. उनका उपन्यास ‘आउशवित्ज़ : एक प्रेम कथा’, संस्मरणात्मक यात्रा-वृत्त ‘देह ही देश’ और स्त्री आत्मकथाओं पर केंद्रित उनकी चर्चित पुस्तक ‘चुप्पियाँ और दरारें’ उनकी रचनात्मकता और अध्यवसाय के उदाहरण हैं. एक ऐसे समय में जब अकादमिया में गंभीर लेखन की अपेक्षा अन्य उद्यम ही अधिक दिख रहे हैं, उनका होना जहाँ अपवाद है वहीं आश्वस्ति भी. फ़्रांज़ काफ़्का पर प्रस्तुत यह आलेख भी उनकी इसी बौद्धिक प्रतिबद्धता का सुफल है. इसमें काफ़्का के जीवन, पारिवारिक परिवेश, लेखन और उनकी विशिष्ट रचनात्मकता का गंभीर तथा सूक्ष्म विवेचन किया गया है. काफ़्का (3 जुलाई, 1883 – 3 जून. 1924) को याद करने का आज दिन भी है. आलेख प्रस्तुत है. https://samalochan.com/kafka/

  • हिंदी में मौलिक सामाजिक‑राजनीतिक विषयों पर स्तरीय पुस्तकें लगातार प्रकाशित हो रही हैं. साथ ही महत्वपूर्ण अनूदित कृतियाँ भी सामने आ रही हैं. हिंदी समाज के बौद्धिक विकास के लिए इनका महत्व निर्विवाद है. इसी क्रम में प्रख्यात राजनीतिक सिद्धांतकार राजीव भार्गव की हिंदी में अनूदित पुस्तक ‘उपनिवेश: सांस्कृतिक अन्याय को कैसे समझें’ सेतु विचार अन्तर्गत जिज्ञासा श्रृंखला में प्रकाशित हुई है. इसका अनुवाद नरेश गोस्वामी ने किया है. इस पुस्तक की विस्तृत चर्चा कुँवर प्रांजल सिंह कर रहे हैं https://samalochan.com/upnivesh-sanskritik-anyaya-ko-kaise-samjhen/

  • गार्गी मिश्र की इन कविताओं में बिखरते, टूटते और ठूँठ होते समय की विविध संवेदनाएँ हैं. इनमें एक ऐसी निर्लिप्तता है जो बहुत कुछ देख लेने के बाद दृष्टि की रक्षा करती है. यातना को सहने का शऊर देती है, जिसकी नोक भीतर धँसी हुई है. इनमें अंत की तैयारी जैसी दार्शनिकता है. उनकी दस कविताएँ प्रस्तुत हैं. https://samalochan.com/gargi-mishra/

  • बिना विश्वदृष्टि के कोई लेखक सचमुच बड़ा नहीं हो सकता. उससे सहमत-असहमत हुआ जा सकता है. इसमें कोई संदेह नहीं कि सलमान रश्दी दुनिया के बड़े लेखकों में एक हैं. उनसे यह बातचीत ग्रांटा के संपादक थॉमस मीनी ने भारत-केंद्रित ‘ग्रांटा’ के 173वें अंक के लिए की थी. हिंदी सहित भारतीय भाषाओं में अनुवाद, साहित्य और राजनीति जैसे विषयों पर केंद्रित यह अत्यंत विचारोत्तेजक बातचीत लेखक-संपादक प्रभात रंजन ने बड़े मनोयोग से हिंदी में अनूदित की है. यह ख़ास अंक आपके लिए प्रस्तुत है. https://samalochan.com/interview-with-salman-rushdie/

  • रविन्द्र कुमार अमेरिका के ओरेगन विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग से जुड़े हैं. भारत लौटने की उनकी यात्रा दिलचस्प है. विभिन्न देशों और संस्कृतियों से गुजरते हुए वे जहाँ उनके बीच के अंतरों को देखते हैं, वहीं उनके अर्थ को समझने की भी कोशिश करते हैं. और यही दृष्टि इस सफ़र को या किसी भी सफ़र को मूल्यवान बनाती है. प्रस्तुत है. https://samalochan.com/homecoming-journey/

  • वसीम अहमद अलीमी की प्रस्तुत कहानी ‘सज्दा और समाधि’ सत्रहवीं सदी के बनारस में रहने वाले साधु और एक सूफ़ी संत की दोस्ती पर आधारित है. कहानी में ये दोनों ईश्वर-साधना तथा उस तक पहुँचने के अपने-अपने आध्यात्मिक मार्गों पर विचार-विमर्श करती हैं. मुख्य रूप से यह कहानी योग-साधना और सूफ़ी परंपरा के तसव्वुफ़ी अमल के बीच निहित गहरी समानताओं को रेखांकित करती है. उर्दू से इसका हिंदी अनुवाद शहादत ने किया है. अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर प्रस्तुत है यह दिलचस्प कहानी. https://samalochan.com/sajda-aur-samadhi/

  • डिस्टोपियन कथा-साहित्य का समृद्ध इतिहास है और उसकी शिखर कृतियों में जॉर्ज ऑरवेल का ‘1984’ अग्रणी स्थान रखता है. यह एक सर्वकालिक क्लासिक है. डिस्टोपियन साहित्य का महत्व केवल भविष्य की भयावह कल्पनाएँ प्रस्तुत करने में नहीं, बल्कि वर्तमान समाज, राजनीति, प्रौद्योगिकी और सत्ता-संरचनाओं की आलोचनात्मक पड़ताल करने में भी है. समय जिस दिशा में बढ़ रहा है, उसे देखते हुए यह असंभव नहीं लगता कि विजयशंकर चतुर्वेदी की प्रस्तुत कथा ‘डेटा नॉट फाउंड’ की कल्पित स्थितियाँ जल्दी ही वास्तविकता का रूप ले लें. क्या यही हमारा भविष्य है? https://samalochan.com/data-not-found/

  • कविता यदि आपके भीतर सोई पड़ी है, तो वह एक दिन उठ बैठेगी. वह भीतर-ही-भीतर आपका पीछा करती रहती है और फिर एक दिन आपके सामने आ खड़ी होती है. शिंजिनी की कविताएँ दैनंदिन जीवन, कार्य-व्यापार की आपाधापी और दुनिया की व्यस्तताओं के बीच अपनी ही ज़बान में, एक पकी हुई उम्र में सामने आई हैं. अंग्रेज़ी में उनकी एक पुस्तक प्रकाशित हो चुकी है और उनकी रचनाएँ निरंतर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं. इसी वर्ष वाणी प्रकाशन से उनका पहला हिंदी कविता-संग्रह 'घुमक्कड़ औरत' प्रकाशित हुआ है. उनकी कुछ कविताएँ प्रस्तुत हैं. https://samalochan.com/shinjini/

  • जैसा समय चल रहा है, उसमें गंभीर, प्रमाणिक और आलोचनात्मक लेखन की जगह न केवल सिकुड़ती जा रही है, बल्कि उसमें जोखिम के तत्व का भी समावेश हो गया है. ऐसे समय में चंद्रभूषण का लेखन अनभय सच कहने की भारतीय परम्परा को जीवित रखे हुए है. उनका हाल का लेखन सांस्कृतिक इतिहास-बोध का सशक्त उदाहरण है. आप उन्हें लगातार समालोचन में पढ़ते रहे हैं. उनसे यह विचारोत्तेजक बातचीत महेश मिश्र ने की है. उन्होंने भीतर तक जाकर कुरेदा है और इस प्रक्रिया में अनेक नई बातें सामने आई हैं. इससे पहले अनिल यादव से उनकी बातचीत आप यहीं पढ़ चुके हैं, जिसका विस्तृत रूप अनिच्चवत संखारा शीर्षक से पुस्तकाकार प्रकाशित हो चुका है. यह ख़ास बातचीत पाठकों के लिए प्रस्तुत है. https://samalochan.com/conversation-between-chandra-bhushan-and-mahesh-mishra/